राजस्थान के लोक नृत्य | Rajasthan ke lok nritya

राजस्थान के लोक नृत्य

यह लेख राजस्थान और भारत के विभिन्न लोक नृत्यों का एक व्यापक संग्रह है। इसमें मनोरंजन, धार्मिक आस्था और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किए जाने वाले नृत्यों का सुंदर वर्णन है।
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लेख के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
  • शास्त्रीय नृत्य: राजस्थान का एकमात्र शास्त्रीय नृत्य कत्थक है, जिसके जयपुर घराने और उसकी बारीकियों पर चर्चा की गई है।
  • प्रमुख लोक नृत्य: लेख में घूमर (नृत्यों का सिरमौर), गैर (भीलों का नृत्य), कच्छी घोड़ी, और तेरहताली जैसे प्रसिद्ध नृत्यों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उनकी प्रस्तुति शैली को समझाया गया है।
  • क्षेत्रीय और जातीय नृत्य: इसमें राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों (जैसे शेखावाटी का गींदड़, जालौर का ढोल) और विभिन्न जनजातियों (जैसे कालबेलिया, भील, गरासिया, सहरिया) के विशिष्ट नृत्यों का विस्तार से विवरण है।
  • विशेष परंपराएं: अग्नि नृत्य (जसनाथी संप्रदाय), चरी नृत्य (गुर्जर जाति), और मछली नृत्य जैसे अनोखे नृत्यों की परंपराओं और उनके पीछे की कहानियों को भी इसमें शामिल किया गया है।
  • राष्ट्रीय संदर्भ: लेख की शुरुआत में भारत के अन्य शास्त्रीय नृत्यों जैसे भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, और कथकली का संक्षिप्त परिचय दिया गया है, जो पाठक को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है।
यह विवरण न केवल नृत्यों के प्रकार बताता है, बल्कि उनसे जुड़े वाद्य यंत्रों, कलाकारों और सांस्कृतिक महत्व को भी स्पष्ट करता है।

आनन्द की अनुभूति होने पर कलाकार हाथ व पाँव को लचकाता है। जिसे लोक नृत्य कहते हैं। लोक नृत्य में कोई नियम नहीं होते हैं।

भारत के प्रसिद्ध नृत्य

(1) भरतनाट्यम्
प्रसिद्ध- तमिलनाडु
भालारिपु, जातिस्वरम, शब्दम, वर्णम, पद्म, तिल्लाना भरतनाट्यम के क्रमानुसार चरण।
नृत्यकार- यामिनी कृष्णमूर्ति, सोनल मानसिंह, टी. बालसरस्वती, पद्मा सुब्रामण्यम, मृणालिनी साराभाई, रूक्मिणी देवी।

(2) कुचिपुड़ी
विषय महाभारत से लिया गया।
नर्त, नृत्य, नाट्य ये तीन प्रकार है।
पुरुष प्रधान नृत्य।
नृत्यकार- वेदांतम, वेमपति चित्र सत्मय, राधा रेड्डी, राजा, स्वप्न सुंदरी शोभा नायडू, यामिनी कृष्णमूर्ति।
देवीलाल सामर ने राजस्थान के लोकनृत्य को भौगोलिकता के आधार पर तीन भागों में बांटा - राजस्थानी, पूर्वी मैदानी, पहाड़ी।

(3) कथकली
प्रसिद्ध- केरल का शास्त्रीय नृत्य।
विषय- रामायण, महाभारत।
पुरूष प्रधान नृत्य।
नाटकीय रूप में सिर पर मुकुट धारण कर प्रस्तुत किया जाता है।
यह नृत्य चेहरे पर रंग लगाकर ताण्डव भाव में किया जाता है जो अच्छाई-बुराई के संघर्ष को प्रदर्शित करता है।
नृत्यकार- वल्लठोल नारायण, मृणालिनी साराभाई, रीता गांगुली, कनक रेले, शांताराव, रागिनी देवी, कृष्णट्टम, कुडिभट्टम।

(4) मणिपुरी
स्त्री-पुरुषों द्वारा
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस नृत्य को भारत में प्रसिद्ध किया।
वाद्य यंत्र- ढोल, पुंगी।
नृत्यकार- साधेनी बोस, विपिन सिंह, नयना, सुवर्णा, दर्शाना, चारू माथुर, रंजना।

(5) मोहिनीअट्टम नृत्य
प्रसिद्ध- केरल का शास्त्रीय नृत्य।
महिलाओं द्वारा साड़ी व गले में चमेली की माला पहनना।
पौराणिक कथाओं का प्रदर्शन होता है।
इस नृत्य में कथकली व भरतनाट्यम का मिश्रण होता है।
प्रारम्भ- 19वीं सदी, स्वाति तिरूनल (त्रवनकोर, केरल शासक)
नृत्यकार- नारायण मेनन, शांता राव, रोशन वजीफदार, शिवाजी, भारती, जया मेनन, गोपिका वर्मा, पल्लवी कृष्ण, शदा दत्ता, वैजंतीमाला, सुनंदा नय्यर।

(6) ओडिसी नृत्य
प्रारम्भ- उड़ीसा के मंदिरों में देवदासियों द्वारा।
स्त्री-पुरुषों द्वारा।
भरतनाट्यम से मिलता-जुलता नृत्य।
राधा-कृष्ण प्रेम कथा का प्रस्तुतीकरण।

(7) बिहू नृत्य
प्रसिद्ध- असम
तीन प्रकार से होता है-
(1) बोहाग बिहू - नववर्ष स्वागत में।
(2) माध्य बिहू - धान फसल पकने पर।
(3) वैशाख बिहू - वसन्त उत्सव पर।

(8) छाउ नृत्य
शास्त्रीय नृत्य
प्रसिद्ध- बिहार, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल।
स्त्री-पुरूष द्वारा।
मुखौटा प्रधान नृत्य।
वाद्य यंत्र- ढोल, करताल
नटराज की अर्द्धनारीश्वर रूप की कल्पना।
श्रीलंका, जापान, इंडोनेशिया से मिलता-जुलता।

(9) पुलिअट्टम नृत्य
प्रसिद्ध- कर्नाटक
पुरूष शरीर पर बाघों की धारियाँ बनाकर नृत्य करते हैं।

(10) यक्षगान
प्रसिद्ध- कर्नाटक
ओबिया का गुरूदा चलन, श्रीन्थ का कृष्ण हीरामिण, रूद्रकवि का सुग्रीव विजय इस नृत्य के प्रसिद्ध नाटक है।
सोमनाथ रचित बहुनाटक यक्षगान का मूल आधार है।

(11) सतरिया नृत्य
प्रसिद्ध- असम का शास्त्रीय नृत्य।
स्त्री-पुरूष द्वारा
आचार्य शंकरदेव ने वैष्णव मंदिरों में प्रारम्भ किया।

(12) पण्डवानी नृत्य
प्रसिद्ध- छत्तीसगढ़।
पाण्डव कथाओं का प्रस्तुतीकरण।
वाद्य यंत्र- इकतारा
नृत्यकार- ऋतु वर्मा, तीजनबाई, देवांगन, झाडूराम।

(13) कोली नृत्य
प्रसिद्ध- महाराष्ट्र
मछुआरों द्वारा किया जाता है।

(14) मोरूलेम नृत्य
प्रसिद्ध- गोवा
मराठा पुरुषों द्वारा।
शरीर पर पंख व चेहरे पर मुखौटा लगाकर।

(15) गिद्दा नृत्य
प्रसिद्ध- पंजाब।
जन्म, विवाह पर।

(16) कलायरिपट्ट
प्रसिद्ध- केरल
पुरुष हथियार लेकर नृत्य करते हैं।

(17) कड़गम नृत्य
प्रसिद्ध- तमिलनाडु
चावल व पानी भरे मटके को लेकर चेचक की देवी मरियम्मा देवी की पूजा।

(18) भक्ता नृत्य
प्रसिद्ध- उड़ीसा
जलते अंगारों व कांटो पर नृत्य।

(19) कागड़ी नृत्य
प्रसिद्ध- तमिलनाडु

(20) डलखई नृत्य
प्रसिद्ध- उड़ीसा
महिला अपने भाई की लम्बी उम्र हेतु।

नृत्यों को चार भागों में विभाजित किया जा सकता है-
  • व्यावसायिक लोक नृत्य - वे नृत्य जो व्यवसाय के लिए किये जाते हैं। जैसे- तेरहताली, कच्ची घोड़ी, भवाई।
  • क्षेत्रीय नृत्य - ये नृत्य एक क्षेत्र विशेष के होते हैं। जो सभी जातियों द्वारा किये जाते हैं। जैसे- गींदड़, गैर, चंग, ढोल व बम रसिया नृत्य।
  • जनजातीय नृत्य - ये नृत्य किसी जनजाति विशेष के द्वारा किये जाते हैं। जैसे- गवरी, नेजा, वालर, मछली, हाथीमना, इण्डोनी।
  • मनोरंजन के लिए नृत्य - ये नृत्य मनोरंजन के लिए किये जाते हैं। जैसे- गीदड़, गैर, चंग, अग्नि।

कत्थक

कत्थक की उत्पत्ति रासलीला से ठाकुर प्रसाद ने की जिसे स्त्री-पुरुष दोनों करते हैं।
  • नृत्यकार- कालका प्रसाद, भैरों प्रसाद, बिन्दादीन महाराज, लच्छुमहाराज, शम्भू महाराज, अच्छन महाराज।

यह राजस्थान का एकमात्र शास्त्रीय नृत्य है। शास्त्रीय नृत्य वह होता है जिसमें नियम व कायदे होते हैं। उत्तरी भारत में इसके दो घराने हैं-
  1. जयपुर घराना- यह कत्थक का प्राचीनतम हिन्दू घराना है। इसके प्रवर्तक भानू जी थे। पंडित बाबुलाल (जयपुर) कत्थक नृत्य के गुरू थे। कलाकार- पं. दुर्गालाल, बिरजू महाराज, सतारा देवी, कुंदन लाल, उदयशंकर, श्रीमाली, अलका नूपुर, गोपीकृष्ण।
  2. लखनऊ घराना- यह शास्त्रीय संगीत का नवीनतम घराना है। यह मुस्लिम घराना है। इस घराने का विकास नवाब वाजिद अली शाह के समय हुआ था।

घूमर

इस नृत्य में लहंगे को घेरे को घुमाया जाता है। जिस कारण से घूमर कहते हैं। घूमर के साथ आठ मात्रा के कहरवे की विशेष चाल होती है, जिसे सवाई कहते हैं। यह राजस्थान का राजकीय नृत्य है। यह नृत्य मारवाड़ व मेवाड़ में राजघराने की महिलाओं द्वारा गणगौर पर किया जाता है। यह पुरुष रस प्रधान नृत्य है। इसे सिरमौर नृत्य व नृत्यों की आत्मा, सामंतशाही नृत्य, रजवाड़ी नृत्य, महिलाओं का सर्वाधिक लोकप्रिय नृत्य कहते हैं। यह गरबा नृत्य की तरह किया जाता है। शेखावाटी में इसे लूर कहते हैं।

नोट- घूमर नृत्य की उत्पत्ति मध्य एशिया के भरंग नृत्य से मानी जाती है।

  • गोवर्धन कुमारी ने घूमर नृत्य को बढ़ावा देने के लिए 1986 में मुम्बई में गणगौर घूमर नृत्य अकादमी की स्थापना की।
यह चार प्रकार का होता है-
  1. घूमर- साधारण स्त्रियों द्वारा किया जाता है।
  2. लूर- राजपूत स्त्रियों द्वारा किया जाता है।
  3. झूमरिया- यह बालिकाओं द्वारा किया जाता है।
  4. झूमर - यह हाड़ौती का प्रसिद्ध नृत्य है जो महिलायें करती हैं।

'म्हारी घूमर छै नखराली ऐ माय
घूमर रमबा म्हे ज्यास्यां ओ रजरी'

गैर नृत्य

यह बाड़मेर व मेवाड़ का प्रसिद्ध है। यह होली के दूसरे दिन प्रारम्भ होकर 15 दिन चलता है। इसमें युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया जाता है। यह भील पुरुषों द्वारा किया जाता है। गैर नृत्य में जो डंडे काम में लिये जाते हैं उन्हें खांडे कहते हैं। नृत्यकार को गैरिया कहते हैं। इस नृत्य में 3 कदम आगे चलकर 1 कदम पीछे चला जाता है। ढोल, बांकिया व थाली प्रमुख वाद्य काम में लिये जाते हैं। यह गींदड़ की भांति होता है। इसमें फाग गीत गाया जाता है। इस नृत्य में मुखौटा पहना जाता है। जो शिव-पार्वती का प्रतीक है।
नाथद्वारा में शीतला सप्तमी से एक महीने तक गैर का आयोजन किया जाता है। 1970 में निहाल अजमेरा ने भीलवाड़ा में गैर मेले का आयोजन किया था। जो आज भी होता है।

गैर के प्रकार

1. तलवारों की गैर
यह चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन किया जाता है। यह मेनार (उदयपुर) की प्रसिद्ध है। इस गैर में कलाकार चूड़ीदार पायजामा, अंगरखी, कमरबंधा, पगड़ी, साफा पहनता है। महाराणा अमर सिंह के समय मधुश्याम जी के नेतृत्व में मेवाड़ से मुगल सेना के अधिकार को हटाने के लिए एक योजना के तहत मुगल सैनिकों को मेनारिया परिवार ने जीमने का न्यौता दिया। जिसमें ढोल के प्रथम डंके में सभी सैनिकों के सामने पतल रखे गये, ढोल के दूसरे डंके में भोजन परोसा गया तथा तीसरे डंके में सभी मुगल सैनिकों को तलवार से काट दिया गया।

2. आंगी-बांगी गैर नृत्य
यह चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन किया जाता है। यह गैर लाखेटा गाँव (बाड़मेर) की प्रसिद्ध है। इसमें पांवों में घूंघरू, धोती, कमीज, साफा, आंगी पहने जाते हैं। चंग व ढोल वाद्य यंत्र काम में लिये जाते हैं।

3. घूमर गैर
यह भीलवाड़ा की प्रसिद्ध है। इसे 1970 में निहाल अजमेरा ने प्रारम्भ किया।

जिंदाद नृत्य
यह नृत्य शेखावाटी का प्रसिद्ध है। इस नृत्य को स्त्री-पुरूष मिलकर करते हैं। नृत्य में ढोलक बजाई जाती है।

लहूर नृत्य
यह नृत्य शेखावाटी का प्रसिद्ध है। यह नृत्य नायक-नायिका द्वारा अभिनय के माध्यम से किया जाता है।

हरणों/लोवड़ी नृत्य
यह नृत्य मेवाड़ का प्रसिद्ध है। इस नृत्य को दीपावली पर बालकों द्वारा किया जाता है।

रण नृत्य
यह नृत्य मेवाड़ का प्रसिद्ध है यह नृत्य युद्ध कलाओं के लिए प्रसिद्ध है। जिसमें दो व्यक्ति नंगी तलवारों से युद्ध प्रदर्शन करते हैं। इस नृत्य में रूमाल व सिक्कों को युद्ध प्रदर्शन के बीच-बीच में उठाया जाता है। यह नृत्य सरगड़ा जाति के पुरुष करते है।

लुंबर नृत्य
यह नृत्य जालौर का प्रसिद्ध है यह नृत्य होली पर महिलाएँ ताली बजाते हुये करती है।

हुरंगा नृत्य
यह नृत्य भरतपुर का प्रसिद्ध है। होली के बाद चैत्र कृष्ण पंचमी से अष्टमी तक महिला व पुरुष स्वांग धारण कर इस नृत्य को करते है।

गरबा नृत्य
यह मूलतः गुजरात का है। राजस्थान में यह डूंगरपुर, बाँसवाड़ा का प्रसिद्ध है। ये नवरात्रों में किया जाता है।

डांडिया नृत्य
यह मूलतः गुजरात का है। राजस्थान में यह मारवाड़ का प्रसिद्ध है। यह होली के बाद खेलते हैं। यह पुरुष प्रधान नृत्य है। इसमें शहनाई व नगाड़ा मुख्य वाद्य होता है। इस नृत्य में बड़ली के भैरूजी का गुणगान किया जाता है। इस नृत्य में पुरुष हाथ में दो छड़ियाँ लेकर आपस में टकराते हुए गोलाकार नृत्य करते हैं। इस नृत्य में धमाल गीत गाये जाते हैं।

गींदड़
यह शेखावाटी का प्रसिद्ध है। यह होली से पहले किया जाता है। इस नृत्य का प्रारम्भ डांडा रोपण (प्रहलाद की स्थापना) से होता है। यह पुरुष प्रधान नृत्य है। इस नृत्य में जो पुरुष महिलाओं का रुप बनाता है, उसे गणगौर/मेहरी कहते हैं। इस नृत्य में नगाड़ा बजाने वाला नगारची कहलाता है। ढोल, ढप, चंग मुख्य वाद्य काम में लिये जाते हैं। इस नृत्य में धमाल गीत गाया जाता है। नृत्य में पैरों की चाल, डंडों का टकराना व नगाड़े की धुन का मिलना जरुरी होता है। इस नृत्य में दूल्हा-दुल्हन, शिव-पार्वती, डाकिया-डाकन, राम, कृष्ण के स्वांग रचे जाते हैं।

कच्छी घोड़ी नृत्य

यह शेखावाटी, परबतसर, डीडवाना का प्रसिद्ध है। इस नृत्य में झांझ, ढोल, बांकिया व थाली वाद्य बजाये जाते हैं। यह वीर नृत्य है, जिसमें तलवारों से नकली लड़ाई की जाती है। यह व्यावसायिक नृत्य है।
इस नृत्य में पुरुष लकड़ी की बनी घोड़ियों को कमर पर बांध कर नृत्य करते हैं। यह नृत्य पैटर्न कला पर आधारित है। यह नृत्य पठानों की मराठों पर विजय के उपलक्ष्य में किया जाता है। माना जाता है कि एक बार रात्रि विश्राम के समय मराठों ने पठानों के घोड़े चुरा लिये तब पठानों ने नकली घोड़ों की सहायता से मराठों पर विजय हासिल की। इस नृत्य में फूल की पंखुड़ियों के खिलने व बंद होने का आभास होता है।
जोधपुर के छतरलाल गहलोत व निवाई (टोंक) के गोविन्द पारीक कच्छी घोड़ी नृत्य के प्रमुख कलाकार है।

बमरसिया
यह मुख्यतः डीग जिला का प्रसिद्ध है। इसमें बम वाद्य व रसिया गीत गाया जाता है। यह नृत्य फाल्गुन में फसल की कटाई की प्रसन्नता में किया जाता है। इस नृत्य को गुर्जर जाति के अविवाहित लड़के करते हैं। बम रसिया में ढोल, मंजीरा, थाली, चिमटा वाद्य यंत्र काम में लिये जाते हैं। यह नृत्य तीन भागों में बँटा है- नर्तक, वादक, गायक।

वालर नृत्य
ये सिरोही का प्रसिद्ध है। इस नृत्य को गरासियों की घूमर कहते हैं। यह बिना वाद्य यंत्र के किया जाता है। यह नृत्य गणगौर पर पुरुष व महिलाओं द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में दो अर्द्ध वृत्त होते हैं जिसमें बाहरी अर्द्ध वृत्त पुरुषों का तथा आंतरिक अर्द्ध वृत्त महिलाओं का होता है। इस नृत्य का प्रारम्भ पुरुष हाथ में छाता या तलवार लेकर करता है। नृत्य में नृत्यांगना अपना दायां हाथ अपने आगे स्थित नर्तक के कंधे पर रखती है।

चरी नृत्य

यह किशनगढ़, अजमेर का प्रसिद्ध है। यह नृत्य गुर्जर जाति की महिलाओं द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में कांस्य की एक चरी होती है जिसमें कांकड़े (कपास) के बीज डाल कर जलाया जाता है तथा चरी को सिर पर रखकर नृत्य किया जाता है। चरी से आग की लपटें निकलती रहती है। फलकू बाई (किशनगढ़, अजमेर) इस नृत्य की प्रसिद्ध नृत्यांगना है। चरी नृत्य में ढोल, थाली, बांकिया वाद्य यंत्र बजाये जाते हैं। सुनीता रावत, मोहन सिंह गौड़, गोवर्धन कुँवर प्रमुख चरी नृत्यकार है।

चकरी नृत्य
यह हाड़ौती क्षेत्र में बूंदी का प्रसिद्ध है। इस नृत्य को कंजरी जाति की अविवाहित लड़कियां करती हैं। यह घूमर जैसा होता है। इसमें 80 कली का घाघरा पहना जाता है। चकरी नृत्य में लड़की तेज गति में घूमती है जिस कारण इसका नाम चकरी पड़ा। शांति, फुलवा, किलमा प्रमुख नृत्यकार हैं।

मछली नृत्य
यह बाड़मेर में बणजारा जाति द्वारा किया जाता है। यह एकमात्र नृत्य है जिसका प्रारम्भ खुशी से व अन्त दुःख के साथ होता है।
यह नृत्य अविवाहित लड़की करती है।
यह नृत्य प्रेम कहानी पर आधारित है। इसमें एक लड़की चांद को अपना पति मानकर नृत्य करती है लेकिन चाँद उसे नहीं मिलता है जिससे वह दुःखी होकर मछली की तरह तड़पती है तथा रोने लगती है। यह घूमर जैसा होता है।
माना जाता है कि माछरी नाम की एक नायिका अपने यौवन में नाचती है जिस पर जल देवता मोहित हो जाते हैं लेकिन माछरी जल देवता का अपमान कर देती है जिससे नाराज होकर जलदेवता पानी के वेग को तेज कर देते हैं जिसमें सभी मछलियाँ फंस जाती हैं तथा वे जल देवता को खुश करने के लिए उनके सामने नृत्य करती हैं लेकिन जल देवता शांत नहीं होते हैं माछरी नामक नायिका लहर में फंस जाती है तथा नायक के आने से पहले ही तड़पते हुए मर जाती है।

घुड़ला नृत्य
यह मारवाड़ में जोधपुर का प्रसिद्ध है। घुड़ला अजमेर का सुबेदार था जिसने पीपाड़ (जोधपुर) गाँव से 140 लड़कियों का अपहरण कर लिया जिन्हें मारवाड़ के शासक राव सातल ने (1489-92 ई.) घुड़ला को मारकर उसकी गर्दन काटकर लड़कियों को दे दी। लड़कियों ने उस गर्दन को पूरे शहर में घुमाया। घुड़ला की पुत्री गीन्दोली के कहने पर मारवाड़ की महिलाओं ने यह नृत्य प्रारम्भ किया। इस नृत्य में महिलाएँ छेद किए हुए मटके में दीपक रख कर रात्रि में नृत्य करती हैं। यह नृत्य शीतलाष्टमी (चैत्र कृष्ण अष्टमी) से गणगौर (चैत्र शुक्ल तृतीया) तक किया जाता है। इस नृत्य को संरक्षण रुपायन संस्थान (बोरूंदा, जोधपुर) व कोमल कोठारी ने दिया।

झाँझी नृत्य
यह मारवाड़ का प्रसिद्ध है जिसमें घुड़ला से छोटी एक मटकी सिर पर रख कर महिलाएँ नृत्य करती हैं।

घूमर-घूमरा नृत्य
यह राजस्थान का एकमात्र शोक सूचक नृत्य है। इस नृत्य को वांगड़ क्षेत्र (डूंगरपुर, बाँसवाड़ा) में विधवा महिलाएँ करती हैं जिस कारण इसे रुदन नृत्य कहते हैं। यह नृत्य ब्राह्मण समाज की महिलाओं द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में जब किसी महिला का पति मर जाता है तब उस महिला को उसके पीहर ले जाया जाता है तथा सभी श्रृंगार कर ससुराल लाया जाता है। तथा उस महिला को चौक में बैठाया जाता है महिला के चारों ओर प्रथम विधवा का तथा दूसरा सुहागन स्त्रियों का घेरा बनता है तथा महिलाएँ नाचती हैं।

तेरहताली नृत्य
इस नृत्य में तेरह मंजीरें (9 मंजीरें दाएं पैर पर, 2 हाथों की कोहनी पर तथा 2 हाथों में) काम में लिये जाते हैं। जिस कारण इसे तेरहताली नृत्य कहते हैं। इस नृत्य में शरीर की लचकता, थाली में जलता दीपक रखकर महिला थाली को सिर पर रखती है, मुँह में तलवार लेकर नृत्य करती है। यह नृत्य पहले हींगलाज माता के मन्दिर में किया जाता था। तेरहताली नृत्य में अनाज साफ करना, आटा गूँदना, अनाज पीसना, अनाज कूटना, घी निकालना, अनाज काटना, आटा छानना, सूत कातना, रोटी बनाना आदि कलाएँ दिखाई जाती है। यह नृत्य रामदेवरा, पोकरण, डीडवाना व डूंगरपुर का प्रसिद्ध है। यह नृत्य कामड़िया पंथ की बहुओं द्वारा बैठ कर किया जाता है। यह व्यावसायिक नृत्य है। इस नृत्य में इकतारा, तन्दूरा व रावणहत्था वाद्य बजाया जाता है। इस नृत्य का जन्म पादरला गाँव (पाली) में हुआ। मांगी बाई इस नृत्य की प्रसिद्ध नृत्यांगना थीं। कमलदास, परमदास, मोहिनी लक्ष्मणदास कामड़, नारायणी ने इस नृत्य को प्रसिद्ध किया।

मांगीबाई
मांगीबाई का जन्म बानीना गाँव (चित्तौड़) में हुआ। इनकी शादी पादरला गाँव के भैरूदास के साथ हुई। मांगीबाई के जेठ गोरमदास ने इन्हें यह नृत्य सिखाया। मांगीबाई ने इस कला को विदेशों में भी प्रस्तुत किया। 1954 में मांगीबाई ने यह नृत्य जवाहरलाल नेहरू के सामने चित्तौड़गढ़ में प्रस्तुत किया। 1990 में मांगी बाई को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार दिया गया।

अग्नि नृत्य
यह कतरियासर (बीकानेर) का प्रसिद्ध है। इस नृत्य को जसनाथी सम्प्रदाय के लोग करते हैं। इस सम्प्रदाय के लोग फते-फते नारे के साथ धूणा में प्रवेश करते हैं। इस नृत्य में अंगारों पर मतीरा फोड़ना, हल जोतना, अंगारों को दाँतों से तोड़ना आदि कलाएँ दिखाई जाती हैं। यह नृत्य जाट सिद्ध द्वारा चैत्र व फाल्गुन शुक्ल सप्तमी को किया जाता है।

ढोल नृत्य
यह जालौर का प्रसिद्ध है। इस नृत्य को माली, ढोली व भील पुरुषों द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में थाकना शैली (जोश) में ढोल बजाया जाता है। इस नृत्य में नर्तक मुँह में तलवार लेकर, भुजा पर रुमाल लपेटकर, हाथों में डंडे लेकर नृत्य करता है। यहाँ खीमसिंह राठौड़ ने सर्वप्रथम ढोल बजाना प्रारम्भ किया था। इस नृत्य में खीमसिंह राठौड़ व सरगड़ा जाति की महिला की प्रेम कहानी जुड़ी है। ढोल नृत्य को प्रकाश में लाने का काम जयनारायण व्यास ने किया था।

कालबेलिया नृत्य
इसे सपेरा नृत्य भी कहते हैं। इस नृत्य को प्रसिद्ध गुलाबो (कोटड़ा, अजमेर) ने किया। यह एकमात्र नृत्य है जिसे 2011 में यूनेस्को की सूची में शामिल किया गया। कंचन, राजकी, कमली कालबेलिया नृत्य की अन्य प्रमुख नृत्यांगना है। प्रशिक्षण केन्द्र हाथीगाँव (जयपुर) है।

भवाई नृत्य
यह नृत्य मूलत: गुजरात का है। यह व्यावसायिक नृत्य है। भवाई नृत्य नाट्य के रूप में किया जाता है। इस नृत्य को प्रसिद्ध भारतीय लोक कला मंडल (उदयपुर) के संस्थापक देवीलाल सांभर ने दयाराम भील के माध्यम से किया। इस नृत्य/नाट्य में शांता गाँधी रचित नाटक ‘जस्मा ओडन’ (आम आदमी के संघर्ष की कथा) को इंग्लैंड व जर्मनी व प्रदर्शित किया गया। पुष्पा व्यास (जोधपुर) भवाई नृत्य की प्रथम महिला नृतकी है। यह मेवाड़ का प्रसिद्ध है। इसके जनक बाघोजी/नागोजी जाट (केकड़ी, अजमेर) है। इस नृत्य में सिर पर अनेक मटके रखकर कांच पर, थाली पर, तलवार पर नृत्य किया जाता है। अस्मिता काला ने (जयपुर) 111 मटके रखकर नृत्य कर लिम्बा बुक में नाम दर्ज करवाया। इस नृत्य में शास्त्री कला दिखाई देती है। तारा शर्मा, रुपसिंह शेखावत, दयाराम, कजली बाई, कुसुम, द्रोपदी आदि प्रसिद्ध नृत्यांगना हैं।

डांग नृत्य
यह मूलतः ब्रज प्रदेश का है। राजस्थान में यह नाथद्वारा, कांकरोली (राजसमंद) का प्रसिद्ध है। यह नृत्य होली पर स्त्री-पुरुषों द्वारा राधा-कृष्ण के रूप में किया जाता है। इस नृत्य में ढोल, मादल वाद्य यंत्र काम में लिये जाते हैं। इस नृत्य में देवर अपनी भाभी पर रंग डालता है तथा भाभी देवर को कोड़ों से पीटती है।

खारी नृत्य
यह मेवात (अलवर) का प्रसिद्ध है। यह नृत्य दुल्हन की विदाई पर उसकी सखियों द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में लड़कियां सिर पर खारी (लकड़ी की बनी छाबड़ी) रखकर नृत्य करती हैं।

नाहर नृत्य
यह माण्डल गाँव (भीलवाड़ा) का प्रसिद्ध है। यह नृत्य होली के 3 दिन बाद किया जाता है। इसमें दो-तीन व्यक्ति पूरे शरीर पर रुई लपेटकर व एक सिंग लगाकर नृत्य करते हैं। इसे एक सिंग वाले शेर का नृत्य भी कहते हैं। ढोल, थाली, ढोलक, नगाड़ा प्रमुख वाद्य यंत्र बजाये जाते हैं। इस नृत्य को भील, ढोली, मीणा, सरगड़ा जाति करती है। माना जाता है कि इस नृत्य का आयोजन शाहजहाँ जब मांडल गाँव में विश्राम के लिए रुके थे तब उनके मनोरंजन के लिए शेर के शिकार का प्रदर्शन किया गया था।

टूटिया/खोड़िया नृत्य
बारात चढ़ने के बाद वर पक्ष की महिलाओं द्वारा यह नृत्य किया जाता है। इस नृत्य में स्त्रियाँ पुरुष का वेश बनाती है।

लांगुरिया/घुटकम/कड़कदण्डवत नृत्य
यह नृत्य करौली में कैलादेवी के मंदिर में किया जाता है। यह नृत्य मीणा जाति द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में नगाड़े व ताशे वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है।

कानूडा नृत्य
यह नृत्य चौहटन (बाड़मेर) का प्रसिद्ध है। यह नृत्य कृष्ण जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) पर किया जाता है। यह नृत्य राधा-कृष्ण का युगल रूप बनाकर किया जाता है।

थाली नृत्य
यह नृत्य कोलू गाँव (फलौदी) का प्रसिद्ध है। यह नृत्य चैत्र अमावस्या को पाबूजी के भक्त करते हैं। इस नृत्य में नृत्यकार अंगुली पर तेज गति से थाली घुमाकर नृत्य करता है।

बिन्दोरी नृत्य
यह नृत्य झालावाड़ का प्रसिद्ध है। यह नृत्य शादी पर किया जाता है। यह युगल नृत्य है। इस नृत्य में युद्ध कौशल का प्रदर्शन होता है।

झूमर नृत्य
यह हाड़ौती का प्रसिद्ध है। यह श्रृंगार रस प्रधान नृत्य है। झूमर कान का आभूषण होता है। यह नृत्य स्त्रियाँ मांगलिक अवसर पर करती हैं।

झूमरा नृत्य
यह मेवाड़ का प्रसिद्ध है। यह नृत्य झूमरा वाद्य से किया जाता है। इसे घूमरा नृत्य भी कहते है।

चर्वा/चरकुला नृत्य
यह भरतपुर में माली जाति की महिलाओं द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में सिर पर बर्तन रखकर उसमें दीपक रखकर नृत्य किया जाता है। इस नृत्य में युद्ध कौशल का प्रदर्शन होता है।

कबूतरी नृत्य
यह चूरू का प्रसिद्ध है। महिलाएँ करती है।

भैरव नृत्य
यह नृत्य ब्यावर का प्रसिद्ध है। बादशाह बीरबल की सवारी के समय किया जाता है। इसे मयूर भी कहते हैं।

लुम्बर नृत्य
यह नृत्य स्त्रियों द्वारा होली पर किया जाता है। यह नृत्य जालौर का प्रसिद्ध है। इस नृत्य में ढोल, चंग वाद्य यंत्र काम में लिये जाते हैं।

पेजण नृत्य
यह नृत्य दीपावली पर वागड़ क्षेत्र में किया जाता है। इस नृत्य में पुरुष महिला का रूप बनाते हैं।

चंग नृत्य
यह नृत्य होली के बाद शेखावाटी में किया जाता है यह पुरुष प्रधान नृत्य है। इस नृत्य में धमाल गीत गाये जाते हैं। इस नृत्य में चार-पाँच पुरुष हाथ में चंग लेकर गोल घेरे में नृत्य करते हैं।

बोहरा-बोहरी नृत्य
यह होली पर जनजातियों पर किया जाता है इसमें एक व्यक्ति बोहरा बनता है जो फटे पुराने कपड़े पहने होता है। बोहरी के साथ कई नर्तक होते हैं जो समूह में नृत्य करते हैं डप, ढोलक, मंजीरा, शहनाई, झालर वाद्य यंत्र बजाये जाते हैं।

फूंदी नृत्य
यह विवाह के समय महिलाओं द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में बालों में चोटी के साथ फूंदी गूंथी जाती है। इस नृत्य में नृतिका तेज गति में लचकती है।

इला-इली नृत्य
इली होली को तथा इला (इलोजी) उसके होने वाले पति को कहते हैं। यह नृत्य होली के समय किया जाता है। बांझ स्त्री रात्रि के समय इलोजी के मन्दिर में जाकर पूजा तथा नृत्य करती है जिससे उनके पुत्र हो जाता है।

कीलियो-बारियो
यह नृत्य नए जंवाई के ससुराल आगमन पर महिलाओं द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में वाद्य यंत्र की जगह एक खाली पीपा काम में लिया जाता है जिसमें एक रस्सी बंधे पत्थर को डाला व निकाला जाता है जो कुएँ से पानी निकालने का आभास कराता है। कीलिया चड़स की किल्ली खोलने व जोड़ने वाला व्यक्ति होता है बारियो चड़स से पानी उड़ेलने का काम करता है।

नोट- चड़स कुएँ से पानी निकालने के काम आता है जो चमड़े का बना होता है।

हिंडोला नृत्य
यह नृत्य जैसलमेर का प्रसिद्ध है जो दीपावली पर किया जाता है। इस नृत्य में खजूर के वृक्ष की एक शाखा काटकर उस पर गोबर मिट्टी का लेप किया जाता है तथा महिलाएँ उसकी पूजा कर उसे जलाती है। इसका आयोजन दीपावली के एक दिन पहले होता है। स्त्री पुरुष दोनों करते है।

धमक मूसल नृत्य
जोधपुर का नृत्य है। इस नृत्य में गाँव में जब कोई बीमारी फैलती है तब उस बीमारी के निवारण के लिए एक नग्न महिला अपने सिर पर जलता हुआ कुंडा रखकर श्मशान तक जाती है तथा कुंडे को श्मशान में डाल आती है। उस महिला के साथ गाँव की कई महिलायें नाचती हुई जाती हैं।

छमछड़ी नृत्य
यह मेवाड़ में गणेश चतुर्थी पर किया जाता है। इस नृत्य में बच्चे रंग बिरंगी पोशाक पहन कर नृत्य करते हैं।

कक्का नृत्य
यह नृत्य जैसलमेर में बसंत पंचमी पर किया जाता है। कामदेव के प्रतीक कक्का की पत्थर की मूर्ति स्थापित कर बच्चे इस नृत्य को करते हैं।

बलेदी
यह दीपावली पर गुर्जर जाति द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में बैल की पूजा कर चार-पाँच लड़के बैल के नीचे से निकल कर करतब दिखाते हैं तथा नृत्य करते हैं। यह नृत्य मेवाड़ का प्रसिद्ध है। इस नृत्य में ढोल वाद्य यंत्र बजाये जाते हैं।

रासतुड़ा
यह नृत्य बंजारा जाति द्वारा किया जाता है। लड़की की विदाई के समय लड़की को बैल पर बैठाया जाता है। जिससे वह बैल से प्रार्थना करती हुई नृत्य करती है कि वह रास (रस्सी) को न तुड़वाले।

बारुद नृत्य
यह नृत्य बस्सी (चित्तौड़) का प्रसिद्ध है। इस नृत्य में दो दल आपस में एक दूसरे पर बारुद डालते हुए नृत्य करते हैं जिन्हें गौरैया कहा जाता है। इस नृत्य में जान जाने का जोखिम रहता है जिस कारण इस नृत्य को बंद कर दिया गया।

सुगनी नृत्य
इत्र का अधिक प्रयोग होने के कारण इसका नाम सुगनी पड़ा। यह नृत्य गोहिया तथा भिमाना जनजाति के अविवाहित युवक-युवतियों द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में युवती लचकतापूर्ण नृत्य कर युवक को अपनी ओर आकर्षित करती है तथा गंधर्व विवाह करती है यह नृत्य पाली में श्रावण मास में किया जाता है।

वेरीहाल
यह नृत्य चैत्र कृष्ण पंचमी (रंग पंचमी) के दिन भाण्डा गाँव (खेरवाड़ा, उदयपुर) में वेरीहाल ढोल के चारों ओर किया जाता है।

राड़
इस नृत्य में एक खड्डे के बीच बाँस पर एक नारियल बाँध दिया जाता है जिसे दो दल तोड़ने की कोशिश करते हैं। दोनों दल एक-दूसरे पर पत्थर, जलती हुई लकड़ी तथा कंडे फेंक कर रोकने की कोशिश करते हैं। यह नृत्य होली पर वागड़ (डूंगरपुर, बाँसवाड़ा) क्षेत्र में किया जाता है।

बादलिया नृत्य
यह नृत्य बादलिया नामक घुमन्तु जाति द्वारा किया जाता है।

चाक-चाणी नृत्य
यह नृत्य गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी) पर विद्यालय में छात्रों द्वारा विचित्र वेशभूषा का प्रदर्शन करते हुए नृत्य किया जाता है।

धाड़ नृत्य
यह नृत्य महिलाएँ इन्द्र भगवान को प्रसन्न करने के लिए करती हैं।

चोगोला नृत्य
यह नृत्य होली पर डूंगरपुर में किया जाता है। यह युगल नृत्य है। इस नृत्य में स्त्री-पुरुष जलती हुई होली के चारों ओर घेरा बनाकर नृत्य करते हैं।

मोहिली नृत्य
यह नृत्य विवाह पर स्त्रियों द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में महिलाएँ गोल घेरा बनाकर मंद गति से नृत्य करती है। यह नृत्य डूंगरपुर धरियावाद(प्रतापगढ़) का प्रसिद्ध है।

पालीनोच नृत्य
पालीनोच नृत्य विवाह पर बाँसवाड़ा में किया जाता है। सामूहिक युगल नृत्य है। 

सालेड़ा नृत्य
यह नृत्य मेवाड़ में स्त्री-पुरुष सामूहिक रूप में समृद्धि व उन्नति के लिए करते हैं।

जातीय नृत्य

1. कालबेलिया जाति के नृत्य
इस जाति के नृत्यों में पूंगी वाद्य का प्रयोग किया जाता है।
  • शंकरिया नृत्य- यह प्रेम कहानी पर आधारित युगल नृत्य है। इस नृत्य में पूंगी, खंजरी, घूरालिया वाद्य काम में लिये जाते हैं। इसमें नृत्य और गीत का मिश्रण है। माना जाता है कि एक बार कालबेलिया साँप की तलाश में जाता है जिसे एक साँप डस लेता है तथा वह मूर्छित हो जाता है। उस कालबेलिया की एक कालबेलन ने जड़ी-बूटियों से रक्षा की थी। होश में आने के बाद कालबेलिया कालबेलन पर मोहित हो जाता है लेकिन कालबेलन मना कर देती है। कालबेलिया मंत्र विद्या से कालबेलन को वश में करता है। नृतकी-कंचन, कमली, राजकी।
  • पणिहारी नृत्य- इस नृत्य को महिलाएँ सिर पर चार-पाँच मटकियाँ रखकर पानी लेने जाते समय करती हैं।
  • इण्डोणी नृत्य- यह नृत्य सिर पर कपड़े की इण्डोणी व मटका रखकर किया जाता है। इस नृत्य में पूंगी व खंजरी वाद्य यंत्र बजाया जाता है। यह नृत्य स्त्री-पुरुष का युगल नृत्य है।
नोट:- ईडोणी कपड़े की बनी होती है। जो सिर व मटके के बीच लगाई जाती है।
  • बागड़िया नृत्य- यह नृत्य स्त्रियों द्वारा भीख मांगते समय किया जाता है। इस नृत्य में चंग वाद्य यंत्र बजाया जाता है।
  • पूंगी नृत्य- इस नृत्य में पुरुष पूंगी बजाता है तथा महिला लचकता के साथ नृत्य करती है।
  • बिच्छुड़ा नृत्य- होली के समय कालबेलिया महिला इस नृत्य को करती है। इस नृत्य में चंग वाद्य यंत्र बजाया जाता है।

2. भीलों के नृत्य
  • नेजा नृत्य- यह नृत्य होली के तीसरे दिन किया जाता है। इस नृत्य में जमीन में बाँस गाड़ कर उस पर नारियल बाँध दिया जाता है। जिसे उसी वर्ष विवाहित पुरुष उतारते हैं व महिलाएँ उन्हें रोकती हैं। यह डूंगरपुर का प्रसिद्ध है। यह युगल नृत्य है। खजूर के पेड़ पर नारियल व रुपया बाँधा जाता है जिसे पुरुष उतारते हैं तथा महिलाएँ रोकती हैं महिलायें पुरुषों को 6 बार रोकती है तथा 7वीं बार पीछे हट जाती है। इस नृत्य में थाली, ढोलक, मादल, वाद्य यंत्र बजाये जाते हैं।
  • शिकार नृत्य - इस नृत्य में भील जनजाति के पुरुष शिकार का प्रदर्शन करता है। इस नृत्य में एक नृतक तीर-कमान लेकर भागता है व दूसरा खड़ा-खड़ा ढोल की ताल के साथ शिकारी के प्रदर्शन करता है।
  • सुकर का मुखौटा नृत्य - इस नृत्य में एक भील पुरुष सुकर का मुखौटा लगाता है तथा दूसरा व्यक्ति तीर कमान से सुकर का शिकार करता है।
  • हाथीमना नृत्य- यह उदयपुर का प्रसिद्ध है। यह विवाह के समय बैठकर किया जाता है। इस नृत्य में हाथ में तलवार लेकर युद्ध का प्रदर्शन होता है। यह पुरुष प्रधान नृत्य है। यह नृत्य घुटनों के बल बैठकर किया जाता है।
  • द्विचक्री - यह युगल नृत्य है जो विवाह के समय भील स्त्री-पुरुष करते हैं। इस नृत्य में दो वृत्ताकार घेरे होते हैं। जिसमें अन्दर के घेरे में महिलाएँ व बाहर के घेरे में पुरूष होते हैं।
  • हुँदरी नृत्य - यह नृत्य भील व मीणा युवतियां करती है।
  • घूमरा नृत्य- यह गरबा जैसा होता है। यह मांगलिक अवसर पर किया जाता है। यह अर्द्ध वृत्ताकार घेरे में महिलायें करती हैं। इस नृत्य में 2 दल होते हैं जिसमें एक दल गाता है तथा दूसरा नाचता है।
  • मांदल नृत्य- यह पार्वती का प्रतीक है।
  • युद्ध नृत्य - इस नृत्य में भील पुरुष दो दलों में बंटकर हाथों में तलवार लेकर नकली लड़ाई का प्रदर्शन करते हैं तथा ऊँची आवाज में मादल बजाते हैं। इस नृत्य में कई बार खून खराबा भी हो जाता है जिस कारण सरकार ने इसे बंद कर दिया। यह उदयपुर का प्रसिद्ध है।
  • लाठी नृत्य- यह पुरूष प्रधान नृत्य है।
  • गवरी नृत्य/राई नृत्य- इस नृत्य की विस्तृत जानकारी लोकनाट्य में है।
  • गल खीचरिया - यह नृत्य शादी के समय किया जाता है इस नृत्य में वर पक्ष के दो व्यक्ति व वधू की चाची भाग लेती है। वधू की चाची राख से भरे सूप के साथ नृत्य करती है। राख से भरे सूप को पुरुषों पर डाल दिया जाता है।
  • रमणी नृत्य- यह नृत्य भील महिलाएँ विवाह के समय मंडप के सामने करती हैं जिस कारण इसे विवाह नृत्य कहते हैं। इसे नृत्य में महिलाएँ कतार में आग-पीछे होती है तथा पुरूष बांसुरी व मांदल बजाते हैं।

3. गरासिया जाति के नृत्य
वालर नृत्य स्त्री-पुरुष द्वारा विवाह पर किया जाने वाला युगल नृत्य है। यह नृत्य सिरोही में गरासिया जाति द्वारा बिना वाद्य यंत्र के किया जाता है।
  • गौर नृत्य- गौर नृत्य गरासिया स्त्री-पुरुष गणगौर पर करते हैं। शिव-पार्वती का प्रतीक यह नृत्य चैत्र शुक्ल चतुर्थी को किया जाता है।
  • जवारा नृत्य- यह नृत्य होलिका दहन से पूर्व उसके चारों ओर किया जाता है। इस नृत्य में महिलाऐं अपने हाथों में जवारा लेकर रखती है। यह नृत्य स्त्री-पुरूष दोनों करते है।
  • मांदल नृत्य- यह गरासिया महिलाऐं गोल घेरा बनाकर करती है।
  • गर्वा नृत्य- सिरोही व उदयपुर में गरासियां जाति द्वारा गरबा किया जाता है। यह नृत्य महिलाएँ करती है।
  • लूर नृत्य- यह शादी पर महिलाओं द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में लड़कियों के दो दल होते हैं जो एक किशोर लड़की के रिश्ते को लेकर आपस में सवाल जवाब के माध्यम से नृत्य करती है।
  • मोरिया नृत्य - यह नृत्य शादी के समय पुरूषों द्वारा किया जाता है। यह नृत्य शादी में गणपति स्थापना के बाद रात्री में किया जाता है।
  • कूद नृत्य- यह बिना वाद्य के किया जाता है। यह युगल होते हैं। यह नृत्य कूद-कूद कर किया जाता है। इस नृत्य में एक युवती अपने प्रेमी के संग भागने की कलायें करती हैं।
  • रायण नृत्य- इस नृत्य में गरासिया पुरुष महिलाओं का रूप बनाकर नृत्य करते हैं। नृत्यकार के हाथों में तलवारें होती हैं जिसमें वह वीरता का प्रदर्शन करते हैं। ढोल व कुंडी वाद्य यंत्र काम में लिये जाते हैं। रायण नृत्य सिरोही का प्रसिद्ध है।

4. सहरिया जाति के नृत्य
सहरिया जाति मुख्यतः बाराँ के किशनगंज व शाहबाज तहसील में रहते हैं।
  • बिछवा नृत्य - यह नृत्य महिलाएँ सामूहिक रूप से करती है।
  • सांग नृत्य - यह युगल नृत्य है।
  • शिकारी नृत्य - यह पुरुष प्रधान नृत्य है जिसमें सहरिया पुरुष हाथ में तलवार या लाठी लेकर नृत्य करता है यह नृत्य विवाह में मेलों में किया जाता है। कुंडी व डफली वाद्य यंत्र बजाये जाते हैं।
  • होली नृत्य
  • झेला नृत्य - यह फसली नृत्य है। इस नृत्य में फसल पकने पर पुरुष अपने खेत में गीत की पंक्ति गाता है जिसे पास वाले खेत का व्यक्ति आगे गाता है इस प्रकार पुरुष व महिलायें इकट्ठी हो जाती हैं तथा नृत्य करती है। यह बाराँ का प्रसिद्ध है।
  • लहंगी नृत्य - यह नृत्य सहरिया जनजाति की युवतियां करती है।
  • इन्द्रपरी नृत्य - इस नृत्य में पुरुष स्त्री का रुप बनाकर बंदर, हिरण, शेर, राक्षस आदि के मुखौटे लगाकर नृत्य करता है। इस नृत्य में ढोल व थाली वाद्य यंत्र काम में लिये जाते हैं। यह नृत्य बाराँ का प्रसिद्ध है।

5. कंजर जाति के नृत्य
  • धाकड़ नृत्य- इसमें युद्ध अभिनय किया जाता है। यह नृत्य झालापाव की बीरा पर विजय की स्मृति में होता है।
  • चकरी नृत्य- यह बूंदी का प्रसिद्ध है। यह नृत्य कंजर जाति की अविवाहित लड़कियाँ करती है। इस नृत्य में तेज गति से चक्कर में घूमा जाता है जिस कारण इसे चकरी नृत्य कहा जाता है। चकरी नृत्य को प्रसिद्ध 1974 ई. में चांचोड़ा के रशीद अहमद ने किया। लकड़ी खुसनी वस्त्र पहनती है। रास्ते चलते राही को अपनी ओर आकर्षित करता था जिस कारण इसे राई नृत्य भी कहा जाता है।
  • कंजरतोड़ा - इस नृत्य में महिलायें गेंद से अनेक प्रकार की कलायें दिखाती हैं। यह युगल नृत्य है।
  • फूँदी नृत्य- यह नृत्य हाड़ौती में कजली तीज पर महिलाएँ करती है। यह नृत्य चकरी से मिलता-जुलता नृत्य है। शांति, फुलवा प्रसिद्ध नृत्यांगना है।

6. कथौड़ी जाति के नृत्य
  • मावलिया- यह नवरात्रों में पुरुषों द्वारा किया जाता है। यह उदयपुर का प्रसिद्ध है। ढोलक व बांसुरी बजाते हैं।
  • होली- यह नृत्य महिलाओं द्वारा पिरामिड बनाकर किया जाता है।

7. मेव जाति के नृत्य
  • रणबाजा - इस नृत्य में नर्तक तलवार, भाला, कटार, बरछी लेकर युद्ध नृत्य करता है। यह युगल नृत्य है। तासा, झाँझ, डमरु, नगाड़ा, ढोल, तुरई वाद्य यंत्र बजाये जाते हैं। रण बाजा नृत्य अलवर का प्रसिद्ध है।
  • रतवई/खारी - यह महिलाओं द्वारा किया जाता है। यह नृत्य इंडोली व खारी रखकर करती है। वाद्य यंत्र- अलगोजा दमागी

8. नट जाति के नृत्य
  • कठपुतली नृत्य- कठपुतली काष्ठ की बनी होती है जिसको धागे से बांध कर नचाया जाता है।
  • मोर/शारीरिक नृत्य- यह नृत्य मंद-मंद गति से रस्सी पर किया जाता है।

9. गुर्जर जाति के नृत्य
  • झूमर नृत्य - इस नृत्य में झूमरा वाद्य यंत्र बजाया जाता है। यह नृत्य पुरुष धार्मिक उत्सवों पर करते है।
नोट - झूमरा नृत्य वीर नृत्य है।
  • चरी नृत्य - इस नृत्य में नृतकी सिर पर सात-आठ चरियाँ रखती है जिसमें ऊपर की चरी में कांकडे (कपास) के बीज जलाये जाते है तथा इन चरियों को सर पर रखकर नृत्य करती है। यह नृत्य व्यवसायिक नृत्य है। चरी नृत्य गुर्जर जाति द्वारा प्रसिद्ध है। फलकू बाई चरी नृत्य की प्रसिद्ध नृत्यांगना है।

10. डामोर जाति के नृत्य
  • परणिया नृत्य - यह नृत्य डामोर जनजाति विवाह के अवसर पर करती है।
  • भरतिया नृत्य - यह नृत्य डामोर जनजाति में मृत्यु के समय किया जाता है।

11. मीणा जनजाति के नृत्य
  • लांगुरिया नृत्य - यह नृत्य मीणा जनजाति द्वारा कैला देवी (करौली) के मेले में किया जाता है। इस नृत्य को घुटकन या कनक दंडवत नृत्य भी कहते है। बीनतारा, नगाड़ा, ताशा आदि वाद्य यंत्र बजाये जाते है।

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

Education, GK & Spiritual Content Creator

Kartik Budholiya is an education content creator with a background in Biological Sciences (B.Sc. & M.Sc.), a former UPSC aspirant, and a learner of the Bhagavad Gita. He creates educational content that blends spiritual understanding, general knowledge, and clear explanations for students and self-learners across different platforms.