राजस्थान के लोकगीत | Rajasthan ke lok geet

राजस्थान के लोक गीत

लोगों को प्रसन्न करने या अपने मन की भावनाओं का प्रदर्शन करने के लिये जो राग अलपाया जाता है, उसे लोकगीत कहते है।
rajasthan-ke-lok-geet
प्रसिद्ध संगीतज्ञ हरिसिंह के बारे में कहा जाता है कि इन्होंने अपनी राग से पत्थर को पिघला दिया था। गाँधीजी ने कहा कि- "लोकगीत ही जनता की भाषा है और संस्कृति की पहरेदार है।"
लोकगीतों को कानों का श्रृंगार, नवसर हार, कंठ का आभूषण कहा जाता है। कवि रविन्द्र के अनुसार लोकगीत संस्कृति का सुखद संदेश देने वाली कला है। लोक संगीत को गाने वाली मीरासी जनजाति मुख्यतः नागौर और जोधपुर में पाई जाती है।
  • राजस्थानी लोकगीतों के सही मंच देने का श्रेय इकराम राजस्थानी को जाता है जो चौमूं (जयपुर) के थे।
  • सामवेद को संगीत का सबसे प्राचीन संगीत ग्रंथ माना जाता है। गुप्तकाल (240-550 ई.) को साहित्य एवं संगीत का 'स्वर्णकाल' कहलाता है। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी की स्थापना 1957 ई. में जोधपुर में की गई।
  • भारत का राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम् है। जिसके रचनाकार बंकिमचन्द्र चटर्जी हैं। इस गीत को गाने में एक मिनट 5 सेकण्ड (65 सेकण्ड) का समय लगता है। यह गीत आनन्दमठ उपन्यास से लिया गया है।
  • भारत का राष्ट्रगान जन-गण-मन है, जिसके रचनाकार रविन्द्रनाथ टैगौर है। इसे गाने में 52 सेकण्ड का समय लगता है। यह गीत गीतांजलि उपन्यास से लिया गया है।
  • राजस्थान का राज्य गीत केसरिया बालम पधारो नी म्हारे देश है जिसे सर्वप्रथम उदयपुर की मांगी बाई ने गाया था। इस गीत को सर्वाधिक बार अल्हा जिल्हाई बाई ने गाया था यह विरह गीत है।
  • राजस्थान की कोकिला गवरी देवी (पाली) है।
  • मरु कोकिला अल्लाहा जिल्हाई बाई है जिनके गुरु उस्ताद-हुसैन बक्स थे।
  • सुर कोकिला - लता मंगेशकर
  • भारत की कोकिला सरोजिनी नायडू है।
नोट- सरोजिनी नायडू भारत की प्रथम महिला राज्यपाल (यूपी) है।

गोरबन्द
यह गीत ऊँट के गले का श्रृंगार करते समय गाया जाता है। यह शेखावाटी व मरुस्थलीय क्षेत्र का प्रसिद्ध है।

गायां चरवाती गोरबंद गूंथिया,
भैस्यां चरावती पोयो म्हारा राज,
म्हारो गोरबन्द लूम्बालो।

कुरजाँ
यह विरह गीत है। यह गीत मारवाड़ की विरहनियों द्वारा कुरजाँ पक्षी को आधार मानकर संदेश वाहक के रुप में गाती हैं। कुरजाँ गीत वर्षा ऋतु में गाया जाता है।

तू छे कुरजाँ भायली ए
तू छै धरम की ए भाण
पतरी लिख दू प्रेम की ए
दीजो पियाजी ने जाए
कुरजाँ म्हारों भंवर मिला दीजे

नोट: खींचन गाँव (फलौदी जिला) व तालछापर (चूरू) कुरजाँ पक्षी के लिए प्रसिद्ध है।

पीपली
यह गीत वर्षा ऋतु में विरहणी द्वारा गाया जाता है। यह शेखावाटी व बीकानेर का प्रसिद्ध है।

लावणी
यह गीत नायक द्वारा नायिका को उपवन में बुलाने के लिए गाया जाता है।

मूमल
यह गीत जैसलमेर की राजकुमारी मूमल के श्रृंगार का वर्णन करता है। मूमल लोद्रवा की राजकुमारी थी जिसका अमरकोट के राजकुमार महेन्द्र के साथ प्रेम था। महेन्द्र के पास चीतल ऊँट था। यह कथा मीनाक्षी स्वामी ने लिखी थी।

जीरा
इसमें पत्नी अपने पति को जीरा नहीं बोने की विनती करती है 'यो जीरो जीव रो बैरी रे, मत बाओं म्हाारा परण्या जीरों।' क्योंकि जीरा फसल में काम ज्यादा होता है जिस कारण नायक-नायिका को समय नहीं दे पाता है जिससे परेशान होकर नायिका यह गीत गाती है।

कौआ गीत
ये विरह गीत है। इस गीत में नायिका कौवे को आधार मानकर गीत गाती है क्योंकि कौआ का बोलना राजस्थान में शुभ माना जाता है तथा मेहमान के आने का प्रतीक होता है।

उड़-उड़ रे मारा काला रे कागला
जद मारा पिवजी घर आवे।

कांगसिया गीत
इस गीत में नायिका श्रृंगार करते समय अपने पति को याद करती हुई यह गीत गाती है। म्हारा छैल भंवर रो कांगसियो, पनियारी ले गई रे।

हिचकी
यह मेवात (अलवर) का प्रसिद्ध है। यह विरह गीत है। हिचकी गीत याद से संबंधित है। माना जाता है कि अगर कोई याद करता है तब हिचकी आती है।

म्हारा पियाजी, बुलाई म्हनै आई हिचकी।

नोट - हिचकी माता का मन्दिर सनवाड़ (उदयपुर) में है।

बधावा
यह शुभ कार्यों पर गाया जाता है। इस गीत में पूर्वजों को याद कर कार्य की सिद्धि के लिये कामना की जाती है। बधावा गीत मंगल गीत है।

पहलो बधावो म्हारे आय म्हारे मिजमानी।
आइयो म्हारे बाबाजी री प्रोल

रातीजोगा
महिलाओं का रात्री जागरण/रातीजोगा। 

काजलियो
यह गीत निकासी के समय दूल्हे की भाभी काजल लगाते समय गाती है। यह श्रृंगार गीत है।

काजल भरियों कुंपलो कोई।
धर्यो पलंग अध बीच कोरो काजलियो।।

बन्ना-बन्नी
यह गीत शादी के समय दूल्हा-दुल्हन के लिए गाया जाता है जिसमें दूल्हा-दुल्हन के प्यार भरे झगड़ों की चर्चा होती है।

घोड़ी
यह निकासी के समय गाया जाता है।

कामण
यह गीत बारात आगमन पर वधू पक्ष की महिलाओं द्वारा दूल्हे को जादू-टोने से बचाने हेतु गाया जाता है।

दादासा के महलां नीचे बनड़ी हंस उड़ावे सा
बनड़ी हंस उड़ावे बांकी माता कामण गावै सा

पपैया गीत
पपैया एक पक्षी है। पपैया गीत में एक लड़की किसी विवाहित पुरुष को अपने प्रेम जाल में फंसाने के लिए जंगल में बुलाती है लेकिन लड़का अपनी पत्नी के साथ धोखा नहीं करता है।

भंवर बागां में आज्यो जी, एजी म्हारो।
नाजुक जीव घबरावै पपैया बोल्यो जी।

सीठणे
यह गाली गीत है। वधू पक्ष द्वारा वर पक्ष को सुनाया जाता है।

ओल्यू
यह लड़की की विदाई पर गाया जाता है।

ओल्यूंडी लगाई रै मारा सैण
ओजी ओ गोरी रा लसकारियां ओल्यूंड़ी

होलर या जच्चा गीत
यह गीत पुत्र जन्म पर गाया जाता है। इस गीत में पुत्र जन्म की खुशी तथा गर्भ पीड़ा का चित्रण किया जाता है।

बिच्छुड़ा
यह हाड़ौती व मेवाड़ का प्रसिद्ध है। इसमें एक महिला को बिच्छू खा जाता है जो मरने वाली है तथा अपने पति को दूसरी शादी करने के लिए कह रही है।

मैं तो मरी होती राज, खाग्यो बैरी बीछूड़ो

झोरावा
यह जैसलमेर का प्रसिद्ध है। यह परदेश गये पति को संदेश पहुँचाने के लिए गाया जाता है।

मौरिया
यह विरह गीत है। यह गीत सगाई हो चुकी लड़की द्वारा गाया जाता है जिसकी शादी में अभी देरी है। वह लड़की अपने पति से मिलने के लिए तड़पती है।

हमसीढ़ों
यह भीलों का युगल गीत है।

सुवटियों
यह गीत भील स्त्री विदेश गए पति हेतु गाती है। इस गीत में विरहणी द्वारा तोते को आधार मानकर गाया जाता है।

दुपट्टा
यह गीत दूल्हे की सालियों द्वारा गाया जाता है।

जखड़ी
लड़की की विदाई पर सहेलियों द्वारा गाया जाता है।

चिरमी
वधू द्वारा अपने भाई व पिता की ससुराल में प्रतीक्षा करते हुए चिरमी पौधे को आधार बनाकर यह गीत गाया जाता है।

लांगूरिया
यह करौली में कैलादेवी के मंदिर में गाया जाता है।

ढोला-मारु
यह ढोला-मारु की प्रेम कहानी पर आधारित है। ढोला नरवर का राजा था तथा मारु पूंगल, बीकानेर की राजकुमारी थी।

कुकड़लू गीत
यह गीत तोरण मारते समय वधू पक्ष की महिलाओं द्वारा गाया जाता है। इसे झिलमिल गीत भी कहते हैं।

कुकड़ी गीत
यह रात्रि जागरण का अंतिम गीत है।

नोट:- सांसी जनजाति में कुकड़ी रस्म होती है।

वीरा गीत
भात के समय गाया जाता है। इसे भात या मायरा गीत भी कहते हैं।

कलाली गीत
यह सवाल जबाब का गीत है। यह गीत शराब निकालने व बेचने वाले के मध्य गाया जाता है। यह गीत कलाल जाति की महिलाएँ मन्द लय में गाती हैं।

हरजस गीत
यह राम कृष्ण की भक्ति के गीत हैं। वृद्ध व्यक्ति के मृत्यु पर यह गीत गाया जाता है।

मरसिये गीत
यह मारवाड़ का प्रसिद्ध है। किसी प्रभावशाली व्यक्ति की मृत्यु पर गाया जाता है।

रतनराणा
यह मार्मिक गीत है।

लोरी
यह बच्चे को सुलाने के लिए गाया जाता है।

पवाड़े
यह पाबूजी के गीत हैं।

सुपणा
यह याद से संबंधित गीत है इस गीत में विरहणी को सुपणा आता है जिससे उसे अपने प्रियतम की याद आने लगती है। यह विरह गीत है।

सूती थी रंगमहल में, सूताँ में आयो रे जजाळ,
सुपणा में म्हारा भँवर न मिलायो जी।

पंछीड़ा
यह हाड़ौती व ढूँढाड़ का प्रसिद्ध है। यह मेले में गाया जाता है।

नोट- माणिक्य लाल वर्मा ने पंछीड़ा गीत लिखा था।

धमाल
होली पर गाया जाता है।

फाग
यह गीत भी होली पर गाया जाता है।

केसरिया बालम पधारो नी म्हारे देश
यह एक विरह गीत है। यह मांड शैली में गाया जाता है। अल्लाह जिल्लाई बाई ने इसे सर्वाधिक बार गाया था।

जलो और जलाल
यह गीत महिलायें बारात का डेरा देखने जाते समय गाती हैं।

फलसड़ा
यह गीत विवाह पर मेहमानों के आगमन पर गाया जाता है।

विनायक गीत
यह गीत मांगलिक अवसर पर गाया जाता है।

चाक गीत
यह गीत शादी में कुम्हार के घर चाक पूजते समय गाया जाता है।

इंडोली गीत
मटके व सिर के बीच रखी जाने वाली कपड़े की इंडोली को आधार मानकर यह गीत गाया जाता है। 'पड़ोसन बड़ी चकोर ले गई इंडोली'

बादली
यह गीत वर्षा ऋतु में हाड़ौती व मेवाड़ में गाया जाता है।

हीड़ गीत
यह गीत दीपावली पर पुरुषों द्वारा समूह बनाकर गाया जाता है। यह मेवाड़ का प्रसिद्ध है। हीड़ गीत में हीड़ दीपक का प्रतीक होता है।

घूघरी गीत
यह गीत शादी में बान के समय गाया जाता है।

हींडोल्या/हींडो गीत
यह गीत झूला झूलते समय गाया जाता है। यह गीत श्रावण मास में गाया जाता है।

सावणियै रौ हींडो रै बांधन जाय।

हालरियों
यह गीत बच्चों को झूला देते समय गाया जाता है।

लालर/पटेल्या
यह गीत आदिवासियों द्वारा गाया जाता है।

परणेत
यह गीत शादी में फेरों के समय गाया जाता है।

बिछिया
यह गीत पर्वतीय क्षेत्र में गाया जाता है।

हरणी गीत
इसे लोवड़ी गीत भी कहते हैं इस गीत में दीपावली के समय मेवाड़ में बच्चे टोलियाँ बनाकर घरों से पैसे इकट्ठे करते हैं।

ज़कड़ियां गीत
पीर, संतों की प्रशंसा में गाये जाने वाले धार्मिक गीत हैं।

चौबाली गीत
राजस्थान के लोकगीतों का संस्मरण 'चौबाली' कहलाता है।

सारंग गीत
दोपहर के समय गाया जाने वाला गीत है।

आल्हा गीत
वर्षा ऋतु में सहरिया जनजाति द्वारा गाया जाता है।

गढ़गीत
दरबारों में, सामंतों की महफिलों में गाया जाने वाला रजवाड़ी गीत।

कलाकी
वीर रस प्रधान गीत।

जांगड़ा
युद्ध के समय वीर रस के साथ गया जाता है।

भुटनी
भरतपुर क्षेत्र में गाया जाने वाला धार्मिक गीत।

धूमालड़ी
विदाई गीत।

मदकर
विदाई गीत।

डुंगरिया
यह गीत ससुराल में महिला अपने भाई के लिए गाती है।

बरसो गीत
विवाह पूर्व दुल्हे को आशीर्वाद।

मोरियो भाई रे भाई
दुल्हे की प्रशंसा में गरासिया जाति में गाया जाने वाली गीत।

लूणाधार
वर्षा ऋतु गाया जाने वाला उदासी भरा गीत।

आंबो
पुत्री की विदाई पर गाया जाने वाला गीत है।

चरचरी गीत
ताल और नृत्य के साथ उत्सवों में गाया जाने वाला गीत है।

काछबा गीत
यह पश्चिमी राजस्थान में गाया जाने वाला प्रेम गीत है।

दारूड़ी
यह गीत महफिलों में शराब परोसते समय गाया जाता है। दारूड़ी दाखां री म्हारै भँवर ने थोड़ी-थोड़ी दीज्यो ए।

पीळा गीत
यह गीत जलवा के समय गाया जाता है।

पड़वलियौ गीत
यह गीत प्रसूति महिला के सामान्य स्थिति में आने के बाद गाया जाता है।

कोयलड़ी गीत
यह गीत लड़की की विदाई पर गाया जाता है जो अत्यन्त मार्मिक गीत है।

हूँस गीत
इस गीत में गर्भवती महिला अपनी सास से भिन्न-भिन्न खाने की मांग करती है लेकिन उसकी सास उसे पूरा नहीं करती है लेकिन उसका पति उसे पूरा करता है।

बेमाता गीत
यह गीत बच्चा जन्म होने के बाद गाया जाता है जिसमें महिलायें बेमाता से बच्चे का अच्छा भाग्य लिखने के लिये कहती है।

घुड़ला गीत
यह गीत मारवाड़ क्षेत्र में होली के बाद घुड़ला नृत्य के समय गाया जाता है।

नोट - घुड़ला नृत्य छिद्रित मटके में दीपक रखकर किया जाता है।

पणिहारी
यह गीत ग्रामीण क्षेत्र में महिलायें पानी लाने जाते समय गाती हैं।

रसिया गीत
यह गीत ब्रज प्रदेश में भरतपुर, धौलपुर का प्रसिद्ध है। यह गीत होली पर गाया जाता है इस गीत में भगवान कृष्ण की प्रशंसा होती है। यह गीत बम नृत्य के समय गाया जाता है।

आँगौ मोरियों गीत
यह गीत एक महिला द्वारा अपने परिवार की सुख समृद्धि के लिये गाया जाता है।

संगीत गीत से संबंधित प्रमुख व्यक्ति

गवरी देवी
यह बीकानेर की थी। यह जोधपुर राजघराने में एक मांड गायिका थी। महाराजा उम्मेद सिंह के समय गवरी देवी को सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली। गवरी देवी की शादी जोधपुर के मोहनलाल के साथ हुई। गवरी देवी ने 1954 में अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन में भाग लिया जो जयपुर में हुआ था इन्हें राजस्थान की कोकिला कहते हैं। इन्हें 'मांड मल्लिका' भी कहते है।

नोट- पाली की गवरी देवी भी प्रसिद्ध मांड गायकी हैं जो भैरवी युक्त मांड गायन में प्रसिद्ध है।

बन्नो बेगम
बन्नो बेगम शास्त्रीय गायन, माण्ड गायन, ठुमरी, गीत व गजल में निपुण थी। बन्नो बेगम की माता जौहरबाई भी जयपुर दरबार में गायिका थीं। बन्नो बेगम जयपुर गुणीजन खाना में शामिल थीं इनके गुरु नजीन खां थे। इन्होंने राजमाता गायत्री देवी तथा इंग्लैण्ड की महारानी एलीजाबेथ के समक्ष गायन किया था।

मांगीबाई
उनका जन्म प्रतापगढ़ में हुआ। कमलराम इनके पिता तथा रामनारायण इनके पति थे। मांगीबाई मांड व शास्त्रीय गायन में निपुण थी। 1994 में मांगीबाई को पुरस्कृत किया गया। राजस्थान का राज्य गीत सर्वप्रथम इन्होंने ही गाया था।

अल्लाह जिलाई बाई
इनका जन्म 1 फरवरी 1902 ई. बीकानेर में हुआ था। महाराजा गंगासिंह ने इन्हें बचपन में ही गुणीजन खाना में प्रवेश करवा दिया। 2003 में अल्लाह जिलाई बाई पर 5 रूपये की डाक टिकट जारी हुई। यह बीकानेर राजघराने में मांड गायिका थी। अल्लाह जिलाई बाई को मरु कोकिला कहते हैं। संगीत की शिक्षा उस्ताद हुसैन बक्स ने दी थी। 1982 में उन्हें पद्म श्री का अवार्ड मिला। मेवाड़ फाउण्डेशन ने डागर घराना पुरस्कार दिया। अल्लाह जिलाई बाई ने 1987 में अल्बर्ट हॉल (लंदन) में प्रस्तुति दी। केसरिया बालम, बाई सारा वीरा, अल्लाह जिलाई बाई के प्रमुख गीत हैं। 3 नवम्बर 1992 में बीकानेर में अल्लाह जिलाई बाई का निधन हुआ।

नोट- मांड गायिकी उसे कहते हैं जो राजदरबार व महफिलों में कामुकता, भावुकता व सुन्दरता युक्त गायन करती है।

अमीर खुसरो
इन्होंने गायन की कव्वाली, तराना व गजल पद्धति को प्रारम्भ किया। इन्हें ख्याल का जनक कहा जाता है।

नोट- अमीर खुसरो अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में था। इसने खजाइन-उल-फतुह ग्रंथ की रचना की। इसने तबले का भी आविष्कार किया था।

तानसेन
इनका मूल नाम रामतनु पांडे था। इनका जन्म ग्वालियर, मध्यप्रदेश में हुआ था। ये अकबर के नवरत्नों में थे। अकबर ने इन्हें संगीत में कंठाभरणवाणीविलास की उपाधि दी।

प्रतापसिंह
यह 1778 से 1803 ई. जयपुर के शासक रहे हैं। इनके दरबार में गंधर्व बाइसी थी। जिसमें संगीत का प्रधान चांद खां था। ब्रजपाल भट्ट के नेतृत्व में राधा गोविन्द संगीतसार ग्रंथ की रचना की गयी थी।

राणा कुम्भा
यह 1433 से 1468 ई. तक मेवाड़ के शासक थे। इन्होंने जयदेव के गीतगोविन्द ग्रंथ पर रसिकप्रिया टीका की रचना की। इसके शासन में संगींतराज, संगीतमीमांसा व सूड़प्रबंध ग्रंथ की रचना की गयी।

अल्लादिया खाँ
इनका जन्म 1855 ई. में उनियारा (टोंक) में हुआ था। अल्लादिया खाँ जयपुर संगीत घराने के प्रमुख संगीतकार थे। ख्वाजा अहमद खाँ अल्लादिया खाँ के पिता थे। ध्रुपद, धमार, ख्याल गाने में अल्लादिया खाँ निपुण थे। एम.आर. जयकर ने अल्लादिया खाँ को माऊण्ट एवरेस्ट ऑफ म्यूजिक तथा संगीत सम्राट की उपाधि दी।

विष्णु दिगंबर
इनका जन्म 18 अगस्त, 1872 ई. को कुरुण्डवाड़ (महाराष्ट्र) में हुआ था। विष्णु दिगंबर ने 1930 ई. में रघुपति राघव राजा राम का गायन किया। यह गायन गाँधीजी के दांडी मार्च (1930) के समय रामधुन में किया गया था।

विष्णु नारायण भातखंडें
इनका जन्म 19 अगस्त 1860 ई. को मुंबई में हुआ था। इन्हें भारतीय संगीत के उद्धारक कहा जाता है।

हम्मीर देव चौहान
रणथम्भौर के शासक हरमीर देव चौहान ने 'श्रृंगारहार' के नाम से संगीत ग्रंथ की रचना की।

राधाकृष्ण
राधाकृष्ण उनियारा ठिकाने के भीमसिंह का दरबारी विद्वान था। इन्होंने राग रत्नाकर' ग्रंथ की रचना की।

पं. भावभट्ट
पं. भावभट्ट बीकानेर शासक अनूपसिंह (1669-98 ई.) के दरबारी विद्वान थे। गमक मंजरी, राग विवेक, मुरली प्रकाश, नाष्टोदिष्ट प्रबोधक ध्रुवपद टीका, भावमंजरी, कुतुपाध्याय, अनूप विलास, अनूपांकुश, अनूप संगीत रत्नाकार आदि ग्रंथो की रचना की।

पुण्डरीक विट्ठल
विट्ठल जयपुर शासक मानसिंह का दरबारी विद्वान था। इन्होने रागामाला, रामंजरी, नृत्तयनिर्णय, दूहावचन्द्रोदय ग्रंथों की रचना की।

चाँद खाँ
चाँद खाँ सवाई प्रतापसिंह का दरबारी विद्वान था। इन्होने स्वर सागर ग्रंथ की रचना की।

कृष्णानन्द व्यास
ये मेवाड़ के रहने वाले थे। इन्होने 'राग कल्पद्रुम' की रचना की।

मिर्जा राजा जयसिंह
जयपुर शासक मिर्जा राजा जयसिंह ने 'राग कल्पद्रुम' की रचना की।

भट्ट द्वारकानाथ
द्वारकानाथ सवाई प्रतापसिंह के दरबारी विद्वान थे इन्होने 'राग चन्द्रिका' ग्रंथ की रचना की।

पं. विश्वमोहन भट्ट
इनका जन्म 12 जुलाई, 1950 ई. जयपुर में हुआ था। पं. रविशंकर इनके गुरू थे। विश्वमोहन ने गिटार, सरोद, वीणा का समन्वय कर 'मोहन वीणा' नामक नये वाद्य यंत्र का आविष्कार किया था 'गौरीम्मा' नामक नई राग का सृजन किया। पं. विश्वमोहन भट्ट को 1993 में ग्रेमी पुरस्कार, 2002 में पद्मश्री, 2012 में राजस्थान रत्न, 2017 में पद्म भूषण अवार्ड से सम्मानित किया गया।

जगजीत सिंह
इनका जन्म 8 फरवरी, 1941 ई. श्रीगंगानगर में हुआ था। इन्होंनें प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लिखे गीतों को संवेदना व नई दिशा नामक दो एलबमों के द्वारा गाया। ये शास्त्रीय संगीत, गजल, भक्ति संगीत के गायक थे। 2003 में इन्हें पद्मभूषण दिया गया। 31 मार्च 2012 में इन्हें मरणोपरांत 'राजस्थान रत्न' पुरस्कार दिया गया।

मामे खान
ये जैसलमेर के संत्तु गाँव से मांगणियार जाति के थे। इन्होंने सोनचिरइया व मिरज्या नामक हिन्दी फिल्मों में गायन किया है।

मेहन्दी हसन
ये पाकिस्तान के प्रसिद्ध गजल गायक है जो मूलरूप से राजस्थान में झुंझुनूँ के लूणा गाँव से थे।

रहीम फहीमुद्दीन डागर
इनका जन्म 2 फरवरी, 1927 ई. में अलवर में हुआ था। 2011 ई. दिल्ली में इनका निधन हो गया। 2008 में इन्हें पद्मभूषण का अवॉर्ड दिया गया।

मुन्ना मास्टर
इनका मूलनाम रमजान खान था। ये बगरू (जयपुर) के थे। भजन गायन में इन्हें 2020 में पद्मश्री दिया गया।

साकर खां
ये जैसलमेर के निवासी थे ये कमायचा वादक थे। 2012 में इन्हें पद्मश्री दिया गया।

रेशमा
ये राजस्थान में चूरू के लोहा गाँव की थी जो पाकिस्तान की मशहूर गायकी थी। इन्होंने 'लम्बी जुदाई' गीत से प्रसिद्धि पाई थी।

कोमल कोठारी
इनका जन्म 4 मार्च 1929 ई. जोधपुर में हुआ था। इन्होंने राजस्थानी संस्कृति को बचाने हेतु 1960 ई. में (बिलाड़ा, जोधपुर) में रूपायन संस्थान की स्थापना की। इन्होंने राजस्थानी गीतों का संरक्षण किया। 1983 में इन्हें पद्मश्री व 2004 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

लाखा खान
ये रानेगी गांव (जोधपुर) के थे इन्हें 2021 ई. में पद्मश्री दिया गया। ये सिंधी सारंगी बजाने में प्रसिद्ध थे।

संगीत के प्रकार

1. हवेली संगीत- इसका उद्भव ब्रजप्रदेश में हुआ था। यह नाथद्वारा, उदयपुर, चित्तौड़, जयपुर व कामा (डीग) का प्रसिद्ध है। इसमें वल्लभ सम्प्रदाय के लोगों द्वारा मंदिरों में ठाकुरजी के लिए गायन होता है। यह भक्ति भजन की शैली है।

2. टप्पा- यह हिन्दी व पंजाबी का मिश्रण होता है। इसमें तानों का प्रयोग किया जाता है। टप्पा पंजाब की प्रमुख शैली है जो अवध के राजदरबार में विकसित हुई।

3. ठुमरी- यह शास्त्रीय व लोक संगीत का मिश्रण होता है। इसमें श्रृंगार व भाव प्रधान होती है। इनका मुख्य विषय राधा-कृष्ण का प्रेम होता है। इसमें श्रृंगार प्रधान गीत गाये जाते हैं। ठुमरी का जन्म अवध के नबाव वाजिद अली शाह के समय हुआ।

4. मांड गायकी - मांड में कामुकता, भावुकता व श्रृंगार का महत्व होता है। मांड गायन राजा, महाराजाओं के दरबार में गाया जाता है। जैसलमेर के आस-पास का क्षेत्र प्राचीन समय में 'माँड क्षेत्र' कहलाता था। जहाँ विकसित गायन माँड गायन कहलाता है। गवरी देवी (बीकानेर), गवरी देवी (पाली), अल्लाह जिलाई बाई (बीकानेर), मांगी बाई (उदयपुर), जमिला बानो (जोधपुर), बन्नो बेगम (जयपुर) आदि प्रसिद्ध माँड गायकी है।

5. तराना - यह गायन युद्ध के समय ढोली व ढाढी जाति द्वारा वीर रस में युद्ध के समय गाया जाता है। इस गायन में अर्थ पूर्ण शब्दों का प्रयोग नहीं होता है। बल्कि कर्कश आवाज में गाया जाता है।

6. दादरा शैली - इस शैली में चंचलता के साथ गायन होता है। दादरा शैली में श्रृंगार रस का विशेष महत्व है।

7. धमार - धमार शैली का गायन होली पर नाच गानों के साथ होता है। इस शैली में श्रृंगार रस के साथ लय का प्रयोग किया जाता है। धमार में राधा-कृष्ण के पैटर्न का प्रयोग किया जाता है। गुप्त व प्रकाश धमार के दो रूप हैं। फय्याज खां, विलायत खां, हैदर बख्श, बहराम खां, उस्ताद वजीर खां, अहमद अली खां धमार के प्रमुख संगीतकार हैं।

8. ध्रुपद - ध्रुपद गायन के जन्मदाता ग्वालियर शासक मानसिंह तोमर को माना जाता है इस गायन में ब्रज भाषा के साथ राजाओं व ईश्वर का गुणगान, देवदासियों की लीलाओं आदि का गायन होता है। ध्रुपद का स्थायी, अन्तरा, संचारी, आभोग चार खंड में गायन होता है। मानसिंह तोमर के दरबारी संगीतज्ञ बैजू बाबरा ने ध्रुपद गायन प्रारम्भ करने में सहयोग किया था। मधुभट्ट तैलंग ध्रुपद की प्रमुख गायिका है। ध्रुपद गायन को चार वाणियों में बांटा गया है-
  • (अ) नौहरवाणी - यह वाणी जयपुर की प्रसिद्ध है जिसके जनक श्रीचंद नोहर थे।
  • (ब) डागुरवाणी - यह वाणी जयपुर की प्रसिद्ध है जिसके जनक बृजनंद डागर थे।
  • (स) गोहरहारी वाणी - गोहरवाणी की उत्पत्ति ग्वालियर में हुई थी जिसके जनक तानसेन है।
  • (द) खण्डारवाणी - खण्डारवाणी की उत्पति उनियारा (टोंक) में हुई थी। जिसके जनक समोखन सिंह थे।

9. ख्याल - ख्याल शब्द फारसी भाषा का है जिसका अर्थ विचार/कल्पना/सोचना होता है। जौनपुर के शासक सुल्तान शाह शर्की ने 15वीं सदी में ख्याल का आविष्कार किया। ख्याल को तबले के साथ गाया जाता है। ख्याल में नायिका के श्रृंगार वर्णन, राजाओं की प्रशंसा कही जाती है।

10. चारबैंत - यह एक मुस्लिम शैली है जो टोंक की प्रसिद्ध है। चारबैंत में कव्वाली के रुप में गायन होता है। इस गायन में डपली वाद्य यंत्र बजाया जाता है।

संगीत के घराने

जयपुर घराना
इस संगीत घराने का प्रारम्भ सवाई रामसिंह के समय बहराम खां ने किया था इस संगीत के लिए सैनियां घराना प्रसिद्ध हैं। यहां ध्रुव पद पर आधारित संगीत होता है। इसमें ब्रज भाषा का प्रयोग होता है। मृदंग व पखावज प्रमुख वाद्य काम में लिये जाते हैं। अल्लादिया खां इस घराने के प्रमुख संगीतकार हैं जिसका जन्म 1855 ई. में उणियारा (टोंक) में हुआ। जाकिरुद्दीन खां, अल्लाबन्द खां, नसीर मुइनुद्दीन, तानसेन पाण्डेय इस घराने के प्रमुख संगीतकार हैं। जयपुरी ख्याल के जनक मनरंग खां को माना जाता है। सवाईरामसिंह को वीणा वादन रज्जब अली खां ने सिखाया था। मुबारक अली खां, व रज्जब अली खां प्रमुख संगीतकार हैं। मुहम्मद अली खां के शिष्य भातखण्डेजी थे। जो 'कोठीवाले' के नाम से जाने जाते हैं। भातखण्डेजी के पुत्र आशिक अली खां भी संगीतकार था।

दिल्ली घराना
दिल्ली घरानों में सदारंग खां ने ख्याल शैली में गायन किया जिस कारण दिल्ली घराने को सदारंग घराना भी कहते हैं। तानरस खां दिल्ली घराने के प्रमुख संगीतकार थे जिस कारण इस घराने को तानरस घराना भी कहते हैं। दिल्ली घराना का विकास मोहम्मद शाह के समय हुआ।

अतरौली घराना
औरंगजेब सुन्नी धर्म को मानता था तथा उसे संगीत से नफरत थी। उसने अपने दरबार से संगीतकारों को निकाल दिया जो ध्रुपद, धमाल, होरी गायकी के कलाकार थे। ये कलाकार राजस्थान में आकर बस गये। अतरौली घराने के जनक अल्लादिया खां व साहब खां थे इसे अल्लादिया खां घराना भी कहा जता है। यह घराना जयपुर घराने की उपशाखा है। किशोरी अमोनकर, रूलाने वाले फकीर मानतौल खां, करीम खां, छज्जू खां, हैदर खां, दुल्लु खां प्रमुख संगीतकार है। यह घराना मूल रूप से उत्तरप्रदेश का प्रसिद्ध था।

मथुरा घराना
इस घराने की स्थापना महताब खां ने की थी इस घराने में भगवान कृष्ण से संबंधित हवेली संगीत का गायन होता है। जोधपुर व अलवर में मथुरा घराने का गायन होता था।

मेवाती घराना
मेवाती घराने में ध्रुपद व ख्याल का गायन प्रसिद्ध है। इस घराने के संस्थापक जोधपुर राज्य के नजीर खां थे। नजीर खां रामसिंह के दरबारी गायक थे। गायककार- नाथुलाल, चिमनालाल, मोतीराम, ज्योतिराम घराने के प्रसिद्ध गायककार पं. मणिराम, पं. प्रताप, पं. जसराम, पूरणचन्द आदि थे।

पटियाला घराना
कुछ विद्वान पटियाला घराने को जयपुर घराने से ही निकला मानते हैं। पटियाला घराने के जनक अलीबख्श व फतह अली थे। ये दोनों रामसिंह (जयपुर) के दरबारी गायक थे। अलीबख्श के पिता कालू ने इन दोनों को संगीत की शिक्षा दी। पाकिस्तानी गजल गायक 'गुलाम अली' पटियाला घराने से ही संबंधित थे।

बीनकार घराना
यह घराना जयपुर का प्रसिद्ध है। इस घराने के जनक रज्जब खाँ बीकानेर के थे, जो रामसिंह द्वितीय के दरबारी विद्वान थे। सावल खाँ, सादिक खाँ, अली खाँ, मुशर्रफ खाँ अन्य प्रमुख संगीतकार थे।

सेनिया घराना
इस घराने के जनक तानसेन के पुत्र सूरतसेन थे। सेनिया घराने को सितारवादियों का घराना कहते है। यह घराना जयपुर व अलवर में प्रसिद्ध है। सेनिया घराना सितार संगीत के लिये जाना जाता है। सुखसेन, रहीमसेन, कायम सेन, निहालसेन आदि प्रमुख विद्वान थे।

डागर घराना
डागर घराना ध्रुवपद गायक के लिये जाना जाता है। इसे घराने का विकास बहराम खाँ ने किया जो रामसिंह द्वितीय (जयपुर) का दरबारी विद्वान था। तानसेन पाण्डेय, मुइनुद्दीन, जाकिरुद्दीन खां प्रमुख संगीतकार थे। डागर घराना कलावंत जाति का है। डागर घराने के मूलजनक गोपालदास थे।

उणियारा घराना
उणियारा घराना ध्रुवपद के लिये जाना जाता है। करीम खां, जहांगीर खां, छज्जू खां, दुल्लु खां, प्रमुख संगीतकार थे।

रंगीला घराना
इस घराने के जनक रमजान खाँ थे जो जोधपुर के गायक इमाम बख्श के शिष्य थे।

लंगा गायकी
लंगा जाति के गायन के कारण इस गायन को लंगा गायकी कहा जाता है। यह गायन सारंगी व कमायाचा वाद्य यंत्र से किया जाता है। यह गायन जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर का प्रसिद्ध है। फूसें खां, अलाउद्दीन खां, लंगा, करीम खां लंगा प्रसिद्ध कलाकार है।
 
तालबंदी
औरंगजेब ने संगीत व संगीतकारों को अपने राज्य से निकाल दिया। निकाले गये संगीतकार भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवाईमाधोपुर में आकर बस गये। यह गायन प्रतियोगिता के रूप में किया जाता है, जिस कारण इसे 'संगीत दंगल' कहा जाता है।

मांगणियार गायकी
मांगणियार जाति द्वारा गायन के कारण इसे 'मांगणियार गायकी' कहा जाता है। मांगणियार जाति सिंध प्रदेश की मुस्लिम जाति है। बाड़मेर व जैसलमेर में यह गायकी प्रसिद्ध है। यह गायन पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस गायकी में खड़ताल व कमायचा वाद्य यंत्र का प्रयोग होता है रमजान खां, समन्दर खां, सदीक खां, रुकमा मांगणियार प्रसिद्ध गायकी है। 2022 में जयपुर में सदीक खां मांगणियार व अनुसंधान परिषद् की स्थापना की।

Post a Comment

Post a Comment (0)

Previous Post Next Post
Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

Education, GK & Spiritual Content Creator

Kartik Budholiya is an education content creator with a background in Biological Sciences (B.Sc. & M.Sc.), a former UPSC aspirant, and a learner of the Bhagavad Gita. He creates educational content that blends spiritual understanding, general knowledge, and clear explanations for students and self-learners across different platforms.