राज्य विधानमण्डल (राजस्थान)

राज्य विधानमण्डल

राज्य का विधानमण्डल राज्य में नीति-निर्माण की रूपरेखा तैयार करता है तथा सरकार को नीतियों के क्रियान्वयन के लिए वैधानिक शक्ति प्रदान करता है। राज्य स्तर पर आवश्यक विधायी ढाँचा उपलब्ध कराने का कार्य विधानमण्डल द्वारा ही किया जाता है।
भारतीय संविधान में राज्य विधानमण्डल की स्पष्ट व्यवस्था की गई है। भारत के प्रत्येक राज्य में एक विधानमण्डल होता है। संविधान के भाग- 6 के अध्याय- 3 के अंतर्गत अनुच्छेद 168 से 212 तक राज्य विधानमण्डल के संगठन, कार्य, कार्यकाल और शक्तियों का वर्णन किया गया है।
विधानमण्डल राज्य में कानून बनाने वाली सर्वोच्च संस्था है। यह राज्य की कार्यपालिका पर नियंत्रण रखता है तथा राज्य का बजट पारित करता है। किसी राज्य का विधानमण्डल एकसदनीय या द्विसदनीय हो सकता है। द्विसदनीय विधानमण्डल में उच्च सदन को विधानपरिषद और निम्न सदन को विधानसभा कहा जाता है।
राज्यपाल राज्य विधानमण्डल का अभिन्न अंग होता है। केंद्रीय विधायिका से तुलना करने पर स्पष्ट होता है कि केंद्र में लोकसभा की जो भूमिका है, वही भूमिका राज्यों में विधानसभा की होती है, जबकि विधानपरिषद की स्थिति राज्यसभा के समान होती है।
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इस प्रकार राज्य का विधानमण्डल, विधानसभा, विधानपरिषद और राज्यपाल से मिलकर बनता है। संविधान के अनुच्छेद 168 के अनुसार प्रत्येक राज्य में विधानमण्डल का होना अनिवार्य है।
अनुच्छेद 168 (क) के अनुसार आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तरप्रदेश, बिहार तथा तेलंगाना में यह दो सदनों से मिलकर बनेगा और अनुच्छेद 168 (ख) के अनुसार अन्य राज्यों में यह एक सदनीय होगा। वर्तमान में 22 राज्यों में एक सदनीय व्यवस्था है। विधानसभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से वयस्क मताधिकार के आधार पर, प्रत्यक्ष निर्वाचन से होगा। राजस्थान में एक सदनीय विधानमण्डल है जो विधानसभा व राज्यपाल से मिलकर बनता है। विधानसभा में सीटों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर परिसीमन आयोग के प्रतिवेदन के आधार पर निश्चित होता है। वर्तमान में विधानसभा सीटों का निर्धारण 2001 की जनगणना के आधार पर किया जाता है। राजस्थान में पहली विधानसभा (1952-57) में सदस्यों की संख्या 160 थी। बाद में अजमेर के विलय के बाद इसकी सदस्य संख्या 176 कर दी गई। चौथी और पाँचवी विधानसभा में 184 सदस्य संख्या की गई। छठी विधानसभा में (1977-80) में सीटों की संख्या 200 कर दी गई। अब तक यह संख्या 200 ही है।

राज्य विधान मण्डल से संबंधित अनुच्छेद

  • अनु. 168 : राज्यों के विधान मण्डलों का गठन।
  • अनु. 169 : राज्यों में विधान परिषदों का उत्सादन या सृजन।
  • अनु. 170 : विधान सभाओं की संरचना।
  • अनु. 171 : विधान परिषदों की संरचना।
  • अनु. 172 : राज्यों के विधानमण्डलों की अवधि।
  • अनु. 173 : राज्यों के विधानमण्डल की सदस्यता के लिए अर्हता।
  • अनु. 174 : राज्य के विधान मण्डल के सत्र, सत्रावसान और विघटन।
  • अनु. 175 : सदन और सदनों में अभिभाषण और उनको संदेश भेजने का राज्यपाल का अधिकार।
  • अनु. 176 : राज्यपाल का विशेष अभिभाषण।
  • अनु. 177 : सदनों के बारे में मंत्रियों और महाधिवक्ता के अधिकार।
  • अनु. 178 : विधान सभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष।
  • अनु. 179 : अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना, पदत्याग और पद से हटाया जाना।
  • अनु. 180 : अध्यक्ष के पद के कर्त्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्ति।
  • अनु. 181 : जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना।
  • अनु. 182 : विधान परिषद् का सभापति और उपसभापति।
  • अनु. 183 : सभापति और उपसभापति का रिक्त होना, पदत्याग और पद से हटाया जाना।
  • अनु. 184 : सभापति के पद के कर्त्तव्यों का पालन करने या सभापति के रूप में कार्य करने की उपसभापति या अन्य व्यक्ति की शक्ति।
  • अनु. 185 : जब सभापति या उपसभापति को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना।
  • अनु. 186 : अध्यक्ष और उपाध्यक्ष तथा सभापति और उप सभापति के वेतन और भत्ते।
  • अनु. 187 : राज्य के विधान मण्डल का सचिवालय कार्य संचालन।
  • अनु. 188 : सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान।
  • अनु. 189 : सदस्यों में मतदान, रिक्तियों के होते हुए भी सदनों की कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति।
  • अनु. 190 : स्थानों का रिक्त होना।
  • अनु. 191 : सदस्यों के लिए निरर्हताएँ।
  • अनु. 192 : सदस्यों की निरर्हताओं से संबंधित प्रश्नों पर विनिश्चय।
  • अनु. 193 : अनुच्छेद 188 के अधीन शपथ लेने या प्रतिज्ञा करने से पहले यह अर्हित न होते हुए या निरर्हित किए जाने पर बैठने और मत देने के लिए शक्ति राज्य के विधानमण्डलों और उसके सदस्यों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ।
  • अनु. 194 : विधान मण्डलों के सदस्यों की तथा सदस्यों और समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार।
  • अनु. 195 : सदस्यों के वेतन और भत्ते, विधायी प्रक्रिया।
  • अनु. 196 : विधेयकों को पुनः स्थापन और पारित किए जाने के संबंध में उपबंध।
  • अनु. 197 : धन विधेयकों से भिन्न विधेयकों के बारे में विधान परिषद् की शक्तियों पर निर्बंधन।
  • अनु. 198 : धन विधेयकों के संबंध में विशेष प्रक्रिया।
  • अनु. 199 : धन विधेयक की परिभाषा।
  • अनु. 200 : विधेयकों पर अनुमति।
  • अनु. 201 : विचार के लिए आरक्षित विधेयक।
  • अनु. 202 : वार्षिक वित्तीय विवरण।
  • अनु. 203 : विधानमण्डल में प्राक्कलनों के संबंध में प्रक्रिया।
  • अनु. 204 : विनियोग विधेयक।
  • अनु. 205 : अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान।
  • अनु. 206 : लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान।
  • अनु. 207 : वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबंध।
  • अनु. 208 : प्रक्रिया के नियम।
  • अनु. 209 : राज्य के विधानमण्डल में वित्तीय कार्य संबंधी प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन।
  • अनु. 210 : विधानमण्डल में प्रयोग की जाने वाली भाषा।
  • अनु. 211 : विधानमण्डल में चर्चा पर निर्बंधन।
  • अनु. 212 : न्यायालयों द्वारा विधानमण्डल की कार्यवाहियों की जाँच नहीं किया जाना।

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विधानसभा

राजस्थान विधानमण्डल एक सदनीय है। यह विधानसभा व राज्यपाल से मिलकर बना है। विधानसभा राज्य के विधानमण्डल का निम्न सदन है। यह राज्यों में विधानमंडल का लोकप्रिय सदन है। यह एक अस्थायी सदन है जिसके सदस्यों अर्थात् विधायकों (MLA's) का चुनाव जनता द्वारा 5 वर्ष के लिए सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर किया जाता है। अनुच्छेद 170 के अनुसार विधानसभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रत्यक्ष रूप से राज्य की जनता करती है। इस कारण इस सदन को राज्यों का लोकप्रिय सदन भी कहते हैं। विधानसभा को 5 वर्ष से पूर्व भी राज्यपाल द्वारा भंग किया जा सकता है। विधानसभा, विधानपरिषद से अधिक शक्तिशाली सदन है।
  • नोट- विधानसभा के चुनाव भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा सम्पन्न करवाया जाता है।

विधानसभाओं की संरचना- अनुच्छेद 170 (1)

अनुच्छेद 333 के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक राज्य की विधानसभा उस राज्य के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए सदस्यों से मिलकर बनती है। राज्य विधानसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 500 तथा न्यूनतम संख्या 60 निर्धारित की गई है।
अनुच्छेद 170 (2) के अनुसार किसी राज्य की विधानसभा की सदस्य संख्या उस राज्य की जनसंख्या पर निर्भर करती है। प्रत्येक राज्य में विधानसभा सीटों का समायोजन 1971 की जनगणना के आधार पर किया गया है, जबकि निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का समायोजन 2001 की जनगणना के आँकड़ों के अनुसार किया गया है। 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 के अनुसार राज्य विधानसभाओं की सदस्य संख्या वर्ष 2026 तक अपरिवर्तित रहेगी।
सामान्यतः राज्य विधानसभा के सदस्यों की संख्या न्यूनतम 60 और अधिकतम 500 होती है, किंतु अनुच्छेद 371 के अंतर्गत कुछ राज्यों में इससे कम सदस्य संख्या भी निर्धारित की गई है। उदाहरणस्वरूप- अरुणाचल प्रदेश में 60, सिक्किम में 32 तथा गोवा में 40 सदस्य हैं। वहीं मिजोरम और नागालैंड में क्रमशः 40 और 60 सदस्यों की व्यवस्था की गई है। देश में विधानसभा की सर्वाधिक सीटें उत्तर प्रदेश (403) में हैं, जबकि न्यूनतम सीटें सिक्किम (32) में हैं।
संविधान के अनुच्छेद 332 के अनुसार राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (SC) एवं अनुसूचित जनजाति (ST) को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण प्रदान किया जाता है। राजस्थान विधानसभा की कुल सीटें 200 हैं, जिनमें 59 सीटें आरक्षित हैं। इनमें से 34 सीटें अनुसूचित जाति तथा 25 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं।
अनुच्छेद 333 राज्य विधानसभाओं में आंग्ल-भारतीय समुदाय के प्रतिनिधित्व से संबंधित है। यदि किसी राज्य के राज्यपाल की राय में विधानसभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, तो वह उस समुदाय के एक सदस्य को विधानसभा में मनोनीत कर सकता है। पूर्व में देश की लगभग 13 राज्य विधानसभाओं (जैसे- केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्यप्रदेश आदि) में इस प्रावधान के अंतर्गत मनोनयन किया गया था। किंतु 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 द्वारा यह आरक्षण समाप्त कर दिया गया, जो 20 जनवरी 2020 से प्रभावी हुआ।

निर्वाचन पद्धति

आंग्ल भारतीय समुदाय के एक नामजद सदस्य को छोड़कर विधानसभा के अन्य सभी सदस्यों का निर्वाचन मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुनाव द्वारा प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में जनता द्वारा होता है। यह चुनाव वयस्क मतदान के आधार पर होता है।
विधानसभा के निर्वाचन के लिए वयस्क मताधिकार और संयुक्त निर्वाचन प्रणाली अपनाई गई है। निर्वाचन पर नियन्त्रण के लिए हर राज्य को क्षेत्रीय विभाजन के आधार पर बाँटा गया है। इन चुनाव क्षेत्रों का निर्धारण, राज्य को आवंटित सीटों की संख्या को जनसंख्या के अनुपात से तय किया जाता है।
संविधान में राज्य की जनसंख्या के अनुपात के आधार पर प्रत्येक राज्य की विधानसभा के लिए अनुसूचित जाति/जनजाति की सीटों की व्यवस्था की गई है। जैसे राजस्थान में अनु. जाति (SC) की 34 सीटें और अनुसूचित जन जाति की 25 सीटें निर्धारित हैं। कुल 59 सीटें आरक्षित है। अनुसूचित जाति की सर्वाधिक सीटें उत्तरप्रदेश (92) है, इसके पश्चात्, पश्चिम बंगाल (59), मध्यप्रदेश (44), तमिलनाडु (43), बिहार (36), कर्नाटक में (33) है। अनुसूचित जनजाति की सर्वाधिक सीटें मध्यप्रदेश (75), मेघालय व नगालैण्ड प्रत्येक (59) है।
संविधान के अनुच्छेद 332 के द्वारा अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जन जातियों (S.T.) को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण प्रदान किया गया है। प्रारम्भ में आरक्षण का प्रावधान 10 वर्ष के लिए था बाद में संसद द्वारा इसे समय-समय पर बढ़ाया गया। 95वें संविधान संशोधन अधिनियम 2009 के द्वारा इसे 25 जनवरी, 2020 तक बढ़ाया गया।
104 वें संविधान संशोधन विधेयक, 2020 के द्वारा संसद ने संविधान के अनुच्छेद 334 (क) में संशोधन करके अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण 10 वर्ष और बढ़ाकर 80 वर्ष के लिए अर्थात् 25 जनवरी, 2030 तक कर दिया है इस संशोधन के द्वारा आंग्ल भारतीय या एंग्लो इंडियन का आरक्षण नहीं बढ़ाया गया है।

मतदाताओं की योग्यताएँ
मतदाताओं के लिए 18 वर्ष की आयु प्राप्त भारतीय नागरिक होना चाहिए तथा उसका नाम मतदाता सूची में सम्मिलित होना चाहिए। इससे पूर्व मतदान की आयु 21 वर्ष थी। परन्तु 61वें संविधान संशोधन अधिनियम 1989 के द्वारा मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई।

सदस्यों की योग्यताएँ/अर्हताएँ (अनुच्छेद 173)
  • वह भारत का नागरिक हो।
  • कम-से-कम 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  • वह केन्द्र या राज्य सरकार के किसी लाभ के पद पर कार्यरत न हो।
  • संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा निर्धारित योग्यताएँ।
  • निर्वाचन आयोग द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ ली हो।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में वर्णित योग्यताएँ
विधानसभा सदस्य बनने वाला व्यक्ति संबंधित राज्य के निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता होना चाहिए।
अनुसूचित जाति (SC) व जनजाति (ST) का सदस्य आरक्षित एवं अनारक्षित क्षेत्रों से चुनाव लड़ सकता है।
विधानपरिषद् में निर्वाचित होने वाला व्यक्ति विधानसभा में निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
2008 में संशोधन करते हुए यह व्यवस्था की गयी कि आतंकवादी गतिविधियों, मिलावट करने वाला (खाद्य पदार्थों एवं दवाओं में) व्यक्ति, तस्करी, विदेशी मुद्रा नियम अधिनियम एवं अपराधी व्यक्ति को इस अधिनियम के अनुसार चुनाव लड़ने के अयोग्य माना जायेगा।

कार्यकाल/राज्यों के विधान मण्डलों की अवधि (अनु. 172)
अनुच्छेद 172 (1) राज्य विधानसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक से पाँच वर्ष तक होता है। परन्तु राज्यपाल द्वारा इसे समय से पूर्व भी भंग किया जा सकता है। संकटकाल की घोषणा होने पर 1 वर्ष के लिए संसद इस अवधि को बढ़ा भी सकती है, परन्तु यह बढ़ी हुई अवधि अधिक-से-अधिक संकटकाल की समाप्ति के 6 माह बाद तक हो सकती है। यदि सत्ताधारी दल बहुमत खो देता है या मुख्यमंत्री त्यागपत्र दे देता है या राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होता है, तो विधानसभा 5 वर्ष से पूर्व भंग हो सकती है। अनुच्छेद 172 (2) के अनुसार राज्य विधानपरिषद् के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है परन्तु 1/3 सदस्य प्रत्येक 2 वर्ष बाद सेवानिवृत्त हो जाते हैं।

गणपूर्ति
विधानसभा बैठक के लिए गणपूर्ति कम-से-कम 10% या 1/10 सदस्य सदन में उपस्थित हो, लेकिन यह संख्या किसी भी शर्त पर 10 से कम नहीं होनी चाहिए। एक वर्ष में विधानसभा की न्यूनतम 2 बैठकें होनी चाहिए।

राज्य के विधानमंडल के सत्र, सत्रावसान और विघटन (अनु. 174)
संविधान के अनुच्छेद 174 (1) के अनुसार राज्यपाल समय-समय पर राज्य के विधान मंडल के सदन या प्रत्येक सदन को ऐसे समय और स्थान पर, जो वह ठीक समझे, अधिवेशन के लिए आहूत करेगा। डॉ. अम्बेड़कर का कहना है कि विधानसभा सत्र आहूत करना राज्यपाल का कर्त्तव्य है। विधानसभा का सत्र एक वर्ष में कम-से-कम दो बार आहूत किया जाना चाहिए और किन्हीं दो सत्रों के मध्य 6 माह से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए। विशेष परिस्थिति में विधानसभा का विशेष सत्र भी बुलाया जा सकता है। संविधान के उपबंधों के अध्ययधीन एक कलैण्डर वर्ष में विधानसभा के कम से कम तीन सत्र, अर्थात् शीतकालीन सत्र, बजट सत्र और वर्षाकालीन सत्र होंगे। एक वर्ष में समस्त सत्रों की बैठकों की संख्या 60 से कम नहीं होगी।
नाबाम-राबिया मामला 2016 में उच्चतम न्यायालय द्वारा अपने निर्णय में कहा कि राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह व परामर्श से विधानसभा सत्र बुलायेगा। अनुच्छेद 174 व अनुच्छेद 163 को साथ-साथ पढ़ा जावे।
अनुच्छेद 174 (2) क के अन्तर्गत राज्यपाल विधानमण्डल के किसी भी सदन का सत्रावसान कर सकता है। राज्यपाल को विधानसभा का सत्र आहूत करने, सत्रावसान करने व विधानसभा को विघटित करने की शक्ति प्राप्त है। किसी सदन (विधानसभा या विधानपरिषद्) का स्थगन उसका अध्यक्ष/सभापति करता है। सदन की अध्यक्षता स्पीकर (विधानसभा अध्यक्ष) या सभापति (विधानपरिषद्) करता है।
राज्यपाल द्वारा बुलाए गए सत्र की सूचना विधानसभा सचिव द्वारा प्रत्येक सदस्य को नियत तारीख से 21 दिन पूर्व देगा। अनुच्छेद 174 (2) ख के अन्तर्गत राज्यपाल राज्य की विधानसभा का विघटन भी कर सकता है।

सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान (अनुच्छेद 188)
राज्य विधानसभा या विधान परिषद के प्रत्येक सदस्य को अपना स्थान ग्रहण करने से पहले, राज्यपाल या उसके द्वारा इस हेतु नियुक्ति व्यक्ति के समक्ष, संविधान की तीसरी अनुसूची में दिए गए प्रारूप के अनुसार शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा।

विधानसभा सदस्यों के वेतन एवं भत्ते
विधानसभा के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष के वेतन एवं भत्ते 'राज्य की संचित निधि' पर भारित होते हैं। सदस्यों के वेतन का निर्धारण विधानसभा द्वारा किया जाता है।

सदस्यों को प्राप्त विशेषाधिकार
(1) विधानसभा सदस्य सदन में भाषण दे सकते हैं। इनके भाषण के विरुद्ध न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती।
(2) विधानसभा के अधिवेशन के दौरान अर्थात् 40 दिन पूर्व तक और 40 दिन बाद तक विधानसभा सदस्यों के विरुद्ध दीवानी मुकदमे में गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। विधानसभा सदस्यों की निरर्हताएँ (अयोग्यताएँ) अनुच्छेद 191 यदि वह भारत का नागरिक नहीं रहे अर्थात् किसी दूसरे देश की नागरिकता अर्जित (प्राप्त) कर लें।
  • यदि वह भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन लाभ का पद प्राप्त कर लेता है।
  • यदि किसी व्यक्ति को सक्षम न्यायालय द्वारा विकृतचित्त घोषित कर दिया गया है।
  • 10वीं अनुसूची में वर्णित दल-बदल प्रावधानों द्वारा अयोग्य घोषित कर दिया है।
  • संसद द्वारा निर्मित विधि के द्वारा अयोग्य घोषित कर दिया गया है।

पदाधिकारी अनुच्छेद 178
प्रत्येक राज्य की विधानसभा में दो पदाधिकारी होते हैं।
  1. विधानसभा अध्यक्ष (Speaker)
  2. उपाध्यक्ष (Deputy Speaker)
राज्य विधानसभा की कार्यवाही को सुचारू रूप से संचालित करने हेतु राज्य विधानसभा के सदस्य अपने में से विधानसभा अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं। विधानसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का कार्यकाल विधानसभा के कार्यकाल तक होता है।
विधानसभा अध्यक्ष अगली विधानसभा के गठन की प्रक्रिया शुरू होने तक अपने पद पर बना रहता है, यदि उसने त्यागपत्र नहीं दिया है। अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष विधानसभा का सदस्य न रहने की स्थिति में अपना पद छोड़ देते हैं। जब विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर नहीं होते तो सदस्य अपना त्यागपत्र विधानसभा सचिव को देते हैं।
अध्यक्ष व उपाध्यक्ष को विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव द्वारा पद से हटाया जा सकता है। लेकिन ऐसा कोई प्रस्ताव पेश करने के 14 दिन पूर्व उन्हें प्रस्ताव के सम्बन्ध में सूचना दी जानी चाहिए। जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के हटाने के प्रस्ताव पर सदन में विचार किया जा रहा हो, तब सदन की अध्यक्षता उस पदाधिकारी द्वारा नहीं की जा सकती, जिसके विरुद्ध प्रस्ताव पर विचार हो रहा हो।

त्यागपत्र
अध्यक्ष, अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को तथा उपाध्यक्ष अध्यक्ष को त्यागपत्र सौंपकर अपना पद त्याग सकते है। अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष के वेतन तथा भत्तों का निर्धारण विधानमण्डल द्वारा किया जाता है। इनका वेतन राज्य की संचित निधि से दिया जाता है।

प्रोटेम स्पीकर
जब विधानसभा में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होता है अर्थात् विधानसभा की पहली बैठक के तुरन्त पहले विघटित विधानसभा का अध्यक्ष व उपाध्यक्ष अपना पद त्याग देते हैं तो अध्यक्ष के कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए राज्यपाल अनुच्छेद 95(1) के द्वारा सदन के वरिष्ठ सदस्य को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करता है इसे अस्थायी अध्यक्ष सामयिक अध्यक्ष या कार्यवाहक अध्यक्ष भी कहते हैं। राजस्थान विधानसभा में नव निर्वाचित विधानसभा सदस्यों को प्रोटेम स्पीकर शपथ दिलवाता है। शपथ उपरान्त सदस्य अपने में से अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। नये अध्यक्ष के चुनाव के बाद प्रोटेम स्पीकर त्यागपत्र दे देता है।

विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार एवं कार्य
  • विधानसभा (सदन) की बैठकें बुलाना, स्थगित करना और बैठकों की अध्यक्षता करना।
  • सदन में अनुशासन व शांति व्यवस्था बनाये रखना।
  • सदन के नेता के परामर्श से विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श व वाद-विचार का समय निश्चित करना, सदस्यों को भाषण की अनुमति देना व भाषण का क्रम निश्चित करना।
  • सदन में पारित विधेयकों को प्रमाणित करता है।
  • कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय विधानसभा अध्यक्ष करता है।
  • वह सदन के विशेषाधिकारों का रक्षक है।
  • विधानसभा अध्यक्ष नियम समिति, कार्यमंत्रणा समिति एवं सामान्य उद्देश्य समिति का अध्यक्ष होता है।
  • वह विधानसभा की सभी समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति करता है।
  • दल-बदल के आधार पर उठे किसी प्रश्न के संबंध में अंतिम निर्णय अध्यक्ष करता है।

विधानसभा की शक्तियाँ और कार्य
  • विधायी शक्तियाँ
  • वित्तीय शक्तियाँ
  • प्रशासनिक शक्तियाँ
  • निर्वाचन सम्बंधी शक्तियाँ

राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष

क्र.सं. विधानसभा का अध्यक्ष नाम कार्यकाल
से तक
1.श्री नरोत्तमलाल जोशी31.03.195225.04.1957
2.श्री रामनिवास मिर्धा25.04.195703.05.1967
3.श्री निरंजन नाथ आचार्य03.05.196720.03.1972
4.श्री रामकिशोर व्यास20.03.197218.07.1977
5.श्री लक्ष्मण सिंह18.07.197720.06.1979
6.श्री गोपाल सिंह25.09.197907.07.1980
7.श्री पूनमचन्द विश्नोई07.07.198020.03.1985
8.श्री हीरालाल देवपुरा20.03.198516.10.1985
9.श्री गिरिराज प्रसाद तिवारी31.01.198611.03.1990
10.श्री हरि शंकर भाभड़ा16.03.199021.12.1993
30.12.199305.10.1994
11.श्री शान्ति लाल चपलोत07.04.199518.03.1998
12.श्री समर्थलाल मीणा24.07.199804.01.1999
13.श्री परसराम मदेरणा06.01.199915.01.2004
14.श्रीमती सुमित्रा सिंह16.04.200401.01.2009
15.श्री दीपेन्द्र सिंह शेखावत02.01.200921.01.2014
16.श्री कैलाश मेघवाल22.01.201415.01.2019
17.डॉ. सी.पी. जोशी16.01.201925.12.2023
18.वासुदेव देवनानी26.12.2023लगातार

राजस्थान विधानसभा में सरकारी मुख्य सचेतक

क्र.सं. नाम कार्यकाल
कब से कब तक
1.श्री मथुरादास माथुर...07.1953...02.1957
2.श्री हरिदेव जोशी...09.195721.02.1964
3.श्री रामप्रसाद लड्ढा22.04.1964...03.1967
4.श्री जयकृष्ण शर्मा08.03.196705.03.1968
5.श्री गिरधारी लाल व्यास06.03.1968...03.1972
6.श्री खेतसिंह राठौड़13.04.1972...04.1977
7.श्री सम्पत्तराम...07.197709.02.1978
8.श्री नवनीत कुमार पालीवाल10.02.197815.05.1979
9.श्री खेतसिंह राठौड़09.07.198008.03.1985
10.डॉ. बुलाकी दास कल्ला11.03.198506.02.1988
11.श्री रघुनाथ परिहार06.02.198819.12.1989
12.श्री पंकज पंचौली20.12.198928.02.1990
13.श्री ओम प्रकाश गुप्ता15.03.199014.12.1992
14.श्री महावीर प्रसाद जैन29.12.199330.11.1998
15.श्री हरिसिंह महुआ22.03.199904.12.2003
16.श्री महावीर प्रसाद जैन21.06.200410.12.2008
17.श्री वीरेन्द्र बेनीवाल29.12.200823.11.2011
18.डॉ. रघु शर्मा23.11.201109.12.2013
19.श्री कालूराम गुर्जर21.01.201412.12.2018
20.डॉ. महेश शर्मा15.01.201915.12.2023
21.जोगेश्वर गर्ग09.01.2024लगातार

राजस्थान विधानसभा में प्रतिपक्षा दल के नेता

क्र.सं. नाम कार्यकाल
कब से कब तक
1.श्री जसवन्त सिंह29.03.195209.04.1956
2.श्री लक्ष्मण सिंह13.03.196228.02.1967
3.श्री लक्ष्मण सिंह03.05.196715.03.1972
4.श्री लक्ष्मण सिंह20.03.197230.04.1977
5.श्री परसराम मदेरणा18.04.197713.11.1978
6.श्री रामनारायण चौधरी13.11.197815.02.1979
7.श्री परसराम मदेरणा16.02.197929.08.1979
8.महारावल लक्ष्मण सिंह24.09.197911.10.1979
9.श्री भैरोंसिंह शेखावत15.07.198009.03.1985
10.श्री भैरोंसिंह शेखावत28.03.198530.12.1989
11.प्रो. केदार नाथ शर्मा30.12.198901.03.1990
12.श्री हरिदेश जोशी19.03.199015.12.1992
13.श्री परसराम मदेरणा31.12.199230.11.1998
14.श्री भैरोंसिंह शेखावत08.01.199919.08.2002
15.श्री गुलाब चन्द कटारिया25.08.200204.12.2003
16.डॉ. बी.डी. कल्ला16.01.200426.01.2006
17.श्री रामनारायण चौधरी27.01.200622.10.2008
18.श्री हेमाराम चौधरी23.10.200810.12.2008
19.श्रीमती वसुन्धरा राजे02.01.200925.02.2010
20.श्रीमती वसुन्धरा राजे09.03.201120.02.2013
21.श्री गुलाब चन्द कटारिया21.02.201309.12.2013
22.श्री रामेश्वर लाल डूडी23.01.201412.12.2018
23.श्री गुलाब चन्द कटारिया13.01.201922.02.2023
24.श्री राजेन्द्र राठौड़02.04.202315.12.2023
25.टीकाराम जुली16.01.2024लगातार

विधानपरिषद्

राज्य के विधानमण्डल के दूसरे सदन को विधानपरिषद् कहा जाता है यह राज्य का उच्च सदन है। किसी राज्य में विधानपरिषद् की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत की गई है। विधानपरिषद् के सदस्यों को (MLC) या सदस्य विधानपरिषद् कहते हैं।

विधानपरिषद् का सृजन अथवा उत्पादन
अनुच्छेद 169 के अनुसार यदि किसी राज्य की विधानसभा अपने कुल सदस्यों के पूर्ण बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करके संसद को भेजती है तो संसद उस राज्य के लिए विधानपरिषद् की स्थापना या उसका लोप (समाप्त) कर सकती है। इसके लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता नहीं होती है। विधानपरिषद् ऐसा सदन है, जिसे समाप्त तो किया जा सकता है, परन्तु विघटित (Dissolve) नहीं किया जा सकता।
वर्तमान में भारतीय संघ के केवल 6 राज्यों में उत्तर प्रदेश (100) बिहार (75), महाराष्ट्र (78), कर्नाटक (75), आंध्र प्रदेश (50 निर्वाचित + 8 मनोनीत) और तेलंगाना (40) में विधानपरिषद् है। 27 जनवरी, 2020 को आंध्रप्रदेश की जगमोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली वाई एस आर कांग्रेस सरकार द्वारा आंध्रप्रदेश की 58 सदस्यीय विधानपरिषद् को समाप्त करने का प्रस्ताव पारित किया गया है अब यदि केन्द्र सरकार (संसद) स्वीकृति दे देती है तो देश के 5 राज्यों में ही द्विसदनात्मक व्यवस्था रह जायेगी।

सदस्य संख्या या संरचना अनुच्छेद 171 (1)
संविधान में व्यवस्था की गई है कि प्रत्येक राज्य की विधानपरिषद् के सदस्यों की अधिकतम संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की संख्या के 1/3 से अधिक नहीं होगी, परन्तु साथ ही यह भी कहा गया है कि किसी भी दशा में उसकी सदस्य संख्या 40 से कम नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए यदि राजस्थान में विधानपरिषद् का गठन किया जाये तो विधान परिषद में अधिकतम
सदस्य संख्या 200/3=66.66 अर्थात् 67 हो सकती है परन्तु राजस्थान सरकार द्वारा वर्ष 2012 में 66 सदस्यीय विधानपरिषद् के गठन का प्रस्ताव भिजवाया था। जिसे संसद द्वारा अनुमोदित नहीं किया गया। 1 जुलाई 2021 में राज्य सरकार ने पुनः इसे संसद के पास भेजने का निर्णय लिया है। इससे पूर्व अशोक गहलोत ने अपने तीनों कार्यकाल में प्रस्ताव भेजा व वसुंधरा राजे ने वर्ष 2008 में परन्तु स्वीकृति नहीं मिल सकी। 36 सदस्यों वाली जम्मू-कश्मीर की विधानपरिषद् को समाप्त कर दिया है। केन्द्र-शासित प्रदेश जम्मू एवं कश्मीर विधानसभा में 114 सीटें होगी तथा इन सीटों में से पाक अधिकृत कश्मीर (पी.ओ.के.) के लिए 24 सीटें रिक्त रखी जायेगी।

विधानपरिषद् का गठन अनु. 171 (3)
  • विधानपरिषद् के गठन के लिए निम्नलिखित 5 आधारों का सहारा लिया जाता है।
  • 1/3 सदस्य राज्य की स्थानीय संस्थाओं द्वारा चुने जाते हैं।
  • 1/3 सदस्य राज्य की विधानसभा के निर्वाचक मण्डल द्वारा निर्वाचित होते हैं।
  • 1/12 सदस्य राज्य के पंजीकृत स्नातकों द्वारा निर्वाचित होते हैं।
  • 1/12 सदस्य राज्य के ऐसे प्राध्यापकों में से निर्वाचित होते हैं जो माध्यमिक या उच्च शिक्षण संस्था में कम-से-कम 3 वर्ष से अध्यापन कार्य कर रहे हो। 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं, जो साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता और समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष योग्यता या व्यावहारिक अनुभव रखते हो
इस तरह विधानपरिषद् के कुल सदस्यों में से 5/6 सदस्यों का अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव होता है और 1/6 को राज्यपाल नामित करता है। सदस्य, एकल संक्रमणीय मत पद्धति के द्वारा समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के माध्यम से चुने जाते है।

सदस्यों की योग्यताएँ
विधानपरिषद् की सदस्य के लिए भी वही योग्यताएँ हैं जो विधानसभा की सदस्यता के लिए है। अंतर केवल यह है कि विधानपरिषद् के सदस्य के लिए आयु न्यूनतम 30 वर्ष होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, निर्वाचित सदस्य को उस राज्य की विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्र का निर्वाचक होना चाहिए व उसे उसी राज्य का निवासी होना चाहिए, जिसकी विधानपरिषद् का वह सदस्य बनाना चाहता है।

कार्यकाल
विधानपरिषद् एक स्थायी सदन है। इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है, इसके 1/3 सदस्य प्रत्येक 2 वर्ष बाद बदलते है। पूरी विधानपरिषद् कभी भी भंग नहीं होती और इसे राज्यपाल द्वारा भी भंग नहीं किया जा सकता है।

गणपूर्ति तथा बैठक
विधानपरिषद् की बैठकों के लिए गणपूर्ति तभी होती है, जब उसके सदस्यों में से कम-से-कम 10 प्रतिशत सदन में उपस्थित हो, किन्तु यह संख्या 10 से कम नहीं होनी चाहिए। अर्थात् सदन के 1/10 सदस्य।
विधानपरिषद् की वर्ष में कम-से-कम दो बैठक होनी चाहिए तथा इन दोनों बैठकों के बीच 6 माह से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए।

पदाधिकारी अनुच्छेद 182
विधानपरिषद् अपने सदस्यों में से एक सभापति और एक उपसभापति का चुनाव करती है। यदि सदन के सभापति का पद रिक्त हो तो उपसभापति सदन की बैठकों की अध्यक्षता करता है तथा यदि उपसभापति का पद भी रिक्त हो तो सम्बंधित सदन का ऐसा सदस्य जिसे राज्यपाल इस कार्य के लिए नियुक्त करे, उस पद के कर्तव्यों का पालन करता है।
अनुच्छेद 183 के अनुसार सभापति, उपसभापति को सम्बोधित कर और उपसभापति, सभापति को सम्बोधित कर अपना त्यागपत्र दे सकता है।
इन दोनों को विधानपरिषद् सदस्यों के बहुमत द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव के आधार पर हटाया जा सकता है। 14 दिन की पूर्व सूचना पर इनके विरुद्ध हटाने का प्रस्ताव पेश किया जा सकता है, सभापति या उपसभापति तब उस सदन की कार्यवाही का संचालन नहीं करता है, जब हटाने के प्रस्ताव पर विचार-विमर्श किया जा रहा हो।

विधानपरिषद् की शक्तियाँ तथा कार्य
  1. कानून निर्माण सम्बन्धी कार्य
  2. कार्यपालिका सम्बन्धी कार्य
  3. वित्त सम्बन्धी कार्य।
राज्य के विधानमण्डल के लिए संसद के समान ही विधायी प्रक्रिया अपनाई जाती है। एक विधेयक राज्य विधानमण्डल के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। यदि राज्य में विधानपरिषद् विद्यमान है तो यह उस विधेयक को अधिक से अधिक 6 माह तक पारित होने से रोक सकती है। राज्य के स्तर पर दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने का कोई प्रावधान नहीं होता है।

राजस्थान में विधानसभा

राजस्थान में विधानमंडल का विकास स्वतंत्रता के पश्चात और संविधान के लागू होने से हुआ है। स्वतंत्रता से पूर्व राजस्थान 22 देशी रियासतों व एक केन्द्रशासित प्रदेश में विभाजित था।
  1. बीकानेर राज्य- देशी रियासतों में राजतंत्र था। शासक निरंकुश थे और रियासत की विधायी कार्यकारी (प्रशासकीय) और न्यायिक शक्तियाँ शासकों के हाथों में केन्द्रित थी। रियासतें सम्प्रभुता सम्पन्न न होकर ब्रिटिश सम्राट की सार्वभौम सत्ता के अधीन थी। रियासत काल में ही राजस्थान में संसदीय लोकतंत्र शुरू हो गया था। सबसे पहले बीकानेर के शासक महाराजा गंगासिंह ने 1912 में ‘प्रतिनिधि सभा’ के गठन की घोषणा की। 1913 में विधानमण्डल की शुरुआत की। राजस्थान के इस प्रथम विधानमण्डल, जिसे ‘प्रतिनिधि सभा’ कहा जाता था का उद्घाटन 10 नवम्बर, 1913 को हुआ। इस प्रतिनिधि सभा द्वारा नवम्बर, 1913 से लेकर मार्च, 1947 तक 116 सरकारी विधेयक पारित किये। जिन्होंने कानून का रूप लिया।
  2. बाँसवाड़ा राज्य- इसके पश्चात् राजपूताना के बाँसवाड़ा में 3 फरवरी, 1939 को ‘राज्य परिषद’ का गठन किया। रियासती राज्य का दीवान इस परिषद का अध्यक्ष होता था। यह परिषद 1946 तक कार्यरत रही। इसके 6 अधिवेशन आहूत किये गये। एक प्रतिनिधि परामर्शदात्री सभा का गठन 1 अप्रैल, 1941 को किया और इसके संविधान को स्वीकार किया। इस सभा ने 15 जनवरी, 1942 से कार्य करना शुरू किया। यह सभा शिक्षा, जन स्वास्थ्य, स्वशासन, सहकारी विषयों, कस्टम आदि कार्यों के संबंध में चर्चा कर सकती थी। इस सभा को कानूनी (विधायी) और वित्तीय अधिकार प्राप्त नहीं थे। इस परामर्शदात्री सभा में 52 निर्वाचित और कुछ मनोनीत सदस्य होते थे। इसका उपाध्यक्ष मनोनीत होता था। इसका कार्यकाल 4 वर्ष रखा गया। अप्रैल, 1947 में इसका कार्यकाल 4 वर्ष से घटाकर 3 वर्ष कर दिया और उपाध्यक्ष का निर्वाचन किया जाने लगा। महाराजा द्वारा 1944 में गवर्नमेंट ऑफ जोधपुर एक्ट पारित किया गया।
  3. बूँदी रियासत- बूँदी रियासत के महाराजा ईश्वरी सिंह ने 18 अक्टूबर, 1943 को अपने यहाँ 23 सदस्यीय ‘धारा सभा’ का गठन किया, जिसमें 12 निर्वाचित और 11 मनोनीत सदस्य शामिल किये। धारा सभा द्वारा 10 जुलाई 1947 को बूँदी राज्य का संविधान संबंधी एक्ट पारित किया। इस एक्ट द्वारा धारा सभा का कार्यकाल 4 वर्ष निर्धारित किया गया। धारा सभा का निर्वाचन वयस्क मताधिकार और संयुक्त निर्वाचन पद्धति द्वारा गुप्त मतदान के आधार पर करवाया जाना निश्चित किया।
डूंगरपुर रियासत के महारावल ने 1918 में एक ‘राज शासन सभा’ का गठन 1918 में किया। इस सभा को दीवानी मामलों में रियासत के उच्च न्यायालय की तथा आपराधिक मामलों में सत्र न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त थी। इस शासन सभा में कुछ सरदार अधिकारी और कुछ गणमान्य नागरिक शामिल थे। 1936 में इस राज शासन सभा को विधायी कार्य भी सौंप दिये गये।
जयपुर के महाराजा मानसिंह द्वितीय ने जयपुर शासन अधिनियम, 1944 के द्वारा प्रस्ताव पारित करके 1 जून, 1944 को द्विसदनीय विधानमण्डल का गठन किया। जिसका एक सदन ‘प्रतिनिधि सभा’ व दूसरा सदन ‘विधान परिषद्’ था। प्रतिनिधि सदन में 145 सदस्य होते थे।
इन दोनों सदनों के लिए 10 व 15 मई, 1945 को चुनाव हुए। जिसमें 'राज्य का प्रजा मण्डल' को बहुमत मिला। इस विधायिका का उद्घाटन महाराजा मानसिंह द्वितीय द्वारा 5 सितम्बर, 1945 को किया। 1 मार्च 1948 को कुछ संवैधानिक सुधार करके जयपुर में पूर्ण जनप्रतिनिधि सरकार का गठन किया गया और इस प्रकार जयपुर राज्य विधानमण्डल का गठन किया गया और वास्तविक रूप प्राप्त किया।
मेवाड़ रियासत (उदयपुर) में कन्हैयालाल माणिक्य लाल मुंशी द्वारा 27 मई 1947 को अनुमोदित किया। मेवाड़ रियासत की विधायिक में 56 सदस्य निर्धारित किये गये। इन 56 सदस्यों में 51 निर्वाचित व 5 मनोनीत होते थे। सदस्यों का निर्वाचन वयस्क मताधिकार द्वारा किया जाता था। मनोनीत सदस्यों में से ही सभा का अध्यक्ष, रियासत का प्रधानमंत्री तथा 3 मंत्री होते थे। इस विधायक हेतु प्रथम निर्वाचन 4 अप्रैल, 1948 को हुआ। जिसका मेवाड़ प्रजा मण्डल द्वारा विरोध किया गया। इसलिए इस संविधान को समाप्त कर दिया गया। भरतपुर राज्य के महाराजा किशन सिंह ने 1927 में शासन समिति अधिनियम पारित किया जो अस्तित्व में नहीं आ सका। इसके पश्चात 1942 में 'भरतपुर राज्य प्रजा परिषद' में सत्याग्रह के परिणामस्वरूप अक्टूबर, 1942 को भरतपुर राज्य में 'राज्य प्रतिनिधि' सभा का गठन किया गया। इस समिति में 50 सदस्य निर्धारित किये गये, जिनमें से 37 निर्वाचित व 13 मनोनीत होते थे। इस समिति के चुनाव सितम्बर, 1943 में हुए। इस शासन समिति को शासन संबंधी विधेयकों पर चर्चा करने और प्रस्ताव पारित करने की शक्तियाँ प्राप्त थी।
3 फरवरी, 1941 को टोंक रियासत में 25 सदस्यीय 'मजलिस-ए-आम' का गठन किया गया। इन 25 सदस्यों में से 12 निर्वाचित व 13 मनोनीत सदस्य होते थे। ग्रामीण क्षेत्र के सदस्यों का चुनाव पंचायतों के सरपंचों द्वारा और नगरीय क्षेत्रों के सदस्यों का निर्वाचन नगर पालिका के सदस्यों द्वारा किया जाता था। राज्य कौंसिल का उपाध्यक्ष इस 'मजलिस-ए-आम' का सभापति होता था।

विधानसभा

संविधान के अनुच्छेद 168 के अन्तर्गत राजस्थान विधानसभा का गठन 1952 में किया गया। अब तक 16 विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो चुके है। वर्तमान में राजस्थान विधानसभा लालकोठी, जयपुर में स्थित है। वर्ष 2001 में ज्योतिनगर, जयपुर में बनाया गया है जिसका लोकार्पण 6 नवम्बर, 2001 को तत्कालीन राष्ट्रपति श्री के.आर. नारायणन द्वारा किया गया।
राजस्थान की प्रथम विधानसभा में 160 सदस्य निश्चित किये गये। 160 सदस्यीय प्रथम विधानसभा के आम चुनाव 4 से 24 जनवरी, 1952 को हुए और इसका गठन 29 फरवरी, 1952 को हुआ। ब्रिटिश शासन में अजमेर-मेरवाड़ा केन्द्रशासित प्रदेश था। संविधान में अजमेर को 'ग' श्रेणी के राज्य में शामिल किया गया। अजमेर में मई, 1952 में 30 सदस्यीय विधानसभा का गठन किया गया। इस प्रकार अजमेर-मेरवाड़ा के सदस्यों सहित सदस्यों की संख्या 190 हो गई। नवम्बर, 1956 में अजमेर की धारासभा का राजस्थान में विलय हुआ। परिसीमन के बाद 1977 के चुनावों में राजस्थान की विधानसभा सीटें 200 कर दी गईं।
वर्ष 2002 में न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में गठित परिसीमन आयोग की सिफारिश के आधार पर सीटों का पुनर्गठन किया गया। इसमें जयपुर जिले के लिए 19 सीटें व अलवर में 11 सीटें निश्चित की गईं। सबसे कम 2-2 सीटें जैसलमेर व प्रतापगढ़ के लिए निर्धारित की गईं।

1. प्रथम विधानसभा (1952-57)
कार्यकाल- 29 मार्च, 1952 से 23 मार्च, 1957 राजस्थान में पहली विधानसभा के चुनाव 4 से 24 जनवरी, 1952 में हुए। 28 फरवरी, 1952 को विधानसभा का गठन हुआ। विधानसभा की प्रथम बैठक गठन 29 मार्च, 1952 में हुई। प्रथम विधानसभा के गठन की अधिसूचना 23 फरवरी, 1952 को प्रकाशित हुई। 23 फरवरी से 29 मार्च 1952 को शपथ प्रक्रिया हुई। विधानसभा सदस्यों की संख्या परिसीमन आयोग के प्रस्ताव के आधार पर निर्धारित की गई। विधानसभा की सदस्य संख्या 160 थी। इन 160 सीटों में से 139 सामान्य, 16 अनुसूचित जातियों तथा 5 अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित थी। अजमेर-मेरवाड़ा की 30 पृथक विधानसभा सीटें थी। प्रथम विधानसभा में 10 राष्ट्रीय दलों एवं किसान जनता संयुक्त पार्टी ने भाग लिया। प्रथम विधानसभा में कांग्रेस ने 156 सीटों पर चुनाव लड़ा और कांग्रेस को 82 सीटों पर जीत मिली।
मुख्य विपक्षी दल अखिल भारतीय प्रजा परिषद् (राम-राज्य परिषद्) को 24 स्थानों, भारतीय जनसंघ को 8, हिन्दू महासभा को 2, कृषक मजदूर पार्टी को 1 तथा निर्दलीय प्रत्याशियों को 35 स्थानों पर विजय प्राप्त हुई। 7 प्रत्याशी निर्विरोध चुने गये। प्रथम विधानसभा की प्रथम बैठक 29 मार्च, 1952 को जयपुर के सवाईमानसिंह टाउन हॉल में हुई। इस टाउन हॉल को बाद में विधानसभा का रूप दे दिया गया।
  • प्रथम विधानसभा में सर्वाधिक 17 क्षेत्रों में उपचुनाव हुए, जो अब तक का कीर्तिमान हैं।
  • प्रथम विधानसभा का गठन 23 फरवरी, 1952 को हुआ।
  • प्रथम बैठक- 29 मार्च, 1952
  • प्रथम विधानसभा अध्यक्ष- नरोत्तम लाल जोशी (31 मार्च, 1952) कांग्रेस विधायक, झुंझुनूँ
  • प्रथम उपाध्यक्ष- लालसिंह शक्तावत (31 मार्च, 1952)
  • विपक्ष के नेता- कुँवर जसवंत सिंह
  • सरकारी मुख्य सचेतक- मथुरादास माथुर
  • प्रथम विधानसभा सचिव- मंशाराम पुरोहित (18 फरवरी, 1952)
प्रथम विधानसभा में तीन मुख्यमंत्री बने। सबसे पहले कांग्रेस ने टीकाराम पालीवाल को विधायक दल का नेता बनाया और पालीवाल राजस्थान की प्रथम चुनी गई लोकतांत्रिक सरकार के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने मलारना चौड़ एवं महुवा से चुनाव लड़ा, वे दोनों सीटों से चुनाव जीत गए बाद में उन्होंने मलारना चौड़ सीट छोड़ दी। वे 3 मार्च, 1952 को मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 31 अक्टूबर, 1952 को त्यागपत्र दे दिया। 1 नवम्बर, 1952 को जयनारायण व्यास को मुख्यमंत्री बनाया तथा टीकाराम पालीवाल को उपमुख्यमंत्री बना दिया। 13 नवम्बर, 1954 को मोहनलाल सुखाड़िया मुख्यमंत्री बने।
प्रथम महिला विधायक- प्रथम विधानसभा चुनाव में 4 महिला प्रत्याशी खड़ी हुई, परन्तु चारों ही चुनाव हार गई। इन प्रत्याशियों में चिरंजी देवी (फागी), विरेंद्रा बाई (जयपुर शहर), शांता बाई (उदयपुर शहर) व रानी देवी (सोजत मेन) खड़ी हुई। इसके पश्चात् नवम्बर, 1953 में हुए बाँसवाड़ा उपचुनाव में यशोदा देवी (प्रजा समाजवादी पार्टी) से जीतकर राज्य की पहली महिला विधायक बनीं। तो विधानसभा की दूसरी महिला विधायक जून 1954 में कमला बेनीवाल (कांग्रेस) निर्वाचित हुई। उन्होंने आमेर 'ए' से चुनाव जीता। उन्हें उपमंत्री बनाया गया। वे राज्य की पहली महिला मंत्री बनी। प्रथम विधानसभा के कुल 140 निर्वाचन क्षेत्रों में से 139 सामान्य निर्वाचन क्षेत्र एवं 01 क्षेत्र जनजातीय समुदाय के लिए आरक्षित था। इस सीट से बांसवाड़ा से सोशलिस्ट पार्टी के बेलजी चुनाव जीते।

2. द्वितीय विधानसभा ( 1957-62 )
इस विधानसभा के चुनाव 1957 में सम्पन्न हुए इसे राष्ट्रीय दलों व एक राज्य दल ने भाग लिया।
  • गठन- 2 अप्रैल, 1957
  • कार्यकाल- 24 अप्रैल, 1957 से 01 मार्च, 1962
  • सदस्य संख्या- 176
  • प्रथम बैठक - 24 अप्रैल, 1957
  • अध्यक्ष- रामनिवास मिर्धा (25 अप्रैल, 1957 से 3 मई, 1967 तक)
  • उपाध्यक्ष- निरंजन नाथ आर्य (1 मई, 1957 से 1 मार्च, 1962)
इस विधानसभा का शपथ समारोह 2 अप्रैल, 1957 को हुआ, जो 24 अप्रैल, 1957 तक चला। इसकी कार्य अवधि 1 मार्च, 1962 तक रही। कुल 176 सीटों पर हुए चुनाव में कांग्रेस ने 119 सीटें जीती। 32 निर्दलीय जीते और राम राज्य परिषद को 17 सीटें और भारतीय जन संघ को 6 सीटें मिली। मोहन लाल सुखाड़िया ने 11 अप्रैल, 1957 को मंत्रिमंडल का गठन किया। नरेन्द्रसिंह को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया।
  • विधानसभा अध्यक्ष- राम निवास मिर्धा
  • विधानसभा उपाध्यक्ष- निरंजन आचार्य
  • प्रोटेम स्पीकर- नारायण सिंह

3. तृतीय विधानसभा (1962-67)
  • गठन- तीसरी विधानसभा का गठन 3 मार्च, 1962 को हुआ और यह 28 फरवरी, 1967 तक रही।
  • सदस्य संख्या- 176, कांग्रेस (88 + 1), स्वतंत्र पार्टी, 36 सीटें
  • प्रथम बैठक- 13 मार्च, 1962
  • विघटन- 28 फरवरी, 1967
  • प्रोटिम स्पीकर- नारायण सिंह मसूदा (07.05.1962)
  • अध्यक्ष- रामनिवास मिर्धा
  • उपाध्यक्ष- नारायणसिंह मसूदा
  • विपक्ष का नेता - लक्ष्मण सिंह
इन चुनावों में कांग्रेस को 89, स्वतंत्र पार्टी को 36, भारतीय जनसंघ को 15, रामराज्य परिषद को 3, प्रजा समाजवादी दल को 2, सी.पी.आई. को 5, और निर्दलीयों को 22 स्थानों पर जीत हासिल हुई। मोहनलाल सुखाड़िया तीसरी बार सरकार बनाने में सफल रहे। उन्होंने 12 मार्च, 1962 को निर्दलीय विधायकों के सहयोग से अपनी सरकार का गठन किया जो 13 मार्च, 1967 तक कार्यरत रही। इस विधानसभा में सबसे अधिक अविश्वास प्रस्ताव लाये गये।

4. चतुर्थ विधानसभा (1967-72)
इस विधानसभा चुनाव (1967-72) में पहली बार किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला जिसके कारण पहली बार राज्य में 13 मार्च, 1967 से 26 अप्रैल, 1967 तक राष्ट्रपति शासन लागू रहा और वह विधानसभा समय से पूर्व निलंबित हुई। इस विधानसभा में पहली बार राजस्थान में राज्यमंत्री परिषद् में राज्यमंत्री व संसदीय सचिव पद पर नियुक्ति की व्यवस्था की गई। विधानसभा सीटों की संख्या पुनर्सीमन के बाद 176 से बढ़कर 184 कर दी गई। इन चुनावों में कांग्रेस 103 सीटें (प्रारम्भ में 89 सीट पर जीत), स्वतंत्र पार्टी-18, भारतीय जनसंघ-22, संयुक्त समाजवादी दल को 8 एवं निर्दलयों को 15 सीटें मिली।
  • कार्यकाल - 1 मार्च, 1967 से 15 मार्च, 1972
  • गठन - 1 मार्च, 1967
  • सदस्य संख्या - 184,
  • प्रथम बैठक - 3 मई, 1967 तथा विघटन 15 मार्च, 1972
  • अध्यक्ष - निरंजननाथ आचार्य (3 मई, 1967 से 20 मार्च, 1972 तक)
  • उपाध्यक्ष - पूनम चंद विश्नोई, रामनारायण चौधरी
  • नेता प्रतिपक्ष - लक्ष्मण सिंह (3 मई, 1967 से)
  • कुल 184 सीटों में से 133 सामान्य, 30 अनु. जाति, 21 अ.ज.जा. हेतु आरक्षित की गई। इस चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।
  • सीटों की स्थिति निम्नानुसार थी-
  • कांग्रेस- 89 सीटें
  • स्वतंत्र पार्टी- 48 सीटें
  • भारतीय जनसंघ- 22 सीटें
कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। मोहनलाल सुखाड़िया ने सरकार बनाने से इन्कार कर दिया। विरोधी दलों व निर्दलीय विधायकों ने 96 सीटों के समर्थन के साथ राज्यपाल सम्पूर्णानन्द के समक्ष सरकार बनाने का दावा किया। सम्पूर्णानन्द ने कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। विरोधी दलों ने जौहरी बाजार में प्रदर्शन किया। कुछ लोगों की जान चली गई। इस प्रकरण की जाँच के लिए बेरी आयोग गठित किया। सम्पूर्णानन्द ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी। फलस्वरूप 13 मार्च, 1967 को पहली बार राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ।
राज्यपाल सम्पूर्णानन्द ने पहली बार राज्य में राष्ट्रपति शासन 13 मार्च, 1967 को लगाया। चुनाव उपरान्त कुछ विधायक कांग्रेस में शामिल हो गये और नये राज्यपाल सरदार हुकमसिंह ने 26 अप्रैल, 1967 को मोहनलाल सुखाड़िया को चौथी बार राज्य का मुख्यमंत्री नियुक्त किया। इसके पश्चात 8 जुलाई, 1971 को सुखाड़िया ने त्यागपत्र दे दिया। इस प्रकार मोहनलाल सुखाड़िया सर्वाधिक लम्बे कार्यकाल 17 वर्ष तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। इनके त्यागपत्र के पश्चात 9 जुलाई, 1971 को बरकतुल्लाह खां को राज्य के मुख्यमंत्री शपथ दिलवायी गई। बरकतुल्लाह खाँ विधानसभा सदस्य नहीं थे। इसलिए इन्हें 6 माह बाद 3 मार्च, 1972 को त्यागपत्र देना पड़ा। उन्हें बाद में नई सरकार के गठन तक 15 मार्च, 1972 तक मुख्यमंत्री बना रहने दिया। बरकतुल्लाह खाँ राजस्थान के पहले व एकमात्र अल्पसंख्यक मुख्यमंत्री हैं।

5. पाँचवीं विधानसभा (1972-77)
पाँचवीं विधानसभा का गठन 15 मार्च, 1972 को हुआ। इस विधानसभा का कार्यकाल पाँच वर्ष से अधिक रहा। इसकी अवधि सर्वाधिक रही। इसमें सर्वाधिक 13 सत्र आयोजित हुए।
इस विधानसभा में 184 सीटों पर हुए चुनाव में कांग्रेस को 145 सीटें (1 निर्विरोध) स्वतंत्र पार्टी को 11 सीटों, भारतीय जनसंघ को 8 सीटों, भाकपा व सोशलिस्ट पार्टी को 4-4 सीटों पर, निर्दलीयों को 11 सीटों पर जीत मिली। बरकतुल्लाह को विधायक दल का नेता चुना गया। 16 मार्च 1972 को वे दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। 11 अक्टूबर, 1973 को बरकतुल्लाह खां का हृदयघात के कारण निधन हो गया। इसके पश्चात 11 अक्टूबर को ही हरिदेव जोशी को राज्य का मुख्यमंत्री बना गया। आपातकाल समाप्ति के बाद हुए आम चुनाव में फरवरी, 1977 को जनता दल की सरकार बनी। तब कार्यवाहक राज्यपाल वेदपाल त्यागी ने 30 अप्रैल, 1977 को जोशी सरकार को भंग कर दूसरी बार राष्ट्रपति शासन लगवाया।
  • कार्यकाल - 15 मार्च, 1972 से 30 अप्रैल, 1977
  • सदस्य संख्या - 184
  • प्रथम बैठक - 20 मार्च, 1972
  • अध्यक्ष - रामकिशोर व्यास (20 मार्च, 1972)
  • उपाध्यक्ष - रामसिंह यादव (25 मार्च, 1972)
  • विपक्ष का नेता - लक्ष्मणसिंह

6. छठी विधानसभा (1977-80)
1977 में चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन करने के बाद 6वीं विधानसभा की सदस्य संख्या 184 से बढ़ाकर 200 कर दी गई। इस विधानसभा में पहली बार विधानसभा पाँच वर्ष से पूर्व भंग हुई। इन्हीं चुनावों में गैर-कांग्रेसी दल 'जनता पार्टी' को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और राजस्थान में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। इन चुनावों में जनता पार्टी को 150 सीटों व कांग्रेस को 41 सीटों पर सफलता मिली। भैरोंसिंह शेखावत जो मध्यप्रदेश से राज्यसभा सांसद थे, उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया। बाद में अक्टूबर, 1977 में वे छबड़ा (कोटा) से विधानसभा चुनाव जीतकर विधानसभा सदस्य बने। छठी विधानसभा में ही 17 फरवरी, 1980 से 5 जून, 1980 तक तीसरी बार राष्ट्रपति शासन लागू किया गया और भैरोंसिंह सरकार को बर्खास्त किया। मध्यावधि चुनाव के पश्चात कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला।
  • गठन - 22 जून, 1977
  • कार्यकाल - 22 जून, 1977 से 16 फरवरी, 1980
  • सदस्य संख्या - 200
  • प्रथम बैठक - 18 जुलाई, 1977
  • अध्यक्ष - 1. महारावल लक्ष्मण सिंह (22 जून, 1977 से 17 फरवरी, 1980) राजस्थान के प्रथम गैर कांग्रेसी विधानसभा अध्यक्ष बने। 2. गोपाल सिंह आहोर (20 सितंबर, 1979 से जून, 1980 तक)
  • उपाध्यक्ष - रामचन्द्र
  • प्रोटेम स्पीकर - मेजर फतेहसिंह

7. सातवीं विधानसभा (1980- 85)
6वीं विधानसभा समय से पूर्व भंग कर दी गई जिसके परिणामस्वरूप पहली बार राज्य में मध्यावधि चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस को 200 सीटों में से 133 सीटें प्राप्त हुई। भाजपा को 32 स्थानों पर जीत मिली। 6 जून, 1980 को सातवीं विधानसभा का गठन हुआ और जगन्नाथ पहाड़िया को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया। वे विधानसभा सदस्य नहीं थे बल्कि भरतपुर के (बयाना) से लोकसभा सांसद थे, बाद में उन्होंने भरतपुर के बैर सुरक्षित क्षेत्र से नवम्बर, 1980 में चुनाव जीता और विधानसभा सदस्य बने। इसके पश्चात कांग्रेस की केन्द्रीय सत्ता के निर्देश पर जगन्नाथ पहाड़िया ने 12 जुलाई, 1981 को त्याग पत्र दे दिया और 14 जुलाई, 1981 को शिवचरण माथुर को राज्य का मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया। परन्तु, फरवरी 1985 को डीग चुनाव प्रचार के दौरान निर्दलीय प्रत्याशी मानसिंह की गोली लगने से मृत्यु हो गई और 23 फरवरी, 1985 को शिवचरण माथुर को त्यागपत्र देना पड़ा। इस दिन ही हीरालाल देवपुरा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवायी गयी। मार्च, 1985 में चुनाव परिणाम घोषित हो गये जिसके फलस्वरूप हीरालाल देवपुरा को त्यागपत्र देना पड़ा। इस प्रकार हीरालाल देवपुरा मात्र 16 दिन राज्य के मुख्यमंत्री रहे। जो सबसे छोटा कार्यकाल रहा। भैरोंसिंह शेखावत विपक्ष के नेता रहे।
  • कार्यकाल - 6 जून, 1980 से 9 मार्च, 1985
  • विधानसभा सदस्य संख्या - 200
  • प्रथम बैठक - 4 जुलाई, 1980
  • अध्यक्ष - पूनमचन्द्र विश्नोई
  • उपाध्यक्ष - अहमद बख्शी सिन्धी
  • नेता प्रतिपक्ष - भैरों सिंह शेखावत
  • प्रोटेम स्पीकर - परसराम मदेरणा

8. आठवीं विधानसभा (1985-90)
8वीं विधानसभा की अवधि 9 मार्च, 1985 से 01 मार्च, 1990 तक रही। इस विधानसभा में 200 सीटों पर हुए चुनाव में कांग्रेस को 115 स्थानों पर सफलता मिली। इन चुनावों में भाजपा 38, लोकदल 27, जनता पार्टी 10, कांग्रेस (स)1, और अन्य उम्मीदवारों को 9 सीटों पर जीत प्राप्त हुई। 9 मार्च, 1985 को हरिदेव जोशी को दूसरी बार राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया। जोशी के कार्यकाल में देवराला सती काण्ड हो गया इसलिए इन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। इनके त्यागपत्र के बाद 20 जनवरी, 1988 को शिवचरण माथुर को मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया। 1989 में हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी हार हुई। इसलिए माथुर के त्यागपत्र के बाद पुनः 3 दिसम्बर, 1989 को हरिदेव जोशी को मुख्यमंत्री बनाया गया, परन्तु इस समय एक संवैधानिक संकट पैदा हो गया। क्योंकि इस समय हरिदेव जोशी असम के राज्यपाल पद पर कार्यरत थे और उनका त्यागपत्र राष्ट्रपति के द्वारा स्वीकार नहीं किया गया। अन्ततः राष्ट्रपति द्वारा हरिदेव जोशी का त्यागपत्र स्वीकार कर लिया गया। इसके पश्चात 4 दिसम्बर, 1989 को राज्यपाल सुखदेव प्रसाद ने हरिदेव जोशी को तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री की शपथ दिलवायी। नौवीं विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला इसलिए 1 मार्च, 1990 को मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी को त्यागपत्र देना पड़ा।
8वीं विधानसभा में हीरालाल देवपुरा और बाद में गिरिराज प्रसाद विधानसभा अध्यक्ष बने और उपाध्यक्ष के रूप में पहले गिरिराज प्रसाद और बाद में किशन मोटवानी कार्यरत रहे। विपक्ष के नेता के रूप में भैरोंसिंह शेखावत व प्रोफेसर केदारनाथ शर्मा ने कार्य किया।
  • कार्यकाल - 9 मार्च, 1985 से 1 मार्च, 1990
  • विधानसभा सदस्य संख्या - 200
  • प्रथम बैठक - 19 मार्च, 1985
  • अध्यक्ष - हीरालाल देवपुरा (20 मार्च, 1985 से 16 अक्टूबर, 1985), गिरिराज प्रसाद तिवाड़ी (31 जनवरी, 1986 से 15 मार्च, 1990)

9. नवीं विधानसभा (1990-92)
नवीं विधानसभा के चुनाव 27 फरवरी, 1990 को सम्पन्न हुए, 28 फरवरी, 1990 को परिणाम घोषित हुए। 2 मार्च को राज्यपाल द्वारा गठन की अधिसूचना जारी की गई। इस विधानसभा में भी किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। इसलिए भारतीय जनता पार्टी ने गैर-कांग्रेसी सदस्यों के साथ मिलकर दूसरी बार सरकार बनायी। इन चुनावों में भाजपा (85 सीटें), जनता दल (54 सीटें) जीती और गठबंधन सरकार भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व में बनायी। 4 मार्च, 1990 को भैरोंसिंह शेखावत दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। यह राज्य की पहली गठबंधन सरकार थी। यह खण्डित जनादेश वाली विधानसभा थी। 6 दिसम्बर, 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद विवाद होने के कारण 15 दिसम्बर, 1992 से 3 दिसम्बर, 1993 तक राज्य में चौथी बार राष्ट्रपति शासन लागू रहा। राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा के निर्देशन पर राज्यपाल एम. चन्नारेड्डी ने 15 दिसम्बर, 1992 को भैरोंसिंह सरकार को बर्खास्त किया। उस समय भैरोंसिंह शेखावत मुख्यमंत्री थे और राज्य में दूसरी बार मध्यावधि चुनाव करवाये गये। नवीं विधानसभा में 5 बार उप चुनाव भी हुए।
  • कार्यकाल - 2 मार्च, 1990 से 15 दिसम्बर, 1992
  • विधानसभा सदस्य संख्या - 200
  • प्रथम बैठक - 15 मार्च, 1990
  • अध्यक्ष - हरिशंकर भाभड़ा (16 मार्च, 1990 से)
  • उपाध्यक्ष - यदुनाथ सिंह, हीरासिंह
  • विपक्ष का नेता - हरिदेव जोशी
  • प्रोटेम स्पीकर - पूनमचंद विश्नोई

10. दसवीं विधानसभा (1993-98)
दसवीं विधानसभा का कार्यकाल (1993-98) तक रहा। चुनाव आयोग द्वारा 12 अक्टूबर, 1993 में चुनाव करवाने हेतु अधिसूचना जारी की। इन चुनावों में भी किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। भाजपा में 95 स्थानों पर, कांग्रेस को 76, जनता दल को 6 स्थानों पर और 23 स्थानों पर निर्दलीय विजयी हुए। भाजपा और निर्दलीय गठबंधन से 124 सीटें होने पर भैरोंसिंह शेखावत को मुख्यमंत्री बनाया गया। भैरोंसिंह शेखावत ने तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में 4 दिसम्बर, 1993 को शपथ ग्रहण की। हरिशंकर भाभड़ा को विधानसभा अध्यक्ष और शांतिलाल चपलोत को उपाध्यक्ष बनाया गया। बाद में शांतिलाल चपलोत अध्यक्ष और समर्थलाल मीणा उपाध्यक्ष बने। परसराम मदेरणा विपक्ष के नेता बने।
इस विधानसभा में कांग्रेस के हरिदेव जोशी लगातार 10वीं बार विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। भाजपा पुनः सबसे बड़े दल के रूप में उभरी एवं भैरोंसिंह शेखावत ने निर्दलीय विधायकों के सहयोग से सरकार बनायी।
  • कार्यकाल - 4 दिसम्बर, 1993 से 30 नवम्बर, 1998
  • विधानसभा सदस्य संख्या - 200
  • प्रथम बैठक - 28 दिसम्बर, 1993
  • अध्यक्ष - हरिशंकर भाभड़ा (30 दिसम्बर, 1993 से 6 अक्टूबर, 1994), शांतिलाल चपलोत (7 अप्रैल, 1995 से 30 नवम्बर, 1998) समरथ लाल मीणा
  • उपाध्यक्ष - शांतिलाल चपलोत, समर्थलाल मीणा, तारा भण्डारी। तारा भण्डारी राज्य की प्रथम महिला जो विधानसभा उपाध्यक्ष बनी।

11. ग्यारहवीं विधानसभा (1998-2003)
11वीं विधानसभा हेतु नवम्बर, 1998 में चुनाव सम्पन्न हुए। 1 दिसम्बर, 1998 को विधानसभा गठन की अधिसूचना जारी हुई। इस विधानसभा में पहली बार कांग्रेस को 153 सीटें प्राप्त हुईं और उसे स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। अशोक गहलोत को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया। जब गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया गया तो वे जोधपुर से लोकसभा सांसद थे। इसके पश्चात 22 जनवरी, 1999 को हुए उपचुनाव में अशोक गहलोत, सरदारपुरा जोधपुर से विधानसभा सदस्य बने।
  • कार्यकाल - 1 दिसम्बर, 1998 से 4 दिसम्बर, 2003
  • विधानसभा सदस्य संख्या - 200
  • प्रथम बैठक - 4 जनवरी, 1999
  • अध्यक्ष - परसराम मदेरणा
  • उपाध्यक्ष - देवेन्द्रसिंह
  • विपक्ष का नेता - भैरोंसिंह शेखावत

12. बारहवीं विधानसभा (2003-2008)
बारहवीं विधानसभा के चुनाव एक माह पूर्व ही सम्पन्न करवाये गये। 1 दिसम्बर, 2003 को सम्पन्न हुए चुनावों में पहली बार भारतीय जनता पार्टी को वसुंधरा राजे के नेतृत्व में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और वसुंधरा राजे राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। इस विधानसभा में पहली बार सम्पूर्ण राज्य में ई.वी.एम. मशीन को प्रयोग में लाया गया। चुनावों में भाजपा को 120 सीटों पर, कांग्रेस को 56 सीटों पर जीत मिली। इन चुनावों में 12 महिलाएँ भी चुनाव जीती। 8 दिसम्बर, 2003 को वसुंधरा राजे सिंधिया राज्य की 22वीं मुख्यमंत्री बनी।
  • कार्यकाल - 5 दिसम्बर, 2003 से 10 दिसम्बर, 2008
  • विधानसभा सदस्य संख्या - 200
  • प्रथम बैठक - 15 जनवरी, 2004
  • अध्यक्ष - सुमित्रा सिंह (राज्य की पहली महिला विधानसभा अध्यक्ष)
  • उपाध्यक्ष - रामनारायण विश्नोई
  • विपक्ष का नेता- बी.डी. कल्ला, रामनारायण चौधरी, हेमाराम चौधरी

13. तेरहवीं विधानसभा (2008-13)
इस विधानसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। कांग्रेस को 96 सीटों पर जीत मिली। अशोक गहलोत ने निर्दलीयों के समर्थन से सरकार बनायी, बाद में बसपा के 6 सदस्य कांग्रेस में शामिल हो गये। भाजपा व अन्य को 98 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। अशोक गहलोत ने 13 दिसम्बर, 2008 को दूसरी बार राज्य के 23वें मुख्यमंत्री के रूप में 13 दिसम्बर, 2008 को शपथ ग्रहण की।
  • कार्यकाल - 11 दिसम्बर, 2008 से 9 दिसम्बर, 2013
  • विधानसभा सदस्य संख्या - 200
  • प्रथम बैठक - 1 जनवरी, 2009
  • अध्यक्ष - दीपेन्द्र सिंह शेखावत
  • उपाध्यक्ष - रामनारायण मीणा
  • प्रोटेम स्पीकर - देवीसिंह भाटी
  • विपक्ष का नेता - वसुंधरा राजे सिंधिया

14. चौदहवीं विधानसभा (2013-18)
इस विधानसभा में दूसरी बार भारतीय जनता पार्टी को वसुंधरा राजे के नेतृत्व में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और भाजपा ने 200 सदस्यों वाली विधानसभा में 163 सीटें प्राप्त की, परन्तु बाद में हुए उपचुनाव में 3 सीटों पर हार जाने के कारण भाजपा की सीटों की संख्या 160 रह गई। कांग्रेस को 21 सीटें, राजपा को 04 सीटें, बसपा को 3 सीटें, जमींदारा पार्टी को 02 सीटें और निर्दलीयों को 7 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। इन चुनावों में 28 महिलाएँ भी विजयी रही। वसुंधरा राजे दूसरी बार 13 दिसम्बर, 2013 को मुख्यमंत्री बनीं। चुनाव आयोग द्वारा पहली बार 14वीं विधानसभा में नोटा (NOTA) का विकल्प दिया। (NOTA) के विकल्प में अंतिम बटन (गुलाबी रंग) होता है।
  • कार्यकाल - 11 दिसम्बर, 2013 से 12 दिसम्बर, 2018 तक
  • विधानसभा सदस्य संख्या - 200
  • प्रथम बैठक - 21 जनवरी, 2014
  • अध्यक्ष - कैलाश मेघवाल (राज्य के प्रथम दलित व 18वें क्रम के विधानसभा अध्यक्ष)
  • उपाध्यक्ष - राव राजेन्द्र सिंह
  • सदन के नेता - वसुंधरा राजे सिंधिया
  • सदन में विपक्ष के नेता - रामेश्वर डूडी

15. 15वीं विधानसभा 2018 (2018-2023)
राज्य की 200 विधानसभा सीटों के लिए 15वीं विधानसभा के चुनाव 7 दिसम्बर, 2018 को हुए। चुनावों में कांग्रेस को 200 में से 100 सीटें प्राप्त हुई हालांकि चुनाव 199 सीटों पर ही हुआ था। रामगढ़ (अलवर) से बसपा प्रत्याशी लक्ष्मण सिंह के निधन के कारण वहाँ पर बाद में मतदान हुआ। इस सीट पर जनवरी, 2019 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी साफिया जुबैर चुनाव जीती और कांग्रेस को 200 में से 101 सीटें प्राप्त हुई बाद में बसपा के 6 प्रत्याशी कांग्रेस में शामिल हो गए। इसलिए कांग्रेस की वर्तमान में सदस्य संख्या 108 है। इन चुनावों में प्रदेश में 74.69 प्रतिशत मतदान हुआ जो पिछले चुनावों 75.23 से 0.54 प्रतिशत कम रहा। इस बार महिला मतदान 74.66 रही तथा पुरुष मतदान 73.80 प्रतिशत रहा। राज्य में सर्वाधिक मतदान पोकरण सीट पर 80.03 प्रतिशत हुआ। इस बार महिला मतदान पुरुष मतदाताओं की तुलना में 0.86 प्रतिशत अधिक रहा। कांग्रेस को कुल मतदान के 39.3 प्रतिशत मत प्राप्त हुए जबकि भाजपा को 38.8 प्रतिशत, आई.एन.डी को 9.5 प्रतिशत, बसपा को 4 प्रतिशत और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के 2.4 प्रतिशत, नोटा को 1.41 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। इन चुनावों में दो नवीन क्षेत्रीय पार्टियां सामने आई। एक भारतीय ट्राइबल पार्टी है जिसे चुनावों में 2 सीटें मिली। इसका चुनाव चिन्ह ऑटो रिक्शा है। इस पार्टी का गठन 2017 में गुजरात में छोटू भाई वासवा ने किया। दूसरी पार्टी राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक पार्टी है जिसका गठन हनुमान बेनीवाल द्वारा किया गया है। जिसे विधानसभा में 3 सीटें प्राप्त हुई। आर.एल.पी. का चुनाव चिन्ह पानी की बोतल है। 15वीं विधानसभा में 25 महिलाएँ जीती बाद में 2 महिलाएँ उपचुनाव में जीती। वर्तमान में 27 महिलाएँ विधानसभा पहुँची जबकि 14वीं विधानसभा में 28 महिलाएँ जीती थी।

राजस्थान की 16वीं विधानसभा

  • मतदान-199 सीटों पर (कुल 200 सीटें)
नोट- श्रीकरणपुर विधानसभा सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी गुरमीत सिंह कूनर की मृत्यु हुई। इस सीट पर 5 जनवरी, 2023 को चुनाव हुए। इस सीट पर कांग्रेस के रूपिंदर सिंह कुन्नर ने बीजेपी प्रत्याशी सुरेन्द्र पाल सिंह टीटी को हराया। 25 नवम्बर, 2023 को मतदान हुआ। (पहले 23 नवम्बर 2023 था।)
  • कुल मतदाता- 5,26,90,146
  • कुल युवा मतदाता- 1,70,99,334
  • कुल मतदान केन्द्र- 51,756
  • मतदान प्रतिशत- 75.45% (74.62% EVM से व 0.83% डाक से)
नोट- 2018 में मतदान 74.06% (बढ़ोतरी 0.74%)
  • मतदान हुआ- 3,92,11,399
  • कुल महिलाएँ मतदान- 1,88,27,294 (74.72%)
  • कुल पुरुष मतदान- 2,03,87,757 (74.53%)
  • थर्ड जेंडर- 348
  • कुल प्रत्याशी- 1893
  • सर्वाधिक मतदान विधानसभा-कुशलगढ़ (88.13%) , पोकरण (87.79%)
  • सर्वाधिक मतदान जिला- जैसलमेर (82.37%)
  • न्यूनतम मतदान विधानसभा क्षेत्र- मारवाड़ जंक्शन (61.29%), आहोर (61.24%)
  • राज्य का सबसे ऊँचा पोलिंग बूथ (क्रमांक 170) शेरगाँव (सिरोही)
  • राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023 हेतु सतरंगी सप्ताह- 16 से 22 नवम्बर 2023
  • प्रवीण गुप्ता ने घर से दिव्यांगजनों व बुजुर्गों हेतु घर से मतदान के लिए ऐप लॉन्च किया- सहज भीलवाडा एप
  • चुनाव सम्बन्धित समस्याओं से त्वरित निपटने के लिए केन्द्रीय निर्वाचन आयोग द्वारा एप लॉन्च किया गया- C-VIGIC
  • सर्वाधिक मतदान वाली विधानसभा- झोंटवाड़ा
  • छोटी विधानसभा- किशनपोल
  • चुनाव में स्टेट इलेक्शन आइकन- खिलाड़ी दिव्यकृति सिंह
  • प्रत्याशी की चुनाव में खर्च करने की सीमा- 40 लाख (पहले 28 लाख)
  • चुनाव में बुजुर्गों में पहला वोट- इंदु बाला (हवामहल)
  • पोस्ट बैलेट से वोट फ्रॉम होम का प्रथम वोट- दिव्यांग भारत शर्मा (महावीर नगर)
  • पहली बार मीडियाकर्मी को डाक मतपत्र से वोट देने का अधिकार राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023 में दिया गया।
  • परिणाम- भाजपा (115 सीटें), कांग्रेस (70 सीटें), रालोपा (1), अन्य (14 सीटें)
  • वर्तमान- भाजपा (119 सीटें), कांग्रेस (66 सीटें), भारत आदिवासी पार्टी (4), बहुजन समाज पार्टी (2 सीटें), राष्ट्रीय लोक दल (1), स्वतंत्र (8)
  • इस विधानसभा में कुल 20 महिला विधायक हैं जिनमें 9 महिला विधायक भारतीय जनता पार्टी से, 9 महिला विधायक कांग्रेस से व 2 महिला विधायक स्वतंत्र हैं।
  • 16वीं विधानसभा में मुख्यमंत्री- भजनलाल शर्मा (सांगानेर विधानसभा) एस टी. महिला विधायक - 03 (कांग्रेस 02, निर्दलीय 01), अन्य महिला विधायक - 16

राजस्थान की अब तक की विधानसभाओं का कार्यकाल (1952-2023)
  • विधानसभा: पहली गठन की तिथि: 23.02.1952 प्रथम बैठक की तिथि: 29.03.1952 विघटन की तिथि: 23.03.1957 सदस्यों की संख्या: 160
  • विधानसभा: दूसरी गठन की तिथि: 02.04.1957 प्रथम बैठक की तिथि: 24.04.1957 विघटन की तिथि: 01.03.1962 सदस्यों की संख्या: 176
  • विधानसभा: तीसरी गठन की तिथि: 03.03.1962 प्रथम बैठक की तिथि: 13.03.1963 विघटन की तिथि: 28.02.1967 सदस्यों की संख्या: 176
  • विधानसभा: चौथी गठन की तिथि: 13.03.1967 प्रथम बैठक की तिथि: 03.05.1967 विघटन की तिथि: 15.03.1972 सदस्यों की संख्या: 184
  • विधानसभा: पाँचवीं गठन की तिथि: 15.03.1972 प्रथम बैठक की तिथि: 20.03.1972 विघटन की तिथि: 30.04.1977 सदस्यों की संख्या: 184
  • विधानसभा: छठी गठन की तिथि: 22.06.1977 प्रथम बैठक की तिथि: 18.07.1977 विघटन की तिथि: 17.02.1980 सदस्यों की संख्या: 200
  • विधानसभा: सातवीं गठन की तिथि: 06.06.1980 प्रथम बैठक की तिथि: 04.07.1980 विघटन की तिथि: 09.03.1985 सदस्यों की संख्या: 200
  • विधानसभा: आठवीं गठन की तिथि: 09.03.1985 प्रथम बैठक की तिथि: 19.03.1985 विघटन की तिथि: 01.03.1990 सदस्यों की संख्या: 200
  • विधानसभा: नौवीं गठन की तिथि: 02.03.1990 प्रथम बैठक की तिथि: 15.03.1990 विघटन की तिथि: 15.12.1992 सदस्यों की संख्या: 200
  • विधानसभा: दसवीं गठन की तिथि: 04.12.1993 प्रथम बैठक की तिथि: 28.12.1993 विघटन की तिथि: 30.11.1998 सदस्यों की संख्या: 200
  • विधानसभा: ग्यारहवीं गठन की तिथि: 01.12.1998 प्रथम बैठक की तिथि: 04.01.1999 विघटन की तिथि: 05.12.2003 सदस्यों की संख्या: 200
  • विधानसभा: बारहवीं गठन की तिथि: 05.12.2003 प्रथम बैठक की तिथि: 15.01.2004 विघटन की तिथि: 10.12.2008 सदस्यों की संख्या: 200
  • विधानसभा: तेरहवीं गठन की तिथि: 11.12.2008 प्रथम बैठक की तिथि: 01.01.2009 विघटन की तिथि: 09.12.2013 सदस्यों की संख्या: 200
  • विधानसभा: चौदहवीं गठन की तिथि: 11.12.2013 प्रथम बैठक की तिथि: 21.01.2014 विघटन की तिथि: 12.12.2018 सदस्यों की संख्या: 200
  • विधानसभा: पन्द्रहवीं गठन की तिथि: 12.12.2018 प्रथम बैठक की तिथि: 15.01.2019 विघटन की तिथि: 06.12.2023 सदस्यों की संख्या: 200
  • विधानसभा: सोलहवीं गठन की तिथि: 06.12.2023 प्रथम बैठक की तिथि: 19.01.2024 विघटन की तिथि: लगातार सदस्यों की संख्या: 200

16वीं विधानसभा के पदाधिकारी (राजस्थान विधानसभा)
राजस्थान राज्य
  • राज्यपाल - हरिभाऊ बिशनराव बागडे
  • मुख्यमंत्री - भजन लाल शर्मा (26वें)
  • विधानसभा - अध्यक्ष वासुदेव देवनानी
  • प्रोटेम स्पीकर - कालीचरण सराफ
  • सरकारी मुख्य सचेतक - जोगेश्वर गर्ग
  • सदन का नेता - भजन लाल शर्मा
  • नेता प्रतिपक्ष - टीकाराम जूली
  • उपनेता प्रतिपक्ष - रामकेश मीणा
  • भाजपा प्रदेशाध्यक्ष - मदन राठौड

विधानसभा निर्वाचन वर्ष चुनावी मैदान में महिलाएँ विजयी महिलाएँ
1952 04 00
1957 22 08
1962 14 08
1967 11 06
1972 05 04
1977 32 07
1980 31 10
1985 44 16
1990 87 11
1993 90 09
1998 69 14
2003 118 12
2008 154 28
2013 166 28
2018 189 27
2023 50 20

राजस्थान विधानसभा (16वीं विधानसभा- महिला सदस्य)

यहाँ राजस्थान के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों से चुनी गई महिला सदस्यों का विवरण दिया गया है:
  • श्रीमती अनीता भदेल (4): भाजपा | निर्वाचन क्षेत्र: अजमेर दक्षिण (अजा) | जिला: अजमेर
  • श्रीमती अनीता जाटव (6): इनेकां | निर्वाचन क्षेत्र: हिण्डौन (अजा) | जिला: करौली
  • श्रीमती इन्द्रा (20): इनेकां | निर्वाचन क्षेत्र: बामनवास (अजजा) | जिला: सवाई माधोपुर
  • डॉ. ऋतु बनावत (24): निर्दलीय | निर्वाचन क्षेत्र: बयाना (अजा) | जिला: भरतपुर
  • श्रीमती कल्पना देवी (28): भाजपा | निर्वाचन क्षेत्र: लाडपुरा | जिला: कोटा
  • श्रीमती गीता बरवड़ (41): इनेकां | निर्वाचन क्षेत्र: भोपालगढ़ (अजा) | जिला: जोधपुर
  • श्रीमती दिया कुमारी (78): भाजपा | निर्वाचन क्षेत्र: विद्याधर नगर | जिला: जयपुर
  • श्रीमती दीप्ति किरण माहेश्वरी (80): भाजपा | निर्वाचन क्षेत्र: राजसमन्द | जिला: राजसमन्द
  • सुश्री नौक्षम (86): भाजपा | निर्वाचन क्षेत्र: कामां | जिला: भरतपुर
  • डॉ. प्रियंका चौधरी (96): निर्दलीय | निर्वाचन क्षेत्र: बाड़मेर | जिला: बाड़मेर
  • डॉ. मंजु बाघमार (110): भाजपा | निर्वाचन क्षेत्र: जायल (अजा) | जिला: नागौर
  • श्रीमती रमीला खड़िया (124): इनेकां | निर्वाचन क्षेत्र: कुशलगढ़ (अजजा) | जिला: बाँसवाड़ा
  • कुमारी रीटा चौधरी (138): इनेकां | निर्वाचन क्षेत्र: माण्डावा | जिला: झुन्झुनू
  • श्रीमती वसुन्धरा राजे (146): भाजपा | निर्वाचन क्षेत्र: झालरापाटन | जिला: झालावाड़
  • डॉ. शिखा मील बराला (162): इनेकां | निर्वाचन क्षेत्र: चौमूं | जिला: जयपुर
  • श्रीमती शिमला देवी (163): इनेकां | निर्वाचन क्षेत्र: अनूपगढ़ (अजा) | जिला: गंगानगर
  • श्रीमती शोभा चौहान (165): भाजपा | निर्वाचन क्षेत्र: सोजत (अजा) | जिला: पाली
  • श्रीमती शोभारानी कुशवाह (166): इनेकां | निर्वाचन क्षेत्र: धौलपुर | जिला: धौलपुर
  • सुश्री सिद्धि कुमारी (177): भाजपा | निर्वाचन क्षेत्र: बीकानेर पूर्व | जिला: बीकानेर
  • श्रीमती सुशीला रामेश्वर डूडी (185): इनेकां | निर्वाचन क्षेत्र: नोखा | जिला: बीकानेर

राजस्थान विधानसभा की समितियाँ

राजस्थान विधानसभा के कार्य संचालन में सहायता के लिए 22 समितियों की व्यवस्था की गई है। इन समितियों को 2 श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।
  1. स्थायी समितियाँ
  2. तदर्थ समितियाँ

1. स्थायी समितियाँ- ये स्थायी प्रकृति की होती हैं, जो निरन्तरता के आधार पर कार्य करती है। जिनका गठन समय-समय पर या प्रतिवर्ष होता रहता है। राजस्थान विधानसभा में 17 स्थायी समितियाँ है, जिनमें से 4 वित्तीय समितियाँ हैं। वित्तीय समितियों के सदस्यों की नियुक्ति विधानसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है और अन्य विभिन्न विषयों से संबंधित समितियों के सदस्यों को मनोनीत किया जाता है।

2. तदर्थ समितियाँ- ये अस्थायी प्रकृति की होती है, जो विशेष प्रयोजन के लिए गठित की जाती है। जैसे ही प्रयोजन पूरा हो जाता है, वैसे ही इन समितियों का कार्यकाल समाप्त हो जाता है। मुख्यमंत्राी, किसी समिति का सदस्य नहीं होता। लेकिन कार्यमंत्रणा समिति में मुख्यमंत्री सदस्य हो सकता जो कि सदन का नेता होता है।

वित्तीय समितियाँ (Finance Committees)
(1) लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee)
(2) प्राक्कलन समिति 'क' (Estimate Committee 'A')
(3) प्राक्कलन समिति 'ख' (Estimate Committee 'B')
(4) राजकीय/सार्वजनिक उपक्रम समिति (Public Undertaking Committees)

(1) लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee)
यह राज्य सरकार के वित्तीय खर्चों पर नियंत्रण एवं निगरानी रखने के लिए लोक लेखा समिति का गठन किया गया है। यह समिति निश्चित करती है कि लेखों में जिस राशि का वितरण दिखाया गया है उस पर व्यय वैधानिक विधि से हुआ है या नहीं।
इस समिति का सर्वप्रथम 10 अप्रैल, 1952 को गठन किया गया।
इस समिति में कुल 15 सदस्य होते हैं।
लोक लेखा समिति का अध्यक्ष, विपक्षी दल का नेता होता है। वर्तमान में गुलाब चन्द कटारिया इसके अध्यक्ष हैं।
इस समिति के अध्यक्ष का चुनाव, विधानसभा अध्यक्ष करता हैं।
इस समिति का कार्यकाल 1 वर्ष होता है।
इसके सदस्यों का चुनाव विधानसभा सदस्यों द्वारा अपने में से एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा प्रतिवर्ष किया जाता है।
कोई मंत्री, इस समिति का सदस्य नहीं हो सकता।
यह समिति अपनी वार्षिक रिपोर्ट (प्रतिवेदन), विधानसभा अध्यक्ष को सौंपती है।

(2) प्राक्कलन समिति (क)
इसका प्रमुख कार्य प्राक्कलनों से संबंधित नीतिसंगत मितव्ययताएँ को देखना है। प्राक्कलन समिति को लोक लेखा समिति की जुड़वा बहन कहा जाता है। इसमें सभापति सहित 15 सदस्य होते हैं, जिनका चुनाव सदन द्वारा एकल संक्रमणीय मत पद्धति से होता है।

(3) प्राक्कलन समिति/अनुमान समिति/मितव्ययता समिति
यह समिति राज्य सरकार के खर्चों का पूर्वानुमान लगाती है तथा प्रशासन में मितव्ययता एवं कुशलता लाने के लिए वैकल्पिक सुझाव देने का कार्य करती है। व्यय ठीक ढंग से हुआ है या नहीं इसकी जाँच करती है।
राजस्थान विधानसभा में 2 अनुमान/प्राक्कलन समितियाँ है- प्राक्कलन समिति ‘क’ (Estimate Committee ‘A’) तथा प्राक्कलन समिति ‘ख’ (Estimate Committee ‘B’)।
प्राक्कलन समिति के सदस्यों का चुनाव विधानसभा सदस्यों द्वारा अपने में से एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा प्रतिवर्ष किया जाता है। इस समिति के अध्यक्ष का चुनाव विधानसभा अध्यक्ष द्वारा किया जाता है। इस समिति का कार्यकाल 1 वर्ष होता है। इस समिति में अध्यक्ष सहित अधिकतम 15 सदस्य हो सकते है। वर्ष 2021-22 के लिए इसका गठन किया गया। यह समिति अपनी रिपोर्ट (प्रतिवेदन) प्रतिवर्ष विधानसभा अध्यक्ष को सौंपती है।

(4) राजकीय/सार्वजनिक उपक्रम समिति (Public Undertaking Committees)
इस समिति को लोक/सरकारी उपक्रम समिति के नाम से भी जाना जाता है।
यह समिति राज्य सरकार के सरकारी उपक्रमों के प्रतिवेदनों एवं लेखों की जाँच करती है तथा सरकारी उपक्रमों के बेहतर प्रबंधन एवं कार्यकुशलता बढ़ाने हेतु सुझाव भी देती है।
इस समिति में अध्यक्ष सहित 15 सदस्य होते हैं।
इस समिति के अध्यक्ष का चुनाव विधानसभा अध्यक्ष द्वारा किया जाता है।
यह पंचम अनुसूची में विनिर्दिष्ट राजकीय उपक्रमों के कार्यकरण की जाँच करती है।
इस समिति के सदस्यों का चुनाव, विधानसभा सदस्यों द्वारा अपने में से एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा प्रतिवर्ष किया जाता है।
इस समिति का कार्यकाल 1 वर्ष होता है।
यह समिति अपनी वार्षिक रिपोर्ट (प्रतिवेदन) विधानसभा अध्यक्ष को सौंपती है।

अन्य समितियाँ
जाँच समितियाँ- 4 जाँच समितियाँ है-
  • (A) नियत समिति
  • (B) याचिका समिति
  • (C) विशेषाधिकार समिति
  • (D) सदाचार समिति

(A) नियत समिति
यह एक जाँच समिति है। इस समिति का कार्य सदन में प्रक्रिया तथा कार्य संचालन के मामलों पर विचार करना तथा नियमों में परिवर्तन या संशोधन संबंधी सिफारिशें करना। विधानसभा अध्यक्ष स्वयं इस समिति के पदेन सभापति (अध्यक्ष) होते हैं। इस समिति में अध्यक्ष सहित कुल 15 सदस्य होते है।

(B) याचिका समिति
यह भी एक जाँच समिति है।
इस समिति में 15 सदस्य होते हैं।
इसके अध्यक्ष सदस्यों की नियुक्ति विधानसभा अध्यक्ष करता है
इस समिति का कार्य जब शिकायत याचिका सदन में प्रस्तुत की जाती है तो यह समिति शिकायत की जाँच करती है तथा अपनी रिपोर्ट सदन में प्रस्तुत करती है तथा उपचारात्मक सुझाव भी देती है। यह विधानसभा की ‘ओम्बुडसमैन समिति’ के रूप में कार्य करती है।

(C) विशेषाधिकार समिति
यह समिति विधानसभा सदस्यों के विशेषाधिकार हनन के मामलों की जाँच करती है। सदस्यों का मनोनयन अध्यक्ष द्वारा 1 वर्ष के लिए किया जाता है।

(D) सदाचार/आचरण समिति
इस समिति का कार्य विधानसभा के सदस्यों में अनुशासन व मर्यादा बनाए रखना है। यह समिति विधानसभा में दुर्व्यवहार संबंधी मामलों की जाँच करती है।

अन्य समितियाँ
कार्य सलाहकार
विधानसभा अध्यक्ष, स्वयं इस समिति के पदेन सभापति (अध्यक्ष) होते हैं। इस समिति का कार्यकाल 1 वर्ष होता है। वर्तमान में इस समिति में 14 सदस्य हैं, अध्यक्ष सहित। (अधिकतम 15 हो सकते हैं।) इस समिति का कार्य संसदीय कार्यवाही एवं विधेयकों के संबंध में सिफारिश करना है। यह समिति बजट एवं अनुदान की माँगों पर विचार करती है। यह समिति राज्यपाल के अभिभाषण में निर्दिष्ट विषयों की चर्चा के लिए सामान्यतः समय नियत करती है।
मुख्यमंत्री कार्यमंत्रणा समिति का सदस्य हो सकता है।

गैर-सरकारी सदस्यों के विधेयकों तथा संकल्पों पर समिति-
इस समिति का कार्य गैर-सरकारी सदस्यों द्वारा पुनःस्थापित किए गये विधेयकों की जाँच करना तथा उनके संकल्पों पर विचार करना तथा तदानुसार सिफारिश करना।
विधानसभा उपाध्यक्ष, इस समिति का अध्यक्ष होता है। इस समिति में कुल 15 सदस्य होते हैं।

सदन में अनुपस्थित रहने वाले सदस्यों पर समिति-
इस समिति के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति विधानसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है।
इसमें अधिकतम 15 सदस्य होते हैं।
यदि कोई सदस्य बिना सूचना के 60 दिनों तक सदन से अनुपस्थित रहता है, तो समिति इस संबंध में किसी कार्यवाही की सिफारिश कर सकती है।

सरकारी आश्वासनों से संबंधित समिति-
इस समिति का कार्य सदन में प्रश्नों का उत्तर देते समय विधानसभा सदस्यों द्वारा जो आश्वासन दिये जाते हैं, उनकी जाँच करना कि दिये गये आश्वासन पूरे किए गए हैं या नहीं।

अधीनस्थ विधान समिति-
यह समिति देखती है कि संविधान द्वारा प्रदत्त या प्रत्यारोपित विधान बनाने की शक्तियों का प्रयोग ऐसे प्रयोजन के अन्तर्गत उचित रूप से किया जा रहा है या नहीं।
इस समिति में अध्यक्ष सहित कुल 15 सदस्य हो सकते हैं।
इस समिति को "सदन के कर्तव्यों की रक्षक समिति" भी कहा जाता है।

रख-रखाव संबंधी समितियाँ-
(1) सामान्य प्रयोजन समिति
(2) पुस्तकालय/ग्रंथालय समिति
(3) आवास समिति
(4) वेतन-भत्तों संबंधी संयुक्त समिति

कल्याण संबंधी समितियाँ-
(1) अनुसूचित जाति कल्याण संबंधी समिति
(2) अनुसूचित जनजाति कल्याण संबंधी समिति
(3) पिछड़ा वर्ग कल्याण समिति
(4) अल्पसंख्यक कल्याण समिति
(5) महिलाओं एवं बालकों के कल्याण समिति

विधानमण्डल में विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव

राज्य विधान सभा में सरकार के कार्य संचालन अवधि में विभिन्न लोकहित के मुद्दों पर और सरकार पर दबाव देने व सरकार के घेराव करने के लिए कई तरह के प्रस्ताव लाए जाते हैं।

1. ध्यानाकर्षण प्रस्ताव (Calling Attention Motion)
इस प्रस्ताव द्वारा सदन का कोई सदस्य सदन के पीठासीन अधिकारी की अग्रिम अनुमति से, किसी अविलम्बनीय लोक महत्त्व के विषय की ओर संबंधित मंत्री का ध्यान आकर्षित करवा सकता है, परन्तु इस हेतु सचिव को लिखित सूचना देना आवश्यक है। लेकिन अध्यक्ष स्वविवेक से किसी ऐसे विषय को सदन में उठाने की अनुज्ञा दे सकेगा जो जाँच की प्रक्रिया या विषय या प्रक्रम से संबंधित हो।
साधारणतः एक ही बैठक में दो से अधिक ध्यानाकर्षण प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया जायेगा किन्तु एक से अधिक ऐसी सूचनाओं को ग्रहण कर लेने की दिशा में उनकी सापेक्ष पूर्ववर्तिता अध्यक्ष द्वारा अवधारित की जायेगी।

2. स्थगन प्रस्ताव
यह प्रस्ताव किसी अविलम्बनीय लोक महत्व के मामले पर सदन में चर्चा करने के लिए लाया जाता है। यदि ऐसे विषयों पर शीघ्र विचार न किया जाये तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इस प्रस्ताव द्वारा ऐसे गंभीर विषयों पर सदन का ध्यान आकर्षित किया जाता है। यह प्रस्ताव राजस्थान विधानसभा प्रक्रिया नियम 50 के तहत लाया जाता है।
स्थगन प्रस्ताव लाने के लिए अध्यक्ष की सहमति आवश्यक होती है।
स्थगन प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम कुल विधानसभा सदस्यों के 1/10 सदस्यों के हस्ताक्षर होना आवश्यक है। यदि राजस्थान विधानसभा में ऐसा प्रस्ताव लाया जाता है, तो कम से कम 20 सदस्यों के हस्ताक्षर होने आवश्यक है।
स्थगन प्रस्ताव पर चर्चा आरंभ होने के 2 घंटों के भीतर यदि वाद-विवाद समाप्त न हो तो यह स्वतः समाप्त हो जायेगा एवं कोई प्रश्न नहीं रखा जाएगा।
स्थगन प्रस्ताव की सूचना उस दिन की बैठक प्रारंभ होने से पूर्व, जिस दिन की प्रस्ताव रखने का विचार हो निम्न को दी जायेगी- 1. अध्यक्ष 2. संबंधित मंत्री 3. सचिव

स्थगन प्रस्ताव के अधिकार पर निर्बन्धन-
प्रस्ताव हाल ही में घटित किसी विशिष्ट विषय तक सीमित रहेगा।
एक ही बैठक में एक से अधिक ऐसा प्रस्ताव नहीं किया जायेगा।
प्रस्ताव में कोई ऐसा प्रश्न नहीं उठाया जायेगा जो संविधान या इन नियमों के अंतर्गत सचिव को लिखित सूचना देकर अलग प्रस्ताव द्वारा ही उठाया जा सकता है।
एक ही प्रस्ताव द्वारा एक से अधिक विषय पर चर्चा नहीं होगी।
प्रस्ताव द्वारा ऐसे विषय पर चर्चा नहीं की जायेगी, जिस पर उसी सत्र में चर्चा की जा चुकी हो।
प्रस्ताव किसी ऐसे विषय के संबंध में नहीं होगा जो भारत के किसी भाग में क्षेत्राधिकार रखने वाले किसी न्यायालय के न्याय निर्णय के अंतर्गत विचाराधीन हो।
प्रस्ताव में उस विषय की पूर्वाशा न की जायेगी जो विचार के लिए पहले ही नियत किया जा चुका हो।
प्रस्ताव द्वारा विशेषाधिकार का प्रश्न नहीं उठाया जावेगा।

3. अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion)
अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष द्वारा सरकार में अविश्वास व्यक्त करने के लिए नियम 132 के तहत लाया जाता है। यह प्रस्ताव केवल विधानसभा में ही लाया जा सकता है। यह प्रस्ताव सरकार में अविश्वास प्रकट करने के लिए लाया जाता है।
अविश्वास प्रस्ताव लाने हेतु कम से कम कुल विधानसभा सीटों के 1/5 सदस्यों के हस्ताक्षर होना आवश्यक है, यदि राजस्थान विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है, तो कम से कम 40 सदस्यों के हस्ताक्षर होना अनिवार्य है।
लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन होना चाहिए।
अविश्वास प्रस्ताव लाने का कारण बताना आवश्यक नहीं है।
अविश्वास प्रस्ताव एक बार रद्द होने पर पुनः 6 माह तक नहीं लाया जा सकता है।

प्रक्रिया
मंत्रिपरिषद् में विश्वास का अभाव प्रकट करने का प्रस्ताव निम्नलिखित निबन्धनों के अधीन रहते हुए लाया जा सकेगा-
  • (क) प्रस्ताव प्रस्तुत करने की अनुमति प्रश्नों के बाद और उस दिन की कार्यसूची का कार्य प्रारंभ करने से पहले माँगनी होगी।
  • (ख) अनुमति माँगने वाले सदस्य को उस दिन की बैठक प्रारंभ होने से पहले सचिव के पास उस प्रस्ताव की लिखित सूचना देनी होगी।
अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर मंत्रिपरिषद् को त्यागपत्र देना पड़ता है अर्थात् सरकार गिर जाती है।
प्रस्ताव किसी ऐसे दिन लाया जाएगा जो अनुमति माँगने के दिन से पूरे दस दिन से अधिक बाद का न हो।

राजस्थान विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव-
राजस्थान विधानसभा में अब तक 13 बार अविश्वास प्रस्ताव लाया जा चुका है परन्तु ऐसा प्रस्ताव एक बार भी पारित नहीं हुआ है। सर्वप्रथम अक्टूबर 1952 में मुख्यमंत्री टीकाराम पालीवाल सरकार के विरुद्ध निर्दलीय विधायक इन्द्रनाथ मोदी ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया।
13 में से सर्वाधिक 6 बार अविश्वास प्रस्ताव मोहनलाल सुखाड़िया सरकार के विरुद्ध लाये गये हैं।
अंतिम बार (13वीं) 1985 में हरिदेश जोशी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाया गया।

4. विश्वास प्रस्ताव (Confidence Motion)
ऐसा प्रस्ताव मंत्रिपरिषद में विश्वास प्रकट करने के लिए लाया जाता है। ऐसे प्रस्ताव का प्रावधान न तो संविधान में है और न ही विधानसभा के प्रक्रिया और कार्य संचालन संबंधी नियमों में है। विश्वास प्रस्ताव, भारतीय संसदीय परम्परा की देन है।
यह प्रस्ताव सत्ता पक्ष के लोगों द्वारा, अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए लाया जाता है। ऐसा प्रस्ताव केवल विधानसभा में ही लाया जा सकता है। अगर यह प्रस्ताव पारित नहीं होता है, तो सरकार गिर जाती है।

राजस्थान में विश्वास प्रस्ताव-
राजस्थान विधानसभा में अब तक 5 बार विश्वास प्रस्ताव लाया जा चुका है, परन्तु एक बार भी सरकार नहीं गिरी है।
विश्वास प्रस्ताव 3 बार भैरोंसिंह शेखावत सरकार द्वारा और 2 बार अशोक गहलोत सरकार द्वारा लाया गया है।
सबसे पहले मार्च 1990 में भैरोसिंह शेखावत सरकार द्वारा विश्वास प्रस्ताव लाया गया तथा अंतिम बार 14 अगस्त, 2020 को वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार द्वारा लाया गया।

कटौती प्रस्ताव (Cut Motion)-
जिस प्रस्ताव के द्वारा सरकार या उसके किसी विभाग द्वारा धन के लिए प्रस्तावित माँगों में कटौती का प्रस्ताव रखा जाता है, उसे कटौती प्रस्ताव कहते है। बजट पेश होने पर अनुदान माँगों के दौरान विधानसभा सदस्यों को वृद्धि का अधिकार नहीं है, वे मात्र कमी कर सकते हैं। ऐसा वे कटौती के द्वारा ही कर सकते हैं। अतः कटौती प्रस्ताव बजट की बहस के दौरान किसी विभाग की अनुदान माँगों के संदर्भ में प्रयुक्त होते हैं। चूँकि संसद/विधानसभा सरकार के व्यय पर निगरानी रखती है। अतएव सदस्यों को कटौती प्रस्ताव लाने का अधिकार है।

कटौती प्रस्ताव 3 प्रकार के होते हैं-
  1. (A) नीतिगत कटौती - जब माँग की राशि घटाकर 1 रुपया कर दी जाती है, तो उसे नीतिगत कटौती कहते हैं। यह उस नीति के विरोध में होता है जो विभाग की माँगों से जुड़ी होती है। जैसे नए उद्योग खोलने हेतु अनुदान माँग का विरोध कोई पर्यावरण प्रेमी करता है।
  2. (B) अर्थगत कटौती - जब माँग की राशि में एक निर्दिष्ट राशि की कमी की जाये, इसे मितव्ययता कटौती कहते है।
  3. (C) सांकेतिक कटौती - जब बजट की माँग में से 100 रुपये की कमी की जाये। आमतौर पर सरकार को शिकायत/असंतोष दर्ज करवाने के लिए जिसके लिए यह उत्तरदायी है।
यदि विधानसभा में कटौती प्रस्ताव पारित हो जाये तो मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है।

धन्यवाद प्रस्ताव-
जब आम चुनाव के पश्चात् नई सरकार का गठन होता है तो वर्ष के प्रथम सत्र (बजट सत्र) के आरंभ में राज्यपाल विधानमण्डल को संबोधित करता है। जिसमें वह सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों का सांकेतिक उल्लेख करता है। राज्य सरकार की ओर से राज्यपाल के अभिभाषण के पश्चात् राज्यपाल के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए धन्यवाद प्रस्ताव लाया जाता है। विधानसभा व विधान परिषद में इस पर चर्चा होती है। धन्यवाद प्रस्ताव के पारित होने का अर्थ होता है कि, सरकार की नीतियों में सदन को विश्वास है। यह प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है।
धन्यवाद प्रस्ताव पारित नहीं होने पर सरकार गिर जाती है अर्थात् मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है।

विशेषाधिकार प्रस्ताव-
विशेषाधिकार प्रस्ताव किसी सदस्य द्वारा उस समय प्रस्तुत किया जाता है, जब कोई सदस्य यह अनुभव करता है कि, किसी मंत्री ने सही तथ्यों को प्रकट न करके या गलत सूचना देकर सदन या सदन के एक या अधिक सदस्यों के विशेषाधिकार का उल्लंघन किया गया है।

निन्दा प्रस्ताव-
निन्दा प्रस्ताव किसी मंत्री या मंत्रियों के समूह के विरुद्ध या सम्पूर्ण सरकार के विरुद्ध लाया जा सकता है।
यह विपक्ष द्वारा, विधानसभा में लाया जाता है।
निन्दा प्रस्ताव को लाने का कारण बताना आवश्यक है। यह मंत्रिपरिषद की कुछ नीतियों या कार्य के खिलाफ निन्दा के लिए लाया जाता है।
निन्दा प्रस्ताव पारित होने पर सरकार की प्रतिष्ठा गिरती है, सरकार नहीं, परन्तु ऐसे में सरकार को शीघ्र एक विश्वास प्रस्ताव लाकर सदन का विश्वास प्राप्त करना आवश्यक होता है।

राजस्थान विधानसभा में वर्ष 2024 के लिए गठित संसदीय समितियों के अध्यक्ष
समिति का नाम अध्यक्ष
जनलेखा समिति टीकाराम जूली
राजकीय उपक्रम समिति कालीचरण सराफ
प्राक्कलन समिति 'क' अर्जुनलाल जीनगर
प्राक्कलन समिति 'ख' श्रीचंद कृपलानी
सदाचार समिति हरीश चौधरी
विशेषाधिकार समिति पुष्पेन्द्र सिंह
सरकार आश्वासनों संबंधी समिति जितेन्द्र कुमार
पुस्तकालय समिति सुरेन्द्र सिंह राठौड
पिछड़े वर्ग के कल्याण से संबंधित समिति केसाराम चौधरी
अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति फूलसिंह मीणा
अल्पसंख्यक कल्याण समिति पब्बाराम विश्नोई
अधीनस्थ विधान संबंधी समिति अनीता भदेल
नियम समिति श्री वासुदेव देवनानी
याचिका समिति हमीर सिंह
पर्यावरण संबंधी समिति दयाराम परमार
महिला एवं बाल कल्याण संबंधी समिति शोभा चौहान
अनुसूचित जाति कल्याण समिति डॉ. विश्वनाथ मेघवाल
प्रश्न एवं संदर्भ समिति संदीप शर्मा
स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं संबंधी समिति हरी सिंह रावत

संसद में राजस्थान

संसद में राजस्थान से 35 सांसद निर्वाचित होते हैं। इनमें से 25 सांसद लोकसभा के लिए और 10 सांसद राज्यसभा के लिए निर्धारित किये गये हैं। लोकसभा की 25 सीटों में 4 अनुसूचित जातियों के लिए निर्धारित है जो राजस्थान के भरतपुर, बीकानेर, गंगानगर और करौली-धौलपुर क्षेत्र से निर्वाचित होते हैं तथा जनजातियों के लिए 3 सीटें आरक्षित है। जनजातीय क्षेत्रों में उदयपुर, दौसा व बाँसवाड़ा क्षेत्रों के लिए सीटें आरक्षित हैं। इस प्रकार राजस्थान में लोकसभा की आरक्षित सीटों की संख्या 7 है। राजस्थान की प्रथम महिला सांसद श्रीमती शारदा भार्गव (1952) थी, जो राज्यसभा सदस्य के रूप में निर्वाचित हुई। लोकसभा के लिए पहली महिला सांसद महारानी गायत्री देवी बनी, जो स्वतंत्र पार्टी से जयपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद रही। राजस्थान में अनुसूचित जनजाति की प्रथम महिला सांसद श्रीमती उषा मीणा सवाईमाधोपुर से निर्वाचित हुई और प्रथम अनुसूचित महिला सांसद के रूप में श्रीमती सुशीला बंगारू जालौर से निर्वाचित हुई।
प्रथम लोकसभा चुनावों में राजस्थान के लिए लोकसभा की 20 सीटें निर्धारित की गई थी जिनमें 17 सीटें सामान्य, 2 अनुसूचित जातियों के लिए और 1 सीट अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित थी। प्रथम चुनावों के समय अजमेर एक अलग क्षेत्र था जिसकी लोकसभा की 2 सीटें थी। इस प्रकार प्रथम लोकसभा में राजस्थान के लिए कुल 22 सीटें निर्धारित थी। प्रथम लोकसभा चुनाव 17 अप्रैल, 1952 के चुनाव में कांग्रेस को 11, रामराज्य पार्टी को 3, भारतीय जनसंघ को 1 सीट और कृषक लोक पार्टी को 1 स्थान तथा निर्दलीयों को 6 सीटें प्राप्त हुई। चौथी लोकसभा (4 मार्च, 1967-27 दिसम्बर, 1970) के चुनावों में 1967 में राजस्थान की लोकसभा सदस्य संख्या 22 से बढ़ाकर 23 कर दी गई। जिसमें 16 सीटें सामान्य वर्ग के लिए, 4 अनुसूचित जातियों के लिए 3 स्थान जनजातियों के लिए आरक्षित की गयीं।
6वीं लोकसभा (23 मार्च, 1977-22 अगस्त, 1979) के आम चुनाव में राजस्थान की लोकसभा की सीटें 23 से बढ़ाकर 25 कर दी गई। जिनमें अनुसूचित जातियों के लिए 4 सीटें तथा जनजातियों के लिए 3 सीटें आरक्षित की। वर्तमान में यही स्थिति है।
17वीं लोकसभा के चुनाव मई, 2019 में हुए। इन चुनावों में राजस्थान की 25 सीटों के लिए 2 चरणों में चुनाव सम्पन्न कराया गया। पहला चरण आम चुनाव के चौथे फेज में था। जो 29 अप्रैल, 2019 को सम्पन्न हुआ। इसमें 13 सीटों के लिए चुनाव हुआ और मतदान का प्रतिशत 68.17 रहा। दूसरा चरण 5वें फेज में था। जिसके लिए 6 मई, 2019 को 12 सीटों के लिए चुनाव सम्पन्न हुए और इस चरण में मतदान का प्रतिशत 63.72 रहा। राज्य के लिए निर्धारित कुल लोकसभा सीटों में से भारतीय जनता पार्टी ने 24 सीटों पर और नागौर से राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी व भाजपा गठबंधन को 1 सीट प्राप्त हुई। जिस पर हनुमान बेनीवाल विजयी हुये। 2019 के लोकसभा चुनाव में राजस्थान में 66.07 प्रतिशत मतदान हुआ।
इन चुनावों में राजस्थान से 249 प्रत्याशी खड़े हुये जिनमें 23 महिला प्रत्याशी थी। इन महिला प्रत्याशियों में से 3 भाजपा की प्रत्याशी विजयी रहीं। जिनमें दीयाकुमारी, राजसमन्द (सामान्य), रंजीता कोली, भरतपुर, (अ.जा.) तथा जसकौर मीणा, दौसा (अ.ज.जा.) शामिल हैं। वर्तमान में राजस्थान से केन्द्र में 3 मंत्री शामिल है। जिनमें श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, अर्जुन राम मेघवाल व कैलाश चौधरी को मंत्री बनाया गया है।
नोट: 16वीं लोकसभा में राजस्थान से एकमात्र महिला सांसद श्रीमती संतोष अहलावत (भाजपा) झुँझुनूँ से निर्वाचित हुई। राजस्थान से पहली लोकसभा सांसद के रूप में महारानी गायत्री देवी 1962 में निर्वाचित हुई। श्रीमती वसुंधरा राजे सिंधिया राजस्थान से सर्वाधिक 5 बार सांसद रही। राजस्थान से केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल होने वाली प्रथम महिला सुश्री डॉ. गिरिजा व्यास थीं जो जून, 1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव के कार्यकाल में मंत्री बनी।

राज्यसभा में राजस्थान
राजस्थान से राज्यसभा के 10 सांसद निर्धारित किये गये। 1952 में राज्यसभा का गठन किया गया। तब राजस्थान के लिये 9 स्थान निर्धारित किये गये। 1960 में राजस्थान की सीटों की संख्या 9 से बढ़ाकर 10 कर दी गई। श्रीमती शारदा भार्गव 1952 में राजस्थान से पहली महिला सांसद बनी और कालूलाल श्रीमाली पहले कैबिनेट मंत्री बने। वर्ष 2003 में राष्ट्रपति द्वारा पद्मविभूषण से सम्मानित एवं राजस्थान में नशामुक्ति अभियान के प्रमुख कार्यकर्ता डॉ. नारायण सिंह माणकलाव को राष्ट्रपति द्वारा 28 अगस्त, 2003 को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया। डॉ. नारायण सिंह माणकलाव राजस्थान से राज्यसभा के लिए मनोनीत होने वाले प्रथम राजस्थानी है। श्रीमती शारदा भार्गव राजस्थान से राज्यसभा के लिए सर्वाधिक 3 बार निर्वाचित हुई। श्रीरामनिवास मिर्धा व जसवंत सिंह राजस्थान से 4 बार राज्यसभा सदस्य बने।

राजस्थान से राज्यसभा में सदस्य

वर्तमान में कुल 10 सीटों में से 5 सीटें भाजपा के पास और 5 कांग्रेस के पास है। वर्तमान में राजस्थान से राज्यसभा सदस्य निम्नलिखित है-

क्र. सं. नाम (पार्टी) कार्यकाल
1. श्री नीरज डांगी (कांग्रेस) 19.06.2020 से 18.06.2026
2. श्री राजेन्द्र गहलोत (भाजपा) 19.06.2020 से 18.06.2026
3. श्री चुन्नीलाल गरासिया (भाजपा) 04.04.2024 से 03.04.2023
4. श्री मदन राठौड़ (भाजपा) 04.04.2024 से 03.04.2030
5. श्रीमती सोनिया गाँधी (कांग्रेस) 04.04.2024 से 03.04.2030
6. घनश्याम तिवाड़ी (भाजपा) 05.07.2022 से 04.07.2028
7. श्री रणदीप सुरजेवाला (कांग्रेस) 05.07.2022 से 04.07.2028
8. श्री मुकुल वासनिक (कांग्रेस) 05.07.2022 से 04.07.2028
9. श्री प्रमोद तिवारी (कांग्रेस) 05.07.2022 से 04.07.2028
10. श्री रवनीत सिंह (भाजपा) 27.08.2024 से 21.06.2026

अतः वर्तमान में राज्यसभा में 5 कांग्रेस सांसद तथा 5 भाजपा सांसद है।

श्री ओम बिड़ला
वर्तमान में 18वीं लोकसभा के लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिड़ला है। जो कोटा-बूंदी से सांसद है, वे वर्ष 2024 से लोकसभा स्पीकर बने है। श्री बिड़ला राजस्थान से लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) बनने वाले प्रथम सदस्य (व्यक्ति) हैं जो दूसरी बार लोकसभा के स्पीकर बने। वर्तमान में राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ भी राजस्थान राज्य से है, जो भारत के उपराष्ट्रपति हैं।

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

Education, GK & Spiritual Content Creator

Kartik Budholiya is an education content creator with a background in Biological Sciences (B.Sc. & M.Sc.), a former UPSC aspirant, and a learner of the Bhagavad Gita. He creates educational content that blends spiritual understanding, general knowledge, and clear explanations for students and self-learners across different platforms.