मुख्यमंत्री एवं मंत्रिपरिषद (राजस्थान)

मुख्यमंत्री एवं मंत्रिपरिषद

भारत में जैसे केंद्र स्तर पर संसदीय शासन पद्धति लागू है, उसी प्रकार राज्यों में भी यही प्रणाली अपनाई गई है। राज्य सरकार की संरचना लगभग केंद्र सरकार के ढांचे के समान होती है। जहाँ केंद्र में राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख होता है, वहीं राज्यों में यही भूमिका राज्यपाल निभाता है, जो औपचारिक या नाममात्र का प्रमुख होता है।
राज्य सरकार का वास्तविक नेतृत्व मुख्यमंत्री के हाथ में होता है। इसलिए मुख्यमंत्री को राज्य का ‘वास्तविक या प्रायोगिक प्रमुख (De facto Head)’ कहा जाता है। वह सरकार का संचालन करता है और राज्य मंत्रिपरिषद का नेतृत्व करता है। उसकी स्थिति केंद्र में प्रधानमंत्री के समान होती है।
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संविधान के भाग- 6 के अध्याय- 2 में, तथा अनुच्छेद 163 और 164 में राज्य मंत्रिपरिषद से जुड़े प्रावधानों का वर्णन मिलता है। अनुच्छेद 163 में यह स्पष्ट कहा गया है कि राज्यपाल अपने कार्य और अधिकार मंत्रिपरिषद की सलाह से निभाएगा। इस मंत्री परिषद का नेतृत्व मुख्यमंत्री करता है, और वास्तविक कार्यपालिका शक्तियों का प्रयोग मुख्यमंत्री और उसकी मंत्रिपरिषद करती है।
राज्य प्रशासन के संचालन, नीतियों के निर्धारण और कार्यपालिका की दिशा तय करने में मुख्यमंत्री की भूमिका केंद्रीय होती है। अतः मुख्यमंत्री को राज्य प्रशासन की धुरी या प्रमुख संचालक माना जाता है।
राजस्थान में मुख्यमंत्री पद से पूर्व राज्यों के मुखिया का पद नाम 'प्रधानमंत्री' था। भारत शासन अधिनियम, 1935 के पश्चात् जब 1937 में चुनाव हुए तो सरकार के गठन से प्रधानमंत्री कि स्थिति उभर कर सामने आयी। इन चुनावों में राज्यों में मंत्रिमंडल बने उसके प्रधान को प्रधानमंत्री कहा जाता था। स्वतंत्रता उपरान्त केन्द्र सरकार में प्रधानमंत्री बनाया जो वास्तविक शासक था। परन्तु राज्यों में प्रधानमंत्री पद पूर्व में ही था, इसलिए इस विचित्र स्थिति से बचने के लिए तथा केन्द्र और राज्यों की मंत्रिपरिषद के मुखिया दोनों में अन्तर करने के लिए राज्यों की मंत्रिपरिषद के मुखिया का नाम प्रधानमंत्री से मुख्यमंत्री कर दिया गया। इस प्रकार राजस्थान में 7 अप्रैल, 1949 में मुख्यमंत्री पद अस्तित्व में आया। श्री हीरालाल शास्त्री को 'प्रथम मनोनीत मुख्यमंत्री' बनाया गया। राजस्थान में प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री 3 मार्च, 1952 को श्री टीकाराम पालीवाल बने।

मुख्यमंत्री की नियुक्ति अनु. 164 (1)

संविधान सभा द्वारा यह निश्चित किया गया कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जानी चाहिए तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जानी चाहिए। सभी मंत्री राज्यपाल के प्रसाद पर्यन्त ही अपने पद पर बने रहेंगे तथा मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य की विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। संविधान के अनुच्छेद 164 (1) के अनुसार मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जायेगी तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल करता है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि राज्यपाल किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री नियुक्त करने के लिए स्वतन्त्र है। संसदीय व्यवस्था में राज्यपाल, राज्य विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही मुख्यमंत्री नियुक्त करता है अन्य मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल द्वारा की जाती है। लेकिन यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो तो राज्यपाल, मुख्यमंत्री की नियुक्ति में अपने 'स्व-विवेक' का प्रयोग कर सकता है। ऐसी परिस्थिति में राज्यपाल सबसे बड़े दल या दलों के समूह के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है और उसे एक माह के भीतर सदन में विश्वास मत प्राप्त करने के लिए कहता है।
राज्यपाल अपने व्यक्तिगत फैसले द्वारा मुख्यमंत्री की नियुक्ति तब कर सकता है, जब कार्यकाल के दौरान मुख्यमंत्री की मृत्यु हो जाए और कोई उत्तराधिकारी तय न हो। हालांकि मुख्यमंत्री की नियुक्ति के पश्चात् सत्तारूढ़ दल सामान्यतः नये नेता का चुनाव कर लेता है और राज्यपाल के पास उसे मुख्यमंत्री नियुक्त करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता।
मुख्यमंत्री की नियुक्ति के मामले में राज्यपाल को 'स्वविवेक' का प्रयोग नियुक्ति के समय करना पड़ता है यदि
  1. यदि मुख्यमंत्री व्यक्तिगत कारणों से या विधान सभा में बहुमत खो देने पर त्याग पत्र दे।
  2. यदि विधानसभा में सरकार के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पारित हो जाये।
  3. यदि कार्यकाल के दौरान मुख्यमंत्री की मृत्यु हो जाये।
  4. यदि मंत्रिमंडल भंग हो जाये।
संविधान द्वारा राज्यपाल की स्व-विवेक शक्तियों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है, परन्तु उच्चतम न्यायालय द्वारा सितम्बर, 2001 में दिये गए अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा गया है कि, "मुख्यमंत्री की स्व-विवेकी शक्तियाँ असीमित नहीं है। यदि राज्यपाल किसी ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है, जो संविधान सभा का सदस्य बनने योग्य नहीं है, तो ऐसी नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत असंवैधानिक होगी।"
संविधान में ऐसी कोई अपेक्षा नहीं है कि मुख्यमंत्री नियुक्त होने से पूर्व कोई व्यक्ति बहुमत सिद्ध करे। राज्यपाल पहले उसे बतौर मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकता है फिर एक उचित समय के भीतर बहुमत सिद्ध करने को कह सकता है। ऐसा अधिकतर मामलों में होता है।
एस.आर. बोम्बई बनाम भारत संघवाद, 1994 में उच्चतम न्यायालय ने अपनी 9 सदस्यीय संविधान पीठ के द्वारा फैसला दिया कि किसी मंत्रिमंडल को सदन का विश्वास है या नहीं, उसकी परीक्षा का एकमात्र स्थान सदन है। मंत्रिमंडल के समर्थन का निर्णय एक व्यक्ति की व्यक्तिगत राय से नहीं होना चाहिए, चाहे वह व्यक्ति राज्यपाल हो या राष्ट्रपति।
एक ऐसा व्यक्ति जो राज्य विधानमण्डल का सदस्य नहीं हो, उसे छह माह के लिए मुख्यमंत्री नियुक्त किया जा सकता है। परन्तु उसे 6 माह के भीतर राज्य विधानमण्डल के लिए निर्वाचित होना पड़ेगा। ऐसा न होने पर उसका मुख्यमंत्री का पद समाप्त हो जाएगा। अनुच्छेद 164 (4) के तहत ऐसी नियुक्ति 6 माह के लिए वैध होगी।
उदाहरण के लिए- 1977 में भैरोसिंह शेखावत, 1980 में जगन्नाथ पहाड़िया और 1998 में जब अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया गया तो वे राज्य विधानमण्डल के सदस्य नहीं थे। इस प्रकार हरियाणा में बंसीलाल, महाराष्ट्र में एस.बी. चौहान मुख्यमंत्री रह चुके हैं जो मुख्यमंत्री बनते समय विधानमण्डल के सदस्य नहीं थे। संविधान के अनुसार, मुख्यमंत्री को विधानमण्डल के दो सदनों में से किसी एक का सदस्य होना अनिवार्य है। सामान्यतः मुख्यमंत्री निचले सदन (विधानसभा) का सदस्य होता है। लेकिन अनेक अवसरों पर उच्च सदन (विधान परिषद) के सदस्य को भी बतौर मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया है। 1952 में जब सी. राजगोपालचारी को मद्रास का मुख्यमंत्री बनाया गया तो वे विधान परिषद् के सदस्य थे। वर्तमान में तमिलनाडु में विधान परिषद् नहीं है।
दिल्ली के मुख्यमंत्री की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 239 (क) के अन्तर्गत राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और मुख्यमंत्री को शपथ भी उप राज्यपाल द्वारा दिलवायी जाती है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को देते हैं।

मुख्यमंत्री की योग्यताएँ

संविधान में मुख्यमंत्री पद से संबंधित योग्यताओं का कोई उल्लेख नहीं है। मुख्यमंत्री पद की न्यूनतम योग्यताएँ वही हैं जो एक विधायक की होती हैं।

अन्य मंत्रियों की नियुक्ति
राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। व्यक्तिगत रूप से राज्य मंत्रिपरिषद के मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त और सामूहिक रूप से निम्न सदन (विधानसभा) के प्रति उत्तरदायी होते हैं।
  • अनु. 164 (1) में व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का उल्लेख है।
  • अनु. 164 (2) के अनुसार सम्पूर्ण राज्य मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा (निम्न सदन) के प्रति उत्तरदायी होती है।

मंत्रियों की शपथ: अनुच्छेद 164 (3)
कार्य ग्रहण करने से पूर्व राज्यपाल अनुसूची-3 के अनुसार मंत्रियों को 'पद एवं गोपनीयता' की शपथ दिलवाता है। तीसरी अनुसूची के अनुसार मंत्री निम्नलिखित शपथ ग्रहण करेंगे।
  1. संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा व निष्ठा रखने
  2. भारत की प्रभुता एवं अखण्डता अक्षुण्ण रखने
  3. कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक एवं शुद्ध अन्त:करण से निर्वाह करने
  4. भय या पक्षपात या अनुराग या द्वेष के बिना सभी लोगों के प्रति संविधान एवं विधि के अनुसार न्याय।

कार्यकाल

मुख्यमंत्री एवं मंत्रिपरिषद का कार्यकाल निश्चित नहीं है और वह राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त अपने पद पर बने रहते हैं यद्यपि इसका तात्पर्य यह नहीं है कि राज्यपाल मुख्यमंत्री या मंत्री को किसी भी समय बर्खास्त कर सकता है। राज्यपाल द्वारा उसे तब तक बर्खास्त नहीं किया जा सकता जब तक कि उसे विधानसभा में बहुमत प्राप्त है, लेकिन यदि वह विधानसभा में विश्वास खो देता है तो उसे त्यागपत्र देना पड़ता है। अन्यथा राज्यपाल उसे बर्खास्त कर सकता है। साधारणतः मुख्यमंत्री का कार्यकाल विधानसभा के कार्यकाल के समान 5 वर्ष ही होता है।

मंत्रियों की योग्यता : अनु. 164 (4) 
यदि कोई व्यक्ति विधानमण्डल का सदस्य नहीं है तो वह 6 माह तक मंत्री रह सकता है। 6 माह में उसे किसी एक सदन की सदस्यता प्राप्त करना अनिवार्य है, अन्यथा उसका पद स्वतः ही समाप्त हो जायेगा।

मंत्रियों के वेतन एवं भत्ते

अनु. 164 (5) के अनुसार मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों के वेतन एवं भत्ते राज्य विधानमण्डल द्वारा समय-समय पर निर्धारित किये जाते हैं। वर्तमान में राजस्थान में मुख्यमंत्री को 75,000 रूपये मासिक वेतन एवं नि:शुल्क चिकित्सा व आवासीय सुविधाएँ व भत्ते प्रदान किये जाते हैं। कैबिनेट मंत्रियों को 70,000 रूपये मासिक वेतन देय हैं। राजस्थान में मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों के वेतन व भत्तों का निर्धारण विधानसभा द्वारा किया जाता है। विधायकों को राजस्थान विधानसभा (अधिकारियों तथा सदस्यों की परिलब्धियाँ एवं पेन्शन) अधिनियम, 1956 एवं उसके अध्ययधीन विरचित नियमों के अन्तर्गत वेतन और भत्ते, यात्रा, चिकित्सा, आवास, टेलीफोन सम्बन्धी सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। वर्तमान में विधायक को ₹ 40,000 प्रतिमाह की दर से वेतन दिया जाता है और ₹70,000 निर्वाचित क्षेत्र भत्ता दिया जाता है।

राजस्थान में मुख्यमंत्री के कार्य एवं शक्तियाँ

मुख्यमंत्री के कार्य एवं शक्तियाँ
  1. मंत्रिपरिषद का गठन एवं पथ प्रदर्शन
  2. विभागों का बंटवारा
  3. मंत्रियों की नियुक्ति तथा त्यागपत्र
  4. मंत्रिमण्डल का सभापतित्व
  5. सदन का नेता
  6. राज्यपाल एवं मंत्रिमंडल के बीच की कड़ी
  7. मंत्रिपरिषद एवं विधायिका के बीच की कड़ी
  8. प्रशासनिक नियुक्तियाँ एवं नियंत्रण

मुख्यमंत्री राज्य मंत्रिपरिषद के मुखिया के रूप रूप में निम्न शक्तियों का प्रयोग करता है-
  1. राज्यपाल मुख्यमंत्री की सिफारिश पर मंत्रिपरिषद का गठन करता है। वह उन्हीं लोगों को मंत्री नियुक्त करता है, जिनकी सिफारिश मुख्यमंत्री ने की हो। मंत्रिपरिषद का निर्माण और सदस्य संख्या मुख्यमंत्री निश्चित करता है।
  2. वह मंत्रियों के विभागों का आवंटन एवं फेरबदल करता है। वह वरिष्ठ व प्रभावशाली नेता को कैबिनेट मंत्री तथा उनकी तुलना में कनिष्ठ नेताओं को राज्यमंत्री नियुक्त करता है। वह मंत्रिपरिषद का निर्माण भौगोलिक, धार्मिक व जातीय आधार पर करता है। वह सभी वर्गों को शामिल करने का प्रयास करता है।
  3. मतभेद होने पर वह किसी भी मंत्री से त्यागपत्र देने के लिए कह सकता है या राज्यपाल को उसे बर्खास्त करने का परामर्श दे सकता है।
  4. वह मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता करता है।
  5. वह सभी मंत्रियों को उनके क्रियाकलापों में सहयोग, नियंत्रण, निर्देश और मार्गदर्शन देता और नियंत्रण करता है। वह शासन के विभिन्न विभागों में समन्वय स्थापित करता है।
  6. अपने कार्य से त्यागपत्र देकर वह पूरी मंत्रिपरिषद को समाप्त कर सकता है। चूंकि मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद का मुखिया होता है, इसलिए उसके इस्तीफे या मृत्यु के कारण मंत्रिपरिषद अपने आप ही विघटित हो जाती है। दूसरी ओर यदि किसी मंत्री का पद रिक्त होता है तो मुख्यमंत्री उसे भरे या नहीं भरे यह उसकी मर्जी होती है।
  7. मुख्यमंत्री विधानमंडल का नेता होता है।
  8. मुख्यमंत्री, राज्यपाल व मंत्रिपरिषद के बीच की कड़ी है।
  9. वह राज्यपाल के परामर्श से विधानसभा का विघटन कर सकता है।

मुख्यमंत्री के दायित्व/कर्त्तव्य

मुख्यमंत्री, राज्यपाल एवं मंत्रिपरिषद के बीच संवाद का प्रमुख माध्यम है, अनु. 167 के अनुसार राज्यपाल को जानकारी देने आदि के संबंध में मुख्यमंत्री के कर्त्तव्यों का उल्लेख करता है। दायित्व/कर्त्तव्य : संविधान के अनुच्छेद 167 में मुख्यमंत्री के दायित्वों का उल्लेख हैं। अनुच्छेद - 167 (क) के अनुसार, मुख्यमंत्री का यह कर्त्तव्य होगा कि वह राज्य सरकार के प्रशासन से संबंधित सभी निर्णयों और प्रस्तावित कानूनों की जानकारी राज्यपाल को दे। अनुच्छेद - 167 (ख) के अनुसार, मुख्यमंत्री राज्यपाल द्वारा माँगी गई प्रशासन संबंधी जानकारी देना- अनुच्छेद - 167 (ग) के अन्तर्गत मुख्यमंत्री द्वारा किसी मंत्री के निर्णय को मंत्रिपरिषद के समक्ष रखा जाता है।
वह महत्वपूर्ण अधिकारियों जैसे- महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों और राज्य निर्वाचन आयुक्त, राज्य मानवाधिकार आयोग, राज्य वित्त आयोग, राज्य महिला आयोग आदि को नियुक्त करने के संबंध में राज्यपाल को परामर्श देता है।

राज्य के राज्यपाल द्वारा कार्यवाही का संचालन
राज्य के समस्त कार्य राज्यपाल के नाम से किये जाते हैं। राज्यपाल कार्यवाही की सुगमता एवं मंत्रियों को कार्य आवंटन के लिए नियम बना सकता है।

मुख्यमंत्री के कार्य

  • मंत्रिपरिषद् का निर्माण करना
  • मंत्रियों को विभागों का वितरण एवं मंत्रियों की पदमुक्ति
  • मंत्रिमंडल का संचालन
  • सरकार का मुख्य वक्ता
  • राज्यपाल व मंत्रिपरिषद् के मध्य की कड़ी
  • राष्ट्रीय स्तर पर राज्य का प्रतिनिधित्व करता है।
  • राज्य का नीति निर्धारक एवं संचालक
  • मंत्रिपरिषद् एवं विधानसभा के बीच की कड़ी

राज्य विधानमण्डल के संबंध में
सदन के नेता के रूप में मुख्यमंत्री को निम्नलिखित शक्तियाँ प्राप्त हैं-
  1. वह राज्यपाल को विधानसभा का सत्र बुलाने एवं उसे स्थगित करने के संबंध में सलाह देता है।
  2. वह राज्यपाल को किसी भी समय विधानसभा विघटित करने की सिफारिश कर सकता है।
  3. वह सदन में सरकारी नीतियों की घोषणा करता है।

उपरोक्त शक्तियों एवं कार्यों के अलावा मुख्यमंत्री के निम्नलिखित कार्य भी हैं-
  1. वह राज्य योजना बोर्ड का अध्यक्ष होता है।
  2. वह सम्बंधित क्षेत्रीय परिषद् के क्रमवार उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करता है। एक समय में इसका कार्यकाल एक वर्ष का होता है।
  3. वह अन्तर्राज्यीय परिषद् और राष्ट्रीय विकास परिषद् का सदस्य होता है। इन दोनों परिषदों की अध्यक्षता प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है। वह नीति आयोग में गवर्निंग काउंसिल का सदस्य होता है।=
  4. वह राज्य सरकार का मुख्य प्रवक्ता होता है।
  5. राज्य में असैनिक पदाधिकारियों के स्थानान्तरण आदेश मुख्यमंत्री के आदेश पर जारी किये जाते हैं तथा वह राज्य की नीति से सम्बंधित विषयों के सम्बंध में निर्णय लेता है।
  6. वह नीति आयोग का सदस्य होता है।

पद विमुक्ति

सामान्यतः मुख्यमंत्री अपने पद पर तब तक बना रहता है, जब तक उसे विधानसभा में विश्वास प्राप्त (बहुमत) रहता है। अतः जैसे ही उसका विधानसभा में बहुमत समाप्त हो जाता है, उसे त्यागपत्र दे देना चाहिए। यदि वह त्यागपत्र नहीं देता है, तो राज्यपाल उसे बर्खास्त कर सकता है। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री निम्नलिखित स्थितियों में बर्खास्त किया जा सकता है-
  1. यदि राज्यपाल मुख्यमंत्री को विधानसभा का अधिवेशन बुलाने तथा उसमें बहुमत सिद्ध करने की सलाह दे और राज्यपाल द्वारा निर्धारित अवधि के भीतर मुख्यमंत्री, विधानसभा का अधिवेशन बुलाने के लिए तैयार न हो, तो राज्यपाल मुख्यमंत्री को बर्खास्त कर सकता है।
  2. यदि राज्यपाल अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति को यह रिपोर्ट दे कि राज्य का शासन संविधान के अनुसार नहीं चलाया जा सकता या राष्ट्रपति को अन्य स्त्रोतों से यह समाधान हो जाए कि राज्य का शासन संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता तो, राष्ट्रपति मुख्यमंत्री को बर्खास्त करके राज्य का शासन राज्यपाल को चलाने के लिए कह सकता है।
  3. जब मुख्यमंत्री के विरुद्ध राज्य विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाए और मुख्यमंत्री त्यागपत्र देने से इन्कार कर दे, तब राज्यपाल मुख्यमंत्री को बर्खास्त कर सकता है।

राजस्थान विधानसभा में लाये गए विश्वास प्रस्ताव- विधान सभा नियम 132 के द्वारा सरकार एवं विश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत करती है, कि वह सदन में बहुमत धारण किये हुए हैं या रखती है- अब तक 5 बार विश्वास प्रस्ताव लाया जा चुका है।
  • प्रथम बार- 23 मार्च, 1990- मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत द्वारा 9वीं विधानसभा में दो बार
  • दूसरी बार- 18 नवम्बर, 1990- भैरोसिंह शेखावत व ओमप्रकाश गुप्ता द्वारा
  • तीसरी बार- 31 दिसम्बर, 1993- 10वीं विधानसभा में भैरोसिंह शेखावत द्वारा
  • चौथी बार- 3 जनवरी, 2009 को 13वीं विधानसभा में अशोक गहलोत द्वारा
  • पाँचवीं बार 15वीं विधानसभा में- 14 अगस्त, 2020 को अशोक गहलोत द्वारा।
इससे पूर्व राजस्थान में 9वीं, 10वीं, 13वीं व 15वीं विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव लाया गया है।

राज्य मंत्रिपरिषद

अनुच्छेद 163 (1) के अनुसार, राज्यपाल को उसके कार्यों में सहायता व परामर्श देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी। जिसका मुखिया मुख्यमंत्री होगा। राज्यपाल द्वारा स्वविवेक से किये गये कार्यों के अतिरिक्त अन्य शासन संबंधी कार्यों में मंत्रिपरिषद उसे सलाह देगी। संघीय मंत्रिपरिषद के समान राज्य मंत्रिपरिषद की राज्य प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका है। मंत्रिपरिषद ही राज्य की वास्तविक कार्यपालिका है।

मंत्रियों की नियुक्ति एवं शपथ
अनुच्छेद 164 (1) के अनुसार मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री के परामर्श पर राज्यपाल के द्वारा की जाती है। इसका अभिप्राय है कि राज्यपाल उन्हीं लोगों को बतौर मंत्री नियुक्त करता है जिनके नाम की सिफारिश मुख्यमंत्री करते हैं। अनुच्छेद 164(1) में ही कहा गया है कि छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश तथा ओडिशा राज्यों में जनजातियों के कल्याण के लिये एक मंत्री होगा।
सामान्यतः उसी व्यक्ति को बतौर मंत्री नियुक्त किया जाता है जो विधानसभा या विधानपरिषद में से किसी एक सदन का सदस्य हो। कोई व्यक्ति यदि विधानमण्डल का सदस्य नहीं भी है तो भी उसे मंत्री नियुक्त किया जा सकता है। लेकिन 6 महीने के अंदर उसका विधानमण्डल का सदस्य बनना अनिवार्य है। अन्यथा उसका मंत्री पद समाप्त हो जाएगा। मंत्रियों को शपथ राज्यपाल द्वारा दिलवायी जाती है।

राज्य मंत्रिपरिषद का आकार [अनुच्छेद 164 (1ए)]
प्रारम्भ में संविधान में यह निर्धारित नहीं था कि राज्य मंत्रिपरिषद का आकार क्या होगा। अर्थात् राज्यमंत्री परिषद में कितने मंत्री हो सकते हैं। इसका निर्धारण मुख्यमंत्री अपने विवेक से करता था। परन्तु 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के द्वारा यह व्यवस्था की गई कि राज्य मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या राज्य विधानसभा के कुल सदस्य संख्या के 15% से अधिक नहीं होगी, जिसमें मुख्यमंत्री भी शामिल होगा और किसी भी परिस्थिति में मंत्रियों की संख्या 12 से कम नहीं होगी। राजस्थान में मुख्यमंत्री सहित कम से कम 12 कैबिनेट मंत्री होंगे। उदाहरण के लिए राजस्थान में विधानसभा की 200 सीटें हैं, इसलिए मुख्यमंत्री सहित 30 से अधिक मंत्री नहीं हो सकते हैं।
ऐसे राज्य जिनमें विधानसभा की सदस्य संख्या 40 या उससे कम है जैसे सिक्किम (32), मिजोरम (40) व गोवा (40) हैं और केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली-पुदुच्चेरी में मंत्रिपरिषद की सदस्य संख्या निम्न सदन की सदस्य संख्या की 10% होगी और किसी भी परिस्थिति में मंत्रियों की संख्या 7 से कम नहीं होगी।

मंत्रिपरिषद के कार्य एवं शक्तियाँ

  1. राज्य प्रशासन का संचालन
  2. राज्य की नीति का निर्धारण
  3. विधि निर्माण संबंधी कार्य
  4. बजट संबंधी कार्य
  5. राज्य प्रशासन से समन्वय
  6. कार्मिक प्रशासन पर नियंत्रण
  7. मंत्रिमण्डल की बैठकें
  8. सामूहिक उत्तरदायित्व
  9. विविध कार्य- जैसे राज्य के विकास के लिए विभिन्न योजनाएँ व कार्यक्रम बनाना व क्रियान्वयन।

1. राज्य प्रशासन का संचालन :- राज्य प्रशासन में अनेक विभाग, मंत्रालय, निदेशालय, स्वायत्तशासी संस्थाएँ आदि होती है जिनका वास्तविक नियंत्रण एवं संचालन राज्य-मंत्रिपरिषद करता है। प्रत्येक विभाग का राजनैतिक प्रमुख एक मंत्री होता है जिसकी देखरेख व निर्देशन में विभाग के कार्य संचालित किये जाते हैं। प्रत्येक मंत्री अपने विभाग के प्रशासन के लिए राज्य विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी होता है। मंत्रियों को विभागीय कार्यों में सहायता व परामर्श देने के लिए सचिव व प्रशासनिक अधिकारी होते हैं, जिनके कार्यों व गतिविधियों पर मंत्री नियंत्रण रखते हैं।

2. राज्य की नीति का निर्धारण :- लोक कल्याणकारी राज्य में जनता को मूलभूत सुविधाएँ प्रदान करने, चुनावी वादों को पूरा करने, जनता की समस्याओं एवं अभावों के निराकरण के लिए और सम्पूर्ण राज्य के विकास के लिए सरकार नीतियां व कार्यक्रम बनाती हैं। राज्य प्रशासन से संबंधित इन नीतियों व कार्यक्रमों को अंतिम रूप मंत्रिपरिषद ही प्रदान करता है। इन नीतियों के क्रियान्वयन में संबंधित विभाग का सचिव एवं अन्य विशेषज्ञ मंत्री को सलाह, सहायता व परामर्श देते हैं।

3. विधि निर्माण संबंधी कार्य :- हमारे संविधान में केन्द्र-राज्यों के मध्य विधि निर्माण की शक्तियाँ विभाजित की गयी हैं। संविधान के अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची में शक्तियों का विभाजन किया गया है। सातवीं अनुसूची में तीन सूचियां संघ सूची, राज्य सूची व समवर्ती सूची शामिल है। राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकार को प्राप्त है। संसदीय शासन व्यवस्था में सरकारी विधेयक मंत्रियों द्वारा विधानमंडल में पेश किये जाते हैं, विधानमंडल में बहुमत होने के कारण मंत्रिपरिषद द्वारा प्रस्तुत विधेयकों को समर्थन प्राप्त होता है। विधानमण्डल का सत्र शुरू होने से पूर्व ही मंत्रिपरिषद विधि निर्माण की तैयारी पूरी कर लेता है। मंत्रिपरिषद ही विधानमंडल में कानून पास करवा लेता है। विश्रांति काल में राज्यपाल द्वारा जारी अध्यादेश भी मंत्रिपरिषद ही तैयार करवाता है।

4. बजट संबंधी कार्य :- राज्य प्रशासन का वार्षिक वित्तीय विवरण या बजट राज्य मंत्रिपरिषद द्वारा ही बनाया जाता है। सभी मंत्री अपने-अपने विभाग से संबंधित योजनाओं तथा गैर योजना मदों के लिए आवश्यक वित्तीय प्रावधानों का विस्तृत विवरण प्रत्येक इकाई से तैयार करवाता है, इसके पश्चात् सभी विभागों का समग्र बजट मंत्रिपरिषद विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत करता है। विधानमण्डल विचार-विमर्श करके बजट को स्वीकृति प्रदान करता है। विधानमण्डल द्वारा स्वीकृत बजट के अनुसार क्रियान्वयन सुनिश्चित करने का कार्य भी मंत्रिपरिषद करता है।

5. राज्य प्रशासन में समन्वय :- राज्य सरकार के कार्यों में अत्यधिक वृद्धि एवं जटिलता के कारण विभिन्न विभागों के कार्यों व नीतियों में समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता होती है। राज्य मंत्रिपरिषद सरकार के विभागों, कार्यों व नीतियों में समन्वय स्थापित करता है।

6. कार्मिक प्रशासन पर नियंत्रण :- राज्य प्रशासन सरकार की नीतियों को क्रियान्वित करने का काम करता है। मंत्रिपरिषद द्वारा निर्धारित नीतियों का वास्तविक क्रियान्वयन कार्मिक वर्ग द्वारा किया जाता है। प्रशासकीय नीति के क्रियान्वयन एवं प्रशासन के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लोक सेवकों की विशाल टीम होती है, जो मंत्रिपरिषद के अधीन कार्य करती है। प्रशासन में उच्च पदों पर नियुक्ति, पदोन्नति, प्रशिक्षण, स्थानान्तरण एवं अनुशासनात्मक कार्यवाही आदि के संदर्भ में नीतियों का निर्धारण मंत्रिपरिषद द्वारा किया जाता है। कार्मिक प्रशासन पर नियंत्रण स्थापित करने का समुचित कार्य मंत्रिपरिषद करता है।

7. विविध कार्य :-
राज्य के विकास के लिए विभिन्न योजनाओं का निर्धारण एवं उनका क्रियान्वयन करना।
राज्य की वित्तीय नीति पर नियंत्रण एवं राज्य के कल्याणार्थ कर (Tax) प्रणाली का निर्धारण करना।
केन्द्र सरकार, अन्य राज्यों तथा विदेशी अभिकरणों से वार्ता एवं समझौता
अन्तर्विभागीय एवं अन्तः सांस्थानिक समन्वय स्थापित करना।
प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए तत्काल निर्णय लेना एवं उचित कदम उठाना। जैसे कोविड-19 से निपटने के लिए उचित कदम उठाने के कार्य वर्ष 2020 में किये गए।

8. समितियों का गठन एवं प्रशासनिक सुधार :- मंत्रिपरिषद के कार्यों को सुगमता एवं विशिष्टता प्रदान करने के लिए राज्य मंत्रिमण्डल द्वारा कुछ स्थायी समितियों का गठन किया जाता है जैसे- राजनीतिक मामलों पर समिति, कर्मचारी कल्याण समिति, सामाजिक सुरक्षा एवं महिला कल्याण समिति, नियम एवं कार्य समितियाँ आदि। प्रशासन को निरन्तर एवं गतिशील बनाने के लिए प्रशासनिक सुधार समितियों के गठन का कार्य भी मंत्रिपरिषद द्वारा समय-समय पर किया जाता है।

उत्तरदायित्व
मंत्रियों के उत्तरदायित्व
  1. व्यक्तिगत
  2. सामूहिक
  1. व्यक्तिगत रूप से राज्य मंत्रिपरिषद के सभी मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त पद पर बने रहते हैं।
  2. सामूहिक उत्तरदायित्व- अनुच्छेद 164 (2) :- सामूहिक रूप से सम्पूर्ण राज्य मंत्रिपरिषद राज्य के निम्न सदन (विधानसभा) के प्रति उत्तरदायी होता है। साधारण भाषा में कहा जाता है कि यह 'साथ तैरने तथा साथ डूबने' के सिद्धान्त पर कार्य करता है अर्थात् मंत्रिपरिषद के किसी भी सदस्य के कृत्य के लिए सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद उत्तरदायी होता है।
नोट- भारतीय संविधान में राज्यों के मंत्रियों के लिए विधिक उत्तरदायित्व नहीं है।

राज्य मंत्रिपरिषद की संरचना

राज्य मंत्रिपरिषद में निम्नलिखित मंत्री होते हैं-
  • कैबिनेट मंत्री
  • राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)
  • राज्य मंत्री
  • उपमंत्री

1. केबिनेट :- केबिनेट मंत्री प्रथम श्रेणी के मंत्री हैं, जो अपने विभाग के अध्यक्ष (मुखिया) होते हैं। वास्तव में कैबिनेट मंत्रियों का समूह है, जो सरकार की नीतियों का संचालन करते हैं। कैबिनेट मंत्री सरकार के निर्णयों में शामिल होते हैं। कैबिनेट मंत्रियों को ही मंत्रिमण्डल कहते हैं। मंत्रिमण्डल की वास्तविक कार्यकारी अंग होता है। यह सरकार के वैधानिक और वित्तीय मामलों के संबंध में निर्णय करता है। केबिनेट के सदस्य ही सरकार की नीति-निर्धारित करते हैं। केबिनेट या मंत्रिमंडल मंत्रिपरिषद का छोटा भाग होता है। मूल संविधान में मंत्रिमण्डल (कैबिनेट) शब्द का उल्लेख नहीं है, परन्तु यह शब्द एकमात्र 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के द्वारा अनुच्छेद 352 के संबंध में प्रयुक्त किया गया। संविधान में मंत्रिमण्डल की संख्या निश्चित नहीं है। केबिनेट में प्रमुख विभाग शामिल होते हैं जैसे वित्त, गृह, शिक्षा, कृषि, उद्योग आदि। राज्य का मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री भी केबिनेट के सदस्य ही होते हैं।

2. राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) :- दूसरे दर्जे के मंत्री होते हैं, जो विभागीय कार्यों में कैबिनेट मंत्रियों के सहयोगी होते हैं। कभी-कभी इन्हें किसी विभाग का स्वतंत्र प्रभार भी दे दिया जाता है, परन्तु ये मंत्री कैबिनेट की बैठकों में बुलाने पर ही शामिल हो सकते हैं स्वेच्छा से नहीं।

3. राज्य मंत्री :- इन्हें स्वतंत्र प्रभार नहीं दिया जाता।

4. उपमंत्री :- ये कनिष्ठ मंत्री है जो किसी कैबिनेट मंत्री अथवा स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री के अधीन कार्य करते हैं।

मंत्रिपरिषद व केबिनेट

मंत्रिपरिषद में कैबिनेट मंत्री, राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार), राज्य मंत्री व उपमंत्री शामिल होते हैं। मंत्रिपरिषद का आकार बड़ा होता है।
कैबिनेट या मंत्रिमंडल आकार में छोटा होता है, परन्तु अत्यधिक शक्तिशाली होता है।
  • उपमुख्यमंत्री- संविधान में उपमुख्यमंत्री के पद का कोई प्रावधान नहीं है। उपमुख्यमंत्री पद का निर्माण राजनीतिक कारणों से हुआ है। उपमुख्यमंत्री कैबिनेट स्तर का मंत्री होता है।
  • मुख्यमंत्री- मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री सभी मंत्रियों के ऊपर, राज्य में सर्वोच्च शासकीय प्राधिकारी होता है।
  • संसदीय सचिव- ये औपचारिक मंत्री है, जो संसदीय कार्यों में मंत्रियों की सहायता करते हैं। राज्यों में संसदीय सचिवों की नियुक्ति मुख्यमंत्री करता है और संसदीय सचिवों को शपथ भी मुख्यमंत्री दिलवाता है।
  • कैबिनेट समितियाँ- मंत्रिमंडल के कार्यभार को कम करने के लिए केन्द्र व राज्य सरकारें कुछ समितियों का गठन करती है। इन समितियों का संविधान में उल्लेख नहीं है। ये समितियाँ प्रकृति में अतिरिक्त संवैधानिक (Extra Constitutional) होती है।

कैबिनेट समितियों के प्रकार
कार्य एवं प्रकृति के आधार पर इन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है।
  • स्थायी समितियाँ
  • अस्थायी समितियाँ/अल्पकालिक समितियाँ

1. स्थायी समितियाँ :- ये एक विशिष्ट कार्य के साथ प्रकृति में स्थायी होती है परिस्थितियों एवं आवश्यकतानुसार इनका गठन मुख्यमंत्री करते हैं, कैबिनेट मंत्रियों को इनके सदस्य बनाया जाता है। इनमें बिना कैबिनेट की रैंक के लोगों को भी विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया जा सकता है।

2. अस्थायी समितियाँ :- ये अस्थायी प्रकृति की समितियाँ हैं जो समय-समय पर किन्हीं विशिष्ट कार्यों को करने के लिए गठित की जाती है। इन समितियों की संरचना, संख्या आदि आवश्यकतानुसार व अलग-अलग होती है।

सदन के संबंध में मंत्रियों के अधिकार
सभी मंत्रियों को विधानमंडल के दोनों सदनों की कार्यवाही में भाग लेने व बोलने का अधिकार है।
सभी सदस्य विधानमंडल की किसी भी समिति के सदस्य बन सकते हैं, भाग ले सकते हैं एवं बोल भी सकते हैं।
कोई सदस्य अपना मत उसी सदन में दे सकता है जिसका वह सदस्य होता है।

राजस्थान के मुख्यमंत्री

1. हीरालाल शास्त्री (1899-1974)- राजस्थान के जोबनेर में 24 नवम्बर, 1899 को जन्मे हीरा लाल शास्त्री राजस्थान के प्रथम मनोनीत मुख्यमंत्री थे। भारत के रियासती मंत्रालय ने जयपुर रियासत के पूर्व प्रधानमंत्री पं. हीरालाल शास्त्री को 30 मार्च, 1949 को प्रधानमंत्री नियुक्ति किया। वे इस पद पर 7 अप्रैल, 1949 से 5 जनवरी, 1951 तक रहे। राजस्थान की प्रथम लोकप्रिय सरकार हीरालाल शास्त्री के नेतृत्व में गठित हुई। संविधान लागू होने के पश्चात् प्रधानमंत्री पद नाम को (30 मार्च, 1949 से 26 जनवरी, 1950 तक) मुख्यमंत्री पद नाम में बदल दिया गया। 5 जनवरी, 1951 को त्यागपत्र दिया। बाद में सवाईमाधोपुर से चुनाव जीते।
  • श्री हीरालाल शास्त्री की संविधान सभा के सदस्य व प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जयपुर प्रजामण्डल के अध्यक्ष के रूप में व जयपुर के प्रधानमंत्री मिर्जा इस्माइल के मध्य जेंटलमैन एग्रीमेंट हुआ।
  • उन्होंने 1921-27 तक राजकीय सेवा में अधिकारी के रूप में कार्य किया। 1940 में जयपुर प्रजामण्डल के अध्यक्ष बने।
  • हीरालाल शास्त्री ने 30 मार्च, 1949 को राजस्थान में सम्भागीय व्यवस्था की शुरूआत की।
  • वे राजस्थान के प्रथम प्रधानमंत्री भी रहे।
  • राजपूताना में 26 जनवरी, 1950 से पूर्व मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री पदनाम दिया जाता था।
  • हीरालाल शास्त्री सवाई माधोपुर संसदीय क्षेत्र से 1957-62 तक सांसद रहे।
  • इन्होंने अपनी पुत्री के नाम से 1935 में 'शांता बाई शिक्षा कुटीर' की स्थापना की जो वर्तमान में टोंक के निवाई में 'वनस्थली विद्यापीठ' (1947 में) के नाम से देश के प्रथम 'महिला विश्वविद्यालय' के रूप में ख्याति प्राप्त है। वनस्थली विद्यापीठ टोंक जिले के निवाई में स्थित है।
  • हीरालाल शास्त्री की पत्नी श्रीमती रतन शास्त्री ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य करते हुए 'वनस्थली विद्यापीठ' की स्थापना में विशेष योगदान दिया है। श्रीमती रतन शास्त्री 'पद्मश्री' व 'पद्मविभूषण' से सम्मानित राजस्थान की एकमात्र महिला हैं।
  • हीरालाल शास्त्री की आत्मकथा- 'प्रत्यक्ष जीवन शास्त्र' है। उनका लोकप्रिय गीत 'प्रलय प्रतीक्षा: नमो नमः' है। इनका प्रसिद्ध गीत 'सुपनो आयो रे'।
  • 28 दिसम्बर, 1974 को वनस्थली में उनकी मृत्यु हुई।
  • भारत सरकार द्वारा इनकी याद में एक डाक टिकट जारी किया गया। इनके कार्यकाल में दो मुख्य सचिव के. राधाकृष्णन तथा वी. नारायण रहे।

2. सी.एस. वेंकटाचारी- इनका जन्म मैसूर (कर्नाटक) राज्य में 1899 में हुआ। वे केन्द्र सरकार द्वारा राजस्थान में मनोनीत दूसरे क्रम के मुख्यमंत्री के रूप में 5 जनवरी, 1951 से 26 अप्रैल, 1951 तक रहे। भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य तथा संविधान सभा के सदस्य थे। वे राजस्थान के मुख्यमंत्री मनोनीत किये गये। वे कनाडा में भारत के राजदूत रहे। रियासती काल के दौरान उन्होंने बीकानेर व जोधपुर के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। इनके मंत्रिमंडल में आई.सी.एस. भोलानाथ झा भी शामिल थे। यह राज्य का अब तक का छोटा मंत्रिमंडल था। इस मंत्रिमंडल में वेंकटाचारी के अतिरिक्त दो अन्य आई.सी.एस. भोलानाथ झा व श्री हरिशर्मा शामिल थे। भोलानाथ झा के त्यागपत्र के बाद हरिशर्मा मंत्रिमंडल में शामिल किये गये। इनके कार्यकाल में दो मुख्य सचिव रहे। 1. के. राधाकृष्णन, 2. एस. डब्ल्यू. शिवशंकर।

3. जयनारायण व्यास (1899 से 1963)- इन्हें 'शेर-ए राजस्थान', लोकनायक, धुन का धनी, लक्कड़ और फक्कड़ उपनामों से भी जाना जाता है। इनका जन्म जोधपुर में 18 फरवरी, 1899 में हुआ। इन्होंने जोधपुर को अपनी कर्मस्थली बनाया।
  • व्यास राजस्थान के प्रथम क्रांतिकारी थे, जिन्होंने सामंतशाही के विरुद्ध आवाज उठाई। इन्होंने मारवाड़ सेवा संघ, मारवाड़ हितकारिणी सभा तथा मारवाड़ यूथ लीग संस्थाओं की कार्यकारिणी में मुख्य भूमिका निभाई।
  • प्रजामण्डल आन्दोलन के दौरान इन्हें सिवाणा दुर्ग में नजरबंद किया गया।
  • जयनारायण व्यास राजस्थान के एकमात्र मुख्यमंत्री रहे हैं जिन्होंने मनोनीत व निर्वाचित मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया है। वे 26 अप्रैल 1951 से 3 मार्च 1952 तक राज्य के मनोनीत मुख्यमंत्री रहे। इनके कार्यकाल में एस.डब्ल्यू. शिवशंकर तथा बी.जी.राव मुख्य सचिव रहे।
  • 26 अप्रैल 1951 में जयनारायण व्यास मंत्रिमंडल का गठन किया गया, जिसमें टीकाराम पालीवाल, युगल किशोर चतुर्वेदी, बलवंत सिंह मेहता, मोहनलाल सुखाड़िया, मथुरादास माथुर, ब्रज सुन्दर शर्मा, कुम्भाराम आर्य, नरोत्तम लाल जोशी मंत्री के रूप में शामिल हुए। 1 जून, 1951 को श्री जसवंत सिंह (दाऊदसर) को मंत्री बनाया गया। श्री अमृत लाल यादव को उपमंत्री के रूप में शामिल किया गया। इनके इस कार्यकाल में 23 फरवरी, 1952 को प्रथम राजस्थान विधानसभा का गठन किया गया। उन्होंने 3 मार्च, 1952 तक कार्य किया और 1 नवम्बर, 1952 से 13 मार्च, 1954 तक निर्वाचित मुख्यमंत्री के रूप में राज्य के मुख्यमंत्री रहे। 1956 में राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे तथा राजस्थान से राज्यसभा सांसद भी रहे।
  • प्रथम विधानसभा चुनाव में जयनारायण व्यास जोधपुर शहर (ब) तथा जालौर (ए) सीट से चुनाव लड़े और दोनों ही स्थानों से चुनाव हार गए। परन्तु कांग्रेस को बहुमत मिलने पर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। बाद में उन्होंने किशनगढ़ से चांदमल मेहता से सीट खाली करवाकर चुनाव लड़ा और वे किशनगढ़ से चुनाव जीते। मुख्यमंत्री बनने से पहले वे किसी भी मंत्रिपरिषद में मंत्री नहीं रहे। जयनारायण व्यास एक बार राज्य सभा सांसद रहे।
  • प्रथम आम चुनाव में जब जयनारायण व्यास जोधपुर (बी) व जालौर (डी) दोनों क्षेत्रों से दो चुनाव हार गये तो श्री टीकाराम पालीवाल को कांग्रेस बहुमत दल का नेता चुना गया और 3 मार्च, 1952 को उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवायी गयी। वे राज्य के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री बने।
इनकी प्रसिद्ध पत्रिकाएँ निम्नलिखित थी-
  1. तरुण राजस्थान, 1927 - ब्यावर से - प्रकाशक जय प्रकाश नारायण, सम्पादक- विजयसिंह पथिक
  2. आगी-बाण, 1932- ब्यावर से
  3. अखण्ड भारत, 1938 - बम्बई से
  4. पीप (अंग्रेजी पत्रिका)

4. टीकाराम पालीवाल (1907-1995)- इनके नेतृत्व में प्रथम लोकतांत्रिक सरकार का गठन किया गया। वे राजस्थान के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री रहे टीकाराम पालीवाल का जन्म 1907 में मण्डावर (दौसा) में हुआ। वे 3 मार्च, 1952 से 31 अक्टूबर, 1952 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। बाद में जयनारायण व्यास मुख्यमंत्री बने और पालीवाल को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। वे राज्य के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री व प्रथम उपमुख्यमंत्री बने।
  1. अक्टूबर, 1952 में टीकाराम पालीवाल मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव प्रथम विधानसभा में पेश हुआ। 10 अक्टूबर, 1952 को यह अविश्वास प्रस्ताव तात्कालिक अध्यक्ष श्री नरोत्तम लाल जोशी को मिला परन्तु श्री टीकाराम पालीवाल ने बताया कि उनके मंत्रिमंडल ने 8 अक्टूबर, 1952 को त्यागपत्र दे दिया था और कहा मेरी सरकार कार्यवाहक है। इसके पश्चात् 31 अक्टूबर, 1952 को श्री टीकाराम पालीवाल द्वारा त्यागपत्र दे दिया गया और श्री जयनारायण व्यास विधायक दल के नेता चुन लिए गए और 1 नवम्बर, 1952 को जयनारायण मंत्रिमंडल ने शपथ ग्रहण की।
  2. जयनारायण व्यास मंत्रिमंडल में श्री टीकाराम पालीवाल को उप मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके अतिरिक्त रामकिशोर व्यास, भोगीलाल पांड्या, रामकरण जोशी, मास्टर भोलानाथ, नाथूराम मिर्धा और अमृतलाल यादव को मंत्रिमण्डल में शामिल किया गया। अप्रैल 1953 में श्री टीकाराम पालीवाल, श्री नाथूराम मिर्धा और श्री राम किशोर का श्री जयनारायण व्यास से मतभेद हो गया इसलिए उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। 8 जनवरी, 1954 को श्री टीकाराम पालीवाल पुनः मंत्रिमंडल में शामिल हो गये।
  3. इन्होंने 1968 में स्वतंत्र पार्टी से विधानसभा क्षेत्र चौमू से उपचुनाव लड़ा परन्तु हार गये। ● वे लोकसभा-राज्यसभा सांसद भी रहे। ● राजस्थान में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री व राजस्व मंत्री रहे।

5. मोहनलाल सुखाड़िया (1916-1982) - 4 बार मुख्यमंत्री
  • श्री मोहनलाल सुखाड़िया जो व्यास मंत्रिमंडल में राजस्व मंत्री थे, ने नये नेता के चुनाव में श्री व्यास को 8 मतों से पराजित किया और विधायक दल के नेता चुने गए। पहली बार नेता पद के लिए देश में एक युवा वरिष्ठ नेता का मुकाबला प्रतिष्ठित नेता (व्यास) से हुआ। इसका कारण यह था कि प्रथम आम चुनाव में हीरालाल शास्त्री ने भाग नहीं लिया। माणिक्यलाल वर्मा चित्तौड़गढ़ लोकसभा क्षेत्र से, जयनारायण व्यास दो विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव हार गये। टीकाराम पालीवाल मुख्यमंत्री पद से हटने के कारण निराश हो गये। गोकुल भाई भट्ट भी लोकसभा चुनाव हार गये थे। श्री जयनारायण व्यास ने रामराज्य परिषद् के 22 विधायकों को कांग्रेस में शामिल कर लिया।
  • 'आधुनिक राजस्थान के निर्माता' के रूप में पहचान रखने वाले मोहनलाल सुखाड़िया का जन्म 31 जुलाई, 1916 को झालावाड़ में हुआ। इन्होंने उदयपुर को अपनी कर्मस्थली बनाया। इनका देहान्त बीकानेर में 2 फरवरी, 1982 को हुआ।
  • उन्होंने 13 नवम्बर, 1954 को राज्य के पाँचवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली और 9 जुलाई, 1971 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। इन्होंने लगभग 17 वर्षों तक राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। बाद में इन्हें कर्नाटक, आंध्रप्रदेश व तमिलनाडु का राज्यपाल बनाया गया।
  • सुखाड़िया राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने जब उनकी आयु 38 वर्ष थी। इनके समय में सबसे पहले राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था लागू हुई। इन्होंने संभागीय व्यवस्था को बंद किया। इनके कार्यकाल में राजस्थान में पहली महिला मंत्री कमला बेनीवाल बनी। इनके काल में ही राजस्थान में पहली बार राष्ट्रपति शासन 13 मार्च, 1967 को लगा। उस समय सुखाड़िया मुख्यमंत्री थे। सुखाड़िया के जीवन का एक पहलू यह भी है कि उनकी शादी के विरोध में नाथद्वारा के बाजार बंद रहे।
श्री मोहन लाल सुखाड़िया निम्न कार्यकाल में मुख्यमंत्री रहे-
  • प्रथम बार- 13.11.1954 से 11.04.1957 तक
  • दूसरी बार- 13.04.1957 से 11.03.1962 तक
  • तीसरी बार- 11.03.1962 से 13.03.1967 तक
  • चौथी बार- 26.04.1967 से 08.07.1971 तक

सुखाड़िया के समय ही संसदीय सचिव का पद सृजित किया गया। इनके विरुद्ध सर्वाधिक 6 बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। मोहन लाल सुखाड़िया के कार्यकाल के दौरान निम्नलिखित मुख्य सचिव रहे-
  • बी.जी. राव
  • कृष्णन पुरी
  • के.एन. सुब्रमनियम
  • भगवत सिंह मेहता
  • सावलदान उज्ज्वल
  • के.पी.यू. मेनन
  • आर.डी. माथुर
  • जोरावर सिंह।

6. बरकतुल्लाह खाँ (1920-1973)- जोधपुर में जन्मे बरकतुल्लाह खाँ, राजस्थान के 6वें मुख्यमंत्री बने। वे 9 जुलाई, 1971 से 11 अक्टूबर, 1973 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। राजस्थान के प्रथम मुस्लिम मुख्यमंत्री थे। बरकतुल्लाह खाँ अलवर जिले की तिजारा विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक रहे। वे 1971 के भारत-पाक युद्ध के समय राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। उनका विवाह ऊषा मेहता से हुआ। इन्हें 'प्यारे मियां' के नाम से भी जाना जाता है। बरकतुल्लाह खाँ राजस्थान के पहले व एकमात्र अल्पसंख्यक मुख्यमंत्री हैं।
  • राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री जिनकी पद पर रहते हुए मृत्यु हुई। इनके कार्यकाल के दौरान निम्नलिखित मुख्य सचिव रहें- 1. जोरावर सिंह 2. सुन्दर लाल

7. हरिदेव जोशी- हरिदेव जोशी 3 बार राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे। वे 1952 से मृत्युपर्यन्त (10 बार) तक विधायक रह चुके हैं। वे 11वें, 16वें व 18वें क्रम के राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे। उनका कार्यकाल-
प्रथम बार- 11 अक्टूबर, 1973 से 29 अप्रैल, 1977
दूसरी बार- 10 मार्च, 1985 से 20 जनवरी, 1988
तीसरी बार- 4 दिसम्बर, 1989 से 4 मार्च, 1990 तक रहा।
वे तीन बार मुख्यमंत्री रहे, लेकिन एक बार भी कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये।
  • इनके कार्यकाल के दौरान राजस्थान में दूसरी बार राष्ट्रपति शासन 1977 में लगा। राज्यपाल वेदपाल त्यागी की सिफारिश पर बी.डी. जत्ती ने लगाया।
  • हरिदेव जोशी 1990-92 की अवधि में नेता प्रतिपक्ष रहे।
  • इनके कार्यकाल में वर्ष 1987 में सम्भागीय व्यवस्था पुनः शुरू की गई। हरिदेव जोशी असम, मेघालय व प. बंगाल के राज्यपाल रह चुके हैं।
  • इनके कार्यकाल के दौरान सीकर के दीवराला में रूपकंवर सती काण्ड हुआ। जिसे रोकने के लिए संसद व विधानमण्डल में कानून बनाया गया। श्री हरिदेव जोशी के कार्यकाल में निम्न मुख्य सचिव रहें- 1. सुन्दर लाल, 2. मोहन मुखर्जी, 3. नरेश चन्द्रा, 4. बिपिन बिहारी लाल माथुर

8. भैरोंसिंह शेखावत (1923-2010)- भारत के 11वें उपराष्ट्रपति (2002-07) रहे। भैरोंसिंह शेखावत तीन बार (1977-80), 1990-1992 व 1993-1998 तक राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे। 'बाबोसा' के नाम से लोकप्रिय भैरों सिंह शेखावत 'प्रथम गैर कांग्रेसी' सदस्य थे जो राजस्थान के मुख्यमंत्री बने। जब वे पहली बार मुख्यमंत्री बने तो वे मध्यप्रदेश से राज्यसभा सांसद थे, बाद में कोटा की छबड़ा विधान सभा सीट से चुनाव जीतकर विधायक बने। इनका जन्म जयपुर रियासत के खाचरियावास में 23 अक्टूबर, 1923 को सीकर में हुआ। वे स्वतंत्रता पूर्व सीकर ठिकाने में थानेदार रहे। वे भारतीय जनता पार्टी व जन संघ से जुड़े रहे। मुख्यमंत्री बनने से पहले वे मंत्री नहीं रहे। जब भैरोंसिंह शेखावत राजस्थान के मुख्यमंत्री थे तो इनके कार्यकाल के दौरान राज्य में तीसरी बार (1980) (6वीं विधानसभा) में और चौथी बार 1992 में (नौवीं विधानसभा) राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। इनके कार्यकाल में ही राजस्थान में पहली बार 'मध्यावधि चुनाव 1980' में हुए। भैरोंसिंह शेखावत तीन बार राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष रहे। इनके कार्यकाल में बलिराम भगत, दरबारा सिंह व नवरंग लाल टिबरेवाल (कार्यवाहक) इसके अलावा रघुकुल तिलक, सुखदेव प्रसाद, मिलाप चन्द जैन (कार्यवाहक) देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय (कार्यवाहक) व एम. चन्ना रेड्डी राज्यपाल रहे।
  • इनके कार्यकाल में निम्न मुख्य सचिव रहे-
  • 1. कैलाश चंद सैनी 2. मोहन मुखर्जी 3. गोपाल कृष्ण 4. वी.पी. बिहारी लाल 5. टी.वी. रामानन 6. गोविंद मिश्रा 7. एच.एम. माथुर 8. मीठा लाल मेहता 9. अरुण कुमार

9. जगन्नाथ पहाड़िया (1932-2021)- राजस्थान के प्रथम अनुसूचित जाति के व्यक्ति जिन्हें 6 जून, 1980 को मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया। जब उन्हें मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया वे विधानसभा सदस्य नहीं थे। वे 6 जून, 1980 से 13 जुलाई, 1981 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। वे लोकसभा व विधानसभा के सदस्य रहने के अलावा बिहार (1989-90) व हरियाणा (2009-14) राज्यों के राज्यपाल रहे। इन्होंने अपने कार्यकाल में कवयित्री महादेवी वर्मा पर टिप्पणी की इसलिए त्यागपत्र देना पड़ा। 93 वर्ष की आयु में 20 मई 2021 को उनका कोविड-19 के कारण निधन हो गया।
इनके कार्यकाल में दो मुख्य सचिव रहें- 1. गोपाल कृष्ण 2. मदनमोहन

10. शिवचरण माथुर (1926-2009)- वे 14 जुलाई, 1981 से 23 फरवरी, 1985 तक तथा 20 जनवरी, 1988 से 4 दिसम्बर, 1989 तक राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे। इनका जन्म फरवरी 1926 में गुना (म.प्र.) में हुआ। उन्होंने उदयपुर को अपनी कार्यस्थली बनाया। उन्हें 1989 में डीग में हुए गोलीकाण्ड के कारण त्यागपत्र देना पड़ा। वे 2008-09 तक असम के राज्यपाल रहे। शिवचरण माथुर के कार्यकाल में निम्न मुख्य सचिव रहें- 1. मदनमोहन 2. आनन्द मोहन 3. बिपिन बिहारी लाल माथुर

11. हीरालालाल देवपुरा (1925-2004)- राजस्थान में सबसे छोटे कार्यकाल के लिए (मात्र 16 दिन) 23 फरवरी, 1985 से 10 मार्च, 1985 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। वे 'विधानसभा अध्यक्ष' व 'राज्य वित्त आयोग' के अध्यक्ष भी रहे। इनके कार्यकाल में आनन्द मोहन मुख्य सचिव रहे।

12. अशोक गहलोत- जादूगर के नाम से प्रसिद्ध अशोक गहलोत 3 (1998, 2008 व 2018) बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। अशोक गहलोत को राज्यपाल 'कल्याण सिंह' द्वारा शपथ दिलवाई गई। अशोक गहलोत तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने वाले राज्य के चौथे नेता हैं। इससे पूर्व भैरों सिंह शेखावत, हरिदेव जोशी तीन-तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। मोहन लाल सुखाड़िया सबसे अधिक 4 बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। वे तीसरी बार 17 दिसम्बर, 2018 से दिसंबर 2023 तक राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे।
  • राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके गहलोत तीन बार कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष रहे। 5 बार लोकसभा सांसद व पाँच बार विधायक रह चुके हैं। वर्तमान में अशोक गहलोत सरदारपुरा (जोधपुर) से विधायक हैं।
  • अशोक गहलोत का जन्म महामन्दिर जोधपुर में 3 मई, 1951 को हुआ व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े नेता है। वे 11, 12, 13, 14, 15 व 16 विधान सभा के लिए निर्वाचित हो चुके हैं। लोकसभा में 1980-84, 1984-89, 1991-96, 1996-98 व 1998-99 रह चुके हैं। इसके अतिरिक्त केन्द्र में मंत्री, विभिन्न समितियों के सदस्य भी रहे।
  • अशोक गहलोत के कार्यकाल में निम्नलिखित मुख्य सचिव रहें- 1. अरुण कुमार 2. इन्द्रजीत खन्ना 3. आर.के. नायर 4. डी.सी. सामंत 5. श्रीमती कुशलसिंह 6. टी. श्रीनिवासन 7. सलाउद्दीन अहमद 8. सी.के. माधव 9. डी.वी. गुप्ता 10. राजीव स्वरूप 11. निरंजन कुमार आर्य 12. ऊषा शर्मा

13. श्रीमती वसुन्धरा राजे- राजनीति और समाज सेवा के माध्यम से आमजन के हितों के लिए समर्पित एवं प्रतिबद्ध श्रीमती वसुन्धरा राजे का जन्म 8 मार्च, 1953 को मुम्बई में हुआ। तत्कालीन ग्वालियर रियासत की राजमाता विजया राजे सिन्धिया तथा महाराजा जीवाजीराव की पाँच सन्तानों में से राजे चौथी है। आपने अपनी स्कूली शिक्षा प्रेजेन्टेशन कान्वेंट, कोडइकनाल में पूरी की। तत्पश्चात् सोफिया कॉलेज, मुम्बई विश्वविद्यालय, मुम्बई (महाराष्ट्र) से अर्थशास्त्र तथा राजनीति विज्ञान में स्नातक (ऑनर्स) उपाधि प्राप्त की। राजे का विवाह 17 नवम्बर, 1972 को धौलपुर के पूर्व महाराजा हेमन्त सिंह के साथ हुआ। तभी से श्रीमती राजे का राजस्थान से सम्बन्ध है जो समय के साथ और व्यापक एवं प्रगाढ़ होता जा रहा है। आपके पुत्र दुष्यंत वर्तमान में झालावाड़-बाराँ संसदीय क्षेत्र में सांसद हैं।
  • श्रीमती वसुन्धरा राजे के सार्वजनिक जीवन का आरम्भ 1984 में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में हुआ। आप 1985-87 तथा 1987-89 तक प्रदेश भाजपा युवा मोर्चा की उपाध्यक्ष रही। आप 1985 से 1989 तक धौलपुर विधानसभा क्षेत्र से राज्य विधानसभा की सदस्य रहीं। 1987 से 1989 तक राजे भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश इकाई की उपाध्यक्ष रहने के पश्चात् 1989 में पहली बार झालावाड़ से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुई। तब से लगातार पाँच बार 1991, 1996, 1998, 1999 में उसी निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के लिए निर्वाचित होती रही। आपने संसदीय दल की संयुक्त सचिव का पदभार संभाला। श्रीमती वसुन्धरा राजे 1989 से सितम्बर, 2002 तक भाजपा की राष्ट्रीय एवं प्रदेश कार्यसमिति की सदस्य रहीं।
  • श्रीमती वसुन्धरा राजे की कार्यकुशलता एवं दक्षता के परिणामस्वरूप 1998-99 में केन्द्र सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमण्डल में उन्हें राज्यमंत्री का दायित्व सौंपा गया, जिसका उन्होंने कुशलतापूर्वक निर्वहन किया। 13 अक्टूबर, 1999 को श्रीमती राजे को केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में फिर राज्य मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया और उन्हें स्वतंत्र प्रभार के रूप में लघु उद्योग, कार्मिक तथा प्रशिक्षण, पेंशन एवं पेन्शनर्स कल्याण, कार्मिक तथा सार्वजनिक शिकायत व पेन्शन मंत्रालय, परमाणु ऊर्जा विभाग तथा अंतरिक्ष विभाग आदि का दायित्व सौंपा गया।
  • श्रीमती वसुन्धरा राजे 12 सितम्बर, 2002 से 7 दिसम्बर, 2003 तक राजस्थान भाजपा की प्रदेशाध्यक्ष रहीं। इस दौरान श्रीमती राजे ने परिवर्तन यात्रा के माध्यम से पूरे प्रदेश की सघन यात्रा की और विकास बाधाओं और जनसमस्याओं को निकटता से देखा-समझा। आप 12वीं राजस्थान विधानसभा के लिए झालावाड़ के झालरापाटन क्षेत्र से निर्वाचित हुई।
  • श्रीमती वसुन्धरा राजे को 8 दिसम्बर, 2003 से 13 दिसम्बर 2008 तक राजस्थान की प्रथम महिला मुख्यमंत्री के बतौर कार्य करने का गौरव मिला।
  • 13वीं राजस्थान विधान सभा के लिए झालावाड़ के झालरापाटन क्षेत्र से पुनः निर्वाचित हुई। राजे 2 जनवरी, 2009 से 25 फरवरी, 2010 तक राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहीं।
  • श्रीमती राजे ने 8 फरवरी, 2013 को दूसरी बार राजस्थान भाजपा की प्रदेशाध्यक्ष का कार्यभार संभाला। राजे ने सुराज संकल्प यात्रा के माध्यम से पूरे प्रदेश में लगभग 14 हजार किलोमीटर की यात्रा का जनता से सीधा संवाद स्थापित किया तथा उनकी कठिनाइयों और समस्याओं के बारे में जानकारी हासिल की। राजे 14वीं राजस्थान विधानसभा के लिए झालावाड़ के झालरापाटन क्षेत्र से फिर निर्वाचित हुई हैं।
  • श्रीमती वसुन्धरा राजे 9 दिसम्बर, 2013 को सर्वसम्मति से भारतीय जनता पार्टी विधायक दल की नेता निर्वाचित हुई। आपने 13 दिसम्बर, 2013 को मुख्यमंत्री के रूप में राज्य शासन की दूसरी बार बागडोर संभाली है और 17 दिसम्बर, 2018 तक पद पर रही।
  • श्रीमती वसुन्धरा राजे के कार्यकाल में निम्नलिखित मुख्य सचिव रहें- 1. आर.के. नैय्यर 2. अनिल वैश्य 3. बी.सी. सामंत 4. राजीव महर्षि 5. सी.एस. राजन 6. ओ.पी. मीना 7. अशोक जैन 8. एन.सी. गोयल 9. डी.वी. गुप्ता
नोट- भारती की प्रथम महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपानली उत्तर प्रदेश में थे।

14. भजन लाल शर्मा
  • निर्वाचन क्षेत्र-सांगानेर (जयपुर ग्रामीण)
  • भरतपुर के रहने वाले दूसरे व्यक्ति मुख्यमंत्री बने (प्रथम व्यक्ति जगन्नाथ पहाड़िया)
  • यह प्रथम बार मुख्यमंत्री व प्रथम बार विधायक बने हैं।
  • भजन लाल शर्मा RSS के कार्यकर्त्ता हैं।
  • मुख्यमंत्री के रूप में 15 दिसम्बर, 2023 को रामनिवास बाग, अल्बर्ट हॉल (जयपुर शहर) के सामने राज्यपाल कलराज मिश्र ने शपथ दिलाई है।
  • यह 16वीं विधानसभा में मुख्यमंत्री व 14वें मुख्यमंत्री हैं।
  • यह एकमात्र मुख्यमंत्री जिन्होंने जन्मदिवस पर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री

  1. टीकाराम पालीवाल : जयनारायण व्यास के मुख्यमंत्री काल में कांग्रेस के टीकाराम पालीवाल 1 नवम्बर, 1952 से 13 नवम्बर, 1954 तक राज्य के उपमुख्यमंत्री रहे। वे राज्य के पहले उपमुख्यमंत्री बने।
  2. हरिशंकर भाभड़ा : भैरोसिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में 4 दिसम्बर, 1993 से 30 नवम्बर, 1998 तक भाभड़ा राज्य के उपमुख्यमंत्री रहे। इनका कार्यकाल सबसे अधिक रहा। ये उपमुख्यमंत्री के अलावा विधानसभा के अध्यक्ष भी रहे।
  3. बनवारी लाल बैरवा : अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री काल में 19 मई, 2002 से 4 दिसम्बर, 2003 तक बैरवा उपमुख्यमंत्री रहे।
  4. कमला बेनीवाल : 2 जनवरी, 2003 से 4 दिसम्बर, 2003 तक कांग्रेस की कमला बेनीवाल, अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री काल में उपमुख्यमंत्री रहीं। इनका कार्यकाल सबसे छोटा रहा।
  5. सचिन पायलट : मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (कांग्रेस) के तीसरे कार्यकाल के दौरान 17 दिसम्बर, 2018 से 14 जुलाई, 2020 तक संचिन पायलट उप-मुख्यमंत्री रहे।
  6. दिया कुमारी : मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के कार्यकाल में 15 दिसम्बर, 2023 को पहली बार उपमुख्यमंत्री बनी है जो विद्याधर नगर से विधायक है।
  7. प्रेम चन्द बैरवा : मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के कार्यकाल में 15 दिसम्बर, 2023 को उपमुख्यमंत्री बने जो दुदु विधानसभा से विधायक है।

विधानसभा अधिकारियों एवं विधायकों के वेतन (1 अप्रैल, 2019)
पदाधिकारी पहले (₹) अब (₹) पदाधिकारी पहले (₹) अब (₹)
मुख्यमंत्री 55,000 75,000 स्पीकर 50,000 70,000
डिप्टी स्पीकर 45,000 65,000 डिप्टी सीएम 10,000 65,000
कैबिनेट मंत्री 45,000 65,000 राज्य मंत्री 42,000 62,000
संसदीय सचिव 40,000 60,000 मुख्य सचेतक 45,000 65,000
उप मुख्यसचेतक 42,000 62,000 नेता प्रतिपक्ष 45,000 65,000
उपमंत्री 40,000 60,000


वर्तमान में कौन, क्या?

16वीं विधानसभा मंत्रिमण्डल
  1. श्री भजन लाल शर्मा, मुख्यमंत्री- 1. कार्मिक विभाग, 2. आबकारी विभाग, 3. गृह विभाग, 4. आयोजना विभाग, 5. सामान्य प्रशासन विभाग, 6. नीति निर्धारण प्रकोष्ठ-मुख्यमंत्री सचिवालय, 7. सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, 8. भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी)
  2. सुश्री दिया कुमारी, उप मुख्यमंत्री- 1. वित्त विभाग, 2. पर्यटन विभाग, 3. कला, साहित्य, संस्कृति और पुरातत्व विभाग, 4. सार्वजनिक निर्माण विभाग, 5. महिला एवं बाल विकास विभाग, 6. बाल अधिकारिता विभाग
  3. डॉ. प्रेमचन्द बैरवा, उप मुख्यमंत्री- 1. तकनीकी शिक्षा विभाग, 2. उच्च शिक्षा विभाग, 3. आयुर्वेद, योग व प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्धा एवं होम्योपैथी (आयुष) विभाग, 4. परिवहन एवं सड़क सुरक्षा विभाग

कैबिनेट मंत्री

  1. श्री किरोड़ी लाल- 1. कृषि एवं उद्यानिकी विभाग, 2. ग्रामीण विकास विभाग, 3. आपदा प्रबंधन, सहायता एवं नागरिक सुरक्षा विभाग, 4. जन अभियोग निराकरण विभाग
  2. श्री गजेन्द्र सिंह - 1. चिकित्सा और स्वास्थ्य विभाग, 2. चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएँ (ईएसआई)
  3. कर्नल राज्यवर्धन राठौड़- 1. उद्योग एवं वाणिज्य विभाग, 2. सूचना, प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग, 3. युवा मामले और खेल विभाग, 4. कौशल, नियोजन एवं उद्यमिता विभाग, 5. सैनिक कल्याण विभाग
  4. श्री मदन दिलावर - 1. विद्यालयी शिक्षा विभाग (स्कूल एजूकेशन), 2. पंचायती राज विभाग, 3. संस्कृत शिक्षा विभाग
  5. श्री कन्हैयालाल- 1. जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग, 2. भू-जल विभाग
  6. श्री जोगाराम पटेल- 1. संसदीय कार्य विभाग, 2. विधि एवं विधिक कार्य विभाग और विधि परामर्शी कार्यालय, 3. न्याय विभाग
  7. श्री सुरेश सिंह रावत- 1. जल संसाधन विभाग, 2. जल संसाधन (आयोजना ) विभाग
  8. श्री अविनाश गहलोत- 1. सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग
  9. श्री सुमित गोदारा- 1. खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग, 2. उपभोक्ता मामले विभाग
  10. श्री जोराराम कुमावत- 1. पशुपालन एवं डेयरी विभाग, 2. गोपालन विभाग, 3. देवस्थान विभाग
  11. श्री बाबूलाल खराड़ी- 1. जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग, 2. गृह रक्षा विभाग
  12. श्री हेमन्त मीणा- 1. राजस्व विभाग, 2. उपनिवेशन विभाग

राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)

  • श्री संजय शर्मा- 1. वन विभाग, 2. पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, 3. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग
  • गौतम कुमार- 1. सहकारिता विभाग, 2. उड्डयन विभाग
  • श्री झाबर सिंह खर्रा- 1. नगरीय विकास विभाग, 2. स्वायत्त शासन विभाग
  • श्री हीरालाल नागर- 1. ऊर्जा विभाग

राज्य मंत्री

  1. श्री ओटा राम देवासी- 1. पंचायती राज विभाग, 2. ग्रामीण विकास विभाग, 3. आपदा प्रबंधन, सहायता एवं नागरिक सुरक्षा विभाग
  2. डॉ. मंजू बाघमार- 1. सार्वजनिक निर्माण विभाग, 2. महिला एवं बाल विकास विभाग, 3. बाल अधिकारिता विभाग
  3. श्री विजय सिंह- 1. राजस्व विभाग, 2. उपनिवेशन विभाग, 3. सैनिक कल्याण विभाग
  4. श्री कृष्ण कुमार (के.के.) विश्नोई- 1. उद्योग एवं वाणिज्य विभाग, 2. युवा मामले और खेल विभाग, 3. कौशल, नियोजन एवं उद्यमिता विभाग, 4. नीति निर्धारण विभाग
  5. श्री जवाहरसिंह बेढम- 1. गृह विभाग, 2. गोपालन विभाग, 3. पशुपालन एवं डेयरी विभाग, 4. मत्स्य विभाग
नोट- उपरोक्त के अतिरिक्त अन्य अवितरित विभागों का कार्य मुख्यमंत्री स्वयं देखेंगे।

केन्द्रीय मंत्रिमंडल में राजस्थान

केन्द्रीय मंत्रिमंडल में राजस्थान के 4 मंत्री है-
  • श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत- कला, संस्कृति और पर्यटन मंत्रालय
  • अर्जुनराम मेघवाल- विधि एवं न्याय मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री
  • भूपेन्द्र यादव- वन एवं पर्यावरण मंत्रालय
  • भागीरथ चौधरी- कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री
राज्य में मुख्यमंत्री वास्तविक कार्यपालक होता है इसलिए मुख्यमंत्री के दायित्व अत्यधिक बढ़ जाते हैं अतः उनकी सहायता के लिए योग्य व कुशल प्रशासकों का समूह होना आवश्यक है। अतः राज्य में मुख्यमंत्री को सचिवीय या प्रशासनिक सहायता प्रदान करने के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय (सचिवालय) की स्थापना 1951 में की गई। इसका प्रमुख कार्य मुख्यमंत्री द्वारा दिये गये निर्देशों का पालन करना और यह देखना कि संभाग व जिले का प्रशासन सही तरीके से चल रहा है या नहीं। मुख्यमंत्री का सचिवालय या कार्यालय मुख्यमंत्री के प्रति उत्तरदायी होता है। यही कार्यालय मुख्यमंत्री की यात्राओं, पत्राचार, सुरक्षा संबंधी मामलों के लिए जिम्मेदार होता है। मुख्यमंत्री कार्यालय मुख्यमंत्री द्वारा दिये गये आश्वासनों को पूरा करने, लोगों की शिकायतों को दूर करने और मुख्यमंत्री कोष का प्रयोग करने जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य करता है।

संगठन

मुख्यमंत्री कार्यालय राज्य प्रशासन का एक महत्त्वपूर्ण अंग होता है। मुख्यमंत्री कार्यालय मुख्यमंत्री को राजनीतिक व प्रशासनिक दोनों तरह की सहायता उपलब्ध करवाता है। कुछ अधिकारियों की नियुक्ति ऐसे कार्यों को करने व समन्वय स्थापित करने के लिए की जाती है।
मुख्यमंत्री कार्यालय में एक प्रमुख सचिव होता है जिसे मुख्यमंत्री का सचिव भी कहते हैं। यह भारतीय प्रशासनिक सेवा का वरिष्ठ सदस्य होता है। इस सचिव का पद अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होता है। 1988 से पूर्व सचिव के अधीन उपसचिव (3), विशेषाधिकारी (3), प्रेस सलाहकार, उपनिदेशक, सहायक सचिव, पुलिस अधीक्षक (सतर्कता), तथा अन्य मंत्रालियक कर्मचारी होते हैं। दिसम्बर, 1998 में अशोक गहलोत सरकार द्वारा मुख्यमंत्री कार्यालय में संशोधन करते हुए 2 सचिवों की नियुक्ति की गई। जिसे मुख्यमंत्री सचिव प्रथम व मुख्यमंत्री सचिव द्वितीय नाम दिया गया।
इन दोनों सचिवों के अधीन दो-दो उप-सचिव और अन्य कार्मिक नियुक्ति किये गये हैं।

मुख्यमंत्री के कार्यालय के प्रमुख कार्य

यह कार्यालय मुख्यमंत्री के आदेशों-निर्देशों की पालना करता है और मुख्यमंत्री द्वारा आमजन व राजनेताओं को दिये गये आश्वासनों की पूर्ति भी करता है।
इस विभाग के कार्य निम्नलिखित हैं-
  • मुख्यमंत्री को प्रशासनिक व राजनीतिक सूचनाएँ और तथ्य उपलब्ध कराना, और कई महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ देना।
  • मंत्रिमण्डल द्वारा लिये गये पूर्व निर्णयों को लागू किया जाना, सुनिश्चित करवाना।
  • मुख्यमंत्री से संबंधित फाइलों व दस्तावेजों को सुरक्षित रखना व उनका निस्तारण करना।
  • मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणाओं की क्रियान्विति करवाना।
  • मुख्यमंत्री के भ्रमण या दौरों के कार्यक्रम व व्यवस्था सुनिश्चित करना।
  • मुख्यमंत्री सहायता कोष का प्रबन्धन करना, जिसमें अकाल राहत व बाढ़ सामान्य सहायता, चिकित्सालय सहायता, रक्षा सेवा सहायता आदि का प्रबन्ध करना।
  • जनता की शिकायतों की छंटनी करना और उन पर कार्यवाही करते हुए सम्बन्धित विभागों को भेजना।
  • विभिन्न विभागों, संभागों तथा जिलों को दिशा-निर्देश जारी करना।
  • केन्द्र सरकार तथा अन्य राज्यों से पत्र-व्यवहार करना।
  • यदि कोई विभाग मुख्यमंत्री के अधीन हो तो उनके कार्य निष्पादित करवाने में सहायता व परामर्श देना।
  • मुख्यमंत्री से मिलने वाले राजनेताओं और आमजन के लिए समय व बैठकें तय करना।
  • मुख्यमंत्री के पास विचारार्थ आने वाली फाइलों पर अनौपचारिक टिप्पणियाँ अंकित करना।
  • प्रवासी राजस्थानियों और भारतीयों के संदर्भ में मामलों का निस्तारण करना।
  • विकास कार्यों तथा अन्य कल्याणकारी योजनाओं की निगरानी करना।
  • मुख्यमंत्री द्वारा किये गये वादों का निरीक्षण कर पूरा करवाया जाना।
  • मुख्यमंत्री द्वारा सौंपे गए अन्य कार्यों को करना।

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

Education, GK & Spiritual Content Creator

Kartik Budholiya is an education content creator with a background in Biological Sciences (B.Sc. & M.Sc.), a former UPSC aspirant, and a learner of the Bhagavad Gita. He creates educational content that blends spiritual understanding, general knowledge, and clear explanations for students and self-learners across different platforms.