राजस्थान में पर्यटन ऐतिहासिक स्थल
इस लेख में राजस्थान के सभी 33+ जिलों के प्रमुख पर्यटन केंद्रों, ऐतिहासिक स्मारकों और सांस्कृतिक धरोहरों का व्यापक विवरण दिया गया है।
- भारत में आने वाले हर तीसरा पर्यटक राजस्थान आता है।
- राजस्थान में सर्वाधिक पर्यटक इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली व अमेरिका से आते हैं।
- राजस्थान में सर्वाधिक देशी पर्यटक अजमेर व सर्वाधिक विदेशी पर्यटक जयपुर आते है।
- दुर्गों में सर्वाधिक विदेशी पर्यटक आमेर दुर्ग में आते हैं।
- राजस्थान की स्थापत्य कला, चित्रकला, तीर्थकला, लोकजीवन, खानपान पर्यटकों को आकर्षित करते है।
- रामदेवरा, खाटूश्यामजी, अजमेर, उदयपुर, नाथद्वारा, माउण्ट आबू, रणकपुर, भरतपुर, ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह आदि राष्ट्रीय महत्व के पर्यटन स्थल है।
- राजस्थान में अक्टूबर से जनवरी सर्वाधिक विदेशी पर्यटक आते हैं।
- राजस्थान देश का प्रथम राज्य है जिसने 1989 में मोहम्मद युनुस समिति की सिफारिशों पर पर्यटन को उद्योग का दर्जा दिया।
- केरल की तर्ज पर राजस्थान के 7 स्थानों- पुष्कर, नाथद्वारा, जैसलमेर, जयपुर, बीकानेर, माउण्ट आबू व भरतपुर में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करवाते हैं।
- भरतपुर में पंचकर्म (अनुवासवस्ति, वामन, निरूध्वस्ति, नस्य, विरेचन) चिकित्सा केन्द्र स्थापित किया गया। जो प्राकृतिक चिकित्सा व्यवस्था करता है।
- पधारो म्हारे देश, जाने क्या दिख जाए राजस्थान पर्यटन के ‘लोगो’ है।
राज्य पक्षी- राजस्थान का राज्य पक्षी गोड़ावन है जिसे 1981 को राज्य पक्षी का दर्जा दिया गया। इसे माल मोरड़ी, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, गुधानमेर, हुकना, सोहन चिड़िया कहा जाता है। कोरियोटिस नाइग्रोसेप इसका वैज्ञानिक नाम है। यह अण्डे देने के लिए जमीन पर घोंसला बनाता है। गोड़ावन का भोजन तारामीरा है। शोकलिया (भिनाय अजमेर), मरूउद्यान (जैसलमेर), सोरसन (बारां) में गोड़ावन पाया जाता है।
नोट- राष्ट्रीय पक्षी मोर है।
राज्य पशु- राजस्थान का राज्य पशु चिंकारा है। यह एक छोटा हिरण (एन्टीलोप) कहते है जिसका वैज्ञानिक नाम गजेला है। 22 मई, 1981 ई. में इसे राज्य पशु घोषित किया गया।
नोट- राष्ट्रीय पशु बाघ है।
राज्य विरासत पशु - घरेलू पशु, पशुधन, विरासत पशु ऊँट को माना जाता है। 19 सितम्बर 2014 को इसे पशुधन राज्य पशु घोषित किया गया। इसे रेगिस्तान का जहाज कहा जाता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे ‘कैमेलस ड्रेमेटेरियस’ कहा जाता है।
नोट - राष्ट्रीय विरासत पशु हाथी है।
राज्य पुष्प- रोहिड़ा राजस्थान का राज्य पुष्प है जिसे 31 अक्टूबर, 1983 ई. में राज्य पुष्प घोषित किया गया। इसे राजस्थान का सांगवान, मरूस्थल का सांगवान, राजस्थान की मरूशोभा, मारवाड़ टीक कहा जाता है। टीकोमेला एण्डूलेला इसका वैज्ञानिक नाम है।
नोट- राष्ट्रीय पुष्प कमल का फूल है।
राज्य वृक्ष - राजस्थान का वृक्ष खेजड़ी है जिसे 31 अक्टूबर, 1983 ई. में राज्य वृक्ष घोषित किया गया। इसे राजस्थान का कल्पवृक्ष, राजस्थान का कल्पतरू, राजस्थान का गौरव, जांटी, शमी, सीमलों आदि नामों से भी जाना जाता है। प्रोसोपिस सिनेरेरिया इसका वैज्ञानिक नाम है। 1988 ई. में खेजड़ी पर 60 पैसे की डाक टिकट जारी हुई। 12 सितम्बर 1978 ई. से प्रतिवर्ष 12 सितम्बर को खेजड़ी दिवस मनाया जाता है। विजयादशमी पर खेजड़ी की पूजा होती है। गोगाजी, शीतला माता का आराध्य स्थान खेजड़ी के नीचे होता है।
नोट- राष्ट्रीय वृक्ष बड़ है।
राज्य खेल- राजस्थान का राज्य खेल बास्केटबॉल है, जिसे 1948 ई. में राज्य खेल घोषित किया गया ।
नोट- राष्ट्रीय खेल हॉकी है।
राज्य गीत - ‘‘केसरिया बालम पधारों नी म्हारो देश’’ राजस्थान का राज्य गीत है जिसे सर्वप्रथम उदयपुर की मांगीबाई ने तथा सर्वाधिक बार बीकानेर की अल्ला जिल्लाह बाई ने गाया था। यह एक विरह गीत है।
नोट- राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम् है जिसे बंकीमचन्द्र चटर्जी ने लिखा था।
राष्ट्रीय गान जन-गण-मन है जिसे रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा था।
राजस्थान दिवस - राजस्थान दिवस 30 मार्च को मनाया जाता है क्योंकि 30 मार्च, 1949 ई. एकीकरण में चार बड़ी रियासतें शामिल हुई थी।
- राज्य कवि - सूर्यमल्ल मिश्रण
- राज्य नृत्य - घूमर
- राज्य की राजभाषा - हिन्दी
- राज्य का लोकवाद्य - अलगोजा
राज्य में 1950 से पूर्व के प्राचीन एंव ऐतिहासिक दुर्ग, हवेली, महलों का जीर्णोद्धार कर हैरिटेज होटल बनाये जा रहे है। वर्तमान में राजस्थान में 43 हैरिटेज होटल है।
- राजस्थान में 10 पर्यटन संभाग है- जयपुर, जोधपुर, अजमेर, कोटा, भरतपुर, सीकर, बाँसवाड़ा, पाली, बीकानेर, उदयपुर।
- बुद्धा सर्किट- राजस्थान में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये जयपुर व झालावाड़ के बौद्ध पुरावशेष स्थलों को मिलाकर यह सर्किट बनाया गया है।
- स्वर्णिम त्रिभुज/गोल्डन ट्रायंगल - पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए जयपुर, आगरा, दिल्ली को मिलाकर यह त्रिभुज बनाया गया।
- मरु त्रिकोण- जैसलमेर-बीकानेर-जोधपुर-बाड़मेर
2006 राज्य सरकार ने होटल नीति की घोषणा की।
पर्यटन नीतियाँ
- 1. 2001, 2. 2007, 3. 2015, 4. 2020 (नवीनतम्)
- 1 अगस्त 2000 ई. देश की पहली पर्यटन पुलिस का गठन जयपुर में किया गया।
- जयपुर को विश्व स्तरीय हेरिटेज शहर का दर्जा दिया गया।
- फ्रांस से भारत में सर्वाधिक पर्यटक आते हैं।
- राजस्थान में सर्वाधिक राजस्व जुटाने वाला पर्यटन स्थल आमेर महल, जयपुर है।
- राज्य पेइंग गेस्ट योजना 27 दिसम्बर, 1991 ई. को प्रारम्भ की गई।
मेवाड़ कॉम्पलेक्स योजना
19 जनवरी, 1997 ई. को महाराणा प्रताप की 400वीं पुण्यतिथि पर महाराणा प्रताप से संबंधित गोगुन्दा, कुम्भलगढ़, हल्दीघाटी, चावंड आदि महत्वपूर्ण स्थलों को मिलाकर यह योजना प्रारम्भ की गई।
पैलेस ऑन व्हील्स
पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए भारतीय रेलवे व राजस्थान पर्यटन विकास निगम (RTDC) के संयुक्त उपक्रम से 1982 में ‘पैलेस ऑन व्हील्स’ के नाम से शाही रेलगाड़ी प्रारम्भ की गई।
रॉयल राजस्थान ऑन व्हील्स
पैलेस ऑन व्हील्स की तर्ज पर जनवरी, 2010 में रॉयल राजस्थान ऑन व्हील्स दूसरी रेलगाड़ी प्रारम्भ की गई।
राजस्थान में पर्यटन विकास हेतु राजस्थान ‘पर्यटन विकास निगम’ व पर्यटन विभाग कार्य कर रहे हैं।
राजस्थान पर्यटन विभाग
राजस्थान में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए 1956 में राजस्थान सरकार ने नोडल एजेंसी की स्थापना की जिसका कार्य पर्यटन का विकास व व्यवस्था करना है।
राजीव गाँधी पर्यटन विकास मिशन
राज्य में पर्यटन विकास संबंधी नीतियों को प्रभावी ढंग से संचालित करने हेतु 2001 में इस मिशन की स्थापना की गई।
राजस्थान राज्य होटल निगम लिमिटेड (RSHCL)
पर्यटकों को आवास एवं अन्य सुविधाएँ उपलब्ध करवाने हेतु 1965 में RSHCL की स्थापना की गई।
राजस्थान इंस्टीट्यूट ऑफ टूरिज्म एण्ड ट्रेवल मैनेजमेंट (RITTMAN)
राज्य में पर्यटन से मानव संसाधन का विकास करने हेतु 1996 में RITTMAN संस्था की स्थापना की गई।
राजस्थान पर्यटक विकास निगम (RTDC)
पर्यटकों को भोजन, आवास आदि सुविधाएँ उपलब्ध करवाने हेतु 1 अप्रैल, 1979 में RTDC की स्थापना की गई।
राज्य पर्यटन सलाहकार मण्डल
राजस्थान सरकार को सलाह देने हेतु 2000 में इस मण्डल की स्थापना की गई।
अजमेर (RJ-01)
अजमेर की स्थापना 7वीं सदी में अजयपाल चौहान द्वारा मानी जाती है लेकिन प्रमाणित रूप से अजमेर 1113 ई. में अजयराज चौहान ने बसाया था। अजमेर को राजस्थान का हृदय कहते हैं। इसे भारत का मक्का भी कहते हैं।
- पृथ्वीराज स्मारक- यह पृथ्वीराज चौहान का स्मारक है जिसका निर्माण 13 जनवरी 1996 ई. में नगर सुधार न्यास ने करवाया। यह अजमेर-पुष्कर रास्ते की सर्पीलाकार पहाड़ी पर स्थित है।
- आनासागर झील- इस झील का निर्माण 12वीं सदी में अर्णोराज चौहान ने करवाया था। माना जाता है कि इस झील का निर्माण तुर्की सेना के खून से लाल हुई भूमि को धोने के लिये करवाया गया।
- सोनीजी की नसियाँ- प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ/ऋषभदेव को समर्पित यह एक जैन मंदिर है जिसका निर्माण सेठ मूलचंद सोनी ने करवाया।
- अढ़ाई दिन का झोंपड़ा- 1153 ई. में बीसलदेव चौहान ने एक संस्कृत पाठशाला का निर्माण करवाया। जिसे 1194 ई. कुतुबुद्दीन ऐबक ने तोड़कर एक मस्जिद बना दी जिसे राजस्थान की प्रथम मस्जिद माना जाता है। इसे 16 खम्भों का महल भी कहते है। यहां पंजाब शाह पीर का अढ़ाई दिन का उर्स (मेला) भरता है जिस कारण इसे अढ़ाई दिन का झोंपड़ा कहते हैं।
- पुष्कर- पुष्कर को तीर्थस्थल के नाम से जाना जाता है। कार्तिक पूर्णिमा को यहाँ मेला भरता है जिसे रंगीन मेला कहा जाता है। पुष्कर झील में दीपदान का प्रचलन है। यहाँ भारत का एकमात्र ब्रह्मा मंदिर है। माना जाता है कि यहाँ स्थित गया कुण्ड पर भगवान राम ने अपने पिता दशरथ का पिण्डदान किया था। गुरू विश्वामित्र ने भी यहाँ तपस्या की थी। पुष्कर झील के 52 घाट हैं।
- ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह- दरगाह का निर्माण प्रारम्भ इल्तुतमिश ने व पूर्ण हुमायूँ ने किया था। यहाँ रज्जब माह की 1-6 तारीख मेला भरता है। दरगाह में दो बड़ी देग (कढ़ाई) है जिसमें बड़ी देग अकबर ने व छोटी जहाँगीर ने दी थी।
- हैप्पी वैली
- फॉय सागर झील- झील का निर्माण बांडी नदी के जल को रोककर 1891-92 ई. अकाल राहत कार्यों के दौरान करवाया गया।
- आँतेड की छतरियाँ- ये दिगम्बर संप्रदाय की छतरियाँ हैं।
- पंचकुण्ड-पुष्कर- यहाँ पंचकुण्ड कृष्ण अभयारण्य/सुधाबाय अभयारण्य स्थित है। माना जाता है कि यहाँ पाण्डवों ने अपना अज्ञातवास का कुछ समय बिताया था।
अलवर (RJ-02)
राजस्थान का सिंहद्वार की स्थापना प्रतापसिंह (18वीं सदी)
- भानगढ़- भूतों के भानगढ़ के नाम से यह किला जाना जाता है। (दुर्गों के पार्ट में देखें)
- सरिस्का- जयपुर-अलवर मार्ग पर स्थित सरिस्का अभयारण्य प्रकृति व जीव प्रेमियों के आकर्षण का केन्द्र है। अभयारण्य में महाराजा जयसिंह ने ड्यूक ऑफ एडिनबरा के आगमन पर राजभवन का निर्माण करवाया जो वर्तमान होटल सरिस्का पैलेस के नाम से संचालित है। यहाँ राजस्थान पर्यटन विकास निगम ने पर्यटकों के ठहरने के लिए 'होटल टाइगर डेन' की सुविधा कर रखी है।
- सिलीसेढ़ झील- 1814 ई. में महाराजा विनयसिंह ने अपनी रानी शिला देवी के लिये झील व 6 मंजिला महल का निर्माण करवाया। इस महल में वर्तमान में होटल संचालित है।
- मूसी महारानी की छतरी- ये 80 खम्भों की छतरी है जिसका निर्माण विनयसिंह ने करवाया।
- पांडुपोल- माना जाता है कि अज्ञातवास के दौरान कौरवों ने पांडवों को यहाँ घेर लिया था तब भीम ने पहाड़ में गदा मारकर रास्ता बनाया था। यहाँ हनुमानजी की शयन मुद्रा में मूर्ति है।
- नौगजा जैन मंदिर- यह जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की 9 गज (27 फीट) ऊँची प्रतिमा है।
- भर्तृहरि- यहाँ उज्जैन के राजा भर्तृहरि ने तपस्या की थी। यहाँ कनफटे नाथों की तीर्थस्थली है जहां भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को मेला भरता है।
- विजय मंदिर पैलेस- यह सीतारामजी का मंदिर है जिसका निर्माण 1918 में जयसिंह ने करवाया।
- ईटाराणा की कोठी -अलवर- बारीक व सुन्दर जाली, झरोखे युक्त कोठी का निर्माण जयसिंह ने करवाया।
- जैन मंदिर -खैरथल- यह जैन धर्म के 8वें तीर्थंकर चन्द्रप्रभु का मंदिर है।
बाँसवाड़ा (RJ-03)
- स्थापना - महारावल जगमालसिंह।
- उपनाम- सौ द्वीपों का शहर।
- अर्थूना- अर्थूना वागड़ा के परमारों की राजधानी थी। यहाँ विजयराज परमार ने हनुमान जी की विशाल मूर्ति स्थापित करवाई थी। अर्थूना का प्राचीन नाम उत्थूनक था।
- सूर्यमंदिर-तलवाड़ा- यह मंदिर 11वीं सदी में बना था।
- त्रिपुरा मंदिर-तलवाड़ा- त्रिपुरा सुन्दरी पांचाल जाति की कुलदेवी है। त्रिपुरा सुन्दरी सिंह पर सवार अष्टभुजा वाली है।
- केलापानी- माना जाता है कि यहाँ पांडवों ने अपना वनवास बिताया था।
- ब्रह्माजी का मंदिर- (छींछ)- इस मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में हुआ था।
- रणछोड़राय मंदिर- (धूणी)- यहाँ प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ल एकादशी को मेला भरता है।
- ऋषभदेव मंदिर- कालिंजरा
- घोटिया अम्बा माता- बाँसवाड़ा
बाड़मेर (RJ-04)
- किराडू- किराडू का प्राचीन नाम 'किरातकूप' था जो परमारों की राजधानी था। यहाँ गुर्जर प्रतिहार शैली में 5 मंदिर है जिनमें 4 भगवान शिव को व एक भगवान विष्णु को समर्पित है।
- उडूकासमेर- शिव- भाद्रपद शुक्ल द्वितीया को यहाँ रामदेवजी का जन्म हुआ था।
- खेड़िया बाबा- रेबारियों के आराध्य देव हैं।
भरतपुर (RJ-05)
- स्थापना 1733 ई. महाराजा सूरजमल जाट ने की।
- राजस्थान का पूर्वी प्रवेश द्वार/राजस्थान का प्रवेश द्वार।
- केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान- यह उद्यान घना पक्षी विहार के नाम से प्रसिद्ध है जहां शीतकाल में चीन, मंगोलिया, रूस, यूरोप से पक्षी आते हैं।
- लोहागढ़- दुर्गों में देखें।
- डीग के जलमहल- महलों में देखें।
- खानवा (भरतपुर)- 17 मार्च, 1527 ई. महाराजा सांगा व बाबर के मध्य महासंग्राम हुआ था।
- लक्ष्मण मंदिर- इस मंदिर का निर्माण महाराजा बलदेवसिंह ने करवाया।
- गंगा मंदिर- इस मंदिर का निर्माण बलवंतसिंह ने करवाया।
- उषा मंदिर- इस मंदिर का निर्माण 956 ई. में रानी चित्रलेखा ने करवाया था।
- जामा मस्जिद (बयाना, भरतपुर)- इसका निर्माण बलवंत सिंह ने करवाया था।
- केवलादेव घना पक्षी अभयारण्य- 1982 में इस अभयारण्य को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया। 1985 में इसे यूनेस्को की प्राकृतिक धरोहर सूची में शामिल किया गया। यह अभयारण्य साइबेरियन सारस के लिये प्रसिद्ध है।
- अकबर के मृगया महल- रूपवास- अकबर यहाँ आखेट खेलने आये थे।
भीलवाड़ा (RJ-06)
- भीलवाड़ा को राजस्थान का मैनचेस्टर व टेक्सटाइल सिटी के नाम से जाना जाता है।
- सवाईभोज मंदिर (आसीन्द, भीलवाड़ा)- सवाई भोज गुर्जर जाति के आराध्य देव थे। ये देवनारायण जी के पिता थे। प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष में विशाल पशु मेला भरता है।
- शाहपुरा-शाहपुरा स्वतंत्रता सेनानी केसरीसिंह बारहठ, जोरावरसिंह व प्रतापसिंह बारहठ की जन्मस्थली है। शाहपुरा में रामस्नेही संप्रदाय की प्रधान पीठ है।
- माण्डलगढ़ (भीलवाड़ा)- राणा सांगा की छतरी माण्डलगढ़ में है।
- माण्डल-जगन्नाथ कच्छवाह की 32 खम्भों की छतरी यहाँ है।
- नीलकण्ठेश्वर महादेव- मेनाल
- मंदाकिनी मंदिर- बिजोलिया-(भीलवाड़ा)
- यहां मंदाकिनी कुण्ड व महाकालेश्वर, हजारीश्वर, उण्डेश्वर मंदिर स्थित है।
- तिलस्वा महादेव मंदिर- बागोर (भीलवाड़ा)- राजस्थान का सबसे लम्बा किसान आन्दोलन यहीं चला था।
- गाडोली महादेव- जहाजपुर- यह पूरे भारत का एकमात्र मन्दिर है जिसमें भगवान शिव को सम्पूर्ण वस्त्र पहनाए जाते हैं।
बीकानेर (RJ-07)
- बीकानेर का प्राचीन नाम राती घाटी था।
- महाभारत काल में इस क्षेत्र को जांगलप्रदेश कहते थे।
- बीकानेर की स्थापना राव जोधा के पाँचवें पुत्र राव बीका ने अपने चाचा कांधल के साथ मिलकर 1488 ई. में की थी। जिसमें नरहा जाट ने भी सहयोग किया था।
- देशनोक- यहाँ करणी माता का मंदिर है।
- मुकाम- नोखा (बीकानेर)- यहाँ विश्नोई संप्रदाय के संस्थापक जाम्भोजी ने समाधि ली थी। जहाँ प्रतिवर्ष फाल्गुन व आश्विन अमावस्या को मेला भरता है।
- कोलायत- यहाँ सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि का कार्तिक पूर्णिमा को मेला भरता है।
- गजनेर- यहाँ स्थित झील में अप्रवासी पक्षियों का आना-जाना रहता है। यहाँ वन्य जीव अभयारण्य, झील, महल स्थित है।
- देवीकुण्ड सागर- यहाँ बीकानेर राजपरिवार की छतरियाँ हैं।
- जोहड़बीड़- यहाँ राष्ट्रीय ऊँट अनुसंधान केन्द्र है।
- भांडासर जैन मंदिर- पाँचवे तीर्थंकर सुमतिनाथ का मंदिर। इस मंदिर की नींव में घी का प्रयोग किया गया।
- विक्टोरिया क्लब का कर्जन बाग- महाराजा गंगासिंह ने स्थापना की जिसका उद्घाटन 24 नवम्बर, 1902 को लार्ड कर्जन ने किया।
- रसिक शिरोमणि मंदिर- इस मंदिर का निर्माण सरदारसिंह ने किया।
बूँदी (RJ-08)
- बूँदा मीणा के नाम पर इसका नाम बूँदी पड़ा।
- बूँदा मीणा के पौत्र जैता को 1241 ई. में हाड़ा देवा ने हराकर चौहान शाखा की स्थापना की।
- 84 खम्भों की छतरी- छतरी का निर्माण राव राजा अनिरूद्ध सिंह के भाई देवा ने करवाया था।
- केशोरायपाटन- माना जाता है कि इसका प्राचीन नाम रन्तिदेव पाटन था जिसकी स्थापना राजा रंतिदेव ने की थी। यह स्थान चम्बल नदी के तट पर स्थित है। यहाँ विष्णु मंदिर/केशवराय जी मंदिर बना है जिसकी चर्चा वायु पुराण, स्कन्द पुराण, पद्म पुराण में भी हुई है।
- नगलसागर झील- झील का निर्माण महाराजा उम्मेदसिंह ने करवाया। विष्णु सिंह की रानी सुंदर शोभा ने झील के किनारे सुन्दर विलास महल का निर्माण करवाया।
- क्षारबाग- यहाँ बूँदी शासकों का श्मशान है।
- गरदड़ा (बूँदी)- यहाँ प्राचीन सभ्यता स्थल है। जहाँ से विश्व के प्राचीनतम शैल चित्र मिले है जिसे बर्ड राइडर रॉक पेंटिंग कहते है।
- बाबा मीर साहब की दरगाह- बूँदी
चित्तौड़गढ़ (RJ-09)
- सांवरियाजी मंदिर- मण्डफिया गाँव-अफीम का देवता कहते हैं।
- मातृकुण्डिया-राश्मी- यह तीर्थस्थल है जो चन्द्रभगा नदी के किनारे स्थित है। इसे राजस्थान का हरिद्वार कहते हैं।
- नौगजा पीर की कब्र- चित्तौड़गढ़ दुर्ग।
- नगरी/मध्यमिका- बेड़च नदी के किनारे जहां से शिवी जनपद के अवशेष मिले है।
- बाड़ोली शिव मंदिर- भैंसरोड़गढ़-यह मंदिर चंबल व बामनी नदी के किनारे है। यह उत्तर गुप्तकालीन मंदिर है जिसका निर्माण परमार राजा दून ने करवाया था। इस मंदिर को प्रकाश में लाने का काम 1821 ई. में कर्नल जेम्स टॉड ने किया था।
चूरू (RJ-10)
- गोगाजी का मंदिर- ददरेवा गाँव (राजगढ़,चूरू)-यहाँ गोगाजी का जन्म हुआ था। यहाँ स्थित मंदिर को शीषमेढ़ी के नाम से जाना जाता है।
- साहवा का गुरूद्वारा- साहवा (तारानगर,चूरू)
- सालासर बालाजी- सुजानगढ़, चूरू-यहाँ स्थित हनुमानजी की मूर्ति एकमात्र दाढ़ी-मूंछ वाली है।
- मालजी का कमरा- चूरू-इसका निर्माण वि.स. 1974-82 सेठ मालचंद कोठारी ने करवाया था।
- तिरूपति बालाजी मंदिर- सुजानगढ़-यहाँ वेंकटेश्वर मंदिर है जिसका निर्माण द्रविड़ शैली में हुआ है।
- दूधवाखारा (चूरू)- यहाँ 1944 में हनुमानसिंह के नेतृत्व में किसान आन्दोलन हुआ था।
- तालछापर अभयारण्य- सुजानगढ़-यह अभयारण्य काले हिरणों की शरणस्थली कहलाता है।
- धर्मस्तूप-(चूरू)- लाल पत्थर से निर्मित होने के कारण इसे लाल घण्टाघर भी कहते हैं। इस स्तूप पर सभी धर्मों के देवी-देवताओं की मूर्तियाँ लगी है जिस कारण इसे धर्मस्तूप कहते हैं। यहाँ 26 जनवरी 1930 ई. को तिरंगा फहराया गया।
धौलपुर (RJ-11)
- धौलपुर की स्थापना धवलदेव तोमर ने की थी।
- मचकुण्ड- तीर्थों का भांजा के नाम से प्रसिद्ध यह स्थान तीर्थस्थल है जहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल षष्ठी मेला भरता है। माना जाता है कि 1662 ई. में सिक्ख गुरू हरगोविन्द ग्वालियर से आते समय यहाँ रूके थे जिन्होंने तलवार के एक ही वार से शेर का शिकार किया था जिस कारण यहां शेर शिकार गुरूद्वारा बना है।
- घण्टाघर- इसका निर्माण 1880 ई. में राजा निहालसिंह ने प्रारम्भ किया जिस कारण इसे 'निहाल टावर' भी कहते है। यह टावर आठ मंजिला है।
डूंगरपुर (RJ-12)
- गलियाकोट- यहाँ दाऊदी बोहरा संप्रदाय के पीर सैयद फखरूद्दीन की मजार स्थित है।
- बेणेश्वर धाम- सोम, माही, जाखम के त्रिवेणी संगम पर स्थित यह स्थान आदिवासियों का कुम्भ/वागड़ का पुष्कर/वागड़ का कुम्भ के नाम से जाना जाता है। यहाँ माघ पूर्णिमा को मेला भरता है।
- गैप सागर झील- इस झील का निर्माण महारावल गोपीनाथ ने करवाया। महाराजा उदयसिंह ने झील के किनारे विजय राज राजेश्वर मंदिर व उदयविलास महल का निर्माण करवाया।
- राज राजेश्वर मंदिर- गैपसागर (डूंगरपुर)- इस मंदिर का निर्माण विजयसिंह ने करवाया था।
- गवरी बाई का मंदिर- इसे वागड़ की मीरा कहते हैं। मंदिर का निर्माण शिवसिंह ने करवाया।
- एक थम्बिया महल- गैवसागर झील (डूंगरपुर)- इस महल का निर्माण महारावल शिवसिंह ने अपनी माता ज्ञानकुंवरी की स्मृति में करवाया।
श्रीगंगानगर (RJ-13)
- पम्पाराम का डेरा- यहाँ फाल्गुन में मेला भरता है।
- बुड्ढा जोहड़ गुरूद्वारा (रायसिंहनगर) - इस गुरूद्वारा का निर्माण 1954 ई. में संत बाबा फतेहसिंह के निर्देशन में हुआ। यहाँ श्रावण अमावस्या को मेला भरता है।
जयपुर (RJ-14)
सवाई जयसिंह 18 नवम्बर 1727 ई. में जयपुर की स्थापना की थी जिसका वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य था। जयपुर को नो चोकड़ी में बसाया गया जिसकी सड़कें समकोण है। जयपुर की जानकारी बुद्ध विलास ग्रंथ में मिलती है। आधुनिक जयपुर का निर्माता मिर्जा इस्माइल था। जयपुर को गुलाबी नगरी/पिंक सिटी/भारत का पेरिस कहते हैं।
- हवामहल- राजस्थान का एयर दुर्ग नाम से प्रसिद्ध हवामहल का निर्माण 1799 ई. में सवाई प्रतापसिंह ने लालचन्द की देखरेख में करवाया जिसमें पाँच मंजिल है जो निम्न है- शरद मंदिर, रतन मंदिर, विचित्र मंदिर, प्रकाश मंदिर, हवा मंदिर।
- जंतर-मंतर वेधशाला- सवाई जयसिंह ने भारत में पाँच वेधशालाओं (दिल्ली, मथुरा, उज्जैन, वाराणसी, जयपुर) का निर्माण करवाया जिनमें दिल्ली की वेधशाला सबसे प्राचीन व जयपुर की सबसे बड़ी है। जयपुर वेधशाला का नाम जीज-ए-मुहम्मदशाही रखा गया। यहाँ स्थित सम्राट घड़ी एशिया की सबसे बड़ी सौर घड़ी है। जयप्रकाश यंत्र व रामयंत्र अन्य यंत्र हैं।
- गोविन्ददेवजी मंदिर- यहाँ गौड़ीय संप्रदाय की प्रधान पीठ है। गोविन्ददेवजी को जयपुर का वास्तविक शासक माना जाता है।
नोट- एकलिंग जी को मेवाड़ का वास्तविक शासक माना जाता है।
- गलता तीर्थ- यहाँ गालव ऋषि का आश्रम था। यहाँ रामानन्दी संप्रदाय की प्रधान पीठ है।
- पदमप्रभु मंदिर- पदमपुरा बाड़ा-यहाँ 1945 में विशाल जैन मंदिर की स्थापना की गई थी।
- गैटोर की छतरियाँ- कच्छवाह वंश का शमशान घाट।
- ईसरलाट/सरगासूली- सिटी पैलेस में ईश्वरसिंह ने बनवाया।
- कनक वृन्दावन मंदिर- इस मंदिर का निर्माण सवाई जयसिंह ने जलमहलों के निकट करवाया।
- हाथी गाँव - जयपुर
जैसलमेर (RJ-15)
- जैसलमेर की स्थापना 1155 ई. में जैसलदेव भाटी ने की थी।
- इसे स्वर्णनगरी (गोल्डन सिटी) व म्यूजियम सिटी के नाम से जाना जाता है।
- रामदेवरा - (रूणेचा), पोकरण-यहाँ भाद्रपद शुक्ल एकादशी को रामदेवजी ने जीवित समाधि ली थी, जहाँ आज एक विशाल मंदिर बना है। मंदिर के पास रामसरोवर तालाब है जिसका निर्माण स्वयं रामदेवजी ने करवाया था।
- बालीनाथ मठ - पोकरण।
- आशापूर्ण मंदिर - पोकरण।
- खींवज माता मंदिर - पोकरण।
- कैलाश टेकरी - पोकरण।
- राष्ट्रीय मरू उद्यान - (जैसलमेर, बाड़मेर) राजस्थान का सबसे बड़ा वन्यजीव अभयारण्य है।
- आकल वुड फोसिल पार्क - जैसलमेर, यहाँ प्राचीन जीवाश्म रखे हैं।
- थार का घड़ा - जैसलमेर के चान्दन गाँव में एक नलकूप है जिससे मीठा पानी आता है।
जालौर (RJ-16)
- जालौर का प्राचीन नाम जाबालिपुर था।
- जाबालि ऋषि की तपोभूमि होने के कारण इसका नाम जालौर पड़ा।
- कुछ मान्यता के अनुसार जाल वृक्ष की अधिकता के कारण इसका नाम जालौर पड़ा।
- अलाउद्दीन खिलजी (1311-12 ई.) ने जालौर का नाम जलालाबाद कर दिया था।
- सिरे मंदिर- मंदिर का निर्माण मानसिंह ने करवाया था। यहाँ नाथ सम्प्रदाय के जालन्धरनाथ ने तपस्या की थी।
- आशापुरा मंदिर - मोदरा-इसे महोदरी माता अर्थात् बड़े उदर (पेट) वाली देवी भी कहते है। सोनगरा/नाडोल/जालौर चौहानों की कुलदेवी है।
- सुन्धा माता- सुन्डा पर्वत-यह एकमात्र देवी है जिसकी धड़रहित पूजा होती है। यहाँ दिसम्बर 2006 में राजस्थान का प्रथम रोपवे स्थापित किया गया।
- हरजी गाँव - यहाँ मिट्टी के मामाजी के घोड़े बनते हैं।
- भीनमाल (जालौर)- महाकवि माघ भीनमाल के थे। चीनी यात्री हवेनसांग ने भीनमाल की यात्रा की थी।
- बड़गाँव- रानीवाड़ा, (सांचौर) - इसे जालौर का कश्मीर कहते है।
- सांचौर - इस क्षेत्र में पाँच नदियाँ बहती हैं जिस कारण इसे राजस्थान का पंजाब कहते हैं।
झालावाड़ (RJ-17)
- राजस्थान की सबसे नवीन रियासत जिसकी स्थापना 1838 ई. में हुई थी।
- झालावाड़ अंग्रेजों द्वारा बनाई गई राजस्थान की एकमात्र रियासत थी।
- सूर्य मंदिर- झालरापाटन-यहाँ स्थित सूर्य मंदिर चन्द्रभागा नदी के किनारे है।
नोट- झालरापाटन को घण्टियों का शहर कहते हैं।
- द्वारकाधीश मंदिर- झालरापाटन-मंदिर का निर्माण झाला जालिम सिंह ने करवाया।
- झालरापाटन-झालरापाटन की स्थापना कोटा के दीवान झाला जालिम सिंह ने की थी। झालरापाटन को घंटियों का शहर / City of Bells कहते हैं।
- कौल्वी की बौद्ध गुफाएँ- डग, झालावाड़-यहाँ बौद्ध धर्म की गुफाएँ मिली है।
- भवानी नाट्यशाला- यह ओपेरा शैली में निर्मित भारत की अनोखी नाट्यशाला है जिसकी स्थापना 1921 ई. में भवानी सिंह ने की थी।
- शीतलेश्वर महादेव/चन्द्रमौलिश्वर मंदिर- मंदिर का निर्माण दुर्गाण के सामन्त वाप्पक ने 689 ई. (746 वि. स.) में करवाया। यह राजस्थान का प्रथम तिथियुक्त मंदिर है।
- सात सहेलियों का मंदिर- झालरापाटन-यह वैष्णव मंदिर है जिसमें पद्मनाभ की मूर्ति है। कर्नल जेम्स टॉड ने इस मंदिर चारभुजा मंदिर कहा। इस मन्दिर के निर्माण में कच्छपघात शैली का प्रयोग हुआ है।
- शान्तिनाथ जैन मंदिर- झालरापाटन-मंदिर के गर्भगृह में 23वें तीर्थंकर शान्तिनाथ की काले रंग की मूर्ति है। मंदिर का निर्माण 10वीं-11वीं सदी में कच्छपघात शैली में किया गया।
- आदिनाथ जैन मंदिर- चांदखेड़ी-यह मंदिर भू-गर्भ में स्थित है।
झुंझुनूँ (RJ-18)
मरूस्थल का सिंहद्वार कहते हैं।
- बिरला म्यूजियम पिलानी- यह म्यूजियम भारत के प्रसिद्ध म्यूजियम में अपना स्थान रखता है।
- पंचवटी- पिलानी-रामायण व अन्य मूर्तियों से तैयार यह पंचवटी आकर्षित करती है।
- सरस्वती मंदिर- पिलानी-संगमरमर से तैयार यह मंदिर अति सुन्दर है।
- मंडावा (झुंझुनूँ)- यहाँ स्थित लादिया हवेली, चोखानी हवेली में स्थित भित्ति चित्र सैलानियों को मोहित करते हैं। शेखावाटी में सर्वाधिक विदेशी पर्यटक मंडावा में आते है।
- नरहड़ पीर दरगाह- चिड़ावा-यहाँ शक्कर पीर बाबा की दरगाह है जो सांप्रदायिकता के लिये प्रसिद्ध है। शक्कर बाबा को 'बागड़ का धणी' कहते है।
- महनसर- यहाँ पौदारो की सोने की दुकान प्रसिद्ध है।
- BITS- पिलानी-तकनीकी शिक्षा का राष्ट्रीय केन्द्र स्थित है।
- लोहार्गल- मालकेतू पर्वत पर स्थित है। मालकेतू पर्वत की चौबीस कौस की परिक्रमा प्रसिद्ध है यहाँ भाद्रपद अमावस्या को मेला भरता है।
- राणी सती- झुंझुनूँ-यहाँ भारत का सबसे बड़ा सती माता का मेला भाद्रपद अमावस्या को भरता है।
- खेतड़ी- यहाँ ताम्र धातु की प्रचुरता है जिस कारण इसे भारत की ताम्र नगरी कहते है। यहाँ ताँबा शोधन संयंत्र भी लगा है। स्वामी विवेकानन्द यहाँ ठहरे थे।
जोधपुर (RJ-19)
- जोधपुर की स्थापना 1459 ई. में राव जोधा ने की थी।
- जोधपुर को सूर्य नगरी, सनसिटी, ब्लू सिटी, थार मरूस्थल का प्रवेशद्वार कहते है।
- अजित भवन, जोधपुर-यह महल देश का प्रथम हैरिटेज होटल बना।
नोट- 1950 ई. से पूर्व निर्मित किसी भी ईमारत को होटल में बदलना हैरिटेज होटल कहलाता है।
- उम्मेद भवन- छीतर पत्थर से निर्मित होने के कारण इसे छीतर पैलेस भी कहते है। महाराजा उम्मेद सिंह ने 1928-40 ई. के मध्य अकाल राहत कार्यों के दौरान इसका निर्माण करवाया। यहाँ घड़ियों का संग्रहालय है।
- मंडोर (जोधपुर)- मंडोर रावण का ससुराल था। राठौड़ों ने इसे अपनी राजधानी बनाया। जोधपुर शासकों की छतरियाँ यहाँ बनी हैं। यहाँ 33 करोड़ देवी-देवताओं की साल स्थित है।
नोट- 33 करोड़ देवी-देवताओं का मंदिर बीकानेर में है।
- जसवंत थड़ा- महाराजा जसवंत सिंह की याद में महाराजा मानसिंह ने इसका निर्माण करवाया।
- महामंदिर, जोधपुर- यह मंदिर राजस्थान में नाथ संप्रदाय का सबसे बड़ा मंदिर है जिसका निर्माण जोधपुर शासक मानसिंह ने अपने गुरु आयस देवनाथ के कहने पर करवाया।
- ओसियां (जोधपुर)- यहाँ प्राचीन सभ्यता, सूर्य मंदिर, जैन मंदिर दर्शनीय हैं।
- सच्चियाय माता मंदिर- ओसियाँ (जोधपुर)
- हरिहर मंदिर- ओसियाँ (जोधपुर)- यह राजस्थान का प्रथम मंदिर है जिसका निर्माण पंचायतन शैली में हुआ।
- खींचन गाँव, (जोधपुर)- यह गाँव अप्रवासी पक्षी कुरजाँ की शरणस्थली माना जाता है।
- खेजड़ली गाँव (जोधपुर)- यहां अमृतादेवी विश्नोई के नेतृत्व में 28 अगस्त 1730 ई. को पेड़ों की रक्षा करते हुए 363 लोग मारे गये। भाद्रपद शुक्ल दशमी को खेजड़ली गाँव में विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला भरता है।
कोटा (RJ-20)
राजस्थान की शिक्षानगरी, औद्योगिक नगरी, राजस्थान का कानपुर कोटा को कहते हैं। कोटिया भील के कारण कोटा नाम पड़ा। 1631 ई. में मुगल बादशाह शाहजहाँ ने कोटा को बूँदी से पृथक कर माधोसिंह को दिया।
- चारचौमा शिवालय- चौथी-पाँचवी सदी में निर्मित यहाँ गुप्तकालीन शिवालय है।
- शिव मंदिर- कंसुआ- माना जाता है कि यहाँ कण्व ऋषि की तपोभूमि थी। यहाँ 8वीं सदी का कुटिला लिपि का शिलालेख है। यहाँ सहस्त्र शिवलिंग है। यहाँ कण्व ऋषि का आश्रम है।
- चम्बल उद्यान- यह राज्य का श्रेष्ठ उद्यान है।
- हाड़ौती यातायात प्रशिक्षण पार्क- जुलाई, 1992 में स्थापित यह प्रशिक्षण पार्क राजस्थान का प्रथम प्रशिक्षण पार्क है।
- आलनिया- सभ्यता स्थल, जहाँ से 5000 वर्ष पुराने गुहाचित्र मिले हैं।
- अबली मीणी महल- इस महल का निर्माण 1648-58 ई. राव मुकुन्दसिंह ने करवाया।
- क्षारबाग- कोटा शासकों की छतरियाँ है।
- अभेड़ा महल
- गेपरनाथ शिवालय- यह गुप्तकालीन मंदिर है।
- बांसथणी का शिवालय
- बूढ़ादीत का सूर्य मंदिर- यह मंदिर पंचायतन शैली में बना है।
- भीम चौरी- यह गुप्तकालीन शिव मंदिर है। इस मंदिर में स्थित मण्डप को भीम मण्डप माना जाता है।
- विभीषण मंदिर- कैथून- यह भारत का एकमात्र विभीषण मंदिर है।
- मथुराधीश मंदिर- यह मंदिर वल्लभ संप्रदाय के महाप्रभु मथुरेशजी का मंदिर है।
नागौर (RJ-21)
- राव अमरसिंह राठौड़ की छतरी- यह छतरी नागौर के झण्डा तालाब पर स्थित है जिसमें 16 खम्भें है।
- सुल्तान तारकीन की दरगाह- यह सूफी संती काजी हमीदुद्दीन नागौरी की दरगाह है।
- चारभुजानाथ मंदिर (नागौर)- मेड़ता-इसे मीरा मंदिर भी कहते है। इस मंदिर का निर्माण मीरा बाई के दादा राव दूदा ने करवाया था।
पाली (RJ-22)
- प्राचीन नाम- पालिका
- गजानंद मंदिर- घाणेराव (देसूरी, पाली)- यहाँ रिद्धि-सिद्धि की मूर्तियाँ स्थापित है।
- खुदाबख्श बाबा की दरगाह- सादड़ी
- रणकपुर तीर्थ- सादड़ी-यहाँ स्थित जैन मंदिर में देश विदेश से पर्यटक आते है। यहाँ 1444 स्तम्भों का प्रसिद्ध मंदिर है जिसका एक भी स्तम्भ समान नहीं है। मंदिर का निर्माण राणा कुम्भा के समय हुआ जिनका शिल्पी दैपाक था। यहाँ स्थित नेमीनाथ मंदिर को वेश्या मंदिर कहते हैं।
- चोटीलापीर दुलंशाह की मजार
- स्वर्ण जैन मंदिर- फालना, बाली (पाली)
- पीर मस्तान की दरगाह- सोजत (पाली)
- मूंछाला महावीर मंदिर- घाणेराव (देसूरी पाली)-इस मंदिर का निर्माण 10वीं सदी में हुआ। यह राजस्थान का एकमात्र मंदिर है जिसमें महावीर स्वामी को मूंछों में दिखाया गया है।
- सोमनाथ मंदिर- इस मंदिर का निर्माण 1152 ई. में गुजरात शासक कुमारपाल सोलंकी ने करवाया था।
सीकर (RJ-23)
- हर्ष पर्वत (सीकर)- यहाँ 10वीं सदी का प्राचीन शिवालय है जिसे औरंगजेब ने तोड़ा था।
- खाटूश्यामजी (सीकर)- महाभारत कालीन बर्बरीक कलियुग में श्यामजी के नाम से पूजे जाते है। यहाँ श्यामजी के शीश की पूजा होती है।
- जीणमाता-रैवासा (सीकर)- (विस्तृत जानकारी लोकदेवियों में देखें)
- शाकम्भरी माता- सीकर
- गणेश्वर सभ्यता- (नीम का थाना)-कांतली नदी के किनारे ताम्रयुगीन गणेश्वर सभ्यता स्थित है जिसे ताम्र संस्कृति की जननी कहते है।
सिरोही (RJ-24)
- नक्की झील-माउण्ट आबू- यह झील सर्दियों में जम जाती है। यहाँ लोग पिकनिक मनाने आते है।
- नन रॉक-माउण्ट आबू- यहाँ एक चट्टान है जो ऐसे लगती है कि महिला घूंघट निकाले खड़ी है।
- टॉड रॉक-माउण्ट आबू- यहाँ एक चट्टान मेढ़क के समान है।
- रामझरोखा गुफा, हस्तीगुफा, चम्पागुफा-माउण्ट आबू
- गुरू शिखर- राजस्थान की सबसे ऊँची चोटी (1722 मीटर) जहाँ गुरू दत्तात्रेय व भगवान शिव का मंदिर है।
- अचलेश्वर मंदिर- यह भगवान शिव का मंदिर है जहाँ शिवलिंग या मूर्ति के स्थान पर भगवान शिव का अंगूठा है। यहाँ एक खड्डा स्थित है जिसे ब्रह्म खड्डा कहते है। यहाँ एक मंदाकिनी कुण्ड भी स्थित है।
- गौमुख- यहाँ स्थित गौमुख कुण्ड में 700 सीढ़ियाँ लगी है।
- वशिष्ठ आश्रम- यहाँ गुरू वशिष्ठ का आश्रम है तथा पास में ही अग्निकुण्ड है, जिसमें से राजपूतों की उत्पत्ति मानी गई है। यहाँ राम-लक्ष्मण की मूर्तियाँ भी हैं।
- अर्बुदा देवी मंदिर-यह अधर देवी के रूप मे पूजी जाती है।
- सूर्य मंदिर- यहाँ कई सूर्य मंदिर है।
- दिलवाड़ा जैन मंदिर- इन मंदिरों का निर्माण 11वीं-12वीं सदी में हुआ था।
सवाई माधोपुर (RJ-25)
- चौथ का बरवाड़ा- यहाँ चौथमाता का मंदिर है जो कंजर समाज की कुलदेवी है।
टोंक (RJ-26)
- राजस्थान की एकमात्र मुस्लिम रियासत।
- कल्याणजी- डिग्गी, टोंक-यहाँ कल्याणजी के मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल एकादशी को मेला भरता है। मुस्लिम कल्याणजी को कलंह पीर कहते हैं।
- जोधपुरिया- देवधाम यहाँ देवनारायण जी का आराध्य स्थान है।
- अब्दुल कलाम अरबी- फारसी शोध संस्थान, टोंक।
- सुनहरी कोठी- इस महल का निर्माण 1824 ई. में नवाब इब्राहिम खां ने करवाया था।
- संतपीपा की गुफा- टोडारायसिंह
- हाड़ीरानी का कुण्ड- टोडारायसिंह - यह एक भव्य महल है।
उदयपुर (RJ-27)
- उदयपुर की स्थापना 1559 ई. में महाराजा उदयसिंह ने की थी।
- उदयपुर को झीलों की नगरी कहते है।
- ऋषभदेव/केसरियाजी- धुलैव, उदयपुर- यहाँ काले पत्थर की मूर्ति है जिसे भील कालाजी कहते है। मूर्ति पर केसर की खीर चढ़ाई जाती है जिस कारण इन्हें केसरियानाथ कहते है।
- फतेहसागर झील- इस झील का प्रारम्भिक निर्माण 1678 ई. में महाराणा जयसिंह ने करवाया। फतेहसिंह ने पुन: निर्माण करवाया तथा ड्यूक ऑफ कनॉट ने शिलान्यास किया जिस कारण इसे कनॉट बाँध भी कहते है। झील के एक टापू पर अंतर्राष्ट्रीय सौर वेधशाला व एक टापू पर नेहरू पार्क बना है।
- पिछोला झील- इस झील का निर्माण राणा लाखा के समय एक चिड़ीमार बणजारे ने अपने बैल की स्मृति में करवाया।
- झील में स्थित टापू पर जगमंदिर व जगनिवास महल है।
- एकलिंग जी का मंदिर- कैलाशपुरी - माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण बप्पा रावल ने करवाया था।
- सहेलियों की बाड़ी- फतेहसागर झील के किनारे महाराणा सज्जनसिंह ने सहेलियों की बाड़ी के नाम से बगीचा लगवाया जिसका पुन:निर्माण महाराजा फतेहसिंह ने करवाया।
- जगत अम्बिका माता मंदिर
- गोगुन्दा- यहाँ महाराणा प्रताप का राज्यभिषेक व महाराजा उदयसिंह का निधन हुआ था। महाराणा उदयसिंह की छतरी गोगुन्दा में बनी है।
- नागदा- गुहिल शासकों की प्रारम्भिक राजधानी।
बाराँ (RJ-28)
- ब्रह्माणी माता मंदिर- सोरसन, बाराँ- एकमात्र मंदिर है जहाँ देवी की पीठ की पूजा होती है। यह माता कुम्हारों की कुलदेवी है।
- सांवलाजी मंदिर- इस मंदिर का निर्माण 1709 ई. में भीमसिंह - I ने करवाया था।
- भण्डदेवस बाराँ- यहाँ पंचायतन शैली में निर्मित शिव मंदिर है जिसका निर्माण 10वीं सदी में मेदवंशीय राजा मलयवर्मा ने करवाया। इसे हाड़ौती का खजुराव/राजस्थान का मिनी हाड़ौती खजुराव कहते हैं।
नोट- राजस्थान का खजुराव किराडू (बाड़मेर) व मेवाड़ का खजुराव जगत अम्बिका माता को कहते है।
- सीताबाड़ी केलवाड़ा- यहाँ वाल्मिकी आश्रम, सीता व लक्ष्मण के मंदिर है।
- गडगच्च देवालय- अटरू, बाराँ- इस मंदिर का निर्माण 10वीं सदी में हुआ था।
दौसा (RJ-29)
- मेहन्दीपुर बालाजी- यहाँ स्थित मूर्ति पहाड़ी का ही अंग है। इसे घाटा मेहन्दीपुर बालाजी भी कहते है। यहाँ भूत-प्रेतों का पूर्ण ईलाज होता है।
- चाँद बावड़ी- आभानेरी, दौसा-स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना यह बावड़ी भूल-भूलैया बावड़ी भी कहलाती है।
- राणा सांगा का चबूतरा/स्मारक (बसवा)- खानवा युद्ध में घायल राणा सांगा को कुछ समय बसवा में रखा गया था जहाँ उनका चबूतरा बना है।
- बांदीकुई जंक्शन 20 अप्रैल 1874 ई. को आगरा फोर्ट से बांदीकुई के बीच राजस्थान की प्रथम रेलगाड़ी चली थी।
नोट- भारत की प्रथम रेलगाड़ी बम्बई से थाणे के बीच चली थी।
- गेटोलाव- यहाँ संत दादू के शिष्य सुन्दरदास का स्मारक हैं।
- हर्षत माता का मंदिर- आभानेरी-यह एक वैष्णव मंदिर है जिसका निर्माण 8वीं सदी में हुआ था।
- बुवानिया कुण्ड- आलूदा, दौसा
राजसमन्द (RJ-30)
- श्रीनाथजी - नाथद्वारा-राजस्थान में वल्लभ संप्रदाय की प्रधान पीठ है जहाँ मंदिर को हवेली व मंदिर में गाये जाने वाले संगीत को हवेली संगीत कहते हैं। मंदिर का निर्माण महाराणा राजसिंह ने करवाया था।
- द्वारिकाधीश मंदिर - कांकरोली-इस मंदिर का निर्माण महाराणा राजसिंह ने करवाया था।
- चारभुजा मंदिर - गढ़बोर-यहाँ वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है।
- राजसमन्द झील - इस झील का निर्माण महाराणा राजसिंह ने अकाल राहत कार्यों के दौरान करवाया था। इस झील के उत्तरी पाल 25 शिलाओं पर रणछोड़ भट्ट ने मेवाड़ का इतिहास लिखा जिसे राजप्रशस्ति कहते हैं। यह भारत की सबसे बड़ी शिलालेख प्रशस्ति कहलाती है।
हनुमानगढ़ (RJ-31)
- गोगामेड़ी - नोहर, हनुमानगढ़-यहाँ गोगाजी महाराज का मोहम्मद गजनवी के साथ युद्ध हुआ जिसमें गोगाजी वीरगति को प्राप्त हो गये। गोगाजी का धड़ यहाँ कटकर गिरा जिस कारण इस मंदिर को धुरमेड़ी कहते हैं। यहाँ पूरे भाद्रपद महीने पशुमेला भरता है।
- कालीबंगा (हनुमानगढ़)
- सर छोटूराम स्मारक संग्रहालय-संगरिया
करौली (RJ-34)
- करौली का प्राचीन नाम 'कल्याणपुरी' था।
- करौली भद्रावती नदी के किनारे स्थित है।
- 1348 ई. में अर्जुनपाल यादव ने करौली की स्थापना की थी।
- 19 जुलाई, 1997 सवाई माधोपुर से अलग कर करौली राजस्थान का 32वाँ जिला बना।
- कैलादेवी-त्रिकुट पर्वत- यह देवी यादवों की कुलदेवी कहलाती है। चैत्र शुक्ल अष्टमी को यहाँ लक्खी मेला भरता है। मंदिर में घुटकन/कनक दंडवत नृत्य व लांगुरिया गीत गाया जाता है।
- महावीरजी- महावीरजी की 400 वर्ष पुरानी मूर्ति है।
- मदनमोहनजी -गौड़ीय संप्रदाय का यहा प्रसिद्ध पीठ है। प्रत्येक माह अमावस्या को मेला भरता है।
- हसमुख विलास उद्यान- इस उद्यान की स्थापना करौली शासक हरबक्षपाल ने की थी। यहाँ सफेद चंदन के पेड़ हैं।
प्रतापगढ़ (RJ-35)
26 जनवरी 2008 प्रतापगढ़ राजस्थान का 33वाँ जिला घोषित किया गया। 1 अप्रैल 2008 से प्रतापगढ़ ने नये जिले के रूप में कार्य प्रारम्भ किया। प्रतापगढ़ को नया जिला बनाने की सिफारिश परमेशचन्द्र समिति ने की थी।
- देवलिया शासक महारावल प्रतापसिंह ने 1698 ई. में डोडियार का खेड़ा नामक स्थान पर प्रतापगढ़ बसाया।
- गौतमेश्वर जी - अरणोद- यहाँ प्रतिवर्ष वैशाख पूर्णिमा को मेला भरता है।
- कंपू कोठी - प्रतापगढ़
- दीपनाथ महादेव - प्रतापगढ़
- उदयविलास महल - प्रतापगढ़
- काकाजी की दरगाह - प्रतापगढ़-इसे काँठल का ताजमहल कहते हैं।
राजस्थान में पर्यटन ऐतिहासिक स्थल बालोतरा
- नाकोड़ा-बालोतरा - नाकोड़ा को मेवानगर के नाम से भी जाना जाता है जिसका प्राचीन नाम वीरमपुर था। यहाँ जैन धर्म के 23वें तीर्थकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा है।
- ब्रह्मा मंदिर- आसोतरा (बालोतरा)- मंदिर का निर्माण खेतारामजी महाराज ने करवाया था।
- भूरिया बाबा- खेड़ (बालोतरा)
- बाटाडू का कुआँ (बालोतरा)- इसे रेगिस्तान का जलमहल कहते हैं।
डीडवाना कुचामन
- खण्डनाल, परबतसर (डीडवाना) - तेजाजी का जन्मस्थान।
- परबतसर (डीडवाना) - तेजाजी का पशुमेला।
- जैन विश्व भारती-लाडनूँ - तेरापंथी के जनक आचार्य तुलसीदासजी ने इस शिक्षण संस्थान की स्थापना की।
ब्यावर
- कुड़की (ब्यावर) - इस गाँव में मीरा बाई का जन्म हुआ था।
सलूम्बर
- जयसमंद झील -झील का निर्माण 1685 ई. महाराणा जयसिंह ने करवाया था। स्थानीय भाषा में इसे देबर झील भी कहते है। झील के पास रूठी रानी के महल व हवामहल स्थित है।


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