राजस्थान के मंदिर

राजस्थान के मन्दिर

भारत में मंदिर निर्माण की परंपरा का व्यवस्थित विकास गुप्तकाल के दौरान हुआ। इसी काल में धार्मिक स्थापत्य को एक स्पष्ट स्वरूप प्राप्त हुआ। राजस्थान में मंदिर स्थापत्य के प्रारंभिक प्रमाण बैराठ (वर्तमान कोटपुतली-बहरोड़ क्षेत्र) की सभ्यता से प्राप्त हुए हैं, जो यहाँ प्राचीन धार्मिक गतिविधियों की पुष्टि करते हैं।
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गुप्तकाल के समय राजस्थान में निर्मित प्रमुख मंदिरों में मुकन्दरा क्षेत्र स्थित शिव मंदिर (कोटा), कन्सुवा का शिव मंदिर तथा चारचौमा (कोटा) का शिव मंदिर उल्लेखनीय हैं। ये मंदिर उस काल की शिल्पकला, स्थापत्य शैली और धार्मिक आस्था को दर्शाते हैं।

शीतलेश्वर महादेव मन्दिर

झालरापाटन (689 ई.) राजस्थान का प्रथम तिथियुक्त मंदिर सूर्य पूजा व क्षेत्रपाल पूजा का सर्वाधिक प्रचलन राजस्थान में है।

भारत में मन्दिर निर्माण की तीन शैलियाँ हैं -
  • नागर शैली
  • द्रविड़ शैली
  • बेसर शैली

नागर शैली

इस शैली में मन्दिरों में गोल गुम्बदनुमा ऊँची चोटी व बीच में गर्भ गृह होता है। मंदिर चबूतरे पर होता है जिसके बीच में गर्भ गृह होता है, गर्भ गृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ होता है। इसमें मंदिर शिखर युक्त होता है। राजस्थान के अधिकांश मन्दिर इसी शैली में बने हैं। यह उत्तरी भारत की शैली है। नागर शैली को आर्य शैली भी कहा जाता है क्योंकि उत्तरी भारत में आर्य थे तथा नागर शैली भी उत्तरी भारत में थी। पर्सी ब्राउन ने नागर शैली को उत्तर भारतीय आर्य शैली कहा। कोणार्क का सूर्य मंदिर (उड़ीसा), किराडू का सोमेश्वर मंदिर (बाड़मेर), दधिमति माता मंदिर (नागौर), अम्बिका माता मंदिर (जगत, उदयपुर) आदि नागर शैली के मंदिर है।

इसकी तीन उपशैलियाँ हैं -
  1. महामारु/गुर्जर प्रतिहार शैली- इसमें अश्लील मूर्तियों का निर्माण होता है। इस शैली का सर्वाधिक विकास गुर्जर प्रतिहारों ने किया। 8वीं-12वीं सदी यह शैली सर्वाधिक पनपी। जैसे- कुंभ स्वामी मंदिर, कालिका माता मंदिर (चित्तौड़गढ़), सास-बहू मंदिर (नागदा), हरिहर मंदिर (ओसियां, जोधपुर)
  2. पंचायतन शैली- पंचायतन शैली में एक मुख्य मंदिर होता है तथा चार अन्य मंदिर होते हैं। मुख्य मंदिर में विष्णु का तथा अन्य मंदिर में शक्ति शिव, सूर्य, गणेशजी के मन्दिर होते हैं। ये मंदिर श्रृंखला में होते हैं। प्रथम उदाहरण- देवगढ़ (झांसी) का दशावतार मंदिर। जैसे- ओसियाँ (जोधपुर) मन्दिर का हरिहर मंदिर, बाड़ौली का शिव मंदिर, भंडदेवरा मंदिर (बाराँ), जगदीश मंदिर (उदयपुर), बूढ़ादीत मंदिर (कोटा)
  3. एकायतन शैली- इस मंदिर में एक गर्भ गृह होता है, गर्भ गृह के आगे सभामंडप होता है तथा सभामंडप के आगे द्वारमंडप होता है। एक ही देवता का मन्दिर होता है।

द्रविड़ शैली

दक्षिण भारत के मन्दिर इसी शैली में हैं। इस शैली में मंदिर के ऊपर का भाग पिरामिडनुमा होता है, बीच का भाग गुंबदाकार होता है तथा नीचे का भाग वर्गाकार होता है। इस शैली के मंदिरों के प्रवेश द्वार को गोपुरम कहते हैं। इसमें मन्दिर स्तम्भनुमा होते हैं। मन्दिर के चारों ओर मूर्तियां तथा जलकुण्ड होते हैं। जैसे - चोपड़ा मन्दिर (धौलपुर) प्रथम द्रविड़ शैली मन्दिर (राज.)
  • महादेव मन्दिर - झारखण्ड
  • मीनाक्षी मंदिर - मदुरै
  • वेंकटेश्वर मन्दिर - चूरू
  • रंगनाथ मंदिर - पुष्कर, (अजमेर)

बेसर शैली

नागर व द्रविड़ का मिश्रण बेसर शैली कहलाती है यह शैली चालुक्य वंश द्वारा मध्य भारत में फैली थी। इसलिए इसे चालुक्य शैली भी कहते है।
बेसर शैली सर्वप्रथम कर्नाटक में विकसित हुई। इस शैली में मंदिर गोलाकार छोटे शिखर, फैले कलश, मूर्तियों में अत्यधिक अलंकार आदि विशेषताएँ है। ये मंदिर मध्य भारत में बने। चालुक्य मंदिर (कर्नाटक) वैष्णव मंदिर (वृंदावन) बैलूर के मंदिर आदि बेसर शैली के उदाहरण है।

मन्दिर निर्माण की अन्य शैलियाँ

1. भूमिज शैली - नागरशैली की उपशैली महामारू शैली का नवीन रूप भूमिज शैली है, जो महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश में फैली है। भूमिज शैली के मन्दिर का शिखर अनेक खण्डों में बंटा होता है। मंदिर के शिखर के चारों ओर क्रमशः घटते क्रम में छोटे-छोटे शिखरों की लड़ियाँ होती है।

भूमिज शैली के प्रमुख मन्दिर
  • उण्डेश्वर मंदिर - बिजौलिया, भीलवाड़ा
  • महानालेश्वर मंदिर - मेनाल, भीलवाड़ा
  • रणकपुर का सूर्य मन्दिर- पाली
  • सेवाड़ी का जैन मंदिर- बाली, पाली (सबसे प्राचीन)
  • झालरापाटन का सूर्य मन्दिर- झालावाड़
  • रामगढ़ का देवी मन्दिर- बाराँ

2. मारु-गुर्जर/सोलंकी शैली- 1000 ई. के आसपास महामारू व महागुर्जर शैलियों के मिश्रण से तीसरी शैली मारूगुर्जर / सोलंकी शैली का उद्भव हुआ जिसमें महागुर्जर शैली ने स्थापत्य के गुण व महामारू शैली ने अलंकरण के गुण दिये। मारूगुर्जर शैली का सर्वाधिक विकास सोलंकी राजपूतों ने किया, जिसके कारण इसे सोलंकी शैली कहा जाने लगा।

इस शैली के मंदिरों की विशेषताएँ
  • पतले व गोल खम्भे।
  • सजावटी तोरणद्वार/प्रवेशद्वार।
  • गर्भगृह के रथ आगे बढ़े व संख्या में अधिक।

प्रमुख मन्दिर
  • दिलवाड़ा के जैन मंदिर - सिरोही
  • सूर्य मन्दिर- मोठेरा (गुजरात)
  • सचिया माता मन्दिर-औसिया (जोधपुर)
  • शिव मन्दिर- किराडू (बाड़मेर)
  • समिद्धेश्वर मन्दिर- चित्तौड़गढ़ दुर्ग
  • कच्छपघात शैली - कच्छवाह वंश ने ढूँढाड़ में अनेक देवालयों का निर्माण करवाया। कच्छवाह ने नागर शैली के ही मंदिर बनवाये कच्छवाहों द्वारा निर्मित होने के कारण इस शैली का नाम 'कच्छपघात शैली' पड़ गया।

राजस्थान में इस शैली से निर्मित मंदिर के उदाहरण-
  • पद्मनाभ मंदिर- झालरापाटन (झालावाड़)
  • शांतिनाथ जैन मंदिर - झालरापाटन (झालावाड़)

राजस्थान के प्रमुख मन्दिर

अजमेर (RJ-01)

सोनीजी की नसियां- इसका निर्माण प्रारम्भ मूलचन्द सोनी तथा इसे पूर्ण 1865 में इसके पुत्र टीकमचन्द सोनी ने किया। यह प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव/आदिनाथ का मंदिर है। यहाँ एक दिगम्बर जैन मंदिर भी स्थित है। इसे सिंहकूट चैत्यालय व लाल मंदिर कहा जाता है। 1895 ई. स्वर्ण नगरी में मंदिर मे जोड़े जाने के बाद इसे सोनी मंदिर कहा जाने लगा।

ब्रह्मा मन्दिर (पुष्कर)
माना जाता है कि मंदिर का प्रारम्भिक निर्माण शंकराचार्य ने करवाया था। मन्दिर का निर्माण गोकलचंद पारीक ने करवाया था। (1809) इस मंदिर को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया है। मंदिर में सूर्य भगवान की संगमरमर की मूर्ति भी है जो एक प्रहरी की तरह खड़ी है, मूर्ति की खास बात यह है कि भगवान सूर्य ने जूते पहन रखे हैं।
यह भारत में एकमात्र ब्रह्मा मन्दिर है। इस मन्दिर के परिसर में पंचमुखी महादेव, लक्ष्मीनारायण, गौरीशंकर, पातालेश्वर महादेव, नारद और नवग्रह के छोटे-छोटे मन्दिर बने हुए हैं।

नोट- छींछ (बाँसवाड़ा) में ब्रह्मा की आदम कद मूर्ति का मंदिर तथा खेद बाड़मेर में ब्रह्मा के अन्य मन्दिर हैं।

सावित्री मन्दिर (पुष्कर)
माना जाता है कि यज्ञ के समय सावित्री माता अपने पति ब्रह्मा से रूठकर यहाँ चली आयी थीं। यहीं सावित्री माता ने ब्रह्माजी को श्राप दिया था कि उनकी पूजा पुष्कर के अतिरिक्त कहीं नहीं होगी। सावित्री मंदिर का निर्माण रत्नागिरि पर्वत (अजमेर) में गोकुलचंद पारीक ने करवाया था। यहाँ सावित्री जी की पुत्री सरस्वती जी की भी मूर्ति स्थापित है। सावित्री जी का मेला भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को भरता है। यहाँ 3 मई, 2016 ई. 700 मीटर लम्बा रोपवे लगा है जो राजस्थान का तीसरा रोप वे है। नोट- राजस्थान का प्रथम रोप-वे सुंधा माता मंदिर (जालौर) तथा दूसरा रोपवे मंशापूर्णा करणी माता का मंदिर (उदयपुर) में स्थित है।

काचरिया मंदिर (किशनगढ़)
यह निम्बार्क सम्प्रदाय का मंदिर है जिसमें भगवान कृष्ण की मूर्ति अष्ट धातु की तथा राधा की मूर्ति पीतल की है।

आनंदी माता का मंदिर (नोसल, किशनगढ़)
यह मंदिर 9वीं सदी में बना सूर्य मंदिर था। जिसे बाद में आनंदी माता का मंदिर कर दिया गया यह मंदिर पंचायतन शैली में बना है।

वराह मंदिर (पुष्कर, अजमेर)
  • इस मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में अर्णोराज चौहान ने करवाया था।
  • औरंगजेब ने तुड़वाया।
  • वर्तमान निर्माण- सवाई जयसिंह।
  • राणा प्रताप के भाई सागर ने जीर्णोद्धार करवाया।

रंगनाथजी मंदिर- (पुष्कर, अजमेर)
रंगनाथजी मंदिर में विष्णु, लक्ष्मी व नृसिंह की मूर्तियाँ स्थापित है। इस मंदिर का निर्माण द्रविड़/दक्षिण भारतीय शैली में करवाया गया।
रंगनाथजी का मंदिर द्रविड़ शैली का राजस्थान में सबसे बड़ा मंदिर है। यहाँ स्थित मंदिर में भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी सिंह पर सवार है। रंगनाथजी का मन्दिर रामानुज संप्रदाय का प्रमुख तीर्थ है। इस मंदिर का निर्माण 1844 ई. में सेठ पूरणमल ने करवाया।

पाप मोचिनी मंदिर (पुष्कर)
यह मंदिर पुष्कर के मुकुट में मोती के समान है। देव एकादशी के दिन इस मंदिर में आने से पापों से मुक्ति मिलती है।

श्री पंचकुंड शिव मंदिर (पुष्कर-अजमेर)
मंदिर का निर्माण पांडवों ने करवाया। महाशिवरात्री को मेला भरता है।

अटमटेश्वर महादेव मंदिर - अजमेर
इस मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में हुआ। मंदिर निर्माण में जटिल हेमाडपंथी शैली का प्रयोग किया गया। महाशिरड़ी का मेला भरता है। 

रमा बैकुण्ठ मंदिर-.(पुष्कर, अजमेर)
यह मन्दिर रामानुज संप्रदाय का है। मन्दिर का निर्माण डीडवाना (नागौर) के सेठ मगनीराम ने करवाया था। (1820 ई. में)

महादेव मन्दिर-पुष्कर (अजमेर)
इस मन्दिर का निर्माण ग्वालियर (एम.पी.) के मराठा सेनापति अन्नाजी सिंधिया ने करवाया।

निम्बार्क संप्रदाय
  • प्रधान पीठ- सलेमाबाद (किशनगढ़, अजमेर)
  • स्थापना - परशुराम (17वीं सदी)
  • रामदेवजी मंदिर (परबतसर, डीडवाना)- बाबा रामदेवजी का यह मंदिर मिनी रामदेवरा/राजस्थान का द्वितीय रामदेवरा कहलाया है।

नोट- छोटा रामदेवरा गुजरात में है।

अजमेर के अन्य मंदिर
  • गायत्री मंदिर, श्राप विमोचन माता मंदिर, तुलसीदास मंदिर, आत्मेश्वर महादेव मंदिर, नवग्रह मंदिर, सप्तऋषि मंदिर, दत्तात्रेय मंदिर,
  • सूर्यनारायण मंदिर -पुष्कर
  • तुलसीदास जी मंदिर
  • रघुनाथ जी का मंदिर - अजमेर
  • बजरंग गढ़ मंदिर - अजमेर

अलवर (RJ-02)

नीलकंठ महादेव मंदिर (टहला, राजगढ़)
इस मन्दिर का निर्माण 953 ई. में अजयपाल बड़गूर्जर ने करवाया। इस मंदिर में नृत्य करते गणेश जी की मूर्ति है। यह मंदिर गुर्जर प्रतिहार शैली का है।

बूढ़े जगन्नाथ मंदिर (अलवर)
इस मंदिर में रथयात्रा मुख्य आकर्षण है। आषाढ़ शुक्ल अष्टमी से तेरस तक मेला भरता है। सोमनाथ मंदिर (भानगढ़, अलवर)-मंदिर का निर्माण 1631 ई. में माधोसिंह ने करवाया, जो आमेर के राजा मानसिंह का भाई था। भारत का प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर गुजरात में है।

पाण्डुपोल हनुमानजी का मंदिर (अलवर)
यहाँ लेटे हुए हनुमानजी की मूर्ति है। माना जाता है कि पांडवों के अज्ञातवास के समय हनुमानजी ने भीम का घमंड यहाँ तोड़ा था। भाद्रपद में मेला भरता है।

भर्तृहरी मंदिर (सरिस्का, अलवर)
उज्जैन के राजा भर्तृहरी ने यहाँ तपस्या की थी। यहाँ भाद्रपद व वैशाख में मेला भरता है। जिसे कनफटे साधुओं का कुम्भ कहते हैं।

नौगांवा का जैन मंदिर (अलवर)
यहाँ मल्लीनाथ जी का मंदिर है जिसका निर्माण 746 ई. में हुआ। मल्लीनाथजी की पीठ पर प्रशस्ति अंकित है।

नीलकंठ जैन मंदिर (राजगढ़, अलवर)
यह मंदिर जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ का है। वि.स. 979 के शिलालेख के अनुसार मंदिर का निर्माण कनौज शासक महिपालदेव के समय शिल्पी सर्वदेव ने किया। वि.स. 1016 के अनुसार मंथनदेव ने मंदिर के लिए भूमिदान दी।

विजय मंदिर - अलवर मंदिर का निर्माण 1917-18 ई. में महाराजा जयसिंह ने करवाया।

अन्य मन्दिर
  • नलदेश्वर महादेव मन्दिर - थानागाजी (अलवर)
  • नारायणी माता मन्दिर - बरवा डूंगरी (राजगढ़, अलवर)

बाँसवाड़ा (RJ-03)

लकुलीश मन्दिर (अर्थूना)
ये भगवान शिव के 22वें अवतार हैं जिन्होंने पाशुपत सम्प्रदाय चलाया था। यह मन्दिर पंचायतन शैली में बना है जिसका निर्माण चामुण्डा राज ने करवाया।

ब्रह्मा मन्दिर (छींछ, बाँसवाड़ा)
इस मन्दिर का निर्माण जगमाल सिसोदिया ने 12वीं सदी में करवाया। यहाँ नवग्रहों का मन्दिर तथा ब्रह्मा घाट स्थित है। 1495 ई. देवदत्त ने पुनः निर्माण करवाया।

मण्डलेश्वर का शिव मन्दिर
इस मन्दिर का निर्माण 1059 ई. में परमार राजा मण्डन देव ने करवाया। यह मन्दिर पंचायतन शैली में बना है।

घोटिया अम्बा का मन्दिर (बागीदोरा)
यहाँ इन्द्र द्वारा प्रदान किया गया आम का पेड़ लगा है जिसके दर्शन शुभ माने जाते हैं। वनवास के दौरान पांडवों ने कुछ समय यहाँ बिताया था। चैत्र अमावस्या को मेला भरता है।

पार्श्वनाथ जैन मन्दिर (कालिंजरा)
यहाँ भगवान पार्श्वनाथ की खड़ी मुद्रा है जिसके नीचे वि.सं. 1578 ई. लिखा है।

ऋषभदेव जैन मन्दिर (कालिंजरा)
यहाँ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ/ऋषभदेव को समर्पित दिगम्बर मन्दिर है।

त्रिपुरा सुन्दरी-तलवाड़ा (बाँसवाड़ा)
इसे तुराई माता भी कहा जाता है। यह पांचाल जाति की कुल देवी है।

सूर्य मन्दिर (तलवाड़ा, बाँसवाड़ा)
यह मन्दिर जीर्ण शीर्ण हालत में है। इस मन्दिर के पास 12वीं सदी में लक्ष्मीनारायण मन्दिर का निर्माण करवाया गया।

अन्य मन्दिर
  • नीलकण्ठ महादेव मन्दिर - अर्थूना
  • कुम्भेश्वर मन्दिर - अर्थूना
  • सोमनाथ मन्दिर - अर्थूना
  • कनफटा साधु का मन्दिर - अर्थूना
  • कोरणी माता मंदिर - अर्थूना

बाड़मेर (RJ-04)

किराडू के मन्दिर (बाड़मेर)
यहाँ भगवान शिव का मन्दिर है। यहाँ पाँच मन्दिर हैं जिसमें चार भगवान शिव के तथा एक भगवान विष्णु का है। ये मूल निर्माण शैली नागर है। ये मन्दिर परमार और सोलंकी शैली का मिश्रण है। इन मन्दिरों का निर्माण 11वीं-12वीं सदी में किया गया। इन मन्दिरों में सागरमन्थन, कृष्ण लीलाएँ, रामायण व महाभारत के दृश्य दिखाई देते हैं। इन्हें राजस्थान का खजुराहो कहते हैं। इन मन्दिरों के सामने तीन पैरों की महिषासुर मर्दिनी की मूर्ति स्थित है। यहाँ स्थित सोमेश्वर मंदिर प्रतिहार/महामारू शैली में बना है। 1178 ई. में इस मंदिर पर मोहम्मद गौरी ने तथा अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया था। यहाँ के मंदिरों का शिल्प अनूठा है, शिल्पकला के कारण इस मंदिर को 'मूर्तियों का खजाना' कहा जाता है।

गरीबनाथ मन्दिर-शिव, बाड़मेर
इस मंदिर का निर्माण 843 ई./900 वि.स. में जोशी कोमनाथ ने शिवपुरी में करवाया।

आलमजी का धोरा-गुढ़ामलानी, बाड़मेर
यहाँ माघ शुक्ल द्वितीय व भाद्रपद शुक्ल द्वितीय को मेला भरता है जिसमें अश्वपालक अच्छी नस्ल के घोड़े पैदा करने के लिए अपनी घोड़ियाँ लाते हैं। इस स्थल को घोड़ों का तीर्थस्थल कहते हैं।

कपालेश्वर महादेव (चौहटन, बाड़मेर)
इस मंदिर के पास बिशन पग़लिया नामक पवित्र स्थल है, जहाँ भगवान विष्णु के चरण पूजे जाते है। पांडवों ने अपना अज्ञातवास का अन्तिम समय यहाँ बिताया था।

बाड़मेर के अन्य मन्दिर
  • भूरिया बाबा मन्दिर, खेड़िया बाबा मन्दिर, रणछोड़ राय जी का मन्दिर
  • विरात्रा माता मन्दिर - चौहटन (बाड़मेर)

भरतपुर (RJ-05)

उषा मन्दिर (बयाना)
इस मन्दिर का निर्माण बाणासुर ने द्वापर युग में करवाया था। इस मन्दिर में राजपूत व जैन कला का मिश्रण है। इस मन्दिर का पुनः निर्माण लक्ष्मण सेन गुर्जर की रानी चित्रलेखा ने 936 ई. में करवाया। उषा मन्दिर को इल्तुतमिश मुस्लिम शासन काल में उषा मस्जिद बना दिया गया।

गंगा मन्दिर (भरतपुर)
इस मन्दिर की नींव 1846 ई. में बलवन्त सिंह ने रखी थी। 1937 में महाराजा ब्रजेन्द्र सिंह ने इसमें गंगाजी की मूर्ति स्थापित की। यह मन्दिर हिन्दू, मुगल एवं बौद्ध शैली में बना हुआ है। यह मन्दिर 84 खम्भों पर बना है। इस मंदिर का निर्माण बारहदरीनुमा हुआ है।

लक्ष्मण मन्दिर (भरतपुर)
इस मन्दिर का निर्माण 19वीं सदी में बलदेव सिंह ने करवाया। यह भारत का एकमात्र लक्ष्मण मंदिर है।
  • चावड़ देवी मंदिर- भरतपुर
  • सीतारामजी मंदिर - भरतपुर

भीलवाड़ा (RJ-06)

तिलस्वां महादेव मंदिर (मांडलगढ़, भीलवाड़ा)
यहाँ स्थित जल कुण्ड का पानी कुष्ठ व चर्म रोग से मुक्ति दिलाता है। यहाँ प्रतिवर्ष शिवरात्रि को मेला भरता है।

सवाई भोज मंदिर (आसींद, भीलवाड़ा)
यह मंदिर 24 बगड़ावत भाईयों में से एक भाई सवाई भोज का है। यहाँ भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को पशु मेला भरता है। यह मंदिर गुर्जरों का प्रमुख तीर्थ है।

बाईसा महारानी मंदिर (गंगापुर, भीलवाड़ा)
यह मंदिर महादजी सिंधिया की रानी गंगाबाई का है। गंगाबाई की मृत्यु उदयपुर से लौटते समय हो गई जिसका मंदिर महादजी सिंधिया ने करवाया।

हरणी महादेव मंदिर (भीलवाड़ा)
इस मंदिर का निर्माण 1964 में स्वामी प्रत्यक्षानंद महाराज के सान्निध्य में दरक परिवार ने करवाया। शिवरात्रि को यहाँ मेला भरता है। माना जाता है दरक परिवार को मूर्ति स्वप्न में दिखी थी।

उण्डेश्वर मंदिर (बिजौलिया, भीलवाड़ा)
यह विष्णु मंदिर है जिसका निर्माण 1125 ई. में हुआ। इस मंदिर को राजस्थान का प्रथम 'भूमिज शैली' में निर्मित मंदिर माना जाता है। धनोप माता मंदिर (धनोप गांव)- धनोप माता राजा धुंध की कुलदेवी मानी जाती है। यहां प्रतिवर्ष चैत्रशुक्ल एकम से दशमी तक मेला भरता है।

रामद्वारा, भीलवाड़ा
यहाँ रामस्नेही सम्प्रदाय का मुख्य पूजा स्थल है। 1751 ई. में रामचरण जी ने इस सम्प्रदाय की स्थापना की थी। मेला चैत्र कृष्ण एकम से पंचमी को मेला भरता है।
  • धनोप माता - धनोप (फुलियाकलां, भीलवाड़ा)

अन्य मंदिर
  • बीजासण माता का मन्दिर - मांडलगढ़, भीलवाड़ा
  • महानालेश्वर मंदिर - मेनाल, भीलवाड़ा
  • हजारेश्वर मंदिर - मेनाल, भीलवाड़ा
  • यक्षणी माता मन्दिर - मांडलगढ़, भीलवाड़ा
  • मंदाकिनी मंदिर - बिजौलिया, भीलवाड़ा
  • जोगणिया माता मन्दिर - ऊपरमाल, भीलवाड़ा
  • सिंगोली श्याम मन्दिर - मांडलगढ़, भीलवाड़ा
  • कबीरद्वारा मंदिर - हम्मीरगढ़, भीलवाड़ा
  • नृसिंह मंदिर - हम्मीरगढ़, भीलवाड़ा
  • चावण्ड माता मन्दिर - हम्मीरगढ़, भीलवाड़ा
  • मेंढ़की महादेव मंदिर - ऊपरमाल, शाहपुरा

बीकानेर (RJ-07)

भांडेश्वर जैन मंदिर
मंदिर की नींव में पानी की जगह घी काम में लिया गया था। जिससे आज भी मंदिर में घी की सुगन्ध आती है। इस मन्दिर का निर्माण 1411 ई. में ओसवाल महाजन भांडाशाह ने करवाया। यह मन्दिर पाँचवें तीर्थंकर सुमितनाथ जी को समर्पित है। इस मंदिर को त्रिलोक दीपक प्रासाद मंदिर भी कहते है। यह मंदिर तीन मंजिला है जिसकी प्रथम मंजिल पर भगवान सुमतिनाथ की मूर्ति, दूसरी मंजिल पर 24 तीर्थंकरों की तथा तीसरी मंजिल पर भांडाशाह की मूर्ति लगी है। इसे भण्डेश्वर-सण्डेश्वर मंदिर भी कहा जाता है।

कपिल मुनि का मन्दिर (कोलायत), बीकानेर
यहाँ सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिलमुनि का मन्दिर है। कार्तिक मास की पूर्णिमा को यहाँ मेला भरता है जिसे मारवाड़ का पुष्कर कहते हैं। यहाँ स्थित कोलायत झील में करणीमाता के पुत्र लाखा की मृत्यु हो गयी थी जिस कारण चारण जाति के लोग इस मेले में भाग नहीं लेते हैं। कपिल मुनि का जन्म पुष्कर में हुआ था। इनके पिता ब्रह्मा के पुत्र महर्षि कर्दम और माता मनु की पुत्री देवभूति थी। इस मंदिर में दीपदान होता है। इस झील में 52 घाट बने है।

हैरम्ब गणेश मंदिर
मंदिर का निर्माण बीकानेर शासक अनूपसिंह ने जूनागढ़ में करवाया था। यहाँ स्थित गणेशजी की मूर्ति चूहे पर सवार नहीं है बल्कि सिंह पर सवार है जो पूरे भारत में एकमात्र है। माना जाता है कि जब औरंगजेब ने 1669 ई. में मंदिर तोड़ो अभियान चलाया था उस समय अनूपसिंह ने मंदिरों से मूर्तियाँ एकत्रित कर सभी को जूनागढ़ में स्थापित करवाया। जिसमें सिंह पर सवार गणेशजी की भी मूर्ति है।

भैरूजी मंदिर (कोडमदेसर, बीकानेर)
कोडमदेसर, बीकानेर के राठौड़ो की प्रारम्भिक राजधानी थी जहाँ राव बीका ने भैरूजी मंदिर का निर्माण करवाया।

लक्ष्मीनारायणजी का मंदिर (बीकानेर)
इस मंदिर का निर्माण राव लूणकरण ने करवाया था।

रतनबिहारी जी का मंदिर (बीकानेर)
इस मंदिर का निर्माण महाराजा रतनसिंह (1846-51) ने करवाया था।

अन्य मन्दिर
  • जाम्भोजी का मन्दिर-मुकाम, नौखा
  • 33 करोड़ देवी-देवता मंदिर-बीकानेर निर्माण-अनूपसिंह
  • पूर्णेश्वर महादेव मंदिर - भीनासर, बीकानेर
  • पद्मपुरा-बाड़ा जैन मंदिर - दिगम्बर
  • रसिक बिहारी मंदिर-बीकानेर
  • धूनीनाथ मंदिर-बीकानेर

बूंदी (RJ-08)

(i) केशवराय महादेव मन्दिर (केशोरायपाटन, बूँदी)
इस मन्दिर का निर्माण चंबल नदी के किनारे परशुरामजी ने करवाया जिसका 18वीं सदी पुनः निर्माण राव छत्रसाल ने करवाया। यह शिव मन्दिर है।

(ii) कपालेश्वर महादेव मन्दिर (इंद्रगढ़)
इस मंदिर का निर्माण हम्मीर के पिता जैत्रसिंह ने करवाया। यह मंदिर इंद्रगढ़ में चाखण नदी के किनारे नागर शैली में बना है। इस मंदिर के चारों ओर देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हैं।

(iii) गरड़िया महादेव मंदिर (डाबी, बूँदी)

चित्तौड़गढ़ (RJ-09)

बाड़ौली का शिव मन्दिर (भैंसरोड़गढ़)
इस मन्दिर का निर्माण 8वीं सदी में हुआ था। तोरमाण हूण के पुत्र मिहिरकुल को इसका निर्माता माना जाता है। यहाँ स्थित घाटेश्वर मन्दिर में पंचरथ गर्भगृह है। यहाँ शिव पार्वती की मूर्तियाँ स्थापित हैं। यह मन्दिर चम्बल व बामणी नदी के किनारे है। इन मन्दिरों की सर्वप्रथम खोज 1821 ई. में कर्नल जेम्स टॉड ने की थी। ये मन्दिर नागर व पंचायतन शैली का मिश्रण है।

मीराबाई का मन्दिर
यह मन्दिर राणाकुम्भा ने बनाया था जो चित्तौड़गढ़ दुर्ग में है। इस मन्दिर के सामने रैदास की छतरी है जो मीराबाई के गुरु थे। यह मंदिर इण्डो आर्य शैली में बना है।

समिद्धेश्वर महादेव मन्दिर
इस मन्दिर का निर्माण मालवा के शासक राजाभोज परमार ने (1011-55 ई.) करवाया। इस मन्दिर का पुनः निर्माण 1428 में महाराणा मोकल ने करवाया जिस कारण इसे मोकल मंदिर भी कहते हैं। इस मंदिर में जैनधर्म की मूर्तियाँ भी स्थापित हैं। यह मंदिर मारू-गुर्जर शैली में बना है। यहाँ भगवान शिव की त्रिमुखी मूर्ति स्थित है जिस कारण इस मंदिर को त्रिभुवन नारायण मंदिर कहा जाता है। 1150 ई. के कुमारपाल के शिलालेख से मंदिर निर्माण की जानकारी मिलती है।

श्रृंगार चंवरी मंदिर, चित्तौड़गढ़ दुर्ग
यह राणा कुम्भा की पुत्री रमाबाई की शादी की चंवरी थी जिसे बाद में शांतिनाथ जैन मंदिर बना दिया गया। इस चंवरी का निर्माण 1448 में वेलका ने करवाया।

कालिका माता मंदिर, चित्तौड़गढ़
यह प्रारम्भ में सूर्य मंदिर था जिसका निर्माण 8वीं - 9वीं सदी में हुआ। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 713 ई. में राजा मान मौर्य ने करवाया। मुगलों द्वारा जब इस मन्दिर को तोड़ दिया गया तब महाराणा सज्जनसिंह ने इसका पुनः निर्माण करवाकर यहाँ कालिका माता की मूर्ति स्थापित की। राजस्थान में विष्णु के कुअवतार का सबसे प्राचीन अंकन इसी मंदिर में देखने को मिलता है।

मातृ कुण्डिया मंदिर, चित्तौड़गढ़
यह भगवान शिव का मंदिर है जो बनास नदी के किनारे राशमी में है। यहाँ लक्ष्मण झूला प्रसिद्ध है। इसे मेवाड़ का हरिद्वार कहते है। मातृकुंडिया में मंगलेश्वर महोदव का मंदिर स्थित है। यह मंदिर चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित है। यहाँ स्थित कुण्ड में अस्थियां विसर्जित की जाती है, जिस कारण इसे राजस्थान का हरिद्वार कहा जाता है।

नगरी, चित्तौड़गढ़
यह मौर्यकालीन एक बिना छत का मन्दिर प्राप्त हुआ है।

माकनगंज मंदिर, चित्तौड़
यह 625 ई. में निर्मित गुप्तोत्तर कालीन मंदिर है।

अद्भुतनाथ मंदिर, चित्तौड़गढ़
इस मंदिर का निर्माण 15वीं सदी में भूमिज शैली में हुआ।

सांवलिया सेठ मंदिर (मंडफिया गाँव, चित्तौड़गढ़)
इस मंदिर में भगवान कृष्ण की काले रंग की मूर्ति है। इस मंदिर को अफीम मंदिर भी कहते हैं। यहाँ जल झलनी ग्यारस का मेला भरता है।

तुलजा भवानी मंदिर
तुलजाभवानी का मंदिर चित्तौड़गढ़ दुर्ग के रामपोल के पास बना है जिसका निर्माण पृथ्वीराज सिसोदिया के दासी पुत्र बनवीर ने करवाया था। इस मंदिर का निर्माण तुलादान से करवाया गया था। तुलजा भवानी शिवाजी की कुल देवी है।

मानगंज मंदिर (बिछोर, चित्तौड़गढ़)
इस मंदिर का निर्माण गुप्तकाल में हुआ था।

अन्नपूर्णा माता मंदिर
यह मंदिर चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण महाराजा हम्मीर ने करवाया था। इसे बिरवड़ी माता भी कहा जाता है।

नीलकंठ महोदय मंदिर
यह मंदिर भी चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित है। मंदिर में स्थित भगवान शिव की मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि यह मूर्ति पाण्डव अपनी बाजू पर बांधे रखते थे।

बाण माता
यह मंदिर भी चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित है। बाण माता सिसोदिया राजवंश की कुलदेवी है।

सतबीस देवरी
यह मंदिर चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित है जहाँ छोटे-छोटी 27 देवरियाँ है। यह जैन मंदिर है जिसका निर्माण 11वीं सदी में हुआ। इस मंदिर का शिल्प देवलवाड़ा जैन मंदिर से मिलता जुलता है।

अन्य मंदिर
  • सप्तमातृका मंदिर - बाडौली
  • भँवरमाता मंदिर - चित्तौड़गढ़

चूरू - (RJ-10)

तिरुपति बालाजी मंदिर (सुजानगढ़)
इस मन्दिर का निर्माण मोहनलाल जानोदिया ने 1994 में डॉ. एम. नागराज एवं डॉ. वेंकटाचार्य की देख-रेख में करवाया। यह मन्दिर दक्षिण भारत की स्थापत्य शैली पर निर्मित है। इसे वेंकटेश्वर मन्दिर भी कहते हैं। यहाँ मंदिर में तिरुपति तिरुमल्ला देवस्थानम् आंध्रप्रदेश द्वारा प्रदान की गई पाषाण एवं लौह की मूर्तियाँ प्रतिष्ठापित की गई है। मंदिर में भगवान विष्णु के दसों अवतारों के भित्ति चित्र है।

श्यामपाण्डियाजी
कैलाश गाँव, तारानगर (चूरू)

सालासर हनुमान मन्दिर
यह पूरे भारत में एक मात्र दाढ़ी-मूँछ युक्त हनुमान मन्दिर है। माना जाता है कि हनुमानजी की यह मूर्ति जमीन से प्रकट हुई थी। इसे सिद्ध पीठ हनुमान मन्दिर भी कहते हैं। 1757 ई. आसोटा गाँव (चूरू) में मोहनदास किसान खेत में हल चला रहे थे जिन्हें खेत में मूर्ति मिली जिसे सालासर नामक स्थान पर स्थापित कर मंदिर बनवाया। यहीं मोहनदासजी ने 1803 ई. में जीवित समाधी ले ली। माना जाता है कि मंदिर का आरम्भिक निर्माण नूरा व दाउद नामक दो मुस्लिम कारीगरों ने किया। हनुमान जयंती (चैत्र पूर्णिमा) को यहाँ विशाल मेला भरता है।

गोगाजी मंदिर (ददरेवा गाँव, राजगढ़)
ददरेवा गाँव में गोगाजी महाराज का जन्म हुआ था। मोहम्मद गजनवी के साथ युद्ध में गोगाजी की गर्दन यहाँ आकर गिरी थी। जहाँ उनकी शीशमेड़ी बनी है। यहाँ प्रतिवर्ष गोगानवमी (भाद्रपद कृष्ण नवमी) को विशाल मेला भरता है। ददरेवा गाँव में गोगाजी मंदिर के पास ही गोरख तालाब बना है। जिसकी मिट्टी सांप काटे स्थान पर लगाने से जहर का असर नहीं होता है।

अन्य मन्दिर -
  • स्यानण डूंगरी मन्दिर, कालीका माता मंदिर - चूरू
  • साहवा का गुरुद्वारा - साहवा, चूरू

नोट- साहवा [तारानगर (चूरू)] में राजस्थान का सिक्खों का सबसे बड़ा मेला भरता है।

धौलपुर (RJ-11)

मचकुण्ड महादेव मन्दिर
यह मन्दिर गंधामदन पर्वत पर स्थित है। माना जाता है कि यहाँ स्थित जलकुण्ड में स्नान करने से चर्म रोग से मुक्ति मिलती है। मचकुण्ड को तीर्थों का भांजा कहते हैं। मेला - भाद्रपद शुक्ल षष्ठी।

नोट- तीर्थों का मामा पुष्कर (अजमेर) तथा तीर्थों की नानी शाकम्भरी माता (जयपुर) को कहते हैं।

महादेव मन्दिर (सैपऊ)
(पार्वती नदी के किनारे) यहाँ स्थित शिवलिंग पर गंगाजल लाकर अभिषेक किया जाता है।

महाकालेश्वर मंदिर (सरमथुरा, धौलपुर)
मेला - भाद्रपद शुक्ल सप्तमी से चतुर्दशी।

चौपड़ा शिव मंदिर (धौलपुर)
राधा बिहारी मंदिर - धौलपुर के लाल पत्थर से निर्मित। इस मंदिर में ताजमहल के समान बारीक नक्काशी की गई है।

शेर शिकार गुरुद्वारा - मचकुण्ड- यहां सिक्खों के छठवें गुरू हरगोविन्द सिंह ने तलवार के एक वार से शेर का शिकार किया था।

डूंगरपुर (RJ-12)

बेणेश्वर धाम (नवटापुरा)
इस मन्दिर का निर्माण महारावल आसकरण ने करवाया था। यहाँ शिवमंदिर है जो सोम, माही, जाखम नदियों के संगम पर बना है। इसे आदिवासियों का कुम्भ, बागड़ का पुष्कर, बागड़ का कुम्भ कहते हैं। बेणेश्वर धाम की स्थापना 1727 ई. में संत मावजी ने की थी। शिवलिंग पर अफीम चढ़ाई जाती है। आदिवासी अपने पूर्वजों की अस्थियों का यहाँ विसर्जन करते है। यहाँ माघ पूर्णिमा को मेला भरता है। यहाँ खण्डित शिवलिंग की पूजा होती है।

श्रीनाथ जी मन्दिर
इस मन्दिर का निर्माण महारावल पूंजराज ने करवाया। यहाँ भगवान कृष्ण व राधा की मूर्ति स्थापित 

देव सोमनाथ मन्दिर (डूंगरपुर)
इस मन्दिर का निर्माण 14वीं सदी में पंचायतन शैली में किया गया। इस मन्दिर में चूना व सीमेन्ट का प्रयोग नहीं हुआ है। यह मंदिर तीन मंजिला है जिसे ‘बागड़ का वैभव’ कहते है।

नोट- जैसलमेर दुर्ग में भी चूने का प्रयोग नहीं हुआ है।

कालिका माता मन्दिर (डूंगरपुर)
इस मन्दिर में एक दीपक जलता है जो कभी भी नहीं बुझता है।

शिव ज्ञानेश्वर शिवालय (डूंगरपुर)
महारावल शिवसिंह ने गैप सागर झील के किनारे अपनी माता ज्ञान कुंवर की याद मे इस शिवालय का निर्माण करवाया। इस मंदिर का निर्माण 1730 ई. से 1785 के मध्य हुआ।

हरि मंदिर (साबला, डूंगरपुर)
निष्कलंक संप्रदाय के संस्थापक संत मावजी को समर्पित इस मंदिर में भगवान कृष्ण की मूर्ति है।

विजयराज राजेश्वर मंदिर (डूंगरपुर)
इस मंदिर का निर्माण 1882 ई. में डूंगरपुर के महाराजा उदयसिंह द्वितीय की रानी उम्मेद कंवर ने करवाया। जिस पूर्ण विजयराज के पुत्र लक्ष्मणसिंह ने 1923 ई. में करवाया।

गवरी बाई मंदिर (डूंगरपुर)
बांगड़ की मीरा के नाम से प्रसिद्ध गवरी बाई के मंदिर का निर्माण शिवसिंह ने करवाया।

नोट- गवरी देवी को राजस्थान की कोकिला कहते हैं।

फूलेश्वर शिवालय
यह एक शिव मंदिर है जिसका निर्माण 1780 ई. में महारावल शिवसिंह रानी फूल कंवर ने करवाया।

अन्य मन्दिर
  • धनमाता मन्दिर - डूंगरपुर
  • मामा-भाणजा मन्दिर - अटरू (बाराँ)
  • संत मावजी का मन्दिर - साबला (डूंगरपुर)
  • भुवनेश्ववर शिव मंदिर - कांवां (डूंगरपुर)
  • नेमिनाथ मन्दिर - डूंगरपुर
  • आदिनाथ मन्दिर - डूंगरपुर

गंगानगर (RJ-13)

गौरी शंकर मंदिर - श्रीगंगानगर

बुढ्ढा जोहड़ (रायसिंहनगर, श्रीगंगानगर)
इसे राजस्थान का अमृतसर भी कहते है। इसका निर्माण 1954 में बाबा फतेहसिंह ने करवाया। अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर के बाद यह भारत का सबसे बड़ा गुरुद्वारा माना जाता है।

नोट- सिक्खों का राजस्थान में सबसे बड़ा मेला साहवा (चूरू) में भरता है।

जयपुर (RJ-14)

गोविन्द देवजी का मंदिर
यह गौड़ीय सम्प्रदाय का मन्दिर है जिसमें राधाकृष्ण की पूजा की जाती है। सवाई जय सिंह ने वृन्दावन से मूर्ति लाकर इनका मन्दिर बनवाया। इन्हें जयपुर का वास्तविक शासक माना जाता है। इनकी पूजा विधि अष्टयाम सेवा के नाम से प्रसिद्ध है।

जगत शिरोमणि मन्दिर आमेर
आमेर शासक मानसिंह प्रथम (1589-1614 ई.) के पुत्र जगतसिंह की मृत्यु बंगाल व बिहार अभियान में 1594 ई. में हो गयी थी जिसकी याद में मानसिंह की रानी कनकावती ने जगतशिरोमणि मन्दिर का निर्माण करवाया। इस मन्दिर में स्थित भगवान कृष्ण की मूर्ति की पूजा मीराबाई बचपन में करती थी जिस कारण इसे मीरा मन्दिर भी कहते हैं। यह मूर्ति मानसिंह चित्तौड़ से लाये थे। इस मन्दिर का निर्माण पंचायतन शैली में हुआ है।

कल्की मन्दिर (जयपुर)
भगवान विष्णु के 10वें अवतार भगवान कल्की का यह मन्दिर विश्व का प्रथम मन्दिर है जिसमें कल्की को घोड़े के साथ दिखाया गया है। माना जाता है कि यहाँ स्थित घोड़े की मूर्ति के पैर में गड्ढा है जो धीरे - धीरे भर रहा है। जिस दिन यह गड्ढा भर गया उस दिन कलियुग का अन्त हो जाएगा। इस मन्दिर का निर्माण सवाई जयसिंह ने 1739 ई. में करवाया।

लाडली मन्दिर (जयपुर)
इसका निर्माण 1823 ई. में हुआ। यह मन्दिर किशोरी रमण का है जिसे लाडली मन्दिर के नाम से जाना जाता है।

चरण मन्दिर (जयपुर)
इस मन्दिर में भगवान कृष्ण के चरणचिह्न रखे गये हैं। माना जाता है कि भगवान कृष्ण यहाँ गाय चराने आते थे।

द्वादश ज्योति लिंगेश्वर महादेव मंदिर (आमेर)
यह मन्दिर मूलतः जैन तीर्थंकर विमलनाथ को समर्पित था। जिसमें बाद में 12 शिवलिंग स्थापित कर दिये गये। इस मन्दिर का निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह के प्रधानमंत्री मोहनदास खण्डेलवाल ने करवाया जिसे बाद में संघी झूंथाराम का मन्दिर कहने लगे।

नृसिंह मंदिर (आमेर)
पृथ्वीराज कछवाह की रानी बाला बाई को कृष्ण दास पयहारी ने नृसिंह जी की मूर्ति प्रदान की। जिसका मन्दिर आमेर के कदमी महल में बनवाया गया।

बिडला मंदिर
इस मंदिर का निर्माण हिन्दुस्तान चैरिटी ट्रस्ट के माध्यम से गंगाप्रसाद ने करवाया। यह मंदिर सफेद संगमरमर का है जो एशिया का प्रथम वातानुकूलित मंदिर है। इस मंदिर मे नारायण व लक्ष्मीजी की मूर्तियाँ हैं जिस कारण इसे लक्ष्मीनारायण मंदिर भी कहते हैं।

लक्ष्मीनारायण मंदिर (आमेर)
इस मंदिर का निर्माण पृथ्वीराज कछवाह की रानी बालाबाई ने करवाया।

कल्याणजी का मंदिर (आमेर)
इस मंदिर का निर्माण भगवन्तदास ने करवाया। इस मंदिर का निर्माण प्रतिहारकाल में हुआ था।

अंबिकेश्वर महादेव मंदिर (आमेर)
माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 1037 ई. कोकिलदेव ने आमेर विजय पर करवाया था। यह आमेर का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है। सूर्य मंदिर ( आमेर )-यहाँ स्थित 954 ई. के शिलालेख के अनुसार इस मंदिर का निर्माण चामुण्डहरि के पुत्र ने करवाया था।

गणेश मंदिर (मोती डूंगरी, जयपुर)
इस मंदिर का निर्माण 1761 ई. माधोसिंह ने करवाया था। माना जाता है कि मूर्ति माधोसिंह की पत्नी अपने पीहर मावली से लाई थी।

गोपीनाथ मंदिर (जयपुर)
यह राजस्थान में गौडीय संप्रदाय की अन्य पीठ मानी जाती है।

गलता तीर्थ (जयपुर)
गालव ऋषि का आश्रम होने के कारण इसे गलताजी कहा जाता है। यहाँ रामानन्दी संप्रदाय की प्रधान पीठ स्थित है जिसकी स्थापना कृष्णदास पयहारी ने की थी। रामानन्दी पीठ से पहले यहाँ नाथ संप्रदाय में कापालिक शाखा की पीठ थी। 1503 ई. में कृष्णदास पयहारी ने नाथ संप्रदाय के चतुर्भुजनाथ को शास्त्रार्थ में पराजित कर रामानन्दी संप्रदाय स्थापित की जिसे छोटी काशी, उत्तर तोताद्रि मंकी वैली के नाम से जाना जाता है।

चूलगिरी जैन मंदिर (जयपुर)
यह मंदिर जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का मंदिर है।

पद्मप्रभु मंदिर (पदमपुरा)
यह दिगम्बर धारा का जैन मंदिर है। माना जाता है कि भगवान पद्म प्रभू की मूर्ति भूमि से प्रकट हुई थी।

जयपुर के अन्य मन्दिर
  • नटवरजी का मंदिर - आमेर
  • वाराही माता मंदिर - आमेर
  • जगदीश मंदिर - गोनेर
  • पद्म प्रभु मंदिर - बाड़ा पदमपुरा

नकटी माता मन्दिर (भवानीपुरा, चाकसू, जयपुर)
यह मन्दिर 9 वीं सदी में बना गुर्जर प्रतिहार शैली का है। जिसकी तुलना माण्डलगढ़ के जलेश्वर मन्दिर से की जाती है। यहाँ स्थित मूर्ति टूटी अवस्था में है। जिस कारण इसे नकटी माता मन्दिर कहते हैं।

वीर हनुमान मंदिर (सामोद चौमू, जयपुर)
इस मंदिर में हनुमानजी की वृद्ध मूर्ति है जिनका एक पैर जमीन में धंसा है।
  • शाकम्भरी माता मन्दिर - सांभर (जयपुर)
  • शीतला माता मंदिर - चाकसू, (जयपुर)
  • बाँकड़ा बिहारी मंदिर
  • विजय गोविन्ददेव जी मंदिर
  • महंगी महादेव मंदिर
  • मदनमोहन मंदिर
  • राजराजेश्वर मंदिर
  • ब्रजराज बिहार मंदिर
  • चन्द्रमोहनजी का मंदिर
  • राधा किशन जी का मंदिर
  • बलदाऊजी का मंदिर
  • गोवर्धन नाथ मंदिर
  • मेहताब बिहार मंदिर
  • राधा दामोदर मंदिर
  • ब्रजनिधि मंदिर
  • गंगा गोपालजी का मंदिर
  • आनंद कृष्ण मंदिर
  • मदन गोपालजी का मंदिर
  • धनुषधारी निझरा हनुमान मंदिर - आंकड़ गाँव, आमेर (जयपुर)

जैसलमेर (RJ-15)

पार्श्वनाथ मंदिर (लोद्रवा) (23वें)
यहाँ पार्श्वनाथ की सहस्त्रफणी मूर्ति है। मूर्ति स्थापना - 1263 ई. में आचार्य श्री जिनपति सूरि ने की थी। मंदिर का निर्माण महारावल लक्ष्मणसिंह के समय हुआ। धन्ना मंदिर का शिल्पी था।

चुंधी गणेश तीर्थ मंदिर (जैसलमेर)
इस मन्दिर में घर बनाने की मन्नत पूरी होती है। यहाँ स्थित गणेशजी की मूर्ति जमीन से प्रकट हुई है। मन्दिर के पास दो कुएँ हैं जिनमें गंगा का पानी आता है।

तनोट माता का मन्दिर (तनोट गाँव)
इन्हें सैनिकों की देवी, रुमाल वाली देवी, थार की वैष्णो देवी, बी.एस. एफ. के जवानों की देवी कहते हैं। इस माता के मन्दिर में मन्नत मांगकर रुमाल बाँधी जाती है। 1965 के भारत-पाक युद्ध में इस देवी ने चमत्कार दिखाये थे।

गजमंदिर (जैसलमेर)
इस मंदिर का निर्माण गजसिंह की रानी रूपकंवर ने करवाया। यह शिव मंदिर है।

लक्ष्मीनाथ जी मंदिर (जैसलमेर)
यह मंदिर जैसलमेर दुर्ग में स्थित है। मंदिर का निर्माण महारावल वैरिसिंह के समय हुआ। मंदिर में भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की युग्म मूर्ति स्थापित है। माना जाता है कि यह मूर्ति 1437 ई. में मेड़ता से लाई गई थी। जैसलमेर के शासक लक्ष्मीनाथ जी को जैसलमेर का वास्तविक शासक तथा स्वयं को उनका दिवान मानते हैं। इसे जन-जन का मंदिर कहते हैं।

नोट- मेवाड़ शासक एकलिंगजी को मेवाड़ का वास्तविक शासक तथा आमेर शासक गोविंददेवजी को आमेर का वास्तविक शासक मानते है।

सूर्य मंदिर (जैसलमेर)
इस मंदिर का निर्माण महारावल वैरिसिंह ने अपनी रानी सूर्यकंवरी के नाम से करवाया।

रत्नेश्वर महादेव मंदिर (जैसलमेर)
यह मंदिर जैसलमेर दुर्ग में स्थित है। मंदिर का निर्माण महारावल वैरिसिंह ने अपनी रानी रत्ना के नाम पर करवाया था।

भटियाणी माता मंदिर (जैसलमेर)
यह प्रसिद्ध सतीमाता का मंदिर है।
यहां चिन्तामणि पार्श्वनाथ मंदिर है जिसका निर्माण थारूशाह भंसाली ने करवाया।

सुग्रा माता मंदिर/भादरियाराय मंदिर- भादरिया गांव
निर्माण- महारावल गजसिंह
मंदिर को आधुनिक रूप संत हरवंश सिंह ने दिया।

चंद्रप्रभु मंदिर
निर्माण- 12वीं सदी
तीन मंजिला मंदिर
अलाउद्दीन खिलजी ने तोड़ा।

संभवनाथ मंदिर
निर्माण- वि. स. 1497, महारावल बैरसिंह के समय जैन परिवार ने।
रामदेवरा- रूणेचा

जैसलमेर के अन्य मन्दिर
  • चिंतामणि पार्श्वनाथ मंदिर - लोद्रवा
  • घटियाली माता मन्दिर - तनोट
  • आशापूर्णा मंदिर - पोकरण
  • चारभुजा मंदिर - पोकरण
  • खींवज माता मंदिर - पोकरण

जालौर (RJ-16)

आशापुरा माता (मोदरा)
यह सोनगरा चौहानों की कुल देवी है। इस माता के मन्दिर में वि. सं. 1532 का एक शिलालेख लगा है।

सुन्धा माता (जसवंतपुरा, भीनमाल, जालौर)
यह मन्दिर सुन्धा पर्वत पर स्थित है। इस मन्दिर में दिसम्बर 2006 में राजस्थान का प्रथम रोपवे स्थापित किया गया।

सिरेमंदिर (जालौर)
इस मन्दिर का निर्माण जोधपुर शासक मानसिंह ने करवाया। यह स्थल जालन्धरनाथ की तपोभूमि थी जो नाथ सम्प्रदाय के प्रसिद्ध ऋषि थे।

आपेश्वर महादेव मन्दिर (रामसीन)
इस मंदिर का निर्माण 13वीं सदी में हुआ था। यहाँ स्थित मूर्ति में भगवान शिव समाधिस्थ मुद्रा में हैं। त्रेता युग में भगवान राम ने अपने वनवास के दौरान यहाँ रात्रि विश्राम किया था।

वराह मन्दिर (भीनमाल)
यहाँ सात फीट ऊँची वराह की मूर्ति है जिसे वराह श्याम भी कहा जाता है।

नीलकंठ महादेव
माना जाता है इस मंदिर का निर्माण अलाउद्दीन खिलजी ने मस्जिदनुमा करवाया था। मंदिर में स्थित शिवलिंग आधा पीला व आधा काला है।

लक्ष्मीवल्लभ पार्श्वनाथ 72 जिनालय - भीनमाल (जालौर)
यहाँ जैन धर्म के 72 तीर्थंकारों का मंदिर बना है जिनमें 24 तीर्थंकर पूर्वक, 24 तीर्थंकर वर्तमान के, 24 तीर्थंकर आगामी होंगे। इन मंदिर का निर्माण लुकंड परिवार ने करवाया। ये नवीन जैन मंदिर है। यहाँ राजस्थान का सबसे बड़ा जैन मंदिर है जो 60 हजार वर्गफीट में फैला है। यह 14 फरवरी, 2011 को बनकर तैयार हुआ।

अन्य मन्दिर
  • सोमनाथ मन्दिर - संकराना
  • जोगमाया मन्दिर - आहोर जालौर
  • वीर फताजी मंदिर - सांधू (जालौर)
  • सुभद्रा माता मंदिर - भद्राजूण (जालौर) इसे धूमड़ा माता भी कहते हैं।
  • नन्दीश्वर दीप तीर्थ - भीनमाल (जालौर) यहां 52 जिनालय है। मंदिर में एक कीर्ति स्तम्भ भी है।
  • माण्डोली का गुरू मंदिर गुरूवर शांति सुरिश्वर का यह मंदिर पूरे भारत में जैन धर्म का श्रद्धा, विश्वास का मंदिर है।
  • क्षेमकरी/खीमज माता - भीनमाल (जालौर) सोलंकियों की कुलदेवी।
  • सेवाड़ा का शिव मन्दिर - सांचौर (जालौर)

झालावाड़ (RJ-17)

सूर्य मन्दिर (झालरापाटन)
यहां आदमकद दिगम्बर जैन मूर्ति स्थित है।
इस मन्दिर का निर्माण 10वीं सदी में करवाया गया। इस मन्दिर में एक रथिका के अन्दर सूर्य और विष्णु की मूर्तियाँ स्थित हैं। इसे सात सहेलियों का मंदिर, पदमनाभ मंदिर, चारभुजा मंदिर के नाम से जाना जाता है। टॉड ने इसे चारभुजा मंदिर कहा। मंदिर निर्माण में कच्छपघात शैली का प्रयोग हुआ है। यहाँ स्थित मूर्ति में सूर्य भगवान को घुटनों तक जूते पहने हुए दिखाया गया।

नोट- झालरापाटन में अत्यधिक मंदिर होने के कारण 'घंटियों का शहर' कहते है।

शीतलेश्वर महादेव मन्दिर (झालरापाटन)
यह मंदिर महामारू शैली में बना है इस मन्दिर का निर्माण 689 ई. में दुगर्गण के सामन्त वाप्पक ने करवाया। यह मन्दिर चन्द्रभागा नदी के किनारे स्थित है। इस मन्दिर में गंगा व यमुना व लकुलीस के चित्र बने हैं। इसे चन्द्रमौलिश्वर महादेव मन्दिर तथा राजस्थान का प्रथम तिथि युक्त मंदिर कहा है। यहाँ अर्द्धनारीश्वर की मूर्ति स्थापित है।

चांदखेड़ी का जैन मंदिर-(खानपुर, झालावाड़)
यहाँ स्थित मंदिर जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ/ऋषभदेव को समर्पित है।

शान्तिनाथ जैन मंदिर (झालावाड़)
यह मंदिर सूर्य मंदिर शैली व कच्छपघात शैली में बना है।

जूनी जी की नसिया, झालरापाटन
झालावाड़ में हथियागौड़, गुनई, बिनायगा बौद्ध गुफाएँ व स्तूप स्थित है जिन्हें 'राजस्थान का एलोरा' कहा जाता है।

नोट- एलोरा की गुफाएँ औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में है। एलोरा गुफाओं का निर्माण राष्ट्रकूट वंश ने करवाया था। एलोरा गुफाओं को यूनेस्को की सूची में शामिल किया गया है।

अन्य मन्दिर
  • नागेश्वर पार्श्वनाथ मंदिर - उल्हेल
  • बौद्धकालीन गुफाएँ - कोलवी
  • द्वारिकाधीश मंदिर - झालावाड़
  • वराह मंदिर - चन्द्रावती

झुंझुनूँ (RJ-18)

राणी सती (झुंझुनूँ)
यह राजस्थान का सती माता का सबसे बड़ा मन्दिर है जहाँ भाद्रपद अमावस्या को विशाल मेला भरता है।

लोहार्गल मंदिर (लोहार्गल, झुंझुनूँ)
यह मंदिर मालकेतू पर्वत की घाटी में बना। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी से अमावस्या तक यहाँ चौबीस कौस की परिक्रमा होती है।

अन्य मन्दिर
  • मोडा पहाड़ मंदिर - झुंझुनूँ
  • खेमी शक्ति का मन्दिर - झुंझुनूँ

रघुनाथजी मंदिर (खेतड़ी, झुंझुनूँ)
यह एकमात्र मंदिर है जिसमे भगवान राम व लक्ष्मण की मूंछों वाली मूर्ति है। इस मन्दिर का निर्माण राजा बख्तावर की रानी चूंडावती ने करवाया।
  • बाबा रामेश्वरदास मन्दिर - खेतड़ी, झुंझुनूँ
  • भटियानीजी का मन्दिर - खेतड़ी, झुंझुनूँ
  • लक्ष्मीनाथ जी का मन्दिर - खेतड़ी, झुंझुनूँ
  • मनसा माता मन्दिर - उदयपुरवाटी, झुंझुनूँ
  • बिहारी जी का मन्दिर - सिंघाना, झुंझुनूँ

जोधपुर (RJ-19)

महामंदिर (जोधपुर)
महामंदिर का निर्माण जोधपुर शासक मानसिंह ने 1812 में अपने गुरू आयस देवनाथ के कहने पर करवाया। यह मंदिर राजस्थान में नाथ संप्रदाय का सबसे बड़ा मंदिर था। इस मंदिर का निर्माण 84 खम्भों पर किया गया था।

अधरशिला रामदेवजी मंदिर (जालौरिया, जोधपुर)
यहाँ रामदेवजी के पग्ल्ये पूजे जाते है। इस मंदिर में झूलते स्तंभ है।

ज्वालामुखी मंदिर (जोधपुर)
यह मंदिर पचेरिया/चिड़ियाटूक पहाड़ी पर बना है। जिसमे महिषासुर मर्दिनी मूर्ति है।

तीजा मांगी मंदिर (जोधपुर)
इस मंदिर का निर्माण मानसिंह की रानी प्रताप कुंवरी ने करवाया।

नोट- 33 करोड़ देवी-देवताओं का मंदिर जूनागढ़ (बीकानेर) में है।

रसिक बिहारी मंदिर
यह भगवान कृष्ण का मंदिर है। जिसे 'नैनी जी मंदिर' भी कहते है।

पाल बालाजी मंदिर- जोधपुर

श्री श्रीयादे माता मंदिर- जोधपुर इसे पूर्ववत् माया मंदिर भी कहते हैं।

रणछोड़ मंदिर (जोधपुर)
इस मंदिर का निर्माण जसवंत सिंह द्वितीय की रानी जाचेडीराव कंवर ने करवाया। (1905 ई.)

कुंजबिहारी मंदिर (जोधपुर)
इस मंदिर का निर्माण विजयसिंह की पासवान रानी गुलाब कंवर ने 1779 ई. में करवाया।

अचलनाथ महादेव मंदिर (जोधपुर)
इस मंदिर का निर्माण 1531 ई. में गंगा की रानी नानकदेवी ने करवाया।

गंगश्याम मंदिर (जोधपुर)
इस मंदिर का निर्माण गंगा ने अपनी पत्नी पदमावती के कहने पर करवाया। यह भगवान कृष्ण का मंदिर है जिसमें स्थित मूर्ति राव गंगा ने पदमावती के पिता जगमाल से दहेज में प्राप्त की थी।

महावीर मंदिर (ओसियाँ, जोधपुर)
इस मन्दिर का निर्माण 8वीं शदी में प्रतिहार शासक वत्सराज ने करवाया। यह महामारु शैली में बना मन्दिर है। यह मन्दिर एक प्रकार की भित्ति से घिरा है।

सूर्य मंदिर (ओसियाँ, जोधपुर)
इस मन्दिर का निर्माण 10वीं सदी में करवाया गया। यहाँ 10 भुजाओं की महिषमर्दिनी की मूर्ति है। यह मन्दिर पंचायतन शैली में बना है। इस शिव मंदिर को राजस्थान का ब्लैक पैगोड़ा, राजस्थान का कोणार्क कहा जाता है।

नोट- कोणार्क सूर्य मंदिर उड़ीसा में स्थित है।

सचिया माता (ओसियाँ, जोधपुर)
इस मन्दिर का निर्माण 12वीं सदी में पंचायतन शैली में करवाया गया। यह ओसवाल की कुल देवी हैं। यहाँ विष्णु, शिव व सूर्य मन्दिर बनवाये गये। सचिया माता हिन्दू व जैन धर्म के समानता के प्रतीक हैं।

हरिहर मंदिर (ओसियाँ, जोधपुर)
ये मन्दिर पंचायतन शैली में है जिनका निर्माण खजुराहो व ओडिशा के परशुरामेश्वर मन्दिरों जैसा हुआ है। यहाँ कुल 3 मन्दिर हैं जिनमें 2 पंचायतन शैली के तथा 1 एकायतन शैली का है।

पीपड़ला माता का मन्दिर (ओसियाँ, जोधपुर)
यह मन्दिर अलंकृत पीठिका पर बना है।

ओसियाँ (जोधपुर) के जैन मंदिर
यहाँ प्राचीनतम महावीर स्वामी का मंदिर है जिसका निर्माण 8वीं सदी में गुर्जर प्रतिहार शासक वत्सराज ने करवाया जिसमें 1016 ई. में अलंकृत तोरणद्वार लगाया गया। ओसियाँ को राजस्थान का भुवनेश्वर कहा जाता है। सच्चियाय माता जो श्वेताम्बर ओसवालों की कुलदेवी है के मंदिर का निर्माण 1178 ई. में करवाया गया।
  • बाणगंगा मन्दिर - बिलाड़ा, जोधपुर
  • आईमाता मन्दिर - बिलाड़ा, जोधपुर
  • पीपड़ला माता मंदिर - जोधपुर

रावण मन्दिर (मंडौर, जोधपुर)
यह मंदिर उत्तरी भारत का प्रथम मंदिर माना जाता है। मूर्ति चुन्नीलाल ने बनाई।
  • 33 करोड़ देवी-देवताओं की साल- मण्डौर, जोधपुर इसे वीरों की साल भी कहते हैं।
  • काला गौरा भैरव मंदिर - मंडौर, जोधपुर

जोधपुर के अन्य मन्दिर
  • जैन अम्बिका मंदिर - घटियाला, जोधपुर
  • घनश्याम मंदिर - जोधपुर
  • उष्ट्रवाहिनी माता मंदिर - जोधपुर

कोटा (RJ-20)

कंसुआ का शिव मन्दिर
इस मन्दिर का निर्माण 738 ई. में किया गया। यहाँ स्थित शिवलिंग पर 1008 लिंग बने हुए हैं। इस मन्दिर में चतुर्मुखी शिवलिंग की पूजा होती है। मन्दिर में लकुलीश तथा नृत्य गणेश का भित्ति चित्रण है। इस मंदिर का निर्माण मौर्यों ने करवाया था। कण्व ऋषि का आश्रम यहीं स्थित है। 8वीं शदी की कुटिल लिपि में शिवगण मौर्य का शिलालेख स्थित है।

विभीषण मन्दिर (कैथून)
यह भारत का एकमात्र मंदिर माना जाता है। इस मन्दिर का निर्माण तीसरी से पांचवीं सदी के मध्य हुआ था। यहाँ स्थित मूर्ति धड़ से ऊपर तक की है।

मथुराधीश मंदिर (पाटनपोल)
यह वल्लभ सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ है। यहाँ दीपावली पर अन्नकूट, होली पर फागोत्सव तथा जन्माष्टमी पर नन्द महोत्सव किये जाते थे। यहाँ स्थित भगवान कृष्ण की मूर्ति को 1670 ई. में बूंदी लाया गया, जहाँ से 1744 ई. में गुमानशाल हाड़ा कोटा लेकर आये तथा मंदिर का निर्माण करवाया।

चारचौमा शिवालय (कोटा)
यह गुप्तकालीन मंदिर है जो कोटा का सबसे प्राचीन मंदिर है।

त्रिकाल चौबीसी जैन मंदिर (आरकेपुरम, कोटा)
इस मंदिर में तीन कालों के 72 तीर्थंकरों की प्रतिमाएं विराजमान है जिस कारण इसे त्रिकाल चौबीसी मंदिर कहते है। यहाँ मुख्य मंदिर मुनि सुव्रतनाथ का है।

नोट- राज्य का दूसरा त्रिकाल चौबीसी मंदिर उदयपुर में है।

जगमंदिर
इस मंदिर का निर्माण महारानी बृज कंवर ने 1740 ई. में किशोर सागर झील में करवाया।

रंगबाड़ी मंदिर
यह महावीर स्वामी का प्रसिद्ध मंदिर है।

अन्य मन्दिर
  • गेपरनाथ महादेव मंदिर - रथकांकरा, कोटा
  • भीमचौरी का मंदिर (गुप्त कालीन मंदिर में प्राचीनतम)-दर्रा
  • खटुम्बरा का शिव मंदिर - कोटा
  • बूढ़ादीत का सूर्य मंदिर - दीगोद - पंचायतन शैली
  • करणेश्वर महादेव - सांगोद (कोटा)

नागौर (RJ-21)

चारभुजानाथ मन्दिर (मेड़ता, नागौर)
इस मन्दिर का निर्माण रावदूदा ने करवाया जो मीराबाई के दादा थे। इस मन्दिर की पूजा हरिदास जी के वंशज करते हैं इस मन्दिर में स्थित भगवान कृष्ण की पूजा मीरा बाई करती थीं। यहाँ मीराबाई, संत तुलसीदास, रैदास की मूर्तियाँ हैं। श्रावणी एकादशी से पूर्णिमा तक झूल़ोत्सव मेला भरता है।

नोट- मीरा बाई के अन्य मन्दिर- कुड़की (ब्यावर), चित्तौड़गढ़ दुर्ग, जगत शिरोमणी मन्दिर (आमेर-जयपुर), हरिहर मन्दिर (कैलाशपुरी-उदयपुर) है।

बंशीवाले का मंदिर (जायल, नागौर)
इस मंदिर का निर्माण राणा श्रीसगर ने करवाया। गौरीशंकर हीराचंद ओझा जो एक महान इतिहासकार है, ने बंशीवाले मंदिर को मुरलीधर का मंदिर कहा।

शिव मंदिर (जसनगर, मेड़ता, नागौर)
यह मंदिर चौहानकालीन है।

नोट- जसनगर को प्राचीन समय में किष्किंधा कहा जाता था।

गुंसाई मंदिर (जुंजाला, नागौर)
माना जाता है कि भगवान विष्णु ने जब वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन कदम जमीन मांगी थी तब वामन का तीसरा पैर जहाँ रखा गया, वहाँ गुसाईं मंदिर है। माना जाता है कि रामदेवजी की यात्रा तभी पूरी मानी जाएगी जब भक्त रामदेवरा जाकर जुंजाला में गुंसाई जी के दर्शन करेगा।

चतुरदास जी का मंदिर (बुटाटी, डेगाना नागौर)
चतुरदास जी एक प्रसिद्ध संत है। यहाँ लकवे का ईलाज होता है।

अन्य मंदिर
  • दधिमति माता का मन्दिर - गोठ मांगलोद, जायल, नागौर
  • भांवल माता का मन्दिर - मेड़ता, नागौर
  • जंभोजी का मन्दिर - पीपासर (नागौर)
  • फलवर्द्धिका का मन्दिर - मेड़ता, नागौर
  • ब्राह्मणी माता का मन्दिर - नागौर

पाली (RJ-22)

यहाँ तीन जैन मंदिर व एक वैष्णव मंदिर है।

(अ) ऋषभदेव/आदिनाथ जैन मंदिर (रणकपुर, देसूरी, पाली)
इस मन्दिर का निर्माण सेठ धरणकशाह ने मथाई नदी के किनारे करवाया जिस कारण इस मन्दिर को धरणीविहार मंदिर भी कहते है। मन्दिर का शिल्पी दैपाक था। मंदिर की प्रतिष्ठा सोमसुन्दर सूरि ने रखी। मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगे शिलालेख में इसे श्री चतुर्मुख युगादीश्वर विहार तथा त्रैलोक्य दीपक कहते हैं। विमल सूरि ने इस मंदिर को नलिनी गुल्म विमान की जैसी रचना बताई। कवि मेह ने इसे त्रैलोक्य दीपक कहा है। इस मन्दिर में आदिनाथ की मूर्ति है जिसके चार मुख है जिस कारण इसे चौमुखा मन्दिर कहा है। इस मंदिर मे 1444 स्तंभ है जिस कारण इसे स्तंभों का वन कहते है। प्रत्येक स्तंभ का अलंकरण भिन्न है। फर्ग्युसन का कथन - मैं अन्य ऐसा कोई भवन नहीं जानता जो इतना रोचक व प्रभावशाली हो या जो स्तम्भों की व्यवस्था में इतनी सुन्दरता व्यक्त करता है।" मंदिर का निर्माण राणा कुम्भा के समय 1439 ई. में करवाया गया। मंदिर में आदिनाथ/ऋषभदेव की 5 फीट ऊँची संगमरमर की मूर्ति लगी है। मंदिर में कुल 24 मण्डप, 84 शिखर है। मंदिर के मुख्य द्वार की छत पर ऋषभदेव की माता मारूदेवी की हाथी पर बैठे मूर्ति है।

(ब) पार्श्वनाथ जैन मंदिर (रणकपुर, देशुरी-पाली)
यह मंदिर नेमिनाथजी के मंदिर के पास ही स्थित है। मंदिर में श्यामल वर्ण की जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथजी की मूर्ति स्थापित है। निर्माण - वि.स. 1209, कुमारपाल, सोलंकी।

(स) नेमिनाथ जैन मंदिर (रणकपुर, देशुरी-पाली)
दीवारों पर नग्न मूर्तियाँ है जिस कारण इसे पातरिया रो देहरो कहते है। यानि वेश्याओं का मंदिर कहा जाता है। मंदिर की दीवारों पर लगी संभोग मुद्रा की मूर्तिया 'काम' को ईश्वर प्राप्ति में बाधा को प्रकट करती है।

(द) सूर्यनारायण मंदिर (पाली)
इस मंदिर में गणेशजी, सूर्य, पार्वती, ब्रह्मा, लक्ष्मी, विष्णु की मूर्तियाँ है।

फालना के जैन मन्दिर
यहाँ राजस्थान का प्रथम स्वर्ण जैन मन्दिर स्थापित किया गया। इसे गेट-वे-ऑफ गॉडवल या मिनी मुम्बई कहा जाता है। मंदिर का निर्माण 1913 ई. में करवाया गया। फालना जैन मंदिर की मूर्तियों की प्रतिष्ठा भट्टारक आचार्य मुनिचंद्र सुरीश्वर ने की थी।

नोट- मिनी मुम्बई - फालना छाता बनाने के लिए प्रसिद्ध है।

मुछाला महावीर मन्दिर (धाणेराव, पाली)
यहाँ महावीर स्वामी की दाढ़ी मूछों वाली मूर्ति है। मारवाड़ में इन्हें जीवन्त स्वामी कहते हैं। मंदिर का निर्माण 10वीं सदी में हुआ था।

सांडेराव का शांतिनाथ जिनालय (पाली)
निर्माण - पाण्डव वंशधर गंधर्वसेन ने करवाया।

राता महावीर जैन मंदिर (पाली)
तुलना - रणकपुर जैन मंदिर से

सोलेश्वर महादेव का मंदिर (गुढ़ा, पाली)
यहाँ परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि ने तपस्या की।

परशुरामेश्वर मंदिर (सादड़ी, पाली)
यहाँ अमरनाथ की तरह चूने से शिवलिंग बनता है जिस कारण इसे राजस्थान का अमरनाथ कहते हैं। यहाँ भगवान परशुराम ने महादेव की तपस्या की।

सेवाड़ी जैन मंदिर (पाली)
इन मंदिरों का निर्माण 1010&20 ई. में हुआ था। ये मंदिर भूमिज शैली में बने है। सिरियारी जैन तीर्थ ( पाली )- यहाँ तेरापंथ के प्रथम आचार्य श्री भीक्षु की समाधि स्थित है।

वरकाणा जैन मंदिर (पाली)
यहाँ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का मंदिर है।

निंबों का नाथ (पाली)
यहाँ नाथ महादेव का मन्दिर है। माना जाता है कि यहाँ कुंती शिव पूजा करती थी।

अन्य मन्दिर
  • वराह अवतार मंदिर - सादड़ी
  • चिंतामणि पार्श्वनाथ मंदिर- सादड़ी
  • गजानन्द मंदिर - घाणेराव
  • चामुण्डा मंदिर-नीमाज
  • आदिनाथ जैन मंदिर- नारलाई
  • गोतमेश्वर (भूरिया बाबा, आदिवासियों का इष्टदेव) - पाली
  • रणकपुर के मंदिर-आदिनाथ चतुर्मुख जिन प्रसाद
  • शान्तिनाथ मन्दिर, सूर्य मन्दिर, पार्श्वनाथ मन्दिर, चौमुखा मन्दिर।

कामेश्वर मंदिर (आऊवा)
इस मंदिर का निर्माण 850 ई. में गुर्जर प्रतिहार शैली में करवाया गया।

सोमनाथ मंदिर (पाली)
इस मंदिर का निर्माण कुमारपाल सोलंकी ने 1152 ई. में करवाया था।

ओम बन्नासा मंदिर (चोटिला, पाली)
इस मंदिर में बुलेट मोटरसाईकिल की पूजा की जाती है। ड्राईवर इनकी पूजा करते है।

सीकर (RJ-23)

खाटू श्याम जी का मन्दिर
यहाँ शीश की पूजा की जाती है। मन्दिर की नींव 1720 ई. में अजमेर के अजीतसिंह सिसोदिया के पुत्र अभयसिंह ने रखी थी। महाभारत में बर्बरीक के मस्तक को कलियुग में श्याम के रुप में पूजते हैं। श्यामजी भीम के पुत्र घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक थे। यहाँ स्थित मूर्ति दाढ़ी-मूंछ युक्त है। बाबा श्याम को हारे का सहारा कहा जाता है। प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ल एकादशी व द्वादशी को यहाँ विशाल मेला भरता है।

हर्षनाथ मंदिर
इस मन्दिर का निर्माण 10वीं सदी में किया गया। यहाँ भगवान शिव का मन्दिर, भैरवजी का मन्दिर व हर्षनाथ का मन्दिर है। यह मन्दिर महामारु शैली में बना है, जिसका निर्माण 956 ई. विसलदेव चौहान के समय हुआ। 1679 ई. में औरंगजेब के सेनापति खानजहाँ बहादुर ने इस मंदिर को तुड़वा दिया। 18वीं सदी में सीकर के रावराजा शिवसिंह ने यहाँ पुनः मंदिर का निर्माण करवाया। प्रतिवर्ष भाद्रपद त्रयोदशी को यहाँ विशाल मेला भरता है।

नोट- हर्ष जीण माता के भाई थे।

अन्य मन्दिर
  • मुरली मनोहर मन्दिर - लक्ष्मणगढ़ (सीकर)
  • जीणमाता मन्दिर - रैवासा, कोछोर (सीकर)
  • जांटी धाम बालाजी मंदिर - फतेहपुर (सीकर)

सिरोही के मन्दिर (RJ-24)

देलवाड़ा जैन मंदिर (आबू, सिरोही)
यहाँ जैन धर्म के कुल 5 मंदिर है जिनका निर्माण 11वीं 13वीं सदी के मध्य सोलंकी शैली में हुआ। 14 अक्टूबर 2009 ई. में इन मंदिरों पर डाक टिकट जारी हुआ। जैन धर्म के ये पाँच मंदिर निम्न है- विमलशाही/आदिनाथ लूणवसही/नेमिनाथ, फर्ग्यूसन, हेवेल, स्मिथ-कारीगरी व सूक्ष्मता की दृष्टि से इन मंदिरों की समानता पूरे हिन्दुस्तान में नहीं। यहाँ पाँच श्वेताम्बर और एक दिगम्बर जैन मन्दिर है। इन मन्दिरों की छत पर सरस्वती, अंबिका, लक्ष्मी, शंखेश्वरी, पदमावती, शीतला की मूर्तियाँ हैं।

(अ) विमलशाही/आदिनाथ मंदिर (दिलवाड़ा)
निर्माता-गुजरात शासक भीमदेव चालुक्य का सेनापति विमलशाह द्वारा 1031 ई. में शिल्पकार- कीर्तिधर, ऋषभदेव / आदिनाथ का। विमलवसही जैन मंदिर के बारे में कर्नल जेम्स टॉड का कथन- 'भारत वर्ष के भवनों में ताजमहल के बाद यदि कोई भवन है तो वह है विमलवसही का मंदिर'। मंदिर का निर्माण संगमरमर से किया गया है। आदिनाथ की मूर्ति सप्तधातु से बनी है जिनकी आंखों में हीरे लगे है।

(ब) लूणवसही मंदिर (दिलवाड़ा)
निर्माण-धावल के अमात्य वास्तुपाल व तेजपाल 1230 ई. शिल्पी-शोभन, मूर्ति-नेमीनाथ (22वें) की जिसकी स्थापना आचार्य श्री विजय सेन सूरि द्वारा गई गई। मन्दिर के मुख्य द्वार के दोनों ओर दो ताक हैं जिन्हें देवरानी - जेठानी के गवाक्ष कहते हैं। मूर्ति की प्रतिष्ठा चैत्र कृष्ण तृतीया 1230 ई. जैन आचार्य विजय सैन सूरि द्वारा रखी गई। देवरानी-जेठानी के गवाक्ष में बाई ओर के गवाक्ष में आदिनाथ की तथा दाई ओर के गवाक्ष में शांतिनाथ की मूर्ति स्थापित है।

(स) पित्तलहर जैन मंदिर
इस मंदिर का निर्माण भीमाशाह ने करवाया था। जिस कारण इसे भीमाशाह मंदिर भी कहते है। इस मंदिर में जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ/ऋषभदेव की 108 मन की पीतल की मूर्ति है। जिस कारण इन्हें पित्तलहर मंदिर कहते है।

(द) पार्श्वनाथ जैन मंदिर
यह तीन मंजिला मंदिर है जिसके गर्भगृह में जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की मूर्ति स्थापित है। इसे सिलावटों का मंदिर कहते हैं। इस मंदिर का निर्माण 1458-59 ई. मांडलिक और उसके परिवार द्वारा करवाया गया।

(य) महावीर स्वामी जैन मंदिर
यह मंदिर जैन धर्म के अन्तिम व 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी का है। मंदिर का निर्माण - 1582 ई. में किया गया।

अचलेश्वर मंदिर
माना जाता है कि जब महमूद बेगड़ा ने मंदिर पर आक्रमण किया तब मधुमक्खियों ने आक्रमण कर दिया, उस स्थान को भंवराथल कहते है। इस दुर्ग में भगवान शिव की मूर्ति की जगह उनका अंगूठा पूजा जाता है। इस मन्दिर के पास मंदाकिनी कुण्ड है। यहाँ एक गहरा गड्ढा है जो ब्रह्म गड्ढा कहलाता है। मंदिर में भगवान शिव के वाहन नंदी व माता पार्वती की खंडित प्रतिमा है जिसे महमूद बेगड़ा ने खंडित किया था। यह मंदिर आबू से अचलगढ़ दुर्ग की ओर जाते समय रास्ते में पड़ता है। निर्माण- 813 ई.

रसिया बालम और कुंवारी कन्या का मन्दिर (देलवाड़ा)
एक कथा के अनुसार आबू के राजा ने ये घोषणा की थी कि जो कोई पर्वत पर एक रात में झील खोद देगा उसके साथ वह अपनी लड़की की शादी करेगा। रसिया बालम ने एक रात में झील खोद दी जिसका नाम नक्की झील था लेकिन राजा ने अपनी पुत्री की शादी नहीं जिस कारण रसिया बालम तथा राजा की पुत्री ने आत्महत्या कर ली। इन दोनों का मन्दिर बनाया गया।

नोट- माना जाता है कि नक्की झील का निर्माण देवताओं ने अपने नाखूनों से खोदकर किया था।

अर्बुदा देवी का मन्दिर (आबू, सिरोही)
इस माता को अधर देवी तथा राजस्थान की वैष्णो देवी कहते हैं।

सूर्य मन्दिर (वरमान, सिरोही)
इस मन्दिर का निर्माण 7वीं सदी में किया गया।

सारणेश्वर महादेव मंदिर, सिरोही
देवड़ा चौहानों के कुलदेवता है। इस मन्दिर का निर्माण 15वीं सदी में हुआ। मंदिर का निर्माण दुर्जनशाल ने करवाया।

(र) कुंथूनाथ जैन मंदिर
यह दिगम्बर जैन मंदिर है जिसका निर्माण 1449 ई. में महाराणा कुंभा ने करवाया।

वशिष्ठ मंदिर (बसन्तगढ़, सिरोही)
इस मंदिर में अग्निकुण्ड से उत्पन्न राजपूतों के अवशेष है।

सिरोही के अन्य मन्दिर-
  • गोपेश्वरजी का शिव मंदिर - पिंडवाड़ा
  • लक्ष्मीनारायण मंदिर - पिंडवाड़ा
  • ब्रह्मा मंदिर - बसन्तगढ़
  • क्षेमकरी माता मन्दिर - बसन्तगढ़
  • परशुराम मन्दिर - कोजरा
  • ऋषिकेश मंदिर - आबूरोड़
  • भुनेश्वर मंदिर - डाडुआ
  • मारकण्डेश्वर मंदिर - अंजारी
  • देवेश्वर शिव मंदिर - सिरोही
  • रामेश्वर मंदिर - रोहिड़ा
  • श्यामलाल मंदिर - नादिया

सवाईमाधोपुर (RJ-25)

त्रिनेत्र गणेश मन्दिर
यह मन्दिर रणथम्भौर दुर्ग में स्थित है जहाँ शादी का प्रथम कार्ड भेजा जाता है। भाद्रशुक्ल चतुर्थी को यहाँ विशाल मेला भरता है। इस मन्दिर में गणेशजी के मुख की पूजा होती है जिस पर सिंदूर लगाया जाता है। गणेश मंदिर के पीछे प्राचीन शिव मंदिर बना है जिसके सामने हम्मीर देव चौहान ने अपना सिर काटकर चढ़ाया था।

नोट- शेर पर सवार गणेश बीकानेर में है। बाजणा गणेश जी सिरोही में है। नाचना गणेश जी अलवर में है। खड़े गणेश कोटा में है। गढ़ गणेश जी जयपुर में है।

घुश्मेश्वर महादेव मन्दिर (शिवाड़)
यहाँ 12वाँ ज्योतिर्लिंग स्थित है। यहाँ महाशिवरात्रि को मेला भरता है। इस मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं का प्रवेश निषेध है। यहाँ स्थित शिवलिंग पानी में डूबा रहता है।

काला गौरा भैरू (सवाईमाधोपुर)
इसमें भैरूजी की दो मूर्तियाँ है जिसमें एक काला व एक गौरा भैरू है। एक पहाड़ी पर बना है जो 9 मंजिला है। यह मंदिर झूलता भैरू मंदिर भी कहलाता है। यहाँ तांत्रिकों की पीठ थी।

चमत्कार जी मंदिर (आलनपुर, सवाई माधोपुर)
यहाँ भगवान ऋषभदेव की मूर्ति स्थापित है। शरद पूर्णिमा को यहाँ मेला भरता है।

अन्य मन्दिर
  • धुंधलेश्वर मंदिर - सवाईमाधोपुर (जिला)
  • चतुर्भुज नाथ मन्दिर - खंडार
  • चौथमाता का मन्दिर - चौथ का बरवाड़ा
  • अमरेश्वर महादेव मन्दिर - सवाई माधोपुर
  • रामेश्वर मंदिर - खण्डार

टोंक (RJ-26)

कल्याणजी का मन्दिर (डिग्गी)
यहाँ कुष्ठ रोग का इलाज होता है। मुस्लिम इसे कलह पीर के नाम से जानते है। यहाँ विष्णु की चतुर्भुज मूर्ति है। इस मन्दिर का निर्माण महाराणा संग्राम सिंह के समय (1509-28) हुआ था। कल्याणजी के मंदिर में श्रावण पूर्णिमा के दिन पदयात्रियों का विशाल मेला भरता है। भाद्रपद शुक्ल एकादशी व वैसाख पूर्णिमा को भी डिग्गी में मेले का आयोजन होता है।

माण्डव ऋषि का मन्दिर
यहाँ माण्डव ऋषि की तपोस्थली है जहाँ 16 प्राचीन मन्दिर हैं।

देवनारायणजी का मंदिर (जोधपुरिया, टोंक)
देवनारायणजी गुर्जरों के आराध्य देव है। इस स्थल को देवधाम कहते है।

नोट - देवनारायणजी के अन्य मंदिर
  • आसीन्द - भीलवाड़ा
  • देवमाली - ब्यावर
  • देवजी की डूंगरी - चित्तौड़गढ़

उदयपुर (RJ-27)

ऋषभदेव मंदिर - धुलेव ( उदयपुर )
उपनाम - केसरियानाथजी, धुलेव के धणी, भील इसे ‘कालाजी’ कहते हैं। यह मंदिर 1100 खम्भों पर बना है। यहाँ तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की पद्मासन मुद्रा में मूर्ति है। इस मंदिर का निर्माण कोयल नदी के तट पर हुआ। मेला - चैत्र कृष्ण अष्टमी को भरता है। यहाँ दिगम्बर, श्वेताम्बर, वैष्णव, जैन, शैव मन्दिर हैं। केसर का उपयोग होने के कारण इसे केसरियानाथ जी कहते है। 2007 के सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार मंदिर की पूजा जैन करते है। भील इनकी झुठी सौगंध नहीं खाते हैं।

जगत अम्बिका मन्दिर
इस मन्दिर का निर्माण 925 ई. में किया गया। मंदिर का निर्माण अल्लट ने करवाया। इस मन्दिर में दुर्गा के कई रुप हैं जिसमें महिषासुरमर्दिनी रुप सर्वप्रमुख है। यह मन्दिर खजुराहो के लक्ष्मण मन्दिर से मिलता है जिस कारण इसे मेवाड़ का खजुराहो व राजस्थान का दूसरा खजुराहो कहते हैं।

नोट- राजस्थान का खजुराहो किराडू (बाड़मेर) को कहते हैं।

सास-बहू मन्दिर - नागदा (गिर्वा, उदयपुर में)
यह मन्दिर पंचायतन शैली में बना है। इनमें बड़ा मन्दिर सास का तथा छोटा मन्दिर बहू का है। इन मन्दिरों का निर्माण 10वीं सदी में किया गया। इस मन्दिर को सहस्त्रबाहु मन्दिर कहते क्योंकि यह भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मन्दिर में नारी सौन्दर्य का चित्रण हुआ है।

एकलिंगजी का मन्दिर (कैलाशपुरी)
इस मन्दिर का निर्माण 8वीं सदी में बप्पा रावल ने करवाया। महाराणा रायमल ने इसे वर्तमान स्वरुप दिया। इस मन्दिर में एकलिंगजी की चतुर्मुखी काले पत्थर की मूर्ति है। इसमें उत्तर मुख को ब्रह्मा, दक्षिण मुख को शिव, पूर्व मुख को सूर्य, पश्चिम मुख को विष्णु कहा जाता है। यह मन्दिर लकुलीश मन्दिर कहलाता है। राजस्थान में पाशुपत सम्प्रदाय का यह एकमात्र मन्दिर है। एकलिंगजी को मेवाड़ शासक अपना वास्तविक राजा मानते हैं। राणा मोकल ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था।

जगदीश मन्दिर (उदयपुर)
इस मन्दिर का निर्माण जगतसिंह प्रथम ने 1651 ई. में करवाया। इस मन्दिर के गर्भ गृह के सामने गरुड़ की विशाल मूर्ति है। इस मन्दिर के चारों कोणों में शिव पार्वती, गणपति, सूर्य तथा देवी के मन्दिर हैं। इसे सपनों से बना मन्दिर भी कहते है। इस मन्दिर का निर्माण पंचायतन शैली में हुआ। इस मन्दिर का निर्माण अर्जुन, भाणा, मुकुन्द की देख-रेख में हुआ।

टूस का सूर्य मन्दिर (मंदेसर, डबोक, उदयपुर)
यह मन्दिर एकायतन शैली में बना है। यहाँ स्थित मूर्ति में एक अप्सरा हाथी के सिर पर खड़ी है तथा एक प्रतिमा में भगवान सूर्य के साथ 2 स्त्रियों की मूर्ति है।

आहड़ के मन्दिर (उदयपुर)
आहड़ में 10वीं सदी में निर्मित जैन मंदिर है जहाँ जगच्चन्दसूरि ने 12 वर्ष तपस्या की थी। यहाँ स्थित आदि वराह के मन्दिर का निर्माण 953 ई. में अल्लट ने करवाया था। यहाँ स्थित सूर्य मन्दिर में भगवान सूर्य 7 घोड़ों के रथ पर सवार हैं।

शैव मन्दिर (कल्याणपुर, खैरवाड़ा, उदयपुर)
यहाँ स्थित मन्दिर का निर्माण 7वीं सदी में किया गया।

गुप्तेश्वर महादेव मंदिर (उदयपुर)
इस मन्दिर को गिरवा का अमरनाथ या मेवाड़ का अमरनाथ भी कहते हैं।

स्कंधकार्तिकेय मंदिर (उदयपुर)
इस मंदिर का निर्माण 6वीं सदी में हुआ था।

विष्णु मंदिर (उदयपुर)
इस मंदिर का निर्माण राणा कुम्भा की पुत्री रमाबाई ने करवाया। यह मन्दिर पंचायतन शैली में बना है जिसका शिल्पी ईश्वर था।

मच्छन्दरनाथ मंदिर (उदयपुर)
यह मंदिर अपनी सांझियों के लिए प्रसिद्ध है जिस कारण इसे संझा मंदिर भी कहते है।

नोट- संझा गोबर से दीवार पर बनाई जाती है। नाथद्वारा (राजसमंद) की केलों की पत्तों से सांझी प्रसिद्ध है।

बोहरा गणेश मंदिर (उदयपुर)
यह मंदिर आहड़ संग्रहालय के पीछे स्थित है। जिसका निर्माण महाराणा राजसिंह ने करवाया था।

महालक्ष्मी मंदिर
श्रीमाली समाज की पारिवारिक देवी। मंदिर का निर्माण श्रीमाली जाति संपत्ति ट्रस्ट द्वारा होता है। दीवाली पर मेला भरता है। आश्विन कृष्ण अष्टमी को माता का जन्मदिन मनाया जाता है।
  • महाकालेश्वर
  • मंशापूर्ण करणी माता
  • उदयपुर के अन्य मन्दिर - आबूनाथ जी मन्दिर - नागदा (उदयपुर)

बाराँ (RJ-28)

भण्डदेवरा शिव मन्दिर (रामगढ़)
इस मन्दिर का निर्माण 10वीं सदी में मेदवंशीय राजा मलय वर्मा ने करवाया। इस मन्दिर में मिथुन मुद्रा की मूर्तियाँ होने के कारण इसे हाड़ौती का खजुराहो/राजस्थान का मिनी खजुराहो कहते हैं। इस मन्दिर का निर्माण भूमिज शैली में हुआ है। मंदिर का जीर्णोद्धार 1162 ई. में त्रिशवर्मा ने करवाया।

गड़गच्च देवालय (अटरू)
यह राधा कृष्ण का मंदिर है जिसमें गणेश, दुर्गा, पार्वती, शिव आदि की मूर्तियाँ हैं। मंदिर का निर्माण 10वीं सदी में शिव मंदिर के रूप में हुआ। जब औरंगजेब ने तुड़वाया तब इस शिव मंदिर का नाम गड़गच्च देवालय पड़ गया। यह मंदिर खजुराहो शैली में बना शिव मंदिर है।

कल्याण जी का मंदिर (बाराँ)
इस मंदिर का निर्माण राजमाता राजकंवर ने 1480 ई. में करवाया। माना जाता है कि कल्याणजी की मूर्ति रणथम्भौर दुर्ग से लाई गई थी।

सीताबड़ी
यह सहरिया जनजाति का मुख्य आस्था स्थल है। माना जाता है कि भगवान राम के द्वारा जब सीता माता का परित्याग कर दिया गया था तब सीता माता यहीं पर वाल्मीकि के आश्रम में रही थीं तथा यहीं पर लव-कुश का जन्म हुआ था। यहाँ पर लव-कुश नामक दो झरने हैं। यहाँ माता सीता, लक्ष्मण व वाल्मीकि के मंदिर बने है। सीताबड़ी मेले को सहरियों का कुम्भ कहते है।

ब्राह्मणी माता (सोरसन, अन्ता-बाराँ)
यहाँ ब्राह्मणी माता की मूर्ति चट्टान को काटकर बनाई गयी है। यह पूरे भारत में एकमात्र मूर्ति है जिसकी पीठ की पूजा व श्रृंगार होता है। माघ शुक्ल सप्तमी को गधों का मेला भरता है।

फूलदेवरा का शिवालय (अटरू-बाराँ)
इस मंदिर को मामा भांजा का मन्दिर भी कहते है। इस शिवालय में चूने का प्रयोग नहीं हुआ है।

तेली का मंदिर (श्रीनाल गाँव)
यह विष्णु मंदिर है।

प्यारे रामजी का मंदिर (बाराँ)
यह मंदिर रामानंद संप्रदाय की गुदड़पंथ की पीठ है। प्यारेरामजी रामानंद संप्रदाय के कुलगुरू स्वामी श्री रामजी के शिष्य थे।

काकनी शिव मंदिर (छीपाबड़ौद, बाराँ)
यहाँ शैव, वैष्णव, जैन मंदिरों का समूह है। यह मंदिर परवन नदी के किनारे स्थित है।

दौसा (RJ-29)

हर्षद माता मन्दिर (आभानेरी)
यह मन्दिर आठवीं सदी का है। गर्भगृह में चतुर्भुजी हरसिद्धि देवी की मूर्ति है। यहाँ वासुदेव, विष्णु, प्रद्युम्न व बलराम के चित्र हैं। 11वीं सदी में इस मन्दिर को महमूद गजनवी ने नष्ट कर दिया था। यह मन्दिर पंचायतन शैली में आता है। प्रारम्भ में यह मंदिर गुर्जर प्रतिहार शैली में बना था। इस मन्दिर में कृष्ण-रुक्मणि के पुत्र प्रद्युम्न की मूर्ति है जो प्रमुख है।

मेंहदीपुर बालाजी (सिकराय, दौसा)
इस मन्दिर में पूरे भारत से भूत-प्रेतों से मुक्ति पाने के लिए भक्त आते हैं। यहाँ स्थित बालाजी को प्रेतराज, कोतवाल के नाम से पुकारा जाता है। यह मन्दिर आगरा-बीकानेर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है।

झाँझेश्वर महादेव मन्दिर (दौसा)
यहाँ श्रावण मास में मेला भरता है। यहाँ स्थित गौमुख से सर्दियों में गर्म व गर्मियों में ठण्डा पानी बहता है।

अन्य मन्दिर
  • नीलकण्ठ महादेव मन्दिर - दौसा
  • नाथ सम्प्रदाय की पीठ - हींगवा
  • गिर्राजजी मन्दिर - दौसा
  • लक्ष्मण मन्दिर - सिकन्दरा
  • कटारमल भैरव मन्दिर - सिकन्दरा

राजसमंद (RJ-30)

चारभुजा मन्दिर
यह मन्दिर गढ़बोर गाँव में स्थित हैं। यहाँ होली व देवझूलनी एकादशी मेला भरता है। इस मूर्ति की पूजा पाण्डवों ने की थी। इसे मेवाड़ का वारीनाथ कहते है।

द्वारकाधीश का मन्दिर (कांकरोली)
इस मन्दिर का निर्माण 1671 ई. में महाराणा राजसिंह ने आसोटिया ग्राम में स्थापित की, बाद में 1719 ई. में इसे कांकरोली में स्थापित किया। इस मूर्ति को औरंगजेब के मन्दिर तोड़ो अभियान (1669 ई.) के समय मथुरा से लाया गया। यह वल्लभ सम्प्रदाय का मंदिर है।

श्री नाथ जी का मन्दिर (नाथद्वारा)
श्री नाथ जी को सात ध्वजा का स्वामी कहा जाता है। 1669 ई. में औरंगजेब के मन्दिर तोड़ो अभियान के समय मथुरा से दाऊजी महाराजा के नेतृत्व में श्रीनाथजी की मूर्ति को सिंहाड़ गाँव लाया गया जहाँ राणाराजसिंह ने इनका मन्दिर बनवाया जिस कारण सिंहाड़ का नाम नाथद्वारा हो गया। यह राजस्थान में वल्लभ/पुष्टिमार्ग की प्रधान पीठ है जहाँ भगवान कृष्ण की बालरुप में पूजा होती है। इस मन्दिर में दिन में सात बार आरती होती है - मंगला, ग्वाला, राजभोग, उत्थापन, भोग, आरती और शयन। यहाँ स्थित मंदिर को हवेली कहते हैं तथा यहाँ गाये जाने वाले भजन को हवेली संगीत कहते हैं। श्रीनाथजी की मूर्ति के पीछे जो भगवान कृष्ण की लीलाओं के चित्र होते है उन्हें पिछवाईयाँ कहते हैं। जन्माष्टमी, फूलडोल तथा दीवाली का अन्नकूट, नाथद्वारा का प्रसिद्ध है। विट्ठलनाथजी, नवनीत प्रियाजी, कल्याणरायजी, वनमाली लालजी, गोपाललालजी, मदनमोहनजी, यमुनानिकुंजजी आदि वल्लभ संप्रदाय के मन्दिर यहाँ स्थित हैं।

कुन्तेश्वर महादेव मंदिर (फरारा, राजसमंद)
यह महाभारतकालीन मंदिर माना जाता है जिसकी स्थापना पाण्डवों की माता कुंती ने की थी।

अन्य मन्दिर
  • कुम्भश्याम मंदिर - कुम्भलगढ़
  • बैरा की मठ - कुम्भलगढ़
  • अंजनेश्वर महादेव मंदिर - देवगढ़
  • रुपनारायण जी मंदिर - सेवंत्री
  • रोकड़िया हनुमान मंदिर - गढ़बोर
  • जरगाजी का मंदिर - जरगा
  • आमजा माता का मंदिर - रीछेड़गाँव

हनुमानगढ़ (RJ-31)

धुरमेड़ी- (गोगामेड़ी गाँव, नोहर)
यह गोगाजी का महमूद गजनवी से गायों के बचाते हुए युद्ध हुआ जिसमें गोगाजी धड़ कटकर यहाँ गिरा जिस पर मंदिर का निर्माण हुआ। इस मंदिर का प्रारंभिक निर्माण फिरोजशाह तुगलक ने मकबरेनुमा करवाया जिसके प्रवेशद्वार पर बिस्मिल्लाह लिखा। गोगामेड़ी मंदिर का आधुनिक निर्माण बीकानेर के राजा गंगासिंह ने करवाया।
भद्रकाली माता- हनुमानगढ़
ब्रह्माणी माता- पल्लू
यह माता सुनारों व ब्राह्मणों की कुलदेवी है।

करौली (RJ-34)

महावीर जी मन्दिर हिण्डौन (करौली)
चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को महावीर जयंती पर यहाँ चार दिन विशाल मेला भरता है। यहाँ दिगम्बर व श्वेताम्बर धाराओं के मन्दिर हैं। मेले में जिनेन्द्र रथ यात्रा निकाली जाती है। महावीर का मंदिर हिण्डौन सिटी, करौली में स्थित है। हिण्डौन सिटी का प्राचीन नाम चांदनपुर था जिस कारण महावीर जी को 'चांदनपुर के महावीर' कहा जाता है। मंदिर का निर्माण जैन श्रावक अमरचंद बिलाला ने करवाया था।

मदनमोहन जी का मन्दिर
इस मन्दिर का निर्माण 1748 ई. में महाराजा गोपालसिंह ने करवाया। मदनमोहन जी की मूर्ति महाराजा गोपालसिंह ने 1728 ई. में गुसाई सुबलदास द्वारा जयपुर से मंगवाई। यह मन्दिर गौड़ीय सम्प्रदाय का है। अमावस्या को मेला भरता है।

प्रतापगढ़ (RJ-35)

गोतमेश्वर महादेव मन्दिर (अरनोद)
गोतमेश्वर को भूरिया बाबा के नाम से भी जाना जाता है जो मीणाओं के आराध्य देव हैं। मीणा इनकी झुठी कसम नहीं खाते है।

अन्य मन्दिर
  • दीपनाथ महादेव मन्दिर - प्रतापगढ़
  • भंवर माता मन्दिर - छोटी सादड़ी

नोट- RJ-32 कोटपुतली व RJ-33 रामगंज मंडी के है।

ब्यावर
  • पीपलाज माता मंदिर - ब्यावर
  • बलाड़ का जैन मंदिर - ब्यावर

कुशाल माता (बदनौर, ब्यावर)
  • इस मन्दिर का निर्माण महाराणा कुम्भा ने करवाया।
  • कल्पवृक्ष मंदिर - ब्यावर

खैरथल-तिजारा
तिजारा जैन मंदिर (खैरथल)- यहाँ 8वें जैन तीर्थंकर चन्द्रप्रभु का मंदिर है। माना जाता है कि यह मूर्ति देहरा गाँव से प्राप्त हुई थी।
चन्द्रप्रभु जैन मंदिर

बालोतरा

नाकोड़ा/मेवानगर पार्श्वनाथ मंदिर (बालोतरा)
यहाँ पौष बढ़ी दशमी को पार्श्व नाथ का जन्म महोत्सव मनाया जाता है तथा चांदी के रथ पर पार्श्वनाथ की शोभायात्रा निकलती है। इस मन्दिर के पास भैरवजी, रणछोड़जी, शिवजी व हनुमानजी के मन्दिर हैं। भैरव जी को हाथ का हुजूर व जागती जोत कहते है। 23 वें पार्श्वनाथ की मूर्ति 1511 ई. में आचार्य कीर्तिरत्न सूरि द्वारा नाकोड़ा भैरव की स्थापना।

रणछोड़ मन्दिर (खेड़, बालोतरा)
यहाँ स्थित वैष्णव मन्दिर को रणछोड़ मन्दिर कहते हैं जिसके प्रवेश द्वार पर गरुड़ की प्रतिमा है। मन्दिर का निर्माण 1173 ई. में हुआ था।

ब्रह्मा मंदिर-आसोतरा, बालोतरा
यह राजस्थान में दूसरा ब्रह्मा मंदिर है जिसका निर्माण 1984 ई. में खेतरामजी महाराज ने करवाया।

मल्लीनाथजी मंदिर-तिलवाड़ा, बालोतरा
तिलवाड़ा गाँव में लूनी नदी के किनारे लोकदेवता मल्लीनाथजी ने समाधि ली जहाँ इनका मंदिर बना है। चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी को मल्लीनाथजी का पशुमेला है जो राजस्थान का सबसे प्राचीन पशु मेला है।
  • महादेव मन्दिर - खेड़ (बालोतरा)
  • हल्देश्वर महादेव मन्दिर - पीपलूद (बालोतरा)
  • भटियाणी माता मन्दिर - जसोल (पंचपदरा, बालोतरा)
  • नागणेची माता मन्दिर - नगाणा (बालोतरा)

डीग

  • गोकुलचंद्र मंदिर, कामां (डीग)- यह पुष्टिमार्गीय वैष्णव मंदिर है।
  • 84 खम्भों की मस्जिद (कामां, डीग)- यहाँ पहले शिव व विष्णु का मन्दिर था इसका निर्माण 8 वीं सदी में हुआ था। मुस्लिम काल में मन्दिरों को तोड़कर मस्जिद बना दी गयी।

फलौदी

  • ब्राह्मणी मन्दिर - फलौदी
  • लटियालजी मन्दिर - कापरड़ा, फलौदी

डीडवाना-कुचामन

जैन विश्व भारती (लाडनूं, कुचामन-डीडवाना)
जैन विश्वभारतीय विद्यालय भारत का एक समविश्वविद्यालय है। 1,00,600 वर्ग मीटर में फैले इस परिसर की स्थापना 1970 में आचार्य तुलसी की प्रेरणा से की गई थी। यह डीम्ड यूनिवर्सिटी है।
  • कैवाय माता मन्दिर - किणसरिया गाँव, परबतसर, डीडवाना
  • पाड़ा माता का मन्दिर/सरकी माता - डीडवाना-कुचामन
  • तेजाजी का मंदिर - खड़नाल, डीडवाना

सलूम्बर

पिपलाद माता मन्दिर - उनवास (सलूम्बर)

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

राजस्थान की ऐतिहासिक विरासत और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को RPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।