स्तम्भ एवं मीनारें
यह लेख राजस्थान के स्तम्भों, मीनारों और स्मारकों को इतिहास, कला और गौरव के प्रतीकों के रूप में जीवंत रूप से प्रस्तुत करता है। इसमें विजय स्तम्भ जैसे भव्य निर्माणों से लेकर घण्टाघरों, जंतर-मंतर और आधुनिक शहीद स्मारकों तक, राजस्थान की स्थापत्य परंपरा और ऐतिहासिक चेतना की निरंतरता को सरल भाषा में समझाया गया है।
लेख बताता है कि ये स्तम्भ और मीनारें केवल ऊँची इमारतें नहीं, बल्कि विजय, ज्ञान, समय, आस्था और बलिदान की कहानी कहने वाले मौन साक्षी हैं। विजय स्तम्भ में अंकित मूर्तियाँ, जैन कीर्ति स्तम्भ की धार्मिक भावना, जंतर-मंतर की वैज्ञानिक दृष्टि, घण्टाघरों की सामाजिक उपयोगिता और शहीद स्मारकों की भावनात्मक शक्ति सब मिलकर राजस्थान की बहुआयामी पहचान को सामने लाते हैं।
कुल मिलाकर यह लेख पाठक को अतीत से वर्तमान तक की एक ऐसी यात्रा पर ले जाता है, जहाँ पत्थर और स्थापत्य के माध्यम से इतिहास बोलता है, संस्कृति साँस लेती है और राष्ट्रप्रेम महसूस होता है।
प्रमुख स्तम्भ एवं मीनारें
विजय स्तम्भ - चित्तौड़गढ़
विजय स्तम्भ (Tower of Victory) - यह चित्तौड़ दुर्ग में स्थित 122 फीट ऊँची 9 मंजिला इमारत है जिसका निर्माण 1440-48 ई. में राणाकुम्भा ने सारंगपुर (मालवा) विजय (1437 ई.) के उपलक्ष में करवाया। इसमें 157 सीढ़ियाँ हैं व आधार की चौड़ाई 30 फुट है। इसकी आठवीं मंजिल पर कोई मूर्ति नहीं है। इस इमारत का शिल्पी जैता था। जिसका सहयोग नाथा, पामा, पूंजा ने किया। इसकी प्रथम मंजिल पर कुम्भस्वामी/विष्णु मंदिर है जिस कारण उपेन्द्र नाथ ने इसे विष्णु ध्वज कहा है। इसकी तीसरी मंजिल पर 9 बार अरबी भाषा में अल्लाह शब्द लिखा है। इसके चारों ओर मूर्तियाँ होने के कारण इसे मूर्तियों का अजायबघर कहते हैं। यह राजस्थान की प्रथम इमारत है जिस पर 15 अगस्त 1949 को एक रुपये का डाक टिकट जारी किया गया। यह राजस्थान पुलिस व माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का प्रतीक चिह्न है। इसके निर्माण में 90 लाख का खर्चा आया। इसकी 9वीं मंजिल पर अत्रि-महेश ने (अभिकवि) मेवाड़ी भाषा में कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति की रचना की। जिसमें राणा कुम्भा की विजयों का वर्णन है।
विजय स्तम्भ के उपनाम-विक्ट्री टावर
- कुतुबमीनार से श्रेष्ठ - कर्नल जेम्स टॉड
- रोम के टार्जन के समान - फर्ग्युसन
- हिन्दू प्रतिमा शास्त्र की अनुपम निधि - आर. पी. व्यास
- संगीत की भव्य चित्रशाला - डॉ. सीमा राठौड़
- पौराणिक देवताओं का अमूल्य कोष - गौरीशंकर हीराचंद ओझा
- लोकजीवन का रंगमंच - गोपीनाथ शर्मा
- विष्णु ध्वज - डॉ. उपेन्द्रनाथ
जैन कीर्ति स्तम्भ - चित्तौड़गढ़
यह चित्तौड़ दुर्ग में स्थित है जिसे जैन स्तम्भ/मेरु कनकप्रभः भी कहते हैं। इसका निर्माण 12वीं सदी में बघेरवाल महाजन सानाय का पुत्र जैन व्यापारी जीजा ने करवाया। इसकी ऊँचाई 75 फीट तथा 7 मंजिले हैं। यह इमारत जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ/ऋषभदेव को समर्पित है।
नोट- जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं जिनमें 24वें महावीर स्वामी थे।
ईसर लाट - जयपुर
इस इमारत का निर्माण सवाई ईश्वरी सिंह ने 1749 ई. में करवाया था। यह इमारत 1748 ई. में हुए मराठों के साथ राजमहल युद्ध के बाद बनायी गई। इस इमारत को सरगासूली भी कहते हैं।
घण्टाघर - बीकानेर
घण्टाघर चौराहे पर बनाया गया है जिसमें चारों ओर घड़ियाँ लगी हैं जो समय बताती है। रेलवे स्टेशन के पास 1967 ई. में गिरधारी दास ने अपने पिता सेठ नरसिंह दास कोठारी की स्मृति में घण्टाघर का निर्माण किया था।
शाही घण्टाघर - धौलपुर
इस घण्टाघर का निर्माण निहालसिंह ने 1880-1910 ई. में करवाया था। इसे निहाल टॉवर भी कहते हैं। यह घण्टाघर भारत का सबसे ऊँचा व बड़ा घण्टाघर है। इस घण्टाघर की ऊँचाई 150 फीट है। यह 8 मंजिला है।
वेली टॉवर घण्टाघर - कोटा
इस घण्टाघर का निर्माण पॉलिटिकल एजेन्ट वेली की देख-रेख में 1889-1940 ई. के मध्य महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय ने करवाया था।
धर्म स्तूप - चूरू
इस घण्टाघर में भगवान कृष्ण शंकराचार्य, जगदम्बा, गुरुनानक, महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध की मूर्तियाँ लगी है जिस कारण से सर्वधर्म सद्भाव का स्तूप कहते हैं। इस घण्टाघर का निर्माण लाल पत्थरों से करवाया गया जिस कारण इसे लाल घण्टाघर कहते हैं। 1930 में यहाँ सर्वप्रथम तिरंगा फहराया गया था। इस घण्टाघर की स्थापना 1925 में स्वामी गोपालदास के द्वारा की गई थी।
पृथ्वीराज स्मारक - करनाल अजमेर
यह स्मारक पृथ्वीराज चौहान तृतीय का है जिसका निर्माण तारागढ़ पहाड़ी पर करवाया गया। 13 जनवरी, 1996 ई. इस स्मारक को राष्ट्र को समर्पित किया गया।
जंतर-मंतर
सवाई जयसिंह ने ज्योतिष अध्ययन व नक्षत्रों की जानकारी प्राप्त करने के लिये भारत में जयपुर, दिल्ली, बनारस, मथुरा, उज्जैन में पाँच वैद्यशालाओं का निर्माण करवाया। जिसमें सबसे प्राचीन वैद्यशाला दिल्ली की है जिसका निर्माण 1724 ई. में करवाया गया। दूसरी वैद्यशाला जयपुर की है जिसका निर्माण 1728 ई. में करवाया गया। यह वैद्यशाला पाँच वैद्यशालाओं में सबसे बड़ी है इस वैद्यशाला में अक्षंशीय परीक्षण हेतु 'जयप्रकाश यंत्र', वायु परीक्षण हेतु रामयंत्र व समय गणना हेतु एशिया की सबसे बड़ी सौर घड़ी जिसे सम्राट यंत्र' कहते हैं आदि यंत्र है। 2010 ई. में जयपुर जंतर-मंतर को यूनेस्को की विश्व धरोहर है जिसका नाम यूनेस्को की सूची में शामिल किया गया।
गडरा का शहीद स्मारक
यह स्मारक बाड़मेर में स्थित है जो 1965 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुये रेल 14 कर्मचारियों की स्मृति में बनाया गया था।
जुबली क्लॉक टॉवर (अजमेर)
इस टॉवर का निर्माण 1887 ई. में महारानी विक्टोरिया की स्वर्ण जयंती की स्मृति पर अजमेर रेलवे स्टेशन के सामने करवाया गया।
अमर जवान ज्योति स्मारक
एस.एम.एस. स्टेडियम, जयपुर
महाराणा प्रताप विजय स्मारक (दिवेर, राजसमंद)
इस स्मारक का उद्घाटन 2012 ई. में हुआ। इस स्मारक का उद्घाटन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने किया था। स्थानीय भाषा में इसे 'मेवा का मधारा' कहा जाता है। 1582 में महाराणा प्रताप ने दिवेर चौकी को जीता था जहाँ आज स्मारक बना है।
मानगढ़ धाम स्मारक - बाँसवाड़ा
17 नवम्बर, 1913 ई. इस स्थान पर गोविन्द गुरू के नेतृत्व में सम्मेलन था जिस पर अंग्रेजों ने गोलिया चला दी जिससे 1500 लोग मारे गये इस घटना को राजस्थान का जलियांवाला बाग कहा जाता है।
जयपुर परकोटा - जयपुर
- यह परकोटा 9 वर्ग मील में बना है जिसका निर्माण सवाई जयसिंह ने करवाया था। परकोटे का वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य थे। डॉ. टी. एच. हैंडले के कहने पर रामसिंह द्वितीय ने परकोटे को गुलाबी/गेरूआ रंग (1868 ई. ) करवाया। चाँदपोल, सूरजपोल, अजमेरी गेट, सांगानेरी गेट, ध्रुवपोल, न्यूगेट, घाट गेट सात दरवाजे है।
- बिशप हैबर ने इस परकोटे को क्रेमलिन की दीवारों से भी सुन्दर बताया है।
- 6 जुलाई, 2019 ई. जयपुर परकोटे को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में 38वें स्थान पर रखा गया।
नोट- जयपुर भारत का दूसरा शहर है जो विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ है। प्रथम शहर अहमदाबाद है।

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