छतरियां (राजस्थान)
यह लेख राजस्थान की छतरियों को केवल स्थापत्य स्मारक के रूप में नहीं, बल्कि स्मृति, सम्मान और सांस्कृतिक परंपरा के जीवंत प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि कैसे राजा-महाराजाओं, रानियों, वीरों, सेनानायकों, संतों और विशिष्ट व्यक्तियों के अंतिम संस्कार स्थलों पर उनकी याद में छतरियों का निर्माण किया गया, जो आज इतिहास की मौन साक्षी बनकर खड़ी हैं।
लेख में राजस्थान के विभिन्न राजवंशों- जैसलमेर, जोधपुर, जयपुर, मेवाड़, बूंदी, कोटा, बीकानेर आदि- के श्मशान स्थलों और उनसे जुड़ी छतरियों का विस्तृत वर्णन मिलता है। खंभों की संख्या, स्थापत्य शैली, भित्ति चित्र, लोककथाएँ और बलिदान की कहानियाँ इन छतरियों को विशेष बनाती हैं। चेतक, पन्नाधाय, गोरा-धाय, जसवंत सिंह, मूसी रानी जैसी ऐतिहासिक स्मृतियाँ पाठक को भावनात्मक रूप से राजस्थान के गौरवशाली अतीत से जोड़ती हैं।
कुल मिलाकर यह लेख छतरियों को पत्थरों की संरचना नहीं, बल्कि वीरता, त्याग, प्रेम, विश्वास और स्मृति की अमर विरासत के रूप में प्रस्तुत करता है, जहाँ इतिहास आज भी जीवित महसूस होता है।
सेठ, साहूकार व राजा- महाराजाओं को जहाँ जलाया जाता था उस स्थान पर उनकी स्मृति में इमारत बनाई जाती है जिसे छतरी कहते हैं-
प्रमुख राजवंशों के श्मशानघाट
- बड़ा बाग - जैसलमेर राजवंश का शमशान घाट जिसका प्रारम्भ महारावल जैतसिंह द्वितीय ने किया जिसे पूर्ण लूणकरण ने करवाया। लूणकरण ने यहाँ सर्वप्रथम 1528 ई. में अपने पिता जैतसिंह की छतरी का निर्माण करवाया।
- मंडोर की छतरियाँ - जोधपुर राजवंश के श्मशान मंडोर के पास स्थित हैं। यहाँ मामा-भाणजा की छतरी, गोराधाय की छतरी, कागा की छतरी स्थित है। सबसे बड़ी सुन्दर छतरी महाराजा अजीतसिंह व सबसे पुरानी छतरी राव गंगा की है।
- पंचकुण्डा की छतरियाँ - जोधपुर महारानियों की कुल 49 छतरियाँ हैं जिसमें मानसिंह की भटियानी रानी की छतरी, रानी सूर्य कंवरी की छतरी 32 खम्भों की है जो सबसे बड़ी है।
- क्षारबाग/छत्रविलास - कोटा राजवंश के शाही श्मसान।
- केसर बाग - बूँदी राजवंश की छतरियाँ यहाँ कुल 66 छतरियाँ हैं, जिसमें महाराज कुमार दूदा की छतरी सबसे प्राचीन व विष्णुसिंह की छतरी सबसे नवीन है।
- गैटोर की छतरियाँ - जयपुर राजवंश की, इसमें प्रथम छतरी सवाई जयसिंह व अन्तिम माधोसिंह द्वितीय की है। इन छतरियों में सवाई जयसिंह की छतरी सबसे सुन्दर है। जिसकी एक प्रतिलिपी लंदन के केनिसंगल म्यूजियम में रखी गई है।
- महारानियों की छतरी - जयपुर
- देवीकुण्ड की छतरी - यह छतरी कल्याण सरोवर के पास बनी है। बीकानेर राजवंश का निजी श्मशान घाट है। यहाँ राव कल्याणमल से राव डूंगरसिंह तक की छतरियाँ बनी है। यहाँ सूरतसिंह के पुत्र मोतीसिंह की पत्नी दीप कुंवरी की छतरी बनी है जो बीकानेर राजघराने में सती होने वाली अन्तिम महिला थी।
- आहड़ की छतरियाँ - मेवाड़ राजवंश, इसमें प्रथम छतरी अमरसिंह प्रथम की है। इन्हें गंगोद्भव स्थान की महासतियां भी कहा जाता है।
प्रमुख छतरियाँ
- 1 खम्भें की छतरी सवाई माधोपुर-रणथम्भौर (सवाई माधोपुर)
- 4 खम्भों की छतरी- श्रृंगार चंवरी (चित्तौड़गढ़) निर्माण- राणा कुम्भा यह मूलत: शांतिनाथ जैन मंदिर है।
- 4 खम्भों की छतरी - जोधपुर, गौराधाय की।
- 4 खम्भों की छतरी - चित्तौड़गढ़ दुर्ग यह छतरी मीरा मंदिर के सामने है। यह छतरी संत रैदास की है।
- 4 खम्भों की छतरी - चित्तौड़गढ़ दुर्ग यह छतरी हनुमानपोल व भैरव पोल के मध्य है। कल्ला राठौड़ की छतरी है।
- 6 खम्भों की छतरी - लालसोट (दौसा) - बंजारे की।
- 6 खम्भों की छतरी- यह छतरी जयमल राठौड़ की है जो चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके (1567-68) में अकबर की सेना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये थे। यह छतरी चित्तौड़गढ़ दुर्ग के हनुमानपोल व भैरवपोल के मध्य बनी है।
- 8 खम्भों की छतरी - बांडोली, सलूम्बर - यह महाराणा प्रताप की है। इस छतरी का निर्माण अमरसिंह प्रथम ने केजड़ बाँध पर करवाया था।
- 8 खम्भों की छतरी - सरिस्का, अलवर - यह मिश्र जी की छतरी है। यहाँ नैड़ा/टहला की छतरी है।
- 8 खम्भों की छतरी - मांडलगढ़, भीलवाड़ा- यह महाराणा सांगा की छतरी है जिसका निर्माण जगनेर, भरतपुर के अशोक परमार ने करवाया।
- 10 खम्भों की छतरी - यह छतरी मामा-भांजा की है जो मेहरानगढ़ (जोधपुर) में स्थित है।
- 12 खम्भों की छतरी - कुम्भलगढ़ दुर्ग, राजसमन्द - यह उड़ना राजकुमार पृथ्वीराज सिसोदिया की है। नारियों के चित्र है। इस छतरी का शिल्पी घषनपना थे।
- 16 खम्भों की छतरी - नागौर दुर्ग - यह अमरसिंह राठौड़ की है। जिन्हें कटार का धणी कहा जाता है।
- 18 खम्भों की छतरी - यह छतरी जसवंत सिंह प्रथम ने अपने प्रधानमंत्री राजसिंह चम्पावत की स्मृति में बनवाई। जोधपुर में है।
- 20 खम्भों की छतरी - जोधपुर - यह सिंधवियों की छतरी है। यहाँ अखैराज, अहाड़ा हिंगोला की भी छतरी है।
- 32 खम्भों की छतरी - मांडलगढ़, भीलवाड़ा - यह जगन्नाथ कच्छवाह की छतरी है जिसमें हिन्दू-मुस्लिम शैली का प्रयोग हुआ है। इस छतरी पर शिवलिंग बना है। जिसकी ऊँचाई 5 फीट है।
- 32 खम्भों की छतरी - बदनोर (ब्यावर) यह छतरी जोधसिंह की है।
- 32 खम्भों की छतरी - रणथम्भौर, सवाईमाधोपुर - इस छतरी का निर्माण हम्मीर देव चौहान ने अपने पिता जैत्रसिंह के 32 वर्ष के शासनकाल की याद में करवाया। इस छतरी पर बैठकर हम्मीर देव न्याय करते थे। जिस कारण से इसे न्याय की छतरी कहते हैं। यह धौलपुर के लाल पत्थर बनाया गया है।
नोट- न्याय की जंजीर आगरा दुर्ग में जहाँगीर ने लगवायी थी।
- 32 खम्भों की छतरी - जोधपुर रानी सूर्य कंवरी की।
- 66 खम्भों की छतरी - ये छतरी बूंदी में है जो हाड़ा शासकों की है।
- 80 खम्भों की छतरी - अलवर - यह मूसीरानी की छतरी है जो महाराजा बख्तावर सिंह की पासवान थीं। यह पासवान बख्तावर की मृत्यु पर सती हुई थीं जिसकी याद में विनयसिंह ने 80 खम्भों की छतरी बनवायी। (1815 ई. ) ये दो मंजिला छतरी है जिस पर रामायण व महाभारत के भित्ति चित्र हैं।
- 84 खम्भों की छतरी देवपुरा गाँव- बूँदी - इस छतरी का निर्माण राव अनिरुद्धसिंह हाड़ा ने धाभाई देवी की स्मृति में 1683 ई. में राव देवा ने करवाया। यह 3 मंजिला छतरी है। इस छतरी पर पशु-पक्षियों के चित्र हैं। इस छतरी पर कामसूत्र के चित्र बने है। इस छतरी को मूसी महारानी की छतरी कहते है।
- जसवंत थड़ा, जोधपुर - इस छतरी का निर्माण महाराजा सरदार सिंह ने जसवंत द्वितीय की याद में (1906) करवाया। इसे राजस्थान का ताजमहल कहते हैं। इस छतरी के पास सुमेरसिंह, सरदारसिंह, उम्मेदसिंह, हनुवंतसिंह की छतरियाँ बनी है।
- कागा की छतरी, जोधपुर - यहाँ जोधपुर राजपरिवार की छतरियाँ हैं इस स्थान पर कागभुशुण्डि ऋषि ने तपस्या की।
- सेनापति की छतरी - मंडोर, जोधपुर मानसिंह के सेनापति इंद्रराज सिंघवी की।
- गोरा- धाय की छतरी - जोधपुर - इसे मारवाड़ की पन्नाधाय भी कहते हैं। 6 व 4 स्तंभों की दो छतरी है। जिसका निर्माण अजीतसिंह ने धायमाता गोराधाय की स्मृति में करवाया।
- कीरत सिंह सोढ़ा की छतरी - जोधपुर, इसे करोड़ों की कीर्ती का धणी कहते हैं। कीरतसिंह जसोल के थे।
- ब्राह्मण देवता की छतरी - मंडोर, जोधपुर, माना जाता है कि मेहरानगढ़ दुर्ग के तांत्रिक क्रिया में जिस ब्राह्मण ने बलिदान दिया था, यह छतरी उसकी है।
- राव कल्याण की छतरी - बीकानेर
- राणा उदयसिंह की छतरी - गोगुन्दा, उदयपुर
- गंगा बाई की छतरी - गंगापुर, भीलवाड़ा - इस छतरी का निर्माण महादजी सिंधिया ने करवाया। गंगाबाई महादजी की पत्नी थी।
- अमरगढ़ की छतरी - बागौर, भीलवाड़ा
- चेतक की छतरी - हल्दीघाटी, बलीचा गाँव, राजसमन्द
- महाराजा ईश्वरसिंह की छतरी - गोविन्द देव जी मन्दिर, सिटी पैलेस, जयपुर
- नटणी की छतरी - सवाई माधोपुर + जालौर
नोट- नटणी की हवेली - भानगढ़ (अलवर) नटणी का चबूतरा पिछोला झील (उदयपुर) के किनारे है।
- गोपाल सिंह की छतरी - करौली
- बनजारा की छतरी - लालसोट (दौसा)
- दुर्गादास राठौड़ की छतरी - शिप्रा नदी के किनारे (उज्जैन, मध्यप्रदेश)
- आंतेड़ की छतरियाँ - अजमेर - यहाँ जैन धर्म के दिगम्बर सम्प्रदाय की छतरियाँ हैं।
- पालीवालों के ब्राह्मणों की छतरी - जैसलमेर
- जोगीदास की छतरी- उदयपुरवाटी ( झुंझुनूं ) - यह छतरी भित्ति चित्रों के लिये जानी जाती है। इन भित्ति चित्रों को देवा ने बनाया था।
- मामा-भान्जा की छतरी - ( जोधपुर ) - धन्ना गहलोत व भीयां चौहान आपस में मामा-भांजा थे। इन्होंने जोधपुर के प्रधानमंत्री मुकंद चंपावत ही हत्या का बदला ठाकुर प्रतापसिंह को मारकर लिया तथा अपना बलिदान दिया। इन दोनों की छतरी अजीतसिंह ने बनवाई। यह छतरी मेहरानगढ़ दुर्ग के लोहा पोल के पास स्थित है। इस छतरी में 10 खम्भों का प्रयोग हुआ है।
- गुसाइयों की छतरी- मेंडा गाँव (जयपुर)
- संत पीपा की छतरी -गागरोन दुर्ग (झालावाड़)
- राजा बख्तावर की छतरी - मंडोर, जोधपुर माना जाता है कि अलवर शासक बख्तावर सिंह जयपुर के जगतसिंह के साथ जोधपुर के मानसिंह के विरूद्ध लड़ने गये थे मंडोर (जोधपुर) में वीरगति को प्राप्त हो गये।
नोट- बख्तावर सिंह की एक छतरी अलवर में भी है।
- अप्पाजी सिंधिया की छतरी - ताऊसर, नागौर
- गफूरबाबा की छतरी- इस छतरी का निर्माण शाहजहाँ ने जगमन्दिर (उदयपुर) में करवाया।
- अकबर की छतरी- बयाना दुर्ग, भरतपुर। इस छतरी का निर्माण गुजरात विजय के बाद करवाया गया।
- कुत्ते की छतरी - रणथम्भौर दुर्ग, सवाई माधोपुर कुक्कुराज घाटी में।
- पन्नाधाय की छतरी - उदयपुर
- राव शेखा की छतरी - परशुरामपुरा, नवलगढ़, झुंझुनूँ
- राव जी की छतरियाँ- बेंगूँ, चित्तौड़गढ़, यहाँ 8 छतरियाँ हैं।
- खाण्डेराव की छतरी- गागरसौली, डीग
- थानेदार नाथुसिंह की छतरी- यह छतरी शाहबाद (बाराँ) में बनी है जिसका निर्माण कोटा शासक उम्मेदसिंह ने करवाया। थानेदार नाथुसिंह डाकुओं से लड़ते हुये वीरगति को प्राप्त हो गये थे।
- मूमल की मेढ़ी - लोद्रवा (जैसलमेर)
- टेस्सीटोरी की छतरी - बीकानेर
- राव जैतसी की छतरी - (भटनेर दुर्ग) हनुमानगढ़
- साधु गिरिधापति की छतरी - कोलायत (बीकानेर)
- दीवान दीपचंद की छतरी - जोधपुर

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