राजस्थान की भू-गर्भिक संरचना
यह लेख मुख्य रूप से राजस्थान की भू-गर्भिक संरचना और इसके भौतिक प्रदेशों का एक विस्तृत विवरण है। इसमें राज्य के ऐतिहासिक निर्माण काल से लेकर वर्तमान भौगोलिक स्वरूप तक की जानकारी दी गई है।
इस लेख को पढ़ने के बाद आपको निम्नलिखित विषयों की जानकारी प्राप्त होगी:
- भू-गर्भिक इतिहास: राजस्थान की चट्टानों का प्राचीन काल (प्री-अरावली) से लेकर आधुनिक काल तक का क्रमिक विकास।
- भौतिक विभाजन: राज्य के चार प्रमुख क्षेत्रों- थार का मरुस्थल, अरावली पर्वतमाला, पूर्वी मैदान और दक्षिण-पूर्वी पठार (हाड़ौती) की विशिष्टताएँ।
- प्राकृतिक संसाधन व स्थलाकृतियाँ: यहाँ मिलने वाली विभिन्न प्रकार की मिट्टी, घास (जैसे सेवण), खनिज भंडार और नदियों द्वारा निर्मित विशेष आकृतियाँ (जैसे बीहड़ और दर्रे)।
- महत्वपूर्ण तथ्य: राजस्थान की जलवायु, जल संरक्षण की पुरानी पद्धतियाँ और यहाँ के प्रमुख भू-विरासत स्थलों (Geo-heritage sites) की जानकारी।
संक्षेप में, यह लेख राजस्थान की ज़मीन की बनावट, ऊँचाई-नीचाई और यहाँ की भौगोलिक विविधता को समझने के लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका है।
I. आद्य महाकल्प (Protozoic Era)
1. प्री-अरावली (Pre-Arawali)
2. प्री-कैम्ब्रियन (Pre-Cambrian)
1. प्री-अरावली
प्री-अरावली
Pre-Arawali
⇓
अनाच्छादन
(Denudation)
⇓
अपशिष्ट पर्वत
(Residual Mountains)
⇓
बुन्देलखण्ड नीस
(Bundelkhand Nees)
इसमें अनाच्छादन (अपक्षय + अपरदन) की प्रक्रिया होने के कारण इनकी ऊँचाई कम होती जा रही है। इसलिए इसको अवशिष्ट पर्वत (residual mountain) की श्रेणी में आ रहे है।
बुन्देलखण्ड नीस (Bundelkhand Nees)
बेड़च घाटी (Bedach Valley) से चित्तौड़गढ़ एवं भीलवाड़ा में 110 किमी. का क्षेत्र भीलवाड़ा सुपर ग्रुप (Bhilwada Super Group) के नाम से जाना जाता है।
इस बुन्देलखण्ड नीस में गुलाबी ग्रेनाइट की प्रधानता है। इसके साथ में अन्य चट्टानें पग्मेटाइट, मैग्नेटाइट, शिष्ट, हार्न ब्लेड हैं ।
2. प्री-कैम्ब्रियन
अरावली पर्वतमाला का निर्माण अपनति के कारण है।
अरावली पर्वतमाला को वलन (fold) का उदाहरण या वलित पर्वतमाला कहा जाता है।
- वलन : भू-गर्भ में सर्पिलाकार आकृति वलन कहलाती है।
- अपनति : वलन का ऊपर उठा भाग अपनति जबकि नीचे वाला भाग अभिनति कहलाता है।
- फैकोलिथ : अपनति एवं अभिनति के मध्य मैग्मा का जमाव फैकोलिथ कहलाता है।
- समपनति : एक अपनति में बहुत सारी अपनति एवं अभिनति होती है। जिसे समपनति (Anticlinorium) कहते है।
प्री कैम्ब्रियन को दो भागों में विभाजित करते हैं-
प्री कैम्ब्रियन
- A. अरावली महासमूह (Aravali Super group)
- B. देहली महासमूह (Delhi Super group)
A. अरावली महासमूह (Aravali Super group)
इसका निर्माण विभिन्न मोड़ों के द्वारा हुआ है तथा इसमें फाइलाइट्स और क्वार्टज चट्टानें मिलती है।
अरावली सुपर ग्रुप को दो भागों में विभाजित करते हैं:-
1. झाड़ौल महासमूह
फाइलाइट्स एवं क्वार्टज चट्टानों की प्रधानता
2. उदयपुर महासमूह
फाइलाइट्स, मार्बल, लाइमस्टोन तथा माइकाशिष्ट चट्टानों की प्रधानता
B. दिल्ली महासमूह (Delhi Super Group)
यह राजस्थान में सर्वाधिक विस्तारित है। इसकी शुरूआत दिल्ली से गुजरात तक है।
अजमेर तथा पश्चिमी पहाड़ियों का निर्माण इसी के अन्तर्गत हुआ है।
दिल्ली सुपर ग्रुप को 3 भागों में विभक्त किया गया है-
1. रायलो समूह (Rialo Series)
यह देहली ग्रुप के समान्तर ही चलता है तथा इसके अन्तर्गत क्वार्टज, मार्बल (मकराना, जिला-डीडवाना-कुचामन) शैल पाई जाती है।
2. अलवर समूह (Alwar Series)
यह अलवर तथा खैरथल तथा बहरोड़ के आस-पास पहाड़ियों के रूप में विस्तारित है।
अलवर समूह के उत्तरी भाग से रायलो समूह विसंग/विलग (discontinue) होता है।
3. अजबगढ़ समूह (Azabgarh Series)
किशनगढ़ (अजमेर) के आस-पास नेफेलाइन साइनाइट चट्टानें मिलती है तथा एरिनपुरा (पाली) का ग्रेनाइट भी इसी के अन्तर्गत आता है।
नोट:- देहली सुपर ग्रुप और अरावली सुपर ग्रुप की संरचना विभेदन तथा विवर्तनिक संरचना भिन्न है।
II. पुराजीवी महाकल्प (Palaeozoic Era)
इस काल में आधारभूत चट्टानों (Primary rocks) का निर्माण हुआ है। इसको दो भागों में बांटा जाता है-
(1) विन्ध्यन महासमूह, (2) परमियन कार्बोनिफेरस महाकल्प
1. विन्ध्यन सुपर ग्रुप (Vidhyan Super Group)
यह धौलपुर, करौली, सवाईमाधोपुर, सुकेत (कोटा) तथा निम्बाहेड़ा (चित्तौड़गढ़) तक विस्तारित है।
यह गंभीर नदी एवं कालीसिंध नदियों के मध्य है।
इसमें कांग्लोमेरेट बालुकाश्म चूना पत्थर तथा चूना पत्थर (लाइम स्टोन) वॉल है।
इसको चार भागों में विभाजित किया गया है-
(i) भंडेर समूह (Bhander Series) ← बालुकाश्म
(ii) रीवा समूह (Rewa Series) ← चूना पत्थर
(iii) कैमूर समूह (Kaimur Series) ← चूना पत्थर
(iv) सेमरी समूह (Semari Series) ← की प्रधानता
विन्ध्यन सुपर ग्रुप के विखण्डन से पश्चिमी राजस्थान में निम्न शैल का निर्माण हुआ है, जिसका नामकरण 1984 में किया गया, जो निम्न हैं-
- (i) नागौर बेसिन: यह जोधपुर, फलौदी, पोकरण, बीकानेर, श्रीगंगानगर तथा नागौर में विस्तारित है।
- (ii) बिरमानिया बेसिन समूह: यह जैसलमेर के दक्षिण में विस्तारित है तथा इसमें नागौर बेसिन के समकालीन चट्टानें मिलती है।
नोट: नागौर बेसिन तथा बिरमानिया बेसिन को मारवाड़ सुपर ग्रुप के नाम से भी जाना जाता है।
2. परमियन कार्बोनिफेरस कल्प (Permo-Carboniferous)
इसमें शैल बैड का निर्माण हुआ जो निम्न है-
परमियन कार्बोनिफेरस कल्प
- बाप बोल्डर बेड
- भादूरा बालुकाश्म
(i) बाप बोल्डर बेड (Bap Boulder Bed)
बाप, फलौदी के आस-पास का क्षेत्र है तथा गोलाकार, अर्द्धगोलाकार, लोढी, बटिया आकृति का है।
बाप बोल्डर का निर्माण विन्ध्यन सुपर ग्रुप तथा अरावली सुपर ग्रुप के विखण्डन से हुआ है।
(ii) भादुरा बालुकाश्म (Bhadura Sand Stone)
यह बाप बोल्डर के ऊपर-पश्चिम में विस्तारित है। इसका निर्माण सामुद्रिक अवस्था में हुआ है।
नोट: बाप बोल्डर बेड में हिमयुगीन चिह्न मिले है, इस कारण इसे हिमवाहित क्षेत्र कहते है।
III. मध्यजीवी महाकल्प (Mesozoic Era)
यह राजस्थान के पश्चिमी भाग में है जिसका विस्तार जैसलमेर, बाड़मेर, बालोतरा, जोधपुर, फलौदी, बीकानेर क्षेत्र में है, इस काल में बीकानेर, जैसलमेर की चट्टानों का अवसादन हुआ। इसके कारण यह अवसादी मालानी, आग्नेय चट्टानों पर अध्यारोपित हो गया।
इसको हम दो भागों में विभाजित करते हैं-
- लाठी सीरीज: भू-गर्भिक जलपट्टी
- विस्तार: पोकरण से मोहनगढ़
- गाँव आकल - आकल वुड फोसिल्स पार्क
- नलकूप - चाँदन/चौधन नलकूप (थार का घड़ा)
- घासः सेवण, शरणस्थली - कोरिओटिस नाइग्रीसेप्स (गोडावण)
IV. नवजीवी महाकल्प (Neozoic Era/Cenozoic Era)
नवजीवी महाकल्प को दो भागों में विभक्त किया गया है-
- तृतीयक महाकल्प (टर्शियरी)
- चतुर्थक महाकल्प (क्वार्टन)
1. तृतीयक महाकल्प (टर्शियरी)
इसमें पश्चिमी राजस्थान में लिग्नाइट कोयला तथा लाइमस्टोन के भण्डार मिले है।
इसका विस्तार बीकानेर, जैसलमेर, फलौदी, जोधपुर, नागौर व बाड़मेर, बालोतरा में है।
2. चतुर्थक महाकल्प (क्वार्टन)
थार के मरूस्थल में प्रवाहित जल तथा वायु के अवसादों के उत्तरोत्तर निक्षेपण हुआ है।
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
राजस्थान की रचना विशिष्ट प्रकार की है क्योंकि इसमें प्री-क्रैम्बियन की चट्टानें तथा वायु अपरदन के द्वारा निर्मित भाग है।
राजस्थान के भौतिक स्वरूप
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत
प्रतिपादन- अल्फ्रेड लोथर वेगनर ने 6 जनवरी, 1912 को फ्रैंकफर्ट में हुए भू-गर्भीय सम्मेलन में किया था।
सन् 1915 में उन्होंने अपनी पुस्तक "The origin of continents and oceans" प्रकाशित की।
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त (1912 ई.)
- वेगनर के अनुसार स्थलीय भाग पैंजिया तथा जलीय भाग को पैथांलासा कहा है।
- इनके अनुसार सम्पूर्ण पृथ्वी एक स्थलखण्ड के रूप में थी, जिसे पैंजिया कहा तथा इसके चारों तरफ जलीय भाग था, जिसे पैथांलासा कहा।
- कालान्तर में भू-गर्भिक हलचलों के कारण स्थलीय भाग में विखण्डन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप अंगारालैण्ड से यूरेशिया (यूरोप + एशिया), उत्तरी अमेरिका का निर्माण हुआ, जबकि गोंडवाना लैण्ड के विखण्डन से दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, मैडागास्कर द्वीप, ऑस्ट्रेलिया, प्रायद्वीपीय पठार (भारत) तथा अंटार्कटिका का निर्माण हुआ।
नोट- भारत भू-खण्ड की दृष्टि से एशिया का भाग है, लेकिन भू-गर्भीय दृष्टि से एशिया का भाग नहीं है।
- पैंजिया के उत्तरी भाग को अंगारा लैण्ड जबकि दक्षिणी भाग को गोंडवाना लैण्ड कहते हैं।
- पैंजिया के मध्य सागर को टेथिस सागर कहते हैं।
अंगारा लैण्ड का विखण्डन
- समय- अंतिम ट्राइसिक युग में।
- विखण्डन से बने भाग- उत्तरी अमेरिका महाद्वीप, आर्कटिक, यूरोप, एशिया।
गोंडवाना लैण्ड का विखण्डन
- समय- प्रथम जुरैसिक युग में।
विखण्डन से बने भाग-
- दक्षिण अमेरिका महाद्वीप
- अफ्रीका
- ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप
- अण्टार्कटिका महाद्वीप
राजस्थान के भौतिक प्रदेश
हरिमोहन सक्सेना के अनुसार (H.M. सक्सेना) के अनुसार राजस्थान को निम्न 4 भौतिक प्रदेशों में विभाजित करते हैं-
1. पश्चिमी मरूस्थल प्रदेश
इसको निम्न भागों में विभाजित करते हैं-
- शुष्क मरूस्थल प्रदेश
- अर्द्ध शुष्क मरूस्थल प्रदेश
I. शुष्क मरूस्थल प्रदेश को 2 भागों में विभाजित करते हैं-
(i) बालुका स्तूप युक्त क्षेत्र
(ii) बालुका स्तूप मुक्त क्षेत्र
II. अर्द्ध शुष्क मरूस्थल प्रदेश को 4 भागों में विभाजित करते हैं-
(i) घग्घर बेसिन
(ii) शेखावाटी बेसिन
(iii) नागौर उच्च भूमि
(iv) लूणी बेसिन
2. अरावली प्रदेश
उत्तरी अरावली
मध्य अरावली
दक्षिणी अरावली
3. पूर्वी मैदानी प्रदेश
माही बेसिन
बनास बेसिन
चम्बल बेसिन
4. दक्षिण-पूर्वी पठारी प्रदेश
विन्ध्यन पठार
दक्कन का पठार
राजस्थान का भौतिक विभाजन
सर्वप्रथम प्रो. V.C. मिश्रा ने राजस्थान को 7 भौगोलिक प्रदेशों में विभाजित किया-
V.C. मिश्रा द्वारा रचित पुस्तक “राजस्थान का भूगोल है।”
इनके अनुसार निम्न भौगोलिक प्रदेश हैं-
1. शुष्क प्रदेश (मरूस्थल का पश्चिमी भाग) वर्षा:- 150 से 250 मिमी (15 से 25 सेमी)
जिले- जैसलमेर, बाड़मेर, बालोतरा, फलौदी, जोधपुर (पश्चिमी भाग), जोधपुर, बीकानेर (दक्षिणी पूर्वी भाग), चूरू (दक्षिणी पश्चिमी भाग), नागौर (पश्चिमी भाग)।
2. अर्द्ध शुष्क प्रदेश- वर्षा:- 250 से 500 मिमी (25 से 50 सेमी)
जिले- जालौर, पाली, जोधपुर (दक्षिणी पूर्वी), नागौर, डीडवाना-कुचामन, झुंझुनूँ, चूरू (उत्तरी पूर्वी), सीकर।
3. नहरी क्षेत्र:- वर्षा - 150 से 250 मिमी (15 से 25 सेमी)
जिले- श्रीगंगानगर, बीकानेर (पश्चिमी भाग), हनुमानगढ़, जैसलमेर (उत्तरी भाग)।
यह सिंचित क्षेत्र है जिसमें अम्लीयता तथा क्षारीयता की समस्याएँ मिलती है।
इस क्षेत्र में गर्मियों में सर्वाधिक आंधियां चलती हैं।
यह बग्गी क्षेत्र (श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़) है, श्रीगंगानगर तथा हनुमानगढ़ में राज्य का सर्वाधिक नहरी क्षेत्र माना जाता है।
4. अरावली पर्वतीय प्रदेश:- वर्षा- 300 से 600 मिमी (30 से 60 सेमी)
जिले :- उदयपुर, सलूम्बर, डूंगरपुर (पश्चिमी भाग), पाली (दक्षिणी-पूर्वी भाग), राजसमंद, ब्यावर।
5. पूर्वी कृषि औद्योगिक प्रदेश:- वर्षा- 500 मिमी से अधिक (50 सेमी से अधिक)
जिले:- अजमेर, जयपुर, दौसा, भरतपुर, अलवर, कोटपूतली-बहरोड़, खैरथल, डीग, धौलपुर, करौली, सवाईमाधोपुर, भीलवाड़ा, बूंदी।
6. दक्षिणी पूर्वी कृषि प्रदेश:- वर्षा- 500 मिमी से अधिक (50 सेमी से अधिक)
जिले:- डूंगरपुर (पूर्वी भाग), बाँसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, कोटा, प्रतापगढ़, बारां, झालावाड़।
इसमें विंध्यन तथा लावा पठारी प्रदेश (ज्वालामुखी निर्मित) आता है।
7. चम्बल बीहड़ प्रदेश:- वर्षा- 500 मिमी से अधिक (50 सेमी से अधिक)।
जिले:- धौलपुर, करौली, सवाईमाधोपुर इसमें सर्वाधिक अवनालिका अपरदन (Gully Erosion), उत्खात भूमि (Badland topography), तथा बीहड़ मिलते हैं।
- राजस्थान को दूसरी बार S.K. सेन ने 1968 में जलवायु के आधार पर तीन भागों में विभाजित किया।
तीसरी बार राजस्थान के भौतिक प्रदेशों का विभाजन प्रो. रामलोचन सिंह के द्वारा 1971 में किया गया। इन्होंने राजस्थान को दो भागों, चार उपभाग एवं बारह लघु प्रदेशों में विभाजित किया है, जो निम्न है-
| क्र. | वृहद् प्रदेश/भाग | उप प्रदेश/उपभाग | लघु प्रदेश |
|---|---|---|---|
| 1. | राजस्थान- | (i) मरुस्थलीय- | (क) जैसलमेर |
| (ख) बाड़मेर | |||
| (ग) बीकानेर | |||
| (ii) राजस्थान बागड़- | (क) घग्घर | ||
| (ख) शेखावाटी | |||
| (ग) नागौर | |||
| (घ) लूनी | |||
| 2. | राजस्थान पठार- | (iii) अरावली पठार- | (क) उत्तरी |
| (ख) मध्य | |||
| (ग) दक्षिणी | |||
| (iv) चम्बल बेसिन- | (क) निम्न चम्बल | ||
| (ख) उच्च चम्बल |
राजस्थान को साहित्यिक शब्दावली के आधार पर तीन भौतिक प्रदेशों में बाँटा गया है:-
- मरू - मरूस्थल
- मेरू - अरावली
- माल - उपजाऊ भूमि (हाड़ौती)
राजस्थान के 4 भौतिक प्रदेश निम्न हैं-
- राजस्थान का भौतिक भू-स्वरूप भू-गर्भिक हलचलों, अनाच्छादन एवं जलप्रवाह प्रणाली के मिले-जुले प्रभाव का परिणाम है।
- राजस्थान को चार भौतिक प्रदेशों में बाँटा गया है, जिसका मुख्य आधार उच्चावच एवं जलवायु है।
उत्तरी-पश्चिमी मरुस्थल/थली/थार का मरुस्थल/पश्चिमी मरुस्थल
- सखरा अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ मरुस्थल होता है। मरुस्थल का अर्थ मृत भूमि अर्थात् एक ऐसा क्षेत्र जो वनस्पति रहित हो मरुस्थल कहलाता है।
- यह ग्रेट पेलियोआर्कटिक अफ्रीका मरुस्थल का पूर्वी भाग है जो उत्तरी अफ्रीका, फिलिस्तीन, अरब देश, पाकिस्तान तथा भारत तक विस्तारित है।
- यह विश्व का 17वाँ सबसे बड़ा मरुस्थल है।
- उपोष्ण की दृष्टि से 9वाँ बड़ा मरुस्थल है।
मरुस्थल की विशेषताएँ निम्न हैं-
थार के मरुस्थल को टेथिस सागर का अवशेष माना जाता है।
टैथिस सागर के प्रमाण
- राजस्थान में खारे पानी की झीलें
- अवसादी चट्टानों की प्रधानता जिसके कारण कोयला, खनिज तेल मिलते हैं।
- कुलधरा गाँव (जैसलमेर) में मछली के अवशेष मिले हैं।
- परम्परागत संसाधनों की प्रधानता।
- जैसे- कोयला, खनिज तेल (पेट्रोल, डीजल)
- बाड़मेर के 'गुढ़ामालानी' क्षेत्र में पाये गये तेल के भण्डार विश्व में सबसे कम गहराई के तेल भण्डार है।
उत्तर-पश्चिमी मरुस्थल की विशेषताएँ
- मरुस्थल का अपने मूल स्थान से आगे बढ़ना मरुस्थल का मार्च कहलाता है।
- मरुस्थल के अन्तर्गत वर्षा के परिणामस्वरूप बनने वाली अस्थायी झीलों को प्लाया रन/टाट कहते हैं।
- रेडाना (बाड़मेर), बाप (फलौदी), थोब (बालोतरा), भाकरी, पोकरन, कनोड़ प्रमुख रन है।
- इस क्षेत्र में पालीवाल ब्राह्मणों के द्वारा की जाने वाली कृषि खड़ीन कृषि कहलाती है।
- खड़ीन का प्रारंभ 15वीं शताब्दी में पालीवाल ब्राह्मणों के द्वारा किया गया।
- मरुस्थल का मार्च राज्य में दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर होता है।
नोट- राज्य में मरुस्थल का ढाल पूर्व से पश्चिम या उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर है।
मरुस्थलीकरण का कारण
मरुस्थल का अपने मूल स्थान से आगे बढ़ना मरुस्थल का मार्च कहलाता है तथा ये मरुस्थल का मार्च ही मरुस्थलीकरण कहलाता है जिसके उत्तरदायी कारण निम्न है-
वायु से 44.42 प्रतिशत, जल से 11.20 प्रतिशत, वनों के कटाव से 6.25 प्रतिशत तथा 1 प्रतिशत लवणीकरण की प्रक्रिया तथा शेष मानवीय कारकों से होता है जैसे-
- अतिचारण, पशुचारण
- वनों का कटाव/निर्वनीकरण/वनोन्मूलन
- जलवायु परिवर्तन
राज्य में 1973 में औसत वर्षा दिन संख्या = 101 दिन
1985 में औसत वर्षा दिन संख्या = 64 दिन
वर्तमान में औसत वर्षा दिन संख्या = 29 दिन
इसके परिणामस्वरूप
- वर्षा में कमी (↓)
- तापमान में वृद्धि (↑)
जब तापमान में कमी या वृद्धि होती है तो अपक्षय की क्रिया होती है।
हवाओं के द्वारा मिट्टी एक जगह से दूसरी जगह जाने से मरुस्थल का विस्तार होता है। अपक्षय-चट्टानों का अपने स्थान पर टूट-फूटकर बिखर जाना अपक्षय कहलाता है।
भू-क्षरण एवं गाद में वृद्धि
यह स्थिति अरावली पर्वतमाला के अंतराल के कारण है।
अरावली पर्वतमाला में 12 अंतराल हैं।
क्षारीयकरण में वृद्धि
यह सांभर झील के आस-पास सर्वाधिक है।
मरूस्थलीकरण की समस्या के निदान के लिए निम्न उपाय हैं-
- 1994 में संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा मरूस्थल के प्रसार को रोकने के लिए 17 जून को मरूस्थलीकरण दिवस घोषित किया।
- 1995 से मरूस्थलीकरण दिवस मनाना शुरू हो गया।
- 17 जून, 2024 के मरूस्थलीकरण दिवस की थीमः
"भूमि के लिए एकजुट :- हमारी विरासत, हमारा भविष्य"
यह 30वाँ मरूस्थलीकरण दिवस है।
- वृक्षारोपण करना
- उद्यानिकी एवं सामाजिक वानिकी का विकास करना।
- शेल्टर बेल्ट कार्यक्रम का विकास
- शुष्क कृषि प्रणाली तकनीकी का विकास करना।
- सिंचाई साधनों का उचित तरीके से प्रयोग करना।
- जल का उपयोग, विदोहन तथा प्रबंधन संतुलित हो।
- चारागाहों पर दबाव कम करें तथा चराई को क्षमतानुसार निश्चित किया जाना चाहिए।
केन्द्रीय शुष्क एवं अनुसंधान संस्थान (Cazri- Central Arid Zone Research Institute)
- स्थापना- 1959,
- मुख्यालय- जोधपुर
- उद्देश्य - मरूस्थल के प्रसार को रोकना।
- AFRI :- ARID FOREST RESEARCH INSTITUTE
- स्थापना- 1985 ( भारत में)
- राजस्थान- 1988,
- मुख्यालय- जोधपुर
- उद्देश्य- वनों का संरक्षण
मरूस्थल को दो भागों में विभाजित किया गया है-
- I. शुष्क मरूस्थल
- II. अर्द्ध शुष्क मरूस्थल
शुष्क मरूस्थल का पूर्वी भाग 25 cm सम वर्षा रेखा को स्पर्श करता है।
- अर्द्ध-शुष्क मरूस्थल का पश्चिमी भाग 25 cm सम वर्षा रेखा को स्पर्श करता है।
- शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क मरूस्थल को दो भागों में विभाजित करने वाली सम वर्षा रेखा 25 cm सम वर्षा रेखा है।
- राज्य में थार के मरूस्थल को दो भागों में विभाजित करने वाली समवर्षा रेखा 25 cm है।
- मरूस्थल का पूर्वी भाग अरावली पर्वतमाला को स्पर्श करता है।
- शुष्क मरूस्थल के पश्चिमी भाग में 10 cm सम वर्षा रेखा है।
शुष्क मरूस्थल को दो भागों में विभाजित करते है- 2- भागों में विभाजित
- बालुका स्तूप युक्त (58.50%) कुल क्षेत्रफल- 128028 वर्ग किमी.
- बालुका स्तूप मुक्त (41.50%) कुल क्षेत्रफल- 85660 वर्ग किमी.
कुल मरूस्थल का प्रतिशत
0% से 20% प्रभावित क्षेत्र- 11.50%
20% से 40% प्रभावित क्षेत्र- 4.80%
40% से 60% प्रभावित क्षेत्र- 14.70%
60% से 80% प्रभावित क्षेत्र- 18.60%
80% से 100% प्रभावित क्षेत्र- 8.90%
(i) बालुका स्तूप युक्त प्रदेश
- मार्च-जुलाई में सर्वाधिक बालुका स्तूप बनते हैं।
- रेत के टीलों को जैसलमेर में 'धरियन' कहते हैं।
- इसमें बायतु (बालोतरा), भालेरी (चूरू), सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर), करणीमाता (बीकानेर), सोहनगढ़ (जैसलमेर), लूणकरणसर (बीकानेर) इत्यादि स्थानों पर बालुका स्तूप अधिक मिलते हैं।
- राज्य में बीकानेर, बाड़मेर तथा जैसलमेर की सीमा के सहारे-सहारे अधिक स्तूपों का विस्तार है इसलिए इन जिलों को महान भारतीय मरुस्थल भी कहते हैं।
- यह विश्व में एकमात्र ऐसा मरुस्थल है जो दक्षिणी-पश्चिमी मानसूनी हवाओं के द्वारा निर्मित है।
1. अनुदैर्ध्य बालुका स्तूप/पवनानुवर्ती/सीफ/देशान्तरीय/अलब स्तूप रेखीय बालुका स्तूप - हवा की दिशा के समानान्तर बनने वाले बालुका स्तूप अनुदैर्ध्य कहलाते है।
अनुदैर्ध्य बालुका स्तूपों के मध्य क्षेत्र को गासी/कोरबा कहते हैं।
- सहारा मरूस्थल में बालुका स्तूप को 'इर्ग' कहते हैं।
- इन बालुका स्तूपों का विस्तार जैसलमेर, जोधपुर, फलौदी, बाड़मेर, चूरू में है।
- ऊँचाई- 10 से 60 मीटर
यह 3 प्रकार के हैं-
- (i) सीफ
- (ii) पवनविमुख रेखीय
- (iii) वनस्पति युक्त रेखीय
रेखीय बालुका स्तूपों का निर्माण लूनी तथा जवाई नदी की घाटियों में हुआ है।
2. अनुप्रस्थ/आड़े बालुका स्तूप- हवा के समकोण बनते हैं।
- इनका निर्माण हवा का लगातार एक दिशा में चलने से होता है।
- विस्तार- पूंगल (बीकानेर), सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर), रावतसर (हनुमानगढ़), चूरू, झुँझुनूँ
3. बरखान/बरच्छान बालुका स्तूप- अर्द्ध चन्द्राकार रेत के टीले।
सर्वाधिक नुकसानदायक बालुका स्तूप।
- सर्वाधिक विस्तार- शेखावाटी में है।
- ऊँचाई- 10 से 20 मीटर
- चौड़ाई- 100-200 मीटर
- विस्तार- भालेरी (चूरू), सीकर, झुँझुनूँ, लूणकरणसर (बीकानेर), ओसिया (जोधपुर), सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर), करणीमाता (बीकानेर)।
- पवन की दिशा में बरखान का ढाल उन्नतोदर जबकि विपरित दिशा में ढाल अधिक होता है जिसे नतोदर कहते हैं।
- बरखान की मध्य में ऊँचाई अधिक होती है।
- ये गतिशील तथा नवीन बालुका स्तूप है।
4. स्टार/तारा बालुका स्तूप- इस प्रकार के बालुका स्तूप अनियमित पवनों के प्रवाह के द्वारा निर्मित होते है।
- यह हम्मादा स्थलाकृति के रूप में मिलते हैं।
- विस्तार- सोहनगढ़, (जैसलमेर), सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर)
- ऊँचाई- 10 से 25 मीटर
5. पेराबालुका स्तूप/पेराबोलिक बालुका स्तूप- यह बालुका स्तूप बरखान के विपरीत बनते है।
- इनकी आकृति महिलाओं की हेयर पिन के समान होती है।
- इनका विस्तार सम्पूर्ण मरूस्थल में है।
- ये बरखान के समान ही होते हैं लेकिन इनके निर्माण की दिशा भिन्न होती है।
6. नेटवर्क बालुका स्तूप- वे बालुका स्तूप जो लगातार बनते है, नेटवर्क बालुका स्तूप कहलाते है।
इनका विस्तार श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़ में है।
7. नोबखा/सब्र काफीज बालुका स्तूप- छोटे-छोटे बालुका स्तूपों को सब्र काफीज कहते है तथा इनका विस्तार सम्पूर्ण मरूस्थल में है।
8. यारडन- मरूस्थलीय क्षेत्रों में लहरदार बालुका स्तूप को यारडन कहते हैं।
इनको उर्मिका के नाम से भी जाना जाता है।
9. अवरोधी बालुका स्तूप- अवरोधक के कारण इनका निर्माण होता है, ये अवरोधक झाड़ी, पेड़ या किसी पहाड़ी के कारण हो सकता है।
- उपनाम- अवशिष्ट अवरोधी जीवावशेष बालुका स्तूप
- विस्तार- जोबनेर (जयपुर), नाग पहाड़ (अजमेर), पुष्कर (अजमेर), कुचामन तथा हर्ष की पहाड़ियों (सीकर) में मिलते हैं।
नोट- सर्वाधिक बालुका स्तूप जैसलमेर में हैं तथा अधिकांश प्रकार के बालुका स्तूप जोधपुर में है।
(ii) बालुका स्तूप मुक्त प्रदेश
- इसमें बालुका स्तूपों का अभाव होता है।
- इस क्षेत्र में लाठी सीरीज/भूगर्भित जल पट्टी पाई जाती है। जिसकी खोज CAZRI वैज्ञानिकों द्वारा की गई।
- इसका विस्तार पोकरन से मोहनगढ़ के मध्य (जैसलमेर) है
- लाठी सीरीज पर सेवण घास पाई जाती है जिसको गोडावण की प्रजनन स्थली कहते हैं।
- सेवण के कटे हुए घास को 'लीलोण' कहते हैं।
इस क्षेत्र में सोलर एनजीं एन्टरप्राइजिंग जोन (SEEZ) है-
इसमें धामण, करडी, तरडगम, सेवण घास उगती हैं।
चांदन नलकूप
- लाठी सीरीज के नजदीक एक कुआँ खोदा गया। इसे 'चांदन नलकूप' या 'थार का घड़ा' कहते हैं।
- यह क्षेत्र परतदार (अवसादी) शैलों से ढका हुआ है जो टर्शियरी से प्लीस्टोसीन काल की है।
- जैसलमेर नगर के दक्षिण में स्थित आकल वुड फॉसिल पार्क इस प्रदेश का क्षेत्र का एक विशिष्ट उदाहरण है, जहाँ वनस्पति के जीवावशेष पाए जाते हैं।
- यह महान मरुस्थल के पूर्व में स्थित है तथा बालुका स्तूपों का अभाव होता है।
- यह क्षेत्र अवसादी चट्टानों से ढका है जो टर्शियरी काल से प्लीस्टोसीन काल तक की है।
- टर्शियरी अवसादी चट्टानों में गैस एवं तेल के भंडार मिले हैं।
- इस क्षेत्र में अवसादी शैल समूह में भूमिगत जल का अच्छा भण्डार है, लाठी सीरीज इसका अच्छा उदाहरण है।
(II) अर्द्धशुष्क मरूस्थल प्रदेश
- यह शुष्क प्रदेश 25 सेमी समवर्षा तथा अरावली पर्वतमाला के मध्य स्थित है।
- इसका पूर्वी भाग अरावली पर्वतीय प्रदेश, पश्चिमी भाग 25 सेमी समवर्षा, उत्तरी भाग मालवा के मैदान को स्पर्श करता है।
- इस प्रदेश को संक्रमणीय/परिवर्ती (Transitional) प्रदेश कहते है, जिसका कारण है शुष्क तथा अर्द्धशुष्क परिस्थितियों का पाया जाना।
- यह प्रदेश अरावली पर्वतीय प्रदेश के पश्चिमी तथा शुष्क जलवायु प्रदेश के पूर्व में है।
- शुष्क मरुस्थल एवं अरावली के मध्य भौतिक प्रदेश को अर्द्धशुष्क मरुस्थल कहा जाता है।
- इसका कुल क्षेत्रफल- 75,000 वर्ग कि.मी.
इसको निम्न भागों में विभाजित किया जाता है-
(i) घग्घर मैदान/बेसिन
(ii) शेखावाटी प्रदेश
(iii) नागौर उच्च भूमि
(iv) लूणी बेसिन
(i) घग्घर का मैदान/हरित घाटी
- यह मैदान श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़ के भाग पर विस्तारित है।
- यह क्षेत्र क्षारीयता, अम्लीयता, जल भराव की समस्या तथा मरुस्थलीकरण की समस्या से ग्रसित हैं जो एक पर्यावरण संकट खड़ा करता है।
- इस क्षेत्र में इंदिरा गाँधी नहर परियोजना (आई. जी. एन. पी.) के आ जाने के कारण यह प्रदेश कृषि युक्त हो गया है तथा मरुस्थलीकरण की समस्या से भी निदान मिला है।
- घग्घर नदी के क्षेत्र को नाली/पाट/बग्गी कहते हैं।
- यह क्षेत्र राजस्थान का अन्नागार कहा जाता है।
- इसका उत्तरी भाग मालवा के मैदान को स्पर्श करता है।
- मालवा का मैदान सतलज तथा घग्घर नदी के मध्य है।
- बग्गी क्षेत्र (उपजाऊ क्षेत्र) श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़ को कहते हैं।
(ii) शेखावाटी/तोरावाटी/बांगर/आंतरिक प्रवाह क्षेत्र
इसकी उत्तरी सीमा घग्घर प्रदेश, दक्षिणी सीमा नागौर उच्च भूमि, पूर्वी सीमा अरावली पर्वतीय प्रदेश तथा पश्चिमी सीमा शुष्क मरुस्थल प्रदेश/25 सेमी समवर्षा रेखा को स्पर्श करती है। इस क्षेत्र में सीकर, उदयपुरवाटी, चूरू, झुंझुनूँ तथा डीडवाना- कुचामन का उत्तरी भाग सम्मिलित किया जाता है, जिसे बांगड़ प्रदेश कहते हैं।
- बांगड़ का अर्थ है पुराना जलोढ़।
- इस प्रदेश में सर्वाधिक बरखान मिलते हैं, जो रेगिस्तान मार्च के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी कारक है।
- इस क्षेत्र में कुओं को स्थानीय भाषा में जोहड़ कहते हैं।
- इस प्रदेश के चूरू में कोई नदी नहीं है तथा इस प्रदेश की मुख्यतः नदी कांतली है।
- यहाँ बलुई मिट्टी, कम वर्षा का क्षेत्र होने के कारण सम्पूर्ण प्रदेश आन्तरिक जलप्रवाह का क्षेत्र है।
- नोट-सांभर झील, आन्तरिक जलप्रवाह का उत्तम उदाहरण है, जिसमें मेढ़ा, रूपनगढ़ तथा खारी नदियाँ मिलती है।
- मेढ़ा नदी घाटी में नवीन बरखान बालुका स्तूप मिलते हैं।
- जोहड़ के गहरे भाग को 'चोंभी' कहते हैं।
नोट:- ढूँढाड क्षेत्र में कुओं को 'बेर/बेरा' कहते हैं। |
- इस प्रदेश की औसत ऊँचाई 450 मी. है।
- लवणीय गर्त- परिहारा, डीडवाना-कुचामन, कोछोर, सुजानगढ़, तालछापर इत्यादि।
- बालुका स्तूपों के बीच में एकत्र जल को 'सर' कहते हैं। जैसे-जसूसर, सालिसर, मानसर, मलसीसर इत्यादि।
- सर्वाधिक बरखान मेंढ़ा (मेंथा) नदी बेसीन में मिलते हैं।
- इसकी पश्चिमी सीमा 25 सेमी. की समवर्षा रेखा एवं पूर्वी सीमा 50 सेमी. की समवर्षा रेखा को स्पर्श करती है।
- भू-गर्भ में चूने के निक्षेप पाये जाने के कारण यहाँ वार्षिक तापांतर अधिक पाया जाता है।
बीड़- शेखावाटी प्रदेश में घास के मैदान
Note:- बीड़ा- ढूंढाड़ क्षेत्र में घास के मैदान
(iii) नागौर उच्च भूमि
- विस्तार- नागौर, डीडवाना-कुचामन, अजमेर का उत्तरी भाग
- इसमें मकराना क्षेत्र मार्बल (डीडवाना कुचामन), गोठ मांगलोद (नागौर) क्षेत्र जिप्सम तथा जायल क्षेत्र फ्लोराइड के लिए प्रसिद्ध है।
- इसका उत्तरी भाग शेखावाटी प्रदेश को, दक्षिणी भाग लूनी बेसिन को, पूर्वी भाग अरावली पर्वतीय प्रदेश को तथा पश्चिमी भाग शुष्क मरुस्थल प्रदेश/25 सेमी समवर्षा रेखा को स्पर्श करता है।
इसकी ऊँचाई समुद्रतल से 300 से 500 मीटर के मध्य है। यह प्रदेश बंजर तथा रेतीला है तथा इसके अन्तर्गत सोडियम क्लोराइड युक्त मिट्टी पाई जाती है। इस प्रदेश में परबतसर तथा नावा की पहाड़ियाँ (डीडवाना-कुचामन) मिलती है तथा इन पहाड़ियों के अतिरिक्त यहाँ कोई पहाड़ी नहीं मिलती है।
- यहाँ परबतसर (डीडवाना-कुचामन), कुचामन (डीडवाना-कुचामन), नावा (डीडवाना-कुचामन) के अतिरिक्त कहीं भी पहाड़ियाँ नहीं हैं।
- इसमें नमक की उत्पत्ति का कारण गहराई में पाई जाने वाली माइकाशिष्ट नमकीन चट्टाने है, जिनमें केशाकर्षण पद्धति से नमक सतह पर आ जाता है तथा इसके बाद वाष्पीकरण से सोडियम क्लोराइड बनता है।
- कुबड़ पट्टी/बाँका पट्टी- पुष्कर (अजमेर), और मेड़ता (नागौर), के मध्य का भाग है।
- हरे कबूतर/हरीयल पक्षी नागौर उच्च भूमि व सरिस्का अभयारण्य में पाया जाता है।
- यह पक्षी कभी जमीन पर पैर नहीं रखता है।
- प्रोफेसर H.S. शर्मा के अनुसार नागौर उच्च भूमि की खारे पानी की झीलें टेथिस सागर का अवशेष नहीं है क्योंकि समुद्री जल में मैग्नीशियम की अधिकता होती है लेकिन यहाँ की खारे पानी की झीलों में इस तत्व की कमी है।
Note:- आसरवा गाँव (डीडवाना-कुचामन) फ्लोराइड की अधिकता के लिए जाना जाता है।
(iv) लूनी बेसिन/गोडवार प्रदेश
- इसमें लूनी नदी तथा इसकी सहायक नदियाँ आती है।
- इसका उत्तरी भाग नागौर उच्च भूमि, दक्षिणी भाग गुजरात राज्य, पश्चिमी भाग शुष्क मरुस्थल प्रदेश/25 सेमी समवर्षा तथा पूर्वी भाग अरावली पर्वतीय प्रदेश को स्पर्श करता है।
- यह लूनी नदी तथा इसकी सहायक नदियों के द्वारा निर्मित प्रदेश है।
- जैसे- बाण्डी, लीलड़ी, मिठड़ी, सुकड़ी, जवाई, सागी, मित्री, खारी तथा जोजड़ी नदियाँ है।
- विस्तार- अजमेर, ब्यावर, पाली, जालौर, बालोतरा, जोधपुर, नागौर का दक्षिणी भाग।
- सिवाणा की पहाड़ियाँ तथा मालानी रायोलाइट की पहाड़ियाँ 'गुम्बदाकार या इन्सेलबर्ग' के रूप में पाई जाती है।
- इस प्रदेश में जल अपरदन व भू-पृष्ठीय आनाच्छादन (अपरदन तथा अपक्षय की संयुक्त क्रिया) का परिणाम है। यह सम्पूर्ण बेसिन का 41.50 प्रतिशत का भाग रखता है। इस प्रदेश के अन्तर्गत वायु अपरदन के द्वारा किया गया कार्य भी शामिल है।
- कालाभरण डूंगर लूनी बेसिन की पूर्वी सीमा निर्धारित करता है। इस क्षेत्र में ग्रेनाइट से निर्मित पहाड़ियाँ (जालौर) है जो इन्सेलबर्ग के रूप में पाई जाती है।
लूनी नदी का प्रवाह क्षेत्र अजमेर → नागौर → ब्यावर → जोधपुर → बालोतरा → बाड़मेर है।
इस क्षेत्र में छप्पन की पहाड़ियाँ मोकलसर से सिवाणा (बालोतरा) तक विस्तारित है जिसमें सर्वाधिक ग्रेनाइट पाया जाता है।
नोट- ग्रेनाइट सिटी- जालौर को कहा जाता है।
- इन पहाड़ियों में 'नाकोड़ा पर्वत' है जो जैनियों का धार्मिक स्थल है (बालोतरा)
- पीपलूद (सिवाणा, बालोतरा) के हल्देश्वर नामक पहाड़ को 'मारवाड़ का लघु माउण्ट आबू' कहते हैं।
- लूनी बेसिन में प्राचीन 'कांप मैदान' की अधिकता पायी जाती है।
- सांचौर में लूनी का बाढ़ मैदान रेल/रेला/नेहड़ कहलाता है।
मरूस्थल में जल संचय
जल दिवस- 22 मार्च को मनाया जाता है।
(i) प्लाया- खारे पानी की बड़ी झीलों को प्लाया कहते हैं। प्लाया को 'सेलिनास' कहते हैं।
(ii) रन/टाट- खारे पानी की छोटी झीलों को 'रन' कहते है।
सर्वाधिक- जैसलमेर में पायी जाती है।
उदाहरण-कनोड (जैसलमेर), पोकरण (जैसलमेर), बाप (फलौदी), थोब (बालोतरा) आदि।
(iii) तल्ली/पोखर- चट्टानी प्रदेशों में जल इकट्ठा हो जाता है। जिसे तल्ली/पोखर कहते हैं।
जल सूखने के बाद नीचे उपजाऊ मिट्टी रह जाती है, जिसे 'खड़ीन' या 'मरहो' कहते है, जिसमें मिश्रित अनाज बोया जाता है, जिसे 'बझेड़' कहते हैं।
नोट- करौली में पान की खेती को 'बजेड़ा' कहते हैं।
खड़ीन कृषि पालीवाल ब्राह्मणों के द्वारा विकसित की गई।
खड़ीन परम्परागत वर्षा जल संग्रहण की पद्धति।
(iv) बालसन- पर्वतों के मध्य जल इकट्ठा हो जाए तो उसे बालसन कहते हैं।
(v) नाड़ी- सर्वप्रथम 1520 ई. में राव जोधा ने बनाई। गाँव के बाहर दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जो तालाब बनाया जाता हैं।
(vi) टांका- कुण्ड को कहते है।
(vii) बावड़ी- सीढ़ीदार कुआँ।
मरूस्थलीय पारिभाषिक शब्दावली
(i) हम्मादा- पथरीला चट्टानी मरूस्थल
(ii) इर्ग- रेतीला मरूस्थल
(iii) वल्ल/मांड- जैसलमेर व बा
(iv) ढांढ- विशिष्ट लवणीय क्षेत्र।
(v) थली- सरदारशहर (चूरू) बीकानेर को कहते हैं।
(vi) रेग- पथरीली एवं रेतीली मिश्रित क्षेत्र।
इस मरूस्थल में निम्न विशेषता देखने को मिलती है जैसे-
- नखलिस्तान - मरूस्थली क्षेत्रों में किसी झील के चारों तरफ हरियाली विकसित हो जाती है तो उसे नखलिस्तान कहते हैं जैसे कोलायत झील (बीकानेर)
- बजादा - मरूस्थली क्षेत्र के अर्न्तगत जहाँ पर्वतीय क्षेत्र होता है। इन पर्वतीय क्षेत्रों के निम्न भाग में जल समाप्त हो जाता है।
- गिरिपद - पर्वतों के निम्न भाग जहाँ मरूस्थलीय रेत एकत्रित हो जाती है उसे गिरिपद कहते हैं। इसको पेडीमेंट के नाम से भी जाना जाता हैं।
- डांड - मरूस्थलीय क्षेत्रों के अर्न्तगत लवणीय झीलों को कहते हैं।
- यारडन - लहरदार बालुका स्तूप को कहते हैं। इसको उर्मिका के नाम से भी जाना जाता हैं।
थार के मरूस्थल को निम्न नाम से जाना जाता है-
- लिबिया तथा मिस्र में 'सिटिर', तुर्कीस्तान में 'कोडर्म' पाकिस्तान में 'चोलिस्तान' तथा अफ्रीका में इसको 'इर्ग' के नाम से जाना जाता है।
- राजस्थान में थार के मरूस्थल का विस्तार 25° उत्तरी अक्षांश से 30° उत्तरी अक्षांश तथा 69°30' पूर्वी देशान्तर से 70°45' पूर्वी देशान्तर है।
- यह विश्व में सर्वाधिक घना बसा मरूस्थल है। इस कारण यहाँ सर्वाधिक जैव-विविधता मिलती है।
- थार के मरूस्थल में गैर परम्परागत संसाधनों की प्रधानता के साथ-साथ परम्परागत संसाधनों की प्रधानता भी है जैसे- कोयला, खनिज तेल।
- लघु मरूस्थल- यह थार मरूस्थल का पूर्वी भाग है जो कच्छ से बीकानेर तक विस्तारित है।
- महान मरूस्थल (ग्रेट डेजर्ट)- यह श्रीगंगानगर से लेकर बाड़मेर तक विस्तारित हैं।
- रेडक्लिफ के समानान्तर सम वर्षा रेखा 10 सेमी. है।
- ईश्वरी प्रसाद ने थार के मरूस्थल को 'रूक्ष' प्रदेश कहा है।
- ह्वेनसांग ने थार मरूस्थल को 'गुर्जरात्रा' कहा है।
थार के मरूस्थल का विस्तार दो देशों में है-
- (i) भारत- थार का मरूस्थल
- (ii) पाकिस्तान- चोलिस्तान (थाल)
इस मरूस्थल का कुल क्षेत्रफल- 2 लाख 33 हजार वर्ग कि.मी. है जिसमें से राजस्थान में 1 लाख 75 हजार वर्ग कि.मी. है। यह ग्रेट पेलियो आर्कटिक अफ्रीका मरूस्थल का पूर्वी भाग है।
भारत के चार राज्यों में विस्तृत हैं :-
- पंजाब
- हरियाणा
- राजस्थान
- गुजरात
- अरावली के पश्चिम में 58% भू-भाग पर मरूस्थल है जबकि राजस्थान में कुल मरूस्थल 61.11% हैं।
- थार का मरूस्थल विश्व का सबसे 'युवा मरूस्थल' व 'सर्वाधिक जनघनत्व वाला मरूस्थल' है।
- विश्व का सबसे अधिक जैव विविधता वाला मरूस्थल है, यह भारत का सबसे गर्म एवं शुष्क क्षेत्र।
- यहाँ टर्शियरी जमावों के खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस तथा लिग्नाइट कोयला के भण्डार स्थित हैं।
- गर्मियों में पश्चिमी रेगिस्तान में उत्पन्न होने वाली निम्न वायुदाब क्षेत्र की मानसूनी पवनें आकर्षित होती है एवं सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के ऋतु चक्र को नियमित करती है।
- मरूस्थल का प्रवेश द्वार, मरूस्थल का सिंह द्वार, मरूस्थल का केन्द्र जोधपुर ग्रामीण, जोधपुर को कहते हैं।
राज्य के निम्न संभाग तथा जिलों में मरूस्थल का विस्तार है-
(i) बीकानेर संभाग:- बीकानेर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू
(ii) जोधपुर संभाग:- जोधपुर, जालौर, सिरोही, फलौदी, जैसलमेर, पाली, बाडमेर, बालोतरा।
(iii) जयपुर संभाग:- अलवर, सीकर, झुंझुनूं, जयपुर, कोटपूतली-बहरोड
(iv) उदयपुर संभाग:- राजसमंद
(v) अजमेर संभाग:- अजमेर , ब्यावर, नागौर, डीडवाना-कुचामननोट
नोट- 4 जून, 2013 में राजस्थान यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट में 17 जिले मरूस्थल में बताए गए, यह 17 जिले निम्न हैं:- बीकानेर, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, चूरू, जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, जालौर, पाली, सिरोही , अजमेर, नागौर, सीकर, जयपुर, अलवर, झुंझनूँ, राजसमंद है।
पश्चिम मरूस्थलीय प्रदेश का कुल क्षेत्रफल- 1,75,000 वर्ग कि.मी.
औसत ऊँचाई- 200-300 मीटर
अरावली पर्वतमाला
- इसका विस्तार 23°20' उत्तरी अक्षांश से 28°20' तथा 72°10' पूर्वी देशांतर से 77° पूर्वी देशांतर है।
- राज्य में अरावली के उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम में देहली संरचना का विस्तार है या इसके समानन्तर है।
- अरावली पर्वतमाला में अनेक भ्रंश भी मिलते हैं।
- यह राजस्थान का एक योजना प्रदेश है जिसको राजस्थान की जीवन रेखा भी कहते हैं जिसका कारण है इसमें खनिजों की अधिकता का होना।
- इस पर्वतीय प्रदेश में क्वार्टजाइट की प्रधानता है।
- अरावली पर्वतमाला को विष्णु पुराण में परिपत्र, भौगोलिक भाषा में मेरू, राजस्थानी भाषा में आडा-वाटा कहते है।
- उत्पत्ति- प्री कैम्बियन युग (65 करोड़ वर्ष) में हुई।
- अरावली एक अवशिष्ट पर्वतमाला की श्रेणी (Residual Mountains) के रूप में उपलब्ध है। इसकी तुलना उत्तरी अमेरिका महाद्वीप की अप्लेशियन पर्वतमाला से की जा सकती है।
- निर्माण - प्रमुख रूप से अवसादी एवं रूपान्तरित चट्टानों से है। अरावली की औसत ऊँचाई- 930 मीटर है।
- यह पर्वतमाला सबसे प्राचीन वलित मोड़दार पर्वतमाला है।
- अरावली की शुरूआत अरब सागर के मिनिकॉय द्वीप से होती हैं।
- अरब सागर को अरावली का पिता कहते हैं।
- इसका विस्तार तीन राज्यों में गुजरात, राजस्थान और हरियाणा और एक केन्द्रशासित प्रदेश दिल्ली में है, जिसकी कुल लम्बाई- 692 कि.मी. है।
- इसका विस्तार पालनपुर (गुजरात) से संसद भवन रायसीना हिल्स (दिल्ली) तक है।
- राजस्थान में अरावली की कुल लम्बाई - 550 किमी.
- राजस्थान में यह सिरोही से खेतड़ी-सिंघाना (झुन्झुनु) तक विस्तारित है, जिसका सर्वाधिक विस्तार उदयपुर तथा न्यूनतम विस्तार अजमेर में है।
- राजस्थान में यह पर्वतमाला दक्षिण पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर विस्तारित है।
- राज्य में अरावली पर्वतमाला की ऊँचाई दक्षिण-पश्चिम से उत्तर पूर्व की ओर कम होती है जबकि उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ती।
- राज्य को दो विशिष्ट भौगोलिक प्रदेशों (मरुस्थली एवं गैर-मरुस्थली) में विभक्त करता है।
- अरावली राजस्थान की जल विभाजक रेखा है क्योंकि यह बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर की नदियों को अलग करती है।
- यह राज्य के पूर्वी भाग में मरुस्थल के प्रसार को रोकती है जिसके कारण पूर्वी भाग उपजाऊ है।
- राजस्थान की अधिकतम नदियों का उद्गम अरावली पर्वतमाला से होता है लेकिन ध्यान रहे सभी नदियों का उद्गम अरावली पर्वतमाला से नहीं होता है।
- सर्वाधिक वन होने के कारण यहाँ सर्वाधिक वन्य जीव अभयारण्य भी हैं।
- अरावली पर्वतमाला की संरचना के कारण अनेक पर्यटक स्थल विकसित हुए हैं। जैसे- किले, मंदिर, झीलें एवं अभयारण्य।
- अरावली पर्वतमाला राज्य की जलवायु को प्रभावित करती है क्योंकि इसके पूर्वी भाग में अधिक वर्षा एवं पश्चिमी भाग में कम वर्षा होती है।
- इसमें जैव विविधता सर्वाधिक पाई जाती है।
- अरावली में प्राचीन एवं वर्तमान सभ्यताएँ विकसित हुई हैं।
- अबुल फजल ने अरावली पर्वतमाला को ‘ऊँट की गर्दन’ कहा है।
- कर्नल टॉड ने अरावली पर्वतमाला को ‘राजपूताना की सुरक्षा दीवार’ कहा है।
➤ अरावली को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया जाता है-
अरावली पर्वतमाला
उत्तरी अरावली
औसत ऊँचाई 450 M
प्रमुख चोटियाँ
- रघुनाथगढ़ (सीकर) - 1055 M
- खोह (जयपुर) - 920 M
- भैरांच (अलवर) - 792 M
- बरवाड़ा (जयपुर) - 786 M
- बबाई (झुंझुनूँ) - 780 M
- बिलाली (कोटपूतली-बहरोड़) - 774 M
- मनोहरथाना (जयपुर) - 747 M
- बैराठ (कोटपूतली-बहरोड़) - 704 M
मध्य अरावली
औसत ऊँचाई 550 M
प्रमुख चोटियाँ
- गोरमजी/टॉडगढ़ (ब्यावर) - 934 M
- तारागढ़ (अजमेर) - 870 M
दक्षिणी अरावली
औसत ऊँचाई 1000 M
प्रमुख चोटियाँ
- गुरु शिखर (सिरोही) - 1722 M
- सेर (सिरोही) - 1597 M
- दिलवाडा/देलवाड़ा (सिरोही) - 1442 M
- जरगा (उदयपुर) - 1431 M
- अचलगढ़ (सिरोही) - 1380 M
- आबू खण्ड (सिरोही) - 1295 M
- कुंभलगढ़ (राजसमंद) - 1224 M
- ऋषिकेश (सिरोही) - 1017 M
- कमलनाथ (उदयपुर) - 1000 M
- सज्जनगढ़ (उदयपुर) - 938 M
(i) उत्तरी अरावली
इसका विस्तार 26°55' से 29°4' उत्तरी अक्षांश से 74°55' से 77°03' पूर्वी देशांतर है।
इसमें देहली क्रम की क्वार्टजाइट तथा फाइलाइट्स शैल का विस्तार है।
इसमें शेखावाटी की निम्न पहाड़ियाँ है जो भूदृश्य बालू पहाड़ियों से परिलक्षित है।
इसमें क्वार्टजाइट व फाइलाइट शैलों की प्रधानता है।
इसमें सांभर से प्रारंभ होने वाली श्रेणी सिंघाना तक विस्तारित है।
इसमें शेखावाटी निम्न पहाड़ियों वाला भाग जिसमें निम्न पहाड़ियाँ विस्तारित है जैसे- सीकर की पहाड़ियाँ, श्रीमाधोपुर (सीकर) की पहाड़ियाँ तथा रींगस की पहाड़ियाँ (सीकर) प्रमुख है।
सांभर गेप के बाद उत्तर-पूर्व में पालखेत व खेतड़ी श्रेणियों के रूप में उत्तर-पश्चिम में शेखावाटी तथा पूर्व में तोरावाटी (सीकर) की पहाड़ियाँ है।
(ii) मध्य अरावली
इसका विस्तार 25°38' से 26°58' उत्तरी अक्षांश से 73°54' से 74°22' पूर्वी देशांतर है।
विस्तार- जयपुर के दक्षिण-पश्चिमी भाग से दक्षिण में देवगढ़ तहसील (राजसमंद) तक है।यह प्रदेश पूर्व में करौली उच्च भूमि में सांभर बेसिन द्वारा अलवर पहाड़ियों द्वारा तथा दक्षिण में बनास बेसिन की सीमा को स्पर्श करता है।इसमें अजमेर तथा नसीराबाद के मध्य विस्तारित पहाड़ियाँ जल विभाजक का कार्य करती है।मेरवाड़ा पहाड़ियाँ - यह मारवाड़ के मैदान को मेवाड़ के पठार से अलग करती है। यह राजसमंद, ब्यावर तथा अजमेर के मध्य विस्तारित हैं इसी क्षेत्र में कुकरा की पहाड़ियाँ है।
इसके प्रमुख दर्रे निम्न हैं - पखेरिया, सूरा घाट, शिवपुर घाट, भूराघाट दर्रा, बर दर्रा हैं। (ब्यावर)
इस क्षेत्र में पहाड़ियों की औसत ऊँचाई 700 मीटर है लेकिन घाटियाँ 500 मीटर ऊँची है।
इस प्रदेश की औसत ऊँचाई- 500 मीटर है।
(iii) दक्षिणी अरावली
- इसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 1000 मीटर है तथा इसका विस्तार 23°46' से 26°02' उत्तरी अक्षांश से 72°16' से 74°35' पूर्वी देशांतर है।
- इस प्रदेश का अपवाह तंत्र समानान्तर और दक्षिणवर्ती है जैसे बनास, कोठारी, बेडच, साबरमती, सोम नदियाँ प्रवाहित होती है।
- सर्वोच्च चोटी- (i) गुरूशिखर (सिरोही) 1722/1727 मी.
नोट - विश्व की सर्वोच्च चोटी- माउण्ट एवरेस्ट (नेपाल) (8848 मी.)
- भारत की सर्वोच्च चोटी- K2/गॉडवीन ऑस्टिन (8611 मी.)
- भारत में स्थित भारत की सर्वोच्च चोटी- कंचनजंघा (सिक्किम) है।
नोट- कर्नल जेम्स टॉड ने गुरूशिखर को संतों का शिखर या हिन्दू ओलम्पस कहा है।
- स्थलाकृतिक दृष्टि से इसे एक विशाल इन्सेलबर्ग भी कहा जाता है।
- संरचनात्मक दृष्टि से अरावली पर्वत श्रृंखला 'देहली क्रम' में हैं, जिसे बैथोलिथ की संज्ञा दी जाती है।
दक्षिणी अरावली को 2 भागों में विभाजित किया जाता है, जो निम्न है-
(i) मेवाड़ पठार- विस्तार- उदयपुर, सलूम्बर, सिरोही, डूंगरपुर
- यही से भारत की महान जल विभाजक रेखा उदयपुर के दक्षिण से दक्षिण-पश्चिम की ओर चली जाती है।
- भोराट पठार (ऊँचाई 1225 मी.)- अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी नदियों के प्रवाह क्षेत्र या जल विभाजक का कार्य करता है।
- इस क्षेत्र की सबसे ऊँची चोटी जरगा है।
- लसाड़िया पठार (सलूम्बर) स्थित है जिसकी ऊँचाई 325 से 650 मीटर तक है।
- गिरवा पहाड़ी (उदयपुर)- इसकी आकृति तश्तरीनुमा है जिसे पहाड़ियों की मेखला कहते हैं।
- मगरा- उदयपुर का उत्तरी-पश्चिमी भू-भाग जो जनजातीय बाहुल्य प्रदेश है।
(ii) आबू खण्ड (सिरोही)- यह ग्रेनाइट से निर्मित भाग है जिसे बैथोलिथ की संज्ञा दी जाती है।
यह 19 किमी. लम्बा तथा 8 किमी. चौड़ा है जिसे विशाल इन्सेलबर्ग की संज्ञा दी जाती है।
इसमें चट्टानी आकृति में टॉड रॉक, नन रॉक तथा हॉर्न रॉक मिलती है।
यह अनियमित पठार जिसमें बहुत प्रमुख चोटियाँ मिलती है।
इसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 1200 मीटर है।
इस पठार के नजदीक उडिया पठार (ऊँचाई 1360 मीटर) स्थित है जो राज्य का सबसे ऊँचा पठार है।
इसमें मेसा का पठार (ऊँचाई 620 मीटर) है जिस पर चित्तौड़गढ़ किला निर्मित है।
प्रमुख पर्वत, पठार एवं पहाड़ियाँ निम्न हैं:-
भाकर- सिरोही की तीव्र ढाल वाली पहाड़ियाँ
- गिरवा- उदयपुर की तश्तरीनुमा पहाड़ियाँ।
- देशहरो (उदयपुर)- जरगा और रागा के मध्य का हरा-भरा क्षेत्र।
- मेरवाड़ा - ब्यावर, अजमेर और राजसमंद के मध्य की पहाड़ियाँ।
- मेवल/बागड- डूंगरपुर और बाँसवाड़ा का मध्य भाग।
- भोमट - उदयपुर, डूंगरपुर और सिरोही के मध्य की पहाड़ियाँ।
- बीजासन पहाड़ियाँ- माण्डलगढ़- भीलवाड़ा के मध्य पहाड़ियाँ।
- मुकुन्दवाड़ा पहाड़ियाँ- कोटा और झालावाड़।
- सुण्डा पहाड़ी- जालौर
- छप्पन पर्वत- उदयपुर
- भामती पहाड़ी- शाहबाद (बाराँ)
- देवगिरी पहाड़ी- दौसा
- नानी सीरडी पहाड़ी- सोजत (पाली)
- सारण पर्वत- पाली
- त्रिकुट पहाड़ी- जैसलमेर
- मानदेसरा पठार- चित्तौड़गढ़
दर्रें/नाल
पखेरिया दर्रा (ब्यावर)- ब्यावर को मसूदा से जोड़ता है।
शिवपुर घाट/सुराघाट दर्रा- ब्यावर को मेवाड़ से जोड़ता हैं।
देसूरी नाल दर्रा (पाली)- देसूरी (पाली) को चारभुजा (राजसमन्द) से जोड़ता है। मारवाड़ को मेवाड़ से जोड़ता है।
जीलवाड़ा नाल/पगल्या नाल दर्रा- मेवाड़ को गुजरात से जोड़ने वाला दर्रा।
हाथी नाल दर्रा- उदयपुर
हाथीगुढ़ा नाल दर्रा- राजसमंद
कमली घाट दर्रा- राजसमंद
अरावली पर्वतमाला में निम्न जिले आते हैं-
सिरोही, उदयपुर, सलूम्बर, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, पाली का कुछ भाग, चित्तौड़गढ़, राजसमंद, ब्यावर, अजमेर, जयपुर, कोटपूतली-बहरोड़, खैरथल-तिजारा, अलवर, झुन्झुनू।
पूर्वी मैदान
यह प्रदेश अरावली पर्वतीय प्रदेश तथा हाड़ौती प्रदेश के मध्य स्थित है।
यह प्रदेश 50 सेमी. सम वर्षा रेखा तथा 75 सेमी. सम वर्षा रेखा के मध्य स्थित है या अरावली पर्वतमाला एवं दक्षिणी-पूर्वी पठारी प्रदेश के बीच में स्थित है-
- इसका ढाल- पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर है।
- यह सर्वाधिक कृषि योग्य प्रदेश है इसलिए इसे राजस्थान का अन्न का कटोरा प्रदेश कहते हैं।
- यह उपजाऊ प्रदेश होने के कारण सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला प्रदेश है इस प्रदेश में क्षेत्रफल की तुलना में जनसंख्या अधिक निवास करती है। इसमें निम्न जिले आते हैं अलवर, खैरथल-तिजारा, जयपुर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवाई माधोपुर, दौसा, टोंक, अजमेर, बाँसवाड़ा, डीग।
- इसका उत्तरी भाग जलोढ़ है तथा दक्षिणी-पूर्व में सैडस्टोन है जो विन्ध्यन समूह का है।
- धौलपुर एवं सवाई माधोपुर में चम्बल नदी के सहारे अत्यधिक कटाव बीहड़ के रूप में है।
- क्षेत्रफल 23% एवं जनसंख्या 39% है।
- निर्माण- नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मृदा से हुआ।
इसको निम्न भागों में विभाजित किया गया है-
1. चम्बल बेसिन 2. बनास-बाणगंगा बेसिन 3. माही बेसिन
1. चम्बल बेसिन
उत्खात स्थलाकृति/बीहड़- नदी द्वारा निर्मित गहरे खड्डों को बीहड़ कहते हैं।
सर्वाधिक बीहड़ भूमि- धौलपुर में स्थित है।
सर्वाधिक बीहड़ भूमि- कोटा, बूंदी, सवाई माधोपुर, करौली में।
यह डाकूओं की शरणस्थली रहा है इसलिए इसे 'डांग क्षेत्र' भी कहते हैं।
चम्बल नदी गॉज, जलप्रपात तथा बीहड़ आदि का निर्माण करती है।
इसमें बीहड़ पट्टी की कुल लम्बाई 480 किमी. है जो कोटा से इटावा, मुरादगंज (UP) तक विस्तारित है, जहाँ चम्बल नदी यमुना नदी से मिल जाती है।
डांग लैण्ड
करौली के पठार पर अनियमित पहाड़ियों को कहते हैं।
यह क्षेत्र चम्बल नदी के अपवाहित क्षेत्र में आता है।
नोट- डांग की रानी- करौली को कहते हैं।
'बीड़' शेखावाटी में घास के मैदानों को बीड़ कहते हैं।
बीहड़ पट्टी- 480 किमी. कोटा से यमुना तक विस्तृत है।
- इस बेसिन का कुल क्षेत्रफल 4500 वर्ग किलोमीटर है जो बीहड़ों से प्रभावित है।
- इसके दक्षिणी भाग में अनियमित पहाड़ियाँ हैं जिनको डांग कहते हैं।
- चम्बल नदी सर्वाधिक अवनलिका अपरदन (Gully Erosion) करती है जिसके परिणामस्वरूप उत्खात् भूमि (Badland topography) का निर्माण होता है। यह अपरदन सबसे अधिक हानिकारक होता है जिसके परिणामस्वरूप भूमि कृषि योग्य नहीं रहती है।
- भरतपुर के पूर्व में मण्डहोली पहाड़ी है जिसकी अधिकतम ऊँचाई 216 मीटर है।
- चम्बल नदी यमुना से मिलने से पूर्व विस्तृत गॉर्ज का निर्माण करती है।
- इसके दक्षिण में मुकुन्दवाड़ा की पहाड़ी स्थित है जिसका ढाल दक्षिण से उत्तर की ओर है। इसी कारण चम्बल नदी भी दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवाहित होती है।
2. बनास बेसिन एवं बाण गंगा बेसिन
बनास बेसिन:-
- राजसमन्द - चित्तौड़गढ़ - भीलवाड़ा - अजमेर - टोंक - सवाईमाधोपुर
- पीडमान्ट स्थलाकृति राजसमंद में स्थित है।
- इसकी औसत ऊँचाई- 280-500 मीटर
- बनास बेसिन- इसकी पश्चिमी सीमा 50 सेमी समवर्षा रेखा को स्पर्श करती है।
- इस क्षेत्र में अनाच्छादन (अपरदन तथा अपक्षय की संयुक्त क्रिया) का प्रभाव सर्वाधिक होता है।
- इसमें बनास नदी के द्वारा पीडमान्ट का मैदान निर्मित है जिसका सम्बन्ध पूर्वी मैदान से है लेकिन यह मैदान अरावली पर्वतीय प्रदेश में स्थित है।
बनास बेसिन को दो उपभागों में विभाजित करते हैं-
1. मेवाड़ का मैदान (दक्षिणी मैदान)
- इसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 280 से 500 मीटर है।
- इसमें राजसमंद, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा जिले आते हैं।
- खेराड़-जहाजपुर तहसील (भीलवाड़ा) के क्षेत्र को खेराड़ कहते हैं।
- इसी के अंतर्गत पीडमान्ट का मैदान आता है।
2. मालपुरा करौली का मैदान (उत्तरी मैदान)
- इसमें अजमेर, टोंक, सवाई माधोपुर जिले आते हैं।
- माल खेराड़- टोंक जिले का अधिकांश क्षेत्र आता है।
- इसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 280 से 400 मीटर है। यह शिस्ट व नीस चट्टानों से निर्मित है।
- इस मैदान का ढाल दक्षिण पूर्व से पूर्व की ओर है।
- यह बनास बेसिन का उत्तरी-पूर्वी भाग है जो कटा-फटा बीहड़युक्त है।
बाणगंगा बेसिन
इसमें कोटपूतली, जयपुर, दौसा, भरतपुर क्षेत्र आते हैं।
3. माही बेसिन
- यह क्षेत्र माही नदी की सहायक नदियों के द्वारा निर्मित है, माही नदी की सहायक नदियों की ढाल प्रवणनांक अधिक है। यह ढाल प्रवणनांक 8 से 12 मीटर प्रति किलोमीटर तक है जो कि अन्य किसी भी प्रदेश में विद्यमान नहीं है।
- यह क्षेत्र अधिक गहराई तक विच्छेदित होने के कारण इस भू-भाग को वागड़ क्षेत्र के नाम से जाना जाता है जिसमें डूंगरपुर तथा बाँसवाड़ा का पहाड़ी क्षेत्र आता है।
- इस बेसिन को प्राचीन पुष्प प्रदेश के नाम से जाना जाता है जिसका कारण है यहाँ महुआ के वृक्षों की प्रधानता है इन वृक्षों में रेडफ्लाइंग स्कवीरल पेटोरिस्टा एल्बीवेंडर (उड़न गिलहरी) पाई जाती है।
- छप्पन का मैदान - प्राचीन काल में प्रतापगढ़ एवं बाँसवाड़ा के मध्य क्षेत्र में छप्पन नदी-नालों का समूह होता था, इस कारण इसे छप्पन का मैदान कहते है।
- माही नदी को वागड़/कांठल/आदिवासियों की गंगा कहते हैं।
- माही बेसिन में बाँस के वृक्षों की अधिकता है तथा यहाँ लाल लोमी मिट्टी पाई जाती है जो मक्का की कृषि के लिए अधिक उपयोगी है।
- इस क्षेत्र में आदिवासियों के द्वारा की जाने वाली स्थानान्तरित कृषि को वालरा कहते हैं। इस प्रकार की कृषि आजीविका निर्वहन के लिए की जाती है, जिसमें प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम होता है। इस प्रकार की कृषि एक जगह पर दो या तीन वर्षों तक ही की जाती है।
- यह कृषि पर्यावरण के लिए हानिकारक है इसलिए इसे पर्यावरण का दुश्मन/कर्तन-दहन कृषि कहते है।
नोट- छप्पन का मैदान/कांठल - प्रतापगढ़ और बाँसवाड़ा के मध्य का क्षेत्र।
- काठ + अल - काठ का अर्थ किनारा और अल का अर्थ आच्छादित होता है।
- प्रतापगढ़ व बाँसवाड़ा क्षेत्र में माही के किनारे वाले क्षेत्र को कांठल कहा जाता है।
नोट- राजस्थान का पूर्वी भाग गंगा यमुना नदियों द्वारा निर्मित मैदान है।
- भारत में पर्वतीय क्षेत्र- 10.7% (विश्व में 12%), पहाड़ी क्षेत्र- 18.6% (विश्व में 14%), पठारी क्षेत्र- 27.7% (विश्व में 33%), मैदानी क्षेत्र- 43% (विश्व में 41%) का विस्तार है।
दक्षिण पूर्वी पठारी प्रदेश या हाड़ौती का पठार
- इसमें निम्न जिले आते हैं कोटा, बूंदी, बाराँ, झालावाड़, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, सवाई माधोपुर।
- इसका ढाल दक्षिण से उत्तर की ओर उत्तर-पूर्व की ओर है।
- इस प्रदेश को 'अस्पष्ट अधर प्रवाह का क्षेत्र' (An area of ill drained - inferior drainage) कहते हैं।
- विशाल सीमा भ्रंश (G.B.F. - The Great Boundary Fault): यह राज्य के दक्षिणी-पूर्वी भाग में विस्तारित है।
- यह भ्रंश बेंगू (चित्तौड़गढ़) तथा कोटा के उत्तरी भाग में स्पष्टतः दृष्टिगत है।
- यह सवाईमाधोपुर से धौलपुर तक देखा जा सकता है।
- इसमें क्षेत्रफल की तुलना में जनसंख्या का प्रतिशत अधिक है।
- इसका विस्तार 23°51' से 25°20' उत्तरी अक्षांश से 75°15' से 77°25' पूर्वी देशांतर है।
- इसका क्षेत्रफल 24185 वर्ग किलोमीटर है इसकी पूर्वी, दक्षिणी एवं दक्षिणी-पश्चिमी सीमा मध्यप्रदेश राज्य के साथ मिलती है।
- इसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 500 मीटर है तथा इसमें चम्बल नदी की सहायक नदियाँ जैसे कालीसिंध, आहू, परवन, घोड़ापछाड़, कुन्नु तथा पार्वती नदियाँ प्रवाहित होती हैं इस कारण यह प्रदेश कृषि योग्य है।
- यह प्रदेश मसालों वाली फसलों के लिए जाना जाता है।
- यह प्रदेश अरावली पर्वतमाला तथा विन्ध्यांचल पर्वतमाला के मध्य संक्रान्ति प्रदेश (Transitional Belt) के नाम से जाना जाता है।
- यह मेवाड़ के मैदान के दक्षिण पूर्व में तथा उत्तर पश्चिम में अरावली पर्वतीय प्रदेश के महान सीमा भ्रंश द्वारा सीमांकित है।
- इस प्रदेश में ऊपरमाल का पठार तथा मेवाड़ का पठार आता है।
ऊपरमाल का पठार
बिजौलिया (भीलवाड़ा) से भैंसरोड़गढ़ (चित्तौड़गढ़) तक विस्तारित यह इस प्रदेश की भौतिक इकाई माना जाता है।
यह पठारी प्रदेश मालवा के पठार में मिल जाता है।
दक्कन का पठार
- इस का विस्तार कोटा, बूँदी, बाराँ, झालावाड़ है।
- निर्माण- बेसाल्ट लावा से
- मिट्टी- काली रेगुर/कपास की काली मृदा
- ऊँचाई- औसत 500 मी.
- निर्माण- क्रिटेशियस काल में
- यह अरावली और विन्ध्यांचल को जोड़ने वाला प्रदेश है।
- ढाल- दक्षिण से उत्तर की ओर।
- मालवा का पठार ''उत्तर-पश्चिम'' में स्थित दो भागों में बँटा हुआ है।
अध्ययन की दृष्टि से हाड़ौती पठार को 2 मुख्य तथा 5 गौण/उपभाग भागों में विभाजित किया गया है-
2 मुख्य भाग तथा 3 उपभाग निम्न हैं।
इसका वर्गीकरण निम्न प्रकार है-
(I) विन्ध्यन कगार
(i) अर्द्धचन्द्राकार पहाड़ियाँ
(ii) नदी निर्मित बेसिन
(iii) शाहबाद क्षेत्र (बारां)
(II) दक्कन पठार
(i) डग गंगधर प्रदेश झालावाड़
(ii) झालावाड़ पठार
(i) विन्ध्यन कगार भूमि (ऊँचाई-350-550 मी.)
- यह क्षेत्र बलुआ पत्थर से निर्मित है जो स्लेटी पत्थरों के द्वारा पृथक दिखाई देता है।
- इसमें चूना पत्थर, बलुआ तथा स्लेटी पत्थरों की प्रधानता है।
- यह चम्बल तथा बनास नदी के मध्य विस्तारित है।
- उत्तर पश्चिम में चंबल के बायें किनारे पर तीव्र ढाल वाले कगार है। यहाँ का कगार खण्ड धौलपुर, करौली सवाईमाधोपुर तक फैला है।
- औसत ऊँचाई- 350 मी. - 550 मी.
(ii) दक्कन लावा का पठार- कोटा, बाराँ, झालावाड़ का क्षेत्र।
- मुकुन्दवाड़ा पहाड़ियाँ/अर्द्धचन्द्राकार पर्वत श्रेणियाँ-झालावाड़
- डग गंगाधर क्षेत्र- झालावाड़
- शाहबाद की पहाड़ियाँ- बाराँ
- इसकी औसत ऊँचाई 300 से 500
- इस क्षेत्र में चम्बल नदी, कालीसिंध नदी तथा पार्वती नदी के द्वारा कोटा जिले में ‘‘त्रिकोणीय जलोढ़ मैदान’’ का निर्माण करती है।
बूँदी में प्रमुख 4 दर्रे निम्न है-
- लाखेरी दर्रा
- रामगढ़ दर्रा
- जेतावास दर्रा
- खटकड़ दर्रा
- मुकुन्दवाड़ा की पहाड़ियाँ तथा आडावाला की पहाड़ियाँ (सवाई माधोपुर तथा बूँदी में) इसी पठारी क्षेत्र का भाग है।
- इसमें मध्यम काली मिट्टी की प्रधानता के कारण कपास, सोयाबीन, चावल की कृषि प्रमुख होती है।
- इसमें धरातलीय विषमता कम होने के कारण कृषि उपयोगी क्षेत्र है।
- इसमें रामगढ़ (बाराँ) में ‘घोड़े की नाल’ आकृति पर्वत श्रेणी का विस्तार है।
- बूँदी की पहाड़ियाँ उत्तर-पूर्व में दक्षिण-पश्चिम की ओर विस्तारित है, यह डबल रिज (दोहरी पर्वतमाला) के रूप में विस्तारित है, इसकी कुल लम्बाई 96 किमी. है।
रामगढ़ क्रेटर
- इसको 200वाँ क्रेटर की मान्यता 2021 में मिली है। यह राज्य का प्रथम जियो हेरिटेज स्थल है।
- इसका व्यास 3.2 किलोमीटर है।
- यह 200 मीटर ऊँची अंगूठीनुमा संरचना में विस्तारित है।
राजस्थान में भू-विरासत स्थल
- राज्य में 12 भू-विरासत स्थल की पहचान की जा चुकी है।
राजस्थान में 2001 में GSI के द्वारा 10 भू-विरासत स्थल की पहचान की गई जो निम्न हैं-
- नेफलाइन साइनाइट- किशनगढ़ (अजमेर)
- सेंदरा ग्रेनाइट- ब्यावर
- बारं काग्लोमरेट- ब्यावर
- जोधपुर ग्रुप मालानी आग्नेय सुईट कॉन्टेक्ट- जोधपुर
- वेल्डेड टफ- जोधपुर
- ग्रेट बॉउन्ड्री फॉल्ट- संतुर (बूँदी)
- स्ट्रोमेटोलाइट पार्क- भोजुन्दा (चित्तौड़गढ़)
- ऑकल वुड फोसिल्स पार्क- जैसलमेर
- राजपुरा-दरीबा- राजसमंद
- स्ट्रोमेटोलाइट पार्क- झामर कोटड़ा (उदयपुर)
इसके बाद 2006 में दो प्रमुख स्थलों की पहचान की गई-
- रामगढ़ उल्कापिंड क्रेटर- बाराँ
- जावर- उदयपुर






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