दुर्ग/गढ़/किला (राजस्थान)

दुर्ग/गढ़/किला

यह लेख दुर्ग, गढ़ और किलों की अवधारणा को ऐतिहासिक गहराई और सांस्कृतिक संवेदनाओं के साथ प्रस्तुत करता है। इसमें सिन्धु घाटी सभ्यता से लेकर राजस्थान के भव्य दुर्गों तक, किलों के विकास, उनकी संरचना और उपयोगिता को सरल भाषा में समझाया गया है। लेख यह स्पष्ट करता है कि दुर्ग केवल युद्ध और सुरक्षा के प्रतीक नहीं थे, बल्कि वे शासन, जीवन-व्यवस्था, जल-संचय, सैन्य संगठन और सामाजिक संरचना के केंद्र भी थे।
राजस्थान के दुर्गों की विभिन्न श्रेणियाँ, मनुस्मृति, अर्थशास्त्र और शुक्रनीति में वर्णित दुर्ग-प्रकारों के माध्यम से यह लेख प्राचीन भारतीय सैन्य बुद्धिमत्ता और रणनीतिक सोच को उजागर करता है। चित्तौड़, कुंभलगढ़, जैसलमेर, रणथम्भौर जैसे दुर्गों से जुड़े तथ्य, आक्रमणों का इतिहास, लिविंग फोर्ट की अवधारणा और स्थापत्य विशेषताएँ पाठक को राजस्थान के गौरवशाली अतीत से जोड़ती हैं। कुल मिलाकर यह लेख दुर्गों को पत्थरों की संरचना नहीं, बल्कि शौर्य, बलिदान, सुरक्षा और सांस्कृतिक विरासत के जीवंत प्रतीक के रूप में सामने लाता है।
rajasthan-kile-durg
सर्वप्रथम दुर्ग के अवशेष सिन्धु घाटी सभ्यता से मिले हैं जिसमें नगर के दो भाग थे-
  1. दुर्गीकृत (पश्चिमी भाग)
  2. अदुर्गीकृत (पूर्वी भाग)
  • दुर्ग- राजा-महाराजाओं के रहने व उनका खजाना सुरक्षित रखने के लिए दुर्ग/ गढ़/किला का निर्माण किया जाता था जिसमें अनेक महीनों का राशन व पानी का भण्डारण होता था। दुर्ग में महल, शस्त्रागार, राजकीय आवास सैनिक छावनियाँ, तालाब, कुण्ड छतरियाँ आदि होते थे।
  • पाशीब - दुश्मन जब दुर्ग को घेर लेते थे तब दुर्ग के बाहर रेत या पत्थर का ऊँचा टीला बनाते जिससे दुर्ग के अन्दर आसानी से आक्रमण किया जा सके, उसे पाशीब कहा जाता था। यह काम चित्तौड़ के तीसरे साके (1567-68 ई.) में अकबर ने किया था जिसे 'मोहर मगरी' कहते हैं।

राजस्थान में दुर्गों की तीन श्रेणियाँ हैं
  1. किला (Good) - यह साधारण होता था जिसमें समुचित व्यवस्था नहीं होती थी।
  2. गढ़ (Best) - यह किले से उच्च व दुर्ग से निम्न श्रेणी का होता था।
  3. दुर्ग (Best) - यह उच्च श्रेणी का होता था जिसमें समुचित व्यवस्था थी।
  • राजस्थान का दुर्गों में तीसरा स्थान है, सर्वाधिक दुर्ग महाराष्ट्र में व दूसरे स्थान पर मध्यप्रदेश है।
  • राजस्थान में सर्वाधिक दुर्ग जयपुर में हैं।
  • कौटिल्य/चाणक्य/विष्णुगुप्त के अर्थशास्त्र ग्रंथ में राज्य के सप्तांग सिद्धांत (राजा, जन, अमात्य/सेनापति, कोष, दुर्ग, मित्र, सेना) दिए गए हैं जिसमें दुर्ग महत्वपूर्ण है।
दुर्गों का सर्वप्रथम वर्गीकरण मनुस्मृति में हुआ है। मनुस्मृति में छः प्रकार के दुर्ग बताये गये हैं-
  1. जल दुर्ग
  2. गिरि दुर्ग
  3. वृक्ष दुर्ग
  4. नृ दुर्ग
  5. मही दुर्ग (पत्थर)
  6. धान्वु दुर्ग (रेत)
इनमें गिरि दुर्ग सर्वश्रेष्ठ है।
  • अर्थशास्त्र व मनु स्मृति में गिरी दुर्ग को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
  • शुक्रनीति में सैन्य दुर्ग को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

कौटिल्य ने चार प्रकार के दुर्ग बताये हैं -
  1. औदुक
  2. पार्वत
  3. धान्वन
  4. वन

शुक्र नीति में 9 प्रकार के दुर्ग होते हैं -
  1. औदुक/जल दुर्ग - जिस दुर्ग के चारों ओर पानी हो, औदुक दुर्ग कहलाता है। जैसे- गागरोन (झालावाड़), भैंसरोड़गढ़ (चित्तौड़गढ़)
  2. गिरी दुर्ग/पार्वत दुर्ग - यह दुर्ग ऊँची पहाड़ी पर बना होता है। इस श्रेणी के दुर्ग राजस्थान में सर्वाधिक हैं। जैसे- जालौर, सिवाणा, चित्तौड़, रणथम्भौर, तारागढ़ व मेहरानगढ़, जयगढ़, दौसा।
  3. वन दुर्ग - यह दुर्ग चारों ओर से वनों से घिरा होता है। इन दुर्गों को मेवास दुर्ग भी कहते हैं। जैसे- सिवाणा (बालोतरा)
  4. एरण दुर्ग - यह दुर्ग गिरी व वन दुर्ग का मिश्रित दुर्ग होता है। यह खाई, कांटों व पत्थरों से घिरा होता है। जैसे- चित्तौड़, जालौर व रणथम्भौर के दुर्ग।
  5. पारिख दुर्ग - इस दुर्ग के चारों ओर खाई होती है। जैसे- भरतपुर, बीकानेर, चित्तौड़ व नागौर।
  6. पारिध दुर्ग - इस दुर्ग के चारों ओर दीवार/परकोटा होता है। जैसे- चित्तौड़, जालौर, बीकानेर, जैसलमेर, गागरोन तथा लोहागढ़, मेहरानगढ़।
  7. धान्वन दुर्ग - यह दुर्ग मरुस्थल से घिरा होता है। जैसे- सोनारगढ़ (जैसलमेर)
  8. सैन्य/सहाय दुर्ग - इस दुर्ग में स्थायी सेना व बन्धु-बान्धव निवास करते हैं। यह दुर्ग सर्वश्रेष्ठ दुर्ग माना जाता है। इसे नर दुर्ग भी कहते हैं। जैसे- चित्तौड़, गागरोन, सिवाणा तथा मेहरानगढ़।
  9. स्थल दुर्ग - यह दुर्ग समतल भूमि पर बना होता है। जैसे- चित्तौड़, जालौर, सिवाणा।
  • सर्वाधिक विदेशी आक्रमण सहने वाला दुर्ग भटनेर (हनुमानगढ़) है।
  • सर्वाधिक स्थानीय आक्रमण सहने वाला दुर्ग तारागढ़ (अजमेर) है।
  • सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट चित्तौड़ दुर्ग है।
  • दूसरा सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट सोनारगढ़ (जैसलमेर) है।
  • तीसरा लिविंग फोर्ट भरतपुर का किला तथा चौथा कुंभलगढ़ है।
  • सर्वाधिक बुर्जों वाला दुर्ग सोनारगढ़ (99 बुर्ज) है।
  • मुगल शैली में बना राजस्थान का एकमात्र दुर्ग मैगजीन का किला (अजमेर) है जिसकी नींव दादूदयाल ने रखी।
  • अंग्रेजों द्वारा निर्मित राजस्थान का दुर्ग बोरसवाड़ा/टॉडगढ़, ब्यावर है।
  • सबसे प्राचीन दुर्ग भटनेर (3वीं सदी) है।
  • दूसरा सबसे प्राचीन दुर्ग चित्तौड़ (7वीं सदी) है।
  • सबसे नवीन दुर्ग मोहनगढ़ (जैसलमेर) है।
  • दूसरा सबसे नवीन दुर्ग लोहागढ़ (1733 ई.) (भरतपुर) है।
  • राजस्थान में मिट्टी से निर्मित दुर्ग भटनेर (हनुमानगढ़), लोहागढ़ (भरतपुर) है।
  • मारवाड़ में निर्मित नौ दुर्गों को नव कोटी कहते हैं।

विष्णु धर्मसूत्र में छ: प्रकार के दुर्ग बताये गये हैं-
  1. जल दुर्ग - चारों ओर जल हो।
  2. गिरि दुर्ग - पहाड़ों पर बना हों।
  3. धान्वन दुर्ग - खुली जमीन पर बना दुर्ग।
  4. नृ दुर्ग - वीर व तेज सैनिकों से घिरा दुर्ग
  5. मही दुर्ग - पत्थर ईंटों से निर्मित मजबूत दुर्ग जो स्थल भाग में बना है।
  6. वृक्ष दुर्ग - जो दुर्ग चारो ओर से पेड़ व कँटीली झाड़ियों से घिरा हो।

नरपति आचार्य ने आठ प्रकार के किलों का वर्णन किया है-
  1. डामरकोट - डमरू के आकार में बना दुर्ग।
  2. गिरिकोट - पहाड़ी पर बना दुर्ग।
  3. नगरकोट - जिस दुर्ग में शहर बसा हो।
  4. धूलकोट - मिट्टी का बना किला।
  5. जलकोट - जल से घिरा किला।
  6. विषमाख्याकोट- टेढ़ी-मेढ़ी सुरंगों से युक्त किला।
  7. विषमभूमिकोट - उबड़-खाबड़ भूमि पर बना किला।
  8. गिरिगुहर- गुफा के रूप में बना किला।

2013 में विश्व धरोहर सूची में राजस्थान के 6 दुर्ग शामिल किये गये हैं।
1. चित्तौड़ 2. कुम्भलगढ़ (राजसमंद) 3. गागरोन (झालावाड़) 4. जैसलमेर 5. रणथम्भौर (सवाईमाधोपुर) 6. आमेर

श्यामल दास के वीरविनोद ग्रंथ के अनुसार मेवाड़ के 84 में से 32 दुर्गों का निर्माण राणा कुम्भा ने करवाया था। राणा कुम्भा को राजस्थान में स्थापत्य कला का जनक कहा जाता है तथा उसका समय (1433-68 ई.) स्थापत्य कला का स्वर्णकाल कहलाता है।

नोट - भारत में स्थापत्य कला का स्वर्णकाल शाहजहाँ का समय (1627-58 ई.) कहलाता है। मारवाड़ में सर्वाधिक दुर्ग मालदेव ने बनवाए।

राजस्थान के प्रमुख दुर्ग

मेवाड़ के दुर्ग


चित्तौड़गढ़
  • क्षेत्रफल- 305 हैक्टेयर।
  • यह दुर्ग धान्वन दुर्ग को छोड़कर सभी श्रेणी में शामिल है। इस दुर्ग को चित्रकुट, सिरमौर दुर्ग, राजस्थान का गौरव, दक्षिणी-पूर्वी द्वार, दुर्गों का दुर्ग कहते हैं। अबुल-फजल ने इस दुर्ग के बारे में कहा है "गढ़ तो चित्तौड़गढ़ बाकी सब गढ़ैया।" यह दुर्ग गम्भीरी व बेड़च नदी के संगम पर स्थित राजस्थान का क्षेत्रफल में सबसे बड़ा दुर्ग है जिसकी लम्बाई 8 किलोमीटर तथा चौड़ाई 2 किलोमीटर है। यह दुर्ग मेसा पठार पर स्थित है जिसकी आकृति व्हेल मछली के समान है। इस दुर्ग का निर्माण 7वीं सदी में चित्रांग/चित्रांगद मौर्य ने करवाया था। राणा कुम्भा को इस दुर्ग का आधुनिक निर्माता माना जाता है। यह दुर्ग दिल्ली से मालवा व गुजरात के रास्ते पर स्थित है जिसका सामरिक महत्त्व सर्वाधिक है। यह एकमात्र दुर्ग है जिसमें कृषि होती थी। यह दुर्ग 21 जून, 2013 को विश्वधरोहर सूची में शामिल किया गया। (यूनेस्को में)
  • दिसम्बर, 2018 ई. में चित्तौड़गढ़ पर 12 का डाक टिकट जारी की गई।
  • प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण एकादशी को चित्तौड़गढ़ दुर्ग में जौहर मेले का आयोजन किया जाता है।
  1. इस दुर्ग को राजस्थान का दक्षिणी प्रवेश द्वार व मालवा का प्रवेश द्वारा कहते हैं।
  2. इस दुर्ग में जयमल, फत्ता, कल्ला राठौड़, रैदास, बाघसिंह की छतरियाँ हैं।
  3. घी-तेल बावड़ी, खातिण बावड़ी, जयमल-फत्ता तालाब, गौमुख कुण्ड, हाथीकुण्ड, सूर्यकुण्ड, भीमतल कुण्ड आदि दुर्ग में स्थित तालाब व बावड़ी है।
  4. श्रृंगार चंवरी मन्दिर- माना जाता है कि यह चंवरी कुम्भा की पुत्री रमाबाई की शादी की चंवरी थी जिसका निर्माण कुम्भा के कोषाध्यक्ष 'वेलका' ने करवाया जिसे बाद में शांतिनाथ जैन मन्दिर बना दिया गया। रमाबाई की शादी मंडलीक से हुई थी।
नोट- श्रृंगार चौकी मेहरानगढ़ में है जहाँ राठौड़ों का राजतिलक होता था।
  • समिद्धेश्वर मंदिर- इस मन्दिर का निर्माण मालवा के राजाभोज (1011-55 ई.) ने नागर शैली में करवाया। मोकल ने इस मन्दिर का पुनः निर्माण करवाया जिस कारण इसे मोकल मन्दिर भी कहते हैं।
  • सतबीस देबरी मन्दिर- इस मन्दिर में सात व बीस अर्थात 27 छोटी छोटी देवरियाँ है जो जैन धर्म के 24 तीर्थकरों को समर्पित है।
  • तुलजा भवानी- ये शिवाजी की कुलदेवी हैं जिसके मन्दिर का निर्माण बनवीर (1536-40 ई.) ने करवाया।
  • कुंभश्याम मन्दिर- यह प्रारम्भ में शिव मन्दिर था जिसे बाद में विष्णु मन्दिर बना दिया। राजा कुम्भा ने इस मन्दिर का पंचायतन शैली में पुनः निर्माण करवाया।
  • कालिका माता मन्दिर- यह एक सूर्य मन्दिर था जिसका निर्माण 8वीं सदी में मानमौरी मौर्य ने करवाया। यह प्रतिहारकालीन मन्दिर है। इस मन्दिर में 12वीं सदी में कालिका माता की मूर्ति स्थापित की गई।

5. दुर्ग में पद्मिनी महल, गौरा-बादल महल, जयमल-फत्ता की हवेलियाँ, पुरोहितों की हवेली, कुम्भा महल/नवलखा महल/नवकोठा महल (यहाँ पन्नाधाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान दिया), फतेहमहल भामाशाह की हवेली, सलूम्बर हवेली, रामपुरा हवेली, आहाड़ा हिंगलू का महल, रतनसिंह महल, आल्हा काबरा की हवेली, राव रणमल की हवेली प्रमुख हैं।

विजय स्तम्भ (Tower of Victory)
यह चित्तौड़ दुर्ग में स्थित 122 फीट ऊँची 9 मंजिला इमारत है जिसका निर्माण 1440-48 ई. में राणा कुम्भा ने सारंगपुर (मालवा) विजय (1437 ई.) के उपलक्ष्य में करवाया। इसमें 157 सीढ़ियाँ हैं व आधार की चौड़ाई 30 फुट है। इसकी आठवीं मंजिल पर कोई मूर्ति नहीं है। इस इमारत का शिल्पी जैता था। जिसका सहयोग नाथा पामा पूंजा ने किया। इसकी प्रथम मंजिल पर कुम्भस्वामी/विष्णु मंदिर है जिस कारण उपेन्द्र नाथ डे ने इसे विष्णु ध्वज कहा है। इसकी तीसरी मंजिल पर 9 बार अरबी भाषा में अल्लाह शब्द लिखा है। इसके चारों ओर मूर्तियाँ होने के कारण इसे मूर्तियों का अजायबघर कहते हैं। यह राजस्थान की प्रथम इमारत है जिस पर 15 अगस्त 1949 को एक रुपये का डाक टिकट जारी किया गया। यह राजस्थान पुलिस व माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का प्रतीक चिह्न है। इसके निर्माण में 90 लाख का खर्चा आया। इसकी 9वीं मंजिल पर अत्रि-महेश ने (अभिकवि) मेवाड़ी भाषा में कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति की रचना की। जिसमें राणा कुम्भा की विजयों का वर्णन है।

विजय स्तम्भ के उपनाम- विक्ट्री टावर
  • कुतुबमीनार से श्रेष्ठ - कर्नल जेम्स टॉड
  • रोम के टार्जन के समान - फर्ग्युसन
  • हिन्दू प्रतिमा शास्त्र की अनुपम निधि - आर. पी. व्यास
  • संगीत की भव्य चित्रशाला - डॉ. सीमा राठौड़
  • पौराणिक देवताओं का अमूल्य कोष - गोरीशंकर हीराचंद ओझा
  • लोकजीवन का रंगमंच - गोपीनाथ शर्मा
  • विष्णु ध्वज - उपेन्द्रनाथ डे

जैन कीर्ति स्तम्भ
यह चित्तौड़ दुर्ग में स्थित है जिसे जैन स्तम्भ/मेरु कनक प्रभ: भी कहते हैं। इसका निर्माण 12वीं सदी में बघेरवाल महाजन सानाय का पुत्र जैन व्यापारी जीजा ने करवाया। इसकी ऊँचाई 75 फीट तथा 7 मंजिलें हैं। यह इमारत जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर आदिनाथ/ऋषभदेव को समर्पित है।

नोट- जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं जिनमें 24वें महावीर स्वामी थे।

दुर्ग पर अधिकार
  1. इस दुर्ग पर प्रथम आक्रमण अफगानिस्तान के मामू का हुआ। (8वीं सदी)
  2. 8 वीं सदी (734 ई.) में बप्पा रावल ने मानमोरी मौर्य से चित्तौड़ छीनकर उस पर अधिकार किया।
  3. इस पर मालवा के परमार राजा मुंज का अधिकार हुआ।
  4. कुछ समय गुजरात के सोलंकी राजा जयसिंह सिद्ध राज का अधिकार हुआ।
  5. 12वीं सदी में पुनः गुहिलों का अधिकार हो गया। जब इल्तुतमिश ने नागदा को तहस-नहस कर दिया था तब जैत्रसिंह ने चित्तौड़गढ़ को अपनी राजधानी बनाया था।
  6. 1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी (दिल्ली) ने अधिकार कर इसका नाम खिज्राबाद कर दिया।
  7. 1326 ई. में राणा हम्मीर ने इस पर अधिकार कर सिसोदिया वंश की नींव रखी।
  8. 1534-35 ई. के साके के बाद इस पर बहादुरशाह (गुजरात) का अधिकार हो गया। जिसमें बहादुर शाह का सेनापति रुमी खाँ था।
  9. 1535 ई. में मन्दसौर के युद्ध में हुमायूँ ने जब बहादुरशाह को हराया तो इस पर पुनः विक्रमादित्य का अधिकार हो गया।
  10. 1536-40 ई. इस दुर्ग पर पृथ्वीराज सिसोदिया के दासी पुत्र बनवीर का अधिकार रहा।
  11. 1540 ई. में इस दुर्ग पर राणा उदयसिंह ने अधिकार कर लिया।
  12. 1544 ई. में राणा उदयसिंह ने दुर्ग की चाबी शेरशाह सूरी को सौंप दी थी।
  13. 1567-68 ई. के चित्तौड़ के तीसरे साके के बाद इस पर अकबर का अधिकार हो गया।
  14. 1615 ई. में जहाँगीर ने यह दुर्ग राणा अमर सिंह को सौंप दिया।
  15. दशरथ शर्मा के अनुसार चित्तौड़ का प्रथम विजेता जैत्र सिंह था।

इस दुर्ग में राजस्थान में सर्वाधिक 3 साके हुए थे
  1. 1303 ई. - रत्नसिंह का अलाउद्दीन के साथ युद्ध जिसमें रत्नसिंह ने केसरिया तथा उसकी रानी ने पद्मिनी ने जौहर का नेतृत्व किया।
  2. 1534-35 ई. - विक्रमादित्य के सेनापति बाघसिंह के नेतृत्व में केसरिया तथा राणा सांगा की रानी कर्मावती के नेतृत्व में जौहर हुआ। इस समय आक्रमण गुजरात के शासक बहादुरशाह ने किया था।
  3. 1567-68 ई. - इस साके में दिल्ली के बादशाह अकबर ने आक्रमण किया जिसमें राणा उदयसिंह के सेनापति जयमल-फत्ता के नेतृत्व में केसरिया तथा गुलाब कंवर व फूल कंवर के नेतृत्व में जौहर हुआ।
नोट - राजस्थान का प्रथम साका 1301 ई. में रणथम्भौर दुर्ग (सवाईमाधोपुर) में हुआ जिसमें हम्मीर देव चौहान के नेतृत्व में केसरिया तथा उसकी रानी रंग देवी के नेतृत्व में जलजौहर हुआ। इस समय आक्रमण दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने किया था।

इस दुर्ग में सात प्रवेश द्वार हैं
  1. पाडन पोल/पावटन पोल - यहाँ देवलिया के रावत बाघसिंह की छतरी है।
  2. भैरों पोल - यहाँ कल्ला राठौड़ (4 खम्भे), जयमल (16 खम्भे) की छतरी है।
  3. हनुमान पोल
  4. गणेश पोल
  5. जोड़ाला पोल
  6. लक्ष्मण पोल
  7. रामपोल - यहाँ फत्ता स्मारक है।
  • इसके पूर्व द्वार को सूरजपोल कहते हैं।
  • इसके उत्तरी द्वार को लाखेटा बारी कहते हैं जिस ओर 1567-68 ई. के आक्रमण के समय अकबर ने अपना मोर्चा लगवाया था।
  • दुर्ग के बाहर 1567-68 ई. के आक्रमण के समय अकबर ने चित्तौड़ी मगरी/मोहर मगरी का निर्माण करवाया।
  • कुम्भा ने एक रथ मार्ग बनवाया।

शेवना दुर्ग (प्रतापगढ़)
  • कुम्भलगढ़ दुर्ग (राजसमंद) - इस दुर्ग का क्षेत्रफल 4268 हैक्टेयर है। इस दुर्ग का प्रारम्भिक निर्माण अशोक मौर्य के पुत्र सम्प्रति मौर्य ने जरगा पहाड़ियों में मच्छेन्द्रपुर के नाम से करवाया। संप्रति मौर्य ने दुर्ग का निर्माण तीसरी सदी में करवाया था। यह दुर्ग हेमकूट पहाड़ी पर हाथी गुड़ा नाल दर्रे के पास स्थित है। यह दुर्ग पार्वत्य/एरण दुर्ग के श्रेणी में आता है। नागौर विजय के उपलक्ष में इसका निर्माण 1448-58 ई. राणा कुम्भा ने करवाया। इसका शिल्पी मण्डन था। इस दुर्ग को कुम्भलमेरु, कटारगढ़, दुर्ग में दुर्ग, मेवाड़ का मेरुदण्ड, मेवाड़, मारवाड़ सीमा का प्रहरी, मेवाड़ की संकटकालीन आश्रयस्थली कहते हैं तथा मेवाड़ मारवाड़ सीमा पर होने के कारण इसे मेवाड़ की आँख भी कहते हैं।

नोट - मारवाड़ की संकटकालीन आश्रयस्थली सिवाणा (बाड़मेर) है।

  1. इस दुर्ग के चारों ओर दीवार की लम्बाई 36 किलोमीटर तथा चौड़ाई 7 मीटर है। जिस कारण से इसे भारत की महान दीवार कहते हैं।
  2. अबुल-फजल इस दुर्ग के बारे में कहते हैं - यह दुर्ग इतनी बुलंदी (ऊँचाई) पर बना है, कि नीचे से ऊपर तक देखने पर सिर की पगड़ी गिर जाती है।
  3. लम्बी प्राचीर, कंगूरों व बुर्जों के कारण कर्नल जेम्स टॉड ने इसे एटुस्कन की संज्ञा दी।
  4. 1536 ई. में पन्नाधाय ने कीरत बारी के सहयोग से उदयसिंह को कुम्भलगढ़ में आशादेव पुरा की सुरक्षा में भेजा।
  5. इस दुर्ग में राणा उदय सिंह का राज तिलक (1537 ई.) तथा महाराणा प्रताप का बादल महल में जन्म (9 मई, 1540 ई.) हुआ।
  6. कटारगढ़ में स्थित मामादेव मन्दिर के पास मामा देव कुण्ड में राणाकुम्भा की उसके पुत्र ऊदा ने हत्या कर दी।
  7. इस दुर्ग में कटारगढ़ है जिसमें बादल महल है, बादल महल के दो भाग हैं - जनाना व मर्दाना, जनाना के दो भाग हैं - श्रृंगार व जूनीकचरी।
  8. इस दुर्ग में तिलखाना स्थित है जो हाथियों का बाड़ा था।
  9. दुर्ग में स्थित झाली रानी के महल को झाली रानी का मालिया कहते हैं।
  10. इस दुर्ग में 1460 ई. में कुम्भलगढ़ प्रशस्ति मामादेव मन्दिर पर पाँच काली शिलाओं पर संस्कृत भाषा में लिखी गयी है। हीराचंद ओझा के अनुसार इस प्रशस्ति की रचना महेश ने तथा अन्य इतिहासकारों के अनुसार इसकी रचना कान्हव्यास ने की थी।
  11. 1578 ई. में राणा प्रताप सोनगरा भाण को दुर्ग सौंप कर स्वयं जंगलों में चले गये।
  12. 1578 ई. में शाहबाज खां (अकबर का सेनापति) ने 3 बार आक्रमण कर इस दुर्ग को विजित किया। जिसमें महाराणा प्रताप के सहयोगी भाण, सींधल व सूजा मारे गये।

इस दुर्ग में 9 द्वार हैं -
  1. ओरठ पोल
  2. हल्ला पोल (प्रथम प्रवेश द्वार)
  3. हनुमान पोल
  4. विजय पोल
  5. भैरव पोल
  6. नींबू पोल
  7. चौगान पोल
  8. पागड़ा पोल
  9. गणेश पोल

माण्डलगढ़ (भीलवाड़ा)
इस दुर्ग को मेवाड़ का प्रवेश द्वार कहते हैं। यहाँ जोधसिंह कच्छवाहा, जगदीश कच्छवाहा, राणा सांगा की छतरी है। रामसिंह राठौड़ के महल, चारभुजा मन्दिर, उडेश्वर मन्दिर, ऋषभदेव मन्दिर दुर्ग में स्थित है मानसिंह ने हल्दी घाटी युद्ध की लगभग 2 माह तैयारी इसी दुर्ग में की थी। यह दुर्ग बनास, बेड़च व मेनाल नदियों के त्रिवेणी संगम के पास स्थित है। कटोरेनुमा अथवा मंडलाकृति होने के कारण इस दुर्ग का नाम माण्डलगढ़ पड़ा। माना जाता है कि मांडिया भील ने इस दुर्ग का निर्माण करवाया। वीर विनोद के रचनाकार श्यामलदास व हीरानन्द ओझा ने चौहानों को माण्डलगढ़ का निर्माता बताया है। कुछ समय इस दुर्ग पर दिल्ली सल्तनत का व फिर हाड़ाओं का अधिकार रहा। राजा क्षेत्रसिंह ने इस पर अधिकार कर लिया। राणा कुंभा का भी इस इस दुर्ग पर अधिकार रहा। 1567 ई. में चित्तौड़गढ़ से पूर्व अकबर ने माण्डलगढ़ पर अधिकार किया। राणा राजसिंह (1652-80 ई.) ने मुगलों से माण्डलगढ़ छीन लिया।

भैंसरोड़गढ़ (चित्तौड़गढ़)
माना जाता है कि इसका निर्माण डोड परमारों ने किया। यह दुर्ग चम्बल व बामणी नदी के किनारे स्थित जल दुर्ग है। इसका निर्माण भैंसाशाह व रोड़ा चारण बंजारे ने 1741 ई. में करवाया। कुछ इतिहासकारों के अनुसार इसका निर्माण व्यापारियों द्वारा किया। इसे राजस्थान का वैलोर दुर्ग कहते हैं। दुर्ग में महाराणा प्रताप के छोटे भाई शक्तिसिंह की छतरी बनी है।
जेम्स टॉड कथन - अगर राजपूताने में उसे किसी जागीर की पेशकश की जाए तो वह भैंसरोड़गढ़ को ही चुनेंगे।

अचलगढ़ (सिरोही)
इसका प्रारम्भिक निर्माण परमारों ने 9वीं सदी में करवाया था। तत्पश्चात इसका निर्माण 1452 ई. में राणा कुम्भा ने करवाया। इस दुर्ग में अचलेश्वर मन्दिर होने के कारण इसे अचलगढ़ कहते हैं। इस दुर्ग में गोमुख मन्दिर, ओखारानी का मालिया, सावन-भादो झील, मानसिंह की छतरी, भंवराथल, पार्वती व नन्दी के चित्र, मंदाकिनी कुण्ड (यह सबसे ऊँचाई पर) स्थित है। अचलगढ़ दुर्ग पर कुछ समय गुजरात सुल्तान कुतुबशाह और महमूद बेगड़ा का अधिकार रहा।

इस दुर्ग में प्रवेश के चार मार्ग हैं-
  • हनुमान पोल
  • गणेश पोल
  • चम्पा पोल
  • भैरव पोल

मचान दुर्ग (सिरोही)
  • इस दुर्ग का निर्माण मेर जाति के आक्रमण को रोकने के लिए किया गया।
  • इस दुर्ग का निर्माण राणा कुम्भा ने करवाया।

बैराठ दुर्ग (बदनौर, ब्यावर)
सज्जनगढ़ का किला (उदयपुर) - यह दुर्ग बांसदरा पहाड़ी पर बना है। इस दुर्ग का निर्माण ज्योतिष गणना करने के लिए करवाया गया है।
  • इसका निर्माण सज्जनसिंह (1874-84 ई.) ने करवाया।
  • इस दुर्ग को उदयपुर का मुकुटमणि कहते हैं।
  • इसकी आकृति गुलाब के समान है।
  • वर्तमान में यहाँ पुलिस का वायरलैस केन्द्र संचालित है।
  • बसंतगढ़ (सिरोही) - यह गिरी दुर्ग है जिसका निर्माण राणा कुम्भा ने करवाया था।

छोटी मांझी साहिबा का किला - (प्रतापगढ़)
इसे लाल किला भी कहते हैं।

बदनौर दुर्ग (ब्यावर)
  • यह दुर्ग हिन्दू शैली में बना है।
  • किले का प्रारम्भिक निर्माण 845 ई. में परमार शासक बदना ने करवाया।
  • चार भुजा शिलालेख के अनुसार दुर्ग का निर्माण 1854 ई. में किया गया।
  • मैया सीता मंदिर, द्वारकाधीश मंदिर, गोपाल मंदिर दर्शनीय स्थल है।

बनेड़ा दुर्ग (भीलवाड़ा)
  • इसका निर्माण राणा कुम्भा ने करवाया था।
  • राणा सांगा ने यह दुर्ग श्रीनगर के जागीरदार करमचंद पंवार को दिया।
  • औरंगजेब ने यह दुर्ग 1681 ई. में राणा राजसिंह के पुत्र भीमसिंह को दिया।
  • इस दुर्ग में मर्दाना महल, जनाना महल, कंवरपदा महल, शीशमहल, मित्र निवास व सरदार निवास महल स्थित हैं।

गोगुन्दा गढ़ (उदयपुर)
  • राणा उदयसिंह का देहान्त व राणा प्रताप का राजतिलक यहीं हुआ था।
  • राणा प्रताप के पुत्र राणा अमरसिंह कुछ दिन के लिए इसे राजधानी बनाया।

ऊंटाला दुर्ग (उदयपुर)
  • राणा प्रताप की मृत्यु के बाद अकबर के पुत्र सलीम (जहाँगीर) ने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया तथा समस खां को किलेदार बनाया।
  • राणा अमरसिंह ने ऊंटाला पर आक्रमण किया। जिसमें अमरसिंह ने हरावल (आगे की सेना) के लिए घोषणा की कि- भविष्य में वही हरावल में होगा जो ऊंटाला दुर्ग में पहले पहुँचेगा जिसे लेकर चूड़ावतों व शक्तावतों में ऊंटाला दुर्ग पहुँचने के लिए होड़ मच गई। शक्तावतों में शक्तिसिंह का तीसरा पुत्र बल्लू दुर्ग पर पहुँचा लेकिन दरवाजा बंद होने के कारण अंदर नहीं जा सका। दरवाजे के आगे नुकीला कीला होने के कारण हाथियों ने दरवाजे के टक्कर नहीं मारी जिससे बल्लू ने दरवाजे के आगे खड़े होकर हाथियों की टक्कर मरवायी जिससे दरवाजा तो टूट गया पर बल्लू की मौत हो गई।
  • जैतसिंह चूड़ावत ने सेना से अपना सिर कटवाकर दुर्ग में फिंकवा दिया। हरावल में चूड़ावत रहे।

बेंगू दुर्ग (चित्तौड़)
  • इसका निर्माण 16वीं सदी में हुआ।

सांगानेर दुर्ग (भीलवाड़ा)
  • इसका निर्माण महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय (1711-34 ई.) ने करवाया।

जानागढ़ (प्रतापगढ़)
  • गौरीशंकर ओझा ने गौतमेश्वर शिलालेख (1505 ई.) के अनुसार इसका निर्माता मकबल खां को माना है जो मालवा का सामंत था।

सलूम्बर दुर्ग (सलूम्बर)
  • यह दुर्ग पारिध व गिरी दुर्ग की श्रेणी में है।
  • इसका निर्माण अंग्रेजों द्वारा किया गया।

तोहन दुर्ग (कांकरोली, राजसमंद)

जयगढ़ दुर्ग (जयपुर)
  • यह दुर्ग चील का टीला/ईगल पहाड़ी पर स्थित है। ठाकुर हरनाथ सिंह के दुर्ग का निर्माण प्रारम्भ मानसिंह प्रथम ने किया जिसे पूर्ण मिर्जा राजा जयसिंह ने किया। इसका निर्माण कोकिल देव (1036-39 ई.), मानसिंह प्रथम (1589-1614 ई.), मिर्जा राजा जयसिंह (1621-67 ई.), सवाई जयसिंह (1700-43 ई.) ने करवाया। गोपीनाथ शर्मा के अनुसार जयसिंह ने निर्माण करवाया। इंदिरा गाँधी ने गुप्त खजाने की खोज के लिये इस दुर्ग में खुदाई करवाई (1975-76) थी। जिससे यह दुर्ग चर्चित हुआ था। दुर्ग में राम, हरिहर व काल भैरव के प्राचीन मन्दिर हैं। विजयगढ़ी के पास एक सात मंजिला प्रकाश स्तम्भ है जो ‘दीया बुर्ज’ कहलाता है।
  • यह दुर्ग आमेर की ओर झांकता दिखाई देता है।
  • इसे रहस्यमयी दुर्ग कहते हैं। क्योंकि इसमें सुरंग बहुत है।

इस दुर्ग में प्रवेश के तीन मार्ग हैं-
  1. डूंगरपोल
  2. अवनी पोल
  3. भैरवपोल
  • यह टांकों व सुरंगों हेतु प्रसिद्ध है। यहाँ राजस्थान का सबसे बड़ा टांका स्थित है जिसकी लम्बाई 155 फीट, चौड़ाई 138 फीट, गहराई 40 फीट है।
नोट - टांका कुण्ड जैसा होता है जिसमें वर्षा का पानी एकत्रित किया जाता है।
  • जयगढ़ दुर्ग मावता झील के पास बना है।
  • संग्रहालय- अवनी दरवाजे के पास स्थित है। इसमें राजघराने के लघु चित्र, मुहर व पीकदान रखा है।
  • तोपें- रणचंडी, भैरवी, माधुरी, धूम्बाण, सिंहासन, रामबाण, नागिन, शिवबाग, कड़क, बिजली, मुल्क मैदान, नाहर मुखी, फतह जंग।
  • यह दुर्ग आमेर दुर्ग से एक सुरंग से जुड़ा है। आमेर दुर्ग से जयगढ़ दुर्ग जाते समय चार दरवाजे आते हैं- 1. हाथी पोल, 2. महल पोल, 3. ध्रुव पोल, 4. गणेश पोल
  • इस दुर्ग में विजयगढ़ी महल है जिसे लघु दुर्ग कहते हैं जिसमें सवाई जयसिंह ने अपने भाई विजय सिंह को कैद किया। इसी विजयगढ़ी में आमेर शासकों का शस्त्रागार, खजाना व तोप बनाने का कारखाना था जो एशिया का एकमात्र तोपखाना था। यहाँ एशिया की सबसे बड़ी जयबाण तोप/रणबकां रखी है जिसे एक ही बार चलाया गया, इसकी इतनी गर्जना हुई की महिलाओं व पशुपक्षियों का गर्भपात हो गया। इसका गोला चाकसू में गिरा जहाँ गोलेलाव तालाब बन गया।
  • इस तोप की मारक क्षमता 35किमी., वजन 50टन, लम्बाई 20फीट व गोले का वजन 50 किलोग्राम था। जयबाण 1720 ई. में बनी।
  • इस दुर्ग में एक कठपुतली घर व चारबाग शैली का उद्यान स्थित है।
  • इस दुर्ग में सुभट निवास (दीवाने आम), खिलवत निवास (दीवाने खास), लक्ष्मी निवास, ललित मंदिर, विलास मंदिर, सूर्य मंदिर, आराम मंदिर, राणावतजी का चौक स्थित है।

आमेर का किला (जयपुर)
  • क्षेत्रफल- 30 हैक्टेयर।
  • यह दुर्ग कालीखोह पहाड़ी पर स्थित है। इस दुर्ग का निर्माण मीणाओं ने किया। 1150 ई. में इस दुर्ग का निर्माण धोलाराय ने करवाया। 1207 ई. में धौलाराय के पुत्र कोकिलदेव ने भुट्टोमीणा से छीनकर इस पर अधिकार कर लिया। इसे अम्बर दुर्ग व अम्बावती अम्बिकापुर आम्रदाद्रि भी कहते हैं।
  • विशप हैबर का कथन - मैनें क्रेमलिन में जो कुछ देखा और अलब्रहा के बारे में जो कुछ सुना उससे बढ़कर भी इस दुर्ग के महल हैं।
  • कोकिलदेव, भारमल ने इसका पुनः निर्माण तथा मानसिंह प्रथम ने 1592 ई. में इसे आधुनिक रूप दिया।
  • 1707 ई. में बहादुर शाह प्रथम ने इसका नाम मोमिनाबाद कर दिया।
  • इस दुर्ग के स्थापत्य में हिन्दू - मुस्लिम शैली का मिश्रण है।
  • इस दुर्ग में जलेब चौक, सिंह पोल, गणेश पोल, दीवाने आम, दीवाने खास, दिलखुश महल, बाला बाई की साल, मावठा तालाब, राम बाण, दलाराम बाग, चार बाग, कचहरियाँ, सुरंग, जस मंदिर, सुख मन्दिर, सुहाग मन्दिर, (यहाँ से रानियाँ दीवाने आम को देखती थीं), चतरनाथ जोगी के स्मारक, सीतारामजी का मन्दिर, शिलामाता मन्दिर जनानी ड्योढ़ी, बुखारा गार्डन, मीना बाजार, केशर क्यारी, भूलभूलैया, अम्बीकेश्वर महादेव मंदिर, मानसिंह महल/कदमी महल (इसमें कछवाह वंश का राजतिलक होता था) राजतिलक की चौकी आदि पर्यटन स्थल हैं।
  • फर्ग्यूसन ने गणेश पोल को दुनिया का सबसे सुन्दर दरवाजा बताया।
  • यह दुर्ग जयगढ़ दुर्ग से सुरंग से जुड़ा है।
  • इस दुर्ग में सर्वाधिक विदेशी पर्यटक आते हैं।
  • दुर्ग में स्थित परी बाग/मोहन की बाड़ी/श्याम बाग में स. जयसिंह ने पुण्डरीक रत्नाकर की देख-रेख में 1740 ई. में अश्वमेघ यज्ञ करवाया, यह यज्ञ भारत का अन्तिम अश्वमेघ यज्ञ माना जाता है।
  • दुर्ग में मानसिंह प्रथम की रानी कनकावती ने अपने पुत्र जगत सिंह की याद में जगत शिरोमणी मन्दिर का निर्माण करवाया। इस मन्दिर में भगवान कृष्ण की मूर्ति जिसकी पूजा मीरा बाई बचपन में किया करती थीं जिस कारण से मीरा मन्दिर भी कहते हैं।
  • आमेर का दुर्ग का सबसे पुराना महल कदमी महल है जिसका निर्माण 1237 ई. मे राजदेव ने करवाया। कदमी महल में स्थित छतरी में मीणा सरदार कछवाहों का राजतिलक करता था।
  • दिवान-ए-खास - इस महल का निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह ने करवाया। इस महल पर कांच का काम किया है। जिस कारण इसे शीशमहल भी कहते हैं। कवि बिहारी ने इसे दर्पण धाम कहा है।

इस दुर्ग में प्रवेश के पांच दरवाजे हैं -
  1. कस्सी दरवाजा
  2. बांसखोह के ठाकुर चूड़सिंह की हवेली जाने का दरवाजा
  3. पिन्ना मियां की हवेली का दरवाजा
  4. भैरू दरवाजा
  5. सूरजपोल दरवाजा

दौसा का किला
  • दौसा दुर्ग का निर्माण देवगिरि पहाड़ी पर गुर्जर प्रतिहार/ बड़गूजरों ने करवाया था जिसका पुनःनिर्माण कछवाहों के शासक दुल्हेराय ने 966 ई.में करवाया। दुल्हेराय की शादी दौसा के पास मोरां के चौहान शासक सालरसिंह की पुत्री कुमकुमदे के साथ हुई।
  • 12वीं सदी में दुल्हेराय ने बड़गूजरों को पराजित कर कछवाह वंश की स्थापना की तथा दौसा को राजधानी बनाया।
  • भारमल के भाई पूरणमल के पुत्र सूरजमल प्रेतेश्वर भोमियाजी के नाम से दौसा के आस-पास पूजे जाते हैं।
  • जनवरी, 1562 ई. दौसा हाकिम रूपाजी बैराणी ने भारमल की मुलाकात अकबर से करवाई।
  • दौसा दुर्ग की आकृति सूप/छाजले जैसी है। प्रवेश द्वार (1) हाथी पोल (2) मोरी दरवाजा
  • 1814 ई. में भरतपुर के जाटों ने अधिकार किया।
  • गुप्तेश्वर महादेव, सहजनाथ महादेव, सोमनाथ, सागर जलाशय, रामचन्द्रजी का मन्दिर, दुर्गामाता मन्दिर, जैन मन्दिर, मस्जिद, चार मंजिला बावड़ी, बैजनाथ महादेव मन्दिर, नीलकंठ महादेव मन्दिर, राजाजी का कुआँ, चौदह राजाओं की साल आदि दुर्ग में दर्शनीय स्थल है।

चौमू दुर्ग - (जयपुर)
  • जागीरी दुर्गा में चौमूहागढ़ का विशेष स्थान था। चौमूहागढ़ पर नाथावतों का अधिकार था। नाथावतों को हराने के लिये जयपुर के दीवान संधी झूथाराम ने आक्रमण किया लेकिन वह नाथावतों को नहीं हरा पाया।
  • यह दुर्ग स्थल दुर्ग की श्रेणी में आता है।
  • इसका निर्माण कर्णसिंह ने प्रारम्भ करवाया (1595-97 ई.) तथा पूर्ण रघुनाथ ने करवाया।
  • इस दुर्ग में दो दरवाजे हैं जिसमें पश्चिमी दरवाजे को ध्रुव पोल तथा पूर्वी दरवाजे को गणेश पोल कहते हैं।
  • देवी निवास, कृष्ण निवास, मोती निवास, शीश निवास, रतन निवास, सीताराम जी मन्दिर, मोहनजी मन्दिर गणेश जी मन्दिर आदि दर्शनीय स्थल हैं।
  • इसे रघुनाथगढ़/धाराधारगढ़/चौमूहागढ़ कहते हैं।
  • पं. हनुमान शर्मा के अनुसार दुर्ग निर्माण हेतु ठाकुर कर्णसिंह को बेणीदास नामक संत ने आशीर्वाद दिया।
  • ठाकुर मोहनसिंह ने सुदृढ़ दीवार का निर्माण करवाया।
  • आक्रांता रजाबहादुर तथा समरू बेगम ने दुर्ग पर गोले दागे पर दुर्ग को कोई नुकसान नहीं हुआ।
  • दुर्ग के मुख्य प्रवेश द्वारा मनोहर पोल के पास बेसन फैक्ट्री संचालित है।
  • दुर्ग में स्थित देवी निवास तो जयपुर के एलबर्ट हॉल की प्रतिकृति मालूम होता है।
  • वि.स. 1803 के शिलालेख के अनुसार ठाकुर जोधासिंह के समय सीतारामजी मंदिर का निर्माण हुआ।
  • बजरंग पोल (रावण दरवाजा), पीहाला दरवाजा, बावड़ी दरवाजा, होली दरवाजा चौपड़, त्रिपोलिया, कटला बाजार, मंगलपोल प्रमुख दर्शनीय स्थल है।

नाहरगढ़/ सुदर्शनगढ़ - (जयपुर)
  • इसे महलों का दुर्ग व मीठड़ी का दुर्ग कहते हैं।
  • इसका निर्माण 1734 ई. में सवाई जयसिंह ने मराठों से जयपुर की रक्षा हेतु करवाया। किवदन्ती के अनुसार इस दुर्ग को दिन में जितना बनाया जाता, रात को वह निर्माण नाहरसिंह बाबा के चमत्कार के कारण टूट जाता, फिर पण्डित रत्नाकर पुण्डरीक के कहने पर नाहरसिंह बाबा की छतरी बनायी गयी तथा उस दुर्ग का नाम नाहरगढ़ रख दिया। दुर्ग में भगवान कृष्ण का मन्दिर होने के कारण सुदर्शनगढ़ भी कहते हैं क्योंकि सुदर्शन भगवान श्रीकृष्ण के चक्र का नाम था।
नोट:- पुण्डरीक ने नाहरसिंह बाबा के अन्यत्र जाने के लिए राजी कर लिया तथा उनका स्थान घाट की गुणी में आंबागढ़ के पास चौबुर्जा गढ़ी में स्थापित किया।

  • यह दुर्ग गिरी, ऐरण, सहाय, पारिध व सैन्य दुर्ग की श्रेणी में आता है।
  • इस दुर्ग में अधिकांश महलों का निर्माण रामसिंह द्वितीय व माधोसिंह ने करवाया।
  • माधोसिंह द्वितीय ने दुर्ग में अपनी पासवान रानियों के लिए विक्टोरिया शैली में एक जैसे 9 महलों का निर्माण करवाया ये है- सूरज प्रकाश, खुशहाल प्रकाश, बसन्त प्रकाश, फूल प्रकाश, जवाहर प्रकाश, ललित प्रकाश, आनन्द प्रकाश, लक्ष्मी प्रकाश, चाँद प्रकाश महल, सवाई जगत सिंह ने अपनी प्रेमिका रसकपूर को यही बंदी बनाया था।
  • इस दुर्ग को जयपुर का मुकुट व जयपुर शहर की ओर झाँकता दुर्ग कहते हैं।
  • दुर्ग में सिलहखाना, हवा मंदिर, माधोसिंह का अतिथि-गृह स्थित है। दुर्ग के पास गैटोर की छतरियाँ व जैविक उद्यान है।

मानपुर दुर्ग (सीकर)
  • इसका निर्माण गौड़ राजा मानसिंह ने करवाया।
  • इस दुर्ग में दीवाने आम, दीवाने खास, अश्वशाला, बारादरी, पालखी महल, रानीमहल स्थित हैं।
  • रानी महल में कठपुतलियों व रागरागिनी के भित्ति चित्र हैं।

लक्ष्मणगढ़ का किला (सीकर)
  • यह दुर्ग बेड़ पहाड़ी पर बना है इस दुर्ग का निर्माण 1805 ई. में लक्ष्मणसिंह ने करवाया।

करणासर का किला (सांभर, जयपुर)
  • इस दुर्ग का निर्माण बहादुरसिंह राणावत ने करवाया था। इस किले को चौबुर्जा दुर्ग भी कहते हैं। यह लघु भूमि दुर्ग है जिसमें शस्त्रागार व पातालतोड़ कुआं है।

भोपालगढ़ (खेतड़ी, झुंझुनूं)
  • इस दुर्ग का निर्माण 1812 ई. में भोपालसिंह ने करवाया।

महनसर दुर्ग (झुंझुनूं)
  • इस दुर्ग का निर्माण 1768 ई. में नाहरसिंह ने करवाया।

दातारामगढ़ (सीकर)
  • इस दुर्ग का निर्माण 1744 ई. में गुमानसिंह ने करवाया।

डूंडलोद दुर्ग (नवलगढ़)
  • इस दुर्ग का निर्माण 1750 ई. में केसरीसिंह ने करवाया।

नवलगढ़ का किला (झुंझुनूं)
  • इस दुर्ग का निर्माण नवलसिंह ने करवाया।

कानोता दुर्ग (जयपुर)
  • इसका निर्माण जोरावरसिंह ने कराया। यह पीलवा (जोधपुर) के ठाकुर जीवराज सिंह का पुत्र था। जयपुर शासक रामसिंह ने इसे कानोता की जागीर दी।

बादलगढ़ (झुंझुनूं)
  • इसका निर्माण 17वीं सदी में नवाब फजल खां ने करवाया।
  • इस दुर्ग में घोड़े व ऊँट रखे जाते थे।

बाघोर दुर्ग (सीकर)
  • इसका निर्माण 12वीं सदी में गोगा व बाधा तंवर ने करवाया।

फतेहपुर दुर्ग (फतेहपुर, सीकर)
  • इसका निर्माण 1453 ई. में कायमखानी फतेहखां ने करवाया।
  • यह धान्वन, ऐरण, पारिख, पारिघ दुर्ग की श्रेणी में है।
  • इस दुर्ग में तेलिन का महल, सैनिक आवास, अस्तबल, रनिवास, शाही महल, मीनारें, नवाब दौलखां का मकबरा आदि स्थित है। जलाल खाँ ने किले का विस्तार किया।
  • इस दुर्ग पर जोधपुर शासक रावजोधा ने फतेहखां को हराकर अधिकार कर लिया।
  • 1541 ई. में राव मालदेव ने (जोधपुर) दुर्ग पर अधिकार कर लिया।
  • 1731 ई. में शेखावतों ने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

खण्डेला दुर्ग (सीकर)
  • इस दुर्ग का निर्माण 11वीं सदी में हुआ था।
  • खण्डेला शासक बहादुर सिंह के समय औरंगजेब ने आक्रमण कर दुर्ग में स्थित मन्दिरों को तुड़वाया।

बबाई दुर्ग (खेतड़ी, झुंझुनूं)
  • यह स्थल दुर्ग है।
  • इस दुर्ग पर सवाई जयसिंह ने अधिकार कर बूंदी के दलेलसिंह को दे दिया।

रघुनाथगढ़ (सीकर)
  • यह मालखेत पहाड़ी पर बना है।
  • दुर्ग में रघुनाथजी का मन्दिर, महादेव मन्दिर, महिषासुर मर्दिनी का मन्दिर, अलखाजी का कुण्ड आदि स्थित हैं।
  • यहाँ चन्देल राजपूतों का अधिकार था।

नायला दुर्ग जमवारामगढ़ तहसील (जयपुर)
  • इसका निर्माण 1872 ई. में पीलवा (जोधपुर) के फतेहसिंह चम्पावत ने करवाया।
  • जयपुर के राजा रामसिंह द्वितीय ने 1860 ई. में फतेहसिंह को नायला की जागीर दी।

बोराज दुर्ग - जयपुर
  • यह दुर्ग जयपुर से दक्षिण-पश्चिम में 45 किलोमीटर दूर गिरी दुर्ग है। इस दुर्ग का निर्माण खंगारोतों ने करवाया। 1786 ई. में रावजी पटेल के नेतृत्व में मराठों ने इसे दुर्ग को विजय किया।

जोबनेर दुर्ग (जयपुर)
  • खंगारोत देवीसिंह ने मराठों से बचने के लिए देवगढ़ व चौबुर्जा नामक दो दुर्ग बनवाये। यहाँ खंगारोतों से पहले चौहानों का अधिकार था।

अचरोल दुर्ग (जयपुर)
  • यह दिल्ली जयपुर मार्ग पर स्थित है इसका निर्माण 1564 ई. में अचलदास ने करवाया जो कछवाहों की बलभद्रोत शाखा से सम्बन्धित थे।

कालख दुर्ग (जयपुर)
  • यह दुर्ग जयपुर-जोबनेर मार्ग पर स्थित है। यह दुर्ग सामंत जोरावरसिंह को जागीर में मिला था। इस दुर्ग के पास नन्हीं डूंगरी पहाड़ी है।

साईवाड़ दुर्ग (जयपुर)
  • यह दुर्ग जयपुर से उत्तरी दिशा में है। यह गिरी दुर्ग है। औरंगजेब के सेनापति ने दुर्ग पर आक्रमण किया जिससे चिमन सिंह हार गया।

उनियारा दुर्ग (टोंक)
  • इस दुर्ग में स्थित भित्ती चित्रों में जयपुर व कोटा की शैली का मिश्रण है।

माधोराजपुरा दुर्ग (जयपुर)
  • यह दुर्ग पारिख, पारिघ व स्थल दुर्ग में आता है।
  • इस दुर्ग का निर्माण माधोसिंह प्रथम (1750-68 ई.) ने मराठों पर विजय के उपलक्ष में करवाया।
  • इस दुर्ग पर कछवाहों की नरूका शाखा का अधिकार था।
  • भरतसिंह नरूका ने अमीर खां पिण्डारी के परिवार को इस दुर्ग में कैद किया। अमीर खां पिण्डारी ने एक वर्ष तक दुर्ग का घेराव रखा लेकिन दुर्ग को नहीं जीत पाया। यह घेराव 21 जनवरी, 1816 ई. से नवम्बर, 1817 ई. तक चला। दुर्ग में सवाई जयसिंह तृतीय की धाय मां रूपा बड़ारण को कैद किया गया था। भोमिया करणसिंह नरूका दुर्ग की रक्षा हेतु शहीद।

मोरिजा दुर्ग (गोविन्दगढ़, जयपुर)
  • यह गिरी दुर्ग है इसका निर्माण कछवाहों की नाथावत शाखा ने करवाया। यह दुर्ग गोविंदगढ़ जयपुर में है।

सहर दुर्ग (सवाई माधोपुर)
  • यहाँ पहले मीणाओं का अधिकार था। कछवाहों की पच्याणोत शाखा का यह ठिकाना था। यह दुर्ग गिरि दुर्ग, पारिघ दुर्ग व एरण दुर्ग की श्रेणी में आता था।

भोमगढ़ दुर्ग (टोंक)
  • इस दुर्ग का निर्माण 17वीं सदी में भोला ब्राह्मण ने करवाया।
  • 19वीं सदी में टोंक के नवाब अमीरखां पिण्डारी ने इसका पुनः निर्माण करवाया।
  • इसे असीरगढ़/काकोड/कनकपुरा दुर्ग भी कहते है।

अजमेर के दुर्ग

तारागढ़/अजयमेरु दुर्ग (अजमेर)
  • इसका निर्माण 683 ई. में अजयपाल चौहान ने करवाया। मान्यमत के अनुसार इसका निर्माण 1113 ई. में अजयराज चौहान ने करवाया। इस दुर्ग का पुनः निर्माण पृथ्वीराज सिसोदिया/उड़ना राजकुमार ने करवाकर इसका नाम पत्नी तारा के नाम पर तारागढ़ कर दिया। (1505 ई)
  • यह दुर्ग बिठली पहाड़ी पर स्थित होने के कारण इसे ‘‘गढ़ बिठली’’ दुर्ग कहते हैं।
  • राजस्थान/राजपूताना को जीतने से पहले इस दुर्ग को विजय करना अनिवार्य था जिस कारण इसे ‘‘राजपूताना की कुंजी’’ कहते हैं।
  • यह दुर्ग राजस्थान में मध्य में स्थित होने के कारण ‘‘राजस्थान का हृदय’’ कहलाता है।
  • यह दुर्ग अरावली के मध्य में स्थित होने के कारण ‘‘अरावली का अरमान’’ कहलाता है।
  • विशप हैबर ने इसे ‘‘राजस्थान का जिब्राल्टर’’ कहा है।
  • जेम्स टॉड के अनुसार अजयराज ने अजयमेरू दुर्ग बनवाया।
  • हरविलास शारदा ने तारागढ़ को राजस्थान का प्रथम गिरी दुर्ग बताया।
  • हरविलास शारदा के अनुसार, इस दुर्ग ने सर्वाधिक स्थानीय आक्रमण सहे हैं।
नोट : सर्वाधिक विदेशी आक्रमण भटनेर दुर्ग (हनुमानगढ़) ने सहे हैं।
  • इस दुर्ग में पीपल बुर्ज, फतेह बुर्ज, इमली बुर्ज, श्रृंगार चंवरी बुर्ज, जानूनायक बुर्ज, घूंघट बुर्ज, नगारची बुर्ज आदि बुर्ज स्थित हैं।
  • यहाँ नानासाहब का झालरा, गोल झालरा, इब्राहिम का झालरा, बड़ा झालरा आदि जलाशय हैं।
  • यहाँ दारा शिकोह का जन्म हुआ जिस कारण यह दुर्ग शिया मुसलमानों का तीर्थ स्थल कहलाता है।
  • इस दुर्ग में घोड़े की मजार है जहाँ दाल चढ़ती है।
  • यहाँ रूठी रानी मानवती उमादे जो मालदेव से रूठ कर अजमेर आ गयी थी उसका महल व छतरी है।
  • यहाँ सिसाखान गुफा है जिसमें से पृथ्वीराज चौहान दुर्ग में स्थित चामुण्डा माता के दर्शन को जाते थे।
  • यहाँ मीरान साहब की दरगाह व सैयद हुसैन खिंडासवारन की दरगाह स्थित है।
  • शाहजहाँ के सेनापति बिट्ठलदास गौड़ (1644-56 ई.) ने पुनः निर्माण कर इसका नाम गढ़ बीठली कर दिया।
  • दुर्ग में 14 बुर्ज हैं।

दुर्ग पर अधिकार
  • 1024 ई. में मोहम्मद गजनवी ने आक्रमण किया।
  • 1135 ई. अर्णोराज के समय मुस्लिमों का आक्रमण हुआ जिसमें अर्णोराज ने मुस्लिम सेना की हत्या कर दी। जिससे चारों ओर खून ही खून हो गया उसे साफ करने के लिए अर्णोराज ने आनासागर झील का निर्माण करवाया।
  • विग्रहराज चतुर्थ/बीसलदेव (1152-64 ई.) के समय 1155 ई. से 1163 ई. अजमेर को पूरे भारत की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है।
  • 1658 ई. में अकबर के सेनापति सैय्यद मुहम्मद कासिम खां का अधिकार हो गया। औरंगजैब की मृत्यु के बाद अजमेर दुर्ग पर राठौड़ों का अधिकार हो गया।
  • 1756 ई. में विजयसिंह ने अजमेर दुर्ग मराठों को सौप दिया।
  • 1787 ई. में राठौड़ों का पुनः अधिकार हो गया।
  • 1790 ई. में मराठा सिंधिया ने पुनः अधिकार कर लिया।
  • 1818 ई. में अंग्रेजों के अधिकार में आ गया।

इस दुर्ग में 6 दरवाजे हैं।
  • लक्ष्मण पोल
  • फूटा दरवाजा
  • बड़ा दरवाजा
  • भवानी पोल
  • हाथी पोल
  • इन्द्र पोल

टॉडगढ़ दुर्ग (ब्यावर)
  • इसका प्राचीन नाम बोरासवाड़ा था।
  • इस दुर्ग का निर्माण कर्नल जेम्स टॉड ने करवाया।
  • इस दुर्ग में सशस्त्र क्रांति (21 फरवरी, 1915) के क्रांतिकारी विजयसिंह पथिक व गोपालसिंह खरवा को बंदी बनाया गया था जहाँ से ये दोनों फरार हो गए।

मैग्जीन दुर्ग (अजमेर)
  • इस दुर्ग का निर्माण 1571-72 ई. अकबर ने ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के सम्मान में करवाया।
  • इस दुर्ग की नींव दादूदयाल ने रखी थी।
  • इसे अकबर का किला व अकबर का दौलतखाना कहते हैं।
  • यह राजस्थान का एकमात्र दुर्ग है जो मुगल शैली/फारसी शैली में बना है। निर्माण में 3 वर्ष लगे।
  • 10 जनवरी, 1616 ई. को जहाँगीर ने सर टॉमस रो को भारत में बसने की अनुमति इसी दुर्ग से दी थी।
  • यह दुर्ग 1857 ई. की क्रांति का केन्द्र था।
  • हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई.) की योजना इसी दुर्ग में बनी थी।
  • इस दुर्ग का मुख्य दरवाजा जहाँगीरी दरवाजा कहलाता है।
  • इस दुर्ग में बादशाही भवन स्थित है।
  • अकबर के पुत्र दानियाल व शाहजहाँ के पुत्र शाहजादा का जन्म इसी दुर्ग में हुआ था। 1801 ई. अंग्रेजों का अधिकार।
  • इस दुर्ग का पुनः निर्माण 1905 में लार्ड कर्जन ने करवाया था।
  • 1908 में इस दुर्ग में राजपूताना संग्रहालय की स्थापना हुई जिसके प्रथम अध्यक्ष हीराचंद ओझा को बनाया गया।
  • 1968 में इस दुर्ग को संरक्षित स्मारक में घोषित किया गया।

किशनगढ़ दुर्ग/केहरीगढ़ (अजमेर)
  • इसे दुर्ग के आंतरिक भाग का जीवनरेखा कहते हैं। इसकी स्थापना 1611 ई. में किशनसिंह ने की। यह दुर्ग स्थल, पारिख एवं पारिघ की श्रेणी में है। यह दुर्ग गूंदोलाय झील के किनारे स्थित है। इस दुर्ग में वल्लभ सम्प्रदाय के श्रीनाथ जी का मन्दिर है।

रूपनगढ़ दुर्ग (किशनगढ़-अजमेर)
  • यह दुर्ग रूपनगढ़ नदी के किनारे है। दुर्ग में शस्त्रागार, सुरंग, जेल, राजसी महल स्थित है। 1997 में से हेरिटेज होटल बना दिया।

करकेड़ी दुर्ग (किशनगढ़-अजमेर)
  • 1756 ई. में सावंत सिंह किशनगढ़ के राजा के पुत्र सरदार सिंह व सावंत सिंह के भाई बहादुरसिंह ने किशनगढ़ के राज्य को लेकर विवाद हुआ जिससे किशनगढ़ राज्य दो भागों में बँट गया।
  • रूपनगढ़, सलेमाबाद, करकेड़ी सरदार सिंह के पास तथा किशनगढ़, फतेहगढ़, सरवाड़, सींधरी बहादुरसिंह के पास रहे।
  • महाराजा यज्ञनारायण ने इस किले का वास्तविक निर्माण करवाया।

शेरगढ़ का किला (धौलपुर)
  • इस दुर्ग का निर्माण कुषाण वंश के शासक मालदेव ने करवाया था। इस दुर्ग को धौलपुर दुर्ग व धौल दोहारगढ़ भी कहते हैं। इसे दक्षिण का द्वारगढ़ कहते हैं। देवीपाल ने दुर्ग का पुनःनिर्माण करवाया। 1540 ई. में शेरशाह सूरी ने पुनःनिर्माण करवाकर इसका नाम शेरगढ़ रखा।
  • इस दुर्ग में हुनहुंकार तोप रखी है जिसकी लंबाई 19 फीट है। इस तोप का निर्माण महाराजा कीरत सिंह ने करवाया।
  • इस दुर्ग में शेरशाह सूरी के गुरू मीर सैयद की मजार स्थित है।
  • मुगलकाल में इस दुर्ग का उपयोग चौरी के रूप में होता था।

बाड़ी का किला (धौलपुर)
  • इस दुर्ग का निर्माण 1444 ई. में हुआ।

ऊँटगिर का किला (करौली)
  • इस दुर्ग का निर्माण लोधी राजपूतों ने करवाया। (16वीं सदी)
  • गोपालदास जी ने दौलताबाद से भगवान कृष्ण की मूर्ति लाकर मंदिर मनवाया।
  • इस दुर्ग को अवंतगढ़, उटनगर, अंतगढ़ भी कहते हैं।

मण्डरायल का किला (करौली)
  • इस दुर्ग में मर्दान शाह पीर की मस्जिद है। इस दुर्ग का निर्माण ब्रजबहादुर ने करवाया। इसे ग्वालियर दुर्ग की कुंजी कहते हैं।

कोटा का किला
  • इसका निर्माण (1264 ई.) बूँदी शासक राव देवा के पुत्र जैत्रसिंह ने कोटिया भील पर विजय के उपलक्ष में करवाया।
  • माधोसिंह हाड़ा (1631-48 ई.) ने दुर्ग में अधिकांश महलों का निर्माण करवाया।
  • प्रवेश द्वार- (1) पाटनपोल, (2) कैथूनीपोल, (3) सूरजपोल, (4) हाथीपोल, (5) किशोरपुरा दरवाजा।
  • यह दुर्ग चम्बल नदी के किनारे स्थित है।
  • कार्ल खण्डेलवाला का कथन:- यहाँ के भित्ति चित्र एशिया में अपने सानी नहीं रखते''।
  • दुर्ग में स्थित कुछ चित्रों को उखाड़कर राष्ट्रीय कला दीर्घा (दिल्ली) में रखा गया है।
  • यहाँ रावठा का तालाब स्थित है।
  • इस दुर्ग का निर्माण हिन्दू-मुगल शैली में हुआ।
  • यहाँ स्थित झाला हवेली भित्ति चित्रों हेतु प्रसिद्ध है।
  • कर्नल जेम्स टॉड ने इस दुर्ग के बारे में कहा कि इस दुर्ग का परकोटा आगरा दुर्ग के बाद सबसे मजबूत है।
  • जून, 1707 ई. में हुए जाजेऊ युद्ध (धौलपुर) में कोटा के रामसिंह हाडा ने आजम के पक्ष में लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की।
  • 1744 ई. में जयपुर के महाराजा ईश्वरीसिंह, मराठा जयप्पा सिंधिया, मल्हारराव होल्कर व सूरजमल जाट ने कोट दुर्ग को घेरा लेकिन सफलता नहीं मिली।
  • 1761 ई. जयपुर के माधोसिंह महल वे कोटा सेनापति झाला जालिमसिंह के बीच भटवाड़ा का युद्ध हुआ जिसमें कोटा विजयी रहा।
  • जैतसिंह महल, माध्वसिंह महल, बड़ामहल, कंवरपदा महल, केसर महल, अर्जुन महल, चन्द्रमहल, बादलमहल, जनाना महल, छतरमहल, भीम महल, दीवाने आम, जालिमसिंह की हवेली आदि महल है।
  • कोट दुर्ग में रियासतकालीन माधवसिंह म्यूजियम स्थित है।

नाहरगढ़ (बाराँ)
  • इसका निर्माण 1712 ई. में कुतुबुद्दीन ने करवाया था।
  • बाजीराव पेशवा ने नवाब से छीनकर यह दुर्ग कोटा शासक दुर्जनशाल (1723-56 ई.) को दे दिया।
  • यह स्थल दुर्ग है।
  • इसकी आकृति लाल किले जैसी है।

बड़ी सादड़ी (चित्तौड़गढ़)
  • जहाँगीर के पुत्र खुर्रम ने विद्रोह के समय इस दुर्ग में शरण ली जिसकी याद में एक दरवाजा बनाया गया।

झालावाड़ गढ़ (झालावाड़)
  • झाला जालिमसिंह के वंशज मदनसिंह 1791 ई. में झालावाड़ नगर व गढ़ की स्थापना की।
  • इस दुर्ग में शीश महल, रंगशाला, जनानी ड्योढ़ी, दरीखाना, सभागार रंगशालाएँ, सुरंगमार्ग स्थित है। इन महलों में फतेहपुर-सीकरी (उत्तर प्रदेश) के महलों की झलक दिखती है।
  • इन महलों में मदनसिंह की शाही सवारी, नृत्य-नाटिका, टोंक नवाब, रास-रंग, चौबीस-अवतार, शाही इन्द्र विमान की सवारी, छत्तीस भोग, हवेलियों के चित्र हैं।

नवलखा दुर्ग (झालावाड़)
  • इसका निर्माण 1860 ई. में पृथ्वीसिंह ने करवाया।
  • इसमें हनुमानजी का मन्दिर बाग स्थित है।
  • इसका निर्माण बहुत महंगा था जिस कारण इसे नवलखा दुर्ग कहते हैं। यह अभी तक पूर्ण नहीं हुआ है।

माण्डलगढ़ दुर्ग (भीलवाड़ा)
  • यह दुर्ग बनास, बेड़च, मेनाल के संगम पर है।
  • यह गिरी-दुर्ग की श्रेणी में है।
  • इसका निर्माण माण्डिया भील ने करवाया जबकि हीरानंद ओझा के अनुसार इसका निर्माण चौहानों ने करवाया था।
  • वर्तमान दुर्ग का निर्माण 12वीं सदी में चौहानों ने करवाया।
  • इस दुर्ग में सागर, सागरी, जलेश्वर, देवसागर, नामक जल कुण्ड हैं।
  • इस दुर्ग में सात प्रवेश द्वार हैं।
  • इस दुर्ग में चारभुजा मन्दिर, उण्डेश्वर मन्दिर, चामुण्डा माता मन्दिर, रघुनाथ मन्दिर, ऋषभदेव मन्दिर, रामसिंह राठौड़ के महल, रुपसिंह के महल, मोरध्वज के महल, नेताजी का महल, कचहरी भवन, तोपखाना, गुरुजी का बाड़ा स्थित है।
  • यह दुर्ग सिद्ध योगियों का केन्द्र है।
  • 12वीं सदी में जब मोहम्मद गोरी ने पृथ्वी राज को हराया तब चौहानों से यह दुर्ग मुस्लिमों के अधिकार में आ गया।
  • मुसलमानों से यह दुर्ग देवीसिंह हाड़ा ने छीन लिया।
  • एकलिंग शिलालेख (1488 ई.) व श्रृंगी ऋषि शिलालेख (1482 ई.) के अनुसार हाड़ाओं से यह दुर्ग मेवाड़ के क्षेत्रसिंह (1364-82 ई.) ने छीन लिया।
  • 1396 ई. में मुजफ्फरशाह (गुजरात) ने इस पर अधिकार कर लिया।
  • एकलिंग महात्म्य (कान्हड़व्यास) के अनुसार इस दुर्ग को राणा कुम्भा (1433-68 ई.) ने लीला से जीता था। कुम्भा के समय इस दुर्ग पर सुल्तान कुतुबुद्दीन (गुजरात), सुल्तान महमूद (मालवा) ने 1446 ई. में इस पर आक्रमण किया लेकिन असफल रहे।
  • राणा रायमल के समय (1473-1509 ई.) गयासुद्दीन ने इस दुर्ग पर आक्रमण किया लेकिन सफलता नहीं मिली।
  • अकबर के समय (1556-1605 ई.) यह दुर्ग कुछ समय मुगलों के अधिकार में रहा। 1567 ई. में अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण करने से पहले इस दुर्ग पर अधिकार किया।
  • 1576 ई. हल्दी घाटी युद्ध की योजना मानसिंह प्रथम (आमेर) ने यहीं से बनाई थी।
  • जगन्नाथ कछवाह व राव खंगार राणा प्रताप से लड़ते हुए दुर्ग के पास पुरामण्डल में मारे गये। जिनके यहाँ स्मारक बने हुए हैं।
  • 1654 ई. में शाहजहाँ ने यह दुर्ग किशनगढ़ के महाराजा रुपसिंह को जागीर में दिया।
  • 1658 ई. में मेवाड़ राणा राजसिंह ने रुपसिंह के सेनापति राघवसिंह को हराकर माण्डलगढ़ पर अधिकार किया।
  • 1679 ई. में औरंगजेब ने माण्डलगढ़ पर अधिकार कर लिया।
  • 1681 ई. में औरंगजेब के पुत्र अकबर के साथ मिलकर मेवाड़ राणाओं ने माण्डलगढ़ पर अधिकार कर लिया।
  • 1700 ई. में औरंगजेब ने यह दुर्ग जुझारसिंह राठौड़ (पीसांगन का जागीरदार) को दिया।
  • 1706 ई. में राणा अमरसिंह ने पुनः माण्डलगढ़ पर अधिकार कर लिया।
  • राणा जगतसिंह द्वितीय ने यह दुर्ग शाहपुरा के उम्मेदसिंह को जागीर में दिया।

अकेलगढ़ (कोटा)
  • यह दुर्ग चम्बल नदी के किनारे स्थित है।

मनोहरथाना दुर्ग (झालावाड़)
  • यह दुर्ग परवन व कालीखोह नदी के संगम पर बना है।
  • इसका प्राचीन नाम खाताखेड़ी था जिसका निर्माण भीलों द्वारा करवाया गया। दुर्ग में विश्वंती माता का मंदिर है।
  • इस दुर्ग का निर्माण चूड़ामन जाट ने करवाया।
  • 1716 ई. में फर्रुखसियर (दिल्ली) जयपुर शासक के सवाई जयसिंह को चूड़ामन के विरुद्ध भेजा। चूड़ामन व सवाई जयसिंह में समझौता हुआ।

तारागढ़ (बूंदी)
  • इसका निर्माण 1354 ई. में बरसिंह हाड़ा ने करवाया। इसकी आकृति तारे जैसी होने के कारण इसे तारागढ़ कहते हैं। रुडयार्ड ने इसका निर्माण भूत व प्रेतों द्वारा करवाया बताया है।
  • गुप्त सुरंगों के कारण इसे राजस्थान का तिलस्मी किला कहते हैं।
  • इस दुर्ग के तिहरा परकोटा है।
  • मेवाड़ के राणा लाखा ने इसे जीतने की कोशिश की लेकिन जब सफलता नहीं मिली तो मिट्टी का नकली दुर्ग बनाकर उसे जीता। नकली दुर्ग को बचाते हुए कुम्भकरण हाड़ा शहीद हो गए।
  • दुर्ग में गर्भगुंजन व महाबला तोप स्थित है।
  • रतन दौलत दरी खाना में बूंदी शासकों का राजतिलक होता था।
  • यहाँ उम्मेद महल, जैतसागर महल, नवलसागर महल, जीवखां महल, बादल महल, फूल महल, छत्र महल, अनिरुद्ध महल, दूधा महल (सबसे प्राचीन), रंगविलास चित्र शाला, 84 खम्भों की छतरी स्थित है।
  • कर्नल जेम्स टॉड का कथन- ‘‘रजवाड़ों के राजप्रासादों में बूंदी के महलों का सौन्दर्य सर्वश्रेष्ठ है।’’
  • तारागढ़ में स्थित महलों की सर्वप्रमुख विशेषता सजीव व सुन्दर चित्रकारी है।
  • वीर विनोद के रचनाकार श्यामलदास के अनुसार बूंदी विजय के प्रयास में राणा क्षेत्रसिंह (1364-82 ई.) को मारे गये थे।
  • वंशभास्कर में देवसिंह द्वारा जैता मीणा से बूंदी लेने का प्रसंग है।
  • बूंदी दुर्ग का स्थापत्य आमेर दुर्ग से मिलता जुलता है।
  • फूलसागर, जैतसागर, नवसागर सरोवर बूंदी दुर्ग में हैं।
  • महाराव बुद्धसिंह ने बूंदी नगर के चारो ओर प्राचीर का निर्माण करवाया।
  • प्रवेश द्वार- (1) हाथीपोल, (2) गणेशपोल, (3) हजारीपोल
  • बूंदी दुर्ग पर मालवा सुल्तान होशंगशाह का अधिकार हुआ।
  • राणा कुम्भा ने अधिकार।
  • सवाई जयसिंह ने अपने बहनोई बुद्धिसिंह हाड़ा को हराकर दलेलसिंह को शासक बनाया।
  • 1458 ई. में मालवा सुर्जन महमूद खिलजी ने बूंदी पर आक्रमण किया जिसमें बूंदी शासक राव बैरीसाल शहीद हो गये।
  • 1569 ई. सुरलन हाड़ा ने अकबर की अधीनता मान ली जिससे बूंदी दुर्ग मुगलों के अधीन हो गया।
  • दुर्ग में रानी जी की बावड़ी है जिसका निर्माण 1699 ई. अनिरुद्धसिंह की रानी ने करवाया।

शेरगढ़/कोषवर्धन दुर्ग - (बारां)
  • यह दुर्ग परवन नदी के किनारे स्थित है।
  • यह दुर्ग जल व वन दुर्ग में आता है।
  • इसका निर्माण मालदेव राठौड़ ने करवाया।
  • पहाड़ी- कोषवृद्धन
  • पर्यटन स्थल- सोमनाथ महादेव मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर, चारभुजा मंदिर, दुर्गामाता मंदिर, सैनिकों के आवास गृह।
  • कोषवर्धन चोटी पर स्थित होने के कारण शेरगढ़ को कोषवर्धन दुर्ग भी कहते हैं।
  • 1542 ई. मालवा विजय के समय शेरशाह सूरी ने इस दुर्ग पर अधिकार किया तथा जीर्णोद्धार कर शेरगढ़ नाम दिया।
  • माना जाता है कि इस दुर्ग का निर्माण नागवंशी शासकों ने करवाया था।
  • दिल्ली शासक फर्रुखशियर (1712-20 ई.) ने यह दुर्ग कोटा शासक भीमसिंह को दिया।
  • उम्मेदसिंह के समय कोटा दीवान जालिमसिंह ने इस दुर्ग पर अधिकार रखा तथा अमीर खां पिण्डारी को अंग्रेजों के विरुद्ध जालिमसिंह ने इस दुर्ग में शरण दी। जालिमसिंह ने दुर्ग में 'झालाओं की हवेली' का निर्माण करवाया।

गागरोन दुर्ग (झालावाड़)
  • क्षेत्रफल- 23 हैक्टेयर
  • यह कालीसिंध व आहू नदी के संगम पर स्थित जल दुर्ग है इसका प्राचीन नाम गर्गराटपुर था। डोडगढ़, धुलारगढ़ इसके अन्य नाम हैं। इसका निर्माण 12वीं सदी (1195 ई.) में डोड राजा बिजलदेव परमार ने करवाया। यह दुर्ग मुकन्दरा पहाड़ी पर सामेल नामक स्थान पर स्थित है।
  • यह दुर्ग बिना नींव के है जिसके तिहरा परकोटा है। यहाँ सन्त पीपा की जन्मस्थली व छतरी है।
  • यहाँ मीठेशाह की दरगाह (औरंगजेब ने निर्माण), सूफी संत हम्मीदुद्दीन की दरगाह, दीवानेआम, दीवानेखास, जनाना महल, शीतला माता मंदिर, अचलदास का महल, रंग महल व औरंगजेब द्वारा निर्मित बुलन्द दरवाजा स्थित है।
नोट : तारकीन/संत हम्मीदुद्दीन नागौरी की दरगाह नागौर में है।
  • 1195 ई. में देवनसिंह चौहान ने डोड शासक बीसलदेव परमार से दुर्ग छीनकर इसका नाम गागरोन कर दिया।
  • प्रवेश द्वार- सूरजपोल, भैरवपोल, गणेशपोल।
  • इसका नाम गागरोन देवनसिंह खींची ने रखा।
  • यहाँ की टकसाल में सालिमशाही रुपया बनता था।
  • शासक दुर्जनशाह ने दुर्ग में मधुसूदन मंदिर का निर्माण करवाया।
  • इस दुर्ग में गीधकराई पहाड़ी है जिससे गिराकर कैदियों को मृत्यु दण्ड दिया जाता था।
  • 1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने जैतसिंह को हराकर इस पर अधिकार किया।
  • 1532 ई. में गुजरात के शासक बहादुर शाह ने इस पर अधिकार किया।
  • 1542 ई. में शेरशाह सूरी ने इस पर अधिकार किया।
  • 1562 ई. में अकबर ने अधिकार किया।
  • शाहजहाँ ने यह दुर्ग कोटा के मुकुन्द सिंह को दिया।
  • अकबर ने यह दुर्ग बीकानेर के पृथ्वीराज राठौड़ को जागीर में दिया।

शिवदास गाडण की अचलदास खिंची री वचनिका के अनुसार इस दुर्ग में दो साके हुए -
1. 1423 ई. - यह साका अचलदास खिंची के समय हुआ जिसमें माण्डु के सुलतान होसंगशाह ( अल्प खाँ ) ने आक्रमण किया। इस साके में अचलदास के नेतृत्व में केसरिया तथा रानी लीला, उम्मादे के नेतृत्व में जौहर हुआ। होसंगशाह ने यह दुर्ग अपने शहजादे गजनी खाँ का सौंपा।
  • मांडू के सुलतान महमूद खिलजी का दुर्ग का अधिकार हो गया। महमूद खिलजी प्रथम ने बदरखाँ को किलेदार बनाया बदरखाँ की मृत्यु के बाद दिलशाद को किलेदार बनाया गया।
  • दिलशाद को परास्त कर पालहणसी का दुर्ग पर अधिकार हो गया।

2. 1444 ई. - यह साका अचलदास के पुत्र पालहणसी के समय हुआ जिसमें मालवा के शासक महमूद खिलजी ने आक्रमण किया। इस साके के बाद गागरोन का नाम मुस्तफाबाद कर दिया गया। इस साके में राणा कुम्भा ने पालहणसी की सहायता के लिये धीरा को भेजा जो वीरगति को प्राप्त हो गया। पालहणसी राणा कुम्भा का भांजा था क्योंकि राणा कुम्भा की बहन की शादी अचलदास खींची के साथ की गई थी।

शाहबाद दुर्ग (बाराँ)
  • यह दुर्ग मुकन्दरा की भामती पहाड़ी पर है।
  • मान्यता के अनुसार शाहबाद दुर्ग का निर्माण 9 वीं सदी में परमार शासकों ने करवाया। कुछ मान्यताओं के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण हम्मीर देव चौहान के वंशज मुकटमणिदेव चौहान ने करवाया था। (1521 ई.)
  • राणा कुम्भा ने मांडू सुलतान को पराजित कर शाहबाद दुर्ग पर अधिकार कर लिया।
  • शाहजहाँ ने दुर्ग विठलदास गौड को जागीर (इनायत) में दिया।
  • दक्षिण यात्रा के समय औरंगजेब इस दुर्ग को विश्राम स्थल के रूप में काम लेते थे।
  • औरंगजेब के फौजदार मकबूल ने दुर्ग में जामा मस्जिद का निर्माण करवाया।
  • मराठा सेनापति खाण्डेराव ने मुगलों से दुर्ग छीन लिया।
  • 1714 ई. में कोटा के महाराज भीमसिंह प्रथम ने खाण्डेराव से शाहबाद दुर्ग छीन लिया।
  • 1991 ई. बाराँ जिले के अंतर्गत आ गया।
  • 1542 ई. में शेरशाह सूरी ने पुनःनिर्माण करवाया तथा इसका नाम शाहबाद रखा। कुछ इतिहासकारों के अनुसार शाहबाद नाम औरंगजेब ने रखा था।
  • झाला जालिमसिंह ने शाहबाद पर अधिकार कर झालावाड़ में मिला लिया। दुर्ग के प्रवेशद्वार पर 'अललपंख' मूर्तियाँ (पंखयुक्त हाथी) दुर्ग में औरंगजेब द्वारा निर्मित जामा मस्जिद है।
  • कालींजर अभियान के समय शेरशाह सूरी ने इस दुर्ग का नाम अपने पुत्र सलीम के नाम पर सलीमाबाद कर दिया।
  • दुर्ग में 19 फीट लम्बी नवलबाण तोप स्थित है।
  • इन्द्रमन चौहान ने दुर्ग में बादल महल का निर्माण करवाया।
  • इस दुर्ग में कुंडाखोह नामक झरना है।

मारवाड़ के दुर्ग

सिवाणा दुर्ग (बालोतरा)
  • इसका निर्माण हल्देश्वर पहाड़ी पर किया गया।
  • इसे कूमट दुर्ग भी कहते हैं।
  • इसका प्राचीन नाम कुम्भाना था।
  • इसका निर्माण 954 ई. में भोज के पुत्र वीरनारायण पंवार ने करवाया।
  • जालौर दुर्ग को जीतने से पहले इस दुर्ग को जीतना अनिवार्य था जिस कारण इसे जालौर दुर्ग की कुंजी कहते हैं।
  • इसे मारवाड़ शासकों की संकटकालीन आश्रयस्थली कहते हैं।
  • शेर-ए-राजस्थान जयनारायण व्यास को इसी दुर्ग में बन्दी बनाया गया।
  • दुर्ग में भांडेलाव तालाब व कल्ला रायमलोत का थान है।
  • जैतारण युद्ध के बाद रावमालदेव ने इसी दुर्ग में शरण ली थी।
  • चन्द्रसेन जोधपुर छोड़कर यहाँ आया था।
  • 1576 ई. में शाहबाज खाँ ने यह दुर्ग चन्द्रसेन से छीना।
  • अकबर के सेनापति शाहबाज खाँ ने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया था।
  • यहाँ के शासक कल्ला रायमलोत ने बूंदी शासक सरजन हाड़ा की पुत्री से शादी की, जिसका विवाह अकबर सलीम (जहाँगीर) से करना चाहता था।
  • 1305 ई. में इस दुर्ग पर दिल्ली सुलतान अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति कमालुद्दीन कुर्ग ने आक्रमण किया। जिससे दुर्ग की रक्षा करते हुए शीतलदेव चौहान व सोमदेवा ने केसरिया तथा उसकी रानी मैणादे ने जौहर किया। इस प्रकार यहाँ साका हुआ। खिलजी ने सिवाणा का नाम खैराबाद कर दिया। भायला पंवार ने दुर्ग में स्थित पेयजल भांडेलाव तालाब में गाय का रक्त मिलाकर अपवित्र कर शीतलदेव चौहान के साथ विश्वासघात किया।
  • 1538 ई. राव मालदेव ने सिवाणा अधिपति डूंगरजी राठौड़ को पराजित कर अधिकार किया।
  • 1310 में अलाउद्दीन स्वयं सेना ले कर आया।
  • प्रथम साके के समय अमीर खुसरो का कथन- 'वे गजब के बहादुर और साहसी थे, उनके सिर के टुकड़े-टुकड़े हो गये फिर भी वे युद्धस्थल पर अड़े रहे।'
  • 1582 ई. में यहाँ का शासक कल्याणमल था, जिस पर जोधपुर के मोटाराजा उदयसिंह ने अकबर के कहने पर आक्रमण किया जिससे सिवाणा का दूसरा साका हुआ।
नोट:- यह राजस्थान का अन्तिम साका माना जाता है।

जांगल दुर्ग (बीकानेर)
  • इस दुर्ग का निर्माण सांखला परमारों ने करवाया।
  • किवदन्ती के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण पृथ्वीराज चौहान (अजमेर) की रानी अजयदेवी ने करवाया।

नाडोल दुर्ग (देसूरी, पाली)
  • महमूद गजनवी व कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस दुर्ग को नष्ट किया।

सांचौर का दुर्ग
  • जब मोहम्मद गजनवी सोमनाथ मन्दिर (गुजरात) को 1025 ई. में लूटने आया तब गुजरात के शासक भीमदेव प्रथम ने सांचौर से मोहम्मद गजनवी को रोकने की कोशिश लेकिन गजनवी ने भीमदेव को हरा दिया।

लोद्रवा दुर्ग (जैसलमेर)
  • इस दुर्ग का निर्माण प्रतिहार ने करवाया।
  • 9वीं सदी में इस पर भाटियों का अधिकार हो गया।
  • सोमनाथ आक्रमण के समय मोहम्मद गजनवी ने इस दुर्ग पर भी आक्रमण किया।
  • 1178 ई. में मोहम्मद गोरी ने इस दुर्ग पर आक्रमण किया।

लोहियाणा दुर्ग (जालौर)
  • कुछ समय के लिए यहाँ महाराणा प्रताप ने निवास किया था।
  • 1883 ई. में जसवंत सिंह द्वितीय ने इस दुर्ग को नष्ट कर दिया।

कोटकास्तां दुर्ग (भीनमाल जालौर)
  • इस दुर्ग का निर्माण भीमनाथ योगी ने करवाया।
  • जोधपुर के मानसिंह ने नाथों को यह क्षेत्र जागीर में दिया।
  • इस दुर्ग में जलन्दर नाथ की समाधि व नर्मदेश्वर महादेव का मन्दिर स्थित हैं।

सेवाड़ी दुर्ग (पाली)

देसूरी दुर्ग (सादड़ी, पाली)
  • इस दुर्ग का निर्माण मांगलिया राजपूत ने करवाया।

कुचामन दुर्ग (डीडवाना)
  • इसका निर्माण 17वीं शताब्दी में गौड़ राजपुतों ने करवाया।
  • 18वीं सदी में जालिमसिंह राठौड़ ने इस दुर्ग का आधुनिकीकरण करवाया। (1727 ई. में) मेड़तिया जालिम सिंह ने बनखण्डी नाम के महात्मा के आशीर्वाद से किलें की नींव रखी।
  • प्रवेशद्वार- (1) चाँदपोल (आथूणा दरवाजा) (2) सूरजपोल (3) कश्मीरीपोल (4) पलटन दरवाजा (5) हौद दरवाजा (6) बारी दरवाजा।
  • यह दुर्ग गिरी, पारिध, एरण दुर्ग की श्रेणी में आता है।
  • यहाँ स्थित सुनहरी बुर्ज में सोने का काम किया गया है।
  • यह दुर्ग अणखला किला व जागीरी किलों का सिरमौर कहलाता है। (दुश्मन जीत नहीं पाए)
  • इस दुर्ग में रनिवास, शीशमहल, हवामहल, शस्त्रागार, देवमन्दिर, अन्नभण्डार, 18 बुर्ज, पातालया हौज, अंधेरिया हौज, ऊँटशाला, हस्तिशाला आदि स्थित हैं।
  • औरंगजेब के समय यह दुर्ग मेड़ता के राठौड़ों के पास चला गया। मेड़ता के राठौड़ों से यह जोधपुर के राठौड़ों के पास आ गया।
  • 1727 ई. में अभयसिंह ने जालिमसिंह को कुचामन की जागीर दी।
  • जोधपुर राज्य में केवल कुचामन के जागीरदार ही अपनी स्वयं की मुद्रा छाप सकते थे।
  • कहावत- "ऐसा किला रानी जाये के पास भले ही हो, ठकुरानी जाये के पास नहीं।"

नागौर दुर्ग
  • नागौर दुर्ग को नागदुर्ग, नागाणा, अहिच्छत्रपुर भी कहते हैं।
  • यह दुर्ग धान्वन श्रेणी में आता है जिसके दोहरा परकोटा है। इस दुर्ग का निर्माण सोमेश्वर चौहान के सामन्त कदम्बवास/कैमास ने 1154 ई. में करवाया।
  • सिराई पोल, बिचली पोल, कचहरी पोल, सूरज पोल, धूपी पोल, राज पोल दुर्ग के प्रवेश द्वार है।
  • यह दुर्ग भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध है।
  • बख्त सिंह ने इस दुर्ग में सर्वाधिक निर्माण करवाया तथा अपने पिता की हत्या कर यहीं पर शरण ली थी।
  • इस दुर्ग पर बाहर से चलाए गए गोले दुर्ग के ऊपर से सीधे निकल जाते हैं।
  • शीश महल, बादलमहल, शुक्रतालाब (अकबर ने बनवाया), अभयसिंह के महल, बख्तसिंह के महल, अमरसिंह की छतरी (16 खम्भे) आदि दर्शनीय स्थल हैं।

दुर्ग पर अधिकार
तराईन द्वितीय (1192 ई.) के बाद मोहम्मद गोरी का दुर्ग पर अधिकार हुआ।
अकबर ने अधिकार किया। 1570 ई. में अकबर ने दुर्ग में 'नागौर दरबार' लगवाया तथा यहाँ शुक्र तालाब व एक फव्वारा लगवाया।
शाहजहाँ ने गजसिंह के पुत्र अमरसिंह राठौड़ को नागौर दुर्ग जागीर में दिया। बंशीवाला का मन्दिर, अतारकीन का दरवाजा (निर्माण- इल्तुतमिश) हमीमुद्दीन नागौरी की दरगाह, अकबरी मस्जिद।
2007 में साफसफाई के कारण यूनेस्को ने इस दुर्ग को अवार्ड ऑफ एक्सीलेंस दिया।

दुर्ग पर अधिकार
1192 ई. मोहम्मद गोरी का अधिकार
ऐबक, इल्तुतमिश, बलबन का अधिकार
1400 ई. फिरोज तुगलक का अधिकार।
1423 ई. मण्डोर के रावचूड़ा का अधिकार।
महाराणा मोकल, महाराणा कुम्भा, शेरशाह सूरी, मालदेव का अधिकार।
1570 ई. अकबर का नागौर दरबार।
शाहजहाँ ने मारवाड़ के गजसिंह के पुत्र अमरसिंह राठौड़ को दिया।
मारवाड़ के अभयसिंह ने अपने भाई बख्त सिंह को जागीर के रूप में दिया।

मालकोट/मेड़ता दुर्ग (नागौर)
  • 8वीं सदी में प्रतिहार शासक बाउक ने इसे अपनी राजधानी बनाया।
  • 1301 ई. में अलाउद्दीन के सेनापति का इस पर अधिकार हुआ।
  • 1556 ई. में जोधपुर के मालदेव ने जयमल को हराकर इस पर अधिकार किया।
  • 1558 ई. में मालदेव ने मेड़ता की जगह मालकोट का निर्माण कराया। मेड़ता दुर्ग को 'मेड़न्तकपुर दुर्ग' भी कहते हैं।

फलौदी दुर्ग (फलौदी)
  • यह नगर राव सूजा के पुत्र राव उदा ने बसाया।
  • 1547 ई. में राव मालदेव ने डूंगरसी से फलौदी छीन लिया।
  • कुछ समय भाखरसी भाटी ने इस पर अधिकार रखा।
  • 1578 ई. में अकबर ने रायसिंह (बीकानेर) को सौंपा।
  • 1615 ई. में जहाँगीर ने सूरसिंह (जोधपुर) को सौंपा।

यहाँ से पांच शिलालेख मिले हैं-
  • प्रथम शिलालेख - इस शिलालेख में जोधपुर के राव सूजा के पुत्र नरा के समय (1475 ई.) पोल निर्माण का उल्लेख है।
  • द्वितीय शिलालेख- यह 1516 ई. का है। इसमें बीकानेर के शासक हम्मीर द्वारा स्तम्भों का पुनः निर्माण का उल्लेख है।
  • तृतीय शिलालेख- यह रायसिंह के समय (1594 ई.) का है।
  • चतुर्थ शिलालेख- यह जोधपुर शासक जसवंतसिंह (1658 ई.) का है।
  • पंचम शिलालेख- यह जोधपुर शासक विजयसिंह ( 1753 ई. ) के समय का है।

खींवसर का किला (नागौर)

बीनादेसर का किला (चूरू)
  • इस दुर्ग का निर्माण 1757 ई. में ठाकुर दल्लेसिंह ने करवाया जो गंगासिंह का दिवान था।

बीकमपुरगढ़ (कोलायत, बीकानेर )
  • बीकमपुरगढ़ दुर्ग का निर्माण 55 ई. पू में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य पंवार ने करवाया।

भूकरका (हनुमानगढ़)
  • इसका निर्माण 1608 ई. में खड्गसिंह ने करवाया।

सुजानगढ़ दुर्ग (चूरू)
  • इस दुर्ग का निर्माण सूरतसिंह (बीका) ने करवाया।
  • इसका प्राचीन नाम हड़बूजी का कोट था।
  • इसके चारों ओर मिट्टी का परकोटा है।

राजगढ़ दुर्ग (चूरू)
  • इसका निर्माण 1766 ई. में बीकानेर शासक गजसिंह ने अपने पुत्र राजसिंह के नाम से करवाया।
  • इसका निर्माण गजसिंह के मंत्री बख्तावरसिंह की देखरेख में हुआ।

रतनगढ़ दुर्ग (चूरू)
  • इस दुर्ग की स्थापना बीकानेर शासक सूरतसिंह ने 1798 ई. में अपने पुत्र रतनसिंह के नाम पर की।
  • इसका प्राचीन नाम कोलासर था।

तारानगर दुर्ग (चूरू)
  • इस दुर्ग का निर्माण बीकानेर शासक सूरतसिंह ने (1787-1828 ई. ) करवाया।
  • इसका प्राचीन नाम रिणी था।
  • सरदारशहर दुर्ग (चूरू)
  • नौहरगढ़ दुर्ग (चूरू)
  • भोपालगढ़ दुर्ग

भाद्राजून दुर्ग - (जालौर)
  • जोधपुर शासक सूरसिंह ने 1596 ई. में यह दुर्ग मुकुन्ददास राठौड़ को जागीर में दिया।

रोहतास दुर्ग/रोहट दुर्ग (पाली)
  • यह दुर्ग लूनी नदी किनारे स्थित है।
  • इस दुर्ग में दुर्गादास राठौड़ ने औरंगजेब के पुत्र अकबर द्वितीय की पुत्री शहजादी सफियत उन्निसा को शरण दी, जिसके साथ जोधपुर शासक अजीतसिंह शादी करना चाहता था लेकिन दुर्गादास ने शादी नहीं करने दी जिसके कारण अजीतसिंह ने दुर्गादास को अपने राज्य से निकाल दिया।

सोजत दुर्ग (पाली)
  • यह दुर्ग सूकड़ी नदी के किनारे स्थित है।
  • इस दुर्ग की स्थापना 1460 ई. में राव जोधा के पुत्र निम्बा ने नानी सीरड़ी पहाड़ी पर की।
  • 1515 ई. में जोधपुर शासक रावगंगा ने यह दुर्ग अपने भाई वीरमदेव को दे दिया। कुछ समय बाद गंगा ने वीरमदेव के मंत्री मुहता रायमल को मारकर सोजत पर अधिकार कर लिया।
  • सोजत का प्राचीन नाम 'शुधादंती' था जो तांबावती/त्रंबावती नाम से प्रसिद्ध था।
  • प्रारंभ में सोजत पर परमारों का अधिकार था।
  • वि.स. 1111 हूल क्षत्रियों ने सोजत बसाया।
  • सोजत दुर्ग को लघुगिरि दुर्ग कहा जाता है।
  • राव मालदेव ने दुर्ग के चारों ओर परकोटे का निर्माण करवाया। जिससे कुछ इतिहासकार इसका निर्माता राव मालदेव को मानते हैं।
  • अकबर ने राव चन्द्रसेन से दुर्ग छीनकर उसके भाई राम को दे दिया।
  • 1607 ई. में जहाँगीर ने यह दुर्ग करमसेन को दे दिया।
  • दुर्ग में सूरजपोल, चन्द्रपोल नामक सात दरवाजे हैं।

सात अन्य दरवाजे है-
  • जोधपुरी दरवाजा, राज दरवाजा, जैतारण दरवाजा, नागौरी दरवाजा, चावंड दरवाजा, रामपोल, जालौरी दरवाजा।
  • तबेला, दरीखाना, जनानी ड्योढ़ी आदि भवन हैं।

बाली दुर्ग (पाली)
  • इस दुर्ग का निर्माण 1240 ई. में बलदेव चौहान ने करवाया।
  • कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण जालौर के वीरमदेव चौहान ने अपनी बहन बालादे व अपने जीजा राणा हम्मीरसिंह (मेवाड़) के लिए करवाया।
  • कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण चैनसिंह ने अपनी प्रेयसी बाली के नाम पर इस दुर्ग का निर्माण करवाया।
  • यह दुर्ग तीन परकोटों से घिरा हुआ है। प्रथम परकोटे का निर्माण वीरमदेव ने, दूसरे का राणा उदयसिंह ने करवाया।
  • यहाँ मनमोहन पार्श्वनाथ मंदिर, चन्द्रभुजा नाथ मन्दिर, विमलनाथ मंदिर, धर्मनाथ मंदिर, वैष्णव मंदिर स्थित हैं।
  • यहाँ गिल्ली डण्डा रखे हुए है जो पाण्डवों के माने जाते हैं।

जैतारण दुर्ग (ब्यावर)
  • 1556 ई. में अकबर ने इसे जीतकर जोधपुर के मोटा राजा उदयसिंह को दे दिया। जिसने इस दुर्ग का निर्माण करवाया।
  • इस दुर्ग में झण्डा पोल नामक इमारत है।

आगेवा दुर्ग (जैतारण, ब्यावर)
  • इसका निर्माण राठौड़ों ने करवाया।

किलोण दुर्ग (बाड़मेर)
  • इसका निर्माण लोकदेवता मल्लीनाथ राठौड़ के वंशज भीमोजी राठौड़ ने 1552 ई. में करवाया तथा बाड़मेर नगर बसाया।
  • यहाँ जोगमाया, जगदम्बा, नागणेची माता का मन्दिर है।
  • भीमोजी के वंशज भारोजी ने अपने पाँच पुत्रों के लिए इस दुर्ग में पाँच कोटड़ियाँ (मकान) बनवायी।
  • किलोण दुर्ग का निर्माण सुजेर भाखरी नामक पहाड़ी पर करवाया।

आऊवा दुर्ग (पाली)
  • यह दुर्ग चम्पावतों के अधिकार में था।
  • 1857 ई. की क्रांति के समय एरिनपुरा छावनी के सैनिकों को आऊवा के सामन्त कुशालसिंह चम्पावत ने शरण दी जिस कारण यह दुर्ग प्रसिद्ध हुआ।
  • 20 फरवरी, 1858 ई. को कर्नल होम्स ने आऊवा पर आक्रमण कर दिया जिससे कुशालसिंह आऊवा छोड़कर मेवाड़ चले गये तथा आऊवा पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया।
  • 1868 ई. में कुशालसिंह के पुत्र देवीसिंह ने खेजड़ला, रास, रायपुर, नीमच, कुचामण, पोकरण के सामन्तों के सहयोग से आऊवा पर अधिकार कर लिया।
  • 1857 ई. की क्रांति के समय पॉलिटिकल एजेंट मॉकमैसन का सिर काट कर इस किले के आगे लटकाया गया।
  • इस दुर्ग में सुगाली माता की मूर्ति है।

पोकरण दुर्ग (जैसलमेर)
  • इसका निर्माण 14वीं सदी में मारवाड़ के सामन्त मालदेव चम्पावत ने करवाया। कुछ मान्यताओं के अनुसार इसका निर्माण 1550 ई. में राव मालदेव ने करवाया।
  • इस दुर्ग में हवा महल, रानी महल, फूल महल, मंगल महल स्थित हैं।
  • वर्तमान में इस दुर्ग में होटल संचालित है।

पीपलूद दुर्ग (बालोतरा)
  • इसका निर्माण दुर्गादास राठौड़ ने करवाया।
  • इस दुर्ग में दुर्गादास ने जोधपुर शासक अजीतसिंह को औरंगजेब से बचाकर रखा था।
  • औरंगजेब के पुत्र अकबर द्वितीय के पुत्र बुलन्द अख्तर व पुत्री सफी यूनिसा को दुर्गादास ने यहाँ रखा तथा उनके लिए पुगले-पुगली के नाम से महल बनवाया।
नोट- पीपलूद को राजस्थान का लघु माउण्ट आबू कहते हैं।

बीकानेर दुर्ग
  • यह धान्वन दुर्ग की श्रेणी में है।
  • इस दुर्ग का निर्माण राती-घाटी क्षेत्र में 1485 ई. में राव बीका ने बीकाजी की टेकड़ी के नाम से करवाया।
  • इस दुर्ग का निर्माण कार्य नापोजी की देख-रेख में हुआ।
  • रायसिंह ने 30 जनवरी, 1589 ई. को इस दुर्ग का निर्माण कार्य पुनः प्रारम्भ किया जो 17 जनवरी, 1594 ई. को पूर्ण हुआ। इसके बाद इस दुर्ग को जूनागढ़ के नाम से जाने जाना लगा। रायसिंह का शिल्पी कर्मचन्द था। रायसिंह प्रशस्ति के अनुसार किले की नींव विक्रम संवत 1645 फाल्गुन सुदी द्वादशी को रखी गई।
  • इस दुर्ग की आकृति चतुर्भुज प्रकार की है। जिसमें 37 बुर्ज हैं।
  • दुर्ग में प्रवेश के दो दरवाजे हैं - 1 करणपोल (पूर्वी) 2 चांदपोल (पश्चिमी)

इस दुर्ग में पाँच आन्तरिक दरवाजे हैं -
  • दौलतपोल
  • फतेहपोल
  • रत्नपोल
  • सूरजपोल
  • ध्रुव पोल

सूरजपोल- सूरजपोल के आगे 1590 ई. में रायसिंह ने जयमल व फत्ता की गजारूढ़ मूर्तियाँ लगवाई। सूरजपोल पर रायसिंह प्रशस्ति उत्कीर्ण है। गणेश मंदिर है।

नोट- इन दोनों की मृत्यु चित्तौड़ के तीसरे साके (1567-68 ई.) में हुई थी जिस कारण अकबर ने आगरा दुर्ग के आगे इन दोनों की हाथियों पर बैठे मूर्तियाँ बनवायी। औरंगजेब के समय जब इन मूर्तियों को तोड़ा गया तब इन्हें जूनागढ़ के आगे बनाया गया।
  • सिलहखाना (शस्त्रागार), भोजनशाला, घुड़शाला, बारादरियां, हुजूरपोड़ी, गुलाब निवास, शिव निवास, फीलखाना, भैरव चौक, कर्ण महल, घण्टाघर, जनानी ड्योढ़ी, चन्द्रमहल, फूलमहल, रायसिंह का चौबारा, अनूप महल, सरदार निवास, गंगा निवास, सूरत निवास, प्रताप निवास, लाल निवास, रतन निवास, मोती महल, रंग महल, सुजान महल, गणपत विलास, शूतरशाला, संगमरमर का तालाब, अतिश (अश्वशाला) गुलाब मन्दिर, सूर मंदिर आदि प्रमुख स्थल हैं।
  • जूनागढ़ दुर्ग के बारे में कहा जाता है कि:- इस दुर्ग की दीवारें बोलती है।
  • यहाँ राव बीका के चाँदी के पलंग व सिंहासन हैं।
  • यहाँ स्थित महलों में मुगल शैली का प्रभाव दिखाई देता है।
  • यहाँ स्थित महलों में सोने की चित्रकारी की गई है।
  • बादल महल में बादलों का सा आभास होता है।
  • फूल महल में काँच का सुनहरा काम किया गया है।
  • छतर महल में रासलीला के दृश्य अंकित हैं।
  • गजमंदिर में रतनसिंह के समय का झूला लगा हुआ है।
  • इस दुर्ग में 33 करोड़ देवी-देवताओं की मूर्तियों का मन्दिर बना है।
नोट - 33 करोड़ देवी-देवताओं की साल जोधपुर में है।
  • अनूपमहल में सोने का काम किया गया है। इस महल में बीकानेर शासक का राजतिलक होता था।
  • कर्ण महल का निर्माण अनूपसिंह ने अपने पिता कर्णसिंह की याद में करवाया।
  • घंटाघर का निर्माण महाराजा डूँगरसिंह ने करवाया।
  • रानीसर व रामसर बीकानेर दुर्ग मे दो कुएँ हैं।
  • जूनागढ़ के आगे सूरसागर झील है जिसकी वसुन्धरा राजे ने मरम्मत करवाकर 15 अगस्त 2018 को नौकायन प्रारम्भ की।
  • यह राजस्थान का प्रथम दुर्ग है जिसमें लिफ्ट लगी हुई है।
  • सुन्दरता के कारण जूनागढ़ को जमीन का जेवर कहते हैं।
  • इस दुर्ग में हेरम्भ गणपति मन्दिर है जिसमें गणेश जी सिंह पर सवार हैं।
नोट- बाजणा गणेश सिरोही व त्रिनेत्र गणेश मन्दिर रणथम्भौर दुर्ग में स्थित है।
  • इस दुर्ग में 1594 ई. का संस्कृत भाषा में एक शिलालेख लिखा गया जिसे रायसिंह प्रशस्ति कहते हैं । इस प्रशस्ति में राव बीका से लेकर रायसिंह तक का इतिहास है।
  • 1937 तक इस दुर्ग में बीकानेर के शासक रहते थे। इसके बाद गंगासिंह ने लाल गढ़ पैलेस का निर्माण करवाया जिससे राजपरिवार वहाँ रहने लगा।
  • इस दुर्ग में गंगासिंह का लड़ाकू विमान, 100 किलो की पोशाक, मेज, कुर्सी, मुहर, तस्वीर, घड़ियाँ, टेलिफोन, बर्तन रखे हुए हैं।
  • 1808 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधिकारी एल्फिस्टन काबुल जा रहे थे जिन्हें बीकानेर के शासक सूरतसिंह ने दुर्ग में ठहराया तथा दुर्ग की चाबियाँ भेंट कीं लेकिन एल्फिस्टन ने चाबियाँ लेने से मना कर दिया।
  • प्रथम दुर्ग जिसमें लिफ्ट लगी है।
  • इस दुर्ग में एक संग्रहालय स्थित है जिसमें टैस्सीटोरी (इटली) ने अनेक पुरातात्विक सामग्री इकट्ठी की।

अधिकार
  • 1733 - नागौर शासक बखतसिंह ने अपने भाई जोधपुर शासक अभयसिंह के साथ विशाल सेना लेकर बीकानेर पर आक्रमण किया पर विफल रहा।
  • 1743 - नागौर शासक बखतसिंह ने पुनः आक्रमण किया तथा जूनागढ़ के किलेदार दौलतसिंह सांखला को अपनी तरफ मिलाया लेकिन दुर्ग पर अधिकार नहीं कर पाया।
  • 1740- जोधपुर शासक अभयसिंह ने बीकानेर पर आक्रमण किया। बीकानेर के विद्रोही सरदार भादरा के ठाकुर लालसिंह, चूरू के संग्रामसिंह ने जोधपुर का साथ दिया। बीकानेर शासक जोरावरसिंह ने सहायता हेतु दूत आनन्द रूप को सवाई जयसिंह के पास भेजा। जयसिंह ने तीन लाख सेना के साथ सहयोग किया।

लालगढ़ पैलेस (बीकानेर)
  • इस दुर्ग का निर्माण महाराजा गंगासिंह ने अपने पिता की याद में लाल पत्थर से 20वीं सदी में करवाया।
  • इस दुर्ग के चारों ओर बाग लगे हैं जिसके एक कोने में तरणताल बना हुआ है।
  • इस पैलेस में दुर्लभ ग्रंथ व दस्तावेजों का एक विशाल पुस्तकालय है।

चूरू दुर्ग (चूरू)
  • इसका निर्माण बीकानेर के सामन्त कुशलसिंह राठौड़ ने करवाया। (1694-1739 ई.)
  • यहाँ जाटों ने मिट्टी से एक दुर्ग बनवाया जिसे धूलकोट कहते हैं।
  • दुर्ग में प्रवेश सिंह द्वार से होता है।
  • इस दुर्ग में गोपीनाथ मन्दिर है।
  • चूरू शासक शिवसिंह के समय बीकानेर के शासक सूरतसिंह ने 1790 ई. में इस दुर्ग पर आक्रमण किया जिसमें शिवसिंह की हार हो गयी।
  • 1814 ई. में सूरतसिंह ने अमरचंद सुराना के नेतृत्व में पुनः चूरू पर आक्रमण किया जिसमें शिवसिंह के पास गोला बारूद समाप्त होने पर शिवसिंह ने दुश्मन की सेना पर चाँदी के गोले दागे।
  • शिवसिंह के बाद इसका पुत्र पृथ्वीसिंह शासक बना जिसने दुर्ग अमरचंद सुराना को सौंप दिया।

जालोर दुर्ग
  • यह दुर्ग धान्वन, गिरि, एरण, पारिध दुर्ग की श्रेणी में आता है।
  • दशरथ शर्मा के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण प्रतिहार राजा नागभट्ट प्रथम (730-60 ई.) ने करवाया।
  • हीराचंद ओझा के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण 10वीं सदी धारावर्ष परमार ने करवाया।
  • यह दुर्ग सुकड़ी नदी के किनारे, कनकाचल/सोनगिरी पहाड़ी पर स्थित है।
  • इस दुर्ग को सुवर्ण गिरी, कंचनगिरी, जालपुर, सोनलगढ़, जाबालीपुर (प्राचीन नाम) कहते हैं।
नोट- स्वर्णगिरी, सोनारगढ़ जैसलमेर दुर्ग को कहते हैं ।
  • हसन निजामी का कथन - ‘‘इस दुर्ग का दरवाजा कोई भी आक्रमणकारी नहीं खोल पाया।’’
नोट- हसन निजामी ने ताज उल मासिर ग्रंथ की रचना की।
  • जाबाली ऋषि की तपोभूमि होने के कारण इसे जालौर कहते हैं।
  • 1181 ई. में कीर्तिपाल चौहान (कीतू) ने परमारों से यह दुर्ग छीना था।
  • 1305 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने अपने सेनापति एन-उल-मुल्क-मुल्तानी को जालौर भेजा जिससे कान्हड़दे ने अलाउद्दीन की अधीनता मान ली। 
  • दहिया बीका ने कान्हड़दे के साथ विश्वासघात कर अलाउद्दीन की सेना को दुर्ग का गुप्त रास्ता बताया।
  • 1311-12 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया। जिसमें कान्हड़देव चौहान व उसके पुत्र बीरमदेव के नेतृत्व में केसरिया तथा जैतलदे के नेतृत्व में जौहर हुआ। इस प्रकार जालौर का साका हुआ तथा अलाउद्दीन ने जालौर का नाम जलालाबाद कर दिया। खिलजी ने दुर्ग में अपनी पुत्री फिरोजा का मकबरा बनवाया जिसे अलाउद्दीन की मस्जिद कहते हैं, इस मस्जिद पर एक तोप का चित्र बनवाया जिस कारण इसे तोप मस्जिद कहते हैं। यह राजस्थान की प्रथम मस्जिद मानी जाती है।
  • वत्सराज के दरबारी विद्वान उद्योतन सूरि ने इस दुर्ग में कुवलयमाला ग्रन्थ की रचना की। (778 ई. में)
  • इस दुर्ग में परमार राजा भोज ने संस्कृत पाठशाला बनवाई जिससे तोड़कर तोप मस्जिद बनी थी।
नोट- अढ़ाई दिन का झोपड़ा (अजमेर) जिसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने संस्कृत पाठशाला को तोड़कर करवाया, इसे भी राजस्थान की प्रथम मस्जिद या 16 खम्भों का महल कहते हैं।
  • चौहानों के बाद इस दुर्ग पर राठौड़ों का अधिकार रहा। राव मालदेव ने अधिकार कर लिया।
  • राठौड़ों से बिहारी पठानों ने अधिकार किया।
  • 1607 ई. में बिहारी पठानों से गजसिंह ने छीना।
  • महाराजा मानसिंह ने आश्रय लिया।
  • जालौर दुर्ग की तुलना चित्तौड़गढ़, चम्पानेर, ग्वालियर दुर्ग से की जाती है।
  • दुर्ग में मल्लिक शाह पीर की दरगाह, चामुण्डा माता मन्दिर, मानसिंह के महल, झालरबावड़ी, सोहनबावड़ी, परमार कालीन कीर्तिस्तम्भ, दहिया की पाल, सुन्धा शिलालेख, जालन्धरनाथ की गुफा व छतरी, बीरमदेव चौकी, जोगमाया मन्दिर, दो मंजिला रानी महल स्थित हैं।
  • इस दुर्ग के सामने नटनी की छतरी स्थित है।
नोट- नटनी का चबूतरा पिछोला झील (उदयपुर) में स्थित है।
कहावत - रायों के भाव रातों ही गये।

इस दुर्ग में 5 दरवाजे हैं।
  1. सूरजपोल (मुख्य प्रवेश द्वार)
  2. ध्रुव पोल
  3. चान्दपोल
  4. सिरे पोल
  5. लाल पोल/चित्तौड़ पोल/दिल्ली पोल

मेहरानगढ़ दुर्ग - जोधपुर
  • इस दुर्ग की नींव 12 मई, 1459 ई. को रिद्धि बाई ने रखी थी। यह नींव विक्रम संवत 1515 ज्येष्ठ सुदी एकादशी को शनिवार के दिन रखी गई।
  • यह दुर्ग पार्वत्य/गिरी, सैन्य, पारिध, एरण, धान्वन श्रेणी में आता है।

मेहरानगढ़ दुर्ग के निम्न प्रवेश द्वार हैं-
  • लोहापोल- इस दरवाजे का निर्माण प्रारम्भ 1548 ई. में राव मालदेव ने करवाया जिसे पूर्ण विजयसिंह ने किया। इस दरवाजे के पास अजीतसिंह ने धन्ना और भींवा की 10 खम्भों की छतरी बनवाई है।
नोट- धन्ना व भींवा अजीतसिंह के सामन्त मुकंद सिंह के सेनापति थे।
  • फतेहपोल- यह दरवाजा दक्षिण-पश्चिम में बना हुआ है। इस दरवाजे का निर्माण अजीतसिंह ने करवाया जब मुगलों ने जोधपुर को 'खालसा' भूमि से आजाद किया।
  • जयपोल- यह दरवाजा उत्तर पूर्व में बना है। इस दरवाजे का निर्माण 1808 ई. में राव मानसिंह ने बीकानेर-जयपुर सेना पर विजय के उपलक्ष्य में करवाया। इस दरवाजे पर किलेदार कीरतसिंह सोढ़ा की छतरी बनी है।
  • ध्रुवपोल
  • भैंरोपोल
  • अमृतपोल
  • खाण्डी पोल
  • सूरजपोल
  • जोधाजी का फलसा
  • यह दुर्ग पचेटिया/चिड़िया टूक पहाड़ी पर स्थित है।
  • इसे मयूरध्वजगढ़/विहंगकूट, कागमुखी, गढ़ चिंतामणी, सूर्यगढ़ कहते हैं।
  • राजाराम खड़ेला व मेहरसिंह को इस दुर्ग की नींव में जिंदा दफनाया गया था।
  • इस दुर्ग के अधिकांश महलों का निर्माण अभयसिंह ने करवाया था।
  • बिल गेट्स ने दुर्ग पर खड़े होकर जोधपुर को ब्लू सिटी नाम दिया।
  • जैकलिन कनेडी ने इसे विश्व का 8वाँ आश्चर्य कहा।
  • यह दुर्ग जोधपुर के मुकुट के समान दिखाई देता है।
  • 1565 ई. में मुगल सूबेदार हसन कुलीखाँ ने अधिकार किया।
  • रुडयार्ड किपलिंग ने इसका निर्माण परियों व फरिश्तों द्वारा करवाया बताया है।
  • टॉड ने कहा इस दुर्ग से पूरे राज्य पर नजर रखी जा सकती है।
  • दुर्ग में शम्भुबाण (यह तोप अभयसिंह ने सरबलुन्द से छीनी थी), गजनी खां (यह तोप गज सिंह ने जालौर विजय पर प्राप्त की थी (1607 ई.), किलकिला (अजीतसिंह इसे अहमदाबाद से लाया था), जमजमा, कड़क बिजली, बगस वाहन नुसरत, गुब्बार, धूड़धाणी तोप स्थित है।
  • इस दुर्ग में जसवंत थड़ा है जिसे राजस्थान का ताजमहल कहते हैं। इसका निर्माण सरदारसिंह (1906) ने अपने पिता जसवंत सिंह द्वितीय की याद में करवाया।
  • इस दुर्ग में झरनेश्वर महादेव, ज्वाला माता, मुरली मनोहरजी, आनन्दधन, चामुण्डा माता, नागणेची माता का मन्दिर स्थित है।
  • यहाँ जहूर खां व भूरे खां की मजार, शेरशाह सूरी की मस्जिद है।
  • मोती महल - मोतीमहल का निर्माण विक्रम संवत 1602 में सूरसिंह ने निर्माण करवाया। फूल महल का निर्माण विक्रम संवत 1781 में अभयसिंह ने करवाया। (इसमें तख्तसिंह ने सोने का काम करवाया), फूल महल, चौखेलाव महल, रंगमहल खबका महल, तलहटी महल, तख्त महल, बिचला महल दुर्ग के प्रमुख महल हैं।
  • दुर्ग के संग्रहालय में अकबर की तलवार रखी है।
  • दुर्ग में श्रृंगार चौकी है जहाँ राठौड़ों का राजतिलक होता था। श्रृंगार चौकी का निर्माण तख्त सिंह ने करवाया था।
  • इस दुर्ग में मानप्रकाश/पुस्तक प्रकाश पुस्तकालय है जिसका निर्माण 1805 ई. में किया गया। जिसे 1974 में संग्रहालय बना दिया गया।
  • यहाँ जोधा की रानी जसमादे ने रानीसागर तालाब बनवाया।
  • जोधा की एक अन्य रानी चाँद कंवरी ने चाँद बावड़ी का निर्माण करवाया।
  • मेवाड़ के पदमचंद सेठ के नाम पर इस दुर्ग में पदमसर तालाब बनवाया गया।

भटनेर दुर्ग - हनुमानगढ़
  • इसका निर्माण 286/295 ई./298 ई./3वीं सदी में भूपत भाटी ने करवाया। यह राजस्थान का सबसे प्राचीन दुर्ग है इस दुर्ग में ईंटों का प्रयोग हुआ है।
  • इस दुर्ग का पुनः निर्माण 12वीं सदी में अभयराव भाटी ने करवाया था।
  • इस दुर्ग का शिल्पी-कैकया था।
  • यह दुर्ग दिल्ली - मुल्तान मार्ग पर स्थित है।
  • यह धान्वन दुर्ग की श्रेणी में आता है।
  • इस दुर्ग को भाटियों की मरोड़ कहते हैं।
  • घग्घर नदी के किनारे स्थित इस दुर्ग को उत्तरी सीमा का प्रहरी कहते हैं।
  • इस दुर्ग ने सर्वाधिक विदेशी आक्रमण सहे हैं।
नोट- सर्वाधिक देशी/ स्थानीय आक्रमण तारागढ़/अजमेर दुर्ग ने सहे हैं।
  • यह राजस्थान का एकमात्र दुर्ग है जिसमें मुस्लिम महिलाओं ने भी जौहर किया।
  • 479 ई. में गजनी के लोमणराज का पुत्र रेणसी लाहौर में चघताई उजबेग से हारकर भटनेर शासक जगस्वात मांडणोत से शरण ली, जिससे चघताई उजबेग ने इस दुर्ग पर आक्रमण किया जिससे यहाँ साका हुआ।
  • 1001 ई. में यहाँ मोहम्मद गजनवी का आक्रमण हुआ।
  • 1206 ई. में मोहम्मद गोरी के गर्वनर कुबाचा ने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया।
  • 1210-36 ई. में इस दुर्ग पर दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने आक्रमण किया।
  • तैमूर लंग (आक्रमण- 1398 ई.) ने अपनी आत्मकथा तुजुक-ए-तैमूरी में इस दुर्ग को अपने जीवन का सबसे मजबूत दुर्ग बताया तथा यहाँ सबसे बड़ा कत्ले आम किया था। इस समय यहाँ का शासक दुलचन्द था। इस समय मुस्लिम महिलाओं ने भी जौहर किया जो राजस्थान में एकमात्र था।
  • 1534 ई. में हुमायूँ के भाई कामरान के आक्रमण के समय बीकानेर के शासक जैतसिंह का सेनापति खेतसी मारा गया।
  • 1549 ई. में ठाकुरसी राठौड़ का अधिकार हुआ।
  • 1570 ई. में इस दुर्ग पर अकबर का अधिकार हुआ लेकिन अकबर ने दुर्ग ठाकुरसी के पुत्र बाघा को सौंप दिया।
  • 1597 ई. में अकबर के श्वसुर नसीर खां ने इस दुर्ग में किसी दासी से छेड़छाड़ की तब बीकानेर के रायसिंह के सामंत तेजा ने उसे मारा।
  • 1805 ई. में मंगलवार के दिन बीकानेर के सूरतसिंह ने भटनेर शासक जब्तासिंह भाटी को हराकर दुर्ग पर अधिकार कर इसका नाम हनुमानगढ़ कर दिया।
  • इस दुर्ग में दिल्ली सुल्तान गयासुद्दीन बलबन के भाई शेर खां की कब्र तथा गुरु गोरखनाथ का मन्दिर है।

जूना दुर्ग (बाड़मेर)
  • इस दुर्ग का निर्माण 1002 ई. में बाहड़ बागभट्ट ने करवाया था जो धरणीवराह का पुत्र था। बाहड़ के नाम पर ही बाड़मेर नाम पड़ा। जूना दुर्ग को बाड़मेरू, बाहड़गिरी भी कहते हैं। इस दुर्ग में एक जैन मन्दिर था।

हापाकोट (चोहटन, बाड़मेर)
  • इस दुर्ग का निर्माण सालिम सिंह द्वितीय के पुत्र हापासिंह ने करवाया था। सालिम सिंह द्वितीय कान्हड़देव चौहान का भाई था।

कोटला किला (शिव, बाड़मेर)
  • यह दुर्ग भाखरी नामक पहाड़ी पर स्थित है।
  • दुर्ग का निर्माण परमारों ने करवाया।
  • गोरधन खींची ने एक सरोखे का निर्माण करवाया जिसे मेड़ी कहते हैं।

सोनारगढ़ - जैसलमेर
  • दुर्ग की नींव वि.स. 1212, श्रावण शुक्ल सप्तमी को रखी गई तथा निर्माण 7 वर्षों में पूर्ण हुआ। क्षेत्रफल 8 हैक्टेयर।
  • इसका निर्माण 12 जुलाई, 1155 ई. में त्रिकूट पहाड़ी/गोरहरा पहाड़ी पर जैसल देव भाटी ने प्रारम्भ करवाया तथा पूर्ण 1162 ई. में सालीवाहन द्वितीय ने करवाया।
नोट- त्रिकूट पर्वत करौली में है जहाँ कैलादेवी का मन्दिर है।
  • इस दुर्ग को स्वर्णगिरी, भाटी भड़ कीवाड़, पश्चिमी सीमा का प्रहरी, रेगिस्तान का गुलाब, राजस्थान का अण्डमान, गोहरगढ़, त्रिकूटगढ़, जैसाणगढ़, गलियों का दुर्ग कहते हैं।
  • इस दुर्ग का निर्माण ईसाल ऋषि की सलाह पर किया गया।
  • इस दुर्ग में दोहरा परकोटा और आकृति घाघरेनुमा होने के कारण इसे कमरकोट कहते हैं।
  • इस दुर्ग में प्रवेश अक्षयपोल से होता है। गणेशपोल, हवापोल अन्य दरवाजे।
  • "गढ़ दिल्ली गढ़ आगरी अधगढ़ बीकानेर, भलो चिणायो भाटियो सिरे टू जैसलमेर" यह कहावत इस दुर्ग के लिए प्रसिद्ध है।
  • अबुल-फजल ने इस दुर्ग के बारे में कहा - घोड़ा किजे काठ का पग किजे पाषाण, अख्तर कीजे लोहे का तब पहुँचे जैसाण।
  • दूर से देखने पर यह दुर्ग ऐसे लगता है जैसे जहाज ने रेगिस्तान में लंगर डाल रखा है।
  • दूर से देखने पर यह दुर्ग अंगड़ाई लेते हुए शेर के समान दिखाई देता है।
  • इस दुर्ग के निर्माण में चूने का प्रयोग नहीं हुआ है, बल्कि जिप्सम का हुआ है।
  • इस दुर्ग की छत लकड़ी से बनी है जिस पर गोमूत्र से लेप किया गया है।
  • इस दुर्ग में सर्वाधिक 99 बुर्ज स्थित हैं।
  • दुर्ग में लक्ष्मीनाथ मन्दिर है जिसका प्रवेश द्वार चाँदी का बना है। लक्ष्मीनाथ जी की मूर्ति मेड़ता से लायी गयी।
  • बादल विलास महल (यहाँ ताजिया टॉवर है), गजविलास महल, जवाहर विलास महल, हरराज महल दुर्ग में स्थित हैं।
  • महारावल अखैसिंह ने सर्वोत्तम विलास (शीशमहल) का निर्माण करवाया।
  • भव्य जालियों, झरोखों युक्त मूलराज द्वितीय ने मोतीमहल, रंगमहल बनवाये।
  • जवाहर विलास, गजविलास महल पत्थर की बारीक कटाई के लिये प्रसिद्ध।
  • पेयजल का जैसल कुआं।
  • पार्श्वनाथ, संभवनाथ, ऋषभदेव/आदिनाथ का मंदिर जो देलवाड़ा मंदिरों से मिलते-जुलते हैं।
  • सत्यजीत रे ने सोनार किला पर फिल्म बनाई।
  • यहाँ ताड़पत्रों पर हस्तलिखित ग्रंथों का जैन भद्र सूरि नामक पुस्तकालय है, जो भूमिगत है।
  • यहाँ स्थित संग्रहालय में स्टाम्प व डाक टिकटों का संग्रह तथा डेजर्ट कूलर स्थित है।
  • 2009 में इस दुर्ग पर ₹ 5 की डाक टिकट जारी की गई।
  • 2013 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।

इस दुर्ग में ढाई साके हुए थे -
  • प्रथम साका - दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने मूलराज भाटी पर आक्रमण किया। खिलजी के आक्रमण करने का कारण मूलराज द्वारा मण्डोर शासकों को शरण देना तथा मूलराज द्वारा खिलजी का खजाना लूटना था। गोपीनाथ शर्मा के अनुसार यह साका 1312 ई. हुआ था।
  • दूसरा साका - 1370-71 ई. में दिल्ली शासक फिरोज तुगलक ने जैसलमेर शासक राव दूदा पर आक्रमण किया। राव दादा के साथ त्रिलोकसी भी शहीद।
  • तीसरा अर्द्ध साका - यह साका 1550 ई. को हुआ। इस साके में कंधार के अमीर अली ने जैसलमेर शासक लूणकरण के साथ धोखा कर दुर्ग की महिलाओं को बंदी बना लिया जिससे महिलाएँ जौहर नहीं कर पायी।

मेवात के दुर्ग

लोहागढ़ दुर्ग- भरतपुर
  • पहले इस दुर्ग को चौबुर्जा कहते थे।
  • यहाँ पहले खेमकरण जाट की गढ़ी थी। 1700 ई. में रुस्तम सगोरिया जाट ने इसकी स्थापना की। इस दुर्ग का सर्वाधिक निर्माण 1733 ई. में सूरजमल जाट ने किया। दुर्ग के निर्माण में 8 वर्ष का समय लगा।

दुर्ग में प्रवेश के मुख्य दरवाजे हैं-
  1. उत्तरी अष्टधातु दरवाजा।
  2. दक्षिणी लोहिया दरवाजा।
  3. सूरजपोल
  4. भूतापोल
  5. हवा पोल
  6. मथुरा पोल
  7. वीरनारायण पोल
  8. अटलबंद पोल
  9. नीमपोल
  10. जधीनापोल
  11. गोवर्धनपोल
  12. चाँदपोल
  13. ऊनाहपोल
  14. कुम्हेरपोल
  • भरतपुर दुर्ग की आधुनिक नींव 19 फरवरी 1733 ई. में सूरजमल जाट ने रखी थी।
  • 1805 ई. में जसवंतराव होल्कर को इस दुर्ग में शरण दी गई जिस कारण अंग्रेज अधिकारी लार्ड लेक ने गोले दागे लेकिन दुर्ग को कोई नुकसान नहीं हुआ जिससे इसका नाम लोहागढ़ पड़ गया। जनवरी, 1805 से अप्रैल 1805 ई. तक लार्ड लेक ने पांच बार आक्रमण किये। 17 अप्रैल, 1805 ई. लार्ड लेक ने घेरा उठा लिया। इस विजय के उपलक्ष में शासक रणजीतसिंह ने फतेहबुर्ज का निर्माण करवाया। (1806 ई.)
  • इस दुर्ग को पूर्वी सीमा का प्रहरी कहते हैं। राजस्थान का सिंहद्वार कहते हैं।
  • दुर्ग के चारों ओर स्थित खाईयों में सुजानगंगा व मोतीझील नहरों का पानी आता है।
नोट- मोती झील को भरतपुर की लाइफ लाइन कहते हैं।
  • यह दुर्ग मिट्टी का बना दुर्ग कहलाता है जिसके चारों ओर दोहरा परकोटा है। यह पारिख दुर्ग की श्रेणी में आता है।
  • किशोरी महल, दादी मां का महल, वजीर की कोठी, बिहारीजी का मन्दिर, मोहनजी का मन्दिर दुर्ग, राजेश्वरी माता मन्दिर, गंगामन्दिर, लक्ष्मणमंदिर (राजस्थान में एकमात्र), जामा मस्जिद, कचहरी किला में स्थित है।
  • दुर्ग में दिल्ली विजय पर जवाहरसिंह ने जवाहरबुर्ज का निर्माण करवाया जिसमें भरतपुर शासकों का राजतिलक होता था। (1735 ई.)
  • इस दुर्ग का मुख्य प्रवेश द्वारा लोहिया पोल कहलाता है।
  • 1826 ई. में इस दुर्ग पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया है।
  • यह दुर्ग सबसे निचाई पर स्थित है।
  • यह सबसे नवीन दुर्ग है। अजयगढ़ कहलाता है।
  • यहाँ एक अजायबघर स्थित है।
  • मत्स्यसंघ का उद्घाटन (18 मार्च 1948) इसी दुर्ग में हुआ।
  • दुर्ग के लिए कहावत - 8 फिरंगी, 9 गौरा लड़े जाट का 2 छोरा (दुर्जनशाल, माधोसिंह)।
  • मत्स्यसंघ का गठन कचहरी में हुआ था।
  • 1765 ई. में भरतपुर शासक जवाहरसिंह ने दिल्ली पर आक्रमण कर लाल किले में लगा अष्टधातु के दरवाजे को उखाड़कर लोहागढ़ के उत्तरी भाग में लगवाया।
नोट- माना जाता है, कि यह अष्टधातु दरवाजा 1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़गढ़ से उतारकर लेकर गया था तथा दिल्ली में झीरी के किले में लगवाया जहाँ से उतारकर शाहजहाँ ने लाल किले में लगवाया।
  • दुर्ग में 8 विशाल बुर्ज, 40 अर्द्धचन्द्राकार बुर्ज बने है। बागर वाली बुर्ज, नवलसिंह बुर्ज, भैंसांवाली बुर्ज, गोकालु बुर्ज, कालिका बुर्ज, सिनमिनी बुर्ज दुर्ग की प्रमुख बुर्ज है।

बयाना का किला (भरतपुर)
  • यह दुर्ग दमदमा/मानी पहाड़ी पर स्थित है।
  • इस दुर्ग का निर्माण 1040 ई. में विजयपाल यादव ने करवाया। बयाना का प्राचीन नाम शोणितपुर था।
  • इस दुर्ग को बादशाह दुर्ग (दुर्भेद्यता के कारण), विजयगढ़ दुर्ग, विजय मंदिर किला सुल्तान कोट, बाणासुर कहते हैं।
  • इस दुर्ग का शिल्प कुतुबमीनार के समान है। इसमें अनेक कब्र हैं।
  • दशरथ शर्मा के अनुसार बयाना का प्राचीन नाम भादानक था।
  • 1046 ई. में इस पर गजनी के मुसलमानों का अधिकार हो गया।
  • 1196 ई. में मो. गोरी का अधिकार हो गया।
  • 1348 ई. में अर्जुन पाल यादव का अधिकार हो गया।
  • फिरोजशाह तुगलक का अधिकार हुआ।
  • खानवा युद्ध (17 मार्च, 1527 ई. ) से पूर्व राणा सांगा ने 16 फरवरी, 1527 ई. को बयाना के मुगल किलेदार मेहंदी ख्वाजा को पराजित कर बयाना दुर्ग पर अधिकार किया था। लेकिन खानवा युद्ध में राणा सांगा की पराजय के बाद बयाना दुर्ग पर पुनः बाबर का अधिकार हो गया।
  • खानवा युद्ध (17 मार्च, 1527 ई. ) के बाद बाबर इसी किले में रुका था।
  • 1807 ई. इस दुर्ग पर जाटों का अधिकार हो गया।
  • यहाँ अकबर की छतरी, दाऊदखा की मीनार, लोदी की मीनार, सादुल्ला सराय, जहांगीरी दरवाजा, उषा मन्दिर, बारहदरी, उषा मस्जिद, भीमलाट स्थित है।
  • उषा मन्दिर का निर्माण 955 ई. में रानी चित्रलेखा ने करवाया था जिसे इल्तुतमिश ने बदलकर उषा मस्जिद बना दिया। 18वीं सदी जाट शासकों ने उषा मस्जिद से पुनः उषा मन्दिर बना दिया।
  • हुँमायूँ ने अपने चचेरे भाई मुहम्मद जमान मिर्जा को इसी दुर्ग में कैद किया था। बयाना दुर्ग में समुद्रगुप्त का विजय स्तम्भ है जो राजस्थान का प्रथम विजय स्तम्भ है। इस विजय स्तम्भ का निर्माण रानी चित्रलेखा ने करवाया था।
  • 371 ई. में विष्णुवर्धन ने पुण्डरीक यज्ञ की समाप्ति पर एक 8 मंजिला स्तम्भ का निर्माण करवाया जिसे भीमलाट कहते हैं।

रणथम्भौर का किला - (सवाई माधोपुर)
  • क्षेत्रफल- 102 हैक्टेयर
  • इसका निर्माण 887 ई. में रणधामदेव चौहान ने करवाया। यह रण व थंभ पहाड़ी पर स्थित होने के कारण रणथम्भौर कहलाया।
  • यह एरण दुर्ग की श्रेणी में आता है।

इस दुर्ग में छह प्रवेश द्वार हैं -
  1. नौ लखा दरवाजा (मुख्य)
  2. हाथी पोल
  3. गणेश पोल
  4. सूरज पोल
  5. त्रिपोलिया पोल/अंधेरी पोल/तोरण पोल
  • इसे चित्तौड़गढ़ का छोटा भाई व दुर्गाधिराज भी कहते हैं।
  • अबुल-फजल ने इस दुर्ग के बारे में कहा बाकी सभी दुर्ग नंगे हैं, यह बख्तरबंद है।
  • 1194 ई. में गोविन्दराज चौहान ने यहाँ रणथम्भौर के चौहान वंश की स्थापना की।
  • कुछ समय यहाँ कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, बलबन का अधिकार रहा। 1292 ई. में इस दुर्ग पर दिल्ली सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया। जब सफलता नहीं मिली तब उसने कहा कि - ऐसे 10 दुर्गों को मैं मुसलमान के बाल के बराबर भी नहीं समझता।
  • 1299 ई. में अलाउद्दीन खिलजी का यहाँ असफल आक्रमण हुआ।
  • 10 जुलाई, 1301 ई. में इस दुर्ग पर अलाउद्दीन खिलजी का (दिल्ली) का अधिकार हुआ। इस आक्रमण में हम्मीर देव चौहान के नेतृत्व में केसरिया व उसकी रानी रंगदेवी/देवलदे के नेतृत्व में पदमसर तालाब में जल जौहर हुआ। इस प्रकार यहाँ राजस्थान का प्रथम साका हुआ। इस साके में अलाउद्दीन के सेनापति नुसरत खां की मृत्यु हो गई। इस साके में हम्मीर देव चौहान के सेनापति रतिपाल व रणमल ने विश्वासघात किया। इस विजय पर अमीर-खुसरो का कथन - "आज कुफ्र का घर इस्लाम का घर बन गया"
नोट - राजस्थान का प्रथम अग्नि जौहर 1303 ई. में रानी पद्मिनी के नेतृत्व में चित्तौड़ दुर्ग में हुआ था।
  • इस दुर्ग पर प्रथम आक्रमण कुतुबुद्दीन ऐबक ने किया था।
  • कुछ समय यहाँ राणा कुम्भा का भी अधिकार रहा है।
  • राणा सांगा ने इस दुर्ग पर भामाशाह को नियुक्त किया।
  • 1533-35 ई. इस दुर्ग पर गुजरात के बहादुर शाह का अधिकार रहा।
  • 1542 ई. में दिल्ली के शेरशाह सूरी का अधिकार था। शेरशाह ने अपने पुत्र आदिल खाँ को किलेदार बनाया।
  • 1554 ई. में यहाँ बूंदी के सुरजन हाड़ा का अधिकार रहा।
  • जहाँगीर व औरंगजेब ने यहाँ खालसा किया था।
  • अन्त में यह दुर्ग कछवाहा वंश के अधिकार में रहा है।
नोट - खालसा वो भूमि होती है जिस पर सीधे केन्द्र का अधिकार होता है।
  • इस दुर्ग में हम्मीर महल, सुपारी महल, जोरा-भौरा (अनाज रखने के गोदाम), हम्मीर कचहरी, रानी कर्मावती की अधूरी छतरी, बादल महल, जोगी महल, पीर सदरुद्दीन की दरगाह, रानीहाड़ तालाब, लक्ष्मीनारायण मंदिर, गुप्त गंगा स्थित है। दुर्ग में स्थित शिव मंदिर में हम्मीर ने अपना सिर चढ़ाया था।
  • यहाँ त्रिनेत्र गणेश मन्दिर गणेशजी हैं जहाँ पूरे भारत से शादी का प्रथम कार्ड भेजा जाता है।
  • हम्मीर देव चौहान ने अपने पिता जैत्रसिंह के 32 वर्ष के शासन काल की याद में 32 खम्भों की छतरी का निर्माण करवाया जिसे न्याय की छतरी कहते हैं।
  • इस दुर्ग में मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर तीनों स्थित हैं।
  • पदमा तालाब, रणिहाल तालाब, रणत्या डूँगरी आदि स्थित हैं।
  • अर्रादा - यह रणथम्भौर दुर्ग में स्थित एक उपकरण था जिससे दुश्मनों पर पत्थर फेंके जाते थे।
  • मगरनी/गरगच - यह रणथम्भौर दुर्ग में स्थित एक उपकरण था जिससे दुश्मनों पर ज्वलनशील पदार्थ फेंका जाता था।

बाला दुर्ग - अलवर
  • इसे कुवारां किला कहा जाता है।
  • इसका निर्माण हसन खां मेवाती ने करवाया।
  • जनश्रुति के अनुसार दुर्ग का निर्माण 1049 ई. में कोकिल देव कछवाह के पुत्र अलघुराय ने करवाया।
  • इस दुर्ग पर कछवाहों की नरुका शाखा का अधिकार रहा।
  • खानवा युद्ध (1527) में यहाँ का शासक हसन खाँ मेवाती था। खानवा विजय के बाद बाबर ने यह दुर्ग अपने पुत्र हिन्दाल को दिया था। कुछ समय शेरशाह सूरी का अधिकार रहा।
  • इसे कुँवारा दुर्ग कहते हैं।
  • इस दुर्ग का पश्चिमी दरवाजा चांदपोल, पूर्वी सूरजपोल, दक्षिणी लक्ष्मण पोल/जयपोल तथा उत्तरी अंधेरी पोल कहलाता है।
  • शेरशाह के उत्तराधिकारी सलीमशाह ने दुर्ग में सलीमसागर नाम जलाशय का निर्माण करवाया।
  • सूरजमल ने दुर्ग पर अधिकार कर दुर्ग में 'सूरजकुण्ड' बनवाया।
  • यह दुर्ग अलवर के मुकुट के समान है।
  • 12वीं सदी में यह किला कछवाहों से निकुम्भ क्षत्रिय (चौहानों) के अधिकार में आ गया।
  • औरंगजेब ने यह दुर्ग मिर्जा राजा जयसिंह को जागीर में दिया।
  • 1775 ई. में राव प्रतापसिंह ने दुर्ग पर अधिकार किया तथा सीताराम मन्दिर का निर्माण करवाया।
  • अलवर दुर्ग के अवशेषों को रावण देहरा के नाम से जाना जाता है।
  • अलवर दुर्ग में स्थित संग्रहालय में हैदर अली, खलीफा हजरत अली, नरदिर शहदुर्रानी, ताहमास्प, अब्बास खां, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगजेब की तलवार, मोहम्मद गौरी का कवच व यशवंत होल्कर का कवच रखे है।

भानगढ़ का किला (राजगढ़, अलवर)
  • इस दुर्ग का निर्माण 1574 ई. में भगवंत दास ने करवाया तथा अपने पुत्र माधोसिंह को दे दिया।
  • इस दुर्ग का प्रवेश द्वार शाही द्वार कहलाता है।
  • मंगला माता मन्दिर, भैरवगोपीनाथ मंदिर, हनुमान मन्दिर, सेवड़े की छतरी, बालकनाथ का धूणा, गौमुख कुण्ड, सुरंग, नक्करखाना आदि यहाँ दर्शनीय स्थल हैं।
  • इस दुर्ग को भूतों का भानगढ़ कहते हैं जहाँ रात्रि में ठहरना मना है।
  • भानगढ़ बाणगंगा की सहायक सांवा नदी के दाहिने तट पर बना है।
  • दुर्ग का निर्माण 1574 ई. में भगवन्तदास ने पिता भारमल के नाम पर करवाया।
  • भगवन्तदास के छोटे पुत्र कुंवर माधवसिंह को जागीर में मिला। हल्दीघाटी में युद्ध माधवसिंह ने राणा प्रताप पर भाले से आक्रमण किया जिससे महाराणा प्रताप के दो दांत टूट गये। युद्ध में माधवसिंह ने जगन्नाथ कछवाहों की प्राणरक्षा की। 1597 ई. में यहां शिलालेख मिला है जो माधवसिंह का है।
  • दुर्ग के तिहरा परकोटा है।
  • दुर्ग तीन भागों में बंटा है- (1) राजन्य (2) सैन्य (3) आवासीय
  • दुर्ग के 5 प्रवेशद्वार है- (1) हनुमान दरवाजा (2) दिल्ली दरवाजा (3) फुलबारी दरवाजा (4) अजमेरी दरवाजा (5) लुहारी दरवाजा।
  • रानी रत्नावती महल, खिरणी वाली हवेली, नगर सेठ की हवेली, दीवानजी की हवेली, पुरोहित जी की हवेली, मोधों की हवेली, नटणी का डेरा आदि पर्यटन स्थल है।
  • 1720 ई. सवाई जयसिंह का अधिकार।
  • भानगढ़ की रानी रत्नावली को सिंघा सेवड़ा प्राप्त करना चाहता था लेकिन प्राप्त नहीं कर सका जिससे उसने भानगढ़ को उजड़ने का श्राप दे दिया।

कुशलगढ़ दुर्ग (बाँसवाड़ा)
  • यह बाँसवाड़ा का ठिकाना था जो राठौड़ों के अधीन था।

बदनगढ़ी (बयाना, भरतपुर)
  • यहाँ मिट्टी का बना दुर्ग है।
  • इस दुर्ग में भावसिंह की पत्नी ने बदनसिंह को जन्म दिया जिससे इसका नाम बदनगढ़ी पड़ा।

डीग दुर्ग (डीग)
  • 1730 ई. में बदनसिंह के समय उसके पुत्र सूरजमल ने इस दुर्ग का निर्माण करवाया।
  • यह पारिख दुर्ग में आता है।
  • इस दुर्ग में 12 बुर्ज बने हैं। जिसमें उत्तर-पश्चिम में ललका बुर्ज, दक्षिण-पूर्व में हजारा बुर्ज, लक्खा बुर्ज, ध्रुव टीला बुर्ज प्रमुख है।
  • इसके चारों ओर तिहरा परकोटा व खाई है।
  • इसमें सूरजमल के महल, सुल्तान सिंह की समाधि, मिर्जा शफी की कब्र (दिल्ली वजीर), शस्त्रागार, गोपालभवन, नन्द भवन, भादों भवन, सावन भवन, सूरज भवन, किशन भवन, केशव भवन (बारहदरी), हरदेव भवन स्थित है इन भवनों के चारों ओर फ्व्वारे लगे हैं जिस कारण इन्हें जलमहल कहते हैं।
  • दुर्ग में स्थित केशव भवन में फ्व्वारों के चलने से बादलों के गर्जना की आवाज आती है।
नोट- डीग को जलमहलों की नगरी कहते हैं।
  • जेम्स फर्ग्यूसन ने इन भवनों के बारे में कहा - इन भवनों के निर्माण में स्थापत्य की दृष्टि से जितना भव्य और वैज्ञानिक कार्य हो सकता है, इन महलों में हुआ है।
  • 1775 ई. में नफज खां ने इस दुर्ग पर घेरा डालकर 1776 ई. में इस पर अधिकार कर लिया। महाराजा रणजीत सिंह ने इसे पुनः छीन लीया।
  • 1804 ई. में जनरल फ्रैजर ने होल्कर की सेना को परास्त किया तथा दुर्ग को लुटा।
  • इस दुर्ग में चार बाग पद्धति से अनेक बाग लगाये गए हैं।

वैर दुर्ग (भरतपुर)
  • यह स्थल दुर्ग की श्रेणी में आता है।
  • इसका निर्माण 1726 ई. में बदनसिंह ने करवाया तथा अपने छोटे पुत्र प्रताप सिंह को दे दिया।
  • इस दुर्ग के ऊपर 18 फीट लम्बी तोप रखी है।
  • इस दुर्ग में पाँच दरवाजे हैं - 1.बयाना, 2. भरतपुर, 3. कुम्हेर, 4. भुवासर, 5. सीता
  • इस दुर्ग में रानी का महल (शीश महल), राजा का महल, दीवाने आम, ब्रज दूल्हे का मन्दिर (राधा कृष्ण मन्दिर) स्थित है।
  • इस दुर्ग में प्रताप सिंह ने आम, नींबू, संतरा, मोरछली, इमली, आदि का बाग है।

कुम्हेर (डीग)
  • इस दुर्ग का निर्माण 1724 ई. में बदनसिंह के पुत्र सूरजमल ने करवाया। 1754 ई. में मराठा मल्हार राव होल्कर के पुत्र खांडेराव ने कुम्हेर दुर्ग पर आक्रमण किया। सूरजमल ने होल्कर से मित्रता करने की कोशिश की लेकिन खाण्डेराव, इमादुलमुल्क (मुगलसेनापति), रघुनाथराव ने कुम्हेर को बुरी तरह लूटा।
  • सूरजमल ने अपनी रानी हँसिया के लिए इस दुर्ग में महलों का निर्माण करवाया।

खण्डार किला (सवाई माधोपुर)
  • यह बनास व गालण्डी नदी के किनारे स्थित है।
  • इस दुर्ग को रणथम्भौर दुर्ग का रक्षक व सहायक दुर्ग कहते हैं।
  • दुर्ग का निर्माण 8वीं - 9वीं सदी में चौहानों ने करवाया था।
  • 1301 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने अधिकार कर लिया।
  • दुर्ग में हनुमानजी की विशाल प्रतिमा स्थित है।
  • दुर्ग में देवी मंदिर, चतुर्भुज मंदिर, झिरीकुण्ड, बाणकुण्ड, सतकुण्डा आदि दर्शनीय स्थल है।
  • 1542 ई. में गुजरात में बहादुरशाह को हराकर शेरशाह सूरी ने अधिकार कर लिया।
  • 1569 ई. में सुर्जनराव हाड़ा को हराकर अकबर ने अधिकार कर लिया।
  • मुगलों के बाद जयपुर के सवाई माधोसिंह प्रथम ने अधिकार किया।
  • भीलों से यह दुर्ग कोटा के हाड़ाओं ने छीना, हाड़ाओं से यह मुगलों के पास तथा यह मुगलों से यह झालावाड़ रियासत के अधीन हो गया।
  • यह दुर्ग पारिघ, गिरी वन, पारिख दुर्ग की श्रेणी में आता है।
  • इस दुर्ग में विश्ववन्ती माता का मन्दिर है जो भीलों की इष्ट देवी हैं।
  • इस दुर्ग में अष्टधातु से निर्मित शारदा तोप है।
  • दुर्ग में महावीर स्वामी की पदमासन मुद्रा व पार्श्वनाथ की आदमकद खड़ी प्रतिमा है।

त्रिभुवनगढ़/तवनगढ़ (करौली)
  • यह दुर्ग बयाना (भरतपुर) के पास पड़ता है लेकिन प्रशासनिक रूप से यह दुर्ग करौली में है।
  • यह दुर्ग त्रिभुवनगिरी पहाड़ी पर स्थित है।
  • इस दुर्ग को इस्लामाबाद के नाम से भी जाना जाता है।
  • इस दुर्ग का निर्माण 11वीं सदी में तवनपाल ने करवाया।
  • इस दुर्ग में ननद भोजाई का कुआँ स्थित है।
  • इस दुर्ग के आन्तरिक भाग को जीवरखा महल कहते हैं।
  • इस दुर्ग में गूँडालाव तालाब स्थित है।
  • जानवरों के अंग व मूर्ति तस्कर वामन नारायण ऋषि ने इस दुर्ग का अपना केन्द्र बनाया था।
  • इस दुर्ग को राजस्थान का खजुराव कहा जा सकता है।
  • डॉ. ओझा के अनुसार, मुहम्मद गौरी ने 1195 ई. में तवनगढ़ पर अधिकार कर लिया। मुहम्मद गौरी ने दुर्ग का अधिकार बहाउद्दीन तुगरिल के अधीन रखा।
  • दुर्ग में 1348 ई. में अर्जुनपाल ने कल्याणजी मंदिर का निर्माण करवाया। प्रवेश द्वार (1) जगनपोल (2) सूर्यपोल
  • खासमहल, बड़ा चौक, तहखाना, जीर्ण छतरियां, दुगाध्यक्ष के महल आदि दर्शनीय स्थल है।

कामां दुर्ग (डीग)
  • इस दुर्ग का निर्माण 8वीं सदी में शूरसेर शासकों ने करवाया।
  • 11वीं सदी में यहाँ प्रतिहार राजा भोज का सामंत लक्ष्मीनिवास राज करता था।
  • इस दुर्ग पर यादव वंश, मुगलों, मुहम्मद हाजी, फिरोज तुगलक का अधिकार रहा।

तिजारा दुर्ग (खैरथल)
  • इस दुर्ग का निर्माण 1835 ई. में राव बलवंत सिंह ने करवाया। दुर्ग में हवा बंगला, भर्तृहरी की गुंबद, हजरत गछनशाह पीर की मजार तथा अलाउद्दीन द्वारा निर्मित एक तालाब है। तिजारा का प्राचीन नाम त्रिगर्त प्रदेश है।

अजबगढ़ (अलवर)
  • इस दुर्ग का निर्माण अजबसिंह ने करवाया।

राजगढ़ दुर्ग (अलवर)
  • इस दुर्ग का निर्माण 18वीं सदी में प्रतापसिंह कछवाह ने करवाया।

राजोरगढ़/नीलकंठ (राजगढ़, अलवर)
  • इसका प्राचीन नाम राज्यपुर था।
  • पहले यह बड़गूजर राजपूतों की राजधानी थी।
  • यहां 10वीं सदी में मथनदेव ने नीलकंठ महादेव मंदिर का निर्माण करवाया। वि. स. 1101 का यहां शिलालेख है जिस पर मुगल शासकों का अधिकार।
  • 16वीं सदी में मुगल शासकों का अधिकार।
  • शाहजहां ने यह दुर्ग मिर्जा राजा जयसिंह को जागीर में दिया।
  • जैन धर्म का लोकप्रिय केन्द्र।
  • यहां जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ की एक विशाल प्रतिमा है जिसे नौ गजा कहा जाता है।
  • जैन धर्म की लोकप्रियता के कारण इसे 'पारानगरी' कहा जाता है।

कांकणबाडी दुर्ग (राजगढ़, अलवर)
  • यह दुर्ग सरिस्का अभयारण्य के मध्य स्थित है।
  • माना जाता है कि इस दुर्ग का निर्माण सवाई जयसिंह (आमेर) ने करवाया। दुर्ग का पुन:निर्माण सवाई प्रतापसिंह (आमेर) ने करवाया।
  • औरंगजेब ने अपने बड़े भाई दारा शिकोह को दौराई युद्ध (1659 ई.) के बाद इसी दुर्ग में कैद किया था।
  • यह दुर्ग दूर से देखने पर दिखाई देता है पर पास जाने पर पेड़ों में छिप जाता है।
  • यह वन दुर्ग का उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • इस दुर्ग में राजनैतिक कैदियों को रखा जाता था।

इन्दौर का किला (भिवाड़ी, खैरथल तिजारा)
  • इस दुर्ग का निर्माण निकुम्भ शासकों ने करवाया।
  • इस दुर्ग को दिल्ली सल्तनत की आँख की किरकरी कहते हैं।

निमराणा का किला (कोटपुतली)
  • इस दुर्ग का निर्माण 1464 ई. में चौहान शासकों ने करवाया।
  • यह दुर्ग पाँच मंजिला है जिस कारण इसे पंचमहल कहते हैं।

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Kartik Budholiya

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राजस्थान की ऐतिहासिक विरासत और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को RPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।