विधिक अधिकार
यह लेख विधिक अधिकारों की अवधारणा को सरल, व्यावहारिक और जनोन्मुख दृष्टिकोण से समझाता है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि विधिक अधिकार कैसे कानून द्वारा प्रदान किए जाते हैं, उनकी संवैधानिक मान्यता क्या है और आम नागरिक के दैनिक जीवन में इनका क्या महत्व है। प्राकृतिक अधिकारों और विधिक अधिकारों के अंतर को सहज उदाहरणों के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए लेख यह बताता है कि कानून किस प्रकार व्यक्ति के हितों की रक्षा करता है।
लेख में विशेष रूप से सम्पत्ति का अधिकार, राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी अधिनियम, 2011 और राजस्थान सुनवाई का अधिकार अधिनियम, 2012 जैसे महत्वपूर्ण कानूनों का विस्तार से वर्णन किया गया है। समयबद्ध सेवाएँ, अपील की प्रक्रिया, पारदर्शिता, दण्ड प्रावधान और जनसुनवाई की व्यवस्था को आम आदमी के दृष्टिकोण से समझाया गया है। साथ ही सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाओं, पोर्टलों और कार्यक्रमों के माध्यम से प्रशासन को अधिक उत्तरदायी, संवेदनशील और पारदर्शी बनाने के प्रयासों को भी दर्शाया गया है। कुल मिलाकर यह लेख विधिक अधिकारों को केवल कानूनी शब्दों तक सीमित न रखकर, नागरिक सशक्तिकरण और सुशासन की मजबूत आधारशिला के रूप में प्रस्तुत करता है।
कुछ अधिकार विधि की किसी निश्चित प्रक्रिया द्वारा औपचारिक रूप से प्रदान किये जाते हैं, जिन्हें विधिक अधिकार कहते हैं। मनुष्य को उसके व्यक्तित्व के विकास एवं जीवन के कुछ आवश्यक कार्य करने पड़ते हैं। अतः मनुष्य को ऐसे कार्यों की स्वतंत्रता देना ही अधिकार है। कुछ अधिकार प्रकृति से प्राप्त होते हैं जिन्हें प्राकृतिक अधिकार कहते हैं। जैसे स्वतंत्रता का अधिकार, जीवन का अधिकार आदि। विधि अधिकार विधि द्वारा मान्य एवं संरक्षित हितों के रूप में किसी व्यक्ति को प्राप्त वह विशेषाधिकार है जिससे वह अन्य व्यक्ति या समूह को कोई कार्य करने अथवा न करने के लिए वैधानिक रूप से बाध्य करता है। उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 131 के अन्तर्गत आने वाले दो प्रमुख निर्णयों राजस्थान बनाम भारत संघ और कर्नाटक राज्य बनाम भारत संघ में विधिक अधिकारों की व्याख्या की है। एक विधिक अधिकार में तीन तत्व- इच्छा, हित और संरक्षण आवश्यक है। विधिक अधिकार विधि की देन है। यह सामाजिक मान्यता एवं प्रवर्तन पर आधारित होते हैं। इन अधिकारों की संकल्पना सकारात्मक विधि से जुड़ी है। इनमें विधि व राज्य की भूमिका अपरिहार्य बन जाती है। ये विधि द्वारा मान्यता प्राप्त एवं संरक्षित हित हैं। ये अधिकार राज्य की इच्छा पर निर्भर होते हैं। परन्तु राज्य इन अधिकारों को नैतिकता के आधार पर सुनिश्चित करता है। ऐसे अधिकार अधिनियम, कानून या अध्यादेश द्वारा प्रदान किये जाते हैं। इन अधिकारों का हनन होने पर न्यायालय में वाद दायर कर इनकी रक्षा की जा सकती है। उदाहरण के लिए कुछ विधिक अधिकार निम्नलिखित होते हैं-
- सम्पत्ति का अधिकार
- राजस्थान लोक सेवाओं को प्रदान करने की गारन्टी अधिनियम-2011
- राजस्थान सुनवाई का अधिकार, 2012
- समान काम के लिए समान वेतन का अधिकार
- विधिक सहायता का अधिकार
- सूचना का अधिकार
- उपभोक्ता अधिकार
- मतदान का अधिकार
- प्राथमिक शिक्षा का अधिकार या शिक्षा का गारन्टी अधिनियम
- घरेलू हिंसा के विरुद्ध अधिकार
- लैंगिक उत्पीड़न के विरुद्ध अधिकार
- दहेज के विरुद्ध अधिकार
- पैतृक सम्पत्ति का समान अधिकार
- स्त्रियों और कन्याओं का अनैतिक व्यापार व अश्लील प्रदर्शन के विरुद्ध अधिकार
- न्यूनतम वेतन का अधिकार आदि
सम्पत्ति का अधिकार
इस अधिकार के अनुसार "किसी व्यक्ति को उसकी सम्पत्ति से विधि के प्राधिकार के बिना वंचित नहीं किया जा सकता है।" अर्थात् भारत की संसद या विधानमंडल द्वारा बनाई गई विधि या ऐसा कोई नियम या आदेश जिसे विधि का बल प्राप्त है, द्वारा ही किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित किया जा सकता है। सम्पत्ति के अधिकार का उल्लेख संविधान के भाग-12 के अध्याय-4 में अनुच्छेद (300-A) के अन्तर्गत किया गया। प्रारम्भ में सम्पत्ति का अधिकार मूल अधिकारों में शामिल था जिसका उल्लेख संविधान के भाग-3 में मौलिक अधिकारों के अन्तर्गत अनुच्छेद- 19 (1) च व अनुच्छेद-31 में किया गया था। परन्तु 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के सम्पत्ति के मूल अधिकार को मूल अधिकारों की श्रेणी से हटाकर अनुच्छेद 300-A के द्वारा कानूनन अधिकार बना दिया है। वर्तमान में सम्पत्ति का अधिकार विधिक अधिकार है।
राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान की गारन्टी अधिनियम, 2011
एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए सरकार द्वारा जनता को संवेदनशील, जवाबदेह एवं उत्तरदायी प्रशासन उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राज्य में राजस्थान लोकसेवाओं की प्रदान करने की गारंटी अधिनियम 2011 पारित किया। यह अधिनियम लोक प्राधिकारी (विभिन्न विभागों व राज्य सरकार) द्वारा राज्य की जनता को निश्चित समय-सीमा के भीतर कतिपय सेवाएँ प्रदान करने तथा उनसे जुड़े हुये और आनुषंगिक विषयों के लिए उपबंध करने के लिए राजस्थान राज्य-विधान मण्डल द्वारा वर्ष 2011 में अधिनियम संख्यांक 23 के द्वारा यह अधिनियम पारित किया गया। अधिनियम को 21 सितम्बर 2011 को राज्यपाल महोदय की अनुमति प्राप्त हुई। इस अधिनियम का शुभारम्भ 14 नवम्बर, 2011 को तात्कालिक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा किया गया। इस अधिनियम के अन्तर्गत 18 विभागों से जुड़ी हुई 153 सेवाएँ शामिल है। जुलाई 2021 तक इसमें 221 सेवाएँ शामिल कर ली गई है। जिसमें जनता से दिन-प्रतिदिन से जुड़ी हुई सेवाएँ और लोक कल्याणकारी योजनाएँ निर्धारित समय में उपलब्ध करवानी होंगी।
राजस्थान देश का पहला राज्य है, जिसने लोक सेवा प्रदान करने की गारंटी के साथ-साथ जन सुनवाई की गारंटी का प्रावधान किया है।
अधिनियम का नाम : राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान की गारन्टी अधिनियम, 2011 है। यह राजस्थान राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना की तिथि 21 सितम्बर, 2011 से लागू हुआ इसका अधिकार क्षेत्र सम्पूर्ण राजस्थान है। इस अधिनियम का उद्देश्य लोक प्राधिकारी द्वारा राज्य की जनता को नियत समय सीमा में राज्य सरकार द्वारा निर्धारित सेवाएँ प्रदान करने का कार्य सुनिश्चित करना है। अधिनियम की धारा 2 के अनुसार इस अधिनियम में जब तक संदर्भित न हो पदाभिहित अधिकारी से धारा 3 के अधीन कोई सेवा प्रदान करने के लिए इस विषय में अधिसूचित कोई अधिकारी होगा। धारा 4 में सेवा का अधिकार परिभाषित किया गया हैं।
- यह अधिनियम समस्त 'लोक प्राधिकारी' पर लागू होगा 'लोक प्राधिकारी' में राज्य सरकार और उसके विभाग अभिप्रेत है। धारा-3 के अनुसार पदाभित अधिकारी अधिसूचित सेवा प्राप्त करने के लिए पात्र व्यक्ति को, नियत समय सीमा के भीतर सेवा प्रदान करेगा।
- सेवा के अधिकार से तात्पर्य है नियत समय-सीमा के भीतर धारा-4 के अधीन सेवा प्राप्त करने का अधिकार है।
- सेवा प्राप्त करने वाले को सुनवाई नहीं होने पर अपील का अधिकार होगा।
- इस अधिनियम के अन्तर्गत अधिकारी को सेवा चाहने वाले अधिकृत व्यक्ति से प्राप्त आवेदन की पावती देनी होगी और सेवा प्रदान करने की समय सीमा उल्लिखित करनी होगी। इसमें आवेदन देने तिथि भी अंकित करनी होगी।
- यदि किसी व्यक्ति का आवेदन ना मंजूर हो जाये और निर्धारित समय सीमा में कोईसेवा प्रदान नहीं की जाती तो 30 दिन के अन्तर्गत प्रथम अपीलीय अधिकारी को अपील की जा सकती है।
- यदि किसी विभाग का कोई अधिकारी या कर्मचारी निर्धारित समय सीमा में सेवा उपलब्ध नहीं करवाता है और अनावश्यक विलम्ब करता है तो उसे प्रतिदिन 250 का आर्थिक दण्ड दिया जा सकता है। दण्ड की अधिकतम सीमा 5000 होगी जो अधिकारी या कर्मचारी के वेतन से वसूली जाएगी।
योजना एक नजर में
- शुभारम्भ- 14 नवम्बर, 2011 से, मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत द्वारा जयपुर से।
- प्रारम्भ में प्रदेश के 15 विभागों के 53 विषयों की 108 सेवाओं के तहत आम आदमी को एक निश्चित समय सीमा में कार्य करने के उद्देश्य से इसे लागू किया था। जुलाई 2021 तक 25 विभागों की 221 सेवाएँ चिन्हित की गई है।
- अब 18 विभागों की कुल 153 सेवाएँ इसमें शामिल हो गई हैं।
- अधिनियम के तहत शामिल विभागों का कोई भी अधिकारी इन घोषित सेवाओं को निर्धारित समय सीमा में प्रदान नहीं करता है तो कम से कम ₹ 500 से लेकर अधिकतम ₹ 5 हजार तक के आर्थिक दण्ड का प्रावधान किया गया है।
अधिनियम को प्रभावी बनाने के उद्देश्य से ही नियत समय सीमा में कोई सेवा प्रदान नहीं की जाती है तो आंदोलन के नामंजूर होने या नियत समय सीमा की सीमा समाप्त होने की तारीख से 30 दिवस के भीतर प्रथम अपील अधिकारी को अपील प्रस्तुत की जा सकती है। प्रथम अपील अधिकारी के निर्णय के विरुद्ध 60 दिवस के भीतर द्वितीय अपील अधिकारी को दूसरी अपील करने का प्रावधान किया गया है। अधिनियम के तहत अच्छा कार्य करने वाले जिले तथा उत्कृष्ट कार्य करने वाले अधिकारियों एवं कर्मचारियों को पुरस्कृत करने का प्रावधान भी किया गया है। मुख्यमंत्री की मंशा आम आदमी को समय पर सेवाएँ सुलभ करवाकर उसे लाभान्वित करना है।
राज्य की जनता को दिन-प्रतिदिन के कार्य से एक निश्चित समय-सीमा में सेवाएँ उपलब्ध कराने हेतु राजस्थान सरकार ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान करने की गारंटी अधिनियम-2011 विधानसभा द्वारा पारित करवाया है।
आमजन की सक्रिय भागीदारी के साथ अधिकारी व कर्मचारी समयबद्ध सेवाएँ प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
एक्ट के मुख्य प्रावधान
- इसमें जनता से जुड़े 15 विभाग यथा ऊर्जा, पुलिस, चिकित्सा, शिक्षा, यातायात, जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी, राजस्व, स्थानीय निकाय, नगरीय विकास, आवासन, खाद्य, वित्त, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता, सार्वजनिक निर्माण, जल संसाधन एवं जिला प्रशासन को सम्मिलित किया गया है।
- इन विभागों के अन्तर्गत आम जनता से सम्बन्धित दिन-प्रतिदिन के कार्य एवं कल्याणकारी योजनाओं के 53 विषयों की 108 सेवाओं को निर्धारित समय-सीमा में उपलब्ध कराने की गारंटी। आवश्यकता होने पर और अधिक सेवाओं को जोड़ा जा सकता है। वर्तमान में 25 विभागों की 221 सेवाएँ शामिल है।
- किसी विभाग का कोई अधिकारी/कर्मचारी उसकी परिधि में घोषित सेवाओं को निर्धारित समय-सीमा में प्रदान नहीं करता है तो, कम से कम 500 से लेकर अधिकतम 5 हजार तक के आर्थिक दण्ड का प्रावधान।
- यदि वह सेवा प्रदान करने में अनावश्यक विलम्ब करता है तो प्रतिदिन ₹ 250 (अधिकतम ₹ 5 हजार) का आर्थिक दण्ड।
- दण्ड की राशि उत्तरदायी अधिकारी/कर्मचारी के वेतन से वसूलने का प्रावधान। उक्त राशि आवेदनकर्त्ता को क्षतिपूर्ति में भी दी जा सकती है।
- अधिकारी अथवा उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति द्वारा आवेदक को पावती देनी होगी।
- आवेदन के साथ आवश्यक दस्तावेज संलग्न किए गए हैं तो पावती में निश्चित की गई समय सीमा का उल्लेख किया जाएगा।
- आवेदन के साथ आवश्यक दस्तावेज संलग्न नहीं किए गए हैं तो उसका स्पष्ट उल्लेख पावती में किया जाएगा और ऐसी पावती में, निश्चित की गई समय सीमा का उल्लेख नहीं किया जाएगा।
आवेदन प्रक्रिया
सर्वप्रथम आवेदक सेवा प्रदान करने के लिए जिम्मेदार अधिकारी को आवश्यक दस्तावेजों के साथ आवेदन प्रस्तुत करेगा।
सेवा प्रदान करने के लिए अधिकारी नियत समय सीमा के भीतर पात्र व्यक्ति को सेवा प्रदान करेगा।
नामित व्यक्ति प्राप्त आवेदन पर नियत समय सीमा के भीतर या तो वांछित सेवा प्रदान करेगा या आवेदन को नामंजूर करेगा।
नियत समय सीमा, अधिकारी को आवेदन प्रस्तुत करने की तारीख से प्रारम्भ होगी।
किसी सेवा से इंकार या विलम्ब किए जाने की स्थिति में आवेदक को इंकार या विलम्ब का कारण बताया जाएगा, साथ ही इस फैसले के विरुद्ध अपील किए जाने की अवधि, सीमा और सम्बन्धित अपीलीय प्राधिकारी का विवरण सहित सभी सूचना देगा।
पारदर्शिता
अधिकारी, आम जनता की सुविधा के लिए सेवाओं से संबंधित सुसंगत जानकारी कार्यालय के किसी सहज दिखने वाले स्थान पर नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित कराएगा। नोटिस बोर्ड पर अधिसूचित सेवाएँ प्राप्त करने के लिए आवेदन के साथ दिए जाने वाले आवश्यक दस्तावेज प्रदर्शित किए जाएँगे।
सूचना एवं संचार तकनीकी के उपयोग के माध्यम से सेवा परिदान सहित, इस अधिनियम के अधीन अधिसूचित सेवाओं के समय पर परिदान और अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों की केन्द्रीयकृत मॉनीटरिंग के लिए राज्य सरकार एक प्रणाली स्थापित कर सकेगी।
अपील का अधिकार
प्रथम अपील
यदि किसी व्यक्ति का आवेदन नामंजूर कर दिया जाता है या नियत समय सीमा में कोई सेवा प्रदान नहीं की जाती है तो आवेदन के नामंजूर होने या नियत समय-सीमा की समाप्ति होने की तारीख से तीस दिवस के भीतर प्रथम अपील अधिकारी को अपील फाइल कर सकता है।
प्रथम अपील अधिकारी अपील का निर्णय 21 दिन में करेगा तथा सम्बन्धित नामित अधिकारी को तय समय-सीमा के भीतर सेवा प्रदान करने का आदेश दे सकेगा या अपील को नामंजूर कर सकेगा।
यदि नामित अधिकारी किसी आवेदक से आवेदन स्वीकार नहीं करता है तो ऐसा आवेदक प्रथम अपील अधिकारी को सीधे ही आवेदन प्रस्तुत कर सकेगा। इस आवेदन का निस्तारण प्रथम अपील के तरीके से ही किया जाएगा।
द्वितीय अपील
प्रथम अपील अधिकारी के निर्णय के विरुद्ध साठ दिवस के भीतर द्वितीय अपील अधिकारी को दूसरी अपील की जा सकेगी।
द्वितीय अपील अधिकारी, तय कालावधि के भीतर जिम्मेदार अधिकारी को सेवा प्रदान करने का आदेश दे सकेगा या अपील को नामंजूर कर सकेगा। द्वितीय अपील अधिकारी, सेवा प्रदान करने का आदेश प्रदान करने के साथ नामित अधिकारी/प्रथम अपील अधिकारी पर शास्ति अधिरोपित कर सकेगा।
अपील के सम्बन्ध में विशिष्ट प्रावधान
- अपील आवेदन के साथ कोई शुल्क देय नहीं होगा।
- प्रत्येक दशा में अपीलार्थी को सुनवाई की तारीख से कम से कम 7 दिन पूर्व सूचित किया जाएगा।
- प्रथम अपील अधिकारी एवं द्वितीय अपील अधिकारी को दस्तावेजों के निरीक्षण एवं संबंधितों के सम्मन जारी करने के मामलों में वही शक्तियाँ होंगी, जो किसी वाद को विचार करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन सिविल न्यायालय में निहित होती हैं।
अपील के साथ आवश्यक दस्तावेज एवं जानकारी
प्रथम अपील अधिकारी एवं द्वितीय अपील अधिकारी को प्रस्तुत आवेदन में निम्नलिखित जानकारी शामिल होनी चाहिए।
- अपीलार्थी का नाम और पता।
- उस नामित अधिकारी, प्रथम अपील अधिकारी का नाम और पता जिसके निर्णय के विरुद्ध अपील प्रस्तुत की गई है उस आदेश की स्वप्रमाणित प्रति, जिसके विरुद्ध अपील की गई है।
- यदि अपील नामित अधिकारी द्वारा आवेदन को अस्वीकार करने के विरुद्ध की गई है, तो आवेदन की तारीख तथा उस नामित अधिकारी का, जिसको आवेदन किया गया था, का नाम और पता।
- अपील के आधार एवं चाही गई राहत।
- अपील आवेदन के साथ संलग्न दस्तावेजों की सूची।
- कोई अन्य सुसंगत जानकारी जो अपील का निस्तारण करने के लिए आवश्यक हो।
विशेष प्रावधान जो केवल राजस्थान के विधेयक में ही हैं
एक्ट में केवल राज्य सरकार के विभाग ही नहीं, बल्कि निकाय, बोर्ड, निगम, विश्वविद्यालय एवं ऐसी संस्थाएँ, जिन्हें राज्य सरकार से सहायता प्राप्त होती है, को शामिल किया जा सकता है। जलदाय विभाग, जल संसाधन विभाग, सार्वजनिक निर्माण विभाग, स्थानीय निकाय विभाग आदि द्वारा ली जाने वाली जमानत राशि एवं धरोहर राशि को समयबद्ध लौटाने का प्रावधान। सेवानिवृत्त अधिकारियों/कर्मचारियों के पेंशन व अन्य समस्याओं के प्रकरणों को समयबद्ध निस्तारण की व्यवस्था।
ऊर्जा से संबंधित नए विद्युत कनेक्शन के साथ-साथ विद्युत बिलों को ठीक कराना, मीटर बदलवाना, विद्युत सप्लाई को ठीक करवाना आदि से सम्बन्धित सेवाएँ।
जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के अन्तर्गत हैण्डपम्प ठीक करवाने, जल सप्लाई में खराबी को ठीक करवाने, पानी के बिलों को ठीक करवाने तथा मीटर बदलवाने, फाइनल बिल, टाइम एक्सटेंशन एवं डेवियेशन को शामिल किया गया है।
स्थानीय निकाय द्वारा जारी की जाने वाली सभी तरह की एवं निकायों द्वारा जारी किए जाने वाले सभी प्रकार के लाइसेंस शामिल किए गए हैं।
नगरीय विकास विभाग व स्थानीय निकाय के अन्तर्गत भवन निर्माण स्वीकृतियाँ, भूखण्ड उप विभाजन, पुनर्गठन, सामुदायिक केन्द्रों का आरक्षण, दस्तावेज/मानचित्र की प्रति प्राप्त करना शामिल किया गया है।
आवासन मण्डल की सेवाएँ सिर्फ इसी राज्य में शामिल की गई हैं।
पुरस्कार
इस अधिनियम के तहत राज्य में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान पर आने वाले जिलों तथा अधिकारियों व कर्मचारियों को एक करोड़ ₹ की राशि के पुरस्कार देने की घोषणा की है। इसके तहत प्रथम जिले को 25 लाख, द्वितीय जिले को 15 लाख व तृतीय स्थान पर रहने वाले जिले को 10 लाख का पुरस्कार दिया जाएगा। इस अधिनियम के क्रियान्वयन में राज्य में उत्कृष्ट कार्य करने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों को पुरस्कृत करने के लिए 50 लाख का प्रावधान किया गया है।
उपलब्धि
राज्य में आधुनिक भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के जन्म दिवस 14 नवम्बर, 2011 से राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान करने की गारंटी अधिनियम-2011 को सम्पूर्ण राज्य में लागू कर समयबद्धता के साथ लोक सेवाएँ उपलब्ध करवाई जा रही हैं।
राजस्थान सुनवाई का अधिकार अधिनियम, 2012
- अधिनियम का नाम: राजस्थान सुनवाई का अधिकार अधिनियम, 2012
- लागू- 1 अगस्त, 2012 से
- प्रसार क्षेत्र- सम्पूर्ण राजस्थान
राज्य की जनता को नियत समय-सीमाओं के भीतर सुनवाई का अधिकार प्रदान करने तथा उनमें सुसंगत और आनुषंगिक विषयों के लिए उपबंध करने के लिए राजस्थान विधानसभा द्वारा विधेयक संख्या 22/2012 के द्वारा यह अधिनियम पारित किया गया। इसका प्रसार सम्पूर्ण राजस्थान राज्य में होगा। इस अधिनियम को प्रभावी बनाने के लिए एकल खिड़की व्यवस्था लागू की गई। ग्राम पंचायत स्तर पर कार्य दिवसों में प्रतिदिन 10 से 12 बजे तक सुनवाई की जायेगी। परिवाद प्राप्त होने के बाद उसकी रसीद भी जारी की जायेगी। परिवाद तहसील या ब्लॉक पर जाने से सुनवाई उपखण्ड अधिकारी द्वारा प्रत्येक शुक्रवार को की जायेगी। राज्य सरकार ने आम जन को राहत पहुँचाने एवं समयबद्ध सेवाएँ प्रदान करना सुनिश्चित करने के लिए 14 नवम्बर, 2011 से राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान की गारण्टी अधिनियम, 2011 लागू किया गया और आम नागरिकों के अभाव, अभियोगों तथा शिकायतों की सुनवाई एवं निस्तारण हेतु 1 अगस्त, 2012 से राजस्थान सुनवाई का अधिकार अधिनियम, 2012 लागू किया। यह अधिनियम राजस्थान राज्य विधान-मण्डल द्वारा पारित किया गया, जिसे राज्यपाल महोदया की अनुमति दिनांक 21 मई, 2012 को प्राप्त हुई। राजस्थान सुनवाई का अधिकार अधिनियम, 2012 (2012 का अधिनियम सं. 22) की धारा 12 की उप-धारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए राज्य सरकार द्वारा जून 7, 2012 को नियम बनाये गये। यह कानून राजस्थान लोक सेवा अदायगी अधिनियम, 2011 का अनुगामी पूरक कानून है। इस अधिनियम का उद्देश्य नागरिकों को जनसुनवाई का मौका उनके आवास स्थान के निकट जैसे-ग्राम पंचायत, तहसील, उपखण्ड या जिला स्तर पर, तय शुदा समय-सीमा में उपलब्ध कराना है। यह अधिनियम राज्य सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा राज्य सरकार के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वित्त घोषित निकायों, संस्था तथा निगम में 'लोक सुनवाई प्राधिकारी' की स्थापना का प्रावधान करता है।
- विभाग का लोक सुनवाई अधिकारी तय समय में परिवादी को सुनवाई का अवसर देगा। इसकी सूचना लोक सुनवाई अधिकारी को अपने कार्यालय के बाहर बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में लगानी होगी।
- अगर किसी लोक सुनवाई अधिकारी ने सुनवाई से इन्कार किया तो परिवादी असन्तुष्ट होने पर प्रथम अपील प्राधिकारी (First Appellate Authority) को अपील कर सकेगा। प्रथम अपील प्राधिकारी लोक सुनवाई अधिकारी उसके द्वारा विनिर्दिष्ट समयावधि में परिवादी को सुनवाई का अवसर प्रदान करने का आदेश दे सकेगा या अपील खारिज कर सकेगा। प्रथम अपील प्राधिकारी को अपील फाइल किये जाने की तारीख से 21 दिन की सीमा में अपील का निपटारा करना होगा।
- प्रथम अपील प्राधिकारी के विनिश्चय के विरूद्ध द्वितीय अपील प्राधिकारी (Second Appellate Authority) को 30 दिन के भीतर अपील की जा सकेगी।
- प्रथम अपील प्राधिकारी व द्वितीय अपील प्राधिकारी को किसी अपील का विनिश्चय करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन सिविल न्यायालय की शक्तियाँ होगी।
- शास्ति अधिरोपित करने के संबंध में द्वितीय अपील प्राधिकारी के किसी आदेश द्वारा व्यथित लोक सुनवाई अधिकारी या प्रथम अपील प्राधिकारी उस आदेश की तारीख से 60 दिन की कालावधि के भीतर राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट अधिकारी या प्राधिकारी को पुनरीक्षण (Revision) के लिए आवेदन कर सकता है। नामनिर्दिष्ट अधिकारी या प्राधिकारी विहित प्रक्रिया के अनुसार आवेदन का निपटारा कर सकेगा।
- राज्य सरकार ने अपने अपने विभागों के प्रभारी सचिवों को पुनरीक्षण प्राधिकारी के रूप में नामनिर्दिष्ट किया है।
- नामनिर्दिष्ट लोक सूचना अधिकारी, प्रथम अपील अधिकारी, द्वितीय अपील प्राधिकारी एवं पुनरीक्षण अधिकारी के कार्यालयों में समस्त रिकॉर्ड नियम 19 में वर्णित पंजिकाओं में संधारित किये जायेंगे।
- लोक सेवक, सूचना का अधिकार, लोक सेवा गारण्टी के मामले शामिल नहीं होंगे।
- अधिनियम में सूचना और सुगम केन्द्र (Information and Facilitation Centre) ग्राहक सेवा केन्द्र (Customer Care Centre), कॉल सेण्टर (Call Centre), हैल्प डेस्क (Help Desk), और जन सहायता केन्द्रों (People's Support Centre) की स्थापना किये जाने का प्रावधान है। ये केन्द्र शहरों से लेकर पंचायत स्तर तक खोले गये हैं।
- शपथ पत्र की अनिवार्यता समाप्त, दस्तावेज स्वःप्रमाणित लगाया जाना।
राज्य सरकार ने 1 जनवरी, 2015 से शपथ पत्र देने की व्यवस्था को समाप्त कर दिया है एवं स्वयं की प्रमाणित प्रतिलिपियाँ लगाने की व्यवस्था निम्नानुसार की गई है-
- विद्यालय में प्रवेश के लिए आवेदन के साथ लगने वाले दस्तावेज एवं राजकीय, स्थानीय निकाय, पंचायतीराज संस्थाएँ, राजकीय उपक्रम इत्यादि में नौकरी के आवेदन के साथ लगने वाले दस्तावेज।
- जब तक कोई वैधानिक आवश्यकता नहीं हो, राज्य सरकार का कोई भी विभाग, स्थानीय निकाय, पंचायती राज संस्थाएँ, राजकीय उपक्रम में प्रवेश के लिए, नौकरी के आवेदन के साथ, योजनाओं एवं कार्यक्रमों के अन्तर्गत शपथ पत्र के स्थान पर आवेदक की स्वयं की घोषणा लिये जाने की व्यवस्था।
अप्रचलित तथा अप्रासंगिक अधिनियमों को निरस्त किया जाना:-
आम जन को सरल कानूनी व्यवस्था उपलब्ध कराने हेतु 61 मूल अधिनियम तथा 187 संशोधन अधिनियमों को राजस्थान विधानसभा द्वारा Rajasthan Laws Repealing Bill, 2015 के द्वारा निरस्त कर दिया गया है।
अपना जिला-अपनी सरकार
'अपना जिला - अपनी सरकार' कार्यक्रम के तहत माननीय मुख्यमंत्री, जिलों में जाकर जनप्रतिनिधियों से मिलकर स्थानीय समस्याओं का फीड बैंक लेना, आमजन की समस्याएँ सुनकर उनका निवारण, राजकीय कार्यालयों का औचक निरीक्षण करके सुधारात्मक कदम उठा रही हैं। इस दिशा में 30 सितम्बर से 2 अक्टूबर तक सवाईमाधोपुर, 23 से 25 अक्टूबर तक बाड़मेर एवं 28 से 30 अक्टूबर तक नागौर जिलों का दौरा किया जा चुका है।
'सरकार आपके द्वार' कार्यक्रम
जनता से सीधा सम्पर्क स्थापित करने की दिशा में राज्य सरकार ने एक 'अनूठा 'सरकार आपके द्वार' कार्यक्रम प्रारम्भ किया। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत माननीया मुख्यमंत्री एवं माननीय मंत्रीगण संभागों के गाँव-गाँव तक जाकर आमजन की परेशानियाँ सुनते हैं ओर उनका त्वरित गति से हल निकालने का प्रयास करते हैं।
संभागीय स्तर पर जन सुनवाई और कैबिनेट बैठक का कार्यक्रम जनता में विश्वास कायम रखने का अभिनव प्रयोग है।
सरकार आपके द्वार कार्यक्रम की शुरुआत दिनांक 09.02.2014 से 18.02.2014 के मध्य भरतपुर संभाग में की गई। तत्पश्चात् दिनांक 19.06.2014 से 30.06.2014 के मध्य बीकानेर संभाग एवं दिनांक 16.08.2014 से 25.08.2014 के दौरान उदयपुर संभाग का दौरा किया गया।
यह प्रयास ग्रामीण एवं दूर दराज के गरीब लोगों के बीच सरकार का स्वयं उनके द्वार पर जाकर उनकी समस्याएँ सुनने, प्रार्थना पत्र/परिवेदना प्राप्त करने का एक अनुपम कार्यक्रम साबित हुआ है। सरकार की मंशा के अनुरूप ऐसी व्यवस्था कायम की गई जिससे गाँव के लोगों को अपने कामों के लिए जयपुर के चक्कर नहीं लगाने पड़ें एवं उनके सभी काम स्थानीय स्तर पर ही हो जाएं।
सरकार आपके द्वार कार्यक्रम के अन्तर्गत नागरिकों से प्राप्त कुल परिवेदनाएँ 3,07,373 में से 3,05,996 यानी 99.55% निस्तारित।
शिकायत निवारण हेतु राजस्थान सम्पर्क
माननीय मुख्यमंत्री, माननीय मंत्रीगण एवं अधिकारीगण को प्राप्त सभी प्रार्थना पत्रों एवं परिवेदनाओं के समयबद्ध निस्तारण हेतु राजस्थान सम्पर्क पोर्टल विकसित किया गया है।
इस पर सभी आवेदन पत्रों/परिवेदनाओं को दर्ज किया जाता है। यह नागरिकों की परिवेदनाओं के निस्तारण एवं मॉनिटरिंग का कम्प्यूटर तकनीक आधारित एक इन्टीग्रेटेड पोर्टल है। राजस्थान सम्पर्क पोर्टल www.sampark.rajasthan.gov.in के माध्यम से क्रियान्वित कर दिया गया है।
- रसीद का अधिकार -राज्य सरकार ने आमजन को रसीद का अधिकार प्रदान किया है जिसके अन्तर्गत प्रार्थना पत्र/शिकायतकर्ता नागरिकों को प्राप्ति रसीद जारी किया जाना आवश्यक किया गया है। प्राप्त इन सभी शिकायतों को राजस्थान सम्पर्क पोर्टल पर दर्ज किया जाता है और शिकायतकर्त्ता अपने प्राप्ति रसीद के आधार पर पोर्टल पर अपनी शिकायत की स्थिति की जानकारी प्राप्त कर सकता है।
- राजस्थान सम्पर्क पोर्टल के अतिरिक्त SMS, Call Centre एवं e-Mitra Kiosk से भी जन समस्याओं का आवेदन कर वर्तमान स्थिति की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। फोन नं. 181 के द्वारा जन शिकायत फोन के माध्यम से सुनी जाती है व निराकरण किया जाता है।
पब्लिक वेलफेयर पोर्टल (PWP)
राजस्थान सरकार द्वारा 18 दिसम्बर, 2020 को अपने दो वर्ष पूरे किये गये। इस अवसर पर राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सम्पूर्ण जनता को एक ही स्थान पर सभी योजनाओं की पात्रता, शर्तें व लाभ की जानकारी देने के लिये पब्लिक वेलफेयर पोर्टल शुरू किया गया। यह अपनी तरह का एक मात्र पोर्टल है जिसमें सरकार की उपलब्धियों एवं नवाचारों की जानकारी, आम जन के लिए उपयोगी परिपत्र व आदेशों का संकलन एक स्थान पर प्रदर्शित किया गया है।
राजस्थान जन सूचना पोर्टल
आमजन को व्यापक रूप से सरकारी विभागों से जुड़ी सूचनाएँ बिना मांगे उपलब्ध कराने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा 12 सितम्बर, 2019 को सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग द्वारा तैयार किये गये जनसूचना पोर्टल का उद्घाटन किया। इसका उद्देश्य प्रदेश के सरकारी विभागों में पारदर्शिता और जिम्मेदारी बढ़ाने के लिए किया गया है। सरकार से सूचना लेने के लिए लोगों को किसी भी प्रकार की आर.टी.आई. लगाने की आवश्यकता नहीं रहेगी। इस पोर्टल के माध्यम से वर्तमान में आम जनता से जुड़े 55 सरकारी विभागों की 99 योजनाओं की जानकारी एक ही पीठ पर मिल जायेगी। सूचनाओं की जानकारी के लिए मोबाइल एप भी शुरू किया गया है। ऐसा पोर्टल शुरू करने वाला राजस्थान देश का पहला राज्य बन गया है।

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