राजस्व मण्डल
यह लेख राजस्थान के राजस्व प्रशासन की रीढ़ माने जाने वाले राजस्व मण्डल की स्थापना, इतिहास, संरचना, शक्तियों और कार्यों को विस्तार से लेकिन सहज भाषा में प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार राजस्व मण्डल राज्य में भूमि, कृषि और राजस्व से जुड़े विवादों के निस्तारण हेतु सर्वोच्च अर्द्ध-न्यायिक संस्था के रूप में कार्य करता है और काश्तकारों को शीघ्र व सुलभ न्याय उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
लेख में राजस्व मण्डल के ऐतिहासिक विकास, संगठनात्मक ढांचे, प्रशासनिक एवं न्यायिक कार्यों, भू-अभिलेख, कृषि सांख्यिकी, पशुगणना, ई-गवर्नेंस, डिजिटल भूमि अभिलेख और लोक अदालतों जैसी पहलुओं को व्यावहारिक दृष्टि से समझाया गया है। साथ ही इसमें सुधार समितियों की सिफारिशें और आधुनिक तकनीक के माध्यम से राजस्व प्रशासन को अधिक पारदर्शी व जनोन्मुख बनाने के प्रयासों को भी दर्शाया गया है। कुल मिलाकर यह सामग्री राजस्व मण्डल को केवल एक कार्यालय नहीं, बल्कि राजस्थान में भूमि और न्याय व्यवस्था का सशक्त स्तंभ बनाकर प्रस्तुत करती है।
राजस्व मण्डल, राज्य प्रशासन में राजस्व सर्वोच्च अभिकरण है। राजस्व मण्डल एक अर्द्धन्यायिक निकाय है जो राज्य में राजस्व मामलों की सुनवाई करता है। राजस्थान में राजस्व मामलों के शीर्ष न्यायालय के रूप में राजस्व मण्डल की स्थापना राजप्रमुख के अध्यादेश संख्या 22, द्वारा 1919 में की गई, किन्तु इसकी वास्तविक प्रवर्तन तिथि 1 नवम्बर, 1949 मानी जाती है। इसकी स्थापना 7 अप्रैल, 1949 में हुई थी। सन् 1956 में उक्त अध्यादेश के स्थान पर राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 लागू किया गया है। अधिनियम के तहत् राजस्व मण्डल राजस्व मामलों में अपील, निगरानी तथा सन्दर्भ के शीर्षस्थ न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायालयों के प्रशासनिक नियंत्रक के रूप में कार्यरत् है। इसका मुख्यालय अजमेर है तथा सर्किट बेंच जयपुर में स्थित है।
राजस्व मामलों में शीर्षस्थ न्यायालय होने के साथ-साथ राजस्व मण्डल विभिन्न अधिनियमों के अन्तर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए भी राज्य सरकार का एक प्रशासनिक संस्था है। राजस्व मण्डल प्रशासनिक विभाग की ओर से सक्रिय भूमिका निभाता है, तथा राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व करता है। राजस्व प्रशासन के संचालन के लिए तथा राजस्व न्यायालयों पर नियंत्रण तथा भूमि संबंधी कानूनों को लागू करने के लिए राजस्व मण्डल के अपने कार्मिक होते हैं। राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम एवं उनके अन्तर्गत बनाये गए नियमों की क्रियान्विति संभागीय आयुक्त, जिला कलेक्टर, उनके अधीनस्थ, अतिरिक्त जिला कलेक्टरों, उपखण्ड अधिकारियों सहायक जिला कलेक्टरों एवं कार्यपालक दण्डनायक तथा तहसीलदारों द्वारा की जाती है। राज्य में 7 संभागीय आयुक्त राजस्व अपीलीय प्राधिकारी के रूप में कार्य करते हैं। सम्भाग के अधीन 4-5 जिले होते हैं।
इतिहास
राज्य प्राचीन काल से ही भूमि, कृषि तथा उनके प्रशासन का पर्याय रहा है। भू-क्षेत्रीयता तथा जनसंख्या राज्य के भौतिक एवं चेतनमय तत्व माने जाते हैं। इनमें भी कृषि भूमि तथा कृषक सर्वोपरि है। इन्हीं कारणों से ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारतवर्ष में अपने शासन की जड़ें जमाने के लिए प्रशासनिक संस्था के रूप में राजस्व मण्डल की स्थापना की गई। 1786 में भारत में सर्वप्रथम बंगाल प्रेसिडेंसी में राजस्व मण्डल की स्थापना ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा की गई जिसका अनुसरण सभी देशी रियासतों ने किसी न किसी रूप में किया।
राजपूताना क्षेत्र में रियासतों के राजस्व कार्य हेतु अपने-अपने कानून थे तथा स्थानीय आवश्यकतानुसार इन कानूनों का विकास हुआ। बड़ी रियासतों यथा जयपुर, जोधपुर, उदयपुर तथा बीकानेर के स्वयं के काश्तकारी व भू-राजस्व कानून थे, जबकि कुछ छोटी रियासतों में विभिन्न परिपत्रों एवं परम्पराओं द्वारा राजस्व सम्बन्धी कार्य किया जाता रहा था। भू-राजस्व की व्यवस्था सामंतशाही थी तथा बिचौलिये एवं जागीरी प्रथा राजस्व व्यवस्था में परिलक्षित रही। यह सम्पूर्ण व्यवस्था किसानों के शोषण की परिचालक थी।
राजस्व समस्याओं को हल करने के लिए राजस्थान के एकीकरण के समय राजस्थान में शामिल होने वाली रियासतों के उच्च बन्दोबस्त और भू-अभिलेख विभाग का पुनर्गठन किया गया। संयुक्त राजस्थान राज्य के निर्माण के पश्चात् राजप्रमुख ने 7 अप्रैल 1949 को अध्यादेश की उद्घोषणा द्वारा राजस्व मण्डल की स्थापना की गई। यह नवम्बर, 1949 में प्रवर्तन में आया। जिसने बीकानेर, जयपुर, जोधपुर, मत्स्य तथा पूर्व राजस्थान के राजस्व मण्डलों का स्थान ले लिया।
इस प्रकार राजस्व मण्डल, राजस्थान, राजस्व मामलों में अपील रिवीजन (पुर्नव्याख्या) तथा सन्दर्भ का उच्चतम न्यायालय बन गया, साथ ही उसे भू-अभिलेख प्रशासन तथा अन्य विधियों का प्रशासन भी सौंपा गया। इसका प्रमुख उद्देश्य काश्तकारों को भूमि संबंधी विवादों में शीघ्र व सस्ता न्याय दिलवाना है।
संगठनात्मक संरचना
राजस्थान राजस्व भू अधिनियम 1956 की धारा 4 के अनुसार राजस्व मण्डल में 1 अध्यक्ष तथा अन्य सदस्यों की व्यवस्था की गई है। सदस्यों की संख्या 3-15 तक हो सकती है। राजस्थान राजस्व मण्डल में एक अध्यक्ष तथा 20 सदस्य शामिल है। इनमें भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी, राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी, राजस्थान उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारी तथा अभिभाषक शामिल है। राजस्थान राजस्व मण्डल के प्रथम अध्यक्ष बृजचंद शर्मा थे और वर्तमान में राजेश्वर सिंह है।
राजस्व मण्डल का अध्यक्ष भारतीय प्रशासनिक सेवा (I.A.S.) का वरिष्ठ अधिकारी होता है। जिसकी नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है, तथा वह उसके प्रसादपर्यन्त पद पर बना रहता है। अध्यक्ष के द्वारा सभी पर नियंत्रण, निरीक्षण, समन्वय एवं पर्यवेक्षण का कार्य किया जाता है। अध्यक्ष राजस्व मण्डल से सम्बन्धित मामलों की सुनवाई हेतु विभिन्न पीठों (Branch) की स्थापना करता हैं। इनमें से अधिकांश पीठें एक सदस्यीय होती है। द्विस्दस्यीय बैंच भी स्थापित की जाती है। सम्पूर्ण मण्डल की पीठ का पूर्ण बेंच के रूप में गठन बहुत ही कम हो पाता है।
राजस्व मण्डल के अन्य सदस्यों हेतु योग्यताएँ निम्नलिखित हैं-
12 वर्ष की सेवा (कम से कम) पूर्ण कर चुका भारतीय प्रशासनिक सेवा का सदस्य
राजस्थान उच्च न्यायिक सेवा का सदस्य जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने की योग्यता रखता हो
अधिवक्ता से उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता रखता हो।
उपरोक्त में से द्वितीय एवं तृतीय वर्ग के राजस्व मण्डल के सदस्य के रूप में नियुक्ति हेतु सिफारिश एक उच्चस्तरीय समिति द्वारा की जाती है जो-
राजस्व कानून एवं प्रशासन का ज्ञान रखती है।
यह राज्य के न्यायिक एवं राजस्व न्यायालयों में राजस्व मुकदमों की पैरवी को अनुभव के आधार पर सदस्यों की सिफारिश करती है।
समिति में शामिल है-
- राजस्थान उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश- अध्यक्ष।
- राजस्थान राज्य सेवा आयोग का अध्यक्ष- सदस्य।
- राजस्थान राज्य का मुख्य सचिव- सदस्य।
- राजस्थान राजस्व मण्डल का अध्यक्ष- सदस्य।
- राजस्थान सरकार का प्रमुख शासन सचिव, राजस्व विभाग- सदस्य सचिव।
राजस्व मण्डल में एक रजिस्ट्रार भी होता है। जो भारतीय प्रशासनिक सेवा का वरिष्ठ अधिकारी होता है। यह मुख्य पर्यवेक्षक है तथा अनुभागों पर प्रशासनिक नियंत्रण रखता है।
प्रशासनिक कार्य
राजस्व मण्डल की प्रशासन शाखा द्वारा राजस्व मण्डल एवं अधीनस्थ कार्यालयों में पदस्थापित राजपत्रित अधिकारियों एवं कर्मचारियों के संस्थापन सम्बन्धी समस्त कार्य एवं प्रशासनिक कार्य किये जाते हैं।
न्यायिक कार्य
न्यायिक कार्य राजस्व मण्डल की न्यायिक शाखा द्वारा सम्पादित किये जाते हैं। राजस्व मण्डल के अध्यक्ष तथा सदस्यों द्वारा राजस्व मुकदमों की सुनवाई एवं निस्तारण किया जाता है। राजस्व मण्डल का अधिकार क्षेत्र सम्पूर्ण राजस्थान है। अध्यक्ष अपने अधिकार क्षेत्र के कार्य विभाजन हेतु सक्षम है। राजस्व वाद, सदस्यों की एकलपीठ तथा खण्डपीठ एवं वृहदपीठ, जिसमें दो या दो से अधिक सदस्य होंगे, द्वारा सुने जा सकते है।
राजस्व भू-राजस्व अधिनियम 1956, राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955, राजस्थान उपनिवेशन अधिनियम 1971 राजस्थान भूमि सुधार एवं जागीर पुनर्गहण अधिनियम आदि प्रमुख अधिनियम इसके क्षेत्राधिकार अन्तर्गत है। निबन्धक (रजिस्ट्रार) की प्रमुख न्यायिक शक्तियाँ एवं कर्त्तव्य निम्न हैं-
- वारण्ट पर हस्ताक्षर, जारी करने का नोटिस, अन्य हुक्मनामों को जारी करने सम्बन्धी सभी मामलों का निस्तारण।
- अपील अथवा आपत्तियों के किसी ज्ञापन, याचिका अथवा आवेदन पत्र में औपचारिक कमियों को दूर करने हेतु अनुमति।
- गवाहों के खर्चों तथा भत्तों के भुगतान से सम्बन्धित मामलों पर कार्यवाही करना।
- निर्देश देना कि कोई मामला मण्डल के सम्मुख रखा जाये।
राजस्व मण्डल में राजस्व मुकदमों को दायर निस्तारण एवं न्यायालय सम्बन्धी समस्त कार्य एवं प्रक्रिया के सम्बन्ध में (आवश्यक प्रावधान राजस्थान रेवेन्यू कोर्ट मैन्यूल 1956 में) प्रकाशित किये गये है। निर्णयों एवं दस्तावेजों की वांछित प्रतिलिपि प्राप्ति हेतु पृथक सेल स्थापित किये गये हैं।
भू-अभिलेख शाखा
राजस्थान भू-राजस्व नियमावली 1957 एवं भू-अभिलेख अधिनियम, 1956 के तहत् उपरोक्त शाखा राज्य के भू-अभिलेख निरीक्षक व पटवारियों के संस्थापन सम्बन्धी कुछ कार्यों के अलावा राजस्व इकाईयों के गठन, भू-अभिलेख, कम्प्यूटराइज्ड सुधार सम्बन्धी कार्य किये जाते है।
अन्य प्रमुख कार्य-
- भू-अभिलेख निरीक्षकों के अन्तजिला एवं अन्तसम्भाग स्थानान्तरण सम्बन्धी कार्य।
- भू-अभिलेख निरीक्षण वृत्त एवं पटवार वृत्त सम्बन्धी कार्य।
- नवीन तहसील, उपतहसील का सृजन आदि।
तहसीलदार सेवा अनुभाग
राजस्थान तहसीलदार सेवा शाखा द्वारा राज्य के समस्त तहसीलदारों, नायब तहसीलदारों की नियुक्ति, प्रशिक्षण, सेवानिवृत्ति, वरिष्ठता, स्थानान्तरण, पदस्थापन, वेतनमान, उपपंजीयक पेनल, अनिवार्य सेवानिवृत्ति आदि सम्बन्धी समस्त कार्य किये जाते हैं।
निरीक्षण
राजस्व मण्डल के अध्यक्ष द्वारा किसी भी स्तर के राजस्व न्यायालय का सुविधानुसार निरीक्षण किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त किसी भी सदस्य को उन्हें आवंटित कार्यालयों, न्यायालयों के अतिरिक्त अन्य कार्यालयों, न्यायालयों हेतु निर्देशित किया जा सकता है। कार्मिक एवं प्रशिक्षण सुधार विभाग, राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 9 आदि भी निरीक्षण कार्यों से सम्बन्धित हैं।
वित्त एवं लेख
समस्त व्यय, बजट एवं लेखा सम्बन्धी कार्य संचालन उपरोक्त शाखा के अन्तर्गत आते हैं।
कृषि सांख्यिकी सम्बन्धी प्रमुख कार्य
- भू-उपयोग समंक व फसलों के अन्तर्गत सिंचित व असिंचित क्षेत्रफल, सिंचाई साधनों की सूचना का जिलेवार एवं राज्य स्तर पर संकलन करना। यह राज्य में कृषि सांख्यिकी आंकड़े इकट्ठा करने का कार्य करता है।
- फसलों की औसत उपज व कुल उत्पादन का अनुमान।
- फसल बीमा योजना अन्तर्गत तहसीलदार उपज का अनुमान।
- फसलों के क्षेत्रफल व उत्पादन के अग्रिम अनुमान।
- फल तस्करी व लघु उपज सर्वेक्षण।
- राजस्व मण्डल का वार्षिक प्रतिवेदन, कृषि सांख्यिकी पर उच्चस्तरीय समन्वय समिति की बैठक आदि।
पशुगणना
केन्द्र प्रवर्तित योजना अन्तर्गत पशुगणना का कार्य राजस्व मण्डल के पर्यवेक्षण में जिला स्तरीय राजस्व अधिकारियों के सहयोग से कराया जाता है। राजस्व मण्डल द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष बाद पशुगणना का कार्य किया जाता है। राजस्थान में 20वीं पशुगणना 2017 में हुई। जिसकी रिपोर्ट 2019 में जारी की गई है। उपरोक्त कार्य सम्पन्न करने हेतु संयुक्त निदेशक (सांख्यिकी) राजस्व मण्डल, राज्य पशुगणना अधिकारी है। पशुगणना के अन्तर्गत जीवित पशुओं की सूचना, खेतीबाड़ी में काम आने वाली मशीनों व औजारों की संख्या आदि की सूचना परिवार, ग्रामवार, तहसीलदार, जिला व राज्य स्तर पर संकलित की जाती है।
रिट शाखा
रिट शाखा द्वारा मुख्यतः सेवा सम्बन्धी प्रकरणों में कार्यवाही, विधिक विषयों पर परामर्श विषयक कार्य आदि किये जाते हैं।
विभागीय जाँच
मंत्रालयिक सेवा संवर्ग व तहसीलदार संवर्ग आदि स्तर पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाँच।
पुस्तकालय
राजस्व मण्डल के न्यायिक कार्य को सुचारू रूप से सम्पन्न करने की दृष्टि से पुस्तकालय का गठन किया गया है। जिसमें राजस्व, न्यायिक मामलों एवं विधि प्रक्रिया संबंधी पुस्तकें उपलब्ध हैं।
अभिलेखागार
अभिलेखागार शाखा द्वारा दो स्तरों न्याय एवं सामान्य पर कार्य किया जाता है। न्याय शाखा के प्राप्त पत्रावलियों को जाँच कर यथास्थान रखवायी जाती है। सामान्य शाखा द्वारा अन्य शाखाओं की पत्रावलियाँ प्राप्त कर, जाँच कर यथास्थान रखवायी जाती है।
कम्प्यूटर शाखा
कम्प्यूटर शाखा राजस्व मण्डल के विविध कार्यों में ई-गवर्नेस अनुप्रयोगों को सम्पादित करती है।
नवीन अनुप्रयोग
ई-गवर्नेस अनुप्रयोग
मण्डल के न्यायिक कार्यों का कम्प्यूटराइजेशन-प्रकरण के प्रस्तुतिकरण से लेकर निस्तारण तक कार्यवाही का संचालन मण्डल स्तर पर बनाये गये सॉफ्टवेयर पर कराया जाता है।
R.R.B. का कम्प्यूटरीकरण।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा
इससे रजिस्ट्रार द्वारा समय-समय पर जिलों में कार्यरत उपखंड अधिकारी एवं प्रभारी अधिकारी, तहसीलदार, सदर कानूनगो तथा जिला सूचना विज्ञान अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिये जाते हैं।
- बोर्ड इंटरनेट वेब पोर्टल।
- बोर्ड वेबसाइट (www.bar.rajasthan.gov.in)।
- टच स्क्रीन की सुविधा-मण्डल में टच स्क्रीन स्थापित की गई है, जिसमें कोई भी व्यक्ति किसी भी समय अपने प्रकरण की सम्पूर्ण जानकारी अपनी अंगुलियों के स्पर्श मात्र से ज्ञात कर सकता है। भाषा पूर्णतः हिन्दी है।
ऑनलाइन जमाबन्दी- राजस्व बोर्ड द्वारा राजस्व रिकार्ड ऑन लाइन करने से काश्तकार अपनी खातेदारी भूमि के संबंध में जानकारी बिना किसी अनावश्यक भागदौड़ के प्राप्त कर सकता है।
भू-अभिलेख कार्य, सांख्यिकी कार्य, ई-मेल कार्य, का प्रशिक्षण कम्प्यूटर हार्डवेयर देखरेख, सर्वर बेकअप कार्य आदि।
DIL RMP - अभिलेखों एवं राजस्व दस्तावेजों की कृषक वर्ग तक आसानी एवं सुगमता से पहुँच निश्चित करने के उद्देश्य से Digital India Land Record Modernisation Programme (DILRMP) शुरू किया गया है। इसके अन्तर्गत राजस्व रिकार्ड (जमाबन्दी, भू-नक्शा आदि) के Digitised तथा Online होने के कारण राजस्व काश्तकारों को अभिलेख शीघ्र व आसानी से मिल जाते हैं।
नागरिक अधिकारी पत्र/सूचना का अधिकार- अपने विस्तृत कार्यक्षेत्र एवं दोहरे उत्तरदायित्व (प्रशासनिक एवं न्यायिक कार्य) आदि के कारण राजस्व मण्डल को कार्य में अत्यधिक देरी, लालफीताशाही जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। लम्बित मुकदमे, कार्मिक असन्तुष्टि, राजस्व मण्डल द्वारा प्रदत्त न्याय प्रणाली में अत्यधिक कार्य भार जैसी समस्याएँ भी राजस्व मण्डल की कार्यदक्षता को प्रभावित करती है।
- राजस्व मण्डल को आर्थिक रूप से समझ बनाया जाये।
- मण्डल को सभी राजस्व एवं भू-प्रबन्ध सम्बन्धी विभाग सौंपे जाये।
- समस्त कार्यों पर उचित पर्यवेक्षण की व्यवस्था की जाये।
- क्षेत्रीय बेंचों की स्थापना आवश्यकतानुसार की जाये तथा उनके क्षेत्राधिकार की स्थापना की जाये।
- मुकदमों के निस्तारण हेतु निश्चित समय सीमा हो।
- कार्य शैली में वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग हो।
- राजस्थान प्रशासनिक सुधार समिति राजस्थान राजस्व मण्डल में सुधार हेतु श्री गोपाल कृष्ण भनोत की अध्यक्षता में समिति का गठन किया गया।
भनोत समिति (1992-95) द्वारा राजस्व मण्डल में सुधार हेतु कतिपय सुझाव प्रस्तुत किये गये हैं जो निम्नलिखित है-
- भारतीय प्रशासनिक सेवा में सुपर टाइम स्केल प्राप्त पदाधिकारियों का राजस्व मण्डल में पदस्थापन।
- जिन प्रशासनिक अधिकारियों को सुपरटाइम स्केल में रहते हुए राजस्व मण्डल में कार्य करने का अवसर प्राप्त न हुआ हो, उन्हें उच्च स्केल में आने पर मण्डल में वरिष्ठ सदस्य के रूप में पदस्थापित किया जाये।
- आकर्षक वेतन-भत्ता, आवास सुविधा प्रदत्त हो।
- कुछ माह में सेवानिवृत्त होने वाले पदाधिकारियों को मण्डल में ना लगाया जाये।
लोक अदालतें
राजस्थान राजस्व मण्डल अजमेर द्वारा 'न्याय आपके द्वार' नाम से लोक अदालतों का आयोजन ग्राम पंचायत स्तर पर किया जाता है। जिसमें अपनी सहमति से काश्तकारों के भूमि संबंधी विवादों एवं भूमि संबंधी पारिवारिक विवादों को हल किया जाता है।
'राविरा'
राजस्व मण्डल अजमेर द्वारा 'राविरा' नामक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन किया जाता है। जिसमें राजस्व प्रवृत्तियों एवं गतिविधियों, राजस्व कार्यक्रमों एवं न्यायिक निर्णयों का उल्लेख होता है।
राजस्व मण्डल- एक नजर में
राज्य में भू अभिलेखों, भू राजस्व एवं भू प्रबंध की व्यवस्था हेतु 1 नवम्बर, 1949 को इसकी स्थापना की गई यह एक अर्द्ध न्यायिक निकाय है। यह राजस्व मामलों में राज्य का सर्वोच्च अपील, पुनर्विलोकन तथा संदर्भ न्यायालय है। वर्तमान में राजस्व मण्डल अपने मूल कार्यों के अलावा कृषि आँकडें, पशुपालन एवं सिंचाई सम्बन्धी आँकड़े भी एकत्रित करता है। राजस्व मण्डल का मुख्यालय अजमेर में स्थित है। राजस्थान राजस्व भू अधिनियम 1956 के अनुसार इसका एक अध्यक्ष तथा अन्य सदस्य होगें। इनकी संख्या 3 से 15 हो सकती है। इसका अध्यक्ष भारतीय प्रशासनिक सेवा का मुख्य सचिव स्तर का अधिकारी होता है। जिसकी नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है तथा उनका कार्यकाल भी इनके प्रसादपर्यन्त रहता है। अध्यक्ष की सहायता हेतु 12 सदस्य होते है। जो भारतीय प्रशासनिक सेवा, राजस्थान उच्च न्यायिक सेवा एवं राजस्व मामलों के विशेषज्ञ वकीलों में से राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते है। वर्तमान में श्री उमराव सालोदिया इसकी अध्यक्षा है। प्रशासनिक समन्वय हेतु राजस्व मण्डल में एक रजिस्ट्रार होता है। जो भारतीय प्रशासनिक सेवा का वरिष्ठ अधिकारी होता है। रजिस्ट्रार राजस्व मण्डल के कार्य का मुख्य पर्यवेक्षक होता है। राज्य मण्डल न्यायिक, प्रशासनिक व निरीक्षणात्मक कार्य करता है। वर्तमान में श्री उमराव सालोदिया राजस्व मण्डल के अधिकारी है।


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