राजस्थान के लोकनाट्य | Rajasthan ke lok natya

राजस्थान के लोकनाट्य

इस लेख में राजस्थान के विभिन्न लोकनाट्यों का विस्तृत विवरण दिया गया है। इसमें तमाशा, रम्मत, गवरी, भवाई और नौटंकी जैसी प्रमुख नाट्य शैलियों के उद्भव, उनके प्रसिद्ध कलाकारों और प्रदर्शन के तरीकों को समझाया गया है। साथ ही, विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित रामलीला, रासलीला और ख्यालों की क्षेत्रीय विशेषताओं की जानकारी भी मिलेगी।
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रंगमंच पर लोगों का मनोरंजन करने के लिए जो कार्यक्रम दिखाया जाता है, उसे लोकनाट्य कहते हैं।
राजस्थानी नाटकों के जनक व निर्देशक कन्हैयालाल पंवार थे।

तमाशा

यह लोकनाट्य मूलत: महाराष्ट्र का है। राजस्थान में यह जयपुर का प्रसिद्ध है। इसका प्रारम्भ सवाईप्रताप सिंह (1778-1803 ई.) के समय हुआ। पंडित बंशीधर भट्ट व उसके पुत्र ब्रजपाल भट्ट इसके प्रमुख कलाकार हैं। गोपीकृष्ण भट्ट ने भी इसे प्रसिद्ध किया जो माधोसिंह के दरबारी विद्वान थे। इस नाट्य की प्रसिद्ध कलाकार गौहरजान थी। वासुदेव भट्ट इसके वर्तमान में कलाकार है। तमाशा खुले मंच पर किया जाता है जिसे अखाड़ा कहते हैं। यह नाट्य, संगीत, नृत्य व गायन मिश्रित है। इस नाट्य में स्त्री पात्र की भूमिका स्त्रियाँ ही करती है। यह नाट्य दिन में किया जाता है। हारमोनियम, तबला व सारंगी प्रमुख वाद्य यंत्र काम में लिये जाते हैं। तमाशों की उस्ताद परम्परा फूलजी भट्ट ने प्रारम्भ की। वैसे तो तमाशे का प्रारम्भ सवाई प्रतापसिंह (1778-1803 ई.) के समय माना जाता है लेकिन तमाशे का जन्म मानसिंह प्रथम के समय ‘धमाका मंजरी’ नाट्य के प्रदर्शन से मानी जाती है। धमाका मंजरी की रचना मोहन कवि ने की थी।

प्रसिद्ध तमाशे
हीर-रांझा (धुलंडी के दिन), भर्तृहरि, जोगी-जोगन (होली), छैला पणिहारी, गोपीचन्द का तमाशा (चैत्र अमावस्या), जुठन मियाँ (शीतला अष्टमी के दिन), रूपचन्द्र गढ़ी, नानकशाही तमाशा।

रम्मत

इसका उद्भव जैसलमेर में हुआ था। बीकानेर में यह पाटा संस्कृति के नाम से प्रसिद्ध है। बीकानेर में आचार्यों का चौक रम्मत के लिए प्रसिद्ध है। रात्रि में पुष्करणा ब्राह्मणों द्वारा होली व सावन के महीनों में महापुरुषों की जीवनी का मंचन किया जाता है। इसे खेलने वाले खैलार/रम्मतिये कहलाते हैं। इसमें नगाड़ा व ढोलक प्रमुख वाद्य यंत्र काम में लिये जाते हैं। इस नाट्य में क्रान्तिकारी विचारधारा आ गयी थी। जैसलमेर के तेज कवि ने सन् 1943 में स्वतंत्र बावनी नामक रचना गांधीजी को भेंट की। तेजकवि ने जैसलमेर में श्रीकृष्ण कंपनी के नाम से रम्मत का अखाड़ा शुरू किया। तुलसीराम, सुआ महाराज, फागू महाराज, मनीराम व्यास, गंगादास सेवंग, सूरज, काना सेवंग, गोपाल जी मेहता, गींडोजी, जीतमल प्रमुख रम्मत कलाकार है।

प्रमुख रम्मत
  • अमरसिंह री रम्मत - यह रम्मत आचार्यों के चौक में की जाती है। इस रम्मत में श्रृंगार और सौंदर्य की प्रधानता होती है।
  • हड़ाऊ मेरी री रम्मत - इस रम्मत में कुम्भलगढ़ के राजा हड़ाऊ तथा उसकी पत्नी मेरी के बारे में वर्णन है। इस रम्मत में आदर्श पति-पत्नी का रूप दिखाई देता है। यह रम्मत गद्य-पद्य में होती है जो माता जी के गीत से समाप्त होती है। इसका आयोजन फाल्गुन में मरुनायक जी के चौक में होता है। इस रम्मत का प्रारम्भ जवाहरलाल जी पुरोहित ने किया।
  • जमनादास री रम्मत - यह रम्मत फाल्गुन माह में कीकाणी व्यासों के चौक में होती है। इस रम्मत में लरियालदेवी नाचना, गणेश वंदना, जोशी जोशण वर्षफल होता है। इस रम्मत के जनक जमनालाल कल्ला है। इस रम्मत में भगवती मां द्वारा नाचना, खाखी स्वांग आदि होते हैं।
  • फक्कड़ दाता री रम्मत - यह बीकानेर की प्रसिद्ध है। यह रम्मत फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को होती है। इस रम्मत में बोरा-बोर हास्य, गणेश वंदना, सपेरे का स्वांग, जाट-जाटणी का स्वांग आदि दिखाया जाता है। अन्त में शीतला माता के गीत गाये जाते हैं।
  • फागू महाराज की रम्मत - यह फाल्गुन माह में भट्टों के चौक में होती है। इस रम्मत की लावणियाँ प्रसिद्ध है। यह रम्मत फाल्गुन शुक्ल की दशमी को होती है। इस रम्मत में सर्वप्रथम राय माता का स्वांग आता है। इस रम्मत में रायमाता का स्वांग, जोगी-जोगण, ढोलकिया, टेरिया, सालूजी भिस्ती आदि का विनय होता है।
  • मनीराम जी की रम्मत - यह व्यासों के चौक में की जाती है। इस रम्मत में गणेश वन्दना, रामदेवजी की स्थिति, पणिहारी, ननद-भोजाई, पति-पत्नी की छेड़छाड़, अरबी घोड़ा-घोड़ी आदि दिखाये जाते हैं।
  • कन्हैयालाल की रम्मत - इसका आयोजन व्यासों के चौक में होता है।
  • राजिया महाराज की रम्मत - यह रम्मत फाल्गुन में दमनियों के चौक में किया जाता है। कच्छी घोड़ी नृत्य, गणेश वन्दना, चौमासा, लावणी, पणिहारी गीत आदि किये जाते हैं।

गवरी/राई नाट्य

यह मेवाड़ में भीलों द्वारा किया जाने वाला राजस्थान का सबसे प्राचीन नाट्य है जिस कारण इसे मेरुनाट्य कहते हैं। यह नाट्य रक्षाबंधन के दूसरे दिन भाद्रपद कृष्ण एकम को खेड़ा देवी से आज्ञा लेकर प्रारम्भ होता है तथा 40 दिन चलता है। यह राजस्थान का सबसे लम्बा चलने वाला नाट्य है। यह दिन में किया जाता है।
इस नाट्य में शिव, पार्वती व भस्मासुर की कथा कही जाती है। भस्मासुर नामक राक्षस ने भगवान शिव की तपस्या कर उनसे कड़ा मांग लिया जिसकी विशेषता थी कि किसी भी व्यक्ति के सिर पर घुमाने से वह व्यक्ति भस्म हो जाता है। भस्मासुर ने पार्वती जी को प्राप्त करने के लिए वह कड़ा शिवजी के सिर पर घुमाने की सोची। शिवजी अपनी जान बचाने के लिए भागते हैं। शिवजी को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी का रुप बनाया तथा भस्मासुर के साथ नृत्य कर वो कड़ा भस्मासुर के ऊपर ही घुमा दिया जिससे भस्मासुर जलकर राख हो गया।
इसमें शिव का रुप बनाने वाला पुरिया कहलाता है। इसमें 5 पात्र (बूढ़िया, राई, झामटिया, कुटकड़िया, भोपा) होते हैं जो सभी पुरुष होते हैं। इस नाट्य का सूत्रधार कुटकड़िया हैं। बूढ़िया भस्मासुर का जप होता है। झामट्या लोक भाषा में कविता बोलता है तथा खटकड़िया उसे दोहराता है। खटकड़िया जोकर का काम भी करता है।
राई माता पार्वती को कहा जाता है।
गवरी के विभिन्न प्रसंगों को आपस में जोड़ने वाले सामूहिक नृत्य को 'गवरी की घाई' कहते हैं।
भानू भारती का पशु गायत्री नाट्य की गवरी पर आधारित है।

गवरी नाट्य में 11 लघु नाटिकाएँ होती हैं।
  • माता व नाहर - इस नाटिका में दर्शकों को आशीर्वाद दिया जाता है।
  • भंवरा-भंवरी - इस नाटिका में देवर-भाभी का संवाद होता है।
  • मियावड़ - इस नाटिका में भस्मासुर द्वारा पार्वती को प्राप्त करने की कोशिश तथा देवता द्वारा भस्मासुर को मारना।
  • बाबा - इसमें भस्मासुर की कथा होती है।
  • कान्ह-गुजरी - इसमें जादू-टोने व तान्त्रिक प्रयोग किये जाते हैं।
  • अम्बाव तथा कालू कीर - इस नाटिका में कालू कीर अपनी धर्म बहिन अम्बाव की अँगूठी मछली के पेट से वापस लाते हैं।
  • देवी - अम्बड़
  • खांडलिया भूत
  • बादशाह की सवारी
  • घड़ावत - इस नाटिका में नाट्यकार एक दिन पूर्व अपने मूल गाँव में आकर कुम्हार के घर से मिट्टी लाकर हाथी बनाते हैं तथा चौराहे पर रखकर नाचते गाते हैं।
  • वलावण - यह गवरी नाट्य की अन्तिम नाटिका है जिसमें मिट्टी के हाथी को पानी में विसर्जित किया जाता है।

भवाई

यह मूलतः गुजरात का नाट्य है। यह मेवाड़ में भवाई जाति द्वारा किया जाता है। इसमें उच्च वर्ग व निम्न वर्ग के संघर्ष की कथा कही जाती है।
इस नाट्य के जनक केकड़ी (अजमेर) के बीघा जी जाट/नागा जी जाट माने जाते हैं। यह एक व्यावसायिक नाट्य है। शान्ता गाँधी ने जस्माओड़न की रचना की जो नाट्य का एक प्रकार है। सिर पर अनेक मटके रखकर कांच पर, तलवार पर, थाली पर, गिलास पर नृत्य किया जाता है।
सांगीलाल सांगड़िया, स्वरूप पंवार (बाड़मेर) प्रमुख भवाई नाट्यकार है। इस नाट्य का विषय बोहरा-बोहरी, लोहड़ी-बड़ी, बाघाजी, ढोला-मारु होता है।

नौटंकी

इस नाट्य में 9 प्रकार के वाद्य यंत्र (सारंगी, शहनाई, नगाड़ा, ढोलक, ढपली, चिकारा, हारमोनियम) काम में लिये जाते हैं जिस कारण इसे नौटंकी कहते हैं।
भारत में इसका जन्म हाथरस गाँव (यूपी) में नत्थाराम शर्मा ने किया। राजस्थान में इसके जनक भूरी लाल (डीग) जी हैं। गिरीराज प्रसाद (कामां, डीग) इसके प्रमुख कलाकार हैं। स्वर्णलाल, कल्याणसिंह, बद्रीसिंह, बाबूलाल हकीम, मनोहरलाल, मा. गिर्राज प्रसाद, शिवदत्त, लच्छी, श्यामसुन्दर, लता, कमलेश, गुलाब बाई, व कृष्णा कुमारी प्रमुख नाट्यकार हैं।
भरतपुर के नौटंकीकार रामदयाल शर्मा जिन्हें नौटंकी में 2021 में पद्मश्री का अवार्ड दिया गया। रामदयाल को ब्रज कौकिला के नाम से जाना जाता है।
नौटंकी भरतपुर, करौली, सवाईमाधोपुर व धौलपुर की प्रसिद्ध है। हाथरस शैली की नौटंकी भरतपुर की प्रसिद्ध है।

प्रमुख नौटंकी
आल्हा-ऊदल, हरिशचन्द्र, कामदेव, रुपबसंत, सत्यवान-सावित्री, लैला-मजनूं, अमरसिंह राठौड़, शियापौष, हरिशचन्द्र-तारामती, माधवानल-कामदेव, सत्यवान-सावित्री, लैला-मजनूं, भक्त-पूर्णमल आदि प्रमुख नौटंकी है।

चारबैत

टोंक की प्रसिद्ध है। इसे नवाबों की विद्या भी कहते हैं। इसमें पठानी लोगों द्वारा ढप वाद्य यंत्र से कव्वाली के रूप में गायन होता है। भारत में इसका प्रारम्भ उस्ताद अब्दुल करीम खाँ ने तथा राजस्थान में इसका प्रारम्भ फैजुल्ला खाँ के समय करीम खाँ निहंग ने किया। इसका प्रमुख केन्द्र टोंक है। पठानी काव्य की इस शैली में पश्तो भाषा में चार पंक्तियाँ लिखी जाती हैं जिसे बैत कहते हैं जिससे इसका नाम चारबैत पड़ा। नवाब शहादत अली खां रामपुर से चारबैत कलाकारों को टोंक लाये थे। भक्ति, श्रृंगार, रकीबखानी, गम्माज चारबैत की प्रमुख श्रेणियाँ है।

बहरुपिया

यह कला होली पर की जाती है। इसमें व्यक्ति अलग-अलग प्रकार के रूप रचकर लोगों का मनोरंजन करता है। यह कला भीलवाड़ा की प्रसिद्ध है। इस कला को प्रसिद्ध जानकीलाल भांड (मंकी मैन) ने लंदन में कला दिखा कर किया। परशुराम (केलवा, राजसमंद) प्रसिद्ध कलाकार है। जानकी लाल का पुत्र लादुराम भांड भी बहरुपिया कला में निपुण है। देवर-भाभी, लैला-मजनूं, गुरु-चेला, सेठ-सेठानी, चाचा-बोहरा व अर्द्धनारीश्वर प्रमुख स्वांग है।

स्वांग

इस कला में होली पर विभिन्न प्रकार के स्वांग रचकर लोगों का मनोरंजन किया जाता है। यह नाट्य हास्यकला प्रधान होती है। स्वांग मारवाड़ में रावल जाति द्वारा किये जाते हैं।
सेठ-सेठानी, मेना-गुजरी, अर्द्धनारीश्वर, चाचा-बोहरा, जोगी-जोगण आदि प्रमुख स्वांग हैं। मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) में नारों का स्वांग चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को किया जाता है जो 1614 ई. में शाहजहाँ के समय प्रारम्भ हुआ था।

रासलीला

ब्रजप्रदेश की राई जाति रासलीला को व्यवसायिक रूप में प्रस्तुत करती है। रासलीला का नायक 'स्वरूप' कहलाता है। यह वल्लभ सम्प्रदाय में प्रसिद्ध है इसमें भगवान कृष्ण की लीलाएँ होती हैं। राजस्थान में इसके प्रवर्तक हित हरिवंश हैं। यह फुलेरा (जयपुर) की प्रसिद्ध है। शिवलाल कुमावत, मोहनदास, किशोरीदास, गोविन्द दामोदर, हरगोविन्द स्वामी, रामस्वरुप स्वामी इसके प्रमुख कलाकार हैं।
  • नृसिंह लीला- जोधपुर में नृसिंह का मेला भरता है। जिसे मूलके का मेला भी कहते हैं। इस लीला में भगवान नृसिंह अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा करते हैं और हिरण्यकश्यप का वध करते हैं।
  • सनकादियों की लीला- घोसुण्डा (चित्तौड़गढ़) में आश्विन शुक्ल तृतीया व बस्सी (चित्तौड़गढ़) में कार्तिक पूर्णिमा को सनकादियों की लीला दिखाई जाती है। जिसमें नृसिंह भगवान का हिरण्यकश्यप का वध करते दिखाया गया है।
  • गंधर्व नाट्य- इस नाट्य में जैन धर्म पर आधारित अंजना सुंदरी व मैना सुंदरी नामक नाट्यों का प्रदर्शन किया जाता है। यह नाट्य मारवाड़ में गंधर्व जाति द्वारा किया जाता है।
  • रामलीला- भगवान राम के जीवन चरित्र को नुक्कड़ पर भिन्न-भिन्न पात्रों के माध्यम से दिखाया गया नाट्य रामलीला कहलाता है। रामलीला का प्रारम्भ गोस्वामी तुलसीदास ने काशी (उत्तरप्रदेश) से किया था। राजस्थान में अलग-अलग क्षेत्र की अलग-अलग रामलीलाएँ प्रसिद्ध है। बिसाऊ (झुंझुनूं) में रामलीला का मूक अभिनय किया जाता है। जिसका प्रारम्भ जमनाश्याम नामक संन्यासिनी ने किया था। अटरू (बाराँ) की रामलीला में शिव धनुष भगवान राम द्वारा नहीं बल्कि दर्शकों द्वारा तोड़ा जाता है। मांगरोल (बाराँ) की रामलीला ढाई कड़ी के दोहों की है। पांतूदा (कोटा), जुरहरा (कामााँ, डीग), फुलेरा (जयपुर) कुम्भलगढ़, करौली आदि क्षेत्र की रामलीला प्रसिद्ध है।
  • रासधारी - इसमें भगवान कृष्ण की लीलाएँ होती हैं। इस कला के जनक मेवाड़ के मोतीलाल जाट थे। इसे गाँव के चौराहे पर किया जाता है। रासधारी को गीतों के माध्यम से कहा जाता है। मोरध्वज, नागजी, हरिश्चन्द्र प्रमुख कलाकार हैं।
  • नुक्कड़ नाट्य - यह खुले मंच पर किया जाता है। भवाई, बहरुपिया, गवरी, रामलीला नुक्कड़ पर की जाती है।
  • बैठकी नाट्य - यह नाट्य दो दल जमीन पर आमने-सामने बैठ कर करते हैं। यह नाट्य प्रेम पर आधारित है। इस नाट्य में हारने वाला दल जीतने वाले दल को अपने वाद्य यंत्र दे देता है।
  • दंगल - यह सवाईमाधोपुर, दौसा, भरतपुर, टोंक का प्रसिद्ध है। इसमें शास्त्रीय गायन होता है। इसे लोक धरातल पर प्रस्तुत किया जाता है। हारमोनियम व ढोलक प्रमुख वाद्य यंत्र काम में लिये जाते हैं।

प्रमुख दंगल

  • रसिया दंगल - यह डीग की प्रसिद्ध है।
  • कन्हैया दंगल - यह करौली की प्रसिद्ध है। रामायण तथा महाभारत के प्रसंग कहे जाते हैं।
  • कादरा भूतरा दंगल - यह गीजगढ़ (सिकराय, दौसा) का प्रसिद्ध है। इस दंगल में नृसिंह, प्रहलाद, नारद, शुक्राचार्य, महादेव तथा कादरा-भूतरा के स्वांग निकाले जाते हैं। इन सभी के मुखौटे भगत जी के मन्दिर में रखे हैं।
  • भेंट दंगल - यह धौलपुर के बाड़ी-बसेड़ी का प्रसिद्ध है।
  • ढप्पाली दंगल - यह अलवर, खैरथल, डीग भरतपुर, लक्ष्मणगढ़ का प्रसिद्ध है।
  • कठपुतली नाट्य - यह आडू की लकड़ी की बनती है। कठपुतलियाँ नटों व भाटों द्वारा नचायी जाती है। इसमें सिंहासन बत्तीसी, पृथ्वीराज संयोगिता तथा अमरसिंह की कथाएँ होती हैं।
  • सवारी नाट्य - इस नाट्य में किसी देवता की सवारी निकाली जाती है।

प्रमुख सवारी नाट्य

  • बस्सी (चित्तौड़गढ़) - कार्तिक पूर्णिमा को गणेश, ब्रह्मा, कालिका, काला-गोरा, नृसिंहावतार की झांकियाँ, निकाली जाती हैं।
  • सांगोद का न्हाण - यह कोटा का प्रसिद्ध है। यह 9वीं सदी से वीरवर सांगा गुर्जर की याद में होली पर किया जाता है। वर्तमान न्हाण की सवारी 1871 ई. से निकाली जा रही है। इस यात्रा में 7 लड़कों को देवियों के रुप में सजाकर शोभा यात्रा निकाली जाती है।
  • हुरंगा नाट्य - इस नाट्य में स्त्री-पुरुष बम, ढोल की तान पर नाचते गाते हैं। भरतपुर में होली पर हुरंगों का आयोजन होता है।
  • लीला नाट्य - भगवान राम व कृष्ण के जीवन से सम्बन्धित स्वरुप महापुरुष धारण कर उनके जीवन का अभिनय करते हैं।

प्रमुख लीलाएँ

  • धनुष लीला - यह अटरू (बारां व कोटा) की प्रसिद्ध है जिसमें दर्शकों द्वारा एक बड़ा धनुष तोड़ा जाता है। माना जाता है धनुष तोड़ने वाले लड़के की जल्दी शादी हो जाती है।
  • ढाई कड़ी के दोहों की रामलीला - यह मांगरोल (बाराँ) की प्रसिद्ध है। इस कला में अयोध्या, जनकपुरी व लंका बसाई जाती है।
  • रासमंडल - यह वागड़ क्षेत्र की प्रसिद्ध है। इसमें भगवान कृष्ण की लीलाएँ होती हैं। जिसमें कृष्ण को घघरी पहनाई जाती है तथा पाँव में घूंघरू बाँधे जाते हैं। संत मावजी को कृष्ण का अवतार माना जाता है।
  • गौरलीला - यह गणगौर पर गरासिया जाति द्वारा की जाती है। यह आबू (सिरोही) की प्रसिद्ध है।
  • रामत - यह रावल जाति द्वारा चारण जाति की उपस्थिति में की जाती है। इसमें विभिन्न स्वांग प्रदर्शित किये जाते हैं।

ख्याल

इसका शाब्दिक अर्थ खेल होता है। इसका मुखिया उस्ताद कहलाता है। यह संगीत प्रधान है। इसमें प्रतियोगिता होती है।
  • कुचामनी ख्याल- यह नागौर की प्रसिद्ध है। लच्छीराम इसके जनक थे। इसमें सामाजिक व्यंग्य युक्त वाचन होता है। ओपेरा इस ख्याल का स्वरूप है। ऊगमराज, बंशीलाल इसके प्रमुख कलाकार हैं। राव रीडमल, मीरा मंगल, नीलगिरी, गोगा चौहान प्रमुख ख्याल है। पीताम्बरी, पारस, मैनासुन्दरी, नागवन्ती, नाग, ख्याल के प्रमुख विषय हैं। इस ख्याल में ढोल, शहनाई, ढोलक, सारंगी मुख्य वाद्य यंत्र काम में लिये जाते हैं।
  • तुर्रा-कलंगी ख्याल- इसका उद्भव चंदेरी (मध्य प्रदेश) में हुआ। तुकनगीर व शाहअली ने इसे प्रारम्भ किया। तुकनगीरी के नाम पर इसे तुर्रा जो भगवान शिव का प्रतीक है तथा शाहअली के नाम पर इसे कलंगी जो शक्ति का (पार्वती) प्रतीक है। इसमें चंग वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है। इसमें काव्यात्मक शास्त्रार्थ होता है। यह घोसुन्डा, निम्बाहेड़ा, नीमच व चित्तौड़ के प्रसिद्ध हैं। सहेडू सिंह, हम्मीर बेग, रुपचन्द, छोटूलाल, खेमचन्द, भवानीशंकर, हरिशंकर, चेनराम, जयदयाल सोनी व नानालाल गन्धर्व इसके प्रमुख कलाकार हैं। राजस्थान में प्रारम्भ सहेडूसिंह व हम्मीर बेग ने प्रारम्भ किया। इसे हिन्दु मुस्लिम मिलकर करते हैं।
  • शेखावाटी ख्याल- यह चिड़ावा, खण्डेला और चूरू की प्रसिद्ध है। इसके जनक नानूराम राणा (चिड़ावा) थे। इसके शिष्य दुलिया राणा ने इसे प्रसिद्ध किया। सोहनलाल, बन्शी बनारसी मुख्य कलाकार हैं। इस ख्याल में गायन व नृत्य की प्रधानता होती है। इसमें सारंगी, हारमोनियम, बांसुरी, ढोलक काम में ली जाती है। हीर-रांझा, भर्तृहरि, ढोला मरवण, हरिशचन्द्र, जयदेव कंकाली आदि प्रमुख ख्याल हैं।
  • जयपुरी ख्याल- इसमें रुढ़िवादिता का प्रभाव नहीं है। इसमें स्त्री पात्र की भूमिका स्त्रियाँ ही करती हैं। मियां-बीवी, जोगी-जोगन, कानगुजरी प्रमुख ख्याल हैं। इस ख्याल में संगीत, नृत्य, गायन का समन्वय होता है। ख्याल भारमली नामक ख्याल की रचना हमीदुल्ला ने की थी।
  • हेला ख्याल- यह लालसोट (दौसा) व सवाईमाधोपुर की प्रसिद्ध है। इसमें लम्बी टेर से वाचन होता है। इसके जनक हेला शायर थे। यह गणगौर पर प्रारम्भ होती है। इसमें बम वाद्य का प्रयोग किया किया जाता है। इस ख्याल में प्रतिस्पर्धा होती है। नौबत वाद्य यंत्र भी बजता है।
  • अलीबख्शी ख्याल- इसके जनक राव अली बख्श थे। यह मुण्डावर गाँव (खैरथल तिजारा) की प्रसिद्ध है। भेंट, दोहा, सेंधु, ठुमरी तथा झांझको आदि का प्रयोग किया जाता है। पदमावत, कृष्ण लीला, नल का छड़ाव, बारहमासा, जल का बगदाव, अलवर का सिफतनामा, गुलाब कावल, फसावा आजाद, निहालदे, चन्द्रावत महाराज ये दस ख्याल अलीबख्श ने लिखी थी।
  • कन्हैया ख्याल- यह सवाईमाधोपुर, भरतपुर, धौलपुर व करौली की प्रसिद्ध है। यह मीणा जाति द्वारा दिन में कही जाती है। इसमें मंजीरा व नौबत वाद्य काम में आता है। 'मेड़िया' इसका मुख्य पात्र होता है। इस ख्याल में पौराणिक कथाओं को कहा जाता है। सुदामा-चरित्र, शिव-विवाह, कृष्ण-लीला, नरसी-भगत आदि प्रमुख कन्हैया ख्याल है।
  • कठपुतली ख्याल - इस कला को मुख्य रुप से नट या भाट जाति करती है। कठपुतलियाँ काष्ठ की बनी होती है। कठपुतलियाँ किसी मानव रुप को उजागर करती है। सिंहासन बत्तीसी, पृथ्वीराज संयोगिता, अमरसिंह राठौड़ आदि की कठपुतलियाँ प्रसिद्ध है। कठपुतलियाँ बिना पाँव की होती है। जादू-टोने तथा भूत-प्रेतों के लिए कठपुतलियों का प्रयोग किया जाता था।
  • माच के ख्याल - इस ख्याल के जन्मदाता बगसू राम (भीलवाड़ा), को माना जाता है। इस ख्याल में वीर रस, प्रेम व भक्ति की प्रधानता होती है। राजागोपीचन्द्र, मूमल महेन्द्र, ढोला-मारु, मोरध्वज, तारामती, हरिश्चन्द्र, खींवजी, आभल दे, अमरसिंह राठौड़, राजा हम्मीर, भृतहरि आदि की ख्याल प्रसिद्ध है।
  • हाथरसी ख्याल - इस ख्याल को नथाराम गौड़ ने प्रसिद्ध किया। माच की ख्याल गाँव में तख्तों पर किया जाता है जो मारवाड़ का प्रसिद्ध है। इस ख्याल में सांरगी, ढोलक, तबला वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है।
  • ढप्पाणी ख्याल- यह अलवर, भरतपुर की प्रसिद्ध है।
  • किशनगढ़ी ख्याल - बंशीधर शर्मा इसके प्रवर्तक है।
  • बीकानेरी ख्याल - मोतीलाल इसके प्रवर्तक हैं। गोपीचन्द व अमरसिंह की ख्याल प्रसिद्ध है।

भारत के लोकनाट्य

आधुनिक भारतीय रंगमंच का प्रारम्भ 1831 ई. में हुआ।

(1) दशावतार
प्रसिद्ध- गोवा, कोंकण
लकड़ी का मास्क पहन भगवान विष्णु के 10 अवतारों का प्रस्तुतीकरण।

(2) भांड पाथेर
प्रसिद्ध- कश्मीर
किसानों द्वारा।

(3) गरोदा
प्रसिद्ध- गुजरात
रोमांस व वीरता के साथ प्रस्तुतीकरण।

(4) अंकिया नट
प्रसिद्ध- असम, उड़ीसा, बंगाल, मथुरा।
भगवान कृष्ण के जीवन का प्रस्तुतीकरण।
16वीं शदी में शंकरदेव व शिष्य महादेव द्वारा प्रारम्भ।

(5) जात्रा
प्रसिद्ध- बंगाल
चैतन्य महाप्रभू द्वारा प्रारम्भ।
धार्मिक अनुष्ठान।

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