राजस्थान के प्रमुख संत, संप्रदाय व धर्म
यह लेख राजस्थान के प्रमुख संतों, धार्मिक संप्रदायों और भक्ति परंपराओं का एक विस्तृत विवरण है। इसमें हिंदू धर्म के विभिन्न मतों जैसे शैव, वैष्णव और शाक्त धर्म के उद्भव, सिद्धांतों और उनके प्रमुख केंद्रों की जानकारी दी गई है।
- भक्ति का प्रारम्भ सिन्धु सभ्यता से ही हो गया क्योंकि सिंधुवासी मूर्ति पूजक थे।
- राजस्थान में वैष्णव धर्म का सर्वप्रथम उल्लेख घोसुण्डी शिलालेख में मिलता है।
- वैदिक सभ्यता में भी प्राकृतिक शक्तियाँ, सूर्य, इन्द्र आदि की पूजा होती है।
- भक्ति आन्दोलन का प्रारम्भ 14-15 वीं सदी में माना जाता है।
भगवान विष्णु के 10 अवतार
मत्स्यावतार
जब पृथ्वी जलमग्न हो गई तब भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लेकर मनु को बचाया। मत्स्य अवतार ने मनु उनके परिवार व सप्त ऋषियों को नाव में बैठाकर सुरक्षित स्थान पर ले गये। इस अवतार की जानकारी शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ में मिलती है।
कूर्मावतार
पृथ्वी के जलमग्न होने से पृथ्वी की अनेक अमूल्य वस्तुएँ समुद्र के गर्भ में समा गई जिसमें अमृत भी था। अमृत को प्राप्त करने हेतु देवता व दानवों ने समुद्र मंथन की योजना बनाई। भगवान विष्णु ने विशाल कूर्म (कछुआ) का अवतार लिया जिसकी पीठ पर मंदराचल पर्वत रखा गया, मंदराचल पर्वत के चारों ओर नागराज वासुकि को लपेटकर समुद्र मंथन हुआ। समुद्र से सर्वप्रथम विष निकला जिसे भगवान शंकर ने पीया। समुद्र मंथन से ही माता लक्ष्मी की प्राप्ति हुई। अमृत के बंटवारे को लेकर दानव-देवताओं में सुरासुर युद्ध हुआ जिसमें देवताओं की विजय हुई।
वराह अवतार
हिरण्याक्ष राक्षस ने पृथ्वी को जब जल में डूबो दिया तब भगवान विष्णु ने वराह (शूकर/सूअर) का अवतार लेकर हिरण्याक्ष को मारा तथा पृथ्वी को अपने दाँतों से उठाकर पुनः स्थापित किया।
नरसिंह अवतार
हिरण्यकश्यप को वरदान था कि उसे दानव-देवता, पशु-पक्षी, ऊपर-नीचे, बाहर-भीतर, अस्त्र-शस्त्र से मारा नहीं जा सकता। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद था जो विष्णु भक्त था। भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार जिसमें नर (आदमी), सिंह (शेर) का रूप था अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध किया।
वामन अवतार
राजा बलि ने सम्पूर्ण पृथ्वी लोक पर अधिकार कर अत्याचार प्रारम्भ कर दिया। भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर बलि से तीन कदम भूमि दान मांगी जिसमें वामन अवतार ने प्रथम कदम में सम्पूर्ण पृथ्वी दूसरे कदम में आकाश व तीसरे कदम में पाताल लोक को नाप दिया।
परशुरामावतार
परशुरामावतार जमदग्नि ब्राह्मण के पुत्र थे। कार्त्तवीर्य नामक क्षत्रिय राजा ने जमदग्नि से कामधेनु गाय छीन ली। जिससे परशुराम ने कार्त्तवीर्य को मार दिया। कार्त्तवीर्य के पुत्रों ने जमदग्नि की हत्या कर दी जिससे परशुराम ने कार्त्तवीर्य के पुत्रों को 21 बार पराजित किया।
रामावतार
लंकापति रावण का अहंकार तोड़ने के लिये भगवान विष्णु ने राम का अवतार लिया।
कृष्णावतार
मथुरा नरेश कंस को मारने के लिए भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया। यह भगवान विष्णु का सबसे महत्वपूर्ण अवतार था।
बुद्धावतार
हिंसक कर्मों व बलिप्रथा को समाप्त करने हेतु भगवान विष्णु ने बुद्ध का अवतार लिया।
कल्कि अवतार
यह अवतार शेष है।
- हिन्दू धर्म में मोक्ष (मुक्ति) प्राप्ति के तीन मार्ग बताये हैं।
- मोक्ष का अर्थ होता है:- आत्मा का परमात्मा से मिलन यानि जन्म-मरण का चक्कर समाप्त होना।
मोक्ष प्राप्ति के तीन मार्ग माने गये हैं-
- ज्ञान:- भगवान की आराधना कर स्वयं ज्ञान की प्राप्ति करना तथा अन्य लोगों तक पहुँचाना।
- कर्म:- सत्कर्म कर मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। भगवद् गीता में कर्म को महत्व दिया गया है।
- भक्ति:- भगवान की पूजा, अर्चना कर मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। आजकल मोक्ष प्राप्ति का यही सबसे सरल मार्ग है। भक्ति का सर्वप्रथम उल्लेख श्वेताम्बर उपनिषद् में हुआ है।
- भक्ति का उल्लेख श्रीमद्भागवत् गीता में हुआ है। भक्ति का प्रारम्भ दक्षिण भारत में हुआ था जिसके जनक शंकराचार्य जी थे। भक्ति को उत्तरी भारत में लाने का काम रामानन्द ने किया था।
भक्ति दो प्रकार की होती है-
- सगुण भक्ति:- भगवान की किसी मूर्ति की पूजा करना सगुण भक्ति कहलाती है। इसमें भगवान का साकार रूप में पूजा होती है। जैसे:- रामानुज, वल्लभ, निम्बार्क, नाथ, गौड़ीय, पाशुपत, निष्कलंक, चरणदासी, मीरादासी।
- निर्गुण भक्ति:- यह भक्त मूर्ति पूजा के विरोधी होते हैं। इसमें भगवान के निराकार रूप की पूजा की जाती है; जैसे:- विश्नोई, जसनाथी, दादू, रामस्नेही, परनामी, निरंजनी, कबीर पंथी, लालदासी।
- आस्तिक भगवान को मानता है जबकि नास्तिक भगवान को नहीं मानता है।
हिन्दू धर्म को 3 भागों में बांटा गया है:-
1. भागवत/आलवार धर्म
भगवान विष्णु तथा विष्णु के अवतारों को मानने वाले भक्त आलवार कहलाते हैं। इसके प्रवर्तक वासुदेव थे। भगवान विष्णु के 10 अवतार माने गये हैं:- अमरकोश व गीत गोविन्द में विष्णु के 39 अवतार माने गये है।
2. नयनार/आडीयार धर्म
शिव पूजा का सर्वप्रथम उल्लेख सिन्धु घाटी सभ्यता में मिलता है।
ऋग्वेद में भगवान शिव को रुद्र के रूप में पूजा जाता था।
तैत्तिरीय संहिता में शिव नाम मिलता है।
अथर्ववेद में महादेव नाम मिलता है।
प्रयाग प्रशस्ति में शिवजटा से गंगा निकलने का उल्लेख है।
सोमनाथ मंदिर का निर्माण भीम प्रथम ने करवाया था जो चालुक्य वंश का शासक था। इस मंदिर को महमूद गजनवी ने तोड़ा तथा पुनः निर्माण चालुक्य शासक कुमारपाल ने करवाया।
भगवान शिव व उसके अवतारों को मानने वाले भक्त नयनार कहलाते हैं। शैव धर्म का उदय शुंग सातवाहन वंश में हुआ। लिंग पूजा का प्रथम वर्णन मत्स्य पुराण में मिलता है।
कौषीतकी व शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ में शिव के 28 रूपों का वर्णन है।
भारत में शिव के 18 अवतार बताये गये हैं। भारत में शैव धर्म की 12 शाखाएँ है जिनमें से 3 राजस्थान में है:-
माननाथी
इस शाखा की स्थापना आयस देवनाथ ने की थी। आयस देवनाथ के कहने पर जोधपुर के शासक मानसिंह ने जोधपुर में महामंदिर का निर्माण करवाया जो राजस्थान में नाथ सम्प्रदाय का सबसे बड़ा मंदिर है। मंदिर का निर्माण 1872 ई. में करवाया गया, जिसमें 84 खम्भें हैं।
वैराग्य नाथी
इस शाखा की स्थापना भर्तृहरि ने की थी। इस शाखा की प्रधान पीठ राताडुंगा (पुष्कर, अजमेर) में है।
नाथ
यह सबसे नवीन शाखा है जिसकी स्थापना नाथ मुनि ने की थी। नाथ मुनि के बाद इस शाखा को मत्स्येन्द्र नाथ ने बढ़ाया। मत्स्येन्द्र नाथ के दो शिष्य थे। जिसमें गोरखनाथ ने हठ योग चलाया तथा जालन्द्र नाथ ने जालौर में नाथ पीठ स्थापित की। इस शाखा का सर्वाधिक प्रचार-प्रसार 10वीं व 11वीं सदी में हुआ था। भर्तृहरि, आयसदेवनाथ, गोपीचन्द नाथ सम्प्रदाय के प्रमुख अनुयायी थे।
भर्तृहरि उज्जैन के राजा थे जिन्होंने अलवर में तपस्या की थी। भर्तृहरि की गुफा बघेरा (अजमेर) में है। सरिस्का (अलवर) में भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को कनफटे नाथों का मेला भरता है जो मेवात का सबसे बड़ा मेला है। नाथ सम्प्रदाय सर्वाधिक मारवाड़ में प्रचलित है। सम्प्रदाय के लोग योग पर बल देते हैं। नाथ सम्प्रदाय के मंदिर को आसन कहते हैं।
नाथ सम्प्रदाय की राजस्थान में तीन शाखाएँ मानी जाती हैं-
- कालबेलिया:- ढिकाई गाँव (जोधपुर) के गुरु कनीपाव की गद्दी को कालबेलिया जाति द्वारा पूजा जाता है। यह जाति साँप, बिच्छू काटे व्यक्ति का इलाज करती है। यह जाति कानों में मुर्कियाँ पहनती है।
- जोगी:- जोगी भगवा वस्त्र पहनते हैं। इस शाखा में भक्ति की जगह योग पर बल दिया गया है। जोगियों द्वारा अलग-अलग रुप बदला जाता है। जैसे- बिल्ली बनना, शेर बनना, कुत्ता बनना आदि।
- मसानियें जोगी:- ये चिड़ियानाथ के अनुयायी माने जाते हैं। चिड़ियानाथ के शिष्य दीनानाथ थे। इस शाखा का मुख्य तीर्थ भीम सेन पहाड़ी के पास अरना (जोधपुर) है।
भारत में शैव धर्म की 4 प्रमुख शाखाएँ हैं:-
- पाशुपत:- इसमें शिव के 18 अवतारों को माना गया है। यह शाखा सबसे प्राचीन है। इस शाखा की स्थापना दूसरी सदी ईसा पूर्व में लकुलीश ने की थी। लकुलीश का जन्म कायावरोहण (गुजरात) में हुआ था। इन्हें भगवान शिव का अन्तिम 28 वाँ अवतार माना गया है। इस सम्प्रदाय की राजस्थान में एकमात्र पीठ कैलाशपुरी (उदयपुर) एकलिंगजी मन्दिर है।
- कापालिक:- इस शाखा को मानने वालों का ईष्टदेव भैरो है तथा ये नर बलि देते हैं। इस सम्प्रदाय को मानने वाले साधु को अघोरी बाबा कहते हैं जो श्मशान में निवास करते हैं। ये सुरा-सुन्दरी का सेवन करते हैं।
- कालामुख:- इस शाखा को मानने वाले महाव्रतधर या अघौरी कहलाते हैं। ये नरकपाल में भोजन व शरीर पर भस्म लगाते हैं। ये कापालिक से अधिक भयंकर होते हैं।
- लिंगायत:- ये शिव लिंग की उपासना करते हैं। इस शाखा के प्रवर्तक अलप्रभु थे। इन्हें वीर शैव कहते हैं।
कश्मीरी शैव संप्रदाय
यह ज्ञानमार्गी संप्रदाय है। ध्यान व ज्ञान से परब्रह्म की प्राप्ति बताई है। इस संप्रदाय के तीन उपभाग है-
- आगम शास्त्र – इस शाखा में पशु, पति, पाश की कल्पना की गई।
- प्रत्यभिज्ञा शास्त्र - इस शाखा के प्रवर्तक सोमानंद थे।
- स्पन्दन शास्त्र - इस शाखा के प्रवर्तक वसुगुप्त थे।
3. शाक्त धर्म
- देवी की पूजा करने वाले शाक्त कहलाते हैं।
- सिन्धुवासी शक्ति पूजा करते थे।
- गुप्तकाल( 240-550 ई ) में शक्ति पूजा चरमोत्कर्ष पर थी।
- शिव की पत्नी पार्वती को जगत जननी माना जाता है।
- देवियों के बलि व जादू-टोने के लिए भी पूजा जाता है।
- भेड़ाघाट (जबलपुर, मध्यप्रदेश) के पास 64 योगिनी का मंदिर भारत का प्रसिद्ध मंदिर है।
- कोलमार्गी- ये क्षणिक सिद्धि प्राप्ति हेतु उपासना करते है। ये पंचमकार (माघ, मांस, मत्स्य, मुद्रा, मैथून) की उपासना करते है।
- समयाचारी- ये सामान्य पूजा करते हैं। इस शाखा के लोग श्री चक्र की पूजा करते है।
पंथ/सम्प्रदाय
हिन्दू धर्म से अलग विचारधारा रख जिस संत ने अपना अलग धर्म बना लिया वही पंथ या सम्प्रदाय कहलाते हैं।
शंकराचार्य
जन्म- कलाड़ी गाँव (केरल)
माता- आर्याम्बा/सुभद्रा
शंकराचार्य को भक्ति आन्दोलन का जनक कहा जाता है। इन्होने 8वें वर्ष सन्यास ले लिया था। शंकराचार्य के गुरू 'गोविन्द भागवत पाद' थे जिन्होंने शंकराचार्य को परमहंस की उपाधि दी। शंकराचार्य 'स्मृति संप्रदाय' की स्थापना की तथा 'गीता भाष्य' नामक ग्रंथ की रचना की। शंकराचार्य को प्रछन्न बौद्ध कहा जाता है क्योंकि ये बौद्धों की महायान शाखा को मानता था।
इनका जन्म 788 ई. में कलाड़ी गांव, केरल में हुआ था। शिव गुरु इनके पिता व आर्याम्बा इनकी माता थीं। ये ज्ञानमार्गी थे। इन्होंने अद्वैतवाद (ब्रह्मा को परम सत्ता माना) का सिद्धांत दिया। 32 वर्ष की उम्र में 820 ई. में इनका निधन हो गया। इन्होंने भारत में हिन्दू धर्म को स्थापित किया था। इन्होंने बौद्धों की मठीय परम्परा को अपना कर भारत में चारों कोनों पर चार पीठ स्थापित की।
- उत्तरी/ज्योतिष पीठः- बद्रीनाथ (उत्तराखण्ड) में है जो भगवान विष्णु का मंदिर है।
- दक्षिणी/श्रृंगेरी पीठः- तुंगभद्रा नदी, मैसूर (कर्नाटक) में है जो शिव का मंदिर है।
- पश्चिमी/शारदा पीठः- द्वारिका (गुजरात) में है जो भगवान कृष्ण का मंदिर है।
- पूर्वी/गोवर्धन पीठः- जगन्नाथ पुरी (ओडिशा) में है जो बलभद्र व सुभद्रा की है।
पांचवी पीठ काम कोठी पीठ मानी गयी है जो कान्ची (तमिलनाडु) में है।
यमुनाचारी/यमुनाचार्य
जन्म - 1197 ई. उडूपी (द. भारत)
मत - द्वैतवाद (मालिक-नौकर) (ईश्वर आत्मा संसार से अलग है।)
इन्होंने वैष्णव धर्म की स्थापना की थी। ये दक्षिणी भारत के प्रमुख संत थे। इनके शिष्य रामानुज व रामानुज के शिष्य रामानन्द थे। संप्रदाय - ब्रह्म संप्रदाय/ ग्रंथ भारत तात्पर्य निर्णय
ग्रंथ - 1. वेदान्त सारम, वेदान्त संग्रहम, वेदान्त दीपक
गुरू - यादव प्रकाश
रामानुजाचार्य
माता - कान्तीमती
पिता - केशव/सौमेया
प्रथम गुरु - यादव प्रकाश
उपाधि - यतिराज
इनका जन्म तिरुपति नगर (सीमान्द्र) 1017 ईस्वी में हुआ था। इन्हें दक्षिणी भारत में मध्य काल में भक्ति का जनक कहा जाता है। इन्होंने विष्णु व लक्ष्मी की उपासना की थी। इन्होंने विशिष्टाद्वैतवाद (ब्रह्मा व जीव एक है) मत का प्रतिपादन किया। रामानुजाचार्य ने वेदान्त सारम्, वेदान्त संग्रहम्, वेदान्त दीपक ग्रंथ की रचना की। यादव प्रकाश इनके गुरू थे। 1137 ई. में रामानुजाचार्य का निधन हो गया। इन्होंने रामानुज/श्रीसम्प्रदाय की स्थापना की। यमुनाचार्य रामानुजाचार्य के गुरु थे। रामानुजाचार्य श्री भाष्य ग्रंथ की रचना की। रामानुज संप्रदाय का मूल संस्थापक यमुनाचार्य थे।
रामानन्द
इनका जन्म 1299 ई. इलाहाबाद/प्रयाग (यू.पी.) में हुआ था। ये काशी में निवास करते थे। राघवानन्द कान्चीपूर्ण इनके गुरु थे। इनका निधन 1411 ई. में हुआ। इनके पिता का नाम पुण्य सदन और माता का नाम सुशीला देवी था। प्रधान पीठ (भारत) काशी का श्रीमठ। रामानन्द ने अद्वैतवाद का मत दिया। इन्होंने बैरागी सम्प्रदाय रामानन्दी/रामावत/रसिक सम्प्रदाय की स्थापना की। इनकी भक्ति दास्य भाव की थी। ये भगवान राम की पूजा करते थे। रामानन्द ने भक्ति में सर्वप्रथम महिलाओं को भी शामिल किया। पद्मावती व सुरसरी रामानन्द की शिष्या थीं। रामानन्द को भक्ति आन्दोलन का सेतु कहा जाता है। इन्होने संस्कृत की जगह हिन्दी में उपदेश दिये। इन्होंने भक्ति धारा को दक्षिणी भारत से उत्तर भारत में लाने का काम किया है। इन्हें सगुण व निर्गुण भक्त कहा जाता है। इन्होने भक्ति में जाति-पाँति का भेदभाव मिटाया।
रामानन्द श्री संप्रदाय के 5वें गुरु/अध्यक्ष थे।
इनके कुछ उपदेश आदि ग्रंथ में संकलित है।
इन्होंने मध्यकालीन भारत में धार्मिक पुनर्जागरण को प्रारम्भ किया।
ग्रंथ
- रामार्जुन पद्धति
- रामरक्षा स्त्रोत
- गीता भाष्य
- वैष्णव मताब्द भास्कर
- आनन्द भाष्य
"जाति-पाँति पूछे नही कोय,
हरि को भजे सो हरि को होय।"
इन्होंने हनुमान जी की आरती लिखी।
रामानन्द के 12 शिष्य प्रमुख थे-
योगानन्द, नरहर्यानन्द, सुरसुरानन्द, सुखानन्द, अनन्तानन्द (ब्राह्मण), धन्ना (जाट), पीपा (क्षत्रिय), रैदास (मेघवाल), कबीर (जुलाहा), आशानन्द सैन (नाई), सहना (कसाई), पदमावती व सुरसरी (शिष्या)
रामानन्द के शिष्य
सन्त पीपा (क्षत्रिय)
सन्त पीपा का जन्म 1425 ई., चैत्र पूर्णिमा को गागरोन में हुआ था। यह गागरोन के (झालावाड़) शासक रहे। कड़ावाराव खींची इनके पिता व लक्ष्मीवती इनकी माता थी। पत्नी सीता के कहने पर इन्होंने भतीजे भोजराज को शासन सौंप कर सन्यास ले लिया। बनारस (यू.पी.) में ये रामानन्द के शिष्य बन गये।
राजस्थान में इन्हें निर्गुण भक्ति परम्परा का जनक माना जाता है। इनके बचपन का नाम प्रताप सिंह था। पीपा ने अपने भाई कल्याणराव के पुत्र भोजराज को राज्य सौंपकर तपस्या की थी। पीपा की कुल 20 रानियाँ थीं। जिनमें सबसे छोटी रानी सोखड़ी पदमावती ने पीपा का भक्ति में सहयोग किया। इनकी छतरी गागरोन में है। इनकी गुफा टोडाराय सिंह (टोंक) में है जहाँ पीपा को ज्ञान की प्राप्ति व मृत्यु हुई थी। इनका मंदिर समदड़ी (बालोतरा) में है जहाँ चैत्र पूर्णिमा को मेला भरता है। पीपा का एक अन्य मंदिर मसूरिया (जोधपुर) में है। यह दर्जी समुदाय के आराध्य देव हैं क्योंकि पीपा ने अपना अंतिम समय दर्जी का कार्य कर बिताया था। मंदिर में इनके चरणचिन्हों की पूजा होती है। कुछ दिन पीपा द्वारिका (गुजरात) रहे। शिवदास गाडण के ग्रन्थ अचलदास खींची री वचनिका के अनुसार पीपा ने फिरोज तुगलक को हराया था। पीपा के उपदेश जोग चिन्तामणि में संग्रहित है। चिन्तामणि की कुछ पंक्तियाँ आदि ग्रंथ में संग्रहित है। 1848 ई. फ्रांसीसी दार्शनिक गार्सा द तासी ने पीपा की जीवनी लिखी थी।
संत पीपा को द्वारिकाधीश मंदिर (गुजरात) में भगवान के साक्षात दर्शन हुये। संत पीपा ने एक शेर को पालतू बनाया तथा तेली जाति के एक व्यक्ति को मारकर पुनः जीवित किया।
संत रैदास/रविदास
इनका जन्म मीर गोवर्धनपुर (काशी) 1398 ईस्वी में बनारस में हुआ था। यह काशी में निवास करते थे। रविदास रैदास के बचपन का नाम था। संतोखदास इनके पिता थे तथा कलसा देवी इनकी माता थी। लोना इनकी पत्नी थी। ये मेघवाल जाति के थे। इन्होंने रायदासी सम्प्रदाय की स्थापना की। मीरा ने इन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु बनाया। इनकी छतरी चित्तौड़ दुर्ग में बनी है। इनकी वाणियों को पर्ची कहते हैं। इनके 30 से अधिक पद्य गुरुग्रन्थ साहिब/आदिग्रन्थ में संग्रहित है। कबीर ने इन्हें सन्तों का संत कहा है। रैदास की भक्ति निर्गुण थी। रैदास की साधना का स्थल अमृतसर के आस-पास था। रैदास जूते बनाकर जीविका चलाते थे। रैदास ने स्वयं को एक जगह लिखा है।
'कह्रै रैदास चमारा'
'मन चंगा तो कठौती में गंगा'
'प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी,
जाकि अंग-अंग बास समानी।
प्रभुजी तुम धन-बन हम मोरा,
जैसे चितवन चंद चकोरा'
सिकंदर लोदी ने रैदास को मुसलमान बनाने का प्रयास किया लेकिन नहीं बना पाया। सदनापीर नामक मुसलमान रैदास को मुसलमान बनाने आया था लेकिन रैदास की भक्ति देखकर वह स्वयं रामदास के नाम से रैदास का शिष्य बन गया।
"प्रभुजी तुम चन्दन, हम पानी।
जाकी अंग-अंग बास समानी।।
तुमसे कुछ नही छुपत है।
हम है अज्ञानी।।
संत धन्ना (जाट)
इनका जन्म 1415 ई. में वैशाख कृष्ण अष्टमी के दिन धुवन गाँव (दूनी, टोंक) में हुआ था। यह बनारस जाकर रामानंद के शिष्य बन गये। रामेश्वर इनके पिता थे। इन्हें राजस्थान में धार्मिक आन्दोलन का जनक कहा जाता है। इन्होंने भगवान को हठात भोजन करवाया। ये पंजाब के प्रसिद्ध संत हैं। राजस्थान में धन्ना बीकानेर व मारवाड़ में पूजे जाते हैं। संत धन्ना ने सगुण तथा निर्गुण भक्ति को अपनाकर जातिगत भेदभाव व बाह्य आडम्बर का विरोध किया। माना जाता है कि अगर किसी खेत में फसल कम होती है तब धन्ना जी की पूजा करने से फसल होने लगती है। शादी में केवल गणेश जी की पूजा करते धन्ना जी के उपदेश धन्ना जी की आरती में संग्रहित हैं। इनके कुछ पद्य आदि ग्रन्थ में संग्रहित हैं।
संत कबीर (जुलाहा)
इनका जन्म- 1398 ई. काशी में हुआ। बनारस के नीरु व निम्मा को लहर तारा तालाब में बहते मिले। ये रामानंद के शिष्य थे। ये भारत के सबसे बड़े निर्गुण संत माने जाते हैं। दादू व मलूक दास इनके शिष्य थे। कमाल व कमाली कबीर के पुत्र-पुत्री थे। कबीर के उपदेश की भाषा खिचड़ी/सधुकड़ी थी। बीजक, खासनामा, साखी/साक्षी, सबद व रमैणी कबीर के प्रमुख ग्रंथ हैं। कबीर की शिक्षाओं को उनके शिष्य भागदास ने बीजक में संग्रहित किया। कबीर की मृत्यु 1518 ई. में मगहर (यू.पी.) में हो गयी तथा उनके शरीर के फूल बन गये। कबीर पंथी सिर पर नौकरदार पीली टोपी ओढ़ते हैं। अनन्दास के ग्रंथ 'कबीर - परिचय' के अनुसार सिकन्दर लोदी ने कबीर पर अनेक अत्याचार किये थे। बीजक के तीन भाग हैं- साखी, सबद, रमैणी। अमर मूल, अनुराग सागर, अग्रगीता, मुहम्मद बोध, रेख्ता, अगाध मंगल कबीर की अन्य रचनाएँ हैं। कबीर की मृत्यु के बाद उनके शिष्य धर्मदास गद्दी पर बैठे थे। लौई कबीर की पत्नी थी।
दोहे -
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दिया मिलाय।।
कांकर पत्थर जोड़के मस्जिद ली चिनाय।
ता ऊपर बैठ कर मियां बांग लगाय।।
क्या बहरा हुआ खुदाय।।
"सुखिया सब संसार है, खावै अरू सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागे अरू रोवै"
सैना/आशानन्द
यह नाई जाति का था।
सहाना
यह कसाई जाति का था।
कृष्णदास पयहारी
इनका जन्म 1542 ई. में दाधीच ब्राह्मण परिवार में हुआ था। ये भोजन में केवल दूध का ही सेवन करते थे जिस कारण इन्हें पयहारी कहा जाता है। अनंतानंद कृष्णदास के गुरु थे। कृष्णदास ने राजस्थान में गलता तीर्थ (जयपुर) की स्थापना की जो राजस्थान में रामानंद सम्प्रदाय की प्रधान पीठ है। गलता तीर्थ को उत्तर तोत्ताद्रि कहते हैं। कृष्णदास ने नाथ सम्प्रदाय के चतुर्नाथ को शास्त्रार्थ में हराया था। (1503 ई.) गलता तीर्थ में राम-सीता की युगल सरकार के रूप में पूजा होती है। गलता तीर्थ को मंकी वैली के नाम से भी जाना जाता है। रामानंद सम्प्रदाय निहंग (नंगे) साधु भी होते हैं। इनके रहने का स्थान अखाड़े कहलाते हैं। जुगलमैन, प्रेमतत्व निरुपता, ब्रह्मगीता आदि कृष्णदास पयहारी ने ब्रज भाषा में ग्रंथों की रचना की। सवाई जयसिंह ने रामानंद सम्प्रदाय को आश्रय देकर अपने दरबारी कवि कृष्णभट्ट कला निधि से रामा रसा ग्रंथ की रचना करवाई।
अग्रदास
ये कृष्ण दास पयहारी के शिष्य थे। इन्होंने रामानन्दी सम्प्रदाय की राजस्थान में दूसरी प्रमुख पीठ रैवासा (सीकर) की स्थापना की। अग्रदास के शिष्य नाभादास थे। अग्रदास ने संस्कृत भाषा में चार ग्रंथों की रचना की- अष्टयाम, हितोपदेश, उपासना बावनी, ध्यानमंजरी।
किल्हण दास
ये अग्रदास के शिष्य थे। इन्होंने राम और सीता की राधा और कृष्ण के रूप में पूजा प्रारम्भ की। जिस कारण इस सम्प्रदाय का नाम रसिक सम्प्रदाय हो गया।
निम्बकाचार्य
सुदर्शन चक्र का अवतार।
इनका जन्म 1165 ई. वैलारी (मद्रास) में हुआ था। ये तेलंगाना के निवासी थे। इन्होंने द्वैताद्वैतवाद/भेदाभेद (ईश्वर, जगत व आत्मा भिन्न है फिर भी एक है।) मत का प्रतिपादन किया। नारद मुनि इनके गुरु थे। भास्कर इनके बचपन का नाम था। ये ज्ञान मार्गी थे। इन्होंने 1192 ई. निम्बार्क/सनक/हंस/नारद/सनकादी सम्प्रदाय की स्थापना की। इस सम्प्रदाय के लोग राधा और कृष्ण की युगल सरकार के रूप में पूजा करते हैं। इस सम्प्रदाय की भारत में प्रधान पीठ वृंदावन (मथुरा, यू.पी.) में है।
राजस्थान में इस सम्प्रदाय की प्रधान पीठ सलेमाबाद (अजमेर) में है। जिसकी स्थापना 17 वीं सदी में नारनौल के परशुराम ने रुपनगढ़ नदी के किनारे की थी। परशुराम का जन्म 16वीं सदी में ठिकरिया गाँव (सीकर) में हुआ। हरिव्यास जी परशुराम जी के शिष्य थे। निम्बार्क सम्प्रदाय की राजस्थान में अन्य पीठ उदयपुर व जयपुर में है। राजस्थान में इस सम्प्रदाय के मंदिरों को गोपालद्वारे कहते हैं। मारवाड़ में निम्बार्क सम्प्रदाय को निमावत साध के नाम से जाना जाता है। वैदांत परिजात सौरभ व दस सलोकी निम्बार्काचार्य की रचना है। निम्बार्क संप्रदाय का पुनर्गठन उत्तर भारत में वृन्दावन में हरिव्यास देव ने किया था। परशुराम जी ने परशुराम सागर ग्रंथ की रचना की थी। यह ग्रंथ राजस्थानी मिश्रित हिन्दी में लिखा गया।
वल्लभाचार्य
वल्लभाचार्य का जन्म वैशाख शुक्ल एकादशी को हुआ था। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया विक्रम संवत 1587 काशी में वल्लभाचार्य का निधन हो गया। लक्ष्मण भट्ट वल्लभाचार्य के पिता तथा यल्तमगरू माता थी। महालक्ष्मी के साथ वल्लभाचार्य का विवाह हुआ जो देवभट्ट की पुत्री थी। इनका जन्म 1478 ई. में चम्पारण, बिहार में हुआ था। ये बनारस के निवासी थे। इन्होंने शुद्धा द्वैतवाद (आत्मा-परमात्मा एक है) मत दिया। इन्होंने वल्लभ/रूद्र/पुष्टि मार्गी सम्प्रदाय की स्थापना की। (रूद्र सम्प्रदाय का मूल संस्थापक विष्णु स्वामी को माना जाता है।) इस सम्प्रदाय के लोग भगवान कृष्ण की बालरूप में पूजा करते हैं। माना जाता है कि वल्लभाचार्य द्वारिका की यात्रा से लौटते समय कुछ समय पुष्कर में रहे थे जिस कारण यहां वल्लभघाट बना है। वल्लभाचार्य ने अणुभाष्य, सिद्धान्त रहस्य, भागवत टीका सुबोधिनी, ब्रह्म सूत्र, गीता, श्रीमद्भागवत ग्रंथों की रचना की। वल्लभाचार्य ने वृंदावन में श्रीनाथ जी के मंदिर का निर्माण प्रारम्भ किया जिसे पूर्ण इनके पुत्र विट्ठल नाथ ने किया था। औरंगजेब के समय जब (1669 ई.) इस मंदिर को तोड़ा गया तब गोस्वामी दामोदर गोविन्द जी ने वृंदावन से दो मूर्तियाँ लाकर बूंदी, कोटा, किशनगढ़, पुष्कर होते हुए कदमखेड़ी (चौपासनी, जोधपुर) नामक जगह पर ठहरे तथा कुछ समय बाद मेवाड़ के शासक राणा राजसिंह (1652-80 ई.) को दी। जिसने इनके 1672 ई. में दो मंदिर बनवाये:-
श्री नाथ जी
इस मूर्ति का मंदिर सिहाड़ गाँव (नाथद्वारा, राजसमंद) में करवाया गया। जहाँ की पिछवाईयाँ (भगवान श्रीकृष्ण की कपड़े पर बाल लीलाएँ) प्रसिद्ध हैं। यहाँ के मन्दिरों को हवेली व संगीत को हवेली संगीत कहते हैं। भगवान के दर्शन को झांकी व ईश्वर की कृपा को पुष्टि कहा जाता है। यहां दिन में 8 बार आरती होती है- (1) मंगला (2) श्रृंगार (3) ग्वाल (4) राजभोग (5) उत्थापन (6) भोग (7) आरती (8) शयन
1669 ई. में जब औरंगजेब ने मंदिर तोड़ो अभियान चलाया तब वृन्दावन से विट्ठलनाथजी के वंशज गोस्वामी दामोदर व उनके भाई गोविन्द जी श्रीनाथजी की मूर्ति लेकर राजस्थान में सबसे पहले कोटा, कोटा से पुष्कर, पुष्कर से किशनगढ़, किशनगढ़ से जोधपुर, जोधपुर से चौपासनी, चौपासनी से कदम खंडी नामक जगह पर रुके, कदम खंडी से मेवाड़ के सिहाड़ गांव में राणा राजसिंह ने मंदिर का निर्माण करवाया। श्रीनाथजी को सात ध्वजा के स्वामी कहते हैं। श्रीनाथजी की प्रतिमा में ठोड़ी में लगा हीरा औरंगजेब ने भेंट किया था।
द्वारिकाधीश जी का मंदिर
इस मूर्ति का मंदिर राजसमंद झील के किनारे कांकरोली (राजसमंद) में बनाया गया। विट्ठल नाथ अष्ठ छाप के कवि थे। जिन्होंने 84 वैष्णव की वार्ता ग्रन्थ की रचना की। वल्लभ सम्प्रदाय की एक अन्य पीठ कोटा में है। वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठल नाथ के सात पुत्रों ने वल्लभ सम्प्रदाय के सात मन्दिर बनवाये-
(i) मथुराधीश जी मंदिर - कोटा - 1744 ई. दुर्जनशाल ने निर्माण करवाया। प्रथम पीठ
(ii) गोकुलचन्द्र जी का मन्दिर- कामा, डीग
(iii) मदनमोहन जी का मन्दिर - करौली
(iv) गोकुलनाथजी का मन्दिर - उत्तर प्रदेश
(v) बालकृष्ण जी का मन्दिर - सूरत, गुजरात
(vi) विट्ठलनाथ जी का मन्दिर - नाथद्वारा, राजसमन्द
(vii) द्वारिकाधीश जी का मन्दिर - कांकरोली, राजसमन्द
वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ के निम्न शिष्य थे-
- परमानन्ददास- इनका जन्म 1493 ई. में कन्नौज के कान्यकुन्ज ब्राह्मण कुल में हुआ। प्रयाग में वल्लभाचार्य के शिष्य बने। 'परमानन्द सागर संग्रह' इनका प्रमुख ग्रंथ है।
- नन्ददास- इनका जन्म 1533 ई. में उत्तर प्रदेश में हुआ। ये विट्ठलदास के शिष्य थे। इन्हें 'जड़िया कवि' के नाम से जाना जाता है। सुदामाचरित, रूप मंजरी, प्रेम बारहखड़ी, रास पंचाध्यायी, श्याम सगाई नन्ददास की प्रमुख रचनाएँ हैं।
- गोविन्द स्वामी- इनका जन्म झांतरी गाँव (भरतपुर) में 1505 ई. में इन्होंने विट्ठलनाथ से दीक्षा ली। 'कदम्ब खड़ी' में गोविन्द स्वामी की जानकारी मिलती है। अकबर के नवरत्न संगीत सम्राट तानसेन ने इनसे पदगायन की दीक्षा ली थी।
- चतुर्भुजदास- इनका जन्म 1530 ई. में हुआ। कुंभनदास इनके पिता थे। इनकी रचनाएँ कीर्तनावली में संकलित हैं। विट्ठलनाथ के शिष्य थे।
- छीत स्वामी- ये मथुरा के ब्राह्मण थे। ये विट्ठलनाथ के शिष्य थे। पदावली नाम से इनके पदों का संकलन है।
माध्वाचार्य
इनका जन्म 1197 ईस्वी में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। ये विष्णु के भक्त थे। इन्होंने द्वैतवाद (ईश्वर व जीव भिन्न-भिन्न) का मत दिया। पूर्णप्रज्ञभास्य इनका ग्रंथ है। संन्यास लेने के कारण इनका नाम आनन्द तीर्थ पड़ गया। इन्होंने ब्रह्म सम्प्रदाय की स्थापना की। विष्णु के उपासक थे।
नोट- दादूदयाल ने परब्रह्म संप्रदाय चलाया था।
गौरांग महाप्रभु चैतन्य
इनका जन्म 1485 ई. में नवद्वीप/नादिया (बंगाल) में हुआ। ये बंगाल के निवासी थे। जगन्नाथ मिश्र चैतन्य इनके पिता तथा शची देवी इनकी माता थीं। विष्णुप्रिया चैतन्य की पत्नी थी। माध्वाचार्य इनके गुरु थे। इनके बचपन का नाम निमाई पंडित था। चैतन्य को विश्वम्भर के नाम से जाना जाता है। चैतन्य ने 1510 ई. में गृह त्याग दिया 1533 ई. में इसका निधन हो गया। चैतन्य ने भेदा-भेदवाद, अचिन्त्य सिद्धांत दिया। चैतन्य के गुरू ईश्वरपुरी थे। चैतन्य ने 24 वर्ष की उम्र में केशव भारती से दीक्षा लेकर सन्यास लिया था। इन्होंने गौड़ीय सम्प्रदाय की स्थापना की जिसमें भगवान कृष्ण की पूजा होती है। इन्होंने सर्वप्रथम कीर्तन व नृत्य को ईश्वर भक्ति का अंग माना। इनके विचारों को आधुनिक वैष्णववाद कहते हैं।
नोट- गौड़ीय संप्रदाय का वास्तविक संस्थापक माध्वाचार्य का पुत्र गौड़ स्वामी को माना जाता है। गौरांग महाप्रभु ने गौड़ीय संप्रदाय का सर्वाधिक प्रचार-प्रसार किया जिस कारण उसे वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
कृष्णदास ने चैतन्य चरितामृत नामक चैतन्य की जीवनी लिखी। गौड़ीय सम्प्रदाय की प्रधान पीठ गोविन्द देव जी मंदिर (सिटी पैलेस, जयपुर) का मंदिर है। जिसका निर्माण विक्रम संवत 1770 में करवाया गया। इस पीठ की स्थापना रुपगोस्वामी ने की थी। गोविन्द देव जी को जयपुर के शासक अपना राजा समझते हैं। यहाँ भगवान कृष्ण के मुख की पूजा होती है। आमेर शासक मानसिंह प्रथम ने वृन्दावन में राधागोविन्द मन्दिर का निर्माण करवाया। जो भारत में गौड़ीय संप्रदाय की प्रधान पीठ है। माना जाता है कि गजनी शासक मोहम्मद गजनवी के आक्रमण के समय माध्वाचार्य ने भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति को भूमि में छुपा दिया था। जिसे ढूँढ़ने के लिये 16वीं सदी में गौरांग महाप्रभु चैतन्य ने अपने शिष्य सनातन गोस्वामी व रूपगोस्वामी को भेजा। रूपगोस्वामी ने मूर्ति को ढूँढ़ा जिसका मंदिर 1590 ई. में आमेर शासक मानसिंह प्रथम ने वृन्दावन में बनवाया। जब औरंगजेब के समय इस मंदिर को तोड़ा जाने लगा तब श्री शिवराम गोस्वामी मूर्ति लेकर कामां (डीग) आये जहाँ से रामसिंह प्रथम मूर्ति लेकर जयपुर के गोविन्ददेवजी मंदिर में स्थापित करवाया। गोविन्ददेवजी मंदिर का मूल निर्माण मानसिंह प्रथम ने करवाया था।
नोट- सवाई जयसिंह 1772 ई. गोविन्द देवजी की मूर्ति पुराने गोविन्ददेवजी मंदिर से लाकर सिटी पैलेस (जयपुर) में सूर्य महल में स्थापित किया।
वज्रनाभ ने भगवान कृष्ण के अलग-अलग अंगों को भिन्न-भिन्न स्थानों पर मंदिर बनवाया-
- गोविन्ददेवजी (जयपुर) - मुख भाग - प्रधान पीठ यह मंदिर बिना शिखर का मंदिर है।
- गोपीनाथजी (जयपुर) - वक्ष भाग - अन्य पीठ
- मदनमोहन जी (करौली) - चरण भाग - अन्य पीठ
गौड़ीय सम्प्रदाय की अन्य पीठ
- मदनमोहन जी (करौली)- इस पीठ की स्थापना सनातन गोस्वामी ने की थी। यहाँ भगवान कृष्ण के चरणों की पूजा होती है।
- गोपीनाथ जी (जयपुर) - इस पीठ की स्थापना मधु पण्डित ने की थी। यहाँ भगवान कृष्ण के वक्ष की पूजा होती है।
- राधा विनोद (जयपुर) - इस पीठ की स्थापना लोकनाथस्वामी ने की थी।
- राधा दामोदर (जयपुर) - इस पीठ की स्थापना जीवगोस्वामी ने की थी।
दादूदयाल
इनका जन्म 1544 ई. फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को अहमदाबाद में हुआ था। इनके बचपन का नाम महाबली था। लोदी राम को यह साबरमती नदी में मिले थे। लोदी राम व सावित्री ने इनका पालन किया। बुड्ढन जी/बुद्धाराम/वृदानन्द व कमाल (कबीर के पुत्र) इनके गुरु थे। गरीबदास व मिस्किनदास दादू के शिष्य तथा रूपकुंवरी व शोभाकुंवरी दादू की पुत्रियाँ थी। दादू प्रारम्भ में धुनिया का काम करते थे।
मोतीलाल मेनारिया ने दादूदयाल को राजस्थान का कबीर कहा है। 1574 ई. में इन्होंने सांभर में दादू पंथ/परब्रह्म सम्प्रदाय/निपख सम्प्रदाय की स्थापना की। 1603 ई. में ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी को फुलेरा (जयपुर) में इनका निधन हो गया। इनकी प्रधान पीठ नारायणा (सांभर, जयपुर) में है। नारायणा में दादूदयाल के चरण चिन्ह पूजे जाते हैं तथा यह हिन्दू-मुस्लिम समन्वय का केन्द्र माना जाता है। 1557 ई. में सांभर आये तथा 6 वर्ष तक भैराणा पहाड़ी (सांभर जयपुर) में तपस्या की। इनके उपदेश की भाषा सधुक्कड़ी/ढूंढाड़ी थी। दादू ने प्रथम उपदेश 1568 ई. में साम्भर जयपुर में दिया।
दादू री वाणी, दादू रा दूहा, हरड़े वाणी, अंग वधू (276 पद, 3 भाग) दादू के प्रमुख ग्रंथ हैं। दादू के शिष्यों ने अनभैवाणी व काव्य बेलि के नाम से दादू दयाल के उपदेशों को संकलित किया। दादूदयाल के ग्रंथ हरड़े वाणी का संकलन सुन्दरदास संतदास, रज्जब, जगन्नाथ ने किया था। फाल्गुन शुक्ल पंचमी से एकादशी तक इनका मेला भरता है। मुख्य मेला फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को भरता है। दादूदयाल ने मैग्जीन दुर्ग (अजमेर) की नींव रखी। 1585 ई. में इन्होंने फतेहपुर सीकरी (यू.पी.) में अकबर से मुलाकात की। दादूदयाल ने निपख आन्दोलन चलाया। दादूदयाल ने दुनिया का काम किया था।
दादूदयाल के कुल 152 शिष्य थे जिनमें 100 एकांतवासी तथा 52 घूम-घूमकर दादू द्वारों की स्थापना करने वाले, जिन्हें दादू पंथ के 52 स्तम्भ कहते हैं। दादूदयाल के ग्रंथ हरड़े वाणी का संकलन सुन्दरदास संतदास, रज्जब, जगन्नाथ ने किया था।
दादू पंथ की विशेषता
- विवाह नहीं करते हैं।
- पुत्र गोद लेते हैं।
- तिलक नहीं लगाते हैं।
- माला नहीं पहनते हैं।
- चोटी नहीं रखते हैं।
- शव को जंगल में छोड़कर आते हैं।
- सत्यराम से अभिवादन करते हैं।
- सत्संग स्थल को अलखदरीबा कहते हैं।
- मूर्ति पूजा का विरोध।
- हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल।
- गुरु-शिष्य परम्परा को मानना।
- निर्गुण ब्रह्म की उपासना।
दादूपंथियों की 6 शाखाएँ हैं:-
- खालसा:- नारायणा की गद्दी पर बैठने वाले खालसा कहलाये।
- विरक्त:- घूम-घूम कर उपदेश देने वाले।
- उत्तरादे/स्थानधारी:- विरक्त जो रतिया (हिसार) में स्थाई रहने लगे। बनवारी दास ने इस शाखा की स्थापना की।
- खाकी:- शरीर पर भस्म लगाने वाले तथा जटाएँ रखने वाले। यह शाखा रज्जब जी ने चलाई थी।
- नागा:- कृषि व व्यापार करने वाले तथा हथियार रखने वाले। इस शाखा की स्थापना सुन्दरदास ने की थी।
- निहंग
दादू पंथ के पंचतीर्थ:-
- कल्याणपुर:- जयपुर
- नारायणा:- जयपुर
- भराणा:- जयपुर
- सांभर:- जयपुर
- आमेर:- जयपुर
दादूदयाल के प्रमुख शिष्य
- गरीबदास:- यह दादूदयाल के पुत्र थे जो दादू के बाद नारायणा की गद्दी पर बैठे। साखी पद, आध्यात्म बोध, अनर्भ प्रबोध गरीब दास की रचना है। जन्म 1575 ई. में हुआ।
- सुन्दरदास:- इनका जन्म 1596 ई. में दौसा के खण्डेलवाल परिवार में हुआ। परमानन्द इनके पिता तथा सती इनकी माता थीं। इन्हें दूसरा शंकराचार्य कहा जाता है। इन्होंने नागा पंथ चलाया था। जिनकी प्रधान पीठ दौसा में है। ये सर्वाधिक शिक्षित थे। इनके उपदेश की भाषा ब्रज थी तथा ये श्रृंगार रस के घोर विरोधी थे। सुन्दरदास को मृत्यु के बाद अग्नि संस्कार किया था। 8 नवम्बर, 1997 ई. सुन्दरदास पर भारत सरकार ने 2 रूपये की डाक टिकट जारी की।
- ज्ञानसमुन्दर, हरिबोल चितावली, बारहमासो, गृह वैराग्य बोध ग्रंथ, गुरुकृपा अष्टक, सर्वाडयोग, पंचन्द्रिय चरित, सुखसमाधि, स्वप्न प्रबोध, वेद-विचार, उक्त अनूप, अद्भुत उपदेश, पंच प्रभाव, गुरुदया षटपदी, बावनी, सद्गुरु महिमा, गुत उतानि, गुरु सम्प्रदाय, साखी सुन्दरविलास व 42 ग्रन्थ रचना इनके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। इनकी मृत्यु 1707 ई. में सांगानेर में हो गयी थी।
- रज्जब जी:- इनका जन्म 16वीं सदी में विधवा बांधिनी से सांगानेर में हुआ। ये पठान परिवार के थे। शादी के समय दादू इनसे नाराज हो गये जिस कारण इन्होंने शादी न कर आजीवन दूल्हे का वेश रखा। दादूदयाल की मृत्यु पर इन्होंने अपनी आंख बंद कर ली। इनकी प्रधान पीठ सांगानेर, जयपुर में है। रज्जब वाणी व सर्वंगी इनके प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। रज्जब जी ने संसार को वेद तथा सृष्टि को कुरान कहा है। इनके अनुयायी रज्जवात कहलाते हैं। रज्जब जी ने अंगवधू में दादू की रचनाओं का संग्रह किया जिसमें तीन भाग है। दादूपंथ की उपशाखा खाकी की स्थापना रज्जब जी ने की थी।
- बखना जी:- इनका जन्म 1600 ई. में हुआ। ये नारायणा (जयपुर) के रहने वाले थे। इन्होंने अपने विचारों को गायन के माध्यम से प्रचारित किया जिस कारण इनकी रचना को गेय पद कहते हैं जिसकी संख्या 167 है। बखनाजी के विचार बखना जी वाणी ग्रन्थ में संग्रहित है।
- जनगोपालजी - इनका निवास फतेहपुर सीकरी में था। दादू जन्म लीला परची, ध्रुव चरित्र, प्रहलाद चरित्र, अनन्त लीला, बारहमासिया भंट, जखड़ी-काया प्राण संवाद, साखी, पद भरत-चरित्र, मोहविवेक, चौबीस गुरुओं की लीला आदि जनगोपाल जी प्रमुख रचनाएँ हैं।
- मंगलारामजी - इन्होंने सुन्दरोंदय सर्वोत्तम ग्रंथ की रचना की जिसमें नागा सम्प्रदाय का वर्णन है।
- मिस्किन्दास:- गरीबदास के बाद गद्दी पर बैठे।
- संत दास:- ये अग्रवाल जाति के थे तथा इन्होंने 1639 ई. में जीवित समाधि ले ली फतेहपुर में संत दास जी की 8 खम्भों की छतरी है। संत दास जी ने 12,000 छन्दों की वाणी के नाम से रचना की।
- जगजीवन:- ये प्रारम्भ में वैष्णव धर्म के थे, बाद में दादू के सम्पर्क में आने से दादूपंथी बन गये। ये ब्राह्मण जाति के थे।
- माधोदास:- संत बालिंदजी- भक्तमाल ग्रंथ के अनुसार एक दिन बालिंदजी हिरण का शिकार कर रहे थे हिरण के बच्चों को देखकर बालिंदजी के मन में दयाभाव आ गया तथा इन्होंने दादूपंथ अपना लिया। 'आरिलो' बालिंदजी का प्रमुख ग्रंथ है।
- जगन्नाथदास:- ये कायस्थ जाति के थे। वाणी गुण गंजनामा इनके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं।
जाम्भोजी/जाम्भेश्वरजी (निर्गुण)
इनका जन्म 1451 ई. में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी के दिन पीपासर (नागौर) में हुआ था। लोहठ जी परमार इनके पिता तथा हंसा देवी इनकी माता थीं। गुरु गोरखनाथ इनके गुरु थे। इनके बचपन का नाम धनराज था। पर्यावरण वैज्ञानिक व विष्णु का अवतार माने जाते हैं। इन्होंने 1485 ई. में कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन धोंक धोरा (समराथल, बीकानेर) में इन्होंने विश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना की जिसमें 29 नियम हैं। जाम्भोजी ने आज्ञानुवर्ती सम्प्रदाय को विश्नोई सम्प्रदाय में दीक्षित किया।
विश्नोई सम्प्रदाय के उपदेश स्थल को साथरी कहते हैं। 1483 ई. में जाम्भोजी संभराथल गये। जाम्भोजी के प्रथम अनुयायी पूल्होजी पंवार बने। जाम्भोजी के बाद वील्होजी विश्नोई सम्प्रदाय के अध्यक्ष बने। जाम्भोजी को नागौर के हाकीम मोहम्मद खाँ ने परेशान किया था। राणा साँगा, सातलदेव, मोहम्मद खाँ, रावदूदा, जैत्रसिंह, सिकन्दर लोदी जाम्भोजी के अनुयायी थे।
1536 ई. में तालवा गांव (मुकाम, नोखा, बीकानेर) में जाम्भोजी का निधन हो गया। जहां इस सम्प्रदाय की प्रधान पीठ है। जम्भसागर (29 नियम), जम्भवाणी, जम्भसंहिता/जम्भगीता (पाँचवा वेद/19 वाँ पुराण), विश्नोई धर्म प्रकाश इनके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। इनका मेला फाल्गुन व आश्विन की अमावस्या को भरता है।
विश्नोई संप्रदाय के अनुयायी भेड़-बकरी नहीं पालते हैं क्योंकि भेड़-बकरी नव अंकुरित पौधों को खा जाते हैं। जाम्भोजी ने विष्णु उपासना पर सर्वाधिक बल दिया है। जाम्भोजी द्वारा तैयार अभिमंत्रित मंत्र जिसे 'पाहल' कहते हैं। इस मंत्र को पिलाकर जाम्भोजी ने विश्नोई संप्रदाय की दीक्षा दी।
- माटो- बीकानेर राजाओं ने राजकीय झंडे में खेजड़ी के वृक्ष को राज्य चिह्न के रूप में अंकित करवाया।
- गोवलवास- जाम्भोजी ने संसार को अस्थायी निवासी बताया।
विश्नोई सम्प्रदाय आराध्य स्थान
- पीपासर (नागौर):- जाम्भोजी का जन्म स्थान है इसे खड़ाऊ की पीपा कहते हैं।
- रोटू (जायल, नागौर):- विश्नोइयों का धार्मिक स्थल
- मुकाम (बीकानेर):- जाम्भोजी का समाधि स्थल। यहाँ 1536 ई. जाम्भोजी ने समाधि ली। यह मूल मंदिर है।
- जांगलू (बीकानेर):- यहाँ चैत्र व भाद्र अमावस्या को मेला भरता है।
- रामड़ा बास (बिलाड़ा, जोधपुर)- विश्नोइयों का मंदिर व उपदेश स्थल।
- जाम्भा (बाप, फलौदी):-विश्नोइयों का पुष्कर जहाँ चैत्र व भाद्रपद अमावस्या को मेला भरता है। यहाँ तालाब है।
- लालसर (बीकानेर):- यहां जाम्भोजी का निर्वाण (1536 ई.) (निधन) हुआ।
विश्नोई सम्प्रदाय के 29 नियम
- तीस दिन सूतक रखना।
- पाँच दिन ऋतुवन्ती स्त्री को गृहकार्य से पृथक रहना।
- प्रतिदिन सवेरे स्नान करना।
- शील का पालन करना व संतोष रखना।
- बाह्य और आन्तरिक पवित्रता रखना
- द्विकाल संध्या-उपासना करना।
- संध्या समय आरती और हरिगुण गाना।
- निष्ठा और प्रेमपूर्वक हवन करना
- पानी, ईंधन और दूध को छान कर प्रयोग में लेना।
- वाणी विचार कर बोलना।
- क्षमा-दया धारण करना।
- चोरी नहीं करना।
- निन्दा नहीं करनी।
- झूठ नहीं बोलना।
- वाद-विवाद का त्याग करना।
- अमावस्या का व्रत रखना।
- विष्णु का भजन करना।
- जीव दया करना।
- हरा वृक्ष नहीं काटना।
- काम, क्रोध आदि अजरों को वश में करना।
- रसोई अपने हाथ से बनानी।
- थाट अमर रखना।
- बैल बधिया नहीं करना।
- अमल नहीं खाना।
- तम्बाकू नहीं खाना।
- भांग नहीं पीना।
- मद्यपान नहीं करना।
- मांस नहीं खाना।
- नीला वस्त्र व नील का त्याग करना।
नोट- यह सम्प्रदाय मुख्य रुप से पेड़-पौधों व वन्य-जीवों की रक्षा के लिए जाना जाता है। 1604 ई. में रामसड़ी (डेगाना, नागौर) के कर्मा व गौरा ने वृक्षों की रक्षा हेतु सर्वप्रथम अपना बलिदान दिया। जो विश्नोई सम्प्रदाय के थे। वूंचोजी ने वृक्षों के लिए अपना बलिदान दिया जो पोलवास गाँव (मेड़ता) के थे। 1983 में खेजड़ी को राज्य वृक्ष घोषित किया गया जिसका वैज्ञानिक नाम प्रोसोपिस सिनेरेरिया है।
खेजड़ली घटना (जोधपुर)
राव अभयसिंह (1724-1749 ई.) के समय 28 अगस्त, 1730 ई. (विक्रम संवत-1787) को अभयसिंह के सेनापति गिरधर दास भंडारी ने खेजड़ली ग्राम में हरे वृक्ष काटे। जिसे रोकने के लिए अमृता देवी विश्नोई के नेतृत्व में कुल 363 लोगों (294 पुरुष व 69 महिलाओं) ने अपना बलिदान दिया। इस घटना में प्रथम बलिदान अमृता देवी ने व पुरुषों में प्रथम बलिदान अणदोजी ने दिया। भाद्रपद शुक्ल दशमी को खेजड़ली ग्राम में विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला भरता है। 12 सितम्बर को खेजड़ली दिवस मनाया जाता है। पर्यावरण के क्षेत्र में राजस्थान में सबसे बड़ा पुरस्कार अमृता देवी स्मृति पुरस्कार दिया जाता है। इस आन्दोलन की प्रेरणा लेकर सुन्दरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में पेड़ों को बचाने के लिए उत्तराखण्ड में चिपको आन्दोलन हुआ था। बीकानेर के झण्डे में खेजड़ी का वृक्ष था।
नोट- वृक्षों हेतु बलिदान देना खण्डाणा साका कहलाता है।
चरणदास जी (निर्गुण व सगुण)
इनका जन्म भाद्रपद शुक्ल तृतीया विक्रम संवत 1760 डेहरा गाँव में हुआ था। इनके बचपन का नाम रणजीत सिंह था। मुरलीधर इनके पिता व कुन्जो बाई इनकी माता थीं। ये जैन परिवार से थे। सुखदेव इनके गुरु थे। इन्होंने भाद्रपद शुक्ल तृतीया को 42 नियमों वाला चरणदासी सम्प्रदाय चलाया। चरणदासी संप्रदाय का मुख्य आधार भगवतगीता है। इनकी भक्ति सखा भाव की थी। इनके 52 शिष्य थे। 1782 ई. में इनका दिल्ली में निधन हो गया जहाँ इस सम्प्रदाय की प्रधान पीठ है। जयपुर शासक सवाई प्रताप सिंह चरणदास जी के अनुयायी थे। चरणदास सम्प्रदाय के अनुयायी पीले वस्त्र पहनते हैं।
बसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी) को इस सम्प्रदाय का मेला भरता है। ब्रह्म ज्ञान सागर, ब्रह्म चरित्र, भक्ति सागर, ज्ञान सर्वोदय चरणदास जी के प्रमुख ग्रन्थ हैं। चरणदास जी ने मूर्ति पूजा का खण्डन किया।
दया बाई (विनयमालिका व दयाबोध ग्रन्थ की रचना) चरणदासजी की शिष्या थी। जिसकी मृत्यु 1855 ई. में बिठूर (उत्तरप्रदेश) में हो गई। दयाबाई केशव की पुत्री थी।
सहजो बाई (मत्स्य की मीरा) चरणदास जी की महिला शिष्या थीं। जिसने भगवान कृष्ण की भक्ति की। सहजो बाई ने सहज प्रकाश, सबदवाणी, सौलह तिथि ग्रंथों सात वार निर्णय की रचना की। चरणदास जी ने नादिरशाह के आक्रमण (1739 ईस्वी) की भविष्यवाणी की थी।
नोट- नादिरशाह को ईरान का नेपोलियन कहते हैं। भारत का नेपोलियन समुद्रगुप्त कहलाता है। नेपोलियन फ्रांस का था।
संत मावजी (सगुण व निर्गुण)
- जन्म - वि.स. 1771, माघ शुक्ल पंचमी, साबला (डूंगरपुर)
- पिता - दालम ऋषि
- माता - केसरबाई
- उपनाम - वागड़ के धणी
- संप्रदाय- निष्कलंक
1727 ईस्वी में मावजी को ज्ञान की प्राप्ति हुई तथा इन्होंने सोम, माही व जाखम के संगम पर बेणेश्वर धाम (डूंगरपुर) की स्थापना की जहाँ माघ पूर्णिमा को मेला भरता है। जिसे आदिवासियों का कुम्भ कहते हैं। मावजी के अनुयायी को साध कहते हैं। मावजी की वाणियों को चोपड़ा (वागड़ी भाषा) कहते हैं जिसमें भगवान कृष्ण की लीलाएँ हैं। चोपड़े दीपावली पर बाहर निकाले जाते हैं तथा मकर संक्रांति पर इनका वाचन होता है। मावजी ने अछूतों के लिए लसोड़िया आन्दोलन चलाया। मावजी की पुत्रवधू जनककुमारी ने सर्वधर्म समन्वयवादी मंदिर का निर्माण बेणेश्वर में किया। (1882 ई.)
हरिदास जी (सगुण)
इनका जन्म 1452 ई. में सांखला परिवार में कापड़ोद (डीडवाना) हुआ। इन्होंने निरंजनी/निराला सम्प्रदाय की स्थापना की। इस सम्प्रदाय की प्रधान पीठ गाढ़ा (डीडवाना) में है। जहाँ इनका निर्वाण हुआ था। निहंग व घरबारी निरंजनी सम्प्रदाय की 2 शाखाएँ हैं। हरिदास ने तीखी डुंगरी पहाड़ी पर तपस्या की थी। इन्हें कलियुग का वाल्मीकि कहा जाता है।
समाधि - गाढ़ा (डीडवाना) 1543 ई.
1513 ई. में इन्हें बौद्ध ज्ञान की प्राप्ति हुई।
नोट- भीनमाल (जालौर) के कवि माघ को राजस्थान का वाल्मीकि कहते हैं।
हड़बू जी सांखला हरिदास जी के गुरु थे। हरिदास जी के उपदेश मंत्र राज प्रकाश, विरदावली, भरथरी संवाद व हरिपुरुष की वाणी, संग्राम जोग ग्रंथ, हंस प्रबोध जोग ग्रंथ, अष्टपदी जोग ग्रंथ, ब्रह्म स्तुति ग्रंथ में संग्रहित है। हरिदास जी के 52 शिष्य थे। फाल्गुन शुक्ल प्रथमा से द्वादशी तक इनका मेला भरता है। निरंजनी संप्रदाय ओडिशा में प्रसिद्ध है। इन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल दिया।
रामचरण जी (निर्गुण व सगुण)
इनका जन्म माघ शुक्ल चतुर्दशी 24 जनवरी, 1720 ईस्वी सोडा गाँव (सूरसेन, टोंक) में हुआ। बख्तराम के पिता तथा देवजी इनकी माता थीं। पत्नी गुलाब कंवर, कृपाराम (दांतड़ा) इनके गुरु थे। रामकिशन इनके बचपन का नाम था। इन्होंने 1760 ई. रामस्नेही सम्प्रदाय की स्थापना की। इस सम्प्रदाय की प्रधान पीठ शाहपुरा में है। शाहपुरा में इस सम्प्रदाय का अंतर्राष्ट्रीय कार्यालय है। चैत्र कृष्ण द्वितीया से पंचमी तक शाहपुरा में फूलडोल मेला भरता है।
आना भाई वेणी रामचरण जी के गीतों का संग्रह है। 1798 ई. में रामचरण जी का शाहपुरा में देहान्त हो गया था। इन्होंने निर्गुण राम की उपासना की थी। रामचरण जी के 12 शिष्य थे।
शाहपुरा (भीलवाड़ा) के शासक रणसिंह ने रामचरण के निवास के लिए शाहपुरा में छतरी बनाई। रामस्नेही संप्रदाय के लोग शाकाहारी, मूर्ति पूजा नहीं, दाढ़ी, मूंछ, सिर पर बाल नहीं व गुलाबी रंग की धोती पहनते है। गुरू को सर्वप्रमुख माना जाता है।
1751 ई. कृपारामजी से दीक्षा ली।
रामचरण जी के मुख्य शिष्य
- सन्त रामदास जी:- संत रामदास जी ने रामस्नेही सम्प्रदाय की खेड़ापा (भोपालगढ़, जोधपुर) शाखा की स्थापना की। इनका जन्म 1783 ई. में भीकमपुर, जोधपुर में हुआ। शार्दुल जी इनके पिता तथा अणमी इनकी माता थीं। हरिराम जी रामदास जी के गुरु थे।
- रामदास जी ने जमभारगती, चेतावनी, भक्तमाल, गुरुमहिमा, अंगबद्ध अनुभव वाणी ग्रंथ की रचना की। रामदास जी ने योग व प्राणायाम पर 1756 ई. में निशानी ग्रंथ की रचना की। रामदास जी के बाद यह सम्प्रदाय 5 भागों में बँट गया- घरबारी, विरक्त, विदेही, परमहंस, प्रवृत्ति
- हरिरामदास जी:- संत हरिराम दास जी ने रामस्नेही सम्प्रदाय की सिंहथल (बीकानेर) शाखा की स्थापना की। इनका जन्म सिंहथल (बीकानेर) में हुआ। भाग्यचन्द इनके पिता तथा रामी देवी इनकी माता थीं। चाम्पा हरिरामदास जी की पत्नी, बिहारी दास पुत्र तथा जैमलदास इनके गुरु थे। निसानी इनका ग्रंथ है।
- संत दरियावजी:- संत दरियावजी ने रामस्नेही सम्प्रदाय की रैण (मेड़ता, नागौर) शाखा की स्थापना की। दरियावजी का जन्म जन्माष्टमी 'भाद्रपद शुक्ल अष्टमी' के दिन हुआ। प्रतिवर्ष चैत्र पूर्णिमा को दरियावजी का मेला लगता है। इनका जन्म 1676 ई., जैतारण (ब्यावर) में हुआ। मान जी धुनिया इनके पिता तथा गीगा इनकी माता थीं। 1758 ई. में रैण में इनका निधन हो गया। दरियावजी ने वाणी (10 हजार पद) ग्रन्थ की रचना की। पेमदास (प्रेमनाथजी) जी इनके गुरू थे। हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल दिया।
- जेमलदासजी:- जेमलदास जी को खेड़ापा (भोपालगढ़, जोधपुर) व सिंहथल (बीकानेर) के आदि आचार्य थे। ये हरिरामदाजी के गुरू थे। जेमलदासजी के गुरू माधोदासजी थे।
मलूकदास जी (निर्गुण)
इनका जन्म 1574 ईस्वी में कड़ा (इलाहाबाद, यू.पी.) में हुआ था। पुरूषोत्तम/ कबीर इनके गुरू थे। इन्होंने आलसिया सम्प्रदाय की स्थापना की। इनका निधन 1682 ई. में हुआ था। भक्त बच्चावली, विभव विभूति, ज्ञान बोध मलूकदास जी के प्रमुख ग्रंथ थे।
दोहा:-
"अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काज।
दास मलूका कहि गये, सबके दाता राम।।"
प्राणनाथजी (निर्गुण)
इन्होंने परनामी (गुजरात) सम्प्रदाय की स्थापना की। इस सम्प्रदाय की प्रधान पीठ पन्ना (मध्य प्रदेश) है। राजस्थान में इस सम्प्रदाय की प्रधान पीठ आदर्श नगर, जयपुर में है। प्राणनाथ जी के उपदेश कुंलजम् स्वरूप में है। प्राणनाथ जी का जन्म जामनगर (गुजरात) में हुआ था। नीजानंद स्वामी प्राणनाथ जी के गुरू थे। परनामी सम्प्रदाय के अनुयायी भगवान कृष्ण की निर्गुण रूप की पूजा करते हैं।
संत दास जी (निर्गुण)
इन्होंने गुदड़ सम्प्रदाय की स्थापना की। इस सम्प्रदाय की प्रधान पीठ दाँतड़ा (हुरड़ा, भीलवाड़ा) में है। यह भगवान राम के निर्गुण रूप की पूजा करते थे।
जसनाथ जी (निर्गुण)
- इनका जन्म 1482 ईस्वी देवउठनी ग्यारस (कार्तिक शुक्ल एकादशी) के दिन कतरियासर (बीकानेर) में जाट परिवार में हुआ। हमीरजी जाट इनके पिता व रूपादे इनकी माता थीं। जसंवत सिंह इनके बचपन का नाम था। गोरखनाथ इनके गुरू थे। जसनाथ जी डाबला तालाब में मिले थे। जसनाथ जी ने गोरखमालिया (बीकानेर) में 12 वर्ष तपस्या की थी।
- सिम्भूदड़ा, कोंड़ा, सिद्ध जी रो सिरलोको, गोरख छंदो, जलम झुमरो, जसनाथी पुराण (36 नियम) सम्प्रदाय के प्रमुख ग्रन्थ हैं। यशोनाथ पुराण - इस ग्रंथ की रचना रामनाथजी ने की जिसे जसनाथी संप्रदाय की बाइबिल कहा जाता है। जसनाथ जी सम्प्रदाय के अनुयायी गले में काली ऊन का धागा बाँध कर रखते हैं।
- जसनाथ जी ने जसनाथी सम्प्रदाय की स्थापना (1504) की। इन्होंने भक्ति की जगह योग पर बल दिया। 1500 ईस्वी में ये जाम्भोजी से मिले। 1506 ई. में 24 वर्ष की आयु में इन्होंने कतरियासर, बीकानेर में आश्विन शुक्ल सप्तमी को समाधि ले ली।
- 500 बीघा कतरियासर जमीन जसनाथ जी को सिकन्दर लोदी ने दी थी। इन्हें ज्ञान मार्गी, पर्यावरण विद, ब्रह्मचारी के रूप में जाना जाता है। यह एकमात्र सम्प्रदाय है जिसके भक्त सिद्ध रूस्तमजी के नारे के साथ अग्नि नृत्य करते हैं। अग्नि नृत्य को संरक्षण गंगासिंह ने दिया था।
- जसनाथी सम्प्रदाय का मेला आश्विन शुक्ल सप्तमी को भरता है। इस सम्प्रदाय के प्रमुख संत लालनाथ जी, चौखननाथ जी व सवाईदास जी थे। इस सम्प्रदाय में 36 नियम होते हैं। हीरोजी, हंसोजी, रूस्तम जी जसनाथ जी के प्रमुख शिष्य थे।
- मान्यता के अनुसार एक दिन जसनाथजी की माता जसनाथजी को चूल्हे के पास छोड़कर गई वापस आकर देखा तो जसनाथ जी चूल्हे में बैठकर अंगारे सर में डाल रहे थे। जसनाथ जी की माता यह देखकर रोने लगी। तब जसनाथ चूल्हे से निकलकर अपनी माता की गोद में बैठ गये। इस प्रकार जसनाथ जी के अनुयायी अग्नि नृत्य करते है।
- जसनाथजी ने लोह पांगल नामक तांत्रिक का घमंड तोड़ा। जसनाथजी का रिश्ता काललदे के साथ हुआ था। जिनका मंदिर भी कतरियासर (बीकानेर) में बना है।
जसनाथी सम्प्रदाय के नियम:-
- जाल वृक्ष व मोर पंख को पवित्र मानते हैं।
- उत्तम कार्य करना।
- जीव हिंसा नहीं।
- जल छान कर पीना।
- जूठे मुंह अग्नि में फूंक नहीं मारना।
- ब्याज नहीं लेना।
- दान देना।
जसनाथी सम्प्रदाय की अन्य पीठ
- पांचला:- नागौर - बोयत जी ने स्थापना की।
- पूरनासर:- बीकानेर - हालोजी ने स्थापना की।
- मालासर:- बीकानेर - टोडरजी ने स्थापना की।
- बम्मल:- बीकानेर - हारो जी ने स्थापना की।
- लिखमादेसर:- बीकानेर - हांसोजी ने स्थापना की।
जसनाथी सम्प्रदाय के अनुयायी तीन प्रकार के होते हैं-
- सिद्ध:- ये पुजारी होते हैं।
- परमहंस:- ये विरक्त होते हैं तथा शादी नहीं करते हैं।
- जसनाथी जाट:- ये गृहस्थ होते हैं।
लालदासजी (निर्गुण)
इनका जन्म 1540 ईस्वी को धौलीधुव गाँव (रामगढ़, अलवर) में श्रावण कृष्ण पंचमी को हुआ था। चांदमल इनके पिता तथा समदा इनकी माता थी। मोगरी इनकी पत्नी थी। फकीर गंदन चिश्ती इनके गुरु थे। लालदास जी ने निर्गुण राम की उपासना करते हुए हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल दिया। मेला-आश्विन शुक्ल एकादशी + माघ पूर्णिमा
प्रारम्भ में लालदास जी लकड़हारे थे। इन्होंने लालदासी सम्प्रदाय की स्थापना की। जिसकी प्रधान पीठ नगलाजहाज (वैर, भरतपुर) में है जहाँ इनका निधन (1648 ई.) हुआ था। लालदास जी ने शेरपुर (कोटपुतली) में समाधि ली। ये मध्यकालीन मेवात के प्रमुख संत हैं। इनके उपदेश लालदास की चेतावणियाँ व बानी में संग्रहित है।
दिल्ली के लिए इन्होंने भविष्यवाणी की थी वही शासक होगा जो अपने भाईयों का वध करेगा और अपने भाईयों का वध कर औरंगजेब दिल्ली का बादशाह बना। इस सम्प्रदाय में दीक्षा लेने वाले को काला मुंह कर गधे पर उल्टा बिठाकर गाँव में घुमाया जाता है। दारा शिकोह लालदासजी से मिलने आया था।
लालदासजी ने सिंह शिला पहाड़ी (बांधेली गांव) में तपस्या की थी।
मीरा बाई (सगुण)
इनका जन्म 1498 ई. बाजोली गाँव (मेड़ता, नागौर) में हुआ। जबकि पालन-पोषण कुड़की गाँव (ब्यावर) में हुआ। कुछ इतिहासकारों के अनुसार इनका जन्म 1504 ईस्वी में हुआ। राव दूदा इनके दादा व रतन सिंह राठौड़ इनके पिता थे। इनकी माता का नाम कुन्तलदे/वीर कँवरी था। मीरा के बचपन का नाम पेमल/खुसलमदे था।
मीरा को राजस्थान की राधा/मरुमंदाकिनी कहते हैं। मीरा की शादी राणा सांगा के बड़े पुत्र भोजराज के साथ 1516 ई. में हुई थी। भोजराज की शादी के 7 वर्ष बाद 1523 ई. में मृत्यु हो गयी। कुछ इतिहासकारों के अनुसार भोजराज की मृत्यु 1517 में खातोली युद्ध में हुई थी। गोपीनाथ के अनुसार भोजराज की मृत्यु खानवा युद्ध (17 मार्च, 1527 ई.) में हो गयी थी। मीरा के प्रारम्भिक गुरु चंपाजी थे। गजाधर गुर्जर गौड़ मीरा के धार्मिक गुरु थे। वृन्दावन में मीरा ने रुप गोस्वामी के सानिध्य में भक्ति की। रैदास मीरा के मुख्य गुरु थे, जिनकी छतरी चित्तौड़ दुर्ग में है। मीरा की भक्ति सगुण व माधुर्य भाव की थी। यह कृष्ण को अपना पति मानकर भक्ति किया करती थी। मीरा को कृष्ण का गिरधर रुप सबसे पसंद था। मीरा चित्तौड़ से वृन्दावन चली गयी। उसके बाद गुजरात जाकर डकोर के (द्वारिका, गुजरात) रणछोड़ मंदिर में सशरीर कृष्ण की मूर्ति में विलिन (1540 ई.) हो गयी। कुछ मान्यताओं के अनुसार मीरा का निधन 1563 ई. में हुआ था।
मीरा के देवर उदयसिंह ने सूरदास चम्पावत को मीरा को लाने के लिए वृंदावन भेजा था। मीरा ने वृंदावन में दासी सम्प्रदाय चलाया। इस सम्प्रदाय में पुरुष भी स्त्रियों की वेशभूषा पहनते हैं। मीरा पदावली मीरा, गीतगोविन्द टीका, राग गोविन्द, मीरा की गरीबी, सत्यभामा नू रूसणो, नरसी मेहता री हुंडी, रुकवणी मंगल मीरा के प्रमुख ग्रन्थ हैं। रत्ना खाती ने ब्रज भाषा में नृसिंह जी रो मायरो की रचना की। 1 अक्टूबर, 1952 ई. मीरा बाई पर 2 आने की डाक टिकट जारी की गई। मीरा बाई प्रथम महिला थी जिस पर डाक टिकट जारी हुई।
मीरा महोत्सव आश्विन पूर्णिमा को चित्तौड़ में आयोजित किया जाता है। मीरा के पदों को वृद्ध व्यक्ति की मृत्यु पर गाया जाता है जिन्हें हरजस कहते हैं।
दोहा:-
"मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोय।
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोय।।"
"विरहणी बैठी जागू दुखण लागे नैण।
मीरा के प्रमुख मन्दिर
- चारभुजा नाथ मन्दिर - मेड़ता (नागौर) - इस मन्दिर का निर्माण मीरा के दादा राव दूदा ने करवाया।
- कुम्भश्याम मन्दिर - (चित्तौड़गढ़) - इस मन्दिर का निर्माण कुम्भश्याम के नाम से राणा कुम्भा ने करवाया था जिसे बाद में राणा सांगा के समय मीरा मन्दिर कर दिया गया।
- जगतशिरोमणी मन्दिर - (जयपुर) - इस मन्दिर का निर्माण मानसिंह प्रथम की रानी कनकावती ने अपने पुत्र जगत की याद में करवाया। माना जाता है कि मन्दिर में जो भगवान कृष्ण की मूर्ति है उस मूर्ति की पूजा मीरा बाई बचपन में किया करती थीं।
नोट-
(1) गवरी बाई को वागड़ की मीरा कहते हैं जिनके पति की मृत्यु 7 दिन बाद हो गयी थी। अंतिम समय गवरी बाई काशी चली गयी। जहाँ 1865 ई. में इनका निधन हो गया। मीरा बाई ने फुटकर पदों की रचना की। जिनकी संख्या 610 है।
(2) गवरी देवी मांड गायिका है।
लालगिरी जी (निर्गुण)
इनका जन्म चूरू के सुलाखिया गाँव में मोची परिवार में हुआ। इनका जन्म 10वीं सदी में हुआ था। ये निर्गुण भक्त थे। बचपन में ही ये नागा साधु बन गये थे। इन्होंने अलखिया सम्प्रदाय की स्थापना की। जिसकी प्रधान पीठ बीकानेर में है। अलख स्तुति प्रकाश व कुण्डलिया लाल-गिरी जी का प्रमुख ग्रन्थ है।
नामदेव
इनका जन्म महाराष्ट्र के दर्जी परिवार में हुआ था। इनके कुछ पद आदिग्रंथ में संकलित हैं।
तुलसीदास जी (सगुण)
इनका जन्म 1532 ई. में राजापुर गांव (बान्दा, यूपी) में हुआ था। इनके बचपन का नाम रामबोला था। ये काशी के निवासी थे। इनका निधन 1680 ई. में हो गया था। आत्माराम दूबे इनके पिता व हुलसी दूबे माता थी। तुलसीदास जी ने जन्म लेते ही रोने की जगह राम बोला था। जन्म के समय तुलसीदास के मुख में दंत थे जो अशुभ माने गये। विवाह के पश्चात तुलसीदास जी का अपनी पत्नी से अधिक मोह था। एक दिन तुलसीदास बाहर गये हुए थे पीछे से रत्नावली अपने पीहर चली गई। तुलसीदास जब घर आये तो उन्हें पता चला की रत्नावली पीहर चली गई तब तुलसीदास जी भी नदी में बह रही लाश पर बैठकर रत्नावली के पीछे चले गये। रत्नावली के प्यार में अंधे तुलसीदास साँप को रस्सी समझकर उसे पकड़कर रत्नावली के पास छत पर चले गये। तब रत्नावली ने कहा जितना प्रेम तुम मुझसे करते हो उतना प्रभु से किया होता तो वो मिल जाते। इन्होंने रामचरितमानस, विनय पत्रिका, वैराग्य संदीपनी, गीतावली, रामालला नहछु, हनुमान बाहुक, कवितावली व बरवै रामायण की रचना की।
सूरदास (सगुण)
इनका जन्म 1478 ई. में रुकनता, आगरा में हुआ था। वल्लभाचार्य इनके गुरु थे। सूरदास अन्धे थे। ये भगवान कृष्ण के बालरुप की पूजा करते थे। इन्हें पुष्टिमार्ग का जहाज कहते हैं। सूरसागर (12 स्कन्ध), सूर रामायण, सूर पच्चीसी, सूरसरावली व साहित्य लहरी इनके प्रमुख ग्रंथ हैं।
नाथ सम्प्रदाय
इसकी स्थापना 10 वीं सदी में बंगाल में मत्स्येन्द्र नाथ ने की थी। गुरु गोरखनाथ इनके शिष्य थे। जिन्होंने 10 वीं, 11 वीं सदी में नाथ मत का प्रचार किया। गोरखनाथ का जन्म रावलपिण्डी में हुआ था।
नरसिंह मेहता
ये मूलतः गुजरात के थे। सूरत संग्राम इनके भजनों का संग्रह है। वैष्णव जन तो तेने कहिए इनका प्रसिद्ध है।
चतुरदासजी महाराज
इनका जन्म 15वीं सदी में बुटाटी गाँव (डेगाना, नागौर) में हुआ। इनका मन्दिर बुटाटी गाँव में है जहाँ कार्तिक शुक्ल एकादशी को विशाल मेला भरता है। माना जाता है कि यहां सात दिन परिक्रमा करने से लकवे का इलाज हो जाता है।
बाल नन्दाचार्य जी
इनका जन्म 1635 ई. में गढ़ मुक्तेश्वर में हुआ। बिरजानंद इनके गुरु तथा बलवन्त गौड़ इनके बचपन का नाम था। नन्दाचार्य ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए साधुओं का एक संगठन बनाया। जिसे सैन्य प्रशिक्षण देकर सैन्य संगठन का रूप दिया गया, इसे लश्कर के नाम से जाना जाता है। इस सैन्य संगठन ने मुगल बादशाह औरंगजेब की हिन्दू विरोधी नीति का विरोध किया था। नन्दाचार्य ने लोहार्गल (झुन्झुनूँ) में हनुमान जी की आराधना की तथा रघुनाथ जी का मन्दिर बनवाया। औरंगजेब के विरूद्ध राजसिंह (मेवाड़) व दुर्गादास राठौड़ की सहायता की।
लश्कर संगठन ने हिन्दू धर्म को नुकसान पहुँचाने वालों के साथ युद्ध किया तथा जो अपराध स्वीकार कर माफी मांगते उन्हें चरण पादुकाएँ देकर माफ कर देते हैं।
नवलदासजी (निर्गुण)
इनका जन्म हरसौलाव गाँव (परबतसर, डीडवाना) में हुआ (1840)। इन्होंने नवल सम्प्रदाय की स्थापना की। नवल सम्प्रदाय की प्रधान पीठ जोधपुर में है। नवलदासजी ने नवलेश्वर अनुभववाणी नामक ग्रंथ की रचना की।
ब्रजकंवरी
यह नागरीदास/सावंतसिंह की बहिन थी जो भगवान कृष्ण की पूजा किया करती थी। ब्रजकंवरी ने श्रीमद भगवद गीता का ब्रज भगवत् नाम से अनुवाद किया।
सुंदरकंवरी
यह ब्रजकंवरी की पुत्री थी जो भगवान कृष्ण की भक्त थीं सुंदरकंवरी ने भक्ति के 11 ग्रंथ लिखे थे।
करमाबाई
इनका जन्म कालवा (मकराना, डीडवाना) में जाट परिवार में हुआ था। जीवनराम डूडी इनके पिता तथा रतनी देवी इनकी माता थीं। करमाबाई की शादी गढ़ी सामोर (अलवर) में हुई। एक दिन करमाबाई के माता-पिता गाँव गये हुए थे। उन्होंने करमा बाई को भगवान कृष्ण को भोजन करवाने के लिए कहा। करमाबाई ने कृष्ण भगवान को भोजन करवाने के लिए खिचड़ा बनाया तथा जिद कर भगवान कृष्ण को भोजन करवाया था। करमाबाई का मंदिर कालवा (परबतसर, डीडवाना) में बना है।
गीत:- थाली भरकर लाई खीचड़ो ऊपर घी की बाटकी जिमो म्हारा श्याम धण जिमाव बेटी जाट की बाबो म्हारो गांव गयो है ना जाने कब आवगो बाबा के भरोसा भूख ही रहा जाओगो।
राजाराम संप्रदाय
राजाराम संप्रदाय की स्थापना राजाराम पटेल ने की थी। इस संप्रदाय की प्रधान पीठ शिकरगढ़ (जोधपुर) में है। विश्नोई संप्रदाय की तरह यह संप्रदाय भी पर्यावरण संरक्षण के लिये जाना जाता है।
शंकरदेव
इन्हें असम का चैतन्य महाप्रभु कहा जाता है। इन्होंने मूर्ति पूजा व महिलाओं का विरोध किया।
केशवदास
केशवदास का जन्म 1623 ई. में डीग में हुआ था। ये ओरछा (उत्तर प्रदेश) के शासक रामसिंह के भाई इन्द्रजी सिंह के दरबारी कवि थे। रामभक्ति के कारण इन्हें 'भक्ति आचार्य' कहा गया। कविप्रिया, रामचन्द्रिका, रसिक प्रिया, विज्ञान गीता, रत्नबावनी, जहांगीर जस चन्द्रिका केशवदास की प्रमुख रचनाएँ हैं।
कुंभनदास
कुंभनदास वल्लभाचार्य के शिष्य थे। इनकी जानकारी 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता' से मिलती है। इन्होंने भगवान कृष्ण की भक्ति की। अकबर ने इन्हें फतेहपुर सीकरी (यूपी) बुलाया लेकिन इन्होंने जाने से मना कर दिया फिर चले भी गयी। राग रत्नाकर, राग कल्पद्रुम इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं।
कृष्णदास
इनका जन्म 1496 ई. राजकोट (गुजरात) में हुआ। इन्होने द्वारिका (गुजरात) में वल्लभचार्य से दीक्षा प्राप्त की। कृष्णदास ने श्रीनाथजी मंदिर का प्रबंधन संभाला जिस कारण इन्हें कृष्णदास अधिकारी कहा जाता है।
रसखान
रसखान का जन्म 1533 ई. में हुआ। इन्होने अपनी रचना प्रेमवाटिका में राधा-कृष्ण माली-मालिन का रूप देकर प्रेम का वर्णन किया है। इस ग्रंथ में 53 दोहे है। दानलीला व सुजान रसखासन रसखान की अन्य प्रमुख रचनाएँ है।
"वा छवि रसखान विलोककत वारत काम, कला, निधि कोटि।
काग के आग बड़े सजनी हरि हाथ सौं ले गयो माखन रोटी।"
राधावल्लभ सम्प्रदाय
राधावल्लभ संप्रदाय की स्थापना 1534 ई. में हितहरिवंश गोस्वामी ने वृन्दावन में की थी। इसे संप्रदाय में राधा को कृष्ण से उच्च स्थान दिया गया है। इस संप्रदाय की उपासना को रसोपासना कहा जाता है। हितहरिवंश गोस्वामी का जन्म सहारनपुर (यूपी) में हुआ था। यमुनाष्टक, हित चौरासी, स्फुट वाणी हितहरिवंश गोस्वामी की प्रमुख रचनाएँ है।
सखी संप्रदाय
सखी संप्रदाय की स्थापना हरिदास ने की थी। पहले इसे निंबार्क संप्रदाय की शाखा माना जाता था। अकबर का नवरत्न तानसेन हरिदास का शिष्य था। केलिमाल, सिद्धांत के पद हरिदास की रचनाएँ है।
चतुर्भुजदास
इनका जन्म 1530 ई. में हुआ कुंभनदास इनके पिता थे। इनकी रचनाएँ कीर्तनावली में संकलित है। विट्ठलनाथ के शिष्य थे।
छीत स्वामी
ये मथुरा के ब्राह्मण थे। ये विट्ठलनाथ के शिष्य थे। पदावली नाम से इनको पदों का संकलन है।
उंदरिया पंथ
यह संप्रदाय जयसमंद झील (उदयपुर) के आसपास रहने वाले भीलों में प्रचलित था।
राजाराम
राजाराम ने राजाराम संप्रदाय की स्थापना की जिसकी प्रधानपीठ शिकारपुरा (जोधपुर) में है। यह संप्रदाय विश्नोई संप्रदाय की तरह वृक्षों की रक्षा हेतु जाना जाता है।
करमेती बाई
इनका जन्म खण्डेला (सीकर) में हुआ। परशुराम करमेती बाई के पिता थे।
ज्ञानमती बाई
यह चरणदासी सम्प्रदाय की अनुयायी थीं। आत्माराम इनके गुरु थे। इनका कर्म क्षेत्र जयपुर था। 50 वाणियाँ में इनके उपदेश है।
ताज बेगम
यह फतेहपुर (सीकर) के फदन खाँ कायमखानी की पुत्री थीं। ताजबेगम भगवान कृष्ण की भक्त थीं।
भूरी बाई
इनका जन्म 1892 ई. में सरदारगढ़ (उदयपुर) में हुआ। यह सगुण व निर्गुण भक्त थीं। भूरी बाई की शादी फतहलाल (नाथद्वारा) से हुई। नूराबाई, चलफिरशाह, दिवानशाह के सम्पर्क में आने से भूरी बाई संत बन गयी।
फूला बाई
इनका जन्म मांझवास (डेगाना, नागौर) में जाट परिवार में हुआ। फूलाबाई ने शादी न कर आजीवन वैराग्य धारण किया। हेमाराम फूलाबाई के पिता थे। फूला बाई से मिलने जोधपुर के शासक जसवंत सिंह आये थे।
राना बाई
इनका जन्म हरनावा (1504 ई.) (परबतसर, डीडवाना) में हुआ। चतुरदास इनके गुरु थे। 1570 ई. में रानाबाई ने जीवित समाधि ले ली। रानाबाई भगवान कृष्ण की भक्त थीं।
पिता - रामगोपाल
माता - गंगाबाई
मेला - भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी
1570 में जीवित समाधि
उपनाम - राजस्थान की दूसरी मीरा
रामगोपाल इनके पिता तथा गंगाबाई माता थी। राना बाई को राजस्थान की दूसरी मीरा कहा जाता है।
गंगा बाई
यह भगवान कृष्ण की सगुण भक्त थी। वल्लभ सम्प्रदाय के संस्थापक वल्लभाचार्य के पुत्र बिट्ठल नाथ गंगा बाई के गुरु थे।
रानी रत्नावती
यह भगवान कृष्ण की भक्त थीं। यह भानगढ़ (अलवर) माधोसिंह की रानी थीं। माधोसिंह आमेर के शासक मानसिंह का भाई था।

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