राजस्थान की जनजातियां
जो जाति अन्य जातियों से पिछड़ी हो, जंगलों या अपने मूल स्थान पर रहती हो, शिक्षा का अभाव हो, अन्य जातियों से सम्पर्क करने में संकोच करती हो तथा परम्परागत प्रथाओं रीति-रिवाजों को मानती हो, उन्हें जनजाति कहा जाता है। अधिक पिछड़ी जनजाति को आदिम जनजाति या आदिवासी कहा है।
प्राचीन समय में जनजातियों ने कई क्षेत्रों पर शासन भी किया था क्योंकि जनजातियों में एकता बहुत होती है।
- 2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में सर्वाधिक जनजातीय जनसंख्या वाला जिला उदयपुर तथा सबसे कम जनसंख्या वाला जिला बीकानेर है।
नोट- देश में सर्वाधिक जनजाति संख्या वाला राज्य मध्यप्रदेश तथा सबसे कम हरियाणा है।
2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान सर्वाधिक अनुसूचित जनसंख्या का प्रतिशत बाँसवाड़ा (76.4 प्रतिशत), डूंगरपुर (70.8), प्रतापगढ़ (63.4 प्रतिशत) तथा न्यूनतम प्रतिशत नागौर (0.38 प्रतिशत), बीकानेर (0.3 प्रतिशत), चूरू (0.6 प्रतिशत) है।
नोट- भारत में प्रतिशत के आधार पर सर्वाधिक जनजातियाँ मिजोरम (94.5 प्रतिशत) तथा न्यूनतम हरियाणा में निवास करती है।
- 2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में जनजातियों का लिंगानुपात 948 है। जो सर्वाधिक डूंगरपुर (1000) तथा न्यूनतम धौलपुर (842) का है।
- आदिवासी क्षेत्र में किसी के घर विवाह होने पर उसके गोत्र के सभी लोग 10-10 किलो मक्का उसके घर पर देते है, जिसे 'मेलणी' कहते हैं।
- आदिवासियों के उत्थान के लिए 1964 में माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध संस्थान, उदयपुर की स्थापना की गई।
राजस्थान की जनजातियाँ निम्न है-
भील
भारत में भीलों का निवास महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान में है। राजस्थान में जनसंख्या की दृष्टि से भील दूसरी बड़ी जनजाति है। जो कुल जनजाति का 44.3 प्रतिशत है। भीलों की राजस्थान में जनसंख्या 41 लाख है जिनमें सर्वाधिक 13.40 लाख बाँसवाड़ा में निवास करती है।
भील राजस्थान की सबसे प्राचीन जनजाति है।
यह जनजाति उदयपुर, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, शाहपुरा में निवास करती हैं। यह राजस्थान की प्राचीनतम जनजाति है, मीणाओं के बाद संख्या में इनका दूसरा स्थान है। भील द्रविड़ बील शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है- तीरकमान।
इन्हें भगवान शंकर का वंशज माना जाता है। कर्नल जेम्स टॉड ने इन्हें वनपुत्र कहा है। हीराचंद ओझा ने भीलों को आदिवासी अनार्य कहा है। भील छोटे कद, काला रंग, चौड़ी नाक, लाल आँखें व रुखे बाल के होते हैं। इनमें सयुंक्त परिवार प्रथा का प्रचलन है। पिता परिवार का मुखिया होता है। इस जाति में अन्तर्विवाह का प्रचलन है। भीलों का मुख्य भोजन मक्का की रोटी, प्याज की सब्जी है इस जाति में शराब का प्रचलन अधिक है।
मिट्टी, घास-फूस व कच्ची ईंटों से बना भीलों का घर 'टापरा' कहलाता है। घर के बाहर बना बरामदा ढालिया कहलाता है। भीलों के घरों को कू कहते हैं। छोटे गाँव को फलां तथा बड़े गाँव को पाल कहते हैं। पाल का मुखिया पालवी कहलाता है।
संस्कृत साहित्य में भीलों को निषाद कहा जाता है।
'Race and Cultures of India' के लेखक डॉ. D.N. मजूमदार ने भीलों को निग्रेटो प्रजाति का माना।
'Wild Tribes of India' के लेखक रॉन ने भीलों का मूल स्थान मारवाड़ माना है।
वस्त्रों के आधार पर इनको दो वर्गों में विभक्त किया गया है -
- 1. लंगोटिया भील - ये कमर पर केवल लंगोटी पहनते हैं जिसे खोयतु कहते हैं। स्त्रियों द्वारा घुटनों तक पहना जाने वाला घाघरा कछाबू कहलाता है।
- 2. पोतीददा भील - ये भील धोती, बन्डी व पगड़ी पहनते हैं तथा अंगोछा लपेटते हैं जिसे फालू कहते हैं।
भील जनजाति में महिला व पुरुषों में गोदने का प्रचलन है। भील स्त्रियाँ जंजीर, नथ, बालियाँ, छल्ले, बोर व पैजनियाँ आभूषण पहनती हैं। भील शिव, राम, कालिका, दुर्गा, हनुमान, गणेश-शीतला माता की पूजा करते हैं। इनका मुख्य त्योहार होली है। यह जनजाति जादू-टोने व अंधविश्वासी होती है। इनका मुख्य व्यवसाय आखेट (शिकार) करना है। मेवाड़ के राजचिह्न में एक तरफ राजपूत शासक का तथा दूसरी तरफ भील सरदार का चित्र होता है। महाराणा प्रताप ने भील सरदार पुंजा को राणा कहलाने की अनुमति दी जो एकमात्र था। मुसीबत के समय भील एक ढोल बजाते हैं जिससे सभी भील हथियारों सहित एक स्थान पर इकट्ठा हो जाते हैं। 'फाइरे-फाइरे' भीलों का रणघोष है जिससे ये सचेत हो जाते हैं।
- मेवाड़ में भीलों के क्षेत्र को भोमट कहते हैं। भील पाड़ा कहने पर खुश तथा काड़ी कहने पर नाराज होते हैं। भराड़ी भीलों की देवी है जिसका शादी के समय दीवार पर चित्रांकन होता है। भीलों में पहाड़ी क्षेत्र में की जाने वाली कृषि चिमाता तथा मैदानों में की जाने वाली कृषि दजिया कहलाती है। भीलों में जब बच्चा 12-13 वर्ष का हो जाता है तब उसे बुरी शक्तियों से निडर बनाने के लिए जलता हुआ कपड़ा बच्चे के हाथ पर रखा जाता है।
- भीलों के मृत्यु भोज को कायटा/लोकायी कहते हैं। भील महिला द्वारा पति को पंचायत के सामने साड़ी का पल्लू फाड़कर देना छेड़ा फाड़ना कहलाता है जो इन दोनों में तलाक माना जाता है। भीलों में महिला जब पूर्व पति को छोड़कर दूसरे से शादी कर लेती है उसे नाता प्रथा कहते हैं। नाते के बाद दूसरा पति पूर्व पति को कुछ राशि देता है जिसे झगड़ा राशि कहते हैं।
- भीलों में शादी के समय लड़की के पिता को लड़के वाले कुछ राशि देते हैं जिसे नोतरा/वधू मूल्य कहते हैं। भील महुआ की शराब, मक्के की रोटी, कांदे की सब्जी को पसंद करते हैं। भील केसरियानाथ ऋषभदेव पर चढ़ी खीर खाकर झूठ नहीं बोलते हैं। मेवाड़ फाउण्डेशन की ओर से जनजाति में उत्थान का काम करने पर राणा पुन्जा पुरस्कार दिया जाता है। राजस्थान सरकार ने भीलों को उपज का समुचित लाभ दिलाने के लिए राजस की स्थापना की गयी।
- भील महिलाओं द्वारा ताराभात, केरीभात, लहरभात, ज्वारभात की ओढ़नी ओढ़ी जाती है।
- कुण्डी, मांदल, ढोल, घुंघरू, नगाड़ा, थाली, ढोलक, बाँसुरी, हरनाई, वीणा, ढाक, थाली आदि भीलों के वाद्य यंत्र हैं।
भीलों की शब्दावली
- खोयतु - लंगोटी जो पुरुषों द्वारा कमर पर बांधी जाती है।
- कछाबू - घाघरा जो महिलाओं द्वारा पहना जाता है।
- अटक, ओदारण - यह भीलों की गौत्र है।
- टापरा - यह भीलों का घर होता है।
- कू - कई घरों के समूह को कू कहते हैं।
- पाल - कई गाँव के समूहों को पाल कहते हैं।
- फला - मोहल्ला/झोपड़ियों को फला कहते हैं।
- पालवी - गाँव के मुखिया को पालवी कहते हैं।
- गमेती - कई गाँवों के मुखिया को गमेती कहते हैं जो झगड़ों का समाधान करता है।
- महुआ - पवित्र वृक्ष है।
- देपाड़ा - तंग धोती को कहते हैं। जो पुरुष पहनते हैं।
- टोटम - कुलदेवता
- पिरिया - दुल्हन का पीले रंग का लहंगा जो शादी के समय पहना जाता है।
- सिन्दूरी - दुल्हन की साड़ी जो लाल रंग की होती है।
- फेंटा - लाल, पीला व केसरिया साफा
- फाल - अंगोछा
- नाचनिया ढोल - मांगलिक अवसर पर बजता है।
- देवाल ढोल - गाँव में किसी बीमारी का संदेश देने के लिये बजता है।
- बारी ढोल/गारिये - विपत्ति के समय जोर-जोर से बजता है।
- होवण माता - प्राकृतिक आपदा के बचाव हेतु पूजा
- खोड़िय़ाल माता - मनोकामना पूर्ति हेतु पूजा।
- भीलोड़ी - भीलों की भाषा
- विला - मंदिर का पुजारी
- गांसड़े - मृत्यु की दान-दक्षिणा प्राप्त करने वाला
- सिरा चौकली/चीरा बावसी - मृत व्यक्ति की बनाई गई पत्थर की मूर्ति।
- मातलोक - महिला की मृत्यु पर बना स्मारक (काले पत्थर का)।
- डाहल - भीलों में गाँव का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति।
- रावत - बाँसवाड़ा में भीलों के गाँव का मुखिया।
- आगड़ - पुरूष की मृत्यु पर बना स्मारक (सफेद पत्थर का)।
- बसावो/तदवी - एक ही वंश का मुखिया
- भीलों में विवाह के अवसर पर घर के बाहर चार समेल के पौधों लगाये जाते हैं। अगर समेल पौधे अच्छी तरह लग जाते है तब वर-वधु का भावी जीवन उचित माना जाता है।
- बोलावा - भील मार्गदर्शक द्वारा रास्ता दिखाने के बदले लिया जाने वाला परिश्रम बुलावा कहते हैं।
- विला - थान या मंदिर का पुजारी।
- गांसड़े - भीलों में मृत्यु के समय जिस व्यक्ति को दान-दक्षिणा दी जाती है उसे गांसड़े या जोगी कहते हैं।
- भगत - धार्मिक संस्कार सम्पन्न करवाने वाला।
- पाखरिया - सैनिक के घोड़े को मारने वाला (सबसे इज्जतवान) पाखरिया कहलाता है।
- ढालिया - घर के बाहर स्थित बरामदा ढालिया कहलाता है।
- मेलनी - आदिवासियों में जब किसी व्यक्ति की शादी होती है तब उनके परिवारजन दस-दस किलोग्राम मक्का देते हैं जिसे मेलनी कहते हैं।
- आटा-हाटा - जब एक ही घर में लड़की व लड़के का विवाह होता है उसे आटा-हाटा कहते हैं।
- ढेपाड़ा - भील पुरुषों द्वारा पहने जाने वाली तंग धोती ढेपाड़ा कहलाती है।
- डाम - जब भीलों में कोई बीमारी होती है तब गर्म ठिकरी या जलता कपड़ा छाती पर रखा जाता है उसे डाम कहते हैं।
- होवल माता - प्राकृतिक प्रकोप से बचने हेतु इसकी पूजा करते है।
- मावड़ी - भीलों द्वारा बनाई गई शराब।
- पोत्या - भील पुरुषों द्वारा सिर पर सफेद रंग का साफा बांधा जाता है जिसे पोत्या कहते हैं।
- हारों - ससुराल
- सोरो - श्वसुर
- आई - माँ
- बा - पिता
- मोटाबा - दादा
- माही - फूफा
- हाऊ - सास
- बाबा - नाना
नृत्य
- फायरे - फायरे - यह युद्ध नृत्य है।
- नेजा - यह नृत्य होली के बाद किया जाता है।
- गवरी/राई - यह नृत्य 40 दिन चलता है जो शिव-पार्वती का प्रतीक है।
- कूट-कूदया - यह नृत्य दिन में किया जाता है।
- द्विचक्री - यह नृत्य चक्र बनाकर किया जाता है।
- हाथीमना - यह नृत्य विवाह के समय बैठकर किया जाता है।
- युद्ध नृत्य - इस नृत्य में युद्ध का अभिनय किया जाता है।
भीलों में पाँच प्रकार के विवाह का प्रचलन है
- हठ विवाह - इस विवाह में लड़का-लड़की भागकर शादी करते हैं।
- सेवा विवाह - लड़की का पिता लड़के को कुछ समय अपने घर में रखता है तथा उसे घर या खेत का काम करवाता है। अगर लड़के का काम लड़की के पिता को पसंद आ जाता है तो वह अपनी पुत्री की शादी उस लड़के से कर देता है।
- हरण विवाह - इस विवाह में लड़का लड़की का अपहरण कर शादी कर लेता है। शादी करने के बाद लड़का-लड़की के पिता को कुछ राशि देता है जिसे दापा कहते हैं।
- परीवीक्षा विवाह - लड़का अगर वीरता व साहस का कार्य कर देता है तब लड़की का पिता उसकी शादी अपने पुत्री से कर देता है।
- भीलों में भंगोरिया नामक त्योहार मनाया जाता है जिसमें भीलों के लड़का व लड़की इकट्ठे होते हैं तथा अपना जीवन साथी चुनते हैं।
- हाथीवैडो - वृक्ष को साक्षी मानकर विवाह।
एकी आन्दोलन
एकी आन्दोलन 1921 में मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में चलाया गया। एकी आन्दोलन का प्रारम्भ मातृ कुण्डिया (राशमी, चित्तौड़गढ़ ) से हुआ। यह आन्दोलन लाल-बाग व बेगार प्रथा के कारण हुआ था।
एकी आन्दोलन को भौमट आन्दोलन भी कहा जाता है। क्योंकि यह भीलों के क्षेत्र भौमट में चलाया गया।
मोतीलाल तेजावत ने मेवाड़ राणा के सामने 21 सूत्री मांग रखी जिसे 'मेवाड़ पुकार' के नाम से जाना गया।
भील मोतीलाल तेजावत को बावसी कहते थे तथा अपना मसीहा मानते थे।
नीमड़ा कांड (7 मार्च, 1922)
मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में भीलों की हो रही सभा पर मेवाड़ भील कोर के सैनिकों ने गोलियाँ चला दी जिसमें 1200 भील मारे गये। इस हत्याकांड को दूसरा जलियाँवाला बाग हत्याकांड कहा गया।
नोट- जलियाँवाला बाग (अमृतसर, पंजाब) हत्याकांड 13 अप्रैल, 1919 को हुआ था।
- 1929 में गाँधीजी के कहने पर मोतीलाल तेजावत ने आत्मसमर्पण कर दिया तथा गाँधीजी के सहयोगी मणिलाल कोठारी ने 1936 में तेजावत जी को छुड़ा लिया।
भगत आन्दोलन
भगत आन्दोलन गोविन्द गिरी के नेतृत्व में भीलों को संगठित करने व उनमें जागृति लाने के लिये चलाया गया था।
गोविन्द गिरी का जन्म 1858 ई. बासिया गाँव (डूंगरपुर) में हुआ। राजगिरी व स्वामी दयानन्द सरस्वती से गोविन्द गिरी ने शिक्षा ली।
1883 ई. गोविन्द गिरी ने 'सम्प सभा' की स्थापना की।
मानगढ़ पहाड़ी का हत्याकांड (बाँसवाड़ा)
गोविन्द गिरी के नेतृत्व में भीलों की सभा हो रही थी जिस पर सरकार ने गोलियाँ चला दी। इस हत्याकांड में 1500 भील मारे गये। गोविन्द गिरी को गिरफ्तार कर लिया।
मीणा
मीणा शब्द का शाब्दिक अर्थ मीन या मछली होता है। मीणा जाति की उत्पत्ति भगवान विष्णु के मत्स्यावतार से मानी जाती है। मीणा जनजाति राजस्थान की सबसे बड़ी जनजाति है जो सर्वाधिक जयपुर, सवाई माधोपुर, उदयपुर, अलवर में पाई जाती है। मीणाओं का मूल स्थान राजस्थान माना जाता है। जयपुर शासकों का राजतिलक मीणा सरदार द्वारा किया जाता है।
मीणा जनजाति राजस्थान में जनसंख्या की दृष्टि से प्रथम स्थान पर है।
मीणा पुराण
इस ग्रन्थ की रचना मुनि 'मगन सागर' ने की थी। इस पुराण के अनुसार मीणाओं के 5200 गौत्र हैं। इस ग्रन्थ में मीणाओं की उत्पत्ति मत्स्य अवतार से मानी गयी है। वहीं भाटों के अनुसार मीणाओं की 12 पाल, 32 तड़ व 80 गौत्र है। कर्नल जेम्स टॉड मीणाओं का मूल निवास काली खोह (अजमेर-आगरा के बीच) पर्वतमाला को मानता है।
मीणा आन्दोलन
- 1924 में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट व 1930 में जरायम पेशा अधिनियम बनाया गया जिसके तहत मीणाओं को प्रतिदिन थाने जाकर हाजरी लगानी पड़ती थी। 1933 में मीणा क्षत्रिय महासभा का गठन हुआ जिसने इन कानूनों का विरोध किया।
- अप्रैल 1944 को मुनि मगन सागर की अध्यक्षता में नीमकाथाना में मीणाओं का विशाल सम्मेलन हुआ।
- 1944 ई. में पं. बंशीधर शर्मा के नेतृत्व में जयपुर राज्य मीणा सुधार समिति का गठन किया गया।
- 1946 ई. में बच्चों व स्त्रियों को थाने में हाजरी देने से मुक्त कर दिया।
- 28 अक्टूबर, 1946 को मीणाओं ने मुक्ति दिवस मनाया तथा बागावास में सम्मेलन कर चौकीदारी छोड़ दी।
- 1952 में जरायम पेशा अधिनियम समाप्त कर दिया गया।
मीणाओं के दो वर्ग हैं
- चौकीदार मीणा - यह मीणा राजा-महाराजाओं के यहाँ चौकीदारी करते थे इस कारण इन्हें उच्चवर्ग के मीणा कहते हैं इन मीणाओं को नया वासी मीणा भी कहते हैं। इन मीणाओं का निवास जयपुर, दौसा, आमेर, करौली, सवाईमाधोपुर, सीकर, झुंझनूं के आस-पास था।
- जमींदार मीणा - ये मीणा कृषि कार्य करते हैं जिस कारण इन्हें निम्न वर्ग का माना जाता है। जमींदार मीणाओं में जीविका के लिए पुराने काम किए जाते हैं जिस कारण इन्हें पुराना वासी मीणा कहते हैं। इन मीणाओं का निवास उदयपुर, हाड़ौती, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, चित्तौड़गढ़ के आस-पास थे।
मीणाओं की अन्य उपजातियाँ
- सुरतेवाला मीणा - मीणा पुरुष का अन्य जाति की स्त्री से उत्पन्न पुत्र, सुरतेवाला मीणा कहलाता है।
- भील मीणा - यह मुख्यत: अजमेर, मेवाड़, वागड़ क्षेत्र में पाये जाते हैं।
- रावत मीणा - हिन्दू राजपूतों को रावत मीणा कहते हैं। ये मुख्यत: अजमेर में पाये जाते हैं।
- पड़िहार मीणा - टोंक, भीलवाड़ा, बूँदी इनका मुख्य क्षेत्र है।
- आदि मीणा - यह जाति मुख्य मीणा जाति है।
- ठेढ़िया मीणा - जालौर में इनका मुख्य क्षेत्र है।
- चौथैया मीणा - यह जाति गाँवों की रक्षा के लिए जाने जाते हैं। मारवाड़ इनका मुख्य क्षेत्र है।
- चमरिया मीणा - यह जाति चमड़े का काम करती है।
- परिहार मीणा -
- मेर मीणा - होली, दीपावली, रक्षाबन्धन, जन्माष्टमी, मकर संक्रांति मीणाओं के मुख्य त्योहार हैं। मीणाओं का मुख्य भोजन गेहूँ व बाजरे की रोटी तथा छाछ राबड़ी है। हुक्कापान को मीणाओं का मुख्य नशा कहते हैं।
- बढालिया - वैवाहिक संबंधों में मध्यस्थता करने वाला।
- कीकमारी - संकट के समय जोर से आवाज निकालना।
- मीणा जनजाति बटाईदारी/छोटाबट/हांसिलबाट कृषि के प्रकार है।
- मीणा जनजाति गोवर्धन पर्व पर अपने शस्त्रों की पूजा करते है।
- मीणा जनजाति सर्वाधिक शिक्षित व सम्पन्न जनजाति है। मीणाओं में 'मोरनी मांडणा की परंपरा' है।
- गेली - मीणा युवक के हाथ में रूमाल से बंधी लकड़ी गेली कहलाती है।
- मौसर - मृत्यु के 12वें दिन दिया जाने वाला मृत्युभोज।
- गोटन - मीणाओं में सहेलियों का समूह।
- गौना - बाल विवाह हुई लड़की का प्रथम बार ससुराल जाना।
- पटेल - मीणाओं में पंचायत का मुखिया।
मीणाओं की महिलाएँ हाथ पर अपने पति का नाम गुदवाती हैं तथा शरीर के अन्य हिस्सों पर भी आकृतियाँ बनवाती है। महिलाओं द्वारा घेरदार लहंगा, ओढ़नी व काँचली पहनी जाती है। जमींदार पुरुषों द्वारा गले में बलेवड़ा व झदर्कियाँ आभूषण पहना जाता है। मीणाओं की महिलाएँ कमर में करधनी, पैरों में कड़ियाँ, हाथों में बाजूबंद, सिर पर रखड़ी तथा हाथों में लाख, हाथी दांत की चूड़ियाँ पहनती हैं।
मीणाओं का परिवार पितृसत्तात्मक होता है। बहिन के पति का सबसे ज्यादा आदर-सत्कार होता है। इस जाति में एक स्त्री अपने सिर पर दो कलश लेकर आती है, जिसे जो व्यक्ति सबसे पहले उतारता है वह पुरुष उसका पति होता है। मीणाओं में नाता प्रथा का प्रचलन है। इसमें विधवा पुनर्विवाह भी होता है। मीणाओं में संयुक्त व एकल परिवार की परंपरा भी है। तलाक के समय पुरुष अपने अंगोछे का टुकड़ा फाड़कर महिला को दे देता है जिससे उन दोनों में तलाक मान लिया जाता है। मीणाओं में एक ही गौत्र में शादी नहीं की जाती है।
मीणाओं के पंचायत का मुखिया पटेल कहलाता है। 5 पंचायतों का मुखिया पंच पटेल कहलाता है। मीणाओं की सबसे बड़ी पंचायत चौरासी कहलाती है जिसमें चौरासी गाँव आते हैं। पंचायत का फैसला सर्वमान्य होता है। नहीं मानने पर उस व्यक्ति का हुक्का पानी बंद कर दिया जाता है तथा गाँव से निकाल दिया जाता है। मीणाओं के घरों को टापरा कहते हैं। जंगलों में स्थित घरों को मेवासे कहा जाता है। मीणाओं में अनाज रखने की कोठी को ओबरी कहते हैं।
बुझ मीणाओं का प्रमुख देवता होता है। रामेश्वर घाट (स. माधोपुर) को मीणाओं का प्रयागराज कहते हैं। जीणमाता (सीकर) मीणाओं की इष्ट देवी है। कैलादेवी (करौली), शीतलामाता (चाकसू, जयपुर), चौथमाता (सवाईमाधोपुर) मीणाओं की पूज्य देवी है। कैलादेवी के मंदिर में मीणाओं द्वारा लांगुरिया गीत गाया जाता है। भूरिया बाबा (गोतमेश्वर) मीणाओं के कुल देवता है जिनकी ये झूठी कसम नहीं खाते हैं। भूरिया बाबा का मंदिर अर्णोद (प्रतापगढ़) में है जहाँ वैशाख पूर्णिमा को मेला भरता है। सिरोही में भी भूरिया बाबा का मंदिर है जहाँ अप्रैल महीने में मेला होता है।
कंजर
- कंजर का शाब्दिक अर्थ होता है - जंगल में विचरण करने वाला।
- कंजर जाति कोटा, बूँदी, बाराँ, अलवर, झालावाड़, उदयपुर, भीलवाड़ा, शाहपुरा बहरोड़ व अजमेर में निवास करती है।
- जोगनिया माता बैंगू, चित्तौड़गढ़ कुलदेवी है।
- कंजर जाति समूह में रहती हैं जो एकता के लिये प्रसिद्ध है।
- पाती मांगना- अपराध करने से पूर्व ईश्वर से प्रार्थना।
- कंजर जाति हाकम राजा का प्याला पीकर झूठ नहीं बोलती है।
- परिवार के मुखिया को पटेल कहते है।
- तलाक प्रथा का प्रचलन है।
- कंजर जाति की अविवाहित लड़कियाँ चकरी नृत्य करती है।
- कंजर महिलाएँ एक चुस्त रंगीन पायजामा पहनती है, जिसे खुसनी कहते हैं।
- मरते समय मुंह में शराब डाली जाती है।
- मृतक को गाड़ते हैं।
- हनुमानजी - आराध्य देव
- चौथमाता - आराध्य देवी। चौथ का बरवाड़ा (सवाई माधोपुर)
गरासिया
गरासिया राजस्थान की मीणा व भीलों के बाद तीसरी सबसे बड़ी जनजाति है जिनकी जनसंख्या 3.1 लाख है।
गरासियों का मूल स्थान भाखर (आबू रोड़, सिरोही) माना जाता है।
वीर विनोद ग्रंथ के रचनाकार, श्यामलिदास के अनुसार अरावली के पश्चिमोत्तर में जो भील निवास करते है, उन्हें ही गरासिया कहा जाता है।
कुछ मान्यताओं के अनुसार गरासिया जनजाति की उत्पत्ति गुजरात के बड़ौदा के निकट चैन पारीन क्षेत्र में हुई। गरासियों ने भील लड़कियों से शादी की तथा राजस्थान में बस गये।
1879 ई. राजपूताना गजेटियर में गरासियों की उत्पत्ति राजपूत-भील के रक्त मिश्रण से मानी है।
गरासियां शब्द की उत्पत्ति ‘गिराहिया’ शब्द से मानी जाती है जिसका अर्थ ‘वनवासी लोगों से’ है।
भगवान राम के वंशज। राजस्थान में मीणा व भीलों के बाद तीसरी बड़ी जनजाति गरासिया है। कर्नल जेम्स टॉड ने गरासियों की उत्पत्ति गवास शब्द से मानी है जिसका अर्थ होता है सर्वेन्ट/छोटा समूह/नौकर।
नक्की झील में गरासिया अपने पूर्वजों की अस्थियाँ बहाते हैं।
गरासियों का मूल स्थान 24 गाँवों से निर्मित भाखरपट्टा (सिरोही) है। गरासियों को चौहानों का वंशज माना जाता है जो बड़ौदा में रहते थे। गरासियों का निवास सिरोही (आबू, पिण्डवाड़ा), उदयपुर (कोटड़ा, गोगुन्दा), पाली (बाली) में है।
इनका परिवार पितृसत्तात्मक होता है। परिवार में महिला का स्थान मुख्य होता है। शादी करते ही लड़का परिवार से अलग हो जाता है। गरासियों में गोदना प्रथा का प्रचलन है। महिलाएँ घाघरा, झुलकी, ओढ़नी तथा पुरुष धोती-कुर्ता व अंगरखी पहनते हैं।
गरासियों में आटा पीसने की चक्की को 'घंटी', चारपाई को खाटला तथा मटकी को माटला कहा जाता है।
गरासियों के घरों को घेर कहते हैं। गाँव को पाल व फला कहते हैं। घर के सामने लकड़ी के खम्भों से मकान बनाया जाता है जिसे मेरी कहते हैं। मेरी के ऊपर अतिथि गृह बनाया जाता है जिसे मांड कहते हैं। गाँव के मुखिया को पटेल तथा कई गाँव की मुखिया को सहरोल/कोतवाल कहते हैं।
यह जाति दो भागों में विभाजित है -
- भील गरासिया - गरासिया पुरुष व भील स्त्री से उत्पन्न सन्तान भील गरासिया कहलाता है।
- गमेती गरासिया - भील पुरुष व गरासिया स्त्री से उत्पन्न गमेती गरासिया कहलाता है।
सामाजिक रहन-सहन के आधार पर गरासियों को तीन भागों में बांटा जाता है-
- मोटकी नियात - ये उच्च श्रेणी के गरासियां होते हैं, जिन्हें बाबोर हाइया कहा जाता है।
- नैनकी नियात - ये मध्यम श्रेणी के गरासियां होते हैं, जिन्हें 'माडे़रिया' कहा जाता है।
- निचली नियात - ये निम्न श्रेणी के गरासिया होते हैं।
इस जाति में निम्न प्रकार के विवाह का प्रचलन है -
गरासिया जनजाति में सर्वाधिक प्रेम विवाह होते हैं। इस जनजाति में अत्यधिक पत्नी रखना सम्पन्नता का प्रतीक माना जाता है।
- मोर बंधिया - यह विवाह ब्रह्म विवाह कहलाता है जिसमें सात फेरे होते हैं।
- पहरावना विवाह - इस विवाह में बिना ब्राह्मण के नाम मात्र के फेरे होते हैं।
- ताणना विवाह - इस विवाह में वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को 12 बछड़े, 12 थान कपड़ा दिया जाता है जिसे दापा कहते हैं। इस विवाह में सगाई व फेरे नहीं होते हैं।
- खेवणा विवाह - इस विवाह में महिला किसी अन्य पुरुष के साथ भागकर शादी कर लेती है जिसमें पुरुष प्रथम पति को कुछ राशि देता है।
- आटा-साटा विवाह - इस विवाह में एक घर में लड़की दी जाती है तथा उसी घर से लड़की ली जाती है।
- सेवा विवाह - इस विवाह में लड़की का पिता लड़के को कुछ समय के लिए अपने घर पर रखता है तथा उसके काम को देखता है जिसे खुश होकर वह अपने लड़की की शादी उस लड़के से करते हैं।
- मेलबो विवाह - इस विवाह में लड़की का पिता लड़की को लड़के के घर छोड़कर आता है।
गरासिया शब्दावली
- फालिया - सबसे छोटी इकाई इसमें एक ही गौत्र के लोग रहते हैं।
- घेर - घर
- पाल - गाँव
- हेलो लेवे, पैसा ओछा पेरिया - लोकगीत अनाला मोरयू प्रथा - नवजात मृत शिशु को गाड़ना।
- घोट्या अंबा (बाँसवाड़ा) व चित्र विचित्र मेला (कोटड़ा, उदयपुर) प्रसिद्ध मेले हैं।
- विवाहित स्त्रियाँ हाथी दाँत की तथा अविवाहित लड़कियाँ लाख की चूड़ियाँ पहनती हैं।
- गरासिया जाति शिव, भैरव व दुर्गा की पूजा करते हैं।
- इनका मुख्य त्योहार होली व गणगौर है। अक्षय तृतीया (वैशाख शुक्ल तृतीया) को गरासिया नव वर्ष के रूप में मनाते हैं। गरासियों में बिना वाद्य के वालर नृत्य किया जाता है जिसे गरासियों का घूमर कहते हैं। लूर, मोरिया, मादल, रायण, कूद गरासियों के अन्य नृत्य हैं। नक्की झील इनका पवित्र स्थान है। गरासियों में सर्वाधिक प्रेम विवाह होता है। गरासियों में महिलाओं को तलाक देने का अधिकार नहीं है। पुरुष तलाक के समय महिला के साड़ी का पल्लू फाड़कर देता है जिसे छेड़ा-फाड़ना कहते हैं। इनमें विधवा विवाह का भी प्रचलन है। गरासियों में पूर्व पति को दूसरा पति झगड़ा राशि चुकाता है उसे नातरा प्रथा कहते हैं। झगड़ा राशि का निर्धारण पंचायत करती है।
मनखारों मेला (सिवाय, सिरोही)
यह मेला गणगौर पर भरता है जो गरासियों का सबसे बड़ा मेला है। भाखरी बावसी का मेला, कोटेश्वर मेला, अम्बाजी का मेला, नेवटी का मेला आदि गरासियों के अन्य मेले हैं।
गरासियों में अनाज रखने के भंडार को सोहरी, चारपाई को खाटला, चक्की को घेण्टी कहते हैं। गरासियों में मृत्यु के ऊपर जो स्मारक बनाया जाता है उसे हुर्रें कहते हैं। गरासियों में हारी-भावरी कृषि का प्रचलन है। यह कृषि सामूहिक रूप से की जाती है। गरासियों में मुसीबत के समय एक-दूसरे का आर्थिक सहयोग किया जाता है जिसे हलमा/हाड़ा/हिड़ा कहते हैं। गरासियों में मृत्यु के समय दिया जाने वाला भोज को कोदिया/मेक कहते हैं। गरासियों में मकान के आगे बना बरामदा ओसरा कहलाता है। मोर गरासियों का आदर्श पक्षी है। गरासिये सफेद जीवों की हत्या नहीं करते है इन्हें पवित्र मानते हैं। हेलरु गरासियों की सहकारी संस्था है जो आपस में सहयोग करती है।
सहरिया
टॉड ने इन्हें भीलों की शाखा माना है। सहरिया शब्द फारसी भाषा के 'सहर' से बना है जिसका अर्थ है- जंगल। अर्थात् यह जाति जंगल में रहती है। यह जनजाति आदिम जनजाति में शामिल है। कर्नल जेम्स टॉड ने सहरियों के बारे में कहा- 'सहरिया को एक रोटी खिला दीजिए वह जीवन- भर आपको याद रखेगा'। सहरिया जनजाति सर्वाधिक बाराँ जिले की किशनगंज व शाहबाद पंचायत समिति में पाई जाती है। सहरियों में लगभग 50 गौत्र हैं। पुरुष इस जाति का मुखिया होता है। इस जाति में बहुपत्नी व विधवा पुनर्विवाह का प्रचलन है। पुरुषों को शादी के समय वधू मूल्य देना पड़ता है। जिसे दापा कहते हैं। इस जनजाति का मुख्य भोजन ज्वार, बाजरा व मक्का की रोटी है। इस जनजाति में शराब का प्रचलन भी है। यह जनजाति शादी में लापसी व चूरमा बनाती है।
सहरिया जाति पेड़ के नीचे एक छतरीनुमा झोंपड़ी बनाती है जिसे बंगला/हथाई कहते हैं। मेहमानों को इस बंगले में ठहराया जाता है। सहरिया जाति के घरों के समूह को सहरोल कहते हैं। सहरोल का मुखिया कोतवाल कहलाता है जो न्याय का काम करता है। पंचायत के मुखिया को पटेल कहते हैं जिसका पद वंशानुगत होता है। 5 गाँवों की पंचायत को पंचाई, 11 गाँवों की पंचायत को एकादशियाँ, 84 गाँवों की पंचायत को चौरासिया कहते हैं। चौरासिया पंचायत का फैसला अन्तिम होता है। चौरासी पंचायत की बैठक वाल्मिकी मंदिर (सीताबाड़ी, बाराँ) में होती है।
- सहरिया जनजाति भीख नहीं मांगती है।
- सहरिया जनजाति में दहेज प्रथा का प्रचलन नहीं है।
- सहरिया जनजाति के पुरुष अपने साथ कुल्हाड़ी रखते हैं।
- सहरिया जनजाति में श्राद्ध नहीं किये जाते हैं।
सहरियों का मुख्य त्योहार होली, दीपावली, दशहरा एवं नवरात्रि हैं। सीताबाड़ी (केलवाड़ा, बाराँ) में सहरियों का मेला ज्येष्ठ अमावस्या को भरता है जिसे सहरियों का लक्खी मेला कहते हैं। सहरिया जनजाति तेजाजी, शिव, राम व दुर्गा की पूजा करती है। कोड़िया देवी सहरियों की कुलदेवी है। यह जनजाति गोंद, फल, शहद व वनों से लकड़ी प्राप्त कर आजीविका चलाती है।
शिकारी, होली, झेला, लहँगी, इन्द्रपुरी सहरियों के मुख्य नृत्य हैं।
सहरिया जनजाति की शब्दावलियाँ
- सहराना - सहरियों की बस्ती को कहते हैं।
- कोतवाल - गाँव के मुखिया को कहते हैं।
- कुसिला - सामान रखने की कोठरी
- भडेरी - अनाज रखने की कोठरी।
- गोपना/कोरूआ/टोपा - पेड़ पर मचाननुमा झोंपड़ी
- बँगला/हथाई - बस्ती में छतरीनुमा झोंपड़ी।
- टापरी - घर
- वाल्मीकि - सहरिया जनजाति के आदिगुरु हैं।
- तेजाजी - आराध्य देवता हैं।
- कोड़िया - आराध्य देवी हैं कुलदेवी
धारी संस्कार
मृतक का पुनर्जन्म के लिए एक कुण्डा रखा जाता है जिसके नीचे किसी जानवर के पैरों के निशान बनते हैं। मृत्यु के तीसरे दिन मृतक की अस्थियाँ व राख एकत्रित कर घर के आँगन में बिछा कर कुण्डे से ढक देते है। दूसरे दिन देखने पर उस राख पर किसी जानवर के पैरों के निशान बनता है। जिससे माना जाता है कि उस मृत का जीवन उस जानवर में चला गया है।
- सलुका - अंगरखी
- पंछा - घुटनों तक ऊँची धोती
- खपट्टा - साफा
- बंगल - नृत्यों का सामूहिक स्थल
- हींडा- दीपावली पर गाया जाने वाला गीत।
- लहँगी, आल्हा - वर्षा ऋतु में गाया जाने वाला गीत।
- रेजा - सहरिया जनजाति, विवाहित महिला का वस्त्र।
- खपट्टा - सहरिया पुरूषों का साफा।
- पंछा - सहरिया पुरूषों की धोती।
- सलुका - सहरिया पुरूषों की अंगरखी।
- टापरी - सहरिया जनजाति का घर।
नृत्य
- (1) फाग व राई नृत्य - होली पर
- लेंगी खेल - मकर संक्रांति पर डंडों से खेलते है।
मेले
- कपिल धारा का (बाराँ) का मेला कार्तिक पूर्णिमा को भरता है।
- सीताबाड़ी (केलवाड़ा, बाराँ) का मेला ज्येष्ठ अमावस्या को भरता है जिसे सहरिया जनजाति का कुंभ कहते है।
डामोर
- इनकी उत्पत्ति राजपूतों से मानी जाती है।
- यह जनजाति मूल रुप से गुजरात की है।
- राजस्थान में सर्वाधिक डूंगरपुर, सीमलवाड़ा पंचायत में तथा बाँसवाड़ा में निवास करती है।
- होली पर चाडिया कार्यक्रम होता है।
इस जनजाति में महिलाओं के साथ पुरुष भी गहने पहनते हैं।
- फला -गाँव की छोटी इकाई को कहते हैं।
- मुखिया -गाँव के मुखिया को कहते है।
- मेले - ग्यारस की रेवाड़ी मेला (डूंगरपुर), छैला बावजी मेला गुजरात में भरता है।
ये अंधविश्वासी होते है तथा भूत-प्रेत व जादू-टोने में भी विश्वास करते है।
दीपावली पर ये पशुओं की पूजा करते है।
एकाकी परिवार प्रथा का प्रचलन है।
पशुपालन व कृषि मुख्य व्यवसाय है।
दापा प्रथा, नाता प्रथा, नातरा प्रथा, बहुविवाह का प्रचलन है।
सांसी
- सांसी जनजाति की उत्पत्ति साँसमल नामक व्यक्ति से हुई थी।
- यह जनजाति सर्वाधिक भरतपुर में निवास करती है।
- यह अनुसूचित जनजाति (एसटी) में नहीं बल्कि अनुसूचित जाति (एससी) में आती है।
- इसकी दो उपजातियाँ हैं - 1. बीजा 2. माला
- इस जनजाति में नारियल की गिरी लेन-देन से विवाह पक्का माना जाता है।
- यह जनजाति में घुमक्कड़ जनजाति है।
- सांसी जनजाति में शादी के समय लड़की के चरित्र की परीक्षा ली जाती है जिसे कुकड़ी प्रथा कहते हैं।
नोट- कुकड़ी एक गीत है जो रातीजगा का अन्तिम गीत है।
- इस जनजाति में अन्तर्गोत्र विवाह तथा विधवा विवाह नहीं होते हैं। आपसी झगड़ों के निपटारे के लिए हरिजन जाति को मुखिया बनाती है।
- नीम, पीपल, व बरगद वृक्षों को पूजते हैं।
- होली व दीपावली त्योहार मनाते हैं। इस जनजाति में विवाह के समय तोरण, चंवरी नहीं होते हैं। चोरी को विद्या मानते हैं।
कथौड़ी
- कथौड़ी जनजाति मूलतः महाराष्ट्र की है।
- 2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में लगभग 5 हजार (4833) कथौड़ी जनजाति की जनसंख्या पाई जाती है।
- कथौड़ी एकमात्र जनजाति है जिसे मनरेगा में रोजगार दिया गया है।
- राजस्थान में कथौड़ी उदयपुर की कोटड़ा, झाड़ोल पंचायत व बारां में पाई जाती है।
- कथौड़ी जनजाति का मुख्य व्यवसाय खेर के वृक्ष से कत्था तैयार करना है, जिस कारण इन्हें कथोड़ी कहते हैं।
- कथौड़ी जनजाति मे घास-फूस से बनी झोपड़ी 'खोलरा' कहलाती है।
- भोपा/पटेल- कथौड़ी जनजाति का मुखिया है।
- स्त्री-पुरूष मे गुदवाने का रिवाज है।
- यह जनजाति आभूषण नहीं पहनती है।
- नृत्य, मावलिया, लावणी, होली।
- शव को गाड़ते है। मृत्यु के 5वें दिन भद्दर होते हैं।
- आराध्य देवी-देवता-कंसारी देवी, भारी माता, बाध्य देव, डूंगर देव।
- नायक एक दल का मुखिया।
- फड़का - कथौड़ी जनजाति द्वारा मराठी अंदाज में साडी पहनना।
- खोलरा - बांस से बनी झोपड़ी।

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