राजस्थान की चित्र शैलियां | Rajasthan ki chitra shaili

राजस्थान की चित्र शैलियां 

यह लेख राजस्थान की गौरवशाली चित्रशैली और उसके ऐतिहासिक विकास पर आधारित है।
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इस लेख में आपको राजस्थान की विभिन्न अंचलों की कला संस्कृति और उनकी चित्रशैली के बारे में निम्नलिखित जानकारी पढ़ने को मिलेगी:
  • चित्रशैली का इतिहास: राजस्थान में चित्रशैली का प्रारम्भ, इसका स्वर्णिम काल और आनंद कुमार स्वामी द्वारा किया गया सर्वप्रथम वैज्ञानिक विभाजन।
  • प्रमुख चित्रशैलियाँ: मेवाड़, मारवाड़, ढूँढाड़ और हाड़ौती स्कूलों के अंतर्गत आने वाली सभी प्रमुख चित्रशैलियों (जैसे उदयपुर, किशनगढ़, जयपुर, बूँदी आदि) की अनूठी विशेषताएं और रंगों का चयन।
  • विश्वप्रसिद्ध चित्र: किशनगढ़ चित्रशैली की प्रसिद्ध 'बणी-ठणी' (भारत की मोनालिसा) और प्राचीन ताम्रपत्रों पर उकेरी गई चित्रशैलियों का विस्तृत विवरण।
  • मशहूर चित्रकार: उन प्रमुख कलाकारों (चितेरों) का परिचय जिन्होंने अपनी विशेष चित्रशैली के माध्यम से भीलों के जीवन, पशु-पक्षियों और प्रकृति को कागज़ और दीवारों पर जीवंत किया।
  • अनोखी तकनीकें: दीवारों पर की जाने वाली 'आला-गीला' चित्रशैली, कपड़ों पर 'पिछवाइयाँ' और ऊँट की खाल पर होने वाली 'उस्ता कला' जैसी विशिष्ट पद्धतियों की व्याख्या।
  • संग्रहालय व संस्थाएं: राजस्थान की इन दुर्लभ चित्रशैलियों को सहेजने वाले प्रमुख संग्रहालयों और कला केंद्रों की सूची।
कुल मिलाकर, यह लेख राजस्थान की पारंपरिक चित्रशैली की बारीकियों और उसकी सांस्कृतिक गहराई को समझने के लिए एक संपूर्ण संग्रह है।
  • चित्रशैली का प्रारम्भ मध्य पाषाण (10000-40000 ई.पू.) काल में हुआ था।
  • भारत में चित्रकला का स्वर्णकाल जहाँगीर (1605-1627 ई.) का समय था।
  • भारत में चित्रकारी के पितामह रवि वर्मा (केरल) हैं। जिन्होंने प्रताप का चित्र बनाया था।

नोट- राजस्थानी चित्रकला के आधुनिक जनक कुन्दन लाल मिस्त्री हैं।

  • राजस्थान चित्रकला का प्रारम्भ 15 वीं सदी में हुआ था।
  • कार्ल खण्डेलवाला ने राजस्थान चित्रकला का स्वर्णकाल 17-18वीं सदी माना है।
  • बारहमासा का सर्वप्रथम चित्रण 1377-78 ई. में मुल्ला दाऊद की रचना चन्दायण में हुआ था।
  • राजस्थानी चित्रकला का सर्वप्रथम वैज्ञानिक विभाजन 1916 ईस्वी आनन्द कुमार स्वामी ने राजपूत पेन्टिंग ग्रन्थ में किया।
  • बैराठ सभ्यता (कोटपुतली/बहरोड़) में अनेक चित्र मिले हैं जिस कारण इसे "प्राचीन युग की चित्रशाला" कहते हैं।
  • कालीबंगा (हनुमानगढ़) सभ्यता से अलंकृत ईंटों का फर्श मिला है।
  • आलनिया (कोटा) से 5000 ईसा पूर्व के चित्र मिले हैं।
  • दर (बयाना, भरतपुर) से पक्षियों के चित्र मिले हैं। जिनकी खोज डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने की थी।
  • राजस्थानी चित्रशैली का नाम सर्वप्रथम रामकृष्ण दास ने दिया था।
  • दस वैकल्पिक सुत्त/औध नियुक्ति वृति राजस्थान का सबसे प्राचीन चित्र है। जो जैसलमेर के भंडार में हैं। यह चित्र 1060 ईस्वी का है। इन दोनों ग्रन्थों को भारतीय चित्रकला का दीप स्तंभ कहते हैं।
  • 16वीं शताब्दी में तिब्बत के इतिहासकार तारानाथ ने मरू प्रदेश में श्रृंगधर चित्रकार का उल्लेख किया है। जो प्रथम चित्रकार था। श्रृंगधर 7वीं सदी का चित्रकार था जो राजस्थान का प्रथम चित्रकार माना जाता है। श्रृंगार मारवाड़ के राजा शील का दरबारी चित्रकार था। श्रृंगधर ने यक्ष शैली में चित्र बनाये।
  • वी. एस. वाकणकर ने 1953 ई. कोटा के दर्रा, चम्बल क्षेत्र, माउंट आबू में शैलचित्रों कों खोज की।
  • रामकृष्णदास ने राजस्थान चिकत्रला, हैवल व गांगुली ने राजपूत चित्रकला तथा एन.सी. मेहता हिन्दू चित्रकला कहा। W.H. ब्राउन ने अपने ग्रंथ इंडियन पेंटिंग्स में राजस्थानी चित्रकला को 'राजपूत कला' कहा।
  • राजस्थान की मौलिक चित्रकला पर अजन्ता परम्परा शैली का प्रभाव पड़ा।
  • राजस्थान का ताम्रपत्र पर चित्रित प्रथम ग्रंथ 'श्रावक- प्रतिक्रमण' सूत्र चूर्णी है जो तेजसिंह के समय 1260 ई. में आहड़ (उदयपुर) में चित्रित हुआ। इस ग्रंथ का चित्रकार कमलचंद्र था। वर्तमान में यह ग्रंथ जैसलमेर संग्रहालय में रखा है।
  • राजस्थान का दूसरा चित्रित ग्रंथ सुपासनाह चरित्रम सुपाश्र्वनाथ चरितम् है जिसका चित्रकार 'हीरानंद' थे। यह ग्रंथ 1422-23 में महाराणा मोकल के समय देवकुल पाठक (देलवाड़ा) में चित्रित किया गया जो वर्तमान में सरस्वती संग्रहालय, उदयपुर में रखा गया है।
  • राजस्थानी चित्रकला का प्रारंभ विशुद्ध रूप से 1500 ई. के आस-पास हुआ था।
  • राजस्थानी चित्रकला का आरम्भ अपभ्रंश से हुआ जिसमें अजन्ता, कश्मीर, गुजरात, जैन शैली का प्रभाव रहा।
  • राजस्थानी चित्रकला का आरम्भ मेदपाट (मेवाड़) से माना जाता है जिस कारण मेदपाट को राजस्थानी चित्रकला की जन्म भूमि माना जाता है।

राजस्थान में चित्रकला के प्रमुख संग्रहालय

  1. पोथीखाना - जयपुर
  2. जैन भंडार - जैसलमेर
  3. पुस्तक प्रकाश - जोधपुर
  4. सरस्वती भण्डार - उदयपुर

चित्रकला की संस्थाएँ

  1. कलावृत - जयपुर
  2. आयाम - जयपुर
  3. राजस्थान ललित कला अकादमी - जयपुर
  4. जवाहर कला केन्द्र - जयपुर
  5. पैग - जयपुर
  6. क्रिएटिव आर्टिस्ट ग्रुप - जयपुर
  7. चितेरा - जोधपुर
  8. धोरा - जोधपुर
  9. पुस्तक प्रकाश संग्रहालय/मान पुस्तक प्रकाश - जोधपुर
  10. आज - उदयपुर
  11. सरस्वती भंडार - उदयपुर
  12. टखमण 28 - उदयपुर
  13. पश्चिमी सांस्कृतिक केन्द्र - उदयपुर
  14. प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप - उदयपुर
  15. तुलिका कलाकार परिषद - उदयपुर
  16. अंकन - भीलवाड़ा
  17. मयूर - वनस्थली, टोंक

मुख्य चित्रकार

ईशाहिसामुद्दीन उस्ता - बीकानेर, 1986 पद्मश्री प्राप्त

ईलाही बख्श उस्ता - बीकानेर
महाराजा गंगा सिंह का चित्र बनाया। जो यू.एन.ओ. के संग्रहालय में लगा है।

कैलाश चन्द्र शर्मा - जयपुर
जैन शैली का चितेरा, इन्हें लघु चित्रकला का जादूगर कहा जाता है।

सौभाग्य मल गहलोत - जयपुर
नीड़ का चितेरा

जगमोहन माथोड़िया - जयपुर
श्वानों का चितेरा
इसने 3000 श्वानों के चित्र बनाकर गिनीज बुक में नाम दर्ज करवाया।

ए.एच.मूलर - जर्मनी, बीकानेर में वैज्ञानिक चित्रकार रहे।
उदयपुर रहकर राणा प्रताप के चित्र बनाये।
मुख्य चित्र-राणा प्रताप का समर्पण था।

भूरसिंह शेखावत
इनका जन्म बीकानेर के धौंधलिया गाँव में हुआ था। इन्होंने ग्रामीण जीवन का यथार्थवादी चित्रण किया जिस कारण इन्हें गाँव का चितेरा कहा जाता है। स्वतंत्रता सेनानियों व शहीदों के चित्र बनाये।

परमानंद चोयल
इन्हें भैंसों का चितेरा कहा जाता है। जापान के फुकोका संग्रहालय में इनके द्वारा बनाये चित्र रखे है। इनके पुत्र शैल चोयल भी प्रसिद्ध चित्रकार है।

गोवर्धनलाल जोशी
इनका जन्म 1914 ई. कांकरोली (राजसमंद) में हुआ था। इन्हें बाबा के नाम से जाना जाता है। इनका सर्वप्रथम चित्र बारात का है। इन्हें आदिवासी लोकजीवन/भीलों का चितेरा कहा जाता है।

रामगोपाल विजयवर्गीय
इनका जन्म 1905 ई. बालेर (राजसमंद) में हुआ था। इन्होंने 1924 में महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स, जयपुर से चित्रकला में डिप्लोमा किया। ये राजस्थान के प्रथम चित्रकार थे जिन्हें 1984 में पद्मश्री का अवार्ड दिया गया। इन्होंने 'अभिसार निशा' नामक साहित्यिक रचना की। इन्होंने राजस्थान में सर्वप्रथम 'एकल चित्रण' प्रदर्शनी प्रारम्भ की। इनके चित्रों का प्रमुख विषय नारी है। अभिसार निशा इनकी साहित्यिक रचना है।

ज्योति स्वरूप शर्मा
ये जोधपुर की थी। ये चमड़े पर चित्रकारी में प्रसिद्ध है।

देवीकीनंदन शर्मा
ये अलवर के थे। भित्ति चित्रण व पशु-पक्षियों के चित्रण में प्रसिद्ध थे। इन्हें मास्टर ऑफ नेचर एंड लिविंग ऑब्जेक्ट कहा जाता है।

बद्रीलाल सोनी
ये भीलवाड़ा के थे। इन्हें रंग और रेखाओं का जादूगर कहा जाता है। राजस्थानी चित्रकला को 4 भागों में बांटा गया है-

मेवाड़ स्कूल

राजस्थान चित्र शैली का सबसे प्राचीन व प्रमुख केन्द्र मेवाड़ था। जिस पर अजन्ता शैली का प्रभाव पड़ा। मेवाड़ शैली का सबसे प्राचीन ग्रन्थ श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णी है जो ताम्र पत्रों पर महाराणा तेजसिंह के समय (1260-61 ई.) में आहड़ (उदयपुर) में कमलचन्द्र द्वारा चित्रित किया गया। महाराणा मोकल के समय (1421-33 ई.) देवकुल पाठक ने 1422 ई. में जैन व गुजराती शैली के मिश्रण से सुपाश्र्वनाथ चरित्रम् चित्र को देलवाड़ा (सिरोही) में चित्रित किया। वर्तमान में सरस्वती संग्रहालय उदयपुर है।
1540 ई. में नानाराम ने भागवत पुराण का चित्रण किया।
महाराणा प्रताप के समय (1572-97 ई.) ढोलामारु चित्रण हुआ जिस पर मुगल शैली का प्रभाव था। यह चित्र 1592 ई. में चित्रित किया गया था।
1651 ई. में चित्तौड़गढ़ में मनोहर नामक चित्रकार ने रामायण की सचित्र रचना की जो मुंबई संग्रहालय में रखी है।
1655 ई. में 7 दिन में शूकर क्षेत्र महात्मय व भ्रमर गीत का चित्रण किया।
महाराणा भीमसिंह के समय (1777-1828 ई.) भित्ति चित्रों का प्रचलन हुआ।

मेवाड़ चित्रशैली की उपशैलियाँ

अ. उदयपुर चित्रशैली
राजस्थान की यह मूल चित्रशैली है जिसे चित्रशैलियों की जननी कहते हैं।

विषय- रसिक प्रिया, कदंब वृक्ष, आम वृक्ष, कोयल, सारस, बादलों से युक्त नीला आकाश, गालों तक जुल्फें, लम्बी मूंछें, लताएं, वृक्ष, पुष्प के पौधे, गीत गोविन्द, बारहमासा, हाथी, चकोर पक्षी, मछलीनुमा आंखें, पंचतंत्र, रंग लाल, पीला, नीला पुरुषों के छोटी गर्दन, छोटा कद, गठीली मूंछें, बड़ी आंखें, पगड़ी तथा महिलाएं छोटा कद, घाघरा-लूगड़ी, सरलता के भाव, सीधी लम्बी नाक के चित्र बने।

नोट- पंचतंत्र पुस्तक विष्णु शर्मा ने लिखी थी, जिसके प्रमुख पात्र कलीला और दमना है। इसमें दो गीदड़ों की कहानी है।

कलीला दमना का चित्रण नुरुदीन ने किया था।

चित्रकार- सहाबदीन, मेवा मनोहर कृपा, शाह उमरा, कमल चन्द्र, हीरानंद, श्योकश, जगन्नाथ, कृपाराम, नासिरुदीन, भैरुराम, जीवाााम।
  • इस चित्रशैली पर सर्वप्रथम अजंता चित्रशैली का प्रभाव पड़ा।
  • सुपाश्र्व चित्र हीरानंद ने बनाया था।
  • यह चित्र शैली राणा कुम्भा के समय प्रारम्भ हुई।
  • 18वीं सदी में उदयपुर चित्रशैली में राज-रानियों, पोट्रेट, दरबारी चित्र बनने प्रारम्भ हो गये थे। महाराणा भीमसिंह के समय भित्ति चित्र बनने प्रारम्भ हुए।
  • राणा जगत सिंह प्रथम का समय (1628-1652 ई.) इस चित्रकला का स्वर्णकाल था। उस काल में राग माला (1628 ई.) मालती माधव, एकादशी महात्म्य, पृथ्वीराज री बेल आदि चित्र चित्रित किये गये। गीत गोविन्द (1629 ई.), रसिक प्रिया (1628-30 ई.)
  • जगत सिंह ने चितेरों की ओवरी/तस्वीरों रो कारखानों नामक पाठशाला स्थापित की। जिसका प्रमुख चित्रकार शहाबदीन था। जिसने राजा महाराजाओं के चित्र बनाये। चितेरों की ओवरी में चित्र बनाने वाले को 'दारोगा' कहा जाता था।
  • महाराणा जयसिंह के काल में लघुचित्रों का निर्माण हुआ।
  • मेवाड़/उदयपुर चित्रशैली का सर्वप्रमुख चित्र रागमाला चित्र है जो वर्तमान में दिल्ली अजायबघर में रखा है।

ब. नाथद्वारा चित्रशैली-राजसमंद
  • इसका प्रारम्भ राणा राजसिंह (1652-1680 ई.) के समय हुआ। जिसका समय चित्रकाल का स्वर्णकाल था। 10 फरवरी, 1672 ई. को श्री नाथ जी की मूर्ति स्थापित की गई थी।
  • इस चित्रशैली में पीला व हरा रंग, चकोर नुमा आँखें, मोर, गाय, केले के वृक्ष, आँखों का अलसायापन व सघन वनस्पति का चित्रण हुआ है।
  • राणा राजसिंह के समय कादम्बरी, मालती-मालव, पंचतंत्र, पृथ्वीराज री वेल, एकादशी महात्म्य आदि चित्रों को चित्रित किया गया।
  • इस चित्र शैली में पुष्टी मार्ग/वल्लभ सम्प्रदाय का प्रभाव सर्वाधिक पड़ा है।
  • यहाँ कपड़े पर चित्रकारी की जाती है। जिन्हें पिछवाईयाँ कहते हैं।
  • इस चित्रशैली में श्रीकृष्ण व यशोदा के चित्र सर्वाधिक हैं।
  • इस चित्रशैली पर धार्मिक प्रभाव पड़ा है।
  • यह चित्रशैली व्यावसायिक चित्रकला की ओर अग्रसर है।
  • नारायण चतुर्भुज, नरोत्तम नारायण, विट्ठल दास, घनश्याम, देवकृष्ण, हीरा लाल, हरदेव, उदयराम, घासीलाल, चम्पालाल, कमला व इलायची प्रमुख चित्रकार हैं।
  • इस शैली में उदयपुर व ब्रज शैली का मिश्रण है।

स. देवगढ़ (राजसमंद) चित्रशैली
  • इस चित्रशैली को प्रकाश में लाने का श्रेय 'श्रीधर अंधारे' को जाता है।
  • इसका प्रारम्भ देवगढ़ के रावल द्वारका दास के समय (1680) हुआ था।
  • देवगढ़ चित्रशैली के भित्ति चित्र मोती महल व अजारा की ओवरी में देखने को मिलते हैं।
  • जयसिंह के समय सर्वाधिक विकास हुआ।
  • इस चित्रकला पर मेवाड़, मारवाड़ व ढूँढाड़ शैली का प्रभाव पड़ा जिस कारण इसे मिश्रित (कॉकटैल) चित्रशैली कहते हैं।
  • इस चित्रशैली में राजदरबार के दृश्य, हाथियों की लड़ाई, शिकार के दृश्य, वल्लभ सम्प्रदाय का प्रभाव दिखाई देता है।
  • इस चित्रशैली में हरे व पीले रंग का प्रयोग अधिक हुआ है।
  • कमला, चोखा, वैजनाथ/वैद्यनाथ इस शैली के प्रमुख चित्रकार थे।

द. चावण्द चित्र शैली (उदयपुर)
  • इस चित्रशैली का प्रारम्भ राणा प्रताप (1585 ई.) के समय हुआ।
  • राणा अमर सिंह का समय (1597-1620 ई. ) इस चित्रशैली का स्वर्णकाल था।
  • 1592 ई. में निसारदीन ने ढोलामारु का चित्र बनाया, जो वर्तमान में दिल्ली संग्रहालय में है।
  • निसारदीन ने 1605 ई. में रागमाला सैट की रचना की।

अन्य शैली

शाहपुरा शैली
यह शैली मेवाड़ स्कूल की शैली है। शाहपुरा में मुख्यत: फड़ चित्रण विकसित हुई। फड़ में कपड़े पर देवी-देवताओं का चित्रांकन किया जाता है। श्रीलाल जोशी, दुर्गालाल जोशी, पार्वती जोशी आदि फड़ चित्रकार है।

मारवाड़ स्कूल

16वीं सदी के तिब्बती इतिहासकार ने मरूप्रदेश/मारवाड़ में श्रृंगधर नामक चित्रकार का उल्लेख किया है जो राजस्थान का प्रथम चित्रकार माना जाता है। मारवाड़ी शैली के चित्र 'ओध निर्युक्ति वृत्ति' में मिलते है। 10वीं-15वीं सदी के मध्य मारवाड़ में जैन ग्रंथों का चित्रांकन हुआ। मारवाड़ स्कूल की निम्न उपचित्रशैलियाँ है-

अ. जोधपुर चित्रशैली
  • यह चित्रशैली मालदेव के समय से प्रारम्भ (1532-1562 ई.) हुई थी। मालदेव से पूर्व इस चित्र शैली पर मेवाड़ चित्र शैली का प्रभाव रहा।
  • जोधपुर चित्रशैली का सर्वाधिक विकास राव मालदेव के समय माना जाता है। चोखेलाव महल में मालदेव ने भित्ति चित्र बनवाएं जो इसकी सैनिक रूचि को दर्शाते हैं। मालदेव ने भित्ति चित्रों में सप्तसती के दृश्य व राम-रावण के युद्ध के दृश्य है।
  • जसवंत सिंह प्रथम (1638-1678 ई.) व मान सिंह (1803-1843 ई.) का समय इस चित्रशैली का स्वर्णकाल था।
  • विजयसिंह के समय (1752-93 ई.) मारवाड़ चित्र शैली पर वैष्णव सम्प्रदाय का प्रभाव पड़ा जिसमें राधा-कृष्ण के चित्र सर्वाधिक चित्रित किये गये।
  • रामसिंह के समय लम्बी तुर्रेदार पगड़ियों के चित्र विशेष आकर्षण थे।
  • महाराजा विनयसिंह के समय फैज़ अली व उदयराम दरबारी चित्रकार थे।
  • 1800 ई. में दशहरा दरबार का चित्र बनाया गया।
  • 1816 ई. में शिवदास ने स्त्री को हुक्का पीते हुए चित्रित किया।
  • महाराजा तख्त सिंह के समय (1843-73 ई.) मारवाड़ चित्रशैली पर यूरोपियन चित्रशैली का प्रभाव पड़ा तथा सुनहरे रंगों का प्रयोग होने लगा।
  • इस चित्रशैली पर मुगल शैली का प्रभाव जसवंतसिंह प्रथम तथा मोटा राजा उदय सिंह (1583-1595 ई.) के समय पड़ा।
  • महाराजा अभयसिंह के शासनकाल में 1725 ई. में चित्रकार डालचंद ने महाराजा अभयसिंह का नृत्य करते चित्र बनाया।
  • इस चित्रशैली पर मानसिंह के समय (1803-1843 ई.) नाथ सम्प्रदाय से संबंधित चित्र बने। मानसिंह का समय (1803-43) जोधपुर चित्रशैली का स्वर्णकाल था।
  • इस शैली का प्रमुख चित्र उतराध्ययन सूत्र है जिसकी रचना 1591 ई. में की गई जो वर्तमान में बड़ौदा संग्रहालय में स्थित है।
  • चित्रकार अनु मल्होत्रा ने 'द महाराजा ऑफ जोधपुर, द गलेक्सी लिव्ज ऑन' चित्र जोधपुर शासक गजसिंह द्वितीय का बनाया जिसमें गजसिंह द्वितीय का नाम बप्पाजी नाम रखा।
  • 1623 ई. में वीर विट्ठलदास चंपावत (पाली) जी चित्रकार ने 'रागमाला' ग्रंथ की रचना की।
  • इस चित्र शैली में पीला रंग, आम का वृक्ष, बादामनुमा आंखे, चील, कौआ, ऊँट, घोड़ा, कुत्ता, ढोलामारु, रेगिस्तान, कंटीली झाड़ियाँ, मोतियों के आभूषण, मखमल की जूतियाँ, लम्बी तुर्रेदार पगड़ियाँ, लम्बी मूंछें, टोपी पहनी महिला, गहरे काले बादल, खंजन पक्षी व प्रेमाख्यान का चित्रण हुआ है। पुरूषों के लम्बे-चौड़े गठीले बदन, ऊँची पगड़ी, राजसी वस्त्र तथा महिलाओं को लहंगा, ओढ़नी पहने दिखाया गया।
  • पाबूजी, हड़बूजी, जुझारजी, अमरसिंह राठौड़, ढूँगजी आदि लोक देवताओं का चित्रण भी मारवाड़ चित्रशैली में हुआ है।
  • जयदेव का गीत-गोविन्द, चन्दन मलय गिरी, बेलि क्रसन रुकमणी रो, मृगावती, फूलवती री वार्ता, मधुमालती, बारहमासा, ढोला मारु रा दूहा, रसराज, रसिक प्रिया, वीरमदे सोनगरा री बात आदि विषय मारवाड़ शैली की विशेषता है।
  • वीर जी भाटी, काला, रामू, रतन जी भाटी, अमरदास, छज्जू, भूत, देवदास, जीतमल, दाना भाटी, रामसिंह भाटी, शंकरदास, किशनदास, नारायणदास, शिवदास, प्रमुख चित्रकार थे।

ब. किशनगढ़ शैली
  • इस चित्रशैली को प्रकाश में लाने का काम ऐरिक डिक्सन एवं फैयाज अली को है।
  • इस चित्रशैली पर हिमाचल की कांगड़ा शैली का प्रभाव दिखाई देता है।
  • किशनगढ़ की स्थापना 1609 ई. में हुई। शासक मानसिंह के समय मोरध्वज मूलराज दिल्ली से किशनगढ़ की राजधानी रूपनगर आये।
  • सावंत सिंह का समय (1699-1764 ई.) इस चित्रशैली का स्वर्णकाल था।
  • इस चित्रशैली में श्वेत व गुलाबी रंग, मोर, भंवरा, बतख, हंस, जलमुर्गी, केला, गाय, खंजरनुमा आँखें, कमल का फूल व ऋतुओं का चित्रण हुआ है।
  • निहालचन्द ने नागर समुच्चय के नाम से 75 चित्रित ग्रन्थों की रचना की।
  • 1750 ई. में निहालचन्द ने राधा-कृष्ण का चित्र बनाया जिसमें राधा और कृष्ण एक-दूसरे को निहार रहे हैं।
  • अमरचन्द ने चांदनी रात की संगीत गोष्ठी नामक चित्र बनाया।
  • सावंत सिंह ने दीपावली व सांझी का चित्र बनाया।
  • सूरध्वज, अमीरचंद, धन्ना, छोटू, लाडली दास, रामलाल, सीताराम, नगराम, नानकराम इस चित्रशैली के प्रमुख चित्रकार हैं।

बणी-ठणी
  • किशनगढ़ के शासक सावंत सिंह की प्रेमिका रसिक प्रिया थी। जिसके लिए सावंत सिंह नागरी दास के नाम से कविता लिखते थे। रसिक प्रिया पासवान थी।
  • सावंत सिंह ने अपने दरबारी चित्रकार मोरध्वज निहालचन्द से रसिक प्रिया का राधा के नाम से चित्र बनवाया। जिसमें लम्बी जुल्फें, धनुषकार भौंहें, घने काले बाल, हाथ में अर्द्ध खिला कमल का फूल तथा नाक में सुन्दर आभूषण बेसरी, एक हाथ से घूँघट को पकड़े, एक लट गालों पर, तीखी नाक, माथे पर बिन्दी तथा सफेद मोतियों की लड़ी, कानों में सुन्दर आभूषण, पतली गर्दन आदि विशेषताएँ हैं।
  • इस चित्र को प्रकाश में लाने का काम ऐरिक डिक्सन व फैयाज ने किया था।
  • ऐरिक डिक्सन ने इस चित्र को भारत की मोनालिसा कहा गया था।
नोट- मोनालिसा का चित्र इटली के लियोनार्डो द विंची ने बनाया था।

बणी-ठणी का चित्र वर्तमान में किशनगढ़ संग्रहालय में है तथा इसकी एक प्रतिलिपि अल्बर्ट हॉल (पेरिस) में है।
किशनगढ़ चित्र शैली में ब्रज साहित्य व कांगड़ा शैली का भी प्रभाव पड़ा। किशनगढ़ चित्रशैली में सर्वाधिक चित्र कागज पर बने जिस कारण इसे कागज/वसली शैली कहते है।
5 मई, 1973 को बणी-ठणी पर 20 पैसे का डाक टिकट जारी किया गया।

स. बीकानेर चित्रशैली
  • इस चित्रशैली में मुगल शैली का प्रभाव कल्याण मल के समय जबकि सर्वाधिक मुगल प्रभाव रायसिंह के समय था।
  • बीकानेरी चित्रशैली का सबसे प्राचीन ग्रंथ 'भगवत पुराण' है जो रायसिंह के समय चित्रित हुआ।
  • अनूपसिंह के समय (1669-1698) इस चित्रकला का स्वर्णकाल था।
  • अनूपसिंह लाहौर से उस्ता कला के चित्रकारों को बीकानेर लाये जो उस्ताद कहलाये।
  • महाराजा सुजानसिंह (1700-35 ई.) के समय बीकानेर चित्रशैली मुगल प्रभाव से मुक्त हो गई तथा राजस्थानी शैली बन गई।
  • उस्ता कला को बढ़ावा उस्ता व मथेरण परिवार ने दिया। रूकनुद्दीन, साहेबदीन, कायम खां, हिसामुद्दीन उस्ता जाति के कलाकार थे। हिसामुद्दीन उस्ता दुलमेरा गाँव के थे जिन्हें 1986 में उस्ता कला में पद्मश्री का अवार्ड मिला। चन्दूलाल, मुकुंद, मुन्नालाल मथेरण परिवार के चित्रकार है।
नोट- उस्ता कला ऊँट की खाल पर चित्रांकन करना है। उस्ताकला में मुगल शैली तथा मथेरण शैली में जैन शैली का चित्रण हुआ है।

  • इस चित्रकला पर मुगल, पंजाबी, यूरोपियन, किशनगढ़ व सामंती वैभव का प्रभाव था।
  • इस चित्रकला में पीला, नीला, हरा, लाल, बैंगनी, जामुनी रंग, ऊँची पगड़ियाँ, मृगनयनी आँखें, आम वृक्ष, चील, कौआ, ऊँट, घोड़ा के चित्र दिखाई देते हैं।
  • बीकानेर चित्रशैली पर दक्षिणी चित्रशैली का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा।
  • इस चित्रशैली में चित्रकार अपने चित्र के नीचे अपना नाम व तिथि अंकित करता था।
  • हरमज गोइट्ज ने बीकानेर चित्रशैली को संरक्षण दिया था। हरमज गोइट्ज ने आर्ट एंड आर्किटेक्ट ऑफ बीकानेर पुस्तक लिखी।
  • जर्मनी के चित्रकार ए. एच. मूलर ने कए चित्र बनाया जिसमें पृथ्वीराज राठौड़ महाराणा प्रताप को पत्र लिख रहे है यह चित्र बीकानेर संग्रहालय में रखा है।
  • रागमाला, शिकार के दृश्य, राज परिवार के दृश्य, राग-रागिनी, बारह-मासा बीकानेर चित्रशैली के प्रमुख चित्र है।
  • मुन्नालाल, साहिबद्दीन, रहीम खाँ, अहमद उमरानी, अब्दुला, हसन, कासिम, बहाउद्दीन, रामलाल, शाह मुहम्मद, कायम, मुराद, नाथु, रुकनुद्दीन, अलीराजा, आसिर खां, हिसामुद्दीन उस्ता व हसन राजा प्रमुख चित्रकार थे। मुकुन्द, चान्दू लाल, लालचन्द्र मथैरणा कला के प्रमुख चित्रकार हैं।

द. जैसलमेर चित्रशैली
  • यह चित्रकला हरराज भाटी के समय प्रारम्भ हुई।
  • अखेसिंह भाटी व मूलराज द्वितीय का समय इस चित्रकला का स्वर्णकाल था।
  • इस चित्रशैली में लोद्रवा की राजकुमारी मूमल व अमरकोट के राजा महेन्द्र की प्रेम कहानी के चित्र हैं।
  • इस चित्रशैली का किसी भी चित्रशैली पर प्रभाव नहीं पड़ा।

य. नागौर चित्रशैली
  • इस चित्रशैली का प्रारंभ 18 वीं सदी में हुआ था।
  • यह चित्रशैली भित्ति चित्रशैली के लिए प्रसिद्ध है।
  • इस चित्रशैली में फीखे (बुझे), हल्के व उदास रंगों का प्रयोग हुआ है।
  • इस चित्रशैली में पारदर्शी वेशभूषा, वृद्ध व्यक्ति के चेहरे पर झुररिया, सफेद मूँछें, छोटी आँखों, का चित्रण हुआ है।
  • नागौर दुर्ग स्थित महलों में पैदल, घुड़सवार, हाथी सवार, पंखों युक्त परिया, बेल-बूटों, जल-कुण्ड में नहाती महिलाएँ व भित्ति चित्रों का चित्रण हुआ है।
  • नागौर के बादल महल में महिलाओं के चित्र हैं जिनके पंख लगे हैं उन महिलाओं ने फारसी शैली के कपड़े पहने थे जिन्हें आर. एस. अग्रवाल ने पार्सियन गाऊन कहा है।
  • नागौर में भित्ति चित्रों को सर्वाधिक बढ़ावा महाराजा बख्तसिंह ने दिया।

अन्य शैलियाँ

धाणेराव शैली (पाली)
धाणेराव पाली में पड़ता है जो प्राचीन समय में जोधपुर का एक ठिकाना था। कृपाराम, नारायण छज्जू नामक चित्रकारों ने इस नवीन चित्रशैली का प्रारम्भ किया।

अजमेर शैली
यहाँ सामंती वैभव व दरबार के चित्र सर्वाधिक बने। गाँवों में लोकजीवन के चित्र सर्वाधिक बने। जूनिया ठिकाने के चाँद ने 1698 ई. में राजा पाबूजी का चित्र बनाया जो प्रसिद्ध है।
अलाक्श, जालजी, चाँद, नारायण भाटी, रामसिंह भाटी, तैय्यब, माधोजी, राम, साहिबा प्रमुख चित्रकार है।
अजमेर ठिकाणे की चित्रकारी में राजपूत संस्कृति के चित्रों का चित्रण अधिक हुआ है।
उस्ता व साहिबा अजमेर चित्रशैली की महिला चित्रकार थी।

ढूँढाड़ चित्रशैली

इस चित्रशैली पर सर्वाधिक मुगल प्रभाव पड़ा। यह चित्र शैली आदमकद चित्र, पोर्ट्रेट चित्र व भित्ति चित्रण के लिए जानी जाती है। इसकी निम्न उपचित्र शैली है-

अ. आमेर चित्रशैली
  • यह चित्रशैली मानसिंह प्रथम के समय प्रारम्भ हुई।
  • आमेर का प्रारम्भिक चित्रित ग्रंथ आदिपुराण है जिसकी रचना पुष्पदत्त ने की थी।
  • मिर्जा राजा जयसिंह के समय इस चित्रशैली का सर्वाधिक विकास हुआ जिसमें बिहारी सतसई से संबंधित सर्वाधिक चित्र हैं। 1639 ई. में मिर्जा राजा जयसिंह ने कृष्ण-रूकमणी वेली तथा रसिकप्रिया ग्रंथों का चित्रांकन करवाया।
  • 1591 ई. में यशोधरा चरित्र ग्रन्थ की रचना की गई। 1588 ई. में आमेर सूरतखाने में रज्मनामा का चित्रण हुआ जिसमें 169 चित्र हैं। 1606 ई. में आदि पुराणों का चित्रण किया गया।
  • इस चित्रशैली में प्राकृतिक रंगों का प्रयोग (गेरुआ), कालुष, पेवड़ी, पशु-पक्षियों की लड़ाइयाँ, हाथियों की लड़ाइयाँ, रागमाला, नवरस, बारहमासा, कविप्रिया, गीत गोविन्द, रसिक प्रिया, कामसूत्र के चित्र व सफेदा वृक्ष का चित्रण हुआ है।
  • इस चित्रशैली में पंचतंत्र, रामायण, रामचरितमानस व इंडिका से संबंधित चित्र हैं।
  • मन्नालाल, हुकुमचन्द व मुरारी प्रमुख चित्रकार थे।

ब. जयपुर चित्रशैली
  • यह चित्रशैली सवाई जयसिंह (1700-1743 ई.) के समय प्रारम्भ हुई।
  • सवाई प्रताप सिंह का समय (1778-1803 ई.) इस चित्रशैली का स्वर्णकाल था। इस समय रामायण, भागवत, गीत गोविन्द, दुर्गा सप्तशती, राग-रागिनी के चित्र हैं। चित्रकार साहिबराम ने प्रताप सिंह का अर्द्ध व पूर्ण चित्र बनाया। हुक्मा, लक्ष्मण घासी, जीवन, राधाकिशन, चिमन, राजू, सीताराम, मंगल, रामसेवक, गोपाल, उदय आदि प्रमुख चित्रकार थे।
नोट- व्यक्ति चित्र को सबीहे तथा कृष्ण भक्ति के चित्र को पट चित्र कहा जाता है।

  • इस चित्रशैली पर सर्वप्रथम आमेर चित्रशैली का प्रभाव पड़ा।
  • 19वीं सदी में इस चित्रशैली पर यूरोपियन शैली का प्रभाव पड़ा।
  • आदमकद चित्र, अटपटी पगड़ी, झब्बेदार मोचड़ी, लटकते झुमके, राग-रागिनियाँ, व्यक्ति चित्र नृत्यांगनाओं, गायिकाओं, दासियों, रसिक प्रिया, नवरस, षड्ऋतु, रामायण, महाभारत, जुलूस, त्योहार, सफेद रुईदार बादल, आम, केला, पीपल, कदम्ब के वृक्ष, पशुओं की लड़ाई, हाथियों के चित्र, उद्यानों के चित्र, मोर, घोड़े, पीपल, वट के चित्र, मछलीनुमा आँखें व हरा रंग इस चित्रशैली की विषयवस्तु है। पोट्रेट चित्र, आदमकद चित्र, अराईशा पद्धति, भित्ति चित्र, उद्यानों के दृश्य, कामसूत्र, फकीरों को भिक्षा देती स्त्री, चेहरे पर चेचक के दाग, नमाज पढ़ती शहजादी आदि का चित्रण प्रमुख विशेषता है।
  • जयपुर चित्रशैली में हांसिये को गहरे लाल रंग से बनाया गया है। जो इसकी मुख्य विशेषता है।
  • महिला का आकार मध्यम प्रकार का है जो कुर्ता, दुपट्टा, जामे, ओढनी, पायजामे व पारदर्शी चुन्नी ओढ़े है। पाजेब, चूड़ी, बाजूबंद, टेवता, कंठी, सतलड़ी, टीका, टोटी, हार, बाली, मुख्य आभूषण हैं।
  • पुरुषों की आकृति मध्यम आकार की थी जिनके आदम कद चित्र बने पुरुष जामा, कमर पटका, पगड़ी, कलंगी, तुर्रा, नोकदार जूते, ढीले पायजामे, मोतियों की माला, बाजूबन्द, लौंग, बाली पहनें हैं।
  • हिन्दू देवी-देवताओं को यूरोपीय कुर्सी पर बैठाया गया है।
  • 1857 ई. में रामसिंह द्वितीय के समय जयपुर में महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स बनायी गयी। रामसिंह के समय तवायफों, रनिवास, शिव, देवी आदि के चित्र बनने लगे थे।
  • सवाई प्रतापसिंह के दरबार में गन्धर्व बाइसी में कई चित्रकार थे।
  • शाहीबराम ने ईश्वरीसिंह का आदमकद चित्र बनाया। जो राजस्थान में प्रथम था।
  • मोहम्मद शाह ने 1772 ई. में यशोधरा का चित्र बनाया।
  • ईश्वरीसिंह के समय लालचन्द ने गंगवाना युद्ध का चित्र बनाया।
नोट- गंगवाना युद्ध (जोधपुर) 1741 ई. में सवाई जयसिंह व अभय सिंह (जोधपुर) के बीच हुआ जिसमें अभयसिंह की हार हुई।

लालचंद, सालीगराम, राजीदास, शाहीबराम, गंगबक्स, घासीराम, लक्ष्मणदास, हरिनारायण, निरंजन, राधाकिशन, रामदीन, त्रिलोक, रघुनाथ, मुहम्मदशाह, मन्ना, सांवला, गजा, हीरा, फेदूला, हुकमा, चिमना, उदय, गोपालदास व रघुनाथ इस चित्रशैली के प्रमुख चित्रकार हैं।

स. अलवर चित्रशैली
  • यह चित्रशैली प्रतापसिंह (1775 ई.) के समय आरम्भ हुई तथा विनयसिंह का समय (1815-57 ई.) इस चित्रशैली का स्वर्ण काल था। प्रताप सिंह के समय डालूराम नामक चित्रकार जयपुर से अलवर आया तथा राजगढ़ किले के शीश महल में भित्ति चित्रण किया।
  • अलवर चित्रशैली में नफरी वादन विशेष आकर्षण था।
  • प्रताप सिंह के पुत्र बख्तावर सिंह के समय बलदेव ने मुगल शैली में तथा डालूराम ने राजपूत शैली में सर्वाधिक चित्र बनाये। सालगा व सालिगराम अन्य चित्रकार थे।
  • गुलिस्तां के चित्र, अलवर के रंगमहल के चित्र बलदेव व गुलाम अली ने चित्रित किये थे।
  • इस चित्रशैली पर ईरान, मुगल, यूरोपियन, दिल्ली व जयपुर चित्रशैली का प्रभाव पड़ा।
  • हरा रंग, मछलीनुमा आँखें, पीपल, वटवृक्ष, मोर, घोड़े इस चित्रशैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं। किनारे/बॉर्डर पर सुन्दर बेल बूटों का चित्रांकन अलवर चित्रशैली की सर्वप्रमुख विशेषता है।
  • मूलचन्द ने हाथीदांत पर चित्र बनाये।
  • शिवदान सिंह के समय कामशास्त्र पर चित्र बने।
  • यह एकमात्र चित्रशैली है जिसमें वैश्या (गणिका) के चित्र हैं।
  • बुद्धराम, डालचन्द, मंगलसेन, नानक राम, बुद्ध राम, छोटेलाल, नन्दराम, जमनादास, गुलाबअली, बलदेव व मूलचन्द अलवर चित्रशैली के प्रमुख चित्रकार थे।
  • शेखसादी रचित गुलिस्ता ग्रन्थ (जवाहरातों की स्याही से रचित) विनय सिंह के समय चित्रित किया गया। जिसमें 17 रंगीन चित्र हैं।
  • नफीरी वादन इस शैली का प्रमुख चित्रण है।

द. उनियारा, टोंक
  • इस चित्रशैली को सरदार सिंह (1740-77 ई.) ने प्रसिद्ध किया।
  • संग्राम सिंह ने भी इस चित्र शैली को प्रसिद्ध किया।
  • मीरबक्स ने हनुमान जी, भगवान राम, सीता, लक्ष्मण के चित्र बनाये।
  • यह चित्र शैली जयपुर व बूँदी के मध्य उनियारा ठिकाने में प्रसिद्ध है।
  • इस चित्रशैली पर जयपुर व बूँदी चित्रशैली का प्रभाव है।
  • इस चित्रशैली में आदमकद चित्र, बारहमासा, रामायण, राज दरबार, राजा- महाराजा, भगवत पुराण, दशावतार, ऊँट, घोड़ा, शेर, हाथी, पशु-पक्षियों के चित्र सर्वाधिक हैं। भीम, काशी, मीरबख्श, राम-लखन, धीमा प्रमुख चित्रकार हैं।

य. शेखावाटी चित्र शैली
  • इस चित्रशैली में भित्ति चित्रण प्रसिद्ध है। जिसे खुली कला दीर्घा (ओपन एयर आर्ट गैलरी) कहते हैं। इस चित्रशैली का प्रारम्भ 15वीं सदी में हुआ।
  • भित्ति चित्र नवलगढ़ (पाटोदिया हवेली, मोती लाल जी की हवेली, चोखानी हवेली, गंगा माता मन्दिर, कल्याण जी मन्दिर), बिसाऊ, फतेहपुर (गोयनका की हवेली, काशीप्रसाद की हवेली, सादूराम की हवेली, सिंहानियों की हवेली, चमड़ियों की हवेली), सीकर (रघुनाथ मन्दिर, बियाणियों की हवेली), रामगढ़ व मण्डावा के प्रसिद्ध हैं।
  • हवाई जहाज, रेलगाड़ी, मोटरगाड़ी, योद्धाओं के चित्र, ऊँट, घोड़े, डूंगर जी, जवाहर जी, लैला-मजनूं, हीर-रांझा, सामाजिक व धार्मिक चित्रांकन इस चित्रशैली की विशेषता है।
  • जोगीदास की छतरी (उदयपुरवाटी, झुंझुनूँ) पर देवा ने चित्रांकन किया।

अरायस पद्धति/पणा पद्धति/आला-गीला पद्धति
  • इस पद्धति में गीली दीवार पर चित्रकारी की जाती है।
  • यह पद्धति इटली से भारत आई थी।
  • अकबर व जहाँगीर के समय इसका सर्वाधिक विकास हुआ।
  • इसमें गुलाबी कत्थई नीले रंग का प्रयोग होता है।
  • बालूराम कुम्हार (चेजारा), जयदेव व तनसुख प्रमुख चित्रकार हैं।
  • इस चित्रशैली व बीकानेर चित्रशैली में चित्र के नीचे चित्रकारों के नाम व तिथि अंकित मिलती है।
यह पद्धति तीन प्रकार की होती है:-
  1. फ्रेस्को बुनो- गीली दीवार पर चित्रकारी
  2. फ्रेस्को सेको- दीवार सूखने पर चित्रकारी
  3. साधारण विधि - दीवार पर सीधी चित्रकारी

हाड़ौती स्कूल

अ. बूँदी चित्रशैली
  • यह चित्रशैली सुर्जन सिंह के समय प्रारम्भ हुई।
  • भाव सिंह व उम्मेद सिंह (1739-1771 ई.) का समय चित्रशैली का स्वर्णकाल था।
  • भावसिंह अनिरुद्ध के समय बूँदी चित्रशैली पर दक्षिण भारत की चित्रशैली का प्रभाव पड़ा। भावसिंह के समय चित्रकार मतीराम ने ललित ललाम व रसराज ग्रन्थ की रचना की।
  • शासक शत्रुशाल (1631 ई.) के समय बूँदी चित्रशैली पर विलासिता का प्रभाव पड़ने लगा।
  • उम्मेद सिंह ने चित्रशाला बनवाई जिसे भित्ति चित्रों का स्वर्ग कहते हैं। उम्मेद सिंह को एक चित्र में सूअर का शिकार करते हुए दिखाया गया है (1750 ई.)।
  • शासक छत्रसाल ने भित्ति चित्रों का रंगमहल बनवाया।
  • एक चित्र में एक अंग्रेज को अपनी पत्नी के साथ पियानो बजाते दिखाया गया है।
  • महाराव विष्णुसिंह के समय इस चित्रशैली पर यूरोपियन प्रभाव पड़ना प्रारम्भ हुआ।
  • इसे पशु-पक्षियों वाली चित्रशैली कहते हैं। इस चित्रशैली में सोने, चाँदी के रंगों का अधिक प्रयोग हुआ है।
  • इस चित्रशैली में मेवाड़, मुगल व मालवा शैली का मिश्रण है।
  • वर्षा में नाचते मोर, पेड़ पर फुदकते बंदर, कबूतर, हाथी, हरिण, बतख, खजूर के वृक्ष, कमल के फूल, अंगुलियों में मेहंदी लगी, पेड़ों की कतार, झुकी पगड़ी, शिकार, ऋतुएँ, उत्सव, भोग विलास, अन्तःपुर का जीवन, चक्रदार पायजामा, आम्रपत्र के समान आँखें, बारहमासा, कृष्णलीला दरबार, शिकार, हाथियों की लड़ाई, हरे व नारंगी रंगों का प्रयोग इस चित्रशैली की मुख्य विशेषता है।
  • सुरजन, अहमद, डालू, भीखराज, श्रीकृष्ण व रामलाल प्रमुख चित्रकार हैं।

ब. कोटा चित्रशैली
  • यह चित्रशैली रामसिंह प्रथम के समय (1661-1705 ई.) प्रारम्भ हुई तथा उम्मेद सिंह का समय (1771-1820 ई.) इस चित्रशैली का स्वर्णकाल था। छत्रशाल के समय कोटा चित्रशैली ने स्वतंत्र अस्तित्व बनाया। महारावल भीमसिंह के समय इस चित्रशैली पर कृष्ण भक्ति का प्रभाव पड़ा। जिसमें इस चित्रशैली पर वल्लभ संप्रदाय का प्रभाव अधिक पड़ा।
  • डालू चित्रकार ने 1768 ई. में रागमाला सेट बनाया। जो कोटा का सबसे बड़ा रागमाला सैट है जिसमें रानियों को शिकार करते दिखाया गया है।
  • बादलों के दृश्य, मोर, बतख, खजूर, हरिण, मृगनयनी आँखें, श्रृंगार बेला, बेटी की विदाई, पैर का कांटा, राम द्वारा हिरण का शिकार करते चित्र, नायिका भेद, राग-रागिनी, हल्का पीला, नीला व हरा रंग व रानियों को राजाओं के साथ शिकार करते दिखाया है।
  • कोटा की झाला हवेली भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध है। हरे रंग की पृष्ठ भूमि पर भूरे व गुलाबी रंगों से चित्रण कोटा चित्रशैली की विशेषता है।
  • लछी राम, डालू, गोविन्द, नूरमोहम्मद, लालचंद व रघुनाथ प्रमुख चित्रकार हैं।

अन्य शैली

झालावाड़ शैली
झालावाड़ रियासत 1838 ई. में कोटा से अलग की गई थी जो राजस्थान की सबसे नवीन व अंग्रेजों द्वारा बनाई गई एकमात्र रियासत थी।
झालावाड़ के महलों में रामलीला, कृष्णलीला, श्रीनाथजी, राजसी वैभव के चित्र सर्वाधिक बने।

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

राजस्थान की ऐतिहासिक विरासत और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को RPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।