राजस्थानी भाषा एवं बोली
यह लेख राजस्थानी भाषा और उसकी विभिन्न बोलियों के ऐतिहासिक विकास और वर्तमान स्वरूप पर आधारित एक विस्तृत संकलन है। इसमें भाषा की उत्पत्ति के विभिन्न मतों से लेकर उसके वैज्ञानिक वर्गीकरण तक की महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है।
इस लेख को पढ़ने से आपको निम्नलिखित पहलुओं को जानने का अवसर मिलेगा:
- भाषा का उद्भव और विकास: राजस्थानी भाषा का प्राचीन संस्कृत से लेकर आधुनिक स्वरूप तक का सफर और इसके विकास में सहायक रहे विभिन्न 'अपभ्रंशों' (जैसे शौरसेनी और गुर्जरी) की जानकारी।
- क्षेत्रीय बोलियाँ: राजस्थान के अलग-अलग अंचलों में बोली जाने वाली प्रमुख बोलियों (मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूँढाड़ी, हाड़ौती आदि) की विशेषताएँ और उनके प्रभाव क्षेत्र।
- साहित्यिक रूप: राजस्थानी साहित्य की दो मुख्य शैलियों, 'डिंगल' और 'पिंगल', के बीच का अंतर और इनमें रचित ऐतिहासिक ग्रंथों का परिचय।
- प्रमुख संस्थान और अकादमियाँ: भाषा और संस्कृति के संरक्षण में जुटी राजस्थान की प्रमुख अकादमियों, उनकी स्थापना और उनके द्वारा प्रकाशित पत्रिकाओं का विवरण।
- महत्वपूर्ण तथ्य: राजस्थानी भाषा से जुड़े ऐतिहासिक व्यक्तित्वों (जैसे कर्नल जेम्स टॉड, डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन) का योगदान और भाषा की वर्तमान संवैधानिक स्थिति।
कुल मिलाकर, यह लेख उन पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है जो राजस्थान की भाषाई विविधता और उसके गौरवशाली इतिहास को गहराई से समझना चाहते हैं।
- उत्तर मध्यकालीन भारत की राजभाषा थी- अंग्रेजी
- प्राचीन भारत की राजभाषा थी- संस्कृत
- आधुनिक भारत की राजभाषा है- हिन्दी
- 14 सितम्बर, 1949 अनुच्छेद 343 में हिन्दी को राजभाषा घोषित किया गया।
- संविधान के भाग 17 में अनुच्छेद 343-351 राजभाषा का उल्लेख है।
- हिन्दी भाषा का खड़ी बोली रूप राजभाषा के रूप में प्रयोजित हुआ।
- राजभाषा हिन्दी में संशोधन के लिए संसद को राष्ट्रपति की पूर्वानुमति आवश्यक है।
- राजस्थानी भाषा भारोपीय परिवार की है।
- राजस्थानी भाषा का उद्भव शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ। मान्य मत के अनुसार मरूगुर्जरी अपभ्रंश से राजस्थानी भाषा का विकास हुआ था।
- पिंगल शिरोमणी के रचनाकार कुशललाभ व आईन-ए-अकबरी के रचनाकार अबुल-फजल ने इस क्षेत्र की भाषा को मारवाड़ी कहा है।
- हिन्दी भाषा दिवस 14 सितम्बर को तथा राजस्थानी भाषा दिवस 21 फरवरी को मनाया जाता है।
- राजस्थान शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग राजस्थान इतिहास के पिता कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी पुस्तक एनल्स एण्ड एण्टीक्विटीज ऑफ राजस्थान में किया। इसी राजस्थानी शब्द को 1912 में डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन ने अपने भाषा सर्वेक्षण ग्रंथ में प्रयोग किया।
- भाषाओं का उल्लेख 8वीं अनुसूची में किया गया है। 8वीं अनुसूची में कुल 22 भाषाएँ हैं। संविधान लागू होने के समय 8वीं अनुसूची में 14 भाषाएँ थीं। राजस्थानी भाषा का 8वीं अनुसूची में नाम नहीं है।
- विश्व में सर्वाधिक मंडारी/चीनी भाषा बोली जाती है। राजस्थानी का विश्व में 16वां तथा भारत में 7वां स्थान है। राजस्थान में सर्वाधिक क्षेत्र में मारवाड़ी तथा सर्वाधिक लोगों द्वारा ढूँढाड़ी भाषा बोली जाती है।
कहवत- दो कोस पर पानी बदलै नौ कोस पर वाणी।
- बोली छोटे क्षेत्र में बोली जाती है तथा भाषा का क्षेत्र विस्तृत होता है। जब किसी भाषा को लिखना हो तब लिपि काम में ली जाती है। हिन्दी भाषा की लिपि देव-नागरी है तथा राजस्थानी भाषा की लिपि महाजनी/मुडिया/बनियावली है।
- ब्रजसेन सूरि रचित भरतेश्वर बाहुबली घोर जो 12वीं सदी का है राजस्थानी भाषा का प्राचीनतम ग्रंथ है।
- उद्योतन सूरि के कुवलयमाला (वि.स. 835) में भारत में 18 भाषायें बताई हैं। जिसमें राजस्थानी भाषा को मरुभाषा बताया है।
नोट- उद्योतन सूरि जालौर के गुर्जर प्रतिहार राजा वत्सराज का दरबारी था।
- सर्वप्रथम राजस्थानी शब्द का प्रयोग डॉ. जॉर्ज अब्राहम गियर्सन ने 1912 ई. में अपने ग्रंथ लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया में किया था। इन्होंने ही सर्वप्रथम राजस्थानी भाषा का वैज्ञानिक विभाजन किया।
- 17वीं. से 19वी. सदी का समय राजस्थानी भाषा का स्वर्णकाल था।
- 17वीं. सदी में राजस्थानी भाषा का स्वतंत्र रुप से विकास हो चुका था।
- राजस्थानी भाषा को मरुवाणी/मरुभाषा/मारुभाषा/मरुदेशीय भाषा/ डिंगल कहते हैं।
भाषा का कालक्रम के अनुसार विभाजन
1. प्राचीन आर्यभाषा काल (1500 ई. पू. - 500 ई.पू.)
1500-800 ई. पू. की भाषा वैदिक संस्कृत थी।
जिसमें संहिता ब्राह्मण ग्रंथ व कुछ भाग उपनिषद का आता है।
800-500 ई. पू. की भाषा लौकिक संस्कृत है जिसमें उपनिषद आते हैं।
2. मध्यकालीन आर्यभाषा काल (500 ई. पू. से 1000 ई.)
संस्कृत विद्वानों ने इस काल की भाषा को प्राकृत भाषा नाम दिया।
कर्पूर मंजरी टीका के लेखक वासुदेव, हेमचन्द, मार्कण्डेय आदि ने प्राकृत भाषा कहा।
मध्यकालीन आर्यभाषा में तीन धाराएँ विकसित हुई
1. पालि भाषा (500 ई. पू. - 1 ई.)
बौद्ध साहित्य की रचना इसी भाषा में।
2. प्राकृत भाषा - (1 ई. से 500 ई.)
साहित्य व नाट्यशास्त्रों की रचना।
3. अपभ्रंश भाषा - (500 ई.-1000 ई.)
इसे देशी, ग्रामीण, अमीरी भाषा भी कहते है।
मार्कण्डेय ने इसके तीन भेद बताये - नागर, उपनगर, ब्राचक।
3. आधुनिक आर्यभाषा काल (1000 ई. से अब तक)
वैदिक संस्कृत का प्रचलन बढ़ा।
प्रारम्भ में वैदिक संस्कृत व प्राकृत एक ही थी। बाद में शिष्टजनों की भाषा संस्कृत व सामान्य जन की भाषा 'प्राकृत' कहलाई।
- कन्हैयालाल-माणिक्यलाल मुंशी ने राजस्थानी व गुजराती क्षेत्र की भाषा गुर्जरी अपभ्रंश बताया जिससे राजस्थानी भाषा का उद्भव हुआ इस मत का समर्थन मोतीलाल मेनारिया ने किया।
राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति
- आर्य - वैदिक संस्कृत
- पालि - संस्कृत
- शौरसेनी प्राकृत - मागधीप्राकृत
- महाराष्ट्री प्राकृत - गुर्जरी अपभ्रंश
- नागर - अपभ्रंश
- राजस्थानी - हिन्दी
- गुर्जरी अपभ्रंश - मोतीलाल मेनारिया व के. एम. मुंशी राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति इसी अपभ्रंश से मानते हैं।
- सौराष्ट्री अपभ्रंश - सुनीति कुमार चटर्जी इस मत को मानते हैं।
- नागर अपभ्रंश - जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन व पुरुषोत्तम लाल मेनारिया इस मत को मानते हैं।
- शौरसेनी अपभ्रंश - L. P टेस्सीटोरी व महावीर प्रसाद शर्मा इस मत को मानते हैं जो सर्वमान्य मत है।
नोट- अपभ्रंश किसी भाषा का बिगड़ा हुआ या मिश्रण रुप होता है।
ग्रियर्सन ने 1912 में अपनी पुस्तक लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया में राजस्थानी भाषा का 5 भागों में वर्गीकरण किया -
1. पश्चिमी राजस्थानी मारवाड़ी
यह बोली मुख्य रुप से मारवाड़, मेवाड़, सिंध, बीकानेर, जैसलमेर, पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्र में बोली जाती है। इस बोली को चार भागों में बाँटा जाता है -
उत्तरी मारवाड़ी - बीकानेर, शेखावाटी व बागड़ी बोली उत्तरी मारवाड़ी में आती है। पृथ्वीराज राठौड़ के ग्रंथ बेलि क्रिसण रुक्मणी री वचनीका ग्रंथ उत्तरी मारवाड़ी में लिखा गया है।
दक्षिणी मारवाड़ी - मारवाड़ी, गुजराती, सिरोही, गोड़वाटी, देवड़ावाटी बोलियाँ दक्षिणी मारवाड़ी में बोली जाती हैं।
पूर्वी मारवाड़ी - मारवाड़ी व मेवाड़ी पूर्वी मारवाड़ी में बोली जाती है। राजिया रा सोरठे पूर्वी मारवाड़ी में लिखे गये हैं।
पश्चिमी मारवाड़ी - थली व ढठकी बोलियाँ पश्चिमी मारवाड़ी में बोली जाती हैं।
2. उत्तरी-पूर्वी राजस्थानी
यह बोली मुख्यत: कोटपुतली, खैरथल, डीग, अलवर, भरतपुर, गुड़गाँव, अहीरवाटी क्षेत्र में बोली जाती है। दयाबाई, सहजोबाई, चरणदासजी, लालदासजी के उपदेश मेवाती में लिखे गये हैं। उत्तरी-पूर्वी राजस्थानी हिन्दी के समान बोली जाती है।
3. मध्य-पूर्वी राजस्थानी
यह बोली मुख्यत: ढूँढाड़ क्षेत्र में बोली जाती है। तोरावाटी, राजावाटी, काठैला, अजमेरी, किशनगढ़ी, नागर चौल, चौरासी हाड़ौती मध्य-पूर्वी राजस्थानी की मुख्य उपबोलियाँ हैं।
4. दक्षिणी-पूर्वी राजस्थानी
यह बोली मुख्यत: मालवा, मेवाड़ क्षेत्र में बोली जाती है। मालवी, रांगड़ी, सोड़वाड़ी दक्षिणी-पूर्वी राजस्थानी की प्रमुख उपबोलियाँ हैं।
5. दक्षिणी राजस्थानी
यह बोली मुख्यत: भीलों की है। निमाड़ी दक्षिणी-राजस्थानी की प्रमुख उपबोली है।
डॉ. एल.पी. टेस्सीटोरी ने राजस्थानी भाषा को दो भागों में बाँटा है-
1. पश्चिमी राजस्थानी
मारवाड़ी, मेवाड़ी, बागड़ी इसमें गोड़वाड़ी, देवड़ावाटी, शेखावाटी, ढटकी, थली, बीकानेरी, बागड़ी, खैराड़ी बोलियाँ आती हैं।
2. पूर्वी राजस्थानी
इसमें किशनगढ़ी, चौरासी, नागरचौल, जयपुरी, तोरावाटी, राजावाटी, काठैडा, राजावाटी, अजमेरी, ढूँढ़ाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, अहीरवाटी बोलियाँ आती हैं।
- डॉ. मोतीलाल मेनारिया ने राजस्थानी भाषा का विभाजन 5 भागों में किया - मारवाड़ी, ढूँढ़ाड़ी, मालवी, मेवाती, बागड़ी।
- नरोत्तम स्वामी ने राजस्थानी भाषा के चार भाग किये - पश्चिमी/मारवाड़ी, पूर्वी/ढूँढ़ाड़ी, उत्तरी/मेवाती, दक्षिणी/मालवी।
राजस्थानी भाषा के दो साहित्यिक रुप हैं
1. डिंगल
यह मारवाड़ी मिश्रित भाषा है जिसकी उत्पत्ति गुर्जरी अपभ्रंश से हुई है। यह पश्चिमी राजस्थान में बोली जाती है। चारणों ने इस भाषा को अपने साहित्य में काम में लिया। राजस्थान का सर्वाधिक साहित्य इसी भाषा में लिखा गया। डिंगल भाषा को गीतों, ओज व माधुर्य भाव में लिखा गया। डिंगल शैली का सर्वप्रथम प्रयोग 1550 ई. में कुशलनाभ ने अपने ग्रंथ पिंगल शिरोमणि में किया। पृथ्वीराज रासो, विजयपाल रासो, हम्मीर रासों, खुमाण रासों वंश भास्कर आदि ग्रंथ डिंगल में लिखे गये। डिंगल शैली को पंडित रामकरण आसोपा ने अपने ग्रंथ राजरूपक में राजस्थानी भाषा कहा।
डिंगल शैली की चार उपशैलियां है-
- (अ) चारण शैली (ब) सन्त शैली (स) जैन शैली (द) लौकिक शैली
2. पिंगल
इस भाषा में ब्रज भाषा का मिश्रण है जिसकी उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से हुई है। यह पूर्वी राजस्थान में बोली जाती है। भाटों ने इसका प्रयोग किया। इस भाषा को छंदों में लिखा गया। अचलदास खींची री वचनिका, राव जैतसी रो छंद, रूकमणि हरण, राजरूपक, ढोला मारू रा दुहा आदि ग्रंथ पिंगल में लिखे गये।
राजस्थानी भाषा को चार भागों में बाँटा गया है
1. पश्चिमी राजस्थानी
इसका साहित्यिक रुप डिंगल है जो चारणों ने लिखा था।
- मारवाड़ी - ये पश्चिमी राजस्थानी की उप व प्रधान बोली है इसकी उत्पत्ति गुर्जरी अपभ्रंश से हुई। यह करणप्रिय बोली है। यह जोधपुर, फलौदी, बालोतरा, डीडवाना, जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, पाली, नागौर, सिरोही व जालौर की प्रसिद्ध है। यह राजस्थान की सबसे बड़ी बोली है। यह बोली मुख्य रुप से जोधपुर के आस-पास बोली जाती है। मारवाड़ी एक ओजगुण बोली है। जैन साहित्य इसी बोली में है। मूमल, वेलीकृष्ण रुक्मणी री वचनिका, ढोलामारु, राजिया रा सोरठा व मीरा के पद इसी बोली में है। मारवाड़ी में 'स' को 'ह' बोला जाता है।
- मारवाड़ी की उपबोलियाँ - मेवाड़ी, बीकानेरी, शेखावाटी, देवड़ावाटी, गोडवाड़ी, नागौरी, खेराड़ी, बागड़ी, ढाटी, ढटकी, थली।
- मेवाड़ी - यह चित्तौड़गढ़, उदयपुर, राजसमन्द, भीलवाड़ा, प्रतापगढ़ की प्रसिद्ध है। यह राजस्थान की दूसरी सबसे बड़ी बोली है। यह मुख्य रूप से गाँवों में पाई जाती है। कुम्भा का साहित्य इसी बोली में है। कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति इसी बोली में लिखी गई है। मेवाड़ी बोली में 'नी' का प्रयोग अधिक होता है।
- वागड़ी - यह बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, सिरोही में बोली जाती है। ग्रियर्सन के अनुसार यह भीलों की बोली है। इस पर गुजराती का प्रभाव है। इस बोली में 'च, छ' को 'स' बोला जाता है।
- देवड़ावाटी - यह आबू (सिरोही) में बोली जाती है।
- बीकानेरी - यह बीकानेर में बोली जाती है।
- शेखावाटी - यह झुंझुनूँ, सीकर, चूरू में बोली जाती है।
- थली - यह बीकानेर, चूरू, गंगानगर में बोली जाती है।
- नागौरी - यह नागौर में बोली जाती है।
- ढटकी - यह जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, फलौदी में बोली जाती है।
- गौड़वाड़ी - यह गौड़वाड़ प्रदेश (बाड़मेर व जालौर) में बोली जाती है। यह मुख्यतः आहौर (जालौर) व बाली (पाली) में बोली जाती है। नरपति नाल्ह का बीसलदेव रासो ग्रन्थ इसी बोली में है। इस बोली में मारवाड़ी, मेवाड़ी व गुजराती का मिश्रण है। सिरोही, बालवी, महाहड़ी, खणी गोड़वाड़ी की उपबोलियां हैं।
- धावड़ी - यह बोली मुख्य रूप से उदयपुर में बोली जाती है।
- खैराड़ी - यह भीलवाड़ा, बूंदी व टोंक में बोली जाती है। यह बोली ढूँढाड़ी, हाड़ौती व मेवाड़ी मिश्रण है।
नोट - भीलवाड़ा, टोंक व बूंदी का सीमावर्ती क्षेत्र खैराड़ कहलाता है।
- ढाटी - यह बाड़मेर, बालोतरा में बोली जाती है।
- निमाड़ी - यह मालवी की उपबोली है। इसे दक्षिणी राजस्थानी भी कहते हैं।
- मालवी - यह कर्णप्रिय बोली है। इसमें मारवाड़ी व ढूँढाड़ी का मिश्रण पाया जाता है। इस बोली में 'स' की जगह 'ह' बोला जाता है। यह कोटा, झालावाड़, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़ में बोली जाती है। मालवी में गुजराती व मराठी का प्रभाव भी दिखाई देता है। रांगड़ी, निमाड़ी, उमठवाटी, पाटवी, सोडवाड़ी मालवी की उपबोलियाँ हैं।
- रांगड़ी - यह मालवी व मारवाड़ी का मिश्रण है।
2. पूर्वी राजस्थानी
इसका साहित्यिक रुप से पिंगल है जो भाटों ने लिखा था।
- ढूँढाड़ी/जयपुरी/झाड़शाही - यह पूर्वी राजस्थानी की प्रधान बोली है। इस पर गुजराती, मारवाड़ी व ब्रजबोली का प्रभाव है। संतदादू का साहित्य ढूँढाड़ी बोली में है। यह जयपुर (उत्तरी जयपुर को छोड़कर), अजमेर, दौसा, सवाईमाधोपुर व लावा में बोली जाती है। इस बोली में ‘छै’ शब्द का प्रयोग ज्यादा होता है।
ढूँढाड़ी की उपबोलियाँ
- तोरावाटी - कांतली नदी के बहाव क्षेत्र को तोरावाटी कहते हैं। जहाँ तोमर राजपूतों का अधिकार था। यह बोली जयपुर के उत्तरी भाग, झुंझुनूँ के दक्षिणी भाग व सीकर के दक्षिणी-पूर्वी भाग में बोली जाती है जिसमें नीम का थाना, मण्डावा, श्री माधोपुर क्षेत्र आता है।
- राजावाटी - यह जयपुर के पूर्वी भाग व दौसा के पश्चिमी भाग में बोली जाती है।
- नागरचोल - यह सवाईमाधोपुर का पश्चिमी भाग, टोंक के दक्षिणी-पूर्वी भाग में बोली जाती है।
- चौरासी - यह जयपुर के दक्षिणी पूर्वी भाग व टोंक के पश्चिमी भाग में बोली जाती है।
- काठेड़ी - यह जयपुर के दक्षिणी भाग व टोंक में बोली जाती है।
- हाड़ौती - हिन्दी व्याकरण में सर्वप्रथम प्रयोग 1875 में हुआ। हाड़ौती को बोली की मान्यता सर्वप्रथम डॉ. ग्रियर्सन ने दी। यह कोटा, बूँदी, बाराँ, व झालावाड़ में बोली जाती है। हाड़ौती बोली पर गुजराती व मारवाड़ी बोली का प्रभाव दिखाई पड़ता है। वर्तनी की दृष्टि से हाड़ौती राजस्थान की सभी बोलियों में सबसे कठिन मानी जाती है। वंश भास्कर ग्रंथ में सूर्यमल मिश्रण ने भी कुछ हाड़ौती का प्रयोग किया है।
- अजमेरी - यह अजमेर, ब्यावर में बोली जाती है।
- किशनगढ़ी - यह किशनगढ़ (अजमेर) में बोली जाती है।
- ब्रज - यह धौलपुर व भरतपुर, डीग में बोली जाती है।
- मेवाती - यह बोली पश्चिमी हिन्दी व राजस्थानी के मध्य सेतु का काम करती है। लालदासजी व चरणदासजी के साहित्य इसी बोली में लिखे गये हैं। इस बोली पर ब्रज का सर्वाधिक प्रभाव है। यह अलवर, किशनगढ़, गोविंदगढ़, लक्ष्मणगढ़, राजगढ़, भरतपुर, कामां, हरियाणा (गुरूग्राम), उत्तर प्रदेश (मथुरा) में बोली जाती है। इस बोली में ‘लू’ शब्द का सर्वाधिक प्रयोग होता है। राठी व महेता मेवाती की उपबोलियाँ हैं।
- रांगड़ी - यह मालवी व मेवाड़ी का मिश्रण है। यह मालवा व मेवाड़ के ग्रामीण क्षेत्र में बोली जाती है। यह बोलने में कर्कश बोली है। रांगड़ी बोली में ‘श’ को ‘ह’ बोला जाता है। यह मालवी की उपबोली है।
- अहीरवाटी - यह बोली बांगरू/हरियाणवी व मेवाती के मध्य की मानी जाती है। यह यादवों की बोली है। इसे राठी या हीरवाल भाषा भी कहते हैं। यह अलवर, कोटपुतली, मुंडावर (खैरथल-तिजारा), हरियाणा (नारनोल, महेन्द्रगढ़, रोहतक, गुरूग्राम) में बोली जाती है।
- जगरौती - यह बोली मुख्य रूप से करौली में बोली जाती है।
- जोधराज का हम्मीर रासो ग्रंथ इसी बोली में लिखा गया है। अलीबख्शी ख्याल की रचना भी इसी बोली में की गई है। इस बोली में ‘न’ का ‘ण’ बोला जाता है।
- मध्यकालीन भारत की राजभाषा थी- फारसी
राजस्थानी भाषा की विद्यायें
- वंशावली - इसमें राजवंशों का विस्तृत वर्णन होता है।
- वचनिका - यह गद्य-पद्य का मिश्रित रुप होता है।
- ख्यात - यह राजाओं की मान-मर्यादा व उनके वंशों से सम्बन्धित होती है।
- बात/कथा/कहानी - यह प्रेरणास्पद लोककथाओं का लिखित रुप होता है।
- विगत - इतिहास परख होता है।
- वेलि - ऐसा ग्रंथ जिसमें राजा की वीरता व उदारता का वर्णन होता है।
- रासो - शासक की वीरता व अभियानों का वर्णन होता है।
- प्रकाश - किसी व्यक्ति की विशेष उपलब्धियों पर लिखना।
- मरस्या - शोक या मृत्यु के बाद लिखा गया ग्रंथ।
- दवावैत - अरबी - फारसी राजस्थानी दोहे।
- छावली - डूंगरजी - जवाहरजी के गीतों को कहते हैं।
राजस्थानी भाषा से सम्बन्धित संस्थायें
1. राजस्थानी भाषा साहित्य व संस्कृति अकादमी - बीकानेर
स्थापना - 25 जनवरी, 1983
2. राज. संस्कृत अकादमी - जयपुर
स्थापना - 1982
इसी अकादमी का सर्वोच्च पुरस्कार माघ पुरस्कार है। स्वरमाला व स्वर मंगला इस अकादमी की पत्रिकायें हैं।
3. राज. हिन्दी ग्रंथ अकादमी - जयपुर
स्थापना - 15 जुलाई, 1969
यह विश्वविद्यालय स्तरीय पुस्तकों का प्रकाशन करती है।
4. पं. झाबरमल शोध संस्थान - जयपुर
स्थापना - 2000
5. राजस्थानी प्रचारिणी सभा - जयपुर (1975)
यह संस्था मरुवाणी नामक पत्रिका निकालती है।
6. राजस्थान उर्दू अकादमी - जयपुर
स्थापना - 1979
यह अकादमी नखलिस्तान नामक पत्रिका निकालती है।
7. राजस्थानी सिंधी अकादमी - जयपुर
स्थापना - 1979
यह अकादमी रिहाण व सिंधुदूत नामक पत्रिका निकालती है।
8. राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी - जयपुर
स्थापना - 19 जनवरी, 1986
यह अकादमी ब्रज सतदल नामक पत्रिका निकालती है।
9. राजस्थानी प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान - जोधपुर
इसकी स्थापना 1950 में जयपुर में हुई थी जिसका 1958 में जोधपुर स्थानान्तरण कर दिया।
10. जगदीश सिंह गहलोत शोध संस्थान - जोधपुर
इसकी स्थापना 1975 में हुई थी।
11. राजस्थानी शोध संस्थान - चौपासनी (जोधपुर)
इसकी स्थापना 1955 में हुई थी। यह संस्था परम्परा नामक पत्रिका निकालती है।
12. रुपायन संस्थान - बोरुंदा (जोधपुर)
इसकी स्थापना 1960 में हुई यह संस्था लोकसंस्कृति व मरुचक्र नामक पत्रिका निकालती है। इस संस्था का मुख्य कार्य विलुप्त हो रही कला व संस्कृति को जीवित रखना है।
13. राजस्थानी ज्ञानपीठ अकादमी - बीकानेर
यह अकादमी राजस्थानी गंगा नामक पत्रिका निकालती है।
14. राज. राज्य अभिलेखागार - बीकानेर
इसकी स्थापना 1955 में जयपुर में हुई। जिसे 1960 में बीकानेर स्थानान्तरित कर दिया गया।
15. राजस्थानी साहित्य अकादमी - उदयपुर
इसकी स्थापना 28 जनवरी, 1958 को हुई। इस अकादमी का सर्वोच्च पुरस्कार मीरा पुरस्कार है जो 1959-60 में प्रारम्भ किया गया। यह संस्था मधुमती नामक पत्रिका निकालती है।
16. मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी-फारसी शोध संस्थान - टोंक
इसकी स्थापना 1978 में की गयी।
17. राजस्थानी पंजाबी भाषा अकादमी - गंगानगर
इसकी स्थापना 2006 में की गयी।
18. जैन विश्व भारती संस्थान - लाडनूं (डीडवाना)
इसकी स्थापना आचार्य तुलसी ने की थी। यह संस्था तुलसी प्रज्ञा नामक पत्रिका निकालती है।
19. श्री सरस्वती पुस्तकालय - फतेहपुर (सीकर)
यहां साधु-संतों के चित्र रखे है। यहां 1908 में लिखित लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया नामक ग्रंथ लिखा है।
नोट- सरस्वती पुस्तकालय उदयपुर में है।
20. राजस्थानी भाषा बाल साहित्य प्रकाशन - लक्ष्मणगढ़ (सीकर)
यह संस्था पणिहारी नामक पत्रिका निकालती है।
21. लोक संस्कृति नगर श्री शोध संस्थान - चूरू

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