राजस्थानी साहित्य | Rajasthani Sahitya

राजस्थानी साहित्य

यह लेख राजस्थानी साहित्य के ऐतिहासिक सफर और उसकी समृद्ध विरासत का एक व्यापक परिचय देता है। इसमें प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक की प्रमुख साहित्यिक शैलियों, जैसे चारण, जैन, ब्राह्मण और संत साहित्य का विस्तार से वर्णन किया गया है।
पढ़ने वालों को इस लेख में राजस्थान के गौरवशाली इतिहास को दर्शाने वाले रासो ग्रंथों, ख्यातों और फारसी साहित्यों की विस्तृत सूची मिलेगी। साथ ही, सूर्यमल्ल मिश्रण और कन्हैयालाल सेठिया जैसे महान साहित्यकारों के योगदान और उनकी रचनाओं के माध्यम से राजस्थान की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थिति को समझने का अवसर मिलेगा।
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लिखने की कला का विकास सिन्धु घाटी सभ्यता से हो गया था। सिन्धु वासी लिखने में बूस्ट्रोफिडान/सर्पीलाकार/भावचित्रात्मक लिपि का प्रयोग करते थे जो दाएं से बाएं लिखी जाती थी। भारत का सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद माने गये है जिनकी संख्या चार है। जिनमें सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद है।
भारत में प्राप्त प्रथम ग्रंथ चाणक्य का अर्थशास्त्र माना जाता है। जो मौर्यकाल में लिखा गया था। मौर्यकालीन एक अन्य रचना मेगस्थनीज की 'इण्डिका' है। भारत से प्राप्त साहित्यिक ग्रंथों को दो भागों में बांटा जा सकता है-
  1. धार्मिक साहित्य- धर्म से संबंधित साहित्य को इसमें रखा जाता है। जैसे- वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, रामायण, महाभारत, जैन साहित्य, बौद्ध साहित्य आदि।
  2. लौकिक साहित्य- जिन साहित्य में राजा-महाराजा, जनता, समाज का वर्णन हो लौकिक साहित्य कहलाता है। जैसे- अर्थशास्त्र (चाणक्य), इण्डिका (मेगस्थनीज), अमरकोष (अमरसिंह), मृच्छकटिकम् (शूद्रक), गीतांजलि (टैगोर) आदि।
  • राजस्थानी भाषा की प्रथम कहानी विश्रांत प्रवास है जो शिवचंद्र भारतीय ने लिखी।
  • राजस्थानी भाषा में रामायण की रचना संत हनुवंत किंकर ने की थी।
  • भरतेश्वर बाहुबली रास (शालिभद्र सूरि) जो 1184 ई. की है सन बताने वाली राजस्थान की सबसे प्राचीन पुस्तक है।
  • राजस्थानी भाषा की प्रथम फिल्म 'नजराना' है।
  • राजस्थान साहित्य अकादमी का मुख्यालय उदयपुर में है।
  • राजस्थान अभिलेखागार का मुख्यालय जोधपुर में है।
  • राजस्थानी भाषा का प्रथम नाटक केशर विलास है जो शिवचंद्र भारतीय ने लिखा।
  • राजस्थानी भाषा की प्राचीनत्तम रचना भरतेश्वर बाहुबलि है जो वज्रसेन सुरि ने 12वीं सदी में लिखी।
  • राजस्थानी भाषा का प्रथम बारहमासा ग्रंथ नेमीनाथ बारहमासा है जो पाल्हण ने लिखा।
  • आधुनिक राजस्थानी की काव्य कृति बादली है जो चन्द्रसिंह बिरकाली ने लिखी।
  • 1650 से 1850 ई. का समय राजस्थानी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है।
  • राजस्थान का प्रथम हिन्दी उपन्यास अबलाओं का इंसाफ है जिसकी रचना अम्बिका दत्त व्यास ने की थी।
  • आधुनिक राजस्थानी साहित्य का प्रथम उपन्यास कनक सुन्दरी है जिसकी रचना शिवचन्द्र भरतिया ने की थी।
  • महाकवि माघ को राजस्थान का कालीदास कहा जाता है।
नोट- कालीदास चन्द्रगुप्त के दरबार में थे।

  • मुहणोत नैणसी को राजस्थान का अबुल-फजल कहा जाता है।
नोट- अबुल-फजल अकबर के दरबार में थे।

  • राजस्थानी भाषा का सबसे बड़ा शब्दकोश राजस्थानी व्याकरण है जिसकी रचना सीताराम लालस ने की थी।
  • संगीत का विश्वकोष नाम से प्रसिद्ध राग कल्पद्रुम ग्रंथ की रचना कृष्णानन्द व्यास ने की थी।
  • गीता प्रेस गोरखपुर (उत्तरप्रदेश) की स्थापना 1923 ई. में हनुमान प्रसाद पोद्दार ने की थी जो राजस्थान में जन्में थे। यह प्रेस धार्मिक पुस्तकों का नाममात्र की लागत से प्रकाशन करती है।

राजस्थानी साहित्य के प्रकार

1. चारण साहित्य
यह साहित्य वीर व श्रृंगार रस प्रधान साहित्य है इस साहित्य में युद्ध व शौर्य का वर्णन होता है। इसमें गद्य व पद्य रूप में रचना की जाती है। चारण साहित्य में डिंगल शैली का प्रयोग किया जाता है। इस साहित्य में अतिश्योक्ति पूर्ण रचना की गई।

इस साहित्य की प्रमुख कृतियाँ -
  • वैली किशन रूक्मणी री वचनिका - पृथ्वीराज राठौड़
  • पृथ्वीराज रासो - चन्दबरदाई
  • कान्हड़दे प्रबन्ध - पदमनाभ
  • बांकीदास की ख्यात - बांकीदास (1838-1890 ई.)
  • वंश भास्कर - सूर्यमल्ल (1815-1863)
नोट- वंश भास्कर में बूँदी का इतिहास है। सूर्यमल्ल को आधुनिक महाकवि कहा जाता है।

  • सतसई - सूर्यमल्ल
  • नैणसी री ख्यात - मुहणोत नैणसी
  • मारवाड़ रा परगना री विगत - मुहणोत नैणसी
  • बादर ढाढ़ी - वीर भायण
नोट- यह चारण शैली की प्रथम रचना है। जिसे 15वीं सदी में लिखा गया।

2. जैन साहित्य
ये गद्य व पद्य रचना होती है। इस साहित्य में शांत रस का महत्व है। जैन साहित्य के अधिकांश ग्रंथ धर्म पर लिखे गये हैं। जिसमें नीति, श्रृंगार, सामाजिक जीवन को दर्शाया गया। जैन साहित्य प्राकृत व अपभ्रंश में लिखा गया।
प्रमुख ग्रंथ -
  • कुवलयमाला - उद्योतन सूरि
  • चैतन्य वन्दक - जिनेश्वर सूरि
  • पंचग्रंथी व्याकरण - बुद्धि सागर सूरि
  • धूर्ताख्यान - हरिभद्र सूरि

3. ब्राह्मण साहित्य
ब्राह्मणों ने धर्मशास्त्र संबंधित ग्रंथ सर्वाधिक लिखे जिसकी भाषा संस्कृत थी।
जैसे - रामायण, महाभारत, पुराण, बैताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी, हितोपदेश

प्रमुख ब्राह्मण ग्रंथ
  • कान्हड़देह प्रबंध व हम्मीरयण - पद्मनाभ
  • बीसलदेव रासो - नरपति नाल्ह
  • रणमल्ल छन्द - श्रीधर व्यास

4. संत साहित्य
यह साहित्य अधिकांश रूप से पद्य में लिखा गया है।

प्रमुख ग्रंथ
  • वेलि किशन रूक्मणी री वचनिका - पृथ्वीराज राठौड़
  • मीरा पदावली - मीरा
  • नरसी रो मायरो - रतना खाती

प्रमुख रासो साहित्य

1. पृथ्वीराज रासो
इस ग्रंथ की रचना चन्दबरदाई ने की लेकिन इसे पूरा चन्दबरदाई के पुत्र जल्हण ने किया। यह ग्रंथ 64 सर्गों में बंटा है जिसमें 1 लाख छंद हैं। इस ग्रंथ से तत्कालीन समय की सामाजिक और धार्मिक स्थिति की जानकारी प्राप्त होती है। यह ग्रंथ डिंगल व पिंगल दोनों शैली में लिखा गया है। चन्दबरदाई का जन्म 1163 ई. लाहौर में हुआ। पृथ्वीराज रासो में 1300 छंदों को ही प्रमाणित माना गया है। पृथ्वीराज रासो के भिन्न-भिन्न संस्करणों में छंदों की संख्या भिन्न-भिन्न मानी गई है-
  • प्रथम संस्करण- इसमें छंदों की संख्या 16306 मानी गई है जो 'नागरी प्रचारिणी सभा, काशी' से प्रकाशित है। यह संस्करण उदयपुर में सुरक्षित है।
  • दूसरा संस्करण- इस संस्करण में 7000 छंद है। इस संस्करण की प्रतियाँ बीकानेर व अबोहर (पंजाब) में रखी है।
  • तीसरा संस्करण- इस संस्करण में 3500 छंद है। इस संस्करण को महाराजा गंगासिंह म्यूजियम (बीकानेर) में रखा गया है।
कर्नल जेम्स टॉड गार्सा द तासी, मिश्र बंधु, बाबू श्यामसुन्दर ने पृथ्वीराज रासो को प्रमाणित तथा हीरानंद ओझा, श्यामलदास आचार्य शुक्ल, डॉ. वूलर अप्रमाणित मानते है।

2. बीसलदेव रासो
यह ग्रंथ 1155 ई. में लिखा गया। इस ग्रंथ की रचना नरपति नाल्ह ने की। यह ग्रंथ राजस्थानी व गुजराती भाषा का मिश्रण है। इस ग्रंथ में चौहानवंश की राजनीतिक स्थिति की जानकारी मिली है। इस ग्रंथ में बीसलदेव चौहान व मालवा के राजा भोज परमार की पुत्री राजमति की प्रेम कहानी का वर्णन है। बीसलदेव राजमति से नाराज होकर 12 वर्ष के लिए उड़ीसा चले जाते हैं।

3. खुमाण रासो
इस ग्रंथ की रचना दलपत (वि.स. 1769) विजय ने की। इसमें मेवाड़ के बप्पा रावल से राजसिंह तक का इतिहास है। इस ग्रंथ में हल्दीघाटी युद्ध के समय महाराणा-प्रताप एवं उसके भाई शक्तिसिंह के मिलन का वर्णन है। यह ग्रंथ पिंगल शैली में लिखा गया है। इस ग्रंथ की हस्तलिखित प्रति पूना (महाराष्ट्र) संग्रहालय में रखी है। इसमें 8 खंड व 3500 छंद है।

4. क्यामखाँ रासो - कविजान/नियामत खाँ
इसमें चौहानों को वत्सगौत्रीय बताया गया। इस ग्रंथ के अनुसार दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक (1351-88 ई.) ने करमचंद को मुसलमान बनाया तथा उसके वंश क्यामखाँ मुसलमान कहलाए।

5. प्रताप रासो - जाचक जीवन (1780-90)
इसमें अलवर शासक राव राजा प्रतापसिंह का इतिहास है।

6. मानचरित्र रासो- कवि नरोत्तम
इसमें आमेर के राजा मानसिंह व हल्दीघाटी युद्ध का वर्णन है। इस ग्रंथ में मानसिंह, महाराणा प्रताप व अकबर के आपसी सम्बन्धों का वर्णन किया गया। इस ग्रंथ के अनुसार महाराणा प्रताप ने जालौर पर आक्रमण किया था जो हल्दीघाटी युद्ध का मुख्य कारण था।

7. संगत रासो - गिरधर आसिया
इसमें मेवाड़ का इतिहास है इसमें कुल 943 छंद हैं। यह ग्रंथ महाराणा राजसिंह के समय (1652-80 ई.) लिखा गया। इस ग्रंथ में महाराणा प्रताप के भाई शक्तिसिंह व उनके वंशजों का विस्तृत वर्णन है।

8. हम्मीर रासो - जोधराज (1728 ई.)
सारंगधर & अहीरवाटी भाषा में इसमें हम्मीर व अलाउद्दीन खिलजी के युद्ध का वर्णन है।
नोट
  • हम्मीर हठ - चन्द्रशेखर
  • हम्मीर महाकाव्य - नयनचन्द्र सूरि
  • हम्मीर मदमर्दन - जयसिंह सूरि

9. विजयपाल रासो - नल्हसिंह - पिंगल भाषा व वीर रस
(इसमें करौली का इतिहास है।)

10. रतन रासो - कुम्भकरण (1673-85 ई.)
इस ग्रंथ में जोधपुर एवं जालौर के राठौड़ वंश का इतिहास है। इस ग्रंथ में जहाँगीर के विरुद्ध खुर्रम (शाहजहाँ) का विद्रोह, मुगलों का बुरहानपुर घेरा (1625 ई.), दौलताबाद घेरा (1633 ई.), धरमत का युद्ध (1658 ई.) आदि का विस्तृत वर्णन है।

11. जवान रासो - सीताराम रत्नू
इस ग्रंथ में बोराज ठिकाने के ठाकुर जवानसिंह खंगारोत और महादजी सिंधिया के सेनापति रायजी पटेल के बीच 1786 ई. में हुए बोराज युद्ध का वर्णन है।

12. बिन्हैरासो - राव महेशदास
इस ग्रंथ में अलवर के शासक अर्जुन गौड़ की वीरता का गुणगान है। इस ग्रंथ में मुगल उत्तराधिकार युद्ध (1657-59 ई.) का वर्णन है जिसमें मारवाड़ का शासक जसवंत सिंह प्रथम का भी वर्णन है।

13. राणरासो - दयालदास
इस ग्रंथ की रचना महाराणा करणसिंह के समय (1620-28 ई.) की गई। इस ग्रंथ में मुगल-मेवाड़ संघर्ष की जानकारी मिलती है।

14. शत्रुशाल रासो - डूंगरसी
इस ग्रंथ में बूंदी का इतिहास है। जिसमें बूंदी शासक शत्रुशाल (1621-58 ई.) के वैभव व युद्ध अभियानों का वर्णन है।

15. लछिमनगढ़ रासो - खुशाल
इसमें अलवर के शासक व राव मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के सेनापति नजफ खाँ के मध्य 1778 ई. में हुए युद्ध का वर्णन है।

16. छत्रपति रासो - काशी छंगाणी (1682 ई.)
इस ग्रंथ में बीकानेर का इतिहास है। इस युद्ध में बीकानेर शासक करणसिंह व नागौर शासक अमरसिंह के बीच 1644 ई. में हुए 'मतीरे की राड़' का वर्णन है।

17. सुजाणसिंह रो रासो - जोगीदास
इसमें बीकानेर शासक सुजाणसिंह (1700-35 ई.) द्वारा भाटियों पर आक्रमण की जानकारी मिलती है।

18. परमाल रासों
इसे आल्हाखंड भी कहते है। इसकी रचना परमर्दीदेव चन्देल के दरबारी, कवि जगनिक ने की थी।

19. राम रासो - माधोदास दधावाड़िया।

20. रेंवतगिरी रास - विजयसेन सूरि

प्रमुख ख्यात साहित्य

ख्यात का अर्थ होता है ख्याति अर्थात् यह किसी राजा महाराजा की प्रशंसा में लिखा गया ग्रन्थ होता है। ख्यात में अतिश्योक्ति में पूर्ण प्रशंसा की जाती है। ख्यात गद्य साहित्य में लिखी जाती है। ख्यात के बारे में डॉ. गोपीनाथ शर्मा का कथन- "ख्यातों में राजवंश की पीढ़ियों, जन्म-मरण की तिथियों, किन्हीं विशेष घटनाओं का उल्लेख तथा जिस वंश के लिए ख्यात लिखी गई हो, उसके व्यक्ति विशेषों का जीवन सम्बन्धी विवरण रहता है।"

1. नैणसी री ख्यात
इस ख्यात की रचना मुहणोत नैणसी ने की। इस ख्यात में मारवाड़ का इतिहास है इस ख्यात की तुलना बाबरनामा से की जाती है। मुंशी देवीप्रसाद ने नैणसी को राजस्थान का अबुल-फजल कहा है। नैणसी री ख्यात को मुरारी दान ने प्रसिद्ध किया। इस ख्यात में 1000 पृष्ठ हैं। यह ख्यात डींगल भाषा में लिखी नैणसी को राजस्थान में जनगणना का अग्रज माना जाता है क्योंकि इन्होंने ही सर्वप्रथम जनगणना के आँकड़ें किये थे। इस ग्रंथ में काठियावाड़, मालवा, बुन्देलखण्ड, उदयपुर, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, जोधपुर, फलौदी, बीकानेर, किशनगढ़, बूँदी, आमेर व सिरोही का इतिहास मिलता है। नैणसी री ख्यात सबसे प्राचीन ख्यात है। मुहणोत नैणसी जसवंत सिंह प्रथम के दरबारी विद्वान थे। जसवंत सिंह ने दक्षिणी अभियान में जाते समय 1670 में नैणसी व उसके भाई सुन्दरदास की हत्या करवा दी। नैणसी का जन्म 1610 ई. में हुआ था। जयमल इनके पिता थे।
नैणसी री ख्यात के बारे में डॉ. कानूनगो का कथन-
"इस ग्रन्थ का महत्व केवल राजनीतिक ही नहीं, अपितु राजस्थान का सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक इतिहास जानने हेतु यह ग्रन्थ महत्वपूर्ण है। उस समय के उत्सव, त्योहार आदि का सुन्दर वर्णन हुआ है।"

नोट - मुहणोत नैणसी के मारवाड़ रा परगना री विगत की तुलना आईने अकबरी से की जाती है। मारवाड़ रा परगना री विगत को राजस्थान का गजेटियर कहते हैं।

2. बाँकीदास की ख्यात
इस ख्यात की रचना बांकीदास आशिया (1781-1833 ई.) ने की थी। बांकीदास जोधपुर के शासक मानसिंह के दरबारी थे। इन्होंने नीति मंजरी व दातार बावने नामक अन्य रचनायें की। यह ख्यात राजस्थानी भाषा में है जिसमें डिंगल का मिश्रण है। इस ख्यात में छोटी-छोटी दो हजार बातें लिखी गयी हैं। इस ख्यात में जयपुर व जोधपुर की स्थापना के बारे में जानकारी मिलती है। इस ख्यात में जानकारी मिलती है कि 1828 ई. में गया के तीर्थ स्थान पर बीकानेर के राजा रतन सिंह ने अपने सामन्तों को यह शपथ दिलवाई थी कि वे भविष्य में कन्याओं का वध नहीं करेंगे।

3. दयालदास री ख्यात/बीकानेर रा राठौड़ा री ख्यात
इस ख्यात की रचना दयालदास सिंधायच (1798-1891 ई.) ने की थी। दयालदास बीकानेर के शासक रतनसिंह के दरबारी थे। आख्यानि, कल्पद्रुम, गामा री पट्टा री विगत दयालदास की अन्य रचनाएं है। इस ख्यात में राव बीका से लेकर सरदार सिंह तक का इतिहास है। इस ख्यात में तत्कालीन सामाजिक स्थिति की जानकारी मिलती है।

4. मुण्डियार री ख्यात
मुण्डियार नागौर का एक परगना था जहाँ चारणों ने ख्यात की रचना की। इस ख्यात में रावसिहा से लेकर जसवन्त सिंह प्रथम तक का इतिहास मिलता है जिस कारण इसे राठौड़ों की ख्यात कहते हैं। यह ख्यात 17वीं शदी में मारवाड़ मुगल सम्बन्ध, वैवाहिक सम्बन्ध राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था की जानकारी देती है।

प्रमुख साहित्यिक ग्रंथ

1. शिशुपाल वध
इस ग्रन्थ की रचना महाकवि माघ ने की थी। माघ भीनमाल, जालौर के थे, इन्हें राजस्थान का वाल्मीकि कहते हैं।

2. कान्हड़ दे प्रबन्ध
पद्मनाभ (1455 ई.) इस ग्रंथ में अलाउद्दीन खिलजी व कान्हड़दे चौहान के युद्ध का वर्णन है। चार खंडों में विभक्त।

3. अजितोदय
जगजीवनराम भट्ट ने 17वीं सदी में लिखा। इसमें मारवाड़ का इतिहास है। जगजीवनराम अजीतसिंह के दरबारी थे।

4. कर्मचन्द वंशीत्कीर्तन काव्यम - जयसोम
इसमें बीकानेर के वैभव का इतिहास है।

5. हरविलास - राजशेखर
राजशेखर गुर्जर प्रतिहार राजा महेन्द्रपाल का दरबारी था। बालरामायण, काव्यमींसा, विद्धशाल मंजिका, भुवनकोष, कर्पूर मंजरी राजशेखर की अन्य रचनायें हैं।

6. अमरकाव्य वंशावली - रणछोड़ भट्ट
इस ग्रंथ में महाराणा राजसिंह (1652-80 ई.) व अन्य शासकों के बारे में वर्णन किया गया है। इस ग्रंथ से जानकारी मिलती है कि हल्दीघाटी युद्ध में शक्तिसिंह महाराणा प्रताप की सहायता की थी।

7. एकलिंग महात्म्य - कान्ह व्यास
इस ग्रंथ में मेवाड़ शासकों की वंशावली का वर्णन किया गया है। माना जाता है कि इस ग्रंथ के प्रथम भाग की रचना राणा कुम्भा ने की थी जिसे राजवर्णन कहते हैं।

8. पद्मावत - मलिक मोहम्मद जायसी (1540 ई.)
इस ग्रंथ में चित्तौड़ के राजा रतन सिंह व सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मिनी की प्रेम कथा का वर्णन है। यह ग्रंथ हिन्दी भाषा में लिखा गया है।

9. पृथ्वीराज विजय - कवि जयानक
इस ग्रंथ की रचना 12वीं सदी में की गई जिसमें सपादलक्ष व अजमेर के चौहानों का वर्णन किया गया है। इसमें 1190 ई. तक का इतिहास है।

10. हम्मीर महाकाव्य - नयनचन्द्र सूरि (1403 ई.)
इस ग्रंथ में रणथम्भौर के चौहान राजा हम्मीर देव व दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के युद्ध का वर्णन है। इस महाकाव्य के अनुसार राजपूतों की उत्पति सूर्य से मानी जाती है जिस कारण राजपूतों को सूर्यवंशी कहा जाता है।

11. हम्मीररायण - भाउंड व्यास (1481 ई.)
इस ग्रंथ में हम्मीर देव चौहान की उपलब्धियों का वर्णन है। इस ग्रंथ के अनुसार अलाउद्दीन द्वारा रणथम्भौर पर आक्रमण करने का कारण हम्मीर द्वारा मोहम्मदशाह को शरण देना था। इसी ग्रंथ में लिखा है कि अलाउद्दीन ने हम्मीरदेव चौहान के विश्वासघाती सेनापति रणमल व रतिपाल को भी सजा दी थी।

12. वेलि किशन रूक्मणी री वचनीका
इस ग्रंथ की रचना गागरोन (झालावाड़) में बीकानेर के शासक कल्याणमल के पुत्र पृथ्वीराज राठौड़ ने की थी जिसे अकबर ने गागरौन जागीर दी थी। इस ग्रंथ में 304 छन्द है जो डिंगल भाषा में लिखे गये हैं। इस ग्रंथ को खोजने का काम इटली के भाषा वैज्ञानिक टेस्सीटोरी ने किया। टेस्सीटोरी ने पृथ्वीराज राठौड़ को डींगल का हैरोस कहा है। 1973 ई. में टेस्सीटोरी ने रॉयल एशियाटिक सोसायटी (बंगाल) से वेलि किशन रूक्मणी री वचनिका का प्रथम संस्करण निकाला।
  • वेलि किशन रूक्मणी री वचनिका को दुरसा आढा ने पांचवा वेद व 19वां पुराण कहा है। इस ग्रंथ में 16वीं शदी की वेशभूषा, त्योहार, रीति-रिवाज, रहन-सहन की जानकारी मिलती है।
  • दसम भागवत रा दूहा - इसकी रचना पृथ्वीराज राठौड़ ने शान्त रस में की। इस ग्रन्थ में भगवान कृष्ण की भक्ति का वर्णन है इस ग्रन्थ में कुल 184 दोहे हैं।
  • गंगा लहरी - इसकी रचना पृथ्वीराज राठौड़ ने की है जिसमें 80 दोहों में गंगा माता की प्रशंसा की गई है।
  • दशरथरावउत - इस ग्रन्थ की रचना पृथ्वीराज राठौड़ ने की है जिसमें 50 दोहों के माध्यम से भगवान रामचन्द्र की महिमा गायी गई है।

13. अचलदास खिंची री वचनिका - शिवदास गाडण (वि.स. 1480)
यह ग्रंथ चम्पू शैली व वीर रस में लिखा गया है। इस काव्य में गागरौन दुर्ग पर 1423 ई. में हुए मालवा के शासक होशंगशाह का आक्रमण तथा अचलदास द्वारा दुर्ग के साके का वर्णन किया गया है।

14. मारवाड़ रा परगना री विगत - मुँहणोत नैणसी
इस ग्रंथ की रचना राजस्थानी भाषा में की गई है जिसकी तुलना आइने-अकबरी (अबुल फजल) से की जाती है। इस ग्रंथ में 1658-62 ई. में प्रत्येक गांव की जनसंख्या की व आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था की जानकारी मिलती है। जनसंख्या के आंकड़े सर्वप्रथम मुँहणोत नैणसी ने दिये जिसके कारण इसे जनसंख्या का अग्रज कहते हैं।

15. बीर विनोद - श्यामलदास (1836-93) ई.
इस ग्रंथ में मेवाड़ का इतिहास है। इस ग्रंथ को 5 खण्डों व 20 प्रकरणों में बांटा गया है। इस ग्रंथ के लेखन पर रोक महाराणा फतेहसिंह ने लगा दिया। श्यामलदास 1857 की क्रांति का एकमात्र प्रत्यक्षदृष्टा इतिहासकार थे। इस ग्रंथ में महाराणा शंभुसिंह (1861-74) ई. से सज्जनसिंह के शासनकाल तक का इतिहास है।

16. राजरत्नाकर - सदाशिव ने 17वीं सदी में लिखा।
इस ग्रंथ में महाराणा राजसिंह का इतिहास है।

17. राजप्रकाश - किशोरदास
इस ग्रंथ में महाराणा राजसिंह के द्वारा टीका दौड़ के बहाने मुगल इलाकों को लूटने का वर्णन है। यह ग्रंथ हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की विजय बताता है।

18. राजवल्लभ - मण्डन ने 15वीं सदी में लिखा।
इस ग्रंथ की रचना महाराणा कुम्भा (1433-68 ई.) के शासनकाल में की गई है जिसमें राजप्रसाद, दुर्ग, मंदिर, वास्तुकला के निर्माण पद्धति का वर्णन है।

19. राजविलास - कवि मान
इस ग्रंथ में महाराणा राजसिंह व महाराणा जगतसिंह के बारे में जानकारी मिलती है।

20. राजविनोद - सदाशिव भट्ट ने 16वीं सदी में रचना की।
इस ग्रंथ में बीकानेर शासक कल्याणमल (1544-74 ई.) के बारे में जानकारी मिलती है।

21. राजरूपक - वीरभाण
इस ग्रंथ में अजीतसिंह के जन्म, औरंगजेब द्वारा अजीतसिंह को कैद करना, दुर्गादास राठौड़ द्वारा औरंगजेब के पुत्र अकबर को अपनी ओर मिलाना आदि का वर्णन किया गया है। यह ग्रंथ अभयसिंह के शासन काल में लिखा गया है।

22. अमरसार - पं. जीवाधार
इस ग्रंथ में महाराणा प्रताप व उसके पुत्र अमरसिंह के शासनकाल की जानकारी मिलती है।

23. अमीरनामा - मुंशी भुसावन
इस ग्रंथ में टोंक के प्रथम नवाब अमीर खाँ पिण्डारी (1817-34 ई.) के बारे में जानकारी मिलती है।

24. उदयप्रकाश - किशना सिंढायच
इस ग्रंथ में डूंगरपुर के महारावल उदयसिंह के बारे में जानकारी मिलती है।

25. कुवलयमाला - उद्योतन सूरि
इस ग्रंथ की रचना 778 ई. में जैन आचार्य उद्योतन सूरि ने जालौर में की थी। इस ग्रंथ में प्रतिहार शासक वत्सराज के बारे में जानकारी मिलती है। इसमें 8 खंड है।

26. गोरा-बादल चरित - हेमरतन सूरि (1588 ई.)
इस ग्रंथ में 1303 ई. के प्रथम साके में शहीद हुए रतन सिंह के सेनापति गोरा-बादल व रतन सिंह की पत्नी पद्मिनी के बारे में जानकारी मिलती है।

27. जगविलास - नन्दराम
इस ग्रंथ में महाराणा जगतसिंह द्वितीय (1734-51 ई.) के बारे में जानकारी मिलती है।

28. जसवंत विलास - दलपत मिश्र (1648 ई.)
इस ग्रंथ में जसवंत सिंह प्रथम, राव मालदेव, मोटा राजा उदयसिंह के बारे में जानकारी मिलती है। इसी ग्रंथ में नागौर शासक अमरसिंह राठौड़ व शाहजहाँ के साले सलावत खाँ के मध्य दिल्ली दरबार में हुए विवाद के बारे में जानकारी मिलती है।

29. तारीख ए राजस्थान - कालीराम कायस्थ
इस ग्रंथ में राजस्थान की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक स्थिति का पता चलता है।

30. तीर्थकल्प - जैन मुनि जिनप्रभ सूरि कृत
इस ग्रंथ में राजस्थान के रीति-रिवाजों के बारे में जानकारी मिलती है।

31. प्रबन्ध चिन्तामणि - आचार्य मेरुतुंग (1304-05 ई.)
इस ग्रंथ में पृथ्वीराज चौहान (1178-92 ई.) के बारे में जानकारी मिलती है।

32. बुद्ध विलास - बखतराम शाह
इस ग्रंथ में जयपुर की स्थापना के बारे में जानकारी मिलती है।

33. भीम विलास - शंकर राव (1874-1904 ई.)
इस ग्रंथ में नीमराणा शासक के भीमसिंह चौहान (1868-77 ई.) के बारे में जानकारी मिलती है। इस ग्रंथ के अनुसार चौहानों की उत्पत्ति अग्नि कुण्ड से हुई थी।

34. भीम विलास - किसना आढा
इस ग्रंथ में महाराणा भीमसिंह व मेवाड़ वंशावली की जानकारी मिलती है।

35. राव जैतसी रो छंद - बीठू सूजा
इस ग्रंथ में बीकानेर के इतिहास की जानकारी मिलती है। बीठू सूजा ने इस ग्रंथ में लूणकरण को कलियुग का कर्ण कहा है। इसमें बीकानेर शासक राव जैतसी व अकबर के पुत्र कामरान के युद्ध का वर्णन है।
नोट - मुंशी देवी प्रसाद ने रायसिंह को राजपूताने का करण कहा है।

36. वाक्या ए राजपूताना - मुंशी ज्वालाप्रसाद
इस ग्रंथ में राजपूताने का इतिहास मिलता है।

37. सूरज प्रकाश - करणीदान
इस ग्रंथ में 7500 छंद है। यह ग्रंथ डींगल भाषा का है। इसमें राठौड़ों की 13 शाखाओं का वर्णन है।

38. राव रतन री वेलि - कल्याणदास
इस ग्रंथ में बूंदी शासक रतनसिंह (1607-21 ई.) के बारे में जानकारी मिलती है।

39. मानजसो मंडण - बांकीदास
इस ग्रंथ में मारवाड़ शासक मानसिंह द्वितीय की अंग्रेजों व मराठों के प्रति नीतियों का वर्णन हुआ है। इस ग्रंथ के अनुसार मानसिंह ने इंदौर के मराठा सेनापति जसवंतराव होल्कर को अंग्रेजों के विरुद्ध सहायता की थी। इस ग्रंथ में 232 दोहे है।

40. महाराजा गंजसिंहजी रो छंद - किसना आढा
इस ग्रंथ में मुगलों के दक्षिणी अभियानों में राठौड़ों के योगदान के बारे में जानकारी मिलती है। इस ग्रंथ के अनुसार मारवाड़ शासक गजसिंह को जहांगीर ने 1622 ई. में खुर्रम (शाहजहां) के विद्रोह को दबाने जौनपुर भेजा जिसमें खुर्रम का सेनापति भीम सिसोदिया मारा गया तथा खुर्रम भाग गया।

41. ढोला मारू रा दूहा
इसकी रचना कवि कल्लोल कुशललाभ ने की थी। इसकी रचना 11वीं शदी में हुई। इस ग्रंथ में ढोला-मारू की प्रेमकथा का वर्णन है। जिसके अनुसार ढोला का विवाह 3 वर्ष की आयु में पुंगल की राजकुमारी मारू/मारवणी से हो जाता है। ढोला जब युवा होता है तब मारवणी/मारू को भूल जाता है तथा मालवा की राजकुमारी मालवणी से शादी कर लेता है।

42. जयचंद प्रकाश
इसकी रचना भट्टकेदार ने की थी जिसका वर्णन दयालदास के ग्रंथ राठौड़ा रा ख्यात में मिलता है। इस ग्रंथ में कन्नौज (उत्तरप्रदेश) के
राजा जयचंद के सौन्दर्य व वीरता का उल्लेख हुआ।
  • कवि केशवदास - इनका जन्म 1610 ई. चिड़िया गाँव (सोजत, पाली) में हुआ। केशवदास ने तीन ग्रंथों की रचना की थी -
  1. अमरसिंह रा दूहा - इसमें नागौर के अमरसिंह राठौड़ की वीरता व स्वाभिमान का वर्णन हुआ है।
  2. गुण रूपक - इसमें जोधपुर के शासक गजसिंह की तीर्थ यात्राओं, युद्धों व उनके राजशाही जीवन का वर्णन किया गया है।
  3. विवेक वार्ता - ये वेदान्त ग्रंथ है।
  • करणीदान - इनका जन्म मेवाड़ में हुआ था। जोधपुर के महाराजा अभयसिंह के दरबार में इन्होंने 1800 ई. में डिंगल भाषा में सूरजप्रकाश ग्रंथ की रचना की जिसमें मारवाड़ का इतिहास है।
  • कुलपति मिश्र - जयपुर राज्य के राजकवि थे। इन्होंने मुक्ति तरंगिणी, संग्राम सार, रस रहस्य, दुर्गाभक्ति चन्द्रिका ग्रंथों की रचना की।
  • किशोरदास - ये मेवाड़ के शासक राणा राजसिंह (1652-80 ई.) के दरबार में थे। इन्होंने राजप्रकाश ग्रंथ की रचना की जिसमें डिंगल भाषा के 132 छंद हैं।
  • सूर्यमल्ल मिश्रण - सूर्यमल्ल का जन्म 1815 ई. में हरणा गांव बूंदी में हुआ। इनके पिता चण्डीदान बूंदी शासक रामसिंह के दरबारी विद्वान थे। जब चण्डीदान की मृत्यु हो गयी तब सूर्यमल्ल दरबारी कवि बन गये। सूर्यमल्ल ने
  • अनेक क्रांतिकारी ग्रंथों की रचना की -

1. वंश भास्कर
इस ग्रंथ की रचना पिंगल भाषा व पद्यात्मक शैली में की गई। इस ग्रंथ में बूंदी का इतिहास है। इस ग्रंथ की रचना महाराव रामसिंह के कहने पर 1840 ई. लिखना प्रारम्भ किया तथा 1856 ई. में बंद कर दिया। इस ग्रंथ को पूर्ण सूर्यमल्ल के दत्तक पुत्र मुरारीदान ने किया। यह ग्रंथ 8 खंडो में विभक्त है जिसमें 2500 पृष्ठ है। 9 खंड है।

2. वीर सतसई
इस ग्रंथ में गोठड़ा के शासक भौमसिंह व बूँदी शासक के बीच हुए युद्ध का वर्णन है। जब गोठड़ा का शासक भौमसिंह युद्ध को बीच में छोड़ भाग जाता है तब सूर्यमल्ल ने 288 दोहे लिखकर यह ग्रंथ भी बीच में छोड़ दिया। सूर्यमल्ल के दत्तक पुत्र मुरारी दान ने इस ग्रंथ को पूर्ण किया। वीर सतसई में 1857 ई. की क्रांति की घटनाओं को लिखा गया है।

3. बलवन्त विलास
इस ग्रंथ में सूर्यमल्ल मिश्रण रतलाम के राजा बलवन्त सिंह का चरित्र वर्णन किया है।

4. राम रंजात
यह सूर्यमल्ल की प्रथम रचना है।

कन्हैयालाल सेठिया
इनका जन्म 11 सितम्बर, 1919 को सुजानगढ़ (चूरू) में हुआ था। उनकी हिन्दी की प्रथम पुस्तक 1940 ई. में प्रकाशित हुई जिसका नाम वनफूल था। पाताल व पीथल सेठिया की प्रसिद्ध रचना है जिसमें पाथल शब्द महाराणा प्रताप को पीथल शब्द पृथ्वीराज राठौड़ के लिए कहा गया है। लीलटांस रचना पर 1976 में साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। मेरा युग, प्रतिबिम्ब, जमीन रो धणी कुणी, गलगिचीया, धर कूचा धर मजला, मींझर, कूं-कूं, ढीठ, रमणियें रा दूहा, सबद, अधोरीकाल, धरती धोरा री आदि प्रमुख रचनाएँ है। कन्हैयालाल सेठिया की अग्निवीणा रचना के प्रकाशन से बीकानेर में इन पर राजद्रोह का मुकदमा चला। इनकी मृत्यु 11 नवम्बर, 2008 को कलकत्ता में हुई थी। इन्हें पद्मश्री दिया गया।

विजयदान देथा
इनका जन्म 1926 में बोरूंदा (जोधपुर) में हुआ था। बातां री फुलवाड़ी (14 भाग) रुख, अलेखू-हिटलर, तीड़ोराव प्रमुख रचनाएँ हैं। अमोल पालेकर ने ‘पहेली’ फिल्म बनाई। 2007 में पद्मश्री व 2012 में राजस्थान रत्न से सम्मानित किया गया। दुविधा, चौधराइन की चतुराई, बापू के तीन हत्यारे आदि रचना।

मेघराज मुकुल
इनका जन्म 17 जुलाई, 1927 को राजगढ़ (चूरू) में हुआ था। हाड़ीरानी सहलकंवर पर इन्होंने सैनाणी गीत की रचना की। उमंग मुकुल जी की प्रथम रचना।

महेन्द्र भानावत
इनका जन्म 13 नवम्बर, 1937 को कानोड़ (उदयपुर) में हुआ। इन्होंने राजस्थान की संस्कृति व लोक कथाओं पर रचना की। अबूजा राजस्थान, काजल भरियों कूपलों, गेहरों फूल गुलाब रो, देवनारायण रो भात, कंकू कन्या, मरवण माँड़े मांडणा, मेहन्दी राचणी, राजस्थान के थापे, तेजाजी की फड़, रामदला की फड़ आदि महेन्द्र भानावत प्रमुख रचनाएँ हैं।

यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र
इनका जन्म 15 अगस्त, 1932 को बीकानेर में हुआ था। इन्होंने सामाजिक समस्याओं व नारी शोषण पर अपनी रचनाएँ लिखीं। खम्भा अन्नदाता, एक और मुख्यमंत्री ठकुरानी, जोग-संजोग, जमारो, चाँदा सेठानी, महाराजा सेख चिल्ली, हूँ गोरी किण पिव री, तास रो घर आदि यादवेन्द्र शर्मा की प्रमुख रचना है।

चंडीदान
इनका जन्म 1848 ई. में हुआ। ये चारण जाति के थे जो बूंदी राजदरबार में रहते थे इन्होंने विरुद्धप्रकाश तीजतंरग, सारसागर, बलविग्रह, वंशाभरण ग्रंथों की रचना की।

अम्बिका दत्त व्यास
रचना - अबलाओं का इंसाफ (1927 में प्रकाशित राजस्थान का प्रथम उपन्यास)
आश्चर्य वृतांत

राजेन्द्र मोहन भटनागर
रचना - लीले घोड़े का सवार, एक अंतहीन युद्ध, दहशत, सूर श्याम, पयस्विनी मीरा।

ओंकारनाथ चतुर्वेदी
रचना - वंदे मातरम, इला ने देणी आपणी, शंखनाद, एक और सूर्यास्त, मम्मी कब घर लौटेगी।

रांगेय राघव
रचना - मुर्दों का टीला, धारती मेरा, गदल, सीधा सादा रास्ता, देवदासी, साम्राज्य का वैभव, हुजूर।

पं. भरत व्यास
रचना - धुंध और धुंआ, सफर के बीच, मुट्ठी भर रोशनी, खिड़की से झांकता है चांद, नौकरीनामा।

चंडीदान सांदू
इनका जन्म हिलोड़ी (नागौर) में 1923 में हुआ। इन्होंने भरभरी शतक रो अनुवाद, पिलाणी परिचय, कहमुकरणी शतक, सुरातन रा कुंडलिया आदि ग्रंथों की रचना की है।

जान कवि (1671-1721 ई.)
ये फतेहपुर (सीकर) में कायमखानी नवाब थे। जान कवि का मूल नाम न्यामतखाँ था जो जान के नाम से कविता रचना करते थे। इन्होंने पिंगल भाषा व शृंगार रस में प्रेम पर रचनाएँ लिखीं। मदन विनोद, ज्ञानदप, कायम रासों, रूपमंजरी, मोहनी घूंघटनामा आदि जान कवि की प्रमुख रचनाएँ हैं।

दुरसा आढा
इनका जन्म धुँदला गाँव (पाली) में हुआ था। दुरसा आढा अकबर के दरबार में थे, जिन्होंने अकबर के दरबार में महाराणा प्रताप की प्रशंसा की थी। विरुद्ध छहत्तरी, किरतार बावनी श्री कुमार अज्जाजी नी भूचर मोरी नी गजगज दुरसा आढा की प्रमुख रचना है जो शुद्ध डिंगल में लिखी गयी।

दयाराम
इन्होंने मेवाड़ शासक जयसिंह के समय पिंगल भाषा में राणा रासो ग्रंथ की रचना की जिसमें राणा कुम्भा से लेकर जयसिंह तक का इतिहास है।

हरिनाभ
खण्डेला (सीकर) के शासक केसरी सिंह के दरबारी विद्वान थे। इन्होंने औरंगजेब की हिन्दू विरोधी नीति के विरुद्ध काम किया जिस कारण 1754 ई. में औरंगजेब ने नवाब अब्दुला खान को भेजा जिसमें हरिनाभ अब्दुला खान से लड़ते हुए मारे गये। हरिनाभ ने पिंगल भाषा में केसरीसिंह समर ग्रंथ की रचना की।

वीरभाण रत्नू
वीरभाण घढ़ोई गाँव (जोधपुर) के निवासी थे। इन्होंने डिंगल भाषा में राजरुपक ग्रंथ की रचना की। जिसमें 1787 ई. में जोधपुर शासक अभयसिंह तथा गुजरात के सूबेदार शेर विलंदखां के मध्य अहमदाबाद में हुआ युद्ध का वर्णन है। यह वर्णन वीरभाण ने आँखों देखा लिखा है।

जोधराज
जोधराज निमराणा (कोटपुतली) शासक चंद्रभानु के दरबारी कवि थे। चन्द्रभानु के कहने पर जोधराज ने हम्मीर रासो की रचना की जिसमें चौहान शासक हम्मीर देव व अलाउद्दीन के संघर्ष की कहानी है।

धनानन्द
इन्हें प्रेम का पीर कहा जाता है। इन्होंने ब्रज भाषा में इश्कलता, सुजानहित प्रबन्ध, सुजान सागर, विरहलीला ग्रंथ की रचना की।

चिंतामणि
रचना- रसमंजरी, काव्य प्रकास, कवि कुल कल्परू।

कवि वृन्द
इनका जन्म बीकानेर व निवास नागौर में था। ये औरंगजेब के पुत्र मुअज्जम के शिक्षण बने। यमक सतसई, नयन पच्चीसी इनके प्रमुख ग्रंथ है।

रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत
  • जन्म - 1916 ई, देवगढ़ (राजसमंद)
  • 1984 ई. पद्मश्री अवार्ड
  • 2012 ई. राजस्थान रत्न
  • फ्रांसेस टेफ्ट (फ्रांसीसी लेखक) ने 'फ्रॉम पर्दा टु द पीपल' के नाम से रानी लक्ष्मी कुमारी की जीवनी लिखी।
गजबण - रूसी कथाओं का राजस्थानी अनुवाद।
रचना - मूमल, देवनारायण कथा, पाबूजी री बात, डूंगरजी-जवाहर जी री बात, टाबरा री बातां, अमोलक बातां, के रे चकवा बात आदि।
1962 - भीम (राजसमंद)

विजयदान देथा
  • जन्म - 1926 ई., बोरूंदा (जोधपुर)
  • उपनाम - राजस्थान के शेक्सपीयर, बिज्जी।
  • नोट- भारत के शेक्सपीयर कालीदास थे।
  • 2002 - बिहारी पुरस्कार
  • 2007 - पद्मश्री अवार्ड
  • 2012 - राजस्थान रत्न
  • रचना - चौधराइन की चतुराई (1996 ई.)
  • बातां री फुलवारी (1960-75) - 14 खंड (मान्य खंड-13)
  • अलेखूँ हिटलर (1984)
  • उलझन (1984)
  • बापू के तीन हत्यारे (1948)
  • दुविधा फिल्म (1973)
  • चरणदास चोर फिल्म (1975)

मुंशी देवी प्रसाद
  • जन्म - 1848 ई. जयपुर
  • उपनाम - कानून की माता (मारवाड़ में कानून बनाने के कारण)
  • टोंक व जोधपुर राज्य में कार्य किया।
  • रचना - मारवाड़ का भूगोल, स्वप्न राजस्थान।
  • बाबरनामा, हुमायूँनाम, जहाँगीरनामा व औरंगजेबनामा का हिन्दी अनुवाद किया।
  • इन्होंने रायसिंह (बीकानेर शासक) को राजपूताने का कर्ण तथा मुहणोत नैणसी को राजपूताने का अबुल फजल कहा।

लक्ष्मी कुमारी चूड़ावत
रचना - टाबरां री बातां, माँझल रात, गजबण, गिर ऊँचा-ऊँचा गढ़।

नारायणसिंह भाटी
रचना - बरसां सा लांघिया, ढूँगर लांघिया, दुर्गादास, मीरा।

शिवचंद भरतिया
रचना- केसर विलास, कनक सुन्दर, बुढ़ापा की सगाई, विश्रांत प्रवास, फाटक जंजाल।

श्रीनथमल जोशी
रचना - परण्योडी कंवारी, एक बीनणी दो बींद, सबड़का, मैं दी, धोरा री धोरी

फारसी साहित्य

  1. तुजुक-ए-बाबरी- इस ग्रंथ की रचना प्रथम मुगल बादशाह बाबर ने तुर्की भाषा में की थी। यह बाबर की आत्मकथा है। अब्दुल रहीम ने 1589 ई. में इसका फारसी में अनुवाद किया जिसे बाद में 'बाबरनाम' कहा जाने लगा। इस ग्रंथ में बाबर ने लिखा कि मुझे भारत पर आक्रमण करने के लिए राणा सांगा ने आमंत्रण किया था।
  2. हुमायूँनामा- इस ग्रंथ की रचना हुमायूँ की बहन गुलबदन बेगम ने की थी। इस ग्रंथ में जानकारी मिलती है कि शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को हराया तथा हुमायूँ द्वारा राव मालदेव से सहायता मांगना।
  3. आइन-ए-अकबरी- अकबरनामा के नाम से इस ग्रंथ की रचना अबुल-फजल ने की थी, जिसके तीन भाग है। इसके तीसरे भाग को आइन-ए-अकबरी कहा जाता है। इस ग्रंथ में राजस्थानी मुद्राएं, त्यौहार, वस्त्रों की जानकारी मिलती है। इस ग्रंथ में अकबर द्वारा राजस्थान में किये गये निर्माण व राजस्थानी राजकुमारियों से की गई शादी की जानकारी मिलती है।
  4. तबकात-ए-अकबरी- इस ग्रंथ की रचना ख्वाजा निजामुद्दीन अहमद ने की थी। इस ग्रंथ में मुगल-राजपूत विवाह, राजस्थान के गांवों, मुगलों द्वारा राजस्थान से ऊँट मंगवाये जाना व जौहर प्रथा का वर्णन हुआ है।
  5. तुजुक-ए-जहांगीरी- ये जहांगीर द्वारा लिखी गई आत्मकथा है जिसे पूर्ण मौतमिद खां ने किया। इसे जहांगीरनामा भी कहा जाता है। इसमें मेवाड़ से हुई संधि, मुगल आक्रमण, होली, दीपावली, दशहरा, राजपूत राजकुमारियों का विवाह, रणथम्भौर दुर्ग आदि की जानकारी मिलती है।
  6. शाहजहांनामा - इस ग्रंथ की रचना इनायत खां ने की थी। मुगल-मेवाड़ संधि के बाद राणा राजसिंह ने चित्तौड़गढ़ की मरम्मत करवाई जिसे मुगलों ने तुड़वा दिया आदि की जानकारी इस ग्रंथ में मिलती है।
  7. आलमगीरनामा - इस ग्रंथ की रचना औरंगजेब के शासनकाल में मुहम्मद साकी मुस्तैद खां ने की थी। इस ग्रंथ में मुगल आक्रमण, मुगल के वस्त्र, अभियानों, राजस्थान के मार्ग, उस युग का धातु, गरीबों का भोजन आदि की जानकारी मिलती है।
  8. तारीख-ए-शेरशाही- इस ग्रंथ की रचना अब्बास खां सरवानी ने 1544 ई. में अकबर के कहने पर की थी। इस ग्रंथ में मालदेव व शेरशाह सूरी के बीच हुई गिरी सुमेल युद्ध (1544 ई.) की जानकारी मिलती है। गिरी सुमेल (जैतारण, ब्यावर) युद्ध का अब्बास खां सरवानी प्रत्यक्षदृष्टा इतिहासकार था।
  9. बादशाहनामा- इस ग्रंथ की रचना अब्दुल हमीर लाहौरी ने की थी। इस ग्रंथ में मेवाड़-मुगल संधि के बाद कर्णसिंह के पुत्र जगतसिंह को मुगलों द्वारा दिये गये उपहार की जानकारी मिलती है। चित्तौड़गढ़ के आस-पास के भौगोलिक क्षेत्र की भी जानकारी मिलती है।
  10. इकबालनामा- इस ग्रंथ की रचना मोतमिद खां ने की थी। इस ग्रंथ में मेवाड़ की आर्थिक बर्बादी व खुर्रम द्वारा मेवाड़ में की गई हत्याओं की जानकारी मिलती है।
  11. फतूहात-ए-आलमगिरि- इस ग्रंथ की रचना ईसरदास नागर ने की थी। इस ग्रंथ में दुर्गादास राठौड़ की कूटनीति की जानकारी मिलती है। दुर्गादास राठौड़ ने औरंगजेब के पौत्र-पौत्री औरंगजेब को दिये तथा अजीतसिंह व स्वयं ने मनसबदारी प्राप्त की।
  12. मुन्तखब-उत-तवारीख- इस ग्रंथ की रचना अब्दुल कादिर बदायूनी ने की थी। यह हल्दीघाटी युद्ध का प्रत्यक्षदृष्टा इतिहासकार था जिसने हल्दीघाटी युद्ध को गोगुन्दा का युद्ध कहा। इस ग्रंथ में अकबर-जोध विवाह, रक्षाबन्ध न, जौहर आदि की जानकारी मिलती है।
  13. तजकिरात-उल-वाकेयात- इस ग्रंथ की रचना जौहर आफताबची ने की थी। इस ग्रंथ में हुमायूँ के जीवन के बारे में जानकारी मिलती है।
  14. मुनव्वर-ए-कलाम- इस ग्रंथ की रचना शिवदास ने की थी। जोधपुर की राजकुमारी इन्द्रकुंवरी व बादशाह फर्रूखसियर की शादी की जानकारी इसी ग्रंथ में मिलती है। यह अंतिम मुगल-राजपूत वैवाहिक संबंध था।
  15. तारीख-ए-राजस्थान- इस ग्रंथ को नसबुल अंसाव भी कहा जाता है। ग्रंथ की रचना जयपुर शासक सवाई प्रतापसिंह ने 1793 ई. में कालीराम कायस्थ से करवाई। इस ग्रंथ की एक हस्तलिखित प्रति प्राच्च विद्या प्रतिष्ठान (टोंक) में रखी है।
  16. तारीख-ए-फरिश्ता- इस ग्रंथ की रचना मुहम्मद कासिम हिन्दूशाह ने,की थी। इस ग्रंथ में अकबर का अजमेर में निर्माण, राणा कुम्भा, रायमल, मेवाड़-ईडर संबंध, रेगिस्तान के मार्ग आदि की जानकारी मिलती है।
  17. मखजान-ए-अफगानी- इस ग्रंथ की रचना नियामतुल्ला ने की थी। इस ग्रंथ में सिकन्दर लोदी के नागौर अभियान व लोदी वंश के मेवात क्षेत्र की जानकारी मिलती है।
  18. तारीख-ए-हिन्द- इस ग्रंथ की रचना अबू रेहान मुहम्मद बिन अहमद अलबरूनी ने की थी। अलबरूनी मोहम्मद गजनवी के साथ भारत आया था। इस ग्रंथ को किताब-उल-हिन्द/भारत की खोज व 11वीं सदी का भारत दर्पण भी कहा जाता है। इस ग्रंथ की रचना 1030 ई. के आस-पास हुई थी। इस ग्रंथ में उस समय की सामाजिक व आर्थिक स्थिति की जानकारी मिलती है।
  19. तारीख-ए-यामिनी- इस ग्रंथ की रचना अलउतबी ने की थी जिसमें मोहम्मद गजनवी व राजपूत संघर्षों की जानकारी मिलती है।
  20. तारीख-ए-फिरोजशाही- इस ग्रंथ की रचना जियाउद्दीन बर्नी ने की थी। रणथम्भौर (सवाई माधोपुर) पर हुए आक्रमणों की जानकारी इस ग्रंथ में मिलती है।
  21. खजाईन-उल-फुतूह- इस ग्रंथ की रचना अमीर खुसरो ने की थी। अमीर खुसरो को भारत का तोता कहा जाता है। इस ग्रंथ की रचना अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में 1311 ई. में की गई थी। अलाउद्दीन के चित्तौड़ अभियान (1303 ई.) में अमीर खुसरो भी उसके साथ था जो चित्तौड़गढ़ साके का प्रत्यक्ष दृष्टा इतिहासकार था सितार, तबला, कव्वाली, मुरकियों का जन्मदाता अमीर खुसरों को माना जाता है।
  22. ताज-उल-मासिर - इस ग्रंथ की रचना सदरउद्दीन हसन निजामी ने की थी। इस ग्रंथ में अजमेर पर हुए मुस्लिम आक्रमण की जानकारी मिलती है। इस पुस्तक में 1229 ई. के पहले तक का इतिहास मिलता है।
  23. तबकात-ए-नासिरी- इस पुस्तक के लेखक काजी मिनहाज-उस-सिराज थे। इस पुस्तक में मेवात व जालौर तथा नागौर पर हुए मुस्लिम आक्रमणों की जानकारी मिलती है।
  24. तारीख-ए-मुबारकशाही- इस ग्रंथ की रचना याहया-बिन-अहमद-अब्दुलशाह-सरहिन्दी ने की थी। इस ग्रंथ में मुबारकशाह द्वारा मेवात में किये गये आक्रमणों की जानकारी मिलती है।

जैन साहित्य

जैन साहित्यों की रचना 14वीं शदी के लगभग की गई। राजस्थान से प्राप्त जैन साहित्य संस्कृत व राजस्थानी में लिखे गये। ये ग्रंथ राजस्थान में बीकानेर, जैसलमेर, सादड़ी से प्राप्त हुये। जयपुर के महावीर पुस्तकालय में जैन साहित्य संबंधित पुस्तकों का संग्रह है।
  1. हम्मीर मद मर्दन - इस ग्रंथ की रचना जयसिंह सुरि ने की। इस ग्रंथ में रणथम्भौर के चौहान राजा हम्मीर देव की जानकारी मिलती है।
  2. गोरा-बादल - इस ग्रंथ की रचना 1588 ई. में हेमरत्न सूरि ने की थी। इस ग्रंथ में पदमनी की ऐतिहासिकता सिद्ध होती है। इस ग्रंथ में राजपूतों की युद्ध प्रणाली की जानकारी मिलती है। गोरा-बादल रत्नसिंह के सेनापति व पद्मिनी के चाचा व भाई थें।
  3. पद्मिनी चरित्र चौपाई - इस ग्रंथ की रचना लब्धोदय उपाध्याय की थी। इस ग्रंथ में 17वीं सदी की सामाजिक व्यवस्था की जानकारी मिलती है।
  4. नाभीनंदन जिनोधर प्रबंध - इस ग्रंथ की रचना 14वीं सदी में कक्कड़ सूरी ने की थी। यह ग्रंथ पांच अध्यायों में बंटा है। यह ग्रंथ संस्कृत पद्य में लिखा गया था। इस ग्रंथ में किराडू व ओसिया नगरों के धार्मिक व आर्थिक जीवन की जानकारी मिलती है।
  5. नेमिनाथ बारहमासा - इस ग्रंथ की रचना पाल्हण ने की थी। इस ग्रंथ में जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर नेमीनाथ का वर्णन है।
  6. सिंहल सूत्र - इस ग्रंथ की रचना सुंदर ने की थी। इस ग्रंथ में 16वीं सदी की सामाजिक स्थिति की जानकारी मिलती है।
  7. सौभाग्य महाकाव्य - इस ग्रंथ की रचना सोमसूरि ने की थी। यह ग्रंथ 15वीं सदी में लिखा गया जिसमें मेवाड़ के धार्मिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक जानकारी मिलती है।
  8. भरतेश्वर बाहुबलि घोर - वज्रसेन सूरि (1168 ई.)
नोट- भरतेश्वर बाहुबलि रास ग्रंथ शालिभद्र सूरि का है।

9. प्रबंध चिंतामणि - मेरुतुंग

10. कुवलयमाला - उद्योतन सूरि ने 835 वि.स. में जालौर में रचना की जिसमें 8 खंड है।

11. प्रबंधकोश, कुमारपाल चरित - राजशेखर

12. बुद्धिरास - शालिभद्र सूरि

13. हरिमेखला - माहुक

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