राज्य सचिवालय (राजस्थान)

राज्य सचिवालय

राज्य सचिवालय ब्रिटिश शासन की देन है। सचिवालय मूल रूप से मुख्यमंत्री एवं उनकी मंत्रिपरिषद का कार्यालय होता है। राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री तथा मंत्रिपरिषद के सदस्यों को आवश्यक सलाह, परामर्श एवं प्रशासनिक सहायता प्रदान करने के लिए एक शासन सचिवालय या सचिवालय की व्यवस्था की जाती है।
‘सचिवालय’ शब्द का अर्थ है सचिव का कार्यालय। सचिव, मंत्री का प्रमुख सलाहकार होता है और अपने दायित्वों के निर्वहन के लिए उसे एक कार्यालय की आवश्यकता होती है, जिसे सचिवालय कहा जाता है। इस प्रकार सचिवालय वह स्थान है जहाँ सचिव तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारी कार्य करते हैं। राज्य सरकार के सभी विभागों के राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रमुख जिस कार्यालय में बैठकर राज्य की नीतियों एवं विधियों (कानूनों) का निर्धारण करते हैं, वही राज्य सचिवालय कहलाता है।
राज्य सचिवालय को राज्य प्रशासन की समन्वयकारी संस्था माना जाता है। इसकी कार्यप्रणाली का विस्तृत विवरण ‘सेक्रेटेरियल मैनुअल’ में वर्णित होता है। विभागों के राजनीतिक प्रमुख मंत्री होते हैं, जिनमें कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), राज्य मंत्री तथा उपमंत्री शामिल हो सकते हैं। किस विभाग में किस स्तर का मंत्री नियुक्त होगा तथा वह किन-किन कार्यों का निर्वहन करेगा, इसका उल्लेख Rules of Business (कार्यविधि नियमों) में किया गया है।

राज्य का राजनीतिक व प्रशासनिक ढाँचा निम्न प्रकार होता है-
rajya-sachivalaya-rajasthan
राज्यपाल मुख्यमंत्री के परामर्श के आधार पर विभागों का निर्माण करता है और इन विभागों द्वारा राज्य शासन का संचालन किया जाता है। संगठनात्मक दृष्टि से मुख्यमंत्री राज्य सचिवालय का मुखिया होता है।
सचिवालयी विभागों की संख्या प्रत्येक राज्य में भिन्न-भिन्न होती है। यह संख्या 11 से लेकर 35 तक है।
राज्य सचिवालय विभिन्न विभागों में वर्गीकृत रहता है। प्रत्येक विभाग के शीर्ष पर सचिव होता है। जो भारतीय प्रशासनिक सेवा का सदस्य एवं प्रत्येक विभाग का अध्यक्ष शासन सचिव होता है जो (IAS) का सुपर टाइम स्केल का अधिकारी होता है। यह आवश्यक नहीं कि एक सचिव एक ही मंत्री के अधीन कार्य करे, वह एक से अधिक मंत्रियों के प्रति भी उत्तरदायी हो सकता है। सचिव किसी मंत्री विशेष का नहीं वरन् सरकार का सचिव होता है।
सचिवालय का सर्वोच्च राजनीतिक अधिकारी, मुख्यमंत्री होता है तथा सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी मुख्य सचिव होता है। सचिवों की नियुक्ति का निर्णय अन्तिम रूप से संबंधित मंत्री के अनौपचारिक परामर्श के बाद मुख्यमंत्री करता है। सभी विभागों में प्राथमिक संरचना के इस परिवर्तन में मुख्यमंत्री का निर्णय अन्तिम होता है।
प्रशासनिक सुधार आयोग, राजस्थान प्रशासनिक सुधार समिति एवं पंजाब प्रशासनिक सुधार समिति ने यह अनुशंसा की थी कि राज्य सरकार के सचिवों का चयन मुख्यमंत्री द्वारा सही तरीके से एक उच्च स्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर किया जाना चाहिए। चयन का एकमात्र आधार योग्यता, अनुभव एवं उपयुक्तता हो।
प्रशासनिक सुधार आयोग 1967 ने अपनी सिफारिश में विभिन्न राज्यों में कुल मिलाकर अधिकतम 13 विभाग बनाने का सुझाव दिया। सचिवों की संख्या का उल्लेख करते हुए इसे अत्यधिक बताया गया और सुझाव दिया गया कि सचिवों की संख्या 10 से अधिक नहीं होनी चाहिए। यदि कार्य अधिक है तो इसे इन्हीं 10 सचिवों के बीच विभाजित कर दिया जाना चाहिए।

सचिवालय

प्रत्येक राज्य का अपना शासन सचिवालय होता है। शासन सचिवालय मुख्यमंत्री एवं उसके राज्य विभागों का प्रशासनिक स्थल है। सचिवालय मुख्य रूप से सचिवों का कार्यालय है जो शासन की नीतियों से जुड़े होते हैं। शासन सचिवालय मुख्य रूप से नीति निर्माण और विधायी कार्यों में राज्य सरकार की सहायता करता है। सचिवालय एक स्टाफ एजेंसी है अतः राज्य के प्रभावी शासन संचालन हेतु उचित सहायता एवं अन्य जानकारियाँ उपलब्ध कराता है।
राज्य सचिवालय वह स्थान है, जहाँ से शासन व प्रशासन के सत्ता-सूत्रों का संचालन होता है। यह नीति निर्माण के रूप में राजनैतिक नेतृत्व तथा क्रियान्वयन के रूप में लोक सेवकों की संयुक्त कार्यस्थली है। सचिवालय में नीति निर्माण व कार्यक्रम तैयार किये जाते हैं और नीतियों व कार्यक्रमों को लागू करने के लिए आवश्यक दिशा निर्देश राज्य सचिवालय से जारी किये जाते हैं। संविधान के अनुच्छेद 166 के प्रावधानों के अन्तर्गत प्रकाशित कार्यविधि नियम (Rules of Business) के अनुसार सचिवालय का प्रशासन संचालित होता है राज्य सचिवालय ब्रिटिश शासन की देन है। राज्यपाल से कार्यकारी सहायता प्रदान करने के लिए सचिवालय 'स्टाफ अभिकरण' के रूप में कार्य करता है।

सचिवालय का गठन

राज्य सचिवालय विभिन्न विभागों में बाँटा रहता है। प्रत्येक विभाग का राजनैतिक प्रमुख एक मंत्री होता है जिसे कैबिनेट स्तर के मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है कभी-कभी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) या राज्य मंत्री को भी विभाग का राजनैतिक प्रमुख बनाया जाता है।
प्रत्येक विभाग का एक प्रशासनिक प्रमुख होता है जिसे प्रमुख शासन सचिव कहा जाता है। जिसे साधारण भाषा में सचिव भी कहते हैं। शासन सचिव सरकार का होता है न कि मंत्री का। प्रमुख शासन सचिव को एक या अधिक विभागों का मुखिया या विभागाध्यक्ष बनाया जा सकता है। प्रमुख शासन सचिव की सहायता के लिए सचिव, विशेष सचिव, अपर सचिव, संयुक्त सचिव, उपसचिव, अवर सचिव, सहायक सचिव, सचिवालय में उक्त अधिकारियों के अधीन अनुभाग अधिकारी, सहायक अधीक्षक, वरिष्ठ सहायक, कनिष्ठ सहायक व अन्य कार्मिक होते हैं। प्रमुख शासन सचिव तथा शासन सचिव के वेतनमानों में तो अन्तर होता है परन्तु उनके उत्तरदायित्वों में कोई अन्तर नहीं होता है। कुछ विभागों में विशिष्ट शासन सचिव भी होते हैं। जो शासन सचिव या प्रमुख शासन सचिव के अधीन होते है सामान्यतया इस स्तर का एक ही पद एक विभाग में होता है। इसके अधीनस्थ पद सोपान में 'उप सचिव' का पद होता है बड़े विभागों में दो उप सचिव व छोटे विभागों में एक ही उपसचिव होता है। उपसचिव, भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय वन सेवा (IFS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS), राज्य प्रशासनिक सेवा (RAS), राजस्थान लोक सेवा (Raj. Public. Service), राजस्थान सचिवालय सेवा, अन्य विशिष्ट सेवाओं जैसे विधि, सांख्यिकी आदि से हो सकते हैं। उपसचिव के बाद पदसोपान में अवर सचिव, सहायक सचिव आते है जो राज्य सचिवालय सेवा के सदस्य होते हैं इसके बाद अनुभाग अधिकारी होता है जो राजपत्रित होता है यह राजस्थान सचिवालय सेवा के माध्यम से पद ग्रहण करता है। इसके पश्चात् सहायक अधीक्षक, वरिष्ठ सहायक, कनिष्ठ सहायक व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी होते हैं।
शासन सचिव अपने अधीनस्थ स्टाफ पर नियंत्रण रखता है, उपसचिव, शासन सचिव द्वारा सौपे कार्यों को करते है। शासन सचिव स्टाफ अभिकरण का प्रमुख होता है।

चयन एवं नियुक्ति

सचिवालय में प्रत्येक विभाग के सर्वोच्च पद पर कार्यरत सचिव की नियुक्ति संबंधित विभाग के मंत्री के परामर्श के बाद मुख्यमंत्री द्वारा की जाती है। मुख्यमंत्री का निर्णय अंतिम होता है। सचिव से लेकर उपसचिव तक सभी पदों पर प्रायः आई.ए.एस को ही नियुक्त किया जाता है। कभी-कभी राज्य प्रशासनिक सेवा एवं सचिवालय सेवा के पदोन्नत अधिकारियों को अनुभव के आधार पर उपसचिव लगा दिया जाता है। सचिवों की नियुक्ति के समय उनके सेवा अनुभव, विशिष्ट ज्ञान और रूचि का ध्यान रखा जाता है। सचिवालय में अधिकारियों, कर्मचारियों की नियुक्ति प्रत्यक्ष भर्ती द्वारा न करके अनुभव के आधार पर की जाती है।

राज्य सचिवालय के निम्नलिखित कार्य

1. नीति निर्माण और नियोजन - सचिवालय नीति एवं कानून निर्माण करता है तथा अधीनस्थ संस्थाओं पर नियंत्रण रखता है। सचिवालय निर्धारित नीति को सही रूप में क्षेत्रीय कार्यालय को संप्रेषित करता है।

2. सचिवालय सहायता - राज्य सचिवालय राज्य मंत्रिमण्डल तथा उसकी विभिन्न समितियों को उनके दिन-प्रतिदिन के कार्यों से संबंधित सभी विषयों पर सचिवीय सहायता प्रदान करने, उनकी बैठकों की कार्य सूची बनाने तथा उनमें की गयी कार्यवाहियों का आलेखन आदि करने के लिए उत्तरदायी है। राज्य सचिवालय और मंत्रिमण्डलीय सचिवालय मंत्रियों को संबंधित विषयों के आंकड़े व सूचना पेश करते हैं और आवश्यक परामर्श देते हैं। यह विभिन्न सरकारी संस्थाओं से संबंधित आवश्यक सूचनाएँ मंत्रिमण्डल तथा उसकी विभिन्न समितियों एवं राज्यपाल को प्रेषित करता रहता है। मंत्रिमण्डल की बैठकों में लिए जाने वाले निर्णयों की सूचना भी यह संबंधित विभागों तक पहुँचाता है।

3. समन्वयात्मक कार्य - राज्य सरकार के स्तर पर सचिवालय राज्य प्रशासन की एक समन्वयकारी संस्था है। राज्य सरकार के विभिन्न विभागों और अभिकरणों के मध्य समन्वय स्थापित करना सचिवालय का प्रमुख कार्य है। मुख्यमंत्री राजनैतिक कार्यपालिका के मध्य प्रमुख समन्वयकर्त्ता होता है और मुख्य सचिव प्रशासन में समन्वय स्थापित करता है।

4. परामर्श देना - राज्य सचिवालय में कार्यरत सभी शासन सचिव अपने मंत्रियों के लिए प्रमुख परामर्शदाता होते हैं। सचिव, मंत्रियों को विधि निर्माण में आवश्यक सहायता व परामर्श देते हैं।

5. मंत्रिमण्डल के समक्ष आने वाले मामलों में सचिवालय द्वारा किए जाने वाले प्रमुख कार्य निम्नवत हैं-
  • (i) व्यवस्थापन संबंधी मामले, जिनमें अध्यादेश जारी करना भी सम्मिलित है।
  • (ii) राज्यपाल द्वारा समय-समय पर विधानसभा में दिये जाने वाले अभिभाषणों तथा संदेशों को तैयार करना।
  • (iii) विधानसभा के अधिवेशनों का आरम्भ करने, स्थगित करने तथा विधानसभा को भंग करने संबंधी प्रस्तावों पर विचार करना।
  • (iv) किन्हीं विशेष घटनाओं पर सार्वजनिक समिति के गठन तथा इन समितियों द्वारा दिए जाने वाले प्रतिवेदनों पर कार्यवाही किए जाने संबंधी कार्य करना।
  • (v) सरकार के समक्ष वित्तीय साधनों से संबंधित कठिनाईयों का विश्लेषण एवं इन कठिनाइयों को दूर करने संबंधी सुझाव देना।
  • (vi) विभिन्न मंत्रियों द्वारा लिये जाने वाले निर्णय हेतु प्रस्तुत प्रस्तावों अथवा निर्देशों को प्राप्त करने संबंधी आवेदनों पर कार्यवाही करना।
  • (vii) मंत्रिमण्डल द्वारा लिए गए पूर्व निर्णयों को परिवर्तित अथवा संशोधित करने हेतु प्रस्ताव तैयार करना।
  • (viii) मंत्रियों के पारस्परिक विवादों को सुलझाने संबंधी प्रस्ताव
  • (ix) किसी मंत्री व प्रशासक के बीच उठने वाले विवाद को सुलझाना।
  • (x) वे सभी मामले, जो राज्यपाल अथवा मुख्यमंत्री, मंत्रिमण्डल के समक्ष विचार-विमर्श हेतु प्रस्तुत करना चाहते हैं।
  • (xi) सरकार द्वारा चलाये गये किसी अभियोग को वापस लेने संबंधी प्रस्ताव।

6. वित्तीय एवं बजट संबंधी कार्य - बजट निर्धारण के अनुसार खर्च की प्रगति का मूल्यांकन करने का कार्य सचिवालय द्वारा सम्पन्न किया जाता है।

7. राज्य की लोक सेवाओं में भर्ती, नियुक्ति, वर्गीकरण, पदोन्नति, वेतन, सेवा शर्ते अनुशासनात्मक कार्यवाहियों आदि के बारे में नीति और नियमों का निर्धारण करता है।

8. केन्द्र सरकार व केन्द्रीय निकायों से निरन्तर सम्पर्क बनाए रखता है। राज्य प्रशासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए और प्रशासकीय सुविधा की दृष्टि से राज्य प्रशासन की प्रशासकीय संरचना को कई विभागों में बाँट दिया जाता है।

सचिवालय-निदेशालय सम्बन्ध

विभाग दो प्रकार के होते हैं।
  1. सचिवालयी विभाग
  2. कार्यकारी विभाग
जहाँ सचिवालय विभाग से हमारा तात्पर्य ‘सरकार’ या ‘मंत्रालय’ होता है वहीं दूसरी ओर निदेशालय का आशय सरकार के अधीन कार्य करने वाली कार्यकारी संस्था से है। ये सरकार द्वारा निर्धारित नीति के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार होते हैं।

सचिवालय-निदेशालय

राज्य सचिवालय मुख्य रूप से राज्य की नीति निर्धारक, समन्वयकारी संस्था है और निदेशालय मुख्य रूप से नीति क्रियान्वयन से जुड़ा है। राज्य शासन व्यवस्था में सरकार के 3 प्रमुख अंग हैं।
  1. मंत्री
  2. सचिव
  3. कार्यकारी प्रमुख
shasan-vyavastha
मंत्री किसी विभाग का राजनीतिक प्रमुख होता है जिसे सचिवालय सेवा या विधि निर्माण हेतु आवश्यक सहायता व परामर्श देने के लिए सचिव होता है। इस प्रकार मंत्री व सचिव मिलकर सचिवालय का गठन करते है। सचिवालय एक स्टाफ अभिकरण है जो नीति-निर्माण करता है। सचिवालय द्वारा निर्मित नीति को क्रियान्वित करने का कार्य निदेशालय (Directorate) द्वारा किया जाता है। निदेशालय एक लाइन अभिकरण है जिसका मुखिया कार्यकारी अध्यक्ष होता है। जिसे निदेशक, आयुक्त, महानिदेशक, महा निरीक्षक, रजिस्ट्रार, नियंत्रक, मुख्य अभियंता, मुख्य संरक्षक आदि नामों से जाना जाता है। निदेशक की सहायता के लिए अपर निदेशक, संयुक्त निदेशक, उपनिदेशक और सहायक निदेशक होते हैं।

निदेशालय के कार्य

  • निदेशालय अपने विभाग के मंत्री को तकनीकी सलाह व परामर्श देता है।
  • विभाग का बजट तैयार करना।
  • अनुदान आवंटित करना और बजट का पुनर्भरण (पुनर्विनियोजन) करना।
  • विभागीय अधिकारियों को सेवा कालीन प्रशिक्षण देना, अधीनस्थों पर नियमानुसार कार्यवाही करना।
सचिवालय-निदेशालय के अन्तर को निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है।

सचिवालय निदेशालय
1. यह मुख्यतः नीति निर्माण से जुड़ा जुड़ा है । यह मुख्यतः नीति क्रियान्वयन है ।
2. इसका प्रशासनिक प्रमुख एक सामान्यज्ञ (IAS) होता है । सचिवालय की पदसोपानिक स्थिति उच्च होती है । इसका प्रशासनिक प्रमुख विशेषज्ञ होता है । पदसोपानिक स्थिति निम्न होती है ।
3. यह एक स्टाफ अभिकरण है । यह एक सूत्र अभिकरण है ।

राज्य प्रशासन में सचिवालय एवं निदेशालय संबंधों पर विवाद एवं बहस होती रही है। सचिवालय प्रायः यह शिकायत करता है कि-
(i) विभागाध्यक्ष उनके पास वे प्रस्ताव भेजते है जो पूर्ण रूप से तैयार नहीं होते;
(ii) कभी-कभी विभागाध्यक्ष उन मामलों में निर्णय नहीं लिया करते जहाँ उन्हें शक्तियों दी गई होती हैं। दूसरी ओर निदेशालय यह महसूस करते हैं कि
  1. सचिवालय ने सभी महत्वपूर्ण शक्तियों को केन्द्रीकृत कर दिया है
  2. सचिवालय अपने वास्तविक कार्यों को भूल गए है तथा कार्यकारी विभागों से अधिक कार्य करवाते है।
सचिवालयी विभाग की अध्यक्षता एक IAS करता है। जिसे सचिव कहा जाता है। सचिव साधारणतः वरिष्ठ I.A.S. होते है जिन्हें 'सामान्यज्ञ या जनरलिस' कहते हैं। सचिव किसी मंत्री का न होकर सरकार का होता है। कार्यकारी विभाग की अध्यक्षता एक विशेषज्ञ करता है। जिसे उस कार्यकारी विभाग का अध्यक्ष कहते हैं। विभागाध्यक्ष को अपने विभाग से संबंधित सचिव द्वारा अपने मंत्री की ओर से आदेश, अनुदेश और निर्देश प्रदान किये जाते हैं। सचिवालय एक 'स्टाफ अभिकरण' है और निदेशालय 'सूत्र अभिकरण' है। सन् 1948 में श्री डी.जी. कर्वे की अध्यक्षता में स्थापित 'मुम्बई प्रशासनिक जांच पड़ताल समिति' ने भी सचिवालय-निदेशालय संबंधों पर विचार किया था। समिति ने सचिवालय से निदेशालय को पृथक रखने का जोरदार समर्थन किया। सन् 1950 में ए.डी. गोरवाला ने सचिवालय तथा कार्यकारी विभागों के संबंध में निम्न सुझाव दिए-
  1. तकनीकी विभागाध्यक्ष को मंत्री से मिलने के सभी अवसर दिए जाएं ताकि मंत्री को उसके परामर्श का प्रत्यक्ष रूप से लाभ मिल सके।
  2. सचिवालय व कार्यकारी संस्था के बीच पृथक एवं स्पष्ट विभाजक रेखा बनायी जाए एवं कार्यकारी संस्था के प्रमुख को सचिवालय पदाधिकारी बनाकर अनावश्यक 'नोटिंग' एवं विलम्ब से बचाया जाये।
  3. सचिवालय का व्यवसायीकरण किया जाए।
  4. कार्यकारी संस्था के प्रमुख को मंत्रालय या विभाग के विशिष्ट सचिव का दर्जा प्रदान किया जाए।
  5. संबंधित विभागाध्यक्षों को, जहाँ तक संभव हो सके, सचिवालय प्रांगण में ही उपस्थित किया जाए।

प्रशासनिक सुधार आयोग का सुझाव था कि -
  1. प्रमुख विभागाध्यक्षों का वेतन स्तर सचिवों से अधिक नहीं तो कम से कम बराबर अवश्य रखा जाना चाहिए।
  2. किसी राज्य सचिवालय में विभागों की संख्या 13 से अधिक नहीं होनी चाहिए।

राजस्थान राज्य सचिवालय

राज्य सचिवालय राज्य का शीर्ष नीति-निर्धारक है जो नीति निर्माण में मंत्रियों को आवश्यक सहायता प्रदान करता है। सचिवालय राज्य प्रशासन की समन्वयकारी संस्था है राज्य प्रशासन में सचिवालय की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है। राज्य सरकार के समस्त विभाग सचिवालय में सम्मिलित होते है। राजस्थान में सचिवालय की स्थापना से पूर्व रजवाड़े या देशी रियासतें अपने-अपने ढंग से शासन संचालित करते थे। रियासतों के सचिवालय 'महकमाखास' कहलाते थे। स्वतंत्रता उपरान्त विभागों के मुख्यालयों एवं प्रक्रिया के निर्धारण के लिए सरदार पटेल की सिफारिश के आधार पर 'शंकर राव समिति' का गठन किया गया। इस समिति द्वारा स्थानों की परिस्थितियों के आधार पर विभाग स्थापित करने का निर्णय दिया। राज्य में प्रशासन तंत्र की स्थापना के लिए एक अध्यादेश-1949 जारी किया गया। इस प्रकार राजस्थान शासन सचिवालय का एकीकृत रूप में गठन अप्रैल, 1949 में किया गया। राज्य में सर्वप्रथम सचिवालयी कार्यों की शुरूआत भगवानदास बैरेक्स में की गई जहाँ वर्तमान में शासन सचिवालय स्थित है। राज्य सचिवालय विभिन्न विभागों में बँटा रहता है जिसके पदसोपान के शीर्ष पर मुख्य सचिव होता है। मुख्य सचिव सामान्य प्रशासन विभाग का मुखिया होता है। प्रत्येक विभाग का प्रशासनिक प्रमुख शासन सचिव या सचिव कहलाता है और विभाग के कार्यकारी प्रमुख को विभागाध्यक्ष (निदेशक) कहते हैं। प्रत्येक विभाग का राजनैतिक प्रमुख एक मंत्री होता है, जिसे कैबिनेट स्तर के मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है। वह अपने विभाग के नीति निर्माण के लिए उत्तरदायी होता है। विभाग का सचिव विभाग की नीतियों का निर्देशन व प्रवेक्षण करता है। व्यवहार में विभाग की नीतियाँ शासन सचिव या सचिव ही बनाता है। राजस्थान में 1994 में 37 विभाग थे। सितम्बर, 1997 में राजस्थान के शासन सचिवालय में 51 विभाग कार्यरत थे। राज्य सचिवालय में विभागों की संख्या परिवर्तित होती रहती है। वर्तमान में राजस्थान सरकार में निम्नलिखित विभाग कार्यरत है -

सचिवालय के विभाग (Departments of the Secretariat)

  1. आयोजना विभाग
  2. उद्योग विभाग
  3. ऊर्जा विभाग
  4. एन.आई.सी. कम्प्यूटर
  5. कृषि विभाग
  6. कार्मिक विभाग (क)
  7. कार्मिक विभाग (ख व ग)
  8. खान विभाग
  9. खाद्य एवं नागरिक रसद विभाग
  10. खेलकूद एवं युवा मामले विभाग
  11. गृह (अभियोजन) विभाग
  12. गृह विभाग
  13. ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग
  14. चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग (क. आयुर्वेद विभाग) (ख. परिवार कल्याण विभाग) (ग. चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग)
  15. निर्वाचन विभाग
  16. जन अभियोग निराकरण विभाग
  17. जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग
  18. जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग
  19. नगरीय विकास एवं आवासन विभाग
  20. पर्यटन, कला एवं संस्कृति विभाग
  21. पर्यावरण विभाग
  22. परिवहन विभाग
  23. पशुपालन विभाग
  24. प्रशासनिक सुधार विभाग
  25. भू-जल विभाग
  26. महाधिवक्ता कार्यालय
  27. मंत्रिमण्डल सचिवालय
  28. मुख्यमंत्री सचिवालय
  29. मुख्य सचिव कार्यालय
  30. मुद्रण एवं लेख सामग्री विभाग
  31. राजकीय उपक्रम विभाग
  32. राजस्व एवं उपनिवेशन विभाग
  33. लोकायुक्त सचिवालय
  34. वन विभाग
  35. वित्त विभाग
  36. विधि एवं न्याय विभाग (क) विधि रचना एवं संहिताकरण (ख) विभागीय जाँच
  37. शिक्षा विभाग ● उच्च शिक्षा (क) ● माध्यमिक शिक्षा (संस्कृत शिक्षा सहित) (ख) ● प्राथमिक शिक्षा (ग) ● तकनीकी शिक्षा (घ)
  38. श्रम एवं नियोजन विभाग
  39. सहकारिता विभाग
  40. सहायता विभाग
  41. सामान्य प्रशासन विभाग
  42. सार्वजनिक निर्माण विभाग
  43. सिंचाई विभाग
  44. सी.ए.डी. एण्ड वाटर यूटिलाइजेशन विभाग
  45. सैनिक कल्याण, देवस्थान, वक्फ विभाग
  46. समाज कल्याण विभाग
  47. सूचना एवं जन सम्पर्क निदेशालय

मुख्य सचिव

मुख्य सचिव सचिवालय का सर्वेसर्वा होता है। आंध्र प्रदेश प्रशासनिक सुधार समिति ने मुख्य सचिव के पद के संबंध में लिखा था : ‘वह लोक सेवाओं एवं सरकारी अधिकारियों का वरिष्ठ नेता है तथा उनसे संबंधित समस्याओं, सेवा शर्तों एवं कार्यों को देखता है।’
उसका पद और उसके कार्य इतने महत्वपूर्ण हैं कि वह ‘कार्यकाल पद्धति’ (Tenure System) से है। व्यवहार में मुख्य सचिव या तो मुख्य सचिव के पद से रिटायर हो जाता है अथवा उसे केन्द्र सरकार में और अधिक महत्वपूर्ण पदों पर स्थानान्तरित किया जा सकता है।
सन् 1973 तक यह आवश्यक नहीं माना जाता था कि ‘मुख्य सचिव’ सभी राज्यों में वरिष्ठतम आई.ए.एस अधिकारी ही हो। तमिलनाडु में मुख्य सचिव सदैव वरिष्ठतम लोक सेवक होता था। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में वह पद एवं वरिष्ठतम में राजस्व मंडल के सदस्यों से भी कनिष्ठ होता था। पंजाब में यह पद वित्त आयुक्त से कनिष्ठ था।
सन् 1973 के बाद मुख्य सचिव का पद भारत सरकार के सचिव के समतुल्य मान लिया गया है और उसे वही वेतन भत्ते दिए जाएंगे जो भारत सरकार के किसी सचिव को उपलब्ध हैं। वर्तमान में 7वें वेतन आयोग के अनुसार मुख्य सचिव का वेतन ₹ 2,25,000 है।
मुख्य सचिव के पद का सृजन 1799 ई. में लॉर्ड वेलेजली ने किया था। जी.एच. बालों पहले मुख्य सचिव बने किन्तु यह पद केन्द्र सरकार में प्रारम्भ हुआ जिसे बाद में समाप्त कर दिया गया।
सामान्यतः मुख्य सचिव पद पर नियुक्ति वरिष्ठता के आधार पर होती है किन्तु ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि मुख्य सचिव के चयन में योग्यता और अन्य बातें भी निर्णायक होती है। व्यवहार में मुख्य सचिव का चयन राज्य का मुख्यमंत्री करता है।
राज्य प्रशासन को सुचारू रूप से और प्रभावी ढंग से चलाने के लिए यह भी आवश्यक है कि मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के आपसी संबंध मधुर हो। प्रशासनिक सुधार आयोग का मत था कि मुख्य सचिव का चयन बहुत ही सावधानी से किया जाना चाहिए। यह एक वरिष्ठतम प्रभावी व्यक्ति होना चाहिए जिसे अपने योग्यता, अनुभव, ईमानदारी और निष्पक्षता के कारण सभी अधिकारियों का विश्वास और आदर प्राप्त हो।

मुख्य सचिव की स्थिति

मुख्य सचिव शासन सचिवालय का मुखिया, राज्य का कार्यकारी प्रमुख होता है। वह भारतीय प्रशासनिक सेवा का वरिष्ठतम अधिकारी होता है, जो राज्य में नौकरशाही संगठन का मुखिया होता है। वह राज्य में नीति निर्माण, नियन्त्रण तथा प्रशासकीय नेतृत्व, विभिन्न विभागों में समन्वय स्थापित करने जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य करता है, उसे राज्य प्रशासन की 'किंग-पिन' कहते हैं। वह राज्य मंत्रिमंडल का सचिव होता है। वह राज्य में लोकसेवाओं का प्रमुख होता है। मुख्य सचिव मंत्रिमण्डल का सचिव भी होता है। वह सचिवालय का सर्वेसर्वा प्रशासनिक अधिकारी है।

नियुक्ति
मुख्य सचिव की नियुक्ति मुख्यमंत्री द्वारा की जाती है। मुख्य सचिव का कार्यकाल या सेवा अवधि मुख्यमंत्री के साथ उसके सम्बन्धों पर निर्भर करती है। वह मुख्यमंत्री के प्रसादपर्यन्त पद पर बना रहता है। वह मुख्यमंत्री का प्रमुख सहयोगी व सलाहकार होता है।
मुख्य सचिव जो कार्य राज्य में करता है वह केन्द्र में कैबिनेट सचिव, गृह सचिव तथा वित्त सचिव मिलकर करते हैं।

इसके प्रमुख कार्य निम्नवत हैं-
  • वह राज्य मंत्रिमण्डल का सचिव होता है। वह मंत्रिमण्डल की बैठकों का एजेण्डा तैयार करता है, बैठकों की व्यवस्था करता है तथा कार्यवाहियों का रिकार्ड रखता है। बैठकों में प्रस्तुत किए जाने वाले मामले, चाहे किसी भी विभाग से संबंधित हों, मुख्य सचिव के माध्यम से ही प्रेषित किए जाते हैं। वह मंत्रिमण्डल को नीति निर्माण में भी आवश्यक सहायता और सलाह देता है।
  • मुख्य सचिव राज्य प्रशासन में प्रमुख समन्वयक है। उसे राज्य के किसी भी विभाग से संबंधित किसी भी मामले की पत्रावली के निरीक्षण का अधिकार होता है। कई राज्यों में मुख्य सचिव योजना विभाग, कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग का सचिव होता है जिसमें वह समन्वय का कार्य अधिक कुशलता से कर सकता है। वह राज्य में सचिवों की बैठक की अध्यक्षता भी करता है। राज्य की राजधानी में अनेक बार जिला और क्षेत्रीय अधिकारियों की बैठक होती है जिनकी अध्यक्षता मुख्य सचिव करता है। मुख्य सचिव जिला कलेक्टरों के कार्यों पर भी नियंत्रण रख सकता है। यह उसका दायित्व है कि वह जिला कलेक्टर के कार्यों के बारे में पूर्ण जानकारी रखे।
  • मुख्य सचिव अपने राज्य तथा केन्द्र और अन्य राज्य सरकारों के बीच आवश्यक संचार माध्यम का कार्य करता है। वह भारत सरकार और राज्य सरकार के बीच शासकीय संवाद का औपचारिक चैनल है। सामान्यतया अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव और मतभेदों के सभी मामलों पर मुख्य सचिव की सलाह ली जाती है।
  • राज्य प्रशासन में मुख्य सचिव कई बार कतिपय विभागों का प्रभारी भी होता है चूंकि मुख्य सचिव अत्यधिक व्यस्त रहता है, इसलिए इनके सभी विभागों के दैनिक कार्यों का मुख्य उत्तरदायित्व एक उप-सचिव या विशेष सचिव पर होता है जो मुख्य सचिव के निर्देशन में कार्य करता है।
  • राज्य में शांति व व्यवस्था बनाए रखने के लिए वह आवश्यक कार्यवाही करता है।
  • वह राज्य लोक सेवाओं का अध्यक्ष (प्रधान) होता है तथा सरकारी संवर्ग की नियुक्ति, स्थानान्तरण तथा पद विमुक्ति आदि की शक्ति उसमें निहित है।
  • वह सचिवालय भवनों व उनके कक्षों पर प्रशासनिक नियंत्रण रखता है।
  • वह केन्द्रीय रिकॉर्ड ब्रांच, सचिवालय, पुस्तकालय तथा अधिकारी संरक्षण स्टाफ पर जो सचिवालय के सभी विभागों में कार्य करता है, पर्यवेक्षण रखता है।
  • संकटकाल में वह राज्यों के 'नर्व सिस्टम' की भांति कार्य करता है।
  • यदि राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता है तो वह सम्पूर्ण राज्य प्रशासन के संचालन के लिए उत्तरदायी होता है तथा मंत्रिमण्डल की अनुपस्थिति में सभी महत्वपूर्ण फैसले मुख्य सचिव के द्वारा ही लिए जाते हैं तथा सभी सचिवालय विभाग उसके निर्देशन में ही कार्य करते हैं।

बंगाल प्रशासनिक जांच समिति ने 1945 में सिफारिश की थी कि मुख्य सचिव:-
  • मुख्यमंत्री के विभाग का प्रमुख सेवक होना चाहिए।
  • मंत्रिमण्डल तथा मंत्रिमण्डल विकास समितियों का सचिव होना चाहिए।
  • विकास बोर्ड का अध्यक्ष होना चाहिए।
  • विकास की गतिविधियों के मामले में प्रत्येक जिला कलेक्टर का तात्कालिक कार्यकारी उच्चाधिकारी होना चाहिए।
राजस्थान प्रशासनिक सुधार समिति (1963) ने अनुशंसा की कि प्रभारी मंत्री को मुख्य सचिव से निरन्तर सलाह लेते रहना चाहिए और निम्न मामले केवल उसी के माध्यम से आने चाहिए।
  1. नए सिद्धांतों और नई योजनाओं को लागू करने तथा वर्तमान नियम व व्यवहार से विचलन के सभी प्रस्ताव
  2. विभागों के उप-प्रमुख व उससे ऊपर के अधिकारियों की नियुक्ति, पदस्थापना, स्थानान्तरण, पदोन्नति आदि के मामले।
प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्ययन दल ने राज्य प्रशासन पर अपने प्रतिवेदन में यह सुझाव दिया कि मुख्य सचिव के पद को अधिक शक्तिशाली बनाया जाना आवश्यक है क्योंकि मुख्य सचिव को मुख्यमंत्री के अधीन मुख्य समन्वयक के रूप कार्य करना होता है।
मुख्य सचिव के पद को प्रभावशाली बनाने के लिए कई सुझाव दिये जाते हैं, जैसे राज्य के वरिष्ठतम अधिकारियों की सूची में वरिष्ठतम व्यक्ति को ही इस पद पर आसीन किया जाए, उसका कार्यकाल लम्बा हो जिससे कि वह प्रभावपूर्ण ढंग से कार्य कर सके, आदि।

राजस्थान में मुख्य सचिव

स्वतन्त्रता से पहले राजस्थान 'बी' श्रेणी का राज्य था। तब मुख्य सचिव की नियुक्ति केन्द्र सरकार द्वारा की जाती थी। राजस्थान का निर्माण होने पर 13 अप्रैल 1949 को राजस्थान के प्रथम मुख्य सचिव के रूप में के. राधाकृष्णन की नियुक्ति की गई। एकीकरण के परिणामस्वरूप 1 नवम्बर, 1956 को यह अपने वर्तमान स्वरूप में आया। इसके पश्चात् वर्ष 1958 में प्रथम बार राज्य सरकार द्वारा राजस्थान संवर्ग के वरिष्ठ आई.ए.एस अधिकारी की नियुक्ति मुख्य सचिव के तौर पर की गई। पहले विभिन्न राज्यों में मुख्य सचिवों की पदस्थिति अलग-अलग थी। प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिश पर 1973 के बाद राज्य के मुख्य सचिव की स्थिति केन्द्र के सचिव के बराबर कर दी गई। वर्तमान में मुख्य सचिव की पद स्थिति सभी राज्यों में कार्यरत लोक सेवकों में सर्वोच्च होती है। राजस्थान के प्रथम मुख्य सचिव श्री के. राधाकृष्णन थे। राजस्थान की प्रथम महिला मुख्य सचिव श्रीमती कुशल सिंह थी। श्री मीठालाल मेहता को पहली बार वरीयता का उल्लंघन करके फरवरी, 1994 में भाजपा सरकार द्वारा मुख्य सचिव नियुक्त किया गया। श्री वी. बी.एल. माथुर 10 मार्च, 1986 से 31 जनवरी, 1992 तक राज्य के मुख्य सचिव रहे जो चार मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में मुख्य सचिव रहे। उन्होंने हरिदेव जोशी, शिवचरण माथुर, भैरोसिंह शेखावत के साथ भी काम किया।
  1. नियुक्ति :- मुख्यमंत्री द्वारा
  2. सेवाकाल :- मुख्यमंत्री की इच्छा पर निर्भर करता है।
  3. वेतन :- 7वें वेतन आयोग के अनुसार मुख्य सचिव का वेतन ₹2,25,000 मासिक है।

राजस्थान के मुख्य सचिवों की सूची
नाम कार्यकाल
श्री के. राधाकृष्णन 13 अप्रैल, 1949 2 मई, 1950
श्री वी. नारायणन 2 मई, 1950 1 सितम्बर, 1950
श्री के. राधाकृष्णन 1 सितम्बर, 1950 31 जनवरी, 1951
श्री एस.डब्ल्यू. शिवशंकर 8 फरवरी, 1951 16 फरवरी, 1953
श्री बी.जी. राव 16 फरवरी, 1953 30 दिसम्बर, 1954
श्री किशन पुरी 30 दिसम्बर, 1954 12 जनवरी, 1957
श्री के.एन. सुब्रह्मण्यम 11 मार्च, 1957 6 मई, 1958
श्री बी.एस. मेहता 9 मई, 1958 26 सितम्बर, 1964
श्री एस.डी. उज्ज्वल (कार्यवाहक) 26 सितम्बर, 1964 16 जनवरी, 1965
श्री बी.एस. मेहता 16 जनवरी, 1965 29 अक्टूबर, 1966
श्री के.पी.यू. मेनन 29 अक्टूबर, 1966 22 अक्टूबर, 1968
श्री आर.डी. माथुर 22 अक्टूबर, 1968 16 मई, 1969
श्री जेड.एस. झाला 17 मई, 1969 9 अगस्त, 1971
श्री एस.एस. खुराणा 9 अगस्त, 1971 23 जून, 1975
श्री मोहन मुखर्जी 7 जुलाई, 1975 1 मई, 1977
श्री आर.डी. थापर 4 मई, 1977 22 जून, 1977
श्री मोहन मुखर्जी 26 जून, 1977 31 अक्टूबर, 1977
श्री जी.के भनोत 28 नवम्बर, 1977 29 दिसम्बर, 1980
श्री एम.एम.के. वली 29 दिसम्बर, 1980 20 फरवरी, 1984
श्री आनन्द मोहनलाल सक्सेना 21 फरवरी, 1984 22 जुलाई, 1985
श्री नरेश चन्द्र 23 जुलाई, 1985 9 मार्च, 1986
श्री वी.बी.एल माथुर (सर्वाधिक लंबा कार्यकाल) 10 मार्च, 1986 31 जनवरी, 1992
श्री टी.वी. रमणन 31 जनवरी, 1992 30 अगस्त, 1993
श्री गोविन्द जे. मिश्रा 30 अगस्त, 1993 29 जनवरी, 1994
श्री एम.एल मेहता 2 फरवरी, 1994 31 दिसम्बर, 1997
श्री अरुण कुमार 31 दिसम्बर, 1997 1 जनवरी, 2000
श्री इन्द्रजीत खन्ना 1 जनवरी, 2000 26 दिसम्बर, 2002
श्री आर.के. नायर 26 दिसम्बर, 2002 28 फरवरी, 2005
श्री अनिल वैश्य 28 फरवरी, 2005 30 जून, 2007
श्री डी.सी. सामंत 30 जून, 2007 27 फरवरी, 2009
श्रीमती कुशल सिंह (पहली महिला) 27 फरवरी, 2009 31 अक्टूबर, 2009
श्री टी. श्रीनिवासन 31 अक्टूबर, 2009 31 अगस्त, 2010
श्री सलाउद्दीन अहमद 31 अगस्त, 2010 29 फरवरी, 2012
श्री सी.के. मैथ्यू 29 फरवरी, 2012 15 अक्टूबर, 2013
श्री सी.एस. राजन 20 अक्टूबर, 2013 22 दिसम्बर, 2013
श्री राजीव महर्षि 22 दिसम्बर, 2013 28 अक्टूबर, 2014
श्री सी.एस. राजन 31 अक्टूबर, 2014 30 जून, 2016
ओ.पी. मीणा (पहले अनुसूचित जनजाति) 30 जून, 2016 30 जून, 2017
अशोक जैन 30 जून, 2017 31 दिसम्बर, 2017
निहाल चंद गोयल (सबसे छोटा कार्यकाल) 31 दिसम्बर, 2017 30 अप्रैल, 2018
डी.बी. गुप्ता 30 अप्रैल, 2018 03 जुलाई, 2020
श्री राजीव स्वरूप 03 जुलाई, 2020 01 नवम्बर, 2020
श्री निरंजन आर्य 01 नवम्बर, 2020 31 जनवरी, 2022
ऊषा शर्मा 31 जनवरी, 2022 30 जून, 2023 6 माह का एक्सटेंशन
सुधांशु पंत 31 दिसम्बर, 2023 लगातार

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