राजस्थान की मिट्टियाँ
इस लेख में राजस्थान की मृदा संपदा (Soil Resources) और उसके वैज्ञानिक व क्षेत्रीय वर्गीकरण की विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें मिट्टी के निर्माणकारी कारकों, जैसे जलवायु और चट्टानों के प्रभाव को गहराई से समझाया गया है। साथ ही, राज्य में मृदा के विभिन्न प्रकारों, उनकी विशेषताओं, अपरदन की चुनौतियों और संरक्षण के उपायों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला गया है।
राजस्थान की मिट्टियाँ (मृदा संसाधन)
मृदा- भू-पृष्ठ पर असंगठित पदार्थों की वह ऊपरी परत जो कि मूल चट्टानों या वनस्पति के योग से निर्मित होती है, मृदा कहलाती है।
मृदा का अध्ययन जिस शाखा में किया जाता है, उसे पेडोलॉजी कहते हैं।
मृदा संरचना
- विश्व मृदा दिवस- 5 दिसम्बर को मनाया जाता है।
- भू-पृष्ठ पर ऊपरी असंगठित पदार्थों की परत को मृदा कहा जाता है।
- यह वनस्पति के उगने, बढ़ने के लिए जीवांश एवं खनिजांश प्रदान करती है।
- मृदा की सतह प्रायः 30 से 40 सेमी. मानी जाती है किन्तु 150 सेमी. या इससे अधिक गहराई में भी हो सकती है।
- मृदा के प्रधान पोषक तत्व- नाइट्रोजन, कैल्शियम, फॉस्फोरस, पोटेशियम है।
- अनुकूल परिस्थितियों में एक से दो सेंटीमीटर मोटी मिट्टी की परत बनने में लगभग दो शताब्दियाँ लग जाती है लेकिन यह बनी बनाई मिट्टी कुछ ही समय में नष्ट हो सकती है।
- मिट्टी एक बार नष्ट हो जाए या पौष्टिक पदार्थों की कमी से बेकार हो जाए तो कृषि एवं वनस्पति के लिए वह लगभग हमेशा के लिए खत्म हो जाती है, यही कारण है कि मिट्टी को पुनर्नवीन न होने वाला संसाधन माना जाता है।
मृदा परिच्छेदिका
मृदा परिच्छेदिका में क्रमशः 3 मुख्य संस्तर- स्थितियाँ होती हैं- वास्तविक मृदा सबसे ऊपर, इसके नीचे उपमृदा और सबसे नीचे आधारी चट्टान।
- भौतिक एवं रासायनिक संघटन तथा जैविक अंश के आधार पर मृदा को प्रत्येक संस्तर दूसरों से बिल्कुल भिन्न होता है।
- मृदा निर्माण की लम्बी प्रक्रिया के दौरान इस भिन्नता का विकास होता है।
मृदा निर्माण के कारक
मुख्यत: 5 कारक होते हैं-
- आधारी चट्टान/जनक पदार्थ
- स्थानीय जलवायु
- जैविक पदार्थ
- ऊँचाई और उच्चावच अर्थात् स्थलाकृति
- मिट्टी के विकास की अवधि
- बड़े क्षेत्रीय पैमाने पर इन पाँचों में पहले 2 कारक अन्य की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण हैं ।
- जलवायु और जैविक कारकों को क्रियाशील कारक कहते हैं जबकि जनक पदार्थ, स्थलाकृति और विकास की अवधि को निष्क्रिय कारक कहते हैं।
जनक पदार्थ
- मिट्टी के नीचे स्थित चट्टानी संस्तर को जनक पदार्थ कहते हैं क्योंकि इसी से मिट्टी बनती है।
- जनक पदार्थ विखंडित होकर यांत्रिक, रासायनिक तथा जैविक कारकों के प्रभाव से धीरे-धीरे अपक्षायित होते रहते हैं।
- यांत्रिक तथा रासायनिक विधियों से होने वाले अपक्षय की दरों में अंतर होता है और यह चट्टानी संरचना, उसकी कठोरता और जलवायु पर निर्भर करता है।
- अपक्षय की गति जितनी अधिक होगी (जैसे कि उष्ण और आर्द्र जलवायु वाले प्रदेशों में होता है) उतनी ही तेज गति से मृदा का निर्माण होगा।
जलवायु
एक लंबी अवधि में जनक पदार्थों के कारण उत्पन्न विभिन्नताओं को यह बहुत हद तक कम कर देती है।
अतः एक ही जलवायु वाले क्षेत्र में दो भिन्न प्रकार के जनक पदार्थ एक ही प्रकार की मिट्टी का निर्माण कर सकते हैं।
ठीक उसी प्रकार, एक ही तरह के जनक पदार्थ दो भिन्न जलवायु प्रदेशों में दो भिन्न प्रकार की मिट्टी विकसित कर सकते हैं।
जैविक पदार्थ (चींटी, चूहे, दीमक)
वनस्पति, जीव, पेड़, झाड़ियाँ, घास, जीवाणु, जानवर, जीवाणु हवा के नाइट्रोजन को किसी ऐसे रासायनिक यौगिक में बदल देते हैं जिसका उपयोग पौधे कर सकें। यही कारण है कि जीवाणुओं को नाइट्रोजन- यौगिकीकरण का कारक कहा जाता है।
स्थलाकृति
स्थलाकृति मिट्टी के जमाव, उसके अपरदन तथा जलप्रवाह की गति पर प्रभाव डालती है।
मनुष्य भी परोक्ष रूप से मिट्टी को प्रभावित करता है ।
मिट्टी के विकास की अवधि
अनुकूल परिस्थितियों में एक से दो सेंटीमीटर मोटी मिट्टी की परत बनने में लगभग दो शताब्दियाँ लग जाती है लेकिन यह बनी बनाई मिट्टी कुछ ही समय में नष्ट हो सकती है।
मिट्टी के प्रकार
मरूस्थलीय रेतीली मिट्टी/बलुई मिट्टी
- निर्माण- बलुआ पत्थर एवं ग्रेनाइट चट्टानों से, अपरदन द्वारा विशेषतः वायु अपरदन द्वारा।
- इस मृदा के कण सबसे मोटे होते हैं, जिसमें जलधारण क्षमता सबसे कम पायी जाती है।
- इसमें PH मान की अधिकता तथा जैविक तत्वों की कमी के कारण यह मिट्टी कृषि योग्य नहीं है।
- इस मृदा का विस्तार राजस्थान में सर्वाधिक भाग पर पाया जाता है।
- इसे प्यासी मृदा भी कहा जाता है।
- विस्तार- प्रमुख रूप से मरूस्थलीय जिले जैसे-जैसलमेर, जोधपुर, फलौदी, बीकानेर, बाड़मेर, बालोतरा, चूरू, सीकर, नागौर इत्यादि।
- इसमें कमी- नाइट्रोजन तथा कार्बनिक तत्व
- इसमें अधिकता- कैल्शियम व फास्फेट
लवणीय मिट्टी
- यह रेतीली मिट्टी का ही प्रकार है, इसमें लवणों की अधिकता है। इस कारण कृषि संभव नहीं है।
- अधिकता- पोटेशियम, कैल्शियम।
- कमी- मैग्नीशियम एवं कैल्शियम आयन।
- विस्तार- बाड़मेर, जालौर।
- यह मिट्टी रूपान्तरित मिट्टी होने के कारण श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ में भी मिलती है।
भूरी रेतीली/भूरी बलुई मिट्टी/धूसर/सिरोजम/ग्रे पेन्टेड मिट्टी
- इसमें लवणों का जमाव अधिक सिंचाई से हुआ है।
- इसमें कमी- नाइट्रोजन, कार्बनिक तत्त्व
- इसमें अधिकता- फास्फेट
- गहराई में चूने की परत पायी जाती है जिसे हार्डपेन कहा जाता है।
- विस्तार- सीकर, चूरू, झुंझनूँ, नागौर, डीडवाना-कुचामन, पाली, जोधपुर।
- यह भी रेतीली मिट्टी का प्रकार है।
पर्वतीय मिट्टी
- निर्माण- ग्रेनाइट एवं नीस चट्टानों से
- अधिकता- जीवाश्म।
- कमी- पोटाश, फास्फोरस, चूना।
- विस्तार- उदयपुर, राजसमंद, सिरोही, अजमेर
- इसे अधूरे निर्माण की मृदा कहा जाता है।
- यह अरावली पर्वतीय प्रदेश में मुख्यतः मिलती है।
काली मिट्टी/रेगुर मिट्टी
- विस्तार- हाड़ौती क्षेत्र में। (कोटा, बूँदी, बाराँ, झालावाड़)
- उपयोगी- कपास, चावल, सोयाबीन, धनिया।
- इसमें कमी-फास्फेट, जैविक पदार्थ, नाइट्रोजन
- इसमें अधिकता- पोटाश और कैल्सियम की।
- निर्माण- लावा अपरदन द्वारा हुआ है।
- स्वतः जुताई मिट्टी कहते हैं।
- इस मृदा में जलधारण की सर्वाधिक क्षमता होती है।
- लम्बे समय तक सिंचाई की आवश्यकता नहीं एक बार सिंचाई के उपरान्त।
मिश्रित लाल-काली मिट्टी
- इसमें कमी-नाइट्रोजन, फास्फोरस, चुना
- इसमें अधिकता-पोटाश
- उपयोगी-गन्ना, मक्का, कपास
- यह मालवा पठार की काली मिट्टी से व दक्षिणी अरावली की लाल मिट्टी से बनी।
- विस्तार- डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, राजसमंद, उदयपुर, सलूम्बर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़।
- इसमें चीका मिट्टी की प्रधानता है।
लाल लोमी, लेटेराइट मिट्टी
- इसका निर्माण कायांतरित चट्टानों से हुआ है।
- विस्तार- चित्तौड़गढ़, उदयपुर, सलूम्बर, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर (दक्षिणी राजस्थान)।
- उपयोगी- चावल, मक्का, गन्ना
- कमी- N + Ca + P (नाइट्रोजन + कैल्शियम + फास्फोरस)
- अधिकता- लौह तत्त्व।
- इस मिट्टी के कण बारीक होने के कारण अधिक समय तक आर्द्रता बनाए रखती है। इस कारण कम वर्षा में भी इसमें फसल अच्छी हो जाती है।
जलोढ़/कछारी मिट्टी
- विस्तार- जयपुर, अलवर, अजमेर, टोंक, कोटा, सवाई माधोपुर, करौली, धौलपुर, भरतपुर, डीग, दौसा।
- सर्वाधिक उपजाऊ मिट्टी है।
- इसमें कमी-चूना, फास्फोरस, जैविक तत्त्व अधिकता-नाइट्रोजन
- यह मिट्टी नदियों के प्रवाह क्षेत्र में मिलती है।
लाल-पीली मिट्टी
इसका लाल-पीला रंग लौह ऑक्साइड के जलयोजन की अधिक मात्रा के कारण होता है। इसका निर्माण नीस, शिस्ट तथा ग्रेनाइट चट्टान के टूटने से होता है।
इसमें कमी-नाइट्रोजन, कार्बनिक तत्त्व, कैल्शियम
अधिकता-लौह ऑक्साइड
यह मूंगफली तथा कपास के लिए उपयोगी मिट्टी है।
विस्तार- अजमेर, टोंक, भीलवाड़ा, करौली, सवाईमाधोपुर
नोट- भूरी जलोढ़ मिट्टी- अलवर, भरतपुर, गंगानगर, हनुमानगढ़ तथा बनास बेसिन इत्यादि में पाई जाती है।
भारत में मृदा का विस्तार निम्न है
मृदा का नवीन वर्गीकरण
1. एरिडोसोल्स-(शुष्क मिट्टी)
यह शुष्क जलवायु में पायी जाने वाली मृदा है।
इसके तहत जैसलमेर, बाड़मेर, बालोतरा, जोधपुर, फलौदी, चूरू, सीकर, झुंझुनूँ, नागौर, पाली और जालौर, जिले के कुछ क्षेत्र आते हैं।
इस मिट्टी का उपमृदा कण ऑर्थिड्स है जिसके निम्न वर्गीकरण है- 1. कैल्सी ऑर्थिड्स, 2. सेलो ऑर्थिड्स, 3. कैम्बो ऑर्थिड्स, 4. पेलि ऑर्थिड्स
2. एण्टीसोल्स
सर्वाधिक- पश्चिमी राजस्थान में।
यह ऐसा मृदा वर्ग है जिसके अन्तर्गत भिन्न प्रकार की जलवायु में यह शुष्क तथा अर्द्धशुष्क में मृदाएँ सम्मिलित हैं।
यह राजस्थान में सर्वाधिक मिलती है।
इस मिट्टी का उप मृदा वर्गीकरण निम्न है- 1. फ्लूवेंट्स 2. सोमेन्ट्स
3. अल्फीसोल्स
इस मिट्टी का विस्तार जयपुर, दौसा, अलवर, भरतपुर, डीग, सवाई माधोपुर, टोंक, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, बाँसवाड़ा, राजसमन्द, उदयपुर, डूंगरपुर, बूँदी, कोटा, बाराँ, झालावाड़ जिलों में है। यह उपआर्द्र तथा आर्द्र जलवायु में पाई जाती है।
इस मिट्टी में सर्वाधिक उपजाऊ कण होते हैं।
इस मिट्टी का उप मृदा कण हेप्लूस्तालफस है।
4. इन्सेप्टीसोल्स
राजस्थान में सिरोही, पाली, राजसमन्द, उदयपुर, सलूम्बर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़ में प्रधानतः तथा जयपुर, दौसा, सवाई माधोपुर में कहीं-कहीं मिलती है।
इस मिट्टी का उप मृदा कण उस्टोक्रेप्टस है।
5. वर्टीसोल्स
यह आर्द्र तथा अति आर्द्र में पाई जाती है।
यह झालावाड़, कोटा, बूँदी, बाराँ में प्रधानतः तथा डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, चित्तौड़गढ़ में सीमित रूप से मिलती है।
इस मिट्टी का उप मृदा कण क्रोमस्टर्टस और पेल्यूस्टर्टस है।
राजस्थान का कृषि विभागीय मृदा वर्गीकरण
| मृदा का प्रकार | जिले |
|---|---|
| 1. मरुस्थल एवं बालूका स्तूप (Desert and Dunes) | जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर एवं बीकानेर |
| 2. कैल्सी ब्राउन मरुस्थली मृदा (Desert Soils Clacie Brown) | जैसलमेर एवं बीकानेर |
| 3. जिप्सीफेरस (Gypsiferous) | बीकानेर |
| 4. मरुस्थली मृदा (Desert Soils) | गंगानगर, चूरू, झुंझुनूं, बीकानेर, जैसलमेर, नागौर, बाड़मेर, बालोतरा, जोधपुर फलौदी एवं सीकर |
| 5. रेवेरिना (Reverina) | गंगानगर |
| 6. साई सिरोजम (Sie Rozems) | गंगानगर |
| 7. धूसर-भूरी जलोढ़ मृदा (Grey-Brown Alluvial Soils) | जालौर, पाली, नागौर, डीडवाना-कुचामन अजमेर एवं सिरोही, |
| 8. गैर-चूना युक्त भूरी मृदा (Calcic Brown Soils) | जयपुर, सीकर, झुंझुनूं, नागौर, डीडवाना-कुचामन, अजमेर, अलवर |
| 9. नवीन जलोढ़ मृदा (Alluvial Soils of Recent Origin) | अलवर, भरतपुर, सवाईमाधोपुर, जयपुर, डीग, खैरथल, दौसा |
| 10. पीली-भूरी मृदा (Yellowish Brown Soils | जयपुर, टोंक, सवाईमाधोपुर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़ एवं उदयपुर |
| 11. नवीन भूरी मृदा (Brown Soils of Recent Origin) | भीलवाड़ा, अजमेर |
| 12. पर्वतीय मृदा (Hilly Soils) | उदयपुर एवं कोटा |
| 13. लाल-लोमी (Red Loam) | डूंगरपुर एवं बाँसवाड़ा |
| 14. काली गहरी मध्यम मृदा (Deep Medium Black Soils) | कोटा, बूूँदी, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, भरतपुर एवं झालावाड़ |
नदियों के आधार पर मिट्टियों का वर्गीकरण-
- घग्घर प्रदेश - भूरी मटियार दोमट मिट्टी
- लूनी बेसिन - भूरी दोमत मिट्टी
- बनास बेसिन - भूरी मटियार दोमट मिट्टी
- माही चम्बल बेसिन - लाल-काली मिट्टी
अपरदन के प्रकार
1. जल अपरदन/लम्बवत्/अवनलिका अपरदन
सर्वाधिक- चंबल क्षेत्र में होता है।
इसके पश्चात् श्रीगंगानगर, भरतपुर, हनुमानगढ़ में होता है।
सर्वाधिक जल अपरदन-कोटा संभाग
2. वायु/क्षैतिज/परत अपरदन
सर्वाधिक- जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, श्रीगंगानगर
न्यूनतम- धौलपुर
उपचार- खेजड़ी और बबूल
राज्य का 19.4% भाग वायु अपरदन से ग्रसित है।
3. चादरी अपरदन
सर्वाधिक- सिरोही क्षेत्र के आस-पास, राजसमंद
वर्षा के कारण मृदा की ऊपरी परत से पोषक तत्वों का हटना चादरी अपरदन कहलाता है।
4. सेम की समस्या/जलाधिक्ययता
- IGNP के आस-पास का क्षेत्र।
- सर्वाधिक- 1. हनुमानगढ़- नौहर, रावतसर, बडोपल, भगवानदास 2. गंगानगर- सूरतगढ़
- उपचार- सफेदा (यूकेलिप्ट्स) का वृक्ष।
नोट-
सूखा संभाव्य कार्यक्रम- 1974-75
केंद्र : राज्य का अंश- 75:25
- मरू विकास कार्यक्रम- 1977-78
- केन्द्र : राज्य अंश = 75:25
- भारत की कुल व्यर्थ भूमि का राजस्थान में- 20% पाया जाता है।
- सर्वाधिक कृषि भूमि- गंगानगर
- सर्वाधिक बंजर भूमि- जैसलमेर
- सर्वाधिक परती भूमि- जोधपुर
- सर्वाधिक व्यर्थ भूमि- राजसमंद
- केन्द्रीय भू-संरक्षण बोर्ड- जयपुर, सीकर
- मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला- जयपुर, जोधपुर
- मिट्टी को pH के आधार पर मापा जाता है।
- क्षारीय/लवणीय/धूसर मिट्टी- इसमें PH मान 7 से अधिक होता है। उपचार- जिप्सम, रॉक फास्फेट
- उदासीन/उपजाऊ मिट्टी- इसमें PH मान 7 से कम होता है।
- अम्लीय मिट्टी, उपचार- चूना, फास्फोरस
मृदा की समस्या
मृदा अपरदन
यह मृदा की सबसे हानिकारक समस्या है जो जल के प्रभाव से मृदा की ऊपरी सतह से पोषक तत्व तथा मृदा का अत्यधिक कटाव कर देती है जिसके कारण जैविक तत्व नष्ट हो जाते हैं। इस अपरदन को रेंगती हुई मृत्यु, कृषि क्षय रोग/कृषि का प्रथम शत्रु के नाम से भी जाना जाता है।
मृदा अपरदन के निम्न प्रकार हैं-
1. अवनालिका अपरदन
इस प्रकार का अपरदन भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में होता है जिसके कारण मिट्टी का अत्यधिक कटाव होता है और इस क्षेत्र में गहरे खड्डे पड़ जाते हैं जिसे अवनालिका अपरदन कहते हैं।
इस प्रकार का अपरदन सर्वाधिक रूप से कोटा, सवाई माधोपुर, करौली, धौलपुर में होता है।
यह अपरदन सर्वाधिक हानिकारक होता है जो राज्य में चंबल नदी द्वारा किया जाता है।
2. उत्खात भूमि
जल के द्वारा अपरदन करने से अवनालिका एवं बीहड़ का निर्माण होता है जिससे भूमि उबड़-खाबड़ हो जाती है, जिसे उत्खात भूमि/बैडलैण्ड टोपोग्राफी कहते है।
बीहड़ से प्रभावित क्षेत्र 4500 वर्ग किमी है जो कोटा से इटानगर तक विस्तारित है। राज्य में इसका सर्वाधिक विस्तार कोटा, सवाईमाधोपुर, धौलपुर में है। इस प्रकार को लम्बवत् अपरदन भी कहते हैं।
3. वायु अपरदन
पश्चिमी राजस्थान में अत्यधिक गति से चलने वाली वायु के द्वारा मृदा एक स्थान से दूसरे स्थान तक चली जाती है तो इस प्रकार के अपरदन को वायु अपरदन कहते हैं।
वायु अपरदन निक्षेप का साधन भी है। इस प्रकार के अपरदन को क्षैतिज अपरदन के नाम से भी जाना जाता है जो जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर, चूरू, सीकर जिलों में सर्वाधिक होता है।
इन जिलों में हमें विभिन्न प्रकार के बालुका स्तूप या रेत के टीले देखने को मिलते हैं जो वायु के द्वारा निर्मित होते हैं।
4. आवरण अपरदन
अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में वर्षा के कारण भूमि की ऊपरी परत से पोषक तत्व बहकर निकल जाते हैं जिसके कारण भूमि कृषि योग्य नहीं रह पाती है जिसको आवरण अपरदन कहते हैं।
इस प्रकार का अपरदन वर्षा ऋतु में अरावली पर्वतीय प्रदेशों के पूर्वी भागों में अत्यधिक होता है क्योंकि यह अतिवृष्टि क्षेत्र में पड़ता है। इस प्रकार के अपरदन को चादरी अपरदन भी कहते है तथा यह सिरोही, राजसमंद, उदयपुर में अत्यधिक होता हैं।
मृदा अपरदन के कारण
थार के मरूस्थल में अत्यधिक पवन की गति के घर्षण के कारण।
मानवीय कारकों के द्वारा जैसे - अत्यधिक वनों की कटाई, अनुचित भू-प्रबंधन, अत्यधिक पशुचारण, अवैज्ञानिक तरीके से कृषि, खनन तथा अत्यधिक सिंचाई में अपरदन के द्वारा।
प्राकृतिक संसाधनों का अधिक रूप से उपयोग होने के कारण पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
अत्यधिक वर्षा के कारण जल तीव्र गति से प्रभावित होता है जिसके कारण मिट्टी के कण एक जगह से दूसरे जगह चले जाते हैं जो मृदा के अपरदन में सहायक होते हैं।
मृदा अपरदन की हानियाँ
मृदा का लगातार अपरदन होने से भूमि कृषि योग्य नहीं रहती है जिसके कारण कृषि के उत्पादन एवं उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
मृदा के लगातार अपरदन होने से रेगिस्तानी क्षेत्र से लगातार मरूस्थल का प्रसार हो रहा है जो मरूस्थलीकरण के लिये उत्तरदायी कारक है जिसके कारण सूखा तथा अकाल की समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं जैसे- 2013 में राजस्थान यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के अनुसार 5 नए जिले मरूस्थल की चपेट में हैं, जयपुर, अलवर, अजमेर, सिरोही, राजसमंद।
मृदा अपरदन के कारण सांस्कृतिक तथा आर्थिक विकास पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।
मृदा के लगातार अपरदन होने से वनस्पतियों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है जिसके कारण वन्य जीवों का जीवन भी दुष्प्रभावित हुआ है।
मृदा अपरदन के द्वारा नदियों तथा तालाबों में गाद का निर्माण हो जाता है जो एक गंभीर समस्या है।
मृदा अपरदन की समस्या को दूर करने के निम्न उपाय हैं-
- कृषि प्रणाली में सुधार:- कृषि प्रणाली में सुधार करके हम इसे रोक सकते हैं जैसे - मेड़बंदी करना, लैग्युम परिवार की कृषि, फसल चक्रण, ढाल के विपरीत कृषि, पट्टीदार कृषि, सीढ़ीनुमा कृषि इत्यादि।
- बहते हुए पानी को रोकने के लिए मेड़बंदी करना जिससे बहते हुए पानी को रोकने से मृदा अपरदन को रोका जा सकता है।
- बंजर भूमि पर वृक्षारोपण के साथ-साथ पशुओं की चराई पर भी नियंत्रण रखा जा सके।
- पशुओं को चराने के लिए चारागाहों का विकास किया जाना चाहिए।
- समोच्चय कृषि को बढ़ावा देना चाहिए।
मृदा से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण तथ्य निम्न हैं-
- राजस्थान की मिट्टियों में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस की कमी होती है।
- राजस्थान का 43.37 प्रतिशत भाग पवन अपरदन से ग्रसित है।
- सर्वाधिक पवन अपरदन- जैसलमेर।
- कम पवन अपरदन- धौलपुर।
- सर्वाधिक पवन अपरदन जून में होता है।
- पवन अपरदन सूचकांक वाले जिले- सीकर, अजमेर, सांभर (जयपुर)।
- सर्वाधिक बीहड़ भूमि वाले जिले- कोटा, सवाईमाधोपुर।
भूमि अवनयन
मिट्टी की उत्पादन, उत्पादकता तथा उसकी गुणवत्ता कम होना ही भूमि अवनयन है, जिसके निम्न कारण है-
अत्यधिक सिंचाई, अधिक पशु चारण, वनों का कटाव, मृदा में क्षारियता तथा लवणवता में वृद्धि होना, वायु अपरदन, मरूस्थलीकरण, अधिक खनन, औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थ तथा रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशक दवाईयों का प्रयोग करना।
भू-प्रबन्ध विभाग - जयपुर
भू-प्रबन्ध विभाग, राजस्थान, जयपुर वर्तमान में 11 भू-प्रबन्ध अधिकारी कार्यालय, जयपुर, अलवर, भरतपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा, जोधपुर, बीकानेर, अजमेर, टोंक, सीकर एवं कोटा मुख्यालय पर कार्यरत हैं।
वर्तमान स्थिति- राज्य में 113 मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएँ स्थापित है जिसमें से 101 स्थिर प्रयोगशालाएँ एवं 12 भ्रमणशील प्रयोगशालाएँ हैं।
नेशनल मिशन फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर राष्ट्रीय स्तर पर सॉयल हैल्थ कार्ड योजना का 19 फरवरी, 2015 को माननीय प्रधानमंत्री महोदय द्वारा उद्घाटन किया गया।






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