राजस्थान की वनस्पति
इस लेख में राजस्थान की वनस्पति और वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी संपूर्ण जानकारी दी गई है। इसमें राज्य की विभिन्न वन नीतियों, वनों के वैधानिक वर्गीकरण और नवीनतम 18वीं वन रिपोर्ट के महत्वपूर्ण आँकड़ों को शामिल किया गया है। साथ ही, राजस्थान के प्रमुख वृक्षों (जैसे खेजड़ी, रोहिड़ा), घासों, जैविक उद्यानों और पर्यावरण संरक्षण के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाओं के बारे में विस्तार से बताया गया है।
- भारत में सर्वप्रथम वन नीति - 1894
- स्वतंत्र भारत की प्रथम वन नीति - 1952
- इसमें संशोधन - 1988 में किया गया।
- राजस्थान की प्रथम वन नीति - फरवरी, 2010
राजस्थान वन अधिनियम 1953 के प्रावधानों के अनुरूप वैधानिक दृष्टि से उक्त वन क्षेत्र को आरक्षित वन, रक्षित वन और अवर्गीकृत वन के रूप में वर्गीकृत किया गया हैं।
वन विभाग : एक नजर में
- यह आँकड़े राजस्थान वन विभाग के आधार पर है (31 मार्च, 2024 तक)
- प्रदेश का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल- 3,42,239 वर्ग किमी.
- कुल भौगोलिक क्षेत्र का प्रतिशत वन क्षेत्र- 9.64%
- राज्य पशु- चिंकारा एवं ऊँट (पालतु)
- राज्य पक्षी- गोडावण
- राज्य वृक्ष- खेजड़ी
- राज्य पुष्प- रोहिड़ा
- राष्ट्रीय उद्यान- 3
- वन्यजीव अभयारण्य- 26
- बाघ परियोजनाएँ- 5 (रणथम्भौर, सरिस्का, मुकन्दरा हिल्स, रामगढ़ विषधारी, धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व)
- रामसर स्थल- 2 (केवलादेव नेशनल पार्क एवं सांभर झील)
- कुल प्रादेशिक मण्डल- 38
- वन्यजीव मण्डल- 16
वैधानिक दृष्टि से राज्य में वनों की स्थिति
प्रदेश में कुल अभिलेखित वनक्षेत्र (Recorded forest Area) 33014 वर्ग किमी. है जो राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का 9.64% है। राजस्थान वन अधिनियम 1953 के प्रावधानों के अनुरूप वैधानिक दृष्टि से उक्त वन क्षेत्र को निम्नानुसार वर्गीकृत किया गया है-
| वैधानिक स्थिति | क्षेत्रफल ( वर्ग किमी. ) | प्रतिशत | सर्वाधिक |
|---|---|---|---|
| आरक्षित वन (Reserved Forest) | 12198.71 | 36.95% | उदयपुर, चित्तौड़गढ़, अलवर |
| रक्षित वन (Protected Forest) | 18631.13 | 56.43% | बारां, करौली, उदयपुर |
| अवर्गीकृत वन (Unclassified Forest) | 2184.16 | 6.62% | बीकानेर, श्रीगंगानगर, जैसलमेर |
राजस्थान में सर्वाधिक वन-
(1) उदयपुर (2) बारां (3) करौली
राजस्थान में कम वन-
(1) चुरु (2) हनुमानगढ़ (3) नागौर
सर्वाधिक प्रतिशत में वन-
(1) प्रतापगढ़ (2) उदयपुर (3) करौली
कम प्रतिशत में वन-
(1) चूरू (2) जोधपुर (3) नागौर
झाड़ी क्षेत्र
सर्वाधिक झाड़ी वन- पाली, करौली, जयपुर
कम झाड़ी वन- हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, चूरू
भारतीय वन रिपोर्ट 2023
- वन रिपोर्ट तैयार की जाती है- भारतीय वन सर्वेक्षण (F.S.I.- Forest Survey of India) -
- स्थापना- 1 जून, 1981
- मुख्यालय- देहरादून (उत्तराखंड)
इसके 4 क्षेत्रीय कार्यालय है-
- शिमला (हिमाचल प्रदेश)
- कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
- नागपुर (महाराष्ट्र)
- बैंगलुरु (कर्नाटक)
उद्देश्य- वन संसाधनों का सर्वेक्षण व आकलन करना।
- प्रथम वन रिपोर्ट जारी- 1987 (प्रति 2 वर्ष बाद जारी होती है)
- 18वीं वन रिपोर्ट जारी- 21 दिसम्बर, 2024
- जारीकर्ता- पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भारत सरकार के मंत्री भूपेन्द्र सिंह द्वारा
वनावरण/वन क्षेत्र (Forest Cover)
- वृक्ष घनत्व 10% से अधिक तथा क्षेत्रफल 1 हेक्टेयर से अधिक
- आधारित- सुदूर संवेदन उपग्रह आंकड़ों पर व फील्ड आधारित राष्ट्रीय वन इन्वेंट्री
- वन रिपोर्ट में जानकारी- वनावरण, वृक्षावरण, कच्छ वनस्पति आवरण, वनों में कार्बन स्टॉक, वनाग्नि घटनाएँ, कृषि वानिकी
नवीनतम वन रिपोर्ट (18वीं) के अनुसार राजस्थान की वन रिपोर्ट से संबंधित आँकड़े निम्न है-
- अभिलेखित वन- 32,869 वर्ग किमी. (राजस्थान के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 9.60% है)
- अभिलेखित वन क्षेत्र की दृष्टि से राजस्थान का देश में 15 वाँ स्थान है।
- अभिलेखित वन के अन्तर्गत वनावरण: 12706.14 वर्ग किमी.
- अभिलेखित वन के बाहर वनावरण: 3842.07 वर्ग किमी.
- वनावरण- 16548.21 वर्ग किमी. (4.84%)
- वृक्षावरण- 10841.12 वर्ग किमी. (3.16%)
- राजस्थान का वनावरण तथा वृक्षावरण है- 27389.33 वर्ग किमी.
- वनावरण में कमी- 83.80 वर्ग किमी.
- वृक्षावरण में वृद्धि- 478.26 वर्ग किमी.
- राज्य के वनावरण एवं वृक्षावरण में वृद्धि 394.46 वर्ग किमी. दर्ज की गई है।
नोट- वन एवं वृक्ष आवरण में अधिकतम वृद्धि दर्शाने वाले राज्य है-
- छत्तीसगढ़- 684 वर्ग किमी.
- उत्तर प्रदेश- 559 वर्ग किमी.
- ओडिशा- 559 वर्ग किमी.
- राजस्थान- 394 वर्ग किमी. (राजस्थान का स्थान 4th है।)
नवीनतम वन रिपोर्ट के आंकड़े निम्न हैं-
| राज्य के सर्वाधिक वनावरण वाले जिले | कम/न्यूनतम वनावरण वाले जिले |
|---|---|
| 1. उदयपुर- 2766.30 वर्ग किमी. | 1. चूरू- 62.73 वर्ग किमी. |
| 2. अलवर- 1198.74 वर्ग किमी. | 2. हनुमानगढ़- 92.29 वर्ग किमी. |
| 3. प्रतापगढ़- 996.86 वर्ग किमी. | 3. जोधपुर- 111.23 वर्ग किमी. |
| 4. चित्तौड़गढ़- 988.08 वर्ग किमी. | 4. श्रीगंगानगर- 113.46 वर्ग किमी. |
| राज्य के सर्वाधिक वनावरण प्रतिशत वाले जिले हैं | कम/न्यूनतम वनावरण प्रतिशत वाले जिले हैं |
| 1. उदयपुर- 23.60% | 1. चूरू- 0.45% |
| 2. प्रतापगढ़- 22.48% | 2. जोधपुर- 0.49% |
| 3. सिरोही- 17.50% | 3. बीकानेर- 0.86% |
| 4. करौली- 15.18% | 4. जैसलमेर- 0.89% |
| राज्य में सर्वाधिक वन क्षेत्रफल में वृद्धि जिले हैं | राज्य में वन क्षेत्रफल में कमी वाले जिले हैं |
| 1. सीकर- 19.14 वर्ग किमी. | 1. बाराँ- 33.29 वर्ग किमी. |
| 2. बाड़मेर- 19 वर्ग किमी. | 2. प्रतापगढ़- 30.79 वर्ग किमी. |
| 3. अलवर- 16.39 वर्ग किमी. | 3. अजमेर- 18.34 वर्ग किमी. |
| 4. उदयपुर- 12.46 वर्ग किमी. | 4. बीकानेर- 14.85 वर्ग किमी. |
| राज्य के सर्वाधिक झाड़ी क्षेत्र जिले हैं | कम/न्यूनतम झाड़ी क्षेत्र जिले हैं |
| 1. पाली- 453 वर्ग किमी. | 1. हनुमानगढ़- 9 वर्ग किमी. |
| 2. अलवर- 321 वर्ग किमी. | 2. श्रीगंगानगर- 16 वर्ग किमी. |
| 3. जयपुर- 319 वर्ग किमी. | 3. चूरू- 36 वर्ग किमी. |
| राज्य में सर्वाधिक वन अग्नि घटनाएँ | न्यूनतम वन अग्नि घटनाएँ- |
| 1. उदयपुर | 1. जयपुर |
| 2. प्रतापगढ़ | 2. चूरू |
| 3. डूंगरपुर | 3. टोंक |
| 4. राजसमंद |
- MODIS सेंसर (मोडरेट रिजॉल्यूशन इमेजिंग स्पेक्ट्रोरेडियोमीटर)
- उद्देश्य- वनाग्नि की पहचान करना
- राज्य में नवम्बर 2023 से जून 2024 तक 429.47 वर्ग किमी. वनाग्नि क्षेत्र है।
- राजस्थान का वनों एवं वृक्षों से आच्छादित क्षेत्रफल 27,389.33 वर्ग किमी. है जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 8 प्रतिशत है।
- राज्य के वनों की दशकीय वृद्धि (2013 से 23 तक) 2.87% है।
- इस वन रिपोर्ट में 12 जिलों के वनों में वृद्धि तथा 21 जिलो के वनों में कमी दर्ज की गई है।
- 12-जिलो के वनों में वृद्धि दर्ज की गई है जो निम्न है: अलवर, बाड़मेर, बूँदी, चित्तौड़गढ़, जैसलमेर, जोधपुर, कोटा, श्रीगंगानगर, सीकर, सिरोही, टोंक, उदयपुर।
राजस्थान में सर्वाधिक वृक्ष मिलते हैं-
- एनोजिस पंडूला (धोक)
- ब्यूटिया मोनोस्पर्मा (पलाश)
- टेक्टोना ग्रेडिंस (सागवान)
राजस्थान में ग्रामीण क्षेत्र में सर्वाधिक वृक्ष मिलते हैं-
- प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा (अंग्रेजी बबूल)
- प्रोसेसिप सिनेरेरिया (खेजड़ी)
- जिजिफस मॉरिटियाना (बेर)
राजस्थान में शहरी क्षेत्र में सर्वाधिक वृक्ष मिलते हैं-
- प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा (अंग्रेजी बबूल)
- एजाडिरिक्टा इंडिका (नीम)
- अकेशिया निलोटिका (देशी बबूल)
| सर्वाधिक | भौगोलिक क्षेत्र का प्रतिशत | |
|---|---|---|
| अत्यधिक सघन वन (VDF-Very Dense Forest (> 70% Crop Density)) | अलवर | 0.07 |
| मध्यम सघन वन (MDF- Moderately Dense Forest (40-70% Crop Density)) | उदयपुर | 1.24 |
| खुले वन (OF- Open Forest (10-40% Crop Density)) | उदयपुर | 3.53 |
| कुल | 4.84 | |
| झाड़ी (< 10% Crop Density) | 1.60 |
- नवीनतम वन नीति- 1988
- वन नीति के अनुसार - कुल भौगोलिक क्षेत्र के - 33%, पर्वतीय क्षेत्र- 60-65% तथा मैदानी भागों में 20% से अधिक वन होने चाहिए।
- राजस्थान ने अपनी पहली वन नीति- फरवरी 2010 में घोषित की, यह नीति घोषित करने वाला देश का प्रथम राज्य है।
राजस्थान के बायोलॉजिकल पार्क निम्न हैं-
| पार्क का नाम | उद्घाटन तिथि |
|---|---|
| सज्जनगढ़ जैविक उद्यान, उदयपुर | 12 अप्रैल, 2015 |
| माचिया जैविक उद्यान, जोधपुर | 20 जनवरी, 2016 |
| नाहरगढ़ जैविक उद्यान, जयपुर | 4 जून, 2016 |
| अभेडा जैविक उद्यान, कोटा | 18 दिसम्बर, 2021 |
- बीकानेर में मरूधरा जैविक उद्यान व अजमेर में पुष्कर जैविक उद्यान विकसित किये जा रहे हैं।
वनों का वर्गीकरण निम्न दो प्रकार से हैं
- जलवायु के आधार पर
- प्रशासनिक आधार पर
जलवायु के आधार पर वनों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से है-
1. शुष्क/अर्द्ध शुष्क/कांटेदार वन
- यह राजस्थान के 6.15% भाग पर विस्तारित है।
- वर्षा- 25-40 सेंटीमीटर
- राजस्थान के उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र में विस्तारित है।
- जिले- यह मुख्यतः मरूस्थली जिलों में विस्तारित है।
- जैसे- जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, बालोतरा, जोधपुर, फलौदी, नागौर, डीडवाना-कुचामन इत्यादि।
- विशेषता- शुष्क कांटेदार और पत्तियाँ छोटी होती हैं।
- मुख्य वृक्ष- कैर, बैर, खेजड़ी, रोहिड़ा, नागफनी, बबूल इत्यादि।
2. उष्ण कटिबंधीय मानसूनी/मिश्रित पतझड़ वन
- कुल क्षेत्र का 28.42 प्रतिशत
- औसत वर्षा - 50-80 सेंटीमीटर
- इन्हें 'शुष्क मानसूनी वन' कहा जाता है।
- इस प्रकार के वन मार्च-अप्रैल में पत्तियाँ गिरा देते हैं।
- मुख्य वृक्ष - धौंक, खैर, ढांक, साल, बाँस, हरड, बहेड़, आंवला, अमलताश, शीशम, नीम, महुआ, पीपल, अशोक।
- जिले - अजमेर, अलवर, डीग, भरतपुर, दौसा, बूंदी, उदयपुर, बाँसवाड़ा, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा व सवाई माधोपुर।
- इस प्रकार की वनों की औसत ऊँचाई 10-21 मीटर होती है।
3. शुष्क सागवान वन
- इस प्रकार के वन दक्षिणी राजस्थान में सर्वाधिक पाये जाते हैं।
- इस प्रकार के वनों का भौगोलिक क्षेत्रफल पर 6.87% भाग है।
- वर्षा - 75-100 सेंटीमीटर
- जिले - बाँसवाड़ा, उदयपुर, सलूम्बर, डूंगरपुर, कोटा, बूंदी।
- मुख्य वृक्ष - वूलर, आम, तेंदू, बरगद, महुआ।
4. उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन
- यह 0.38% भाग पर विस्तारित है।
- औसत वार्षिक वर्षा - 150 सेंटीमीटर
- सर्वाधिक - माउंट आबू (सिरोही)
- वृक्ष - बाँस, आम इस प्रकार के वनों में विशेष प्रकार की वनस्पति जिसे 'डिक्लिप्टेरा आबुएन्सिस' कहते हैं, पायी जाती है। यह वनस्पति विश्व में केवल यहीं पायी जाती है।
- सालर वृक्ष - उदयपुर, सलूम्बर, सिरोही, चित्तौड़, अलवर और अजमेर क्षेत्र में।
- इस प्रकार के वनों में लेण्टाना व कारा नामक जहरीले पादप पाए जाते हैं।
- इस प्रकार के वनों में सर्वाधिक जैव विविधता पायी जाती है।
5. उष्णकटिबंधीय धौंक वन
- यह वनस्पति 30 से 60 सेंटीमीटर वर्षा वाले क्षेत्र में पायी जाती है।
- इसका विस्तार कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 58.19% भाग पर है।
- इनका विस्तार मुख्यतः शुष्क तथा अर्द्धशुष्क मरूस्थलीय जिलों को छोड़कर अन्य सभी जिलों में है।
प्रशासनिक आधार पर वनों का वर्गीकरण
- आरक्षित वन - इस प्रकार के वनों पर सरकार का नियंत्रण होता है तथा इनमें पशुचारण तथा कटाई नहीं की जा सकती है।
- संरक्षित वन - इस प्रकार के वनों में सरकार की अनुमति के आधार पर पशुचारण तथा कटाई सम्भव है।
- अवर्गीकृत वन - इस प्रकार के वनों में पशुचारण तथा कटाई सम्भव है।
राजस्थान के प्रमुख वनों की सामान्य जानकारी
1. खेजड़ी (प्रोसोपिस सिनेरिया)
- राज्य वृक्ष का दर्जा - 31 अक्टूबर 1983
- स्थानीय नाम - जांटी
- केन्द्रीय शुष्क बागवानी अनुसंधान संस्थान बीकानेर के द्वारा थार शोभा खेजड़ी की कांटे रहित किस्म विकसित की है।
- प्राचीन नाम (वेदों में) - शमी
- राजस्थानी भाषा में इसको सीमलो कहते हैं।
- इसके फल को सांगरी कहते हैं।
- इसकी पत्तियों को लूम कहा जाता है।
- राज्य के लगभग 2/3 भाग पर खेजड़ी के वृक्ष है।
- इसकी पूजा विजयादशमी के दिन शीतला माता के प्रतीक के रूप में की जाती है।
- इस वृक्ष के नीचे गोगाजी और झुंझार जी के थान होते हैं।
- इसको कन्नड़ भाषा में बन्ना/बन्नी, तमिल भाषा में पेयमेय, सिंधी भाषा में छोकड़ो कहते हैं।
- इसको राजस्थान का कल्प वृक्ष तथा राजस्थान का गौरव कहते हैं।
- खेजड़ी दिवस 12 सितंबर को मनाया जाता है तथा प्रथम खेजड़ी दिवस 12 सितंबर 1978 को मनाया गया।
- सर्वाधिक खेजड़ी के वृक्ष शेखावाटी क्षेत्र में पाये जाते हैं। जबकि सर्वाधिक खेजड़ी वृक्ष नागौर, डीडवाना-कुचामन जिले में पाये जाते हैं।
2. रोहिड़ा (टिकोमैला अंडुलेटा)
- राज्य पुष्प का दर्जा - 31 अक्टूबर 1983
- उपनाम - रेगिस्तान का सागवान
- इसको राज्य की मरू शोभा के नाम से जाना जाता है।
- यह मारवाड़ का टीका भी कहलाता है।
- इसका उपयोग बंदूक की बट बनाने में किया जाता है।
3. महुआ (मधुका लोंगोफोलिया)
- इसको आदिवासियों का कल्प वृक्ष कहते हैं।
- महुआ की मदिरा विश्व की एकमात्र फूलों के उपयोग से बनाई जाने वाली मदिरा है। राजस्थान में महुआ के पेड़ डूंगरपुर, प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़, बाँसवाड़ा, राजसमंद, देवगढ़, बारां के जनजाति क्षेत्रों में पाये जाते हैं। भारत में जनजातीय क्षेत्रों के 75 प्रतिशत से अधिक लोग महुआ के फूलों तथा इससे संबंधित व्यवसायों से जुड़े हैं। महुआ के पेड़ जनजातीय लोगों के जीवन की धुरी है, जो कि उन्हें भोजन, औषधि तथा रोजगार प्रदान करता है।
4. ढाक/पलाश (ब्यूटीया मोनोस्पर्मा)
- इस वृक्ष को जंगल की ज्वाला भी कहते हैं।
- सर्वाधिक राजसमंद, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, उदयपुर जिलों में पाया जाता है।
5. बाँस (बेम्बूसोईदाय)
- इस वृक्ष को आदिवासियों का हरा सोना भी कहते हैं।
- बाँस की खेती को बढ़ावा देने हेतु इसे घास की श्रेणी में रखा गया है।
6. तेंदू (डाइऑस्पिरॉस मेलैनोजाइलम)
- इस वृक्ष के फल को टिमरू कहते हैं।
- इसके पत्तों का उपयोग बीड़ी बनाने में भी किया जाता है।
- इसके फल को वागड़ का चीकू कहते हैं।
7. खैर (सेनेगलिया कटेचू)
इससे कत्था तैयार किया जाता है।
8. धौकड़ा (एनोजिस पंडुला)
- राजस्थान में सर्वाधिक वनों में यही वृक्ष पाया जाता है
- जिले - सवाई माधोपुर, उदयपुर, प्रतापगढ़।
- इसकी उपलब्धता विंध्य कगार क्षेत्र में अधिक है।
9. अर्जुन वृक्ष (टर्मीनेलिया अर्जुना)
इसमें लेसीफर लक्का कीट पाया जाता है। जिसके द्वारा रेशम प्राप्त किया जाता है।
यह कृत्रिम रेशम ट्रेसर विधि द्वारा प्राप्त किया जाता है।
यह सर्वाधिक हाडौती क्षेत्र में पाया जाता है।
10. शहतूत (मोरस अल्बा)
शहतूत का उपयोग रेशम उत्पादन में किया जाता है।
11. आँवला (फिलेन्थस एम्ब्लिका)
आँवला का उपयोग औषधीय उपयोग में किया जाता है।
सर्वाधिक - अजमेर, उदयपुर, सलूम्बर, डूंगरपुर।
12. दस्मक/चैती गुलाब
सर्वाधिक - खमनोर (राजसमंद)
13. होहोबा जोजोबा (सिमंडसिया चाइनेसिस)
- मूल स्थान- एरिजोना, मैक्सिको ( U.S.A )
- उपनाम- राजस्थान का पीला सोना
- इजराइल की सहायता से भारत लाया गया।
- इसके दो प्लांट- (i) ढंढ (जयपुर) (ii) फतेहपुर (सीकर)
- इसका झंझर (बीकानेर) में प्लांट निर्माणाधीन है।
- इसका उपयोग ईंधन, सौंदर्य प्रसाधन में किया जाता है।
14. रतनजोत (जेट्रोपा) (अल्काना टिन्कटोरिया)
- निर्माण- बायो-डीजल
- रतनजोत में भारत का प्रथम प्लांट नालकोंडा (आंध्र प्रदेश) में स्थापित किया गया जबकि राजस्थान का प्रथम प्लांट कढलवास (उदयपुर) में स्थापित किया गया।
- प्लांट का नियंत्रण बायो फ्यूल ऑथोरिटी के द्वारा किया जाता है।
15. जामुन- (शायजियम क्यूमिनी) माउंट आबू, सिरोही
- यह मधुमेह के लिए उपयोगी।
16. सालर वृक्ष
सालर वृक्ष सर्वाधिक उदयपुर में मिलता है।
17. चिरमी- (एब्रोसप्रोकेटोरियस)
हृदय घात के लिए औषधी के रूप में उपयोग में लाई जाती है।
18. सफेद मूसली और काली मूसली (क्लोरोफायटम बोरिविलिएनम) (दक्षिण राजस्थान)
पौरूष शक्ति के लिए उपयोगी होता है।
19. ऐलोवेरा/ग्वारपाठा
इसकी कृषि बीकानेर संभाग में सर्वाधिक होती है।
राजस्थान की प्रमुख घासें निम्न हैं-
1. सेवण पश्चिम राजस्थान
वानस्पतिक नाम-लेसीभुरम सिडिकंस
इसको गोडावण की प्रजनन स्थली कहते हैं।
सेवण घास सुख जाने पर इसे लिलोग कहते हैं।
राज्य में सबसे लम्बी घास जिसे मरूस्थलीय क्षेत्र में घास का राजा कहते हैं।
यह पशुओं के लिए सबसे पौष्टिक घास है।
यह लाठी सीरिज पर सर्वाधिक मिलती है।
2. खस इत्र बनाने में उपयोगी (भरतपुर)
यह सुगंधित घास है, जो भरतपुर, सवाईमाधोपुर, करौली, टोंक में मिलती है।
उपयोगी-इत्र, शरबत निर्माण में।
3. बुर- बीकानेर
राज्य की सबसे अधिक सुगंधित घास है।
विस्तार- बीकानेर (नोखा, देशनोक, कोलायत, श्रीडूंगरगढ़ चूरू, सरदारशहर)
4. मैथा/मोथिया भरतपुर
5. ऐंच- भरतपुर
6. धामण- धनुष बनाने में उपयोगी।
सुखा सहनशील घास है, दुधारू पशुओं तथा मधुमेह रोग के लिए उपयोगी है।
7. भूरट/भरूत- यह कांटेदार घास है।
मरूस्थलीय प्रदेश में मृदा क्षरण के लिए उपयोगी है।
गोखरू/कांटी/भाखडी-कांटेदार घास जिसे ऊँट खाते हैं।
8. डाब- सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण के समय सूतक से बचने के लिए काम में ली जाती है।
प्रमुख वृक्ष
- आराध्य वृक्ष - वंश
- पीपल - चौहान
- वट वृक्ष - कच्छवाहा
- नीम - राठौड़
- खेजड़ी - तँवर/ तोमर
- कदंब वृक्ष - यादव
- अशोक - हाड़ा चौहान
वन संरक्षण पुरस्कार
अमृता देवी पुरस्कार
शुरुआत-1994
उद्देश्य- वृक्षारोपण, वन सुरक्षा
अमृता देवी के द्वारा दिया गया बलिदान बिश्नोई सम्प्रदाय में साका खडाणा के नाम से जाना जाता है।
यह बलिदान सन् 1730 ई. (विक्रम संवत् 1787) में जोधपुर के शासक अभय सिंह के शासनकाल में हुआ।
अमृतादेवी पुरस्कार सर्वप्रथम गंगाराम बिश्नोई को 1997 में दिया गया।
राज्य स्तरीय (राजीव गाँधी पर्यावरण)
गाँधी पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार
शुरुआत-2012
वृक्षारोपण कार्यक्रम
मरूस्थल वृक्षारोपण कार्यक्रम- शुरुआत- 1978
सामाजिक वानिकी योजना- 1985-86
वानिकी विकास योजना- 1995
राज्य वानिकी योजना- 1996-2016 (20 वर्षीय कार्यक्रम)
राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता परियोजना सहयोग- JICA
- शुरुआत- 2003
- चरण- प्रथम चरण (फेज- I)- 2003-2010, इसमें 18 जिले चयनित हैं।
- दूसरा चरण (फेज- II)- 2011-2019, इसमें 15 जिले चयनित हैं।
- दस मरूस्थलीय जिले (सीकर, झुंझुनूँ, चूरू, जालौर, बाड़मेर, जोधपुर, पाली, नागौर, जैसलमेर, बीकानेर) एवं पाँच गैर मरूस्थलीय जिले (बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, भीलवाड़ा, सिरोही, जयपुर) तथा सात वन्यजीव संरक्षित क्षेत्रों (कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य, फुलवाड़ी की नाल वन्यजीव अभयारण्य, जयसमन्द वन्यजीव अभयारण्य, सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य, बस्सी वन्य जीव अभयारण्य, केलादेवी वन्यजीव अभयारण्य, रावली टॉडगढ़ वन्यजीव अभयारण्य) में क्रियान्वित की जा रही है।
नोट- राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता विकास परियोजना (R.F.B.D.P.- Rajasthan Forestry and Biodiversity Development Project)
- सहयोग- एजेंसी फ्रांसेइस डी डेवलपमेंट (ए.एफ.डी.)- ए.एफ.डी. फ्रांस की सरकारी एजेंसी है जो विकासशील देशों में आर्थिक एवं सामाजिक विकास को बढ़ावा देती है।
- अवधि- 2023-24 से 2030-31 (8 वर्षों तक)
- राज्य के 13 जिलों में क्रियान्वित की जा रही है। जैसे- अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवाईमाधोपुर, जयपुर, दौसा, कोटा, बूंदी, बाराँ, झालावाड़, टोंक, भीलवाड़ा।
- उद्देश्य- जैव-विविधता तथा वन संसाधनों का संवर्धन करना ताकि जलवायु परिवर्तन से निपटा जा सके। जो समुदाय सशक्तिकरण के माध्यम से किया जाएगा।
- मानव गतिविधियों का जैव-विविधता पर प्रभाव, स्थायी पारिस्थितिकी तंत्र का प्रचार करती है।
हरित राजस्थान योजना
- शुरुआत-2009
- यह एक पंचवर्षीय योजना थी।
- अवधि-2009-2014
वन-धन योजना- शुरुआत
- शुरुआत- 14 अप्रैल, 2018
- इसमें चयनित- माउंट आबू, कुंभलगढ़ वन्य जीव अभयारण्य
- जवाई, रणथम्भौर टाइगर रिजर्व, राष्ट्रीय मरू उद्यान हैं।
वनस्पति एवं वन्य जीवों के संरक्षण संबंधित कानूनी अधिनियम
- वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम - 1972
- बाघ संरक्षण अधिनियम - 1973
- क्रोकोडाइल (मगरमच्छ) संरक्षण अधिनियम - 1975
- वन संरक्षण अधिनियम - 1980
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम - 1986
- हाथी संरक्षण अधिनियम - 1992
- जैव-विविधता संरक्षण अधिनियम - 2002
- डॉल्फिन संरक्षण अधिनियम - 2009 नोट: डॉल्फिन राष्ट्रीय जीव घोषित - 2010
- राजस्थान राज्य जैव-विविधता बोर्ड - 14 सित. 2010
प्रमुख वन एवं पर्यावरण दिवस
- जीव जन्तु पखवाड़ा - 14 जनवरी से 31 जनवरी
- विश्व वानिकी दिवस - 21 मार्च
- विश्व जल दिवस - 22 मार्च
- विश्व पृथ्वी दिवस - 22 अप्रैल
- विश्व जैव-विविधता दिवस - 22 मई
- विश्व पर्यावरण दिवस - 5 जून
- विश्व ओजोन दिवस - 16 सितम्बर
- वन्य जीव सप्ताह - 2 अक्टूबर से 7 अक्टूबर
- वन उत्सव - जुलाई-अगस्त
वनस्पति की प्रमुख शाखाएँ
- मरूद्भिद वनस्पति- इस प्रकार की वनस्पति मरूस्थली क्षेत्रों में पायी जाती है जैसे राज्य के पश्चिम भाग में। इस प्रकार की वनस्पतियाँ काँटेदार व वृक्षों के रूप में पायी जाती है जैसे- कैर, फोग, नागफनी, झाड़ियाँ, थोर, केक्टस इत्यादि।
- लवणोद्भिद्- इस प्रकार की वनस्पति राज्य में सांभर तथा लूणी बेसिन के अन्तर्गत पायी जाती है जैसे- नीलहरित शैवाल लवणीय वनस्पति।
- शैलोद्भिद- इस प्रकार की वनस्पति चट्टानी क्षेत्रों में पायी जाती है।
- अधिपादप - इस प्रकार की वनस्पतियों में वृक्षों के ऊपर बेल एवं फूलों के रूप में स्वतंत्र रूप से विकसित होते हैं। इस प्रकार की वनस्पतियाँ सरिस्का वन्यजीव अभयारण्य में सर्वाधिक पाई जाती है जैसे- 'स्कार्लेट रेडफ्लावर'। इस प्रकार की वनस्पति को एयर प्लांट के नाम से भी जाना जाता है।
- जलोद्भिद् - इस प्रकार की वनस्पति जल से ढकी हुई मृदा में पाई जाती है।
- क्रायोफाइट्स- हिमोद्भिद् प्रकार की वनस्पति
- शीतोद्भिद्- यह अत्यधिक बर्फीले क्षेत्रों में पाई जाती है जैसे टुण्ड्रा प्रदेश।
- समोद्भिद् - यह सामान्य तापमान तथा आर्द्रता वाली वनस्पति है।
राजस्थान की प्रमुख औषधि वनस्पतियाँ
| वनस्पति | प्राप्ति स्थल | उपयोग |
|---|---|---|
| अश्वगंधा | चित्तौड़गढ़ | तनाव दूर करने में |
| डांडा थोर | सम्पूर्ण राजस्थान में | आयुर्वेदिक औषधि |
| ग्वारपाठा | सांभर बेसिन | सौन्दर्य प्रसाधनों के अन्तर्गत |
| सफेद मूसली | उदयपुर, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़ | पौरूष शक्ति में वृद्धि |
| काली मूसली | उदयपुर, बाँसवाड़ा, | पौरूष शक्ति में वृद्धि राजसमंद, प्रतापगढ़ |
| अर्जुन | झालावाड़ | हृदय रोग |
| सालर | जयपुर | बिच्छू काटने पर |
| जंगली प्याज | जोधपुर, बाड़मेर | फेफड़ों के संक्रमण पर |
| वज्रदंती | उदयपुर तथा कोटा में | फसल संक्रमण, खांसी, दंत रोग |
| हिंगोड़ा | उदयपुर तथा कोटा में | गठिया तथा वसा, रक्त चाप नियंत्रण में |
| चिरमी | उदयपुर, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा | आयुर्वेदिक दवा के रूप में |
| गुग्गल | अजमेर | आयुर्वेदिक दवा के रूप में |
| शंखपुष्पी | जोधपुर, बाड़मेर | याददाश्त के लिए |
प्रमुख औषधीय पादपों की सामान्य जानकारी
- अश्वगंधा (विथानिया सोम्नीफेरा)- इसका पादप मूल का उपयोग किया जाता है तथा इसका जोड़ों की सूजन में, मूत्रवर्धक के रूप में तनाव दूर करने में तथा गठिया, जोड़ रोग के संबंध में उपयोग किया जाता है।
- अफीम (पैपवर सोम्नीफेरम)- इसका उपयोग पादप के अर्द्ध परिपक्व फल से प्राप्त दुधिया स्त्राव का किया जाता है तथा इसका खांसी, ऐठन के उपचार तथा दर्द निवारक के रूप में उपयोग किया जाता है।
- नीम (एजेडिरक्टा इन्डिका)- इसकी छाल, बीज, पुष्प तथा पत्तियों का उपयोग किया जाता है जो जीवाणु नाशी के रूप में तथा त्वचा रोग में उपयोग किया जाता है।
- आंवला (अम्बालिका ओफिसिनेलिस)- इसके फल का उपयोग किया जाता है। इसका उपयोग अपच के रूप में तथा विटामिन 'सी' की कमी को दूर करने के लिए किया जाता है।
- अदरक (जिन्जीबर ऑफीसिनेल) इसका उपयोग प्रकन्द के रूप में किया जाता है। इसका उपयोग खांसी तथा गले के रोग में, पाचन शक्ति बढ़ाने में किया जाता है।
- सफेद मूसली (क्लोरोफाइटम बोरिविलिएनम) इसकी जड़ का उपयोग किया जाता है जो पुरूषों में पुरूषत्व की कमी को दूर करता है।
- हल्दी (कुरकुमा लोंगा)- इसकी प्रकन्द का उपयोग किया जाता है जिसका उपयोग मधुमेह रोग, शरीर में बनी गैस तथा त्वचा संबंधित रोग के लिए किया जाता है।
- सर्पगन्धा (राउवाल्फिया सर्पेन्टाइना)- इसकी पादप मूल का उपयोग किया जाता है। जिसका तनाव तथा उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किया जाता है।
- धतूरा (डटूरा स्ट्रैमोनियम)- यह पूरा पौधा उपयोग में लिया जाता है जैसे इसकी जड़, तना तथा पत्तियों का उपयोग किया जाता है। इसका उपयोग दमा तथा गठिया के उपचार में तथा केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र के उत्तेजित होने पर इसका उपयोग किया जाता है।
- कुनैन (सिनकोना स्पीशीज)-इस पौधे की छाल का उपयोग किया जाता है जिसका उपयोग मलेरिया रोग के निदान के लिए किया जाता है।
- विभाग द्वारा मुख्य रूप से दो अधिनियम राजस्थान वन अधिनियम, 1953 तथा राजस्थान तेन्दू पत्ता (व्यापार का विनियमन) अधिनियम, 1974 को पारित किया है।
- केन्द्रीय अधिनियम वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 है।


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