राजस्थान के वन्यजीव अभ्यारण्य
यह लेख राजस्थान के वन्यजीव संरक्षण और अभयारण्यों के बारे में एक अत्यंत जानकारीपूर्ण और व्यापक डिजिटल गाइड है। इसमें राज्य के ऐतिहासिक वन्यजीव कानूनों से लेकर वर्तमान में संचालित सभी राष्ट्रीय उद्यानों, बाघ परियोजनाओं (Tiger Projects) और अभयारण्यों का विस्तृत ब्यौरा दिया गया है।
यह लेख न केवल प्रकृति प्रेमियों के लिए बल्कि RPSC, RSMSSB और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए एक Complete Study Material के रूप में कार्य करेगा। इसमें जिलों के शुभंकर (Mascots) और पर्यावरण से जुड़े महत्वपूर्ण दिवसों की सूची भी शामिल है जो परीक्षा की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है।
राजस्थान की मारवाड़ रियासत ने वन्यजीव संरक्षण हेतु कानून बनाया लेकिन 'शिकार पर प्रतिबंध' सर्वप्रथम 'टोंक रियासत' ने लगाया।
संसार में प्रकृति के संरक्षण के लिए सबसे पहले कार्य सम्राट अशोक ने किया क्योंकि इसके समय वन्य जीवों पर शिकार के लिए जो प्रतिबंध लगाये गये हैं वे शिलालेखों पर उल्लेखित हैं।
भारतीय संविधान् में अनुच्छेद 48 (क) एवं मौलिक कर्त्तव्य 51 (5) में वन्य जीवों के संरक्षण को प्राथमिकता दी गई है।
वन्य जीवों में वे सब आ जाते हैं जो जंगल/वनों में रहते हैं। जैसे- पेड़-पौधे, पशु-पक्षी।
राज्य में राजस्थान वन्य पशु पक्षी सुरक्षा एक्ट- 1951 लागू किया गया। उद्देश्य- वन्य जीवों की सुरक्षा
राजस्थान वन एक्ट
- 1953 लागू किया गया।
- उद्देश्य- रक्षित एवं आरक्षित क्षेत्रों में।
Note- राजस्थान वाइल्ड लाइफ बोर्ड की स्थापना- 1955
उद्देश्य- वन्य जीवों की सुरक्षा
- राज्य में 7 नवम्बर, 1955 को वन्य जीवों के संरक्षण के अधिक औपचारिक नियम बनाये गये क्योंकि इस समय रणथम्भौर, दर्रा, कैलादेवी, जयसमंद, वन-विहार, केवलादेव, सरिस्का इत्यादि अभयारण्य जो आखेट स्थल थे, इनको वन्य जीवों के लिए आरक्षित क्षेत्र के रूप में घोषित किया गया।
वन्य जीव संरक्षण एक्ट- 1972
उद्देश्य-
- राष्ट्रीय पार्क एवं अभयारण्य की स्थापना करना।
- वन्य जीवों का संरक्षण करना।
- लुप्त हो रही प्रजातियों के शिकार पर प्रतिबंध लगा देना।
वन्य जीव संरक्षण से संबंधित कानून
वन्य पक्षी एवं जन्तु सुरक्षा एक्ट- 1887
यह वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए प्रथम कानून है।
वन्य पशु एवं पक्षी संरक्षण एक्ट- 1912
उद्देश्य- शिकार एवं खरीदने से संबंधित प्रतिबंध
वन अधिनियम- 1927
उद्देश्य- वन्य जीवों की सुरक्षा
इण्डियन बोर्ड ऑफ वाइल्ड लाइफ की स्थापना- 1952
उद्देश्य- वन्य जीवों की सुरक्षा
राजस्थान वाइल्ड लाइफ बोर्ड
- स्थापना- 1955
- सन् 1976 में 42 वें संविधान संशोधन के द्वारा वन एवं वन्य जीवों को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में सम्मिलित किया गया।
Note- राजस्थान वन्य पशु एवं पक्षी अधिनियम- 1951, 23 अप्रैल 1951
- भारत सरकार द्वारा वन्य जीव सुरक्षा एक्ट को 9 सितम्बर 1972 को लागू किया गया, यह राजस्थान में 1 सितम्बर 1973 को लागू हुआ। उद्देश्य- वन्य जीवों के शिकार पर प्रतिबंध
- 1986 में जानवरों से बनी वस्तुओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
- राज्य में राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्य कुल क्षेत्रफल के 2.71% भू-भाग पर है जबकि आखेट निषेध 7.80% भू-भाग पर है।
राज्य सरकार के अधिनियम
कतिपय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम -1950
इसमें कबूतर और मोर को संरक्षण दिया गया।
राजस्थान वन्यजीव संरक्षण अधिनियम - 23 अप्रैल 1991
इसके तहत वन्यजीव बोर्ड के गठन का प्रावधान किया गया।
वन्यजीव बोर्ड का गठन -1955
- स्टॉक होम सम्मेलन - 5 जून 1972 से 21 जून 1972 तक
- उद्देश्य- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवीय पर्यावरण के संरक्षण हेतु।
- पर्यावरण के संरक्षण के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का यह प्रथम प्रयास था।
- 5 जून- विश्व पर्यावरण दिवस
बायोस्फीयर-रिजर्व
- संचालन- केंद्र सरकार
- कार्य- संकटग्रस्त प्रजाति को संरक्षण प्रदान करती है।
- भारत में कुल बायोस्फीयर रिजर्व-18
- भारत में सर्वाधिक अभयारण्य- अंडमान-निकोबार
- राजस्थान में सर्वाधिक अभयारण्य- उदयपुर
- राजस्थान में कुल अभयारण्य- 26
- संरक्षित क्षेत्र/कंजर्वेशन रिजर्व- 37
जैव-विविधता का अर्थ
- यह प्राकृतिक संसाधन है, जिसका अर्थ आनुवांशिक, प्रजाति तथा पारिस्थितिकी तंत्र की विषमता का स्तर मापता है।
- जैव-विविधता का जनक-एडवर्ड ओ. विल्सन
- जैव-विविधता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया-वाल्टर रोजेन
इसकी 2 विधियाँ हैं :-
स्व-स्थाने :-
- किसी जीव को प्राकृतिक आवास में संरक्षण देना स्व-स्थाने कहलाता है।
- जैसे- राष्ट्रीय उद्यान, वन्य जीव अभयारण्य, बायोस्फीयर रिजर्व, हॉपस्पॉट (आशा के स्थल) हॉटस्पॉट
पर-स्थाने :-
- किसी जीव को कृत्रिम आवास में संरक्षण देना पर-स्थाने कहलाता है, जैसे- चिड़ियाघर
राजस्थान में राष्ट्रीय उद्यान का वर्गीकरण निम्न प्रकार से हैं :-
- रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान
- केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान
- मुकुन्दरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान
1. रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान- सवाई माधोपुर
- उपनाम- भारतीय बाघों का घर, शेरों की भूमि
- इसको अभयारण्य का दर्जा दिया गया- 1955
- इसको राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया- नवंबर 1980
- कुल क्षेत्रफल- 392 Km² (167 Km² राष्ट्रीय उद्यान )
- यह उद्यान 1973-74 में 'बाघ परियोजना' में चयनित।
- राज्य का पहला 'टाइगर प्रोजेक्ट' है।
- क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटी बाघ परियोजना
- अरावली और विन्ध्यांचल पर्वतमाला के मध्य स्थित है।
- राज्य का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान।
- यहाँ 1960 में - एलिजाबेथ।
- यहाँ 1985 में -राजीव गाँधी,
- यहाँ 2005 में -मनमोहन सिंह, भ्रमण के लिए आये थे।
- इसको Land of Tiger कहा जाता है।
इस उद्यान में जल स्त्रोत
- पदम तालाब
- मलिक तालाब
- राज बाघ तालाब
- गिलाई सागर झील
- लाहपुर झील
- मानसरोवर झील
विशेषता
- काला गरुड़ पाया जाता है।
- लाल सिर वाले तोते पाये जाते हैं।
- रणथम्भौर दुर्ग स्थित है।
- 32 खम्भों की छतरी
- त्रिनेत्र गणेश जी का मंदिर
- कुत्ते की छतरी
- 1996-1997 में विश्व बैंक की सहायता से इस अभयारण्य को 'ईको डवलपमेंट परियोजना' में शामिल किया गया।
- यहाँ प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय की भी स्थापना की गई।
- यहाँ 'जोगी महल' स्थित है जिसका निर्माण माधोसिंह ने करवाया।
- इसका कोर एरिया- 167 Km² जबकि बफर एरिया- 225 Km² है।
- कोर क्षेत्र- अनुसंधान कार्य एवं बाघों को उचित आवासीय सुविधा।
- इस राष्ट्रीय उद्यान को वर्ल्ड नेचुरल हेरीटेज साईट में चयनित किया गया है।
2. केवलादेव घना पक्षी विहार, भरतपुर
- उपनाम- पक्षियों का स्वर्ग, पक्षियों की प्रजननस्थली
- इसको अभयारण्य का दर्जा दिया गया- 1956
- इसको राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया- 27 अगस्त, 1981
- इसको 1985 में यूनेस्को की प्राकृतिक धरोहर में शामिल किया गया।
- क्षेत्रफल- 28.75 Km² (क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा राष्ट्रीय उद्यान)
- इसका निर्माण स्विट्जरलैंड की झीलों के आधार पर किया गया।
- यह उद्यान पक्षी वैज्ञानिक डॉ. सलीम अली की कर्मस्थली रहा है।
- यहाँ का आकर्षण साइबेरियन सारस है जो अक्टूबर-नवंबर में आते हैं तथा फरवरी-मार्च में वापस चले जाते हैं।
- इस पक्षी की पसंदीदा घास कुट्टू घास है।
- यह राज्य का दूसरा सर्प उद्यान है।
- राज्य का प्रथम सर्प उद्यान- कोटा में
- यहाँ अजगर भी पाए जाते हैं।
- रॉजी पिस्टन नामक पक्षी पाया जाता है।
- पक्षियों की 392 प्रजातियाँ।
- पक्षी 'एन्चा' नामक घास में फंसकर मर जाते हैं।
- यहाँ चकवा-चकवी पक्षी भी पाया जाता है।
इस उद्यान में जलापूर्ति
- नदियाँ- 1. काकुन्द, 2. गंभीर, 3. बाणगंगा
- 3 बाँध- 1. अजान बाँध, 2. पांचना बाँध, 3. गोवर्धन बाँध
- अजान बाँध के आस-पास कदम के वृक्ष भी मिलते हैं।
नोट- इस उद्यान को 'पाइथन पॉइंट' के नाम से भी जाना जाता है।
- यहाँ प्रथम वन्य जीव प्रयोगशाला स्थापित की गई।
- सलीम अली इंटरप्रिटेशन केन्द्र यहाँ स्थित है।
- ऑस्ट्रेलिया की सॉरोस्की कंपनी की आर्थिक सहायता से 2006 में एक नम भूमि चेतना केंद्र खोला गया।
- यह राजस्थान का प्रथम रामसर स्थल/वेटलैण्ड साइट है जो 1 अक्टूबर, 1981 को चयनित किया गया है।
- भरतपुर के महाराजा श्री किशन सिंह ने इसका निर्माण यूरोपीय महाद्वीप की झीलों के आधार पर किया गया।
यहाँ 2 प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं-
- 1. आवासी पक्षी- वे पक्षी जो यहाँ प्रजनन करते हैं तथा अण्डे देते हैं।
- 2. प्रवासी पक्षी- वे पक्षी जो यहाँ प्रजनन नहीं करते हैं तथा कुछ समय रहकर वापिस चले जाते हैं।
जैसे- साइबेरियन सारस यह शीतकाल में आता है।
- यहाँ साइबेरिया, कोरिया, रूस एवं चीन से पक्षी आते हैं। शौलर्स गीज, हेडेड गीज, रोजी पैलिकन, पौचर्ड, पर्पल मूनहेन इत्यादि।
- साइबेरियन सारस के लिए यहाँ केप्टिन एक्जीबिट सेंटर बनाया गया है क्योंकि यह विश्व की दुर्लभ प्रजातियों में से एक है।
यहाँ प्रवासी पक्षियों के आने के प्रमुख कारण हैं-
- शीत ऋतु में इनके प्रजनन क्षेत्र में अत्यधिक बर्फबारी होने के कारण यह क्षेत्र पक्षियों के लिए अनुकूल नहीं होता है।
- इस उद्यान में इनको उपयुक्त मात्रा में भोजन भी मिल जाता है।
3. मुकन्दरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान
- विस्तार- कोटा - झालावाड़-बूँदी -चित्तौड़गढ़
- यह विंध्याचल की पहाड़ियों में स्थित है।
- 9 जनवरी 2012 में राष्ट्रीय उद्यान के समय जवाहर सागर अभयारण्य के क्षेत्रों को भी सम्मिलित किया गया।
- क्षेत्रफल- 274 वर्ग किलोमीटर
- यह बाघ परियोजना में चयनित- अप्रैल 2013
- आकर्षण- बाघ और गागरोनी तोते।
- गागरोनी तोते को हिंदुओं का आकाश लोचन कहते हैं।
- इस राष्ट्रीय उद्यान के उत्तर-पश्चिम में चम्बल नदी, पूर्वी में कालीसिंध नदी एवं दक्षिण में आहु नदी प्रवाहित होती है।
प्रमुख पर्यटक स्थल
- अबली-मीणी का महल- कोटा
- रावठा महल- कोटा
- भीम चंवरी- कोटा
- बाड़ौली का शिव मंदिर- चित्तौड़गढ़ यहाँ गुप्तकालीन मंदिर है।
- गागरोन का किला- झालावाड़ इस उद्यान में आदिमानव के शैल चित्र मिले हैं।
नोट- राम सागर व झामरा के क्षेत्रों में वन्य जीवों के अवलोकन हेतु स्तंभों को'औदिया' कहा जाता है।
राज्य के अभयारण्य - 26
1. राष्ट्रीय मरु उद्यान (जैसलमेर और बाड़मेर)
- स्थापना- 8 मई 1981
- कुल क्षेत्रफल- 3162 किलोमीटर²
- जैसलमेर- 1900 किलोमीटर²
- बाड़मेर- 1262 किलोमीटर²
- राज का सबसे बड़ा अभयारण्य।
- गज़लर नामक पाइपलाइन बिछाई गई है।
- यहाँ टिड्डी दल और किंग कोबरा पाया जाता है।
- आकलवुड फॉसिल्स पार्क/सुदासरी फॉसिल्स पार्क- जैसलमेर
- इसमें लाठी सीरिज मिलती है जिसको गोडावन की शरण-स्थली कहते हैं क्योंकि इस लाठी सीरिज पर सेवण घास पाई जाती है।
- गोडावन का वैज्ञानिक नाम- क्रोरियोटिस नाइग्रीसेप्स
नोट- गोडावन राजस्थान में जैसलमेर, शोकलिया (केकड़ी) और सोरसन (बाराँ) में पाया जाता है।
- गोडावन के उपनाम - माल मोरडी, सोन चिड़ियाँ, हुकना, शर्मीला पक्षी, घोडाड़ (गुजरात) गुधनेभर
- इस उद्यान में विभिन्न प्रकार के पक्षी, उभयचर, कीट समूह एवं सरीसृप पाए जाते हैं।
- आकल वुड फॉसिल्स पार्क- यहाँ 18 करोड़ वर्ष पूर्व के पेड़ पौधों के जीवाश्म पाये जाते हैं। जिसमें 25 वुड फॉसिल्स पार्क है। इसमें सबसे बड़े फॉसिल्स पार्क की लम्बाई: 7 मीटर, परिधि: 1.5 मीटर
- यह सम्पूर्ण पार्क लगभग 21 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है।
आकल वुड फॉसिल्स पार्क की विशेषता-
- वनस्पति विहिन
- काले हिरण एवं गोडावण की शरणस्थली
- जीवाश्म के लिए प्रसिद्ध
- मरुदभिद पेड़-पौधे के लिए प्रसिद्ध।
2. सज्जनगढ़ अभयारण्य-उदयपुर
- उदयपुर, स्थापना- 1987 में
- क्षेत्रफल- 5.5 किलोमीटर²
- क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा अभयारण्य।
- यह राज्य का प्रथम जैविक उद्यान है।
- इसमें बासदरी पहाड़ी पर सज्जनगढ़ दुर्ग स्थित है।
नोट- इसमें राज्य का प्रथम पेंथर रेस्क्यू सेंटर बनाया जाएगा जिसकी घोषणा मई, 2022 में की गई थी।
3. ताल छापर/अभयारण्य-चूरू
- सुजानगढ़ (चूरू)
- अभयारण्य का दर्जा- 1971
- यह काले हिरणों की शरणस्थली है।
- यह विश्व का सबसे बड़ा कृष्ण मृग अभयारण्य है।
- इस अभयारण्य में कुरजां पक्षी और क्रोमेन क्रेन यहाँ शरण लेते हैं।
- यहाँ हिरण की पसंदीदा घास- 'मोथिया' साइप्रस रोटुंडस पाया जाता है।
विशेष
(i) यहाँ द्रोणाचार्य का आश्रम द्रोणपुर स्थित है।
(ii) राव जोधा के पुत्र बीदा का निवास स्थान बीदावाटी स्थित है।
(iii) राव बीदा की छतरी स्थित है।
जल स्रोत
भैंसालोव तथा डूलालाव प्राचीन तलैया स्थित है।
हिरण की गणना वाटर हॉल पद्धति द्वारा की जाती है।
4. सरिस्का अभयारण्य - अलवर
- बाघों का घर
- स्थापना- नवंबर 1955 (क्षेत्रफल 492 किलोमीटर²)
- बाघ परियोजना में चयनित - 1978 (क्षेत्रफल 861 किलोमीटर²)
- राज्य की सबसे बड़ी बाघ परियोजना।
- इसके लिए 1982 में राष्ट्रीय उद्यान का प्रस्ताव भेजा गया।
- यहाँ हरियल कबूतर पाए जाते हैं।
- यहाँ की काली घाटी में सर्वाधिक मयूर पाए जाते हैं।
- विश्व की सबसे छोटी बिल्ली पाई जाती है।
पर्यटक स्थल
- बलदेव गढ़ का किला
- बाला किला
- अजबगढ़ किला
- भानगढ़ का किला
- कांकन बाड़ी का किला
- भर्तृहरी की गुफाएँ
- पाण्डुपोल हनुमान मंदिर (शयन मुद्रा में)
- पाराशर ऋषि का आश्रम
- ताला वृक्ष मंदिर- मांडव ऋषि की तपस्यास्थली
- भर्तृहरि मंदिर-कनफटे नाथों की शरणस्थली।
- नीलकंठ महादेव मंदिर
- नृत्यरत गणेश मूर्ति
- नारायणी माता का मंदिर
- घठरजोर के जैन मंदिर
यह दो भागों में विभाजित है-
- कोर जोन
- बफर जोन
यहाँ कैलाशचन्द्र सांखला प्रकृति व्याख्यान केन्द्र की स्थापना 1998 में की गई।
5. नाहरगढ़ अभयारण्य, जयपुर
- अभयारण्य घोषित- 1980, स्थापना -1982
- यह राज्य का प्रथम तथा देश का तीसरा 'बीयर रेस्क्यू सेंटर' है।
- 1st- आगरा बीयर रेस्क्यू सेंटर
- 2nd- जेस्सोर बीयर रेस्क्यू सेंटर - गुजरात
6. शेरगढ़ अभयारण्य, बाराँ
- स्थापना- 1983
- परवन नदी के किनारे।
- क्षेत्रफल- 81 Km²
- साँपों की शरणस्थली।
7. रामगढ़ विषधारी अभयारण्य, बूँदी
- स्थापना- 1982
- क्षेत्रफल- 360 वर्ग किलोमीटर।
- वर्तमान में 'बाघ कॉरीडोर' में शामिल।
- उपनाम- अजगर की शरणस्थली।
- यह रणथम्भौर के बाघों का जच्चा घर कहलाता है।
- मेज नदी इसके मध्य से गुजरती है।
- यह राज्य का टाइगर रिजर्व है- 4
8. जमवारामगढ़ अभयारण्य, जयपुर
- स्थापना-1982
- क्षेत्रफल - 300 Km²
- धौंक के वनों के लिए प्रसिद्ध।
- उपनाम- जयपुर का पुराना शिकारगाह है।
- कच्छवाहा राजवंश की कुलदेवी 'जमुवाय' माता का मन्दिर स्थित है।
9. सवाई मानसिंह अभयारण्य, सवाई माधोपुर
- स्थापना- 1984
- उद्देश्य- रणथम्भौर के बढ़ते बाघों के भविष्य के लिए आश्रयस्थल के रुप में विकसित।
- पर्यटन स्थल- चिड़िया खोह।
10. दर्रा अभयारण्य, कोटा, झालावाड़
- स्थापना- 1955
11. कैला देवी अभयारण्य (डांगलैंड)
- विस्तार- सवाई माधोपुर और करौली।
- स्थापना- 1983
- क्षेत्रफल- 676 वर्ग किलोमीटर
- धौंक के वनों के लिए प्रसिद्ध।
- 2007 में 'टाइगर हेबिटेट जोन' घोषित किया गया था।
12. बंध बारेठा अभयारण्य, बयाना (भरतपुर)
- स्थापना- 1985
- उपनाम- परिंदों का घर।
- यह जरखों के लिए प्रसिद्ध है।
13. माउण्ट आबू वन्य जीव अभयारणय, सिरोही
- स्थापना- 1960 क्षेत्रफल- 328 वर्ग किलोमीटर।
यहाँ प्रमुख जीव-
- यह जंगली मुर्गों और भालू के लिए प्रसिद्ध है।
- यहाँ यूब्लेफेरिस नामक सुंदर छिपकली पाई जाती है।
- यहाँ डिकिल्पटेरा आबू एन्सिस औषधी पाई जाती है, जिसको स्थानीय भाषा में कारा कहते है। यह औषधि विश्व में केवल यहीं पाई जाती है।
- यहाँ औषधीय पादप शोध केंद्र स्थित है।
- यहाँ जलापूर्ति कोडरा बाँध से होती है।
- यह राज्य का सबसे ऊँचा अभयारणय है।
- इस अभयारणय में भी 100 से अधिक पक्षी प्रजातियों की संख्या है।
- यह अभयारणय भी पक्षी प्रेमियों के लिए प्रसिद्ध है।
14. सीतामाता अभयारणय, प्रतापगढ़
- इसका विस्तार उदयपुर तथा चित्तौड़गढ़ में भी है।
- स्थापना- 1979
- उपनाम- चीतल की शरणस्थली, उड़न गिलहरी का स्वर्ग।
- राजस्थान का सर्वाधिक जैव विविधता वाला अभयारणय।
- सर्वाधिक सागवान के वृक्ष पाए जाते हैं।
- क्षेत्रफल- 423 वर्ग किलोमीटर।
वन्यजीव
- (i) उड़न गिलहरियाँ (Flying Squirrel) यह महुआ के वृक्ष पर सर्वाधिक पाई जाती हैं।
- (ii) उड़न छिपकलियाँ (विरल पेटोरिस्टा एल वीवेंटर)
- इसमें राजस्थान का सबसे ऊँचा बाँध जाखम बाँध स्थित है।
- यहाँ 'लव-कुश' नामक दो झरने स्थित हैं।
- जलापूर्ति नदियाँ- कर्ममोई/कर्म मोचिन और जाखम नदी से।
15. बस्सी अभयारणय, चित्तौड़गढ़
- स्थापना- 1988
- क्षेत्रफल- 138 वर्ग किलोमीटर
- यहाँ से ओराई और ब्राह्मणी नदी का उद्गम होता है।
- यह अभयारणय भी चीतल की चहल-पहल के लिए जाना जाता है।
16. वन विहार, धौलपुर
- स्थापना- 1955
- क्षेत्रफल- 25 वर्ग किलोमीटर
- उपनाम- पक्षियों की उत्तम आश्रयस्थली।
17. केसर बाग वन्य जीव अभयारणय, धौलपुर
- स्थापना- 1955
- क्षेत्रफल- 14 वर्ग किलोमीटर
18. रामसागर अभयारणय - धौलपुर
- स्थापना- 1955
19. भैंसरोड़गढ़ अभयारणय, चित्तौड़गढ़
- स्थापना- 1979, क्षेत्रफल- 229 वर्ग किलोमीटर
- इसमें मानदेसरा का पठार स्थित है।
- इसमें चूलिया जलप्रपात निर्मित है जिसकी कुल ऊँचाई 18 मीटर है।
- इसमें से चंबल और ब्राह्मणी नदी प्रवाहित होती है।
20. रावली टॉडगढ़ अभयारण्य
- स्थापना- 1983
- विस्तार- राजसमंद, ब्यावर
- क्षेत्रफल- 512 वर्ग किलोमीटर
- राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा देने के लिए केन्द्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है।
21. जयसमंद अभयारण्य, सलूम्बर
- स्थापना- 1955
- क्षेत्रफल- 52 वर्ग किलोमीटर
- यह बघेरों के आश्रय स्थल के रूप में पहचाना जाता है।
- इसमें लसाडिया पठार स्थित है।
22. कुम्भलगढ़ अभयारण्य
- विस्तार- राजसमंद, पाली, उदयपुर
- स्थापना- 1971
- क्षेत्रफल- 610 वर्ग किलोमीटर
- यह पैंथर के निवास स्थान के लिए प्रसिद्ध है।
- राज्य की एकमात्र पैंथर परियोजना यहाँ संचालित है।
- भेड़ियों को यहाँ घण्टेल कहा जाता है।
- इसको भेड़ियों की प्रजनन स्थली कहते हैं।
- यह जंगली भेड़ियों के लिए प्रसिद्ध।
- यहाँ चंदन के वृक्ष पाए जाते हैं।
इस अभयारण्य में निम्न दर्शनीय स्थल हैं-
- यहाँ मूंछला महादेव का मंदिर- पाली
- परशुराम महादेव मंदिर- उदयपुर।
- रणकपुर के जैन मंदिर- पाली।
- इसका निर्माता- धरणक शाह
- वास्तुकार- देपाक
- 1444 खम्भों की छतरी।
- मथाई नदी के किनारे।
- यह आदिनाथ को समर्पित है।
नोट- राज्य का एकमात्र अभयारण्य जहाँ प्रदेश की दो अलग-अलग अपवाह क्षेत्र की नदियाँ बनास व साबरमती नदी बहती है।
इसको 1980 में केन्द्रीय प्रोत्साहन योजना में चयनित किया गया जिसका कारण है वन्य जीवों की अधिकता को देखते हुए।
23. फुलवारी की नाल अभयारण्य, उदयपुर
- स्थापना- 1983 में
- क्षेत्रफल- 493 वर्ग किलोमीटर
- इसमें देश का प्रथम है 'ह्यूमन एटॉमिक पार्क' स्थित है।
- यह महाराणा प्रताप की कर्मस्थली कहलाता है।
- इसमे मानसी-वाकल परियोजना गुजरती है।
- निम्न नदियों का उद्गम- (i) मानसी, (ii) वाकल, (iii) सोम
- औषधियाँ- चिरमी, सफेद मुसली, ब्राह्मी
24. राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य
- विस्तार- कोटा, बूंदी, सवाईमाधोपुर, करौली, धौलपुर।
- यह एकमात्र अंतर्राज्यीय अभयारण्य है, जो तीन राज्यों में स्थित है- राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश।
- यह एकमात्र नदी अभयारण्य है।
- इसको घड़ियाल का संसार कहते हैं।
- घड़ियाल प्रजनन केंद्र- देवरा गाँव, मुरैना तहसील, मध्य-प्रदेश
- उपनाम- जलीय पक्षियों की प्रजनन स्थली
वन्यजीव -
- (i) भारतीय स्कीनर,
- (ii) शिशुमार, गांगेय सूंस और डॉल्फिन जलीय स्तनधारी,
- (iii) उदबिलाव
25. जवाहर सागर अभयारण्य, कोटा
- स्थापना- 1975
- उपनाम- घड़ियालों की प्रजननस्थली।
दर्शनीय स्थल-
- (i) कोटा बैराज
- (ii) गैपरनाथ महादेव मंदिर
- (iii) गराड़िया महादेव मंदिर।
- यह उत्तरी भारत का प्रथम सर्प उद्यान है।
नोट- दूसरा सर्प उद्यान व विष एकत्र करने की प्रयोगशाला- भरतपुर में स्थित है।
26. सवाई माधोपुर अभयारण्य-सवाई माधोपुर
- दर्जा दिया गया- 1955
- यह अभयारण्य बघेरा, भालू, जंगली सुअर, जंगली रीछ, जंगली खरगोश और सांभर के लिए प्रसिद्ध है।
- इस अभयारण्य से कँवाल जी आखेट निषिद्ध क्षेत्र सटा हुआ है।
बाघ परियोजना
राज्य में 5 बाघ परियोजना हैं, जो निम्न हैं-
1. रणथंभौर बाघ परियोजना
दर्जा-1973
विस्तार- सवाईमाधोपुर, करौली, बूँदी, टोंक
क्षेत्रफल- 1530.23 किमी.²
राज्य की सबसे बड़ी बाघ परियोजना
2. सरिस्का बाघ परियोजना
दर्जा- 1978
विस्तार- अलवर, जयपुर
क्षेत्रफल- 1213.34 वर्ग किमी.²
राज्य की तीसरी सबसे बड़ी बाघ परियोजना
3. मुकुन्दरा हिल्स बाघ परियोजना
दर्जा- 2013
विस्तार- कोटा, बूँदी, झालावाड़, चित्तौड़गढ़
क्षेत्रफल- 1135.79 किमी.²
राज्य की चौथी सबसे बड़ी बाघ परियोजना
4. रामगढ़ विषधारी बाघ परियोजना
दर्जा- 2022
विस्तार- कोटा, बूँदी, भीलवाड़ा
क्षेत्रफल- 1496.49 किमी.²
राज्य की दूसरी सबसे बड़ी बाघ परियोजना
5. धौलपुर-करौली बाघ परियोजना
दर्जा-अक्टूबर 2023
विस्तार- धौलपुर-करौली
राज्य की नवीनतम् बाघ परियोजना
क्षेत्रफल-599.64 किमी.²
राज्य की सबसे छोटी बाघ परियोजना
राजस्थान के संरक्षित क्षेत्र निम्न हैं-
- राज्य में सर्वाधिक संरक्षित क्षेत्र- बाराँ
सबसे बड़ा कंजर्वेशन रिजर्व
बालेश्वर- 221.69 वर्ग किमी.
शाहबाद रिजर्व- 189.40 वर्ग किमी.
शाहबाद तलहटी रिजर्व- 178.84 वर्ग किमी.
सबसे छोटा कंजर्वेशन रिजर्व
बीड़ मुहाना-B (जयपुर)- 0.10 वर्ग किमी.
रोटु- 0.73 वर्ग किमी.
सोरसन तृतीय (बाराँ)- 0.76 वर्ग किमी.
बीड घास फुलिया खुर्द- 0.86 वर्ग किमी.
सभी संरक्षित क्षेत्रों के चारों और 24 ईको-सेन्सिटिव जोन घोषित किये जाने हैं, जिसमें से 15 इको-सेन्सिटिव जोन के फाईनल नोटिफिकेशन जारी कर दिये गये हैं, जो निम्न है-
- सीतामाता अभयारण्य (चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़)- 2017
- जमवारामगढ़ अभयारण्य (जयपुर)- 2018
- बंध बारेठा अभयारण्य (भरतपुर)- अक्टूबर 2022
- केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (भरतपुर)- 2019-2020
- बस्सी अभयारण्य (चित्तौड़गढ़)- 2021
- केसरबाग अभयारण्य (धौलपुर)- 2020
- मुकन्दरा हिल्स, दर्रा, जवाहर सागर तथा राष्ट्रीय चम्बल घड़ियाल (कोटा, बूँदी, चित्तौड़गढ़, झालावाड़)- नवम्बर, 2020
- माउंट आबू अभयारण्य (सिरोही)- 2009-2020
- नाहरगढ़ अभयारण्य (जयपुर)- 2019
- रामसागर अभयारण्य (धौलपुर)- 2020
- सज्जनगढ़ अभयारण्य (उदयपुर)- 2017
- टॉडगढ़ रावली अभयारण्य (राजसमंद, ब्यावर)- 2017
- वन-विहार अभयारण्य (धौलपुर)- 2017
- भैंसरोड़गढ़ अभयारण्य (चित्तौड़गढ़) - 2021
- जयसमंद अभयारण्य (सलूम्बर) - 2020
अन्य
1. कुंभलगढ़ अभयारण्य, 2. रामगढ़ विषधारी, 3. सरिस्का अभयारण्य सरिस्का तथा जमवारामगढ़ में शामिल है, 4. शेरगढ़ अभयारण्य, 5. तालछापर अभयारण्य (प्रस्ताव भेजा गया), 1. राष्ट्रीय मरु उद्यान, 2. राष्ट्रीय घड़ियाल अभयारण्य, 3. फुलवारी अभयारण्य, 4. रणथम्भौर, सवाईमाधोपुर, सवाईमानसिंह अभयारण्य तथा केलादेवी शामिल है।
आखेट निषिद्ध क्षेत्र 33
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम- 1972 की धारा-37 के तहत निर्माण किया गया है।
- सर्वाधिक काले हिरण वाला आखेट निषिद्ध क्षेत्र- डोली धवा (जोधपुर और बाड़मेर)
आखेट निषिद्ध क्षेत्र 33 है, जो निम्न जिलों में विस्तारित हैं-
- फलौदी - लोहावट, डेचु।
- जोधपुर - गुढ़ा बिश्नोइयां, डोली, साथीन, फिटकाशनी
- बीकानेर - बज्जू, देशनोक, दीयात्रा, जोहड़बीड़, मुकाम
- उदयपुर - बागदड़ा
- कोटपूतली-बहरोड़ - बर्डोद
- खैरथल-तिजारा - जोहडिया
- बाड़मेर - धोरीमना
- अजमेर - गगवाना, तिलोरा
- बाराँ - सोरसन
- नागौर - जरोदा, रोटू
- पाली - जवाई बाँध
- बूंदी - कनकसागर
- जयपुर - महला, संथाल सागर
- चित्तौड़गढ़ - मेनाल
- सवाई माधोपुर - कंवालजी
- जैसलमेर - रामदेवरा, उज्जला
- टोंक - रानीपुरा
- जालौर - सांचौर
- चूरू - संवत्सर-कोटसर
राजस्थान के आखेट निषिद्ध क्षेत्र की सामान्य जानकारी निम्न है।
- संवत्सर (कोटसर, चूरू)- यह राज्य का सबसे बड़ा आखेट निषिद्ध क्षेत्र है जिसका क्षेत्रफल 7091 वर्ग किमी. है।
- कनक सागर (बूंदी)- यह राज्य का सबसे छोटा आखेट निषिद्ध क्षेत्र है जिसका क्षेत्रफल 1 वर्ग किमी. है।
- शोकलिया (अजमेर)- यह गौडावन के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ खड्मौर भी मिलता है।
- सोरसन (बाराँ)- यह गोडावन के लिये प्रसिद्ध है।
- तिलोरा (अजमेर)- यह जल पक्षी पेलिकन के लिए प्रसिद्ध है।
- उज्जला (जैसलमेर)- यह चिंकारा के लिए प्रसिद्ध है।
- बागदड़ा (उदयपुर)- यह बड़े-बड़े स्तनधारी जीवों के लिए प्रसिद्ध है।
- फिटकाशनी (जोधपुर)- यह रोहिड़ा तथा चिंकारा के लिये प्रसिद्ध है।
- देशनोक (बीकानेर)- यह चिंकारा के लिए प्रसिद्ध है।
- डोली (जोधपुर)- यह काला हिरण तथा चिंकारा के लिए प्रसिद्ध है।
- दीयात्रा (बीकानेर)- यह चिंकारा के लिए प्रसिद्ध है।
- धोरीमन्ना (बाड़मेर)- यह मरू लोमड़ी के लिए प्रसिद्ध है तथा यह बाड़मेर का शुभंकर भी है।
- डेचूं (फलौदी)- यह चिंकारा तथा लोमड़ी के लिए प्रसिद्ध है।
- बज्जू (बीकानेर)- यह चिंकारा के लिए प्रसिद्ध है।
- गुढ़ा विश्नोई (जोधपुर)- यह भेड़िया, चिंकारा तथा काले हिरण के लिए प्रसिद्ध है।
- जम्भेश्वर जी (जोधपुर)- यह मरू लोमड़ी तथा चिंकारा के लिए प्रसिद्ध है।
- जरोदा (नागौर)- यह सियार के लिए प्रसिद्ध है।
- गंगवाना (अजमेर)- यहाँ विभिन्न प्रकार के पक्षी आते हैं।
- रोटू (नागौर)- यह काले हिरण के लिए प्रसिद्ध है।
- लोहावट (फलौदी)- यह चिंकारा तथा मरू लोमड़ी के लिए प्रसिद्ध है।
- मेनाल (चित्तौड़गढ़)- यहाँ पर विभिन्न प्रकार के पक्षियों की प्रजाति मिलती है।
- मुकाम (बीकानेर)- यह चिंकारा तथा काले हिरण के लिए प्रसिद्ध है।
- रामदेवरा (जैसलमेर)- यह गौडावन, चिंकारा तथा कांटे वाली छिपकली के लिए प्रसिद्ध है।
- साथिन (जोधपुर)- यह चिंकारा तथा काले हिरण के लिए प्रसिद्ध है।
- संथाल सागर (जयपुर)- यह जल पक्षी के लिए तथा राज्य का दूसरा सबसे छोटा आखेट निषिद्ध क्षेत्र है।
- रानीपुरा (टोंक)- यह भी काले हिरण के लिए प्रसिद्ध है।
- सांचौर (जालौर)- यह सियार, चिंकारा तथा भारतीय लोमड़ी के लिए प्रसिद्ध है।
- बर्डोद (कोटपूतली-बहरोड़)- यह भेड़िया तथा नीलगाय (रोजड़ा) के लिए प्रसिद्ध है।
- महला (जयपुर)- यह जल पक्षी के लिए प्रसिद्ध है।
- कंवालजी (सवाईमाधोपुर)- यह चीतल तथा सांभर के लिए प्रसिद्ध हैं।
- जोहड़िया (खैरथल-तिजारा)- यह काले हिरण के लिए प्रसिद्ध है।
- जोहड़बीड़ (बीकानेर)- मरूस्थलीय जीव-जन्तु के लिए प्रसिद्ध है।
- जवाई बांध (पाली)- मगरमच्छ के लिए प्रसिद्ध है।
- सबसे बड़ा आखेट निषिद्ध (अवरोही क्रम)- संवत्सर - कोटसर (7091.05 Km²), जम्भेश्वर (3500 Km²), रामदेवरा एवं उज्जला(3000 Km²), गंगवाना (2100 Km²)
- सबसे छोटा आखेट निषेध क्षेत्र- कनकसागर-बूँदी (1 Km²), संथाल-सागर- जयपुर (3 Km²), महला- जयपुर (5 Km²), फिटकाशनी, जोधपुर (5.20 Km²)
भौतिक प्रदेशों/प्राकृतिक विभाग के आधार पर वन्य जीव अभयारण्यों का वर्गीकरण निम्न प्रकार है-
1. अरावली पर्वतमाला
इसमें सर्वाधिक वनस्पति होने के कारण सर्वाधिक वन्य जीव अभयारण्य मिलते हैं।
माउंट आबू, फुलवारी, सज्जनगढ़, जयसमंद, सीतामाता, कुंभलगढ़,टॉडगढ़, जमवारामगढ़, नाहरगढ़, रामगढ़ विषधारी।
2. दक्षिणी-पूर्वी पठारी प्रदेश
यह चम्बल एवं इसकी सहायक नदियों के द्वारा निर्मित है। बस्सी, भैंसरोड़गढ़, कनक सागर, कैला देवी, रणथम्भौर, सवाई-मानसिंह,शेरगढ़, दर्रा, जवाहर सागर राष्ट्रीय चम्बल घड़ियाल अभयारण्य।
3. पूर्वी मैदानी प्रदेश
यहाँ प्रवासी एवं अप्रवासी पक्षी के लिए प्रसिद्ध केवलादेव, बंध बारेठा एवं वन विहार।
4. थार का मरुस्थल
राष्ट्रीय मरु उद्यान, तालछापर, गजनेर, भालू, बडोपल।
इस क्षेत्र में सर्वाधिक आखेट निषिद्ध क्षेत्र है।
महत्वपूर्ण तथ्य
वन्य जीवों के आश्रय स्थल के आधार पर 1972 के एक्ट के तहत 03 भागों में विभाजित किया गया-
(1) राष्ट्रीय उद्यान (2) अभयारण्य (3) आखेट-निषिद्ध क्षेत्र
बाघों की गणना 4 प्रकार से की जाती है-
(1) पगमार्क पद्धति (2) रेडियो कॉलरिंग (3) रजिस्ट्रेशन पद्धति (4) केमरा ट्रेप पद्धति
कैलाश सांखला
- जन्म- जोधपुर
- इनको टाइगर मैन ऑफ इण्डिया कहते हैं।
- इनको 1992 में पद्मश्री मिला है।
- इनकी पुस्तक- द रिटर्न ऑफ टाईगर/द टाईगर
राज्य का एकमात्र पक्षी चिकित्सालय - जौहरी बाजार की स्थापना 1953 में की गई है।
मृगवन -7
- अशोक विहार- जयपुर (1986)
- संजय उद्यान- कोटपूतली-बहरोड (1986)
- माचिया सफारी मृगवन-जोधपुर (1985)
- अमृतादेवी विश्नोई मृगवन-जोधपुर (1994)
- सज्जनगढ़ मृगवन-उदयपुर (1984)
- पुष्कर मृगवन-अजमेर (1985)
- दुर्ग मृगवन-चित्तौड़गढ़ (1969)
नोट- आठवाँ मृगवन बाराँ में प्रस्तावित है। देश का प्रथम राष्ट्रीय वानस्पतिक उद्यान माचिया सफारी पार्क।
जंतुआलय - 5
1. जयपुर जंतुआलय-जयपुर
स्थापना- 1876 ई., रामसिंह द्वितीय ने।
सबसे प्राचीन व सबसे बड़ा जंतुआलय।
इसे नाहरगढ़ जैविक उद्यान में शामिल कर दिया।
घड़ियाल व मगरमच्छ के प्रजनन के लिए प्रसिद्ध।
2. उदयपुर जंतुआलय-उदयपुर
स्थापना- 1878 ई., में स्वरूप सिंह के द्वारा
वर्तमान में गुलाब उद्यान में स्थित।
इसे सज्जनगढ़ जैविक उद्यान में स्थानांतरित किया जाएगा।
3. जोधपुर जंतुआलय-जोधपुर
स्थापना- 1936 ई.
गोडावन पक्षी के प्रजनन हेतु प्रसिद्ध माचिया सफारी पार्क में स्थानांतरित किया जाएगा।
4. कोटा जंतुआलय-कोटा
स्थापना- 1954 ई., नवीनतम जंतुआलय
5. बीकानेर जंतुआलय-बीकानेर
- यह जंतुआलय वर्तमान में बंद है।
नोट- 6 वाँ जंतुआलय अजमेर में प्रस्तावित।
- गधों का अभयारण्य- झुंझुनूँ में प्रस्तावित।
- भालू अभयारण्य- सुंधा माता (जालौर)
- गाय अभयारण्य- बीकानेर
नोट- भालू बचाओ केंद्र/बीयर रेस्क्यू सेन्टर - नाहरगढ़ अभयारण्य (जयपुर) में खोला गया।
- चीता अभयारण्य- शाहगढ़ बल्ज (जैसलमेर)
- गिद्ध कंजर्वेशन- जोहड़बौड़ (बीकानेर)
- मछली अभयारण्य- बड़ी तालाब (उदयपुर)
अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य
1. गोडावण
- इसको हिंदी में सोहन/गुधनमेर/हुकान
- राजस्थानी में- गोडावण/गुंजन
- गुजराती में- घोडाड कहते हैं।
- यह पक्षी शर्मीला होता है एवं एकान्त में रहता है।
- इसका आकार बड़ा होता है तथा वजन में भी भारी होता है।
- यह जल के नजदीक घास में घोंसला बनाकर रहता है एवं वृक्षों पर नहीं बैठता है।
- यह मूलत: अफ्रीकी पक्षी है।
यह कीड़े-मकोड़े, टिड्डी, चूहे, छिपकली, बिच्छू, सांप, केर, बेर एवं जंगली पेड़ों को खा लेता है। इस कारण यह सर्वभक्षी श्रेणी में आता है।
- इसलिए इसको किसान मित्र भी कहते हैं। इसकी प्रजनन शक्ति बहुत कम होती है क्योंकि मादा एक बार में एक या दो अंडे ही देती है।
- इसके सिर पर एक काला तुर्रा भी होता है।
- राजस्थान में सर्वाधिक- जैसलमेर, बाड़मेर
- यह शोकलिया (अजमेर) एवं सोरसन (बाराँ) में भी मिलता है।
2. राजहंस (फ्लेमिंगो)
यह कच्छ के रण में प्रजनन करते हैं।
यह सितम्बर के महीने में सांभर झील की ओर आ जाते हैं।
गुलाबी चोंच, लम्बी टाँगें, गुलाबी पंख तथा सारस जैसी आकृति वाला पक्षी है।
इसकी ऊँचाई- 4 फीट होते हैं।
3. कोर्सर
तालछापर में मिलते हैं। हिन्दी में इसे क्षिप्रचला कहते हैं।
इसके सिर पर बादामी रंग का सुंदर शिखर होता है तथा आँखों के बीच से होती हुई काली व सफेद पट्टी होती है जो सिर तक जाती है।
इस पक्षी के पैर सफेद रंग के होते हैं।
4. खरमोर/तिलोर
शोकलिया (अजमेर) में खरमोर तथा गोडावण मिलता है।
देशी मुर्गे जैसा होता है।
इनके पंख पीछे की तरफ घूमे हुए पाए जाते हैं।
इनके पंखों के किनारे सफेद होते हैं।
यह अत्यधिक घास वाले क्षेत्र में बच्चों को जन्म देते हैं।
5. साइबेरियन सारस
यह नवम्बर के अंत में या दिसम्बर के प्रारंभ में राजस्थान आते हैं और मार्च के अंत में चले जाते हैं।
6. उड़न गिलहरी
यह एक दुर्लभ एवं लुप्तप्राय: वन्य जीव प्रजाति है।
यह रात्रिरचर जीव है।
यह रातभर भोजन की तलाश में एवं सूर्योदय से पहले वृक्षों में बनाए कोटरों में आ जाती है।
गति- 60-70 किमी./घण्टा
7. जांघिल/पेन्टर्ड स्टार्क
एक प्रकार का सारस, इसकी चोंच लम्बी, भारी एवं पीले रंग की होती है।
इसके सफेद पंखों पर धारियाँ एवं चमकीले हरे-काले निशान होते हैं।
इसके शरीर पर कुछ गुलाबी अंश भी दिखाई देते हैं।
यह राज्य में केवलादेव, उदयपुरिया तालाब (कोटा), तालाबशाही (धौलपुर) में दिखाई देता है।
8. जंगली मुर्गे
यह उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों एवं पहाडी क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है।
यह सामान्यत: घरेलू पक्षी जैसा चालाक एवं खूबसूरत होता है।
इसमें नर पक्षी की पूँछ (दुम) हसियांकार काले रंग की एवं मादा की पूंछ लाल रंग की होती है।
राज्य में यह माउंट आबू एवं कुंभलगढ़ अभयारण्य में देखे जा सकते हैं।
9. कुरजा पक्षी (डोमोसियल क्रेन)
यह सर्वाधिक खींचन में मिलता है।
जैव विविधता से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य
अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधन संरक्षण एवं संगठन (International Union for Conservation of Nature)
स्थापना - 5 अक्टूबर 1948
उद्देश्य - विश्व में घटती हुई जैव विविधता को सुरक्षित करने के लिए इसका गठन किया गया। विश्व की आशंकित जातियों की खोज करके एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जाता है जिसे रेड डाटा बुक कहा जाता है। इस पुस्तक का प्रथम प्रकाशन 1 जनवरी 1972 को हुआ।
रेड डाटा बुक में निम्न जानकारियाँ होती है -
- लाल रंग के पृष्ठों पर मुद्रित - इसके अन्तर्गत विलुप्त हो रही प्रजातियाँ तथा उनके बचाव से संबंधित लेखों का उल्लेख होता है।
- सफेद रंग के पृष्ठों पर मुद्रित - इसके अन्तर्गत ऐसी प्रजातियाँ आती है जो एक निश्चित स्थान पर पाई जाती हैं जिसको हम दुर्लभ प्रजातियाँ अर्थात् संकटग्रस्त या संकटापन्न कहते हैं तथा इस प्रकार की जातियों की संख्या भी बहुत कम होती है।
- पीले रंग के पृष्ठों पर मुद्रित - इसके अन्तर्गत ऐसी जातियाँ आती है जो क्रमिक रूप से तेजी से कम हो रही है।
- भूरे रंग के पृष्ठों पर मुद्रित - इनके अन्तर्गत ऐसी जातियाँ आती हैं जिनका समग्र विवरण उपलब्ध नहीं है तथा ऐसी विवेचना की जाती है कि इनकी संख्या भी कम हो रही है।
- हरे रंग के पृष्ठों पर मुद्रित - इसके अन्तर्गत ऐसी जातियाँ आती है जिनका संरक्षण कर लिया गया है तथा ऐसा अनुमान है कि इनकी संख्या भी लगातार बढ़ रही है।
जैविक जातियों का वर्गीकरण
इनके अन्तर्गत ऐसी जातियाँ आती है जो संकटाधीन दृष्टिकोण से रखी गई हैं-
- विलुप्त प्राय: प्रजातियाँ (Threatened Species-T)- ऐसी प्रजातियाँ जिनकी संख्या लगातार कम हो रही है।
- संकटग्रस्त/संकटापन्न जातियाँ (Endangered Species -E)- इसके अन्तर्गत ऐसी जातियाँ आती है जो तेजी से कम हो रही हैं तथा भविष्य में विलुप्त होने का खतरा है।
- क्षतिग्रस्त जातियाँ (Vulnerable Species -V)- इनकी संख्या लगातार कम हो रही है तथा अतिशीघ्र संकटग्रस्त श्रेणी में आने की पूरी संभावना है।
- दुर्लभ/विरल जातियाँ (Rare Species-R)- यह सीमित भौगोलिक क्षेत्र में आबाद है अर्थात् बहुत कम संख्या रह गई हैं।
- विलुप्त जातियाँ (Extinct Species)- इसके अन्तर्गत ऐसी जातियाँ आती है जिनका अस्तित्व अतीत में था, लेकिन अब ये भी समाप्त हो रही हैं।
विलुप्त प्राय/लुप्त प्राय/विलुप्ति के कगार पर जातियाँ निम्न हैं-
- पक्षी- इण्डियन क्रेन (सारस)
- सरीसृप - घडियाल, कछुआ, अजगर, मीठे पानी का मगरमच्छ
- द ग्रेट इण्डियन बस्टर्ड - गोडावन- यह राज्य में केवल सौंखलियां (अजमेर) सोरसन (बाराँ) में मिलता है।
- पेड़ों के ऊपर घोंसला बनाकर रहने वाला हार्नबिल्स है।
- गैंडा (द ग्रेट इण्डियन रायनोसोरस) - यह भारत में केवल काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में मिलता है।
राजस्थान के वन मण्डल निम्न हैं- राज्य के प्रमुख वन मण्डल निम्न है-
- जयपुर मण्डल- जयपुर, सीकर, झुंझुनूँ, दौसा, सवाईमाधोपुर (पश्चिमी भाग)
- जोधपुर मण्डल- जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, जालौर, पाली, चूरू, श्रीगंगानगर, बीकानेर।
- उदयपुर मण्डल- उदयपुर, राजसमंद
- सिरोही मण्डल- सिरोही
- बाँसवाड़ा मण्डल- बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, चित्तौड़गढ़ (दक्षिणी भाग)
- बाराँ मण्डल- बाराँ
- चित्तौड़गढ़ मण्डल- चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा (दक्षिणी-पश्चिमी भाग)
- झालावाड़ मण्डल- झालावाड़
- कोटा मण्डल- कोटा
- बूँदी मण्डल- बूँदी
- अजमेर मण्डल- अजमेर
- टोंक मण्डल- टोंक, भीलवाड़ा (उत्तरी-पूर्वी भाग)
- भरतपुर मण्डल- अलवर, भरतपुर, धौलपुर, सवाईमाधोपुर (पूर्वी भाग)
वन विकास से संबंधित योजनाएँ
1. अरावली विकास कार्यक्रम
यह योजना पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के लिए शुरू की गई केन्द्र की योजना है तथा इसे पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में उल्लेखित किया गया है।
इसके उद्देश्य निम्न हैं:-
- वनों की कटाई रोकना
- मरूस्थलीकरण को रोकना
- जल एवं भूमि का उचित संरक्षण करना।
- ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों का विकास करना।
- चारागाह को विकसित करना।
- बंजर भूमि का पुनर्निर्माण करना।
- पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यावरण को सुधारना।
- अभयारण्यों का विकास करना।
- इस परियोजना में मुख्य उद्देश्य जनता की सक्रिय रूप से भागीदारी बनाना।
इस परियोजनाओं के अन्तर्गत केन्द्र तथा राज्य के मध्य 75 : 25 का अनुपात रखा गया तथा इस योजना को दो चरणों में रखा गया-
(अ) अरावली वृक्षारोपण परियोजना
- शुरूआत- 1992
- सहयोग- जापान
- इसका प्रमुख उद्देश्य अरावली के अंतरालों में पेड़-पौधे लगाना तथा जल संसाधनों का विकास करना है। जैसे-बाँध तथा एनिकट का निर्माण करना।
- भूमि का कटाव व अवैध खनन को रोकने से संबंधित कार्य को बढ़ावा देना। इस योजना को दस पर्वतीय जिलों में लागू किया गया। इसका प्रथम चरण 1992 से 1997 तक चला।
- प्रथम चरण कम समय चलने का कारण है कि भारत ने 1998 में परमाणु परीक्षण किया जिसके तहत विदेशों से सहायता मिलना कम हो गया।
(ब) पुष्कर समन्वित विकास परियोजना
- इस परियोजना का उद्देश्य पुष्कर घाटी में वनों का विकास करना है तथा पुष्कर झील में मिट्टी के भराव को रोकना है।
- इस कार्यक्रम के अन्तर्गत पुष्कर झील से मिट्टी को बाहर निकालना, अत्यधिक वृक्षारोपण करना तथा भू-संरक्षण एवं वानिकी विकास के कार्यक्रमों को बढ़ावा देना। इस परियोजना की शुरूआत 1997-1998 में कनाडा के सहयोग से की गई तथा इसको अरावली विकास कार्यक्रम में शामिल किया गया। नागौर तथा पुष्कर की तरफ मरूस्थलीकरण के प्रसार को सीमित करने का उद्देश्य रखा गया। यह योजना इंडिया-कनाडा एनवायरमेंट फेसिलिटी के सहयोग से चलाई गई। इस योजना को पुष्कर गेप योजना के नाम से भी जाना जाता है।
2. वानिकी विकास परियोजना
- शुरूआत- 1995
- इसको राज्य के गैर मरूस्थलीय जिलों में लागू किया गया। यह योजना OECF (Overseas Economic Cooperation Fund) के सहयोग से शुरू की गई। यह कम्पनी जापान की सहायता से संचालित है।
3. जनता वन योजना
- शुरूआत- 21 मार्च, 1996
- इसका मुख्य उद्देश्य जनता की भागीदारी के साथ में वनों का विकास करना है।
- इस योजना का मुख्य उद्देश्य गैर राजकीय संस्थाओं के माध्यम से वृक्षों के संरक्षण एवं लगाने से संबंधित है।
4. मरूस्थल वृक्षारोपण कार्यक्रम
- शुरूआत- 1978
- यह केन्द्र की योजना है जिसका मुख्य उद्देश्य मरूस्थलीकरण के प्रसार को रोकना है जिसके तहत वृक्षारोपण एवं चारागाहों का विकास करना है।
5. तेन्दु पत्ता योजना
- इस पत्ते से बीड़ी बनाई जाती है तथा इस पत्ते का राष्ट्रीयकरण 1974 में कर दिया गया तथा यह राज्य में लघुवन उपज आय प्राप्ति का प्रमुख स्रोत है तथा यह राज्य में कोटा, बारां, झालावाड़, चित्तौड़गढ़, डूँगरपुर जिलों में मिलता है।
6. ऑपरेशन खेजड़ी
- शुरूआत- 1991
- इसका मुख्य उद्देश्य मरूस्थलीकरण के प्रसार को रोकना है तथा इस योजना से खेजड़ी से संरक्षण, संवर्द्धन एवं प्रसार करना है। खेजड़ी को पंजाबी हरियाणवी में जांटी, तमिल भाषा में पेयमेय, कन्नड़ भाषा में बन्ना-बन्नी, विश्नोई संप्रदाय में शमी तथा स्थानीय भाषा में सीमलो के नाम से जाना जाता है।
- राज्य में 1000 वर्ष पुराने खेजड़ी का वृक्ष मांगलियावास (ब्यावर) में मिला है तथा विजयादशमी को खेजड़ी के वृक्ष की पूजा की जाती है। इस वृक्ष के नीचे गोगाजी एवं जुझार बाबा के मंदिर का थान बनाया जाता है।
- खेजड़ी के वृक्ष को दो कीड़े नुकसान पहुँचाते हैं सेलेस्ट्रेना (कीड़ा) एवं ग्लाइकोटमा (कवक) है।
- खेजड़ी के वृक्ष पर 5 जून, 1988 को 60 पैसे का डाक टिकट जारी किया गया।
- खेजड़ी दिवस 12 सितम्बर को मनाया जाता है तथा प्रथम खेजड़ी दिवस 12 सितम्बर, 1978 को मनाया गया।
7. शहरी वानिकी योजना
- शुरूआत- 1995-96
- इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में पर्यटकों वाले क्षेत्रों में वृक्षारोपण करना है ताकि हरितपट्टियों का विकास किया जा सके। इस योजना के अन्तर्गत सार्वजनिक स्थल, धार्मिक स्थल, सड़क तथा अस्पतालों में वृक्षारोपण करना है।
8. बायोलॉजिकल पार्क योजना
- इस योजना का शुभारंभ 1 अक्टूबर 1994 में किया गया तथा नाहरगढ़ (जयपुर) को जैविक उद्यान बनाने का निर्णय लिया गया। इस पार्क का उद्देश्य चिड़ियाघर में रहने वाले विशेष वन्य प्राणी जीव तथा विलुप्त हो रही प्रजातियों को प्राकृतिक आवास में संरक्षण उपलब्ध करवाना है।
- इस जैविक उद्यान के बाद में निम्न जैविक उद्यानों को विकसित किया गया जैसे- सज्जनगढ़, माचिया सफारी तथा अभेड़ा है।
9. राष्ट्रीय बाँस मिशन कार्यक्रम
यह भारत सरकार के द्वारा शत-प्रतिशत वित्तीय सहायता के आधार पर चलाई गई है।
इसका मुख्य उद्देश्य बाँस की कृषि को बढ़ावा तथा उद्यानिकी पौधशालाओं का निर्माण करना है।
10. राजस्थान हरित परियोजना
- यह नरेगा के तहत संचालित की जा रही है जिसकी शुरूआत 2009 में की गई तथा यह 2009 से 2014 तक क्रियान्वित रही। यह योजना सम्पूर्ण राजस्थान में लागू की गई जिसका उद्देश्य चारागाह भूमि, सार्वजनिक भूमि तथा सड़कों के किनारे वृक्षारोपण करना है।
- इसका शुभारंभ 18 जून 2009 को जयपुर में स्थित शिक्षा संकुल में किया गया है।
11. गूग्गल संरक्षण एवं विकास परियोजना
शुरूआत- 2008-09 यह एक प्रकार की औषधि फसल है तथा यह योजना इसके विकास एवं संरक्षण के लिए शुरू की गई।
इसके अन्तर्गत बाड़मेर तथा जोधपुर को गूग्गल संरक्षण क्षेत्र घोषित किया गया।
12. फॉरेस्ट इंस्टीट्यूट ऑफ एक्सीलेंस-जयपुर
इसका उद्देश्य वन तथा वन्य जीवन के कार्यों से संबंधित प्रशिक्षण उपलब्ध करवाने का कार्य करेगा इसकी एक शाखा रणथम्भौर में भी स्थापित की गई है। यह देश का दूसरा वन्यजीवों के कार्यों से संबंधित प्रशिक्षण केन्द्र है।
देश का प्रथम ऐसा प्रशिक्षण केन्द्र देहरादून में है।
13. रूख-भायला
इसकी शुरूआत सर्वप्रथम 1986 में डूंगरपुर से की गई। भायला का अर्थ मित्र है तथा रूख का अर्थ वृक्ष से है। इसका उद्देश्य वृक्षों के संरक्षण से संबंधित है।
14. पेडॉक्सी योजना
- इस योजना की शुरूआत पर्यावरण संरक्षण हेतु सन् 2007-08 में की गई।
राज्य में वन तथा पर्यावरण से संबंधित राज्यस्तरीय संस्थान:-
- रेगिस्तान वनीकरण केन्द्र- जोधपुर, स्थापना 1952
- रेगिस्तान वनीकरण एवं मृदा संरक्षण केन्द्र- बासनी, जोधपुर स्थापना- 1957
- राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मण्डल- जयपुर, स्थापना 1975
- शुष्क वन अनुसंधान केन्द्र- जोधपुर, स्थापना 1988 इसकी स्थापना केन्द्रीय स्तर पर 1985 में की गई।
- राजस्थान राज्य जैव-विविधता बोर्ड- स्थापना 2010
- राज्य वन विकास अभिकरण- स्थापना 2010
- मरू वन प्रशिक्षण केन्द्र- जोधपुर
- राजस्थान वन प्रशिक्षण केन्द्र- अलवर
- राजस्थान वानिकी प्रशिक्षण केन्द्र- जयपुर
- राजस्थान ग्राम फॉर्म नर्सरी केन्द्र- जयपुर
- विश्व वानिकी वृक्ष उद्यान केन्द्र- झालाना, जयपुर
राजस्थान ईको टूरिज्म साईट निम्न है-
- भैंसरोडगढ़- चित्तौड़गढ़
- मुकन्दरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान- कोटा, झालावाड, बूंदी, चित्तौड़गढ़
- सुन्धा माता- जालौर
- मेनाल व हम्मीरगढ़- भीलवाड़ा
- पंचकुंड मृगवन- पुष्कर
- गुढ़ाबिश्नोई- जोधपुर
- बस्सी-सीतामाता- चित्तौड़गढ़
वनों से संबंधित महत्वपूर्ण शब्दावली:-
- बीड़- पशुओं की चराई से संबंधित मैदान, जिसे चारागाह भी कहते हैं।
- सूड- खेत में स्वतः होने उगने वाली कंटीली झाड़ियों को फसल उगाई से पूर्व काटने की प्रक्रिया अर्थात् खेत को साफ करने की प्रक्रिया को सूड कहते है।
- ओरण- वह गोचर भूमि जिसे किसी देवता को अर्पित करने के बाद उसमें से कोई भी लकड़ी नहीं काटता है तो इसको ओरण भूमि कहते है।
- लाखावट- तालाब के मध्य में एक छोटा टापू बना होता है जिस पर विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ होती है, जिसे लाखावट कहते है।
- आल- एक पौधा जिसकी जड़ व छाल से लाल रंग बनता है जिसे आल के नाम से जाना जाता है।
- आगोर - किसी भी जलाशय के आस-पास में जो पड़ती भूमि होती है उसमें से वृक्ष नहीं काट सकते हैं।
- आंबीहलद - हल्दी-कपूर औषधि में काम आती है।
- साका खडाना - विश्नोई संप्रदाय के द्वारा वृक्षों के संरक्षण के लिए दिये गये बलिदान को साका खडाना के नाम से जाना जाता है।
प्रमुख दिवस
- राष्ट्रीय बाघ दिवस - 14 फरवरी
- विश्व वानिकी दिवस - 21 मार्च
- विश्व मौसम दिवस - 23 मार्च
- विश्व स्वास्थ्य दिवस - 7 अप्रैल
- जन संसाधन दिवस - 10 अप्रैल
- पृथ्वी दिवस - 22 अप्रैल
- जैव विविधता दिवस - 22 मई
- तंबाकू मुक्ति दिवस - 31 मई
- विश्व महासागर दिवस - 8 जून
- विश्व जनसंख्या दिवस - 11 जुलाई
- विश्व बाघ दिवस - 29 जुलाई
- विश्व ओजोन दिवस - 16 सितंबर
- विश्व गैण्डा दिवस - 22 सितंबर
- विश्व वन्य जीव दिवस - 3 मार्च
- विश्व प्राकृतिक आवास दिवस - 3 अक्टूबर
- वन्य जीव सप्ताह - 2-7 अक्टूबर
- विश्व शाकाहार दिवस - 1 अक्टूबर
- विश्व खाद्य दिवस - 16 अक्टूबर
- विश्व आपदा नियंत्रण दिवस - 13 अक्टूबर
- विश्व पर्यावरण जागरूकता माह - 19 अक्टूबर-15 नवंबर
- राष्ट्रीय पक्षी दिवस - 12 नवम्बर
- विश्व पर्यावरण दिवस - 5 जून
- राष्ट्रीय प्रदूषण रोकथाम दिवस - 2 दिसंबर
जिलों के सुभंकर
| जिला | शुभंकर |
|---|---|
| अजमेर | खड़मोर |
| अलवर | सांभर |
| बाँसवाड़ा | जलपीपी |
| बाराँ | मगरमच्छ |
| बाड़मेर | मरु लोमड़ी |
| भीलवाड़ा | मोर |
| बीकानेर | भट्ट तीतर |
| बूँदी | सुर्खाब |
| चित्तौड़गढ़ | चौसिंगा |
| चूरू | काला हिरण |
| दौसा | खरगोश |
| धौलपुर | पंछीड़ा |
| डूंगरपुर | जांघिल |
| हनुमानगढ़ | छोटा किलकिला |
| जैसलमेर | गोडावण |
| जालौर | भालू |
| झालावाड़ | गागरौनी तोता |
| झुंझुनूँ | काला तीतर |
| जोधपुर | कुरजाँ |
| करौली | घड़ियाल |
| कोटा | ऊदबिलाव |
| नागौर | राजहंस |
| पाली | तेन्दुआ |
| प्रतापगढ़ | उड़न गिलहरी |
| राजसमंद | भेड़िया |
| सवाईमाधोपुर | बाघ |
| श्रीगंगानगर | चिंकारा |
| सीकर | शाहीन |
| सिरोही | जंगली मुर्गा |
| टोंक | हंस |
| उदयपुर | कब्रविज्जु |
| जयपुर | चीतल |
| भरतपुर | सारस |
प्रमुख जीवों की सामान्य जानकारी
1. बाघ (टाइगर)
- बाघ की लम्बाई 2.5 मी.
- वजन- 140 कि.ग्रा.
- इसमें पेड़ पर चढ़ने की प्रवृत्ति कम ही होती है।
- इसके मूंछों के बालों की लम्बाई 5 इंच तक होती है।
- रंग- सुनहरा
- शरीर पर काली धारियाँ होती है।
2. बघेरा (Panther/पैंथर)
- यह बाघ से छोटा होता है।
- यह बलवान एवं फुर्तीला होता है।
- लम्बाई - 1.75 मीटर से 2.5 मीटर तक
- वजन - 50 से 70 किग्रा.
- चीता एवं बघेरा में भिन्नता होती है।
- बघेरा चीता की अपेक्षा बड़ा होता है।
3. तेन्दुआ
यह फुर्तीला एवं पेड़ों पर चढ़ जाता है। यह चीते से अधिक फुर्तीला होता है लेकिन गति चीते से अधिक नहीं है।
यह पानी में भी तैर सकता है इस कारण यह पानी में जाकर मछलियों को खा जाता है।
यह बिल्ली परिवार का सदस्य है ।
इसकी खाल पर धब्बे अनियमित होते हैं ।
4. चीता
इसके शरीर पर गोल धब्बे (काले) होते हैं तथा व्यवस्थित एक समान और क्रम में होते हैं।
5. हिरण (Antelope)
ये खुले क्षेत्रों में एवं घास के मैदानों में रहना पसंद करते हैं।
इनकी दौड़ने की गति अधिक है जो इनके बचाव का कारण है।
ये जुगाली भी करते हैं।
हिरण एवं मृग (Deer) में अंतर होता है-
हिरण-
- इसके सींग छल्लेदार होते हैं एवं गिरते नहीं है ।
- इनके मुख्य सींग के दो भाग होते हैं ।
- मृग-हिरण की तरह इनके सींग के दो भाग नहीं होते हैं।
- इनके सींग 1 या 2 वर्षों में गिरकर फिर से नये आ जाते हैं।
- अपने सींगों से स्वयं की रक्षा करते हैं।
- यह शाकाहारी श्रेणी में आते हैं तथा घास, पत्तियाँ एवं फल खाकर जीवन- यापन करते हैं।
राजस्थान में हिरण श्रेणी के 4 प्रकार के एवं मृग श्रेणी के 2 प्रकार के मृग मिलते हैं, जो निम्न हैं-
- (i) हिरण श्रेणी - चिंकारा, काला हिरण, चौसिंगा, नीलगाय
- (ii) मृग श्रेणी - चीतल, सांभर
(i) हिरण श्रेणी
1. चिंकारा
ये छोटे कद का सुंदर पशु है इसके सींग सुंदर होते हैं तथा मादा के सींग बहुत छोटे होते हैं। इसके सींग- चक्राकार होते हैं।
2. काला हिरण/कृष्ण मृग
संस्कृत भाषा में इसे ऐरना कहते हैं।
इसका ऊपरी भाग काला होता है एवं पेट के नीचे का भाग सफेद होता है।
सींग लम्बे एवं चक्राकार होते हैं।
इनमें सींग वाली मादा कम होती है।
इसकी गति 80 से 90 किमी./घंटा है।
यह राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, मध्य प्रदेश में पाया जाता है।
3. नीलगाय/रोजड़ा
इनमें नर का रंग काला- नीला एवं मादा का रंग भूरा होता है।
यह खेतों में फसलों को सर्वाधिक नुकसान पहुँचाता है।
यह सामान्यतः समूह (झुण्ड) में रहता है।
यह घोड़ा जैसा दिखाई देता है।
4. चौसिंगा
इसका ऊपरी रंग हल्का भूरा व लाल होता है लेकिन नीचे का सफेद होता है।
इसके दो जोड़ी के रूप में सींग होते हैं।
इसके सामने वाले सींग छोटे एवं पीछे वाले सींग बड़े होते हैं।
चार सींगों वाला यह जीव विश्व का एकमात्र जीव है जो केवल भारत में मिलता है।
इसको 'घटेल' भी कहते हैं।
इसके सींग चक्राकार नहीं होते हैं तथा मादा के सींग नहीं होते हैं।
(ii) मृग श्रेणी
1. सांभर
इसके कान लम्बे होते हैं।
रंग-भूरा बादामी या हल्का काला। इनमें नर के रंग में कालापन अधिक है जबकि मादा एवं बच्चे का कम है।
सींग की सामान्य लम्बाई: 110-115 सेमी.
इनके प्रत्येक सींग में 3 नुकीली शाखाएँ होती हैं।
इनको कीचड़ में लोट लगाना अधिक पसंद है।
2. चीतल
यह सबसे सुंदर मृग है।
इसके चमकदार सुनहरे भूरे रंग पर सफेद रंग के गोल धब्बे होते हैं।
सांभर की तरह इसके भी नर चीतल के प्रत्येक सींग के 3 भाग होते हैं।
इनके सींग प्रतिवर्ष गिरते रहते हैं।
इनकी सूंघने, देखने एवं सुनने की तीव्र क्षमता होती है।


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