सूफी आंदोलन (राजस्थान)

सूफी आंदोलन (राजस्थान)

सूफी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 869 ई. में बसरा (अरब) के जिहाद ने किया। सूफी आंदोलन 8वीं सदी में प्रारम्भ हुआ।
sufi-aandolan-rajasthan
भारत में अरब आक्रमणकारियों के साथ सूफी संतों ने प्रवेश किया तथा सिंध व दक्षिण भारत में प्रचार किया। भारत में वास्तविक सूफी आंदोलन का प्रारम्भ 12वीं सदी में अबुल हसन हज हुज्विरी ने की जिनकी कब्र लाहौर में बनी है। अबुल फजल ने ‘कश्फूल महजूब’ की रचना की। अबुल फजल हसन के बाद बाबा फखरूद्दीन आये। जिन्होंने द. भारत के पेन्नु कोंडा में अपने विचार प्रसारित किये। सैयद मुहम्मद बन्दा विज गेसू दराज भी प्रमुख सूफी संत थे जिन्होंने ‘मेराजुल आशकीन’ की रचना की।
  • भारत में सूफी आन्दोलन 12वीं सदी में प्रारम्भ हुआ।
  • सूफी मत के 12 सिलसिले थे।
  • आईन-ए-अकबरी में 14 सिलसिले माने हैं।
  • सूफी मत रहस्यवादी हैं।
इब्न-उल-अराबी- प्रथम सूफी संत थे जिसने वहादत-उल-वजूद का सिद्धांत दिया, जो एकत्व का सिद्धांत है।
अबू याजीद उल विस्तानी महत्वपूर्ण सूफी संत थे।

सूफियों की शब्दावली (प्रारंभ में लिखनी है।)
  • गुरू - पीर/मुर्शीद
  • शिष्य - मुरीद
  • निवास - खानकाह
  • उत्तराधिकारी - बली
  • शिक्षा देने का स्थान - जमैतखाना
  • रबिया - प्रथम महिला संत
  • मंसूर बिन हल्लाज - प्रथम सूफी संत
  • कथन - मलफूजात
  • पत्र - मकतूबात
  • समा - नृत्य, संगीत
  • फना - ईश्वर में डूबना
  • जन्नत - स्वर्ग
  • दोजख - नरक
पंक्ति में बैठकर अल्लाह की आराधना करना
जो आध्यात्मिक लोग पवित्रता व सादगी का जीवन जीते थे वे सूफी कहलाये।

सूफी सिलसिले के दो भाग हैं-
  1. बा-शरा- इस्लामी विधान को मानने वाले- इसमें चिश्ती, सुहरावर्दी व कादरी सिलसिले प्रसिद्ध हैं।
  2. बे-शरा- इस्लामी विधान को न मानने वाले

विशेषताएँ-
  • सूफी मत इस्लामी देशों में उदय हुआ।
  • एक सूफी गुरु व शिष्यों को मिलाकर एक सिलसिला बना।
  • इस मार्ग में प्रेम की प्रधानता है।
  • इसमें नारी के अपूर्व शौर्य का वर्णन है।
  • संगीत से मन केन्द्रित होता है।
  • बिना गुरु के ज्ञान प्राप्त नहीं होता।

सुहरावर्दी सम्प्रदाय

सुहरावर्दी सम्प्रदाय का मूल प्रवर्तक जियाउद्दीन अबुलजीव थे।
इस सम्प्रदाय की स्थापना 13 वीं सदी में बगदाद के जलालुद्दीन सुर्खपोश, शियाबुद्दीन सुहरावर्दी ने की थी।
भारत में इस सम्प्रदाय के संस्थापक शेख बाहुद्दीन जकारिया, जल्लालुद्दीन तबरीजी थे। जिन्होंने बंगाल में इसकी स्थापना की। बाहुद्दीन जकारिया ने 13वीं सदी में मुल्तान में खानगार स्थापित की। बहाउद्दीन जकारिया ने इल्तुतमिश को कुबाचा के विरुद्ध सहायता की तब इल्तुतमिश ने बहाउद्दीन को राजनीतिक पद दिया।
सैयद जलालुद्दीन तबरीजी, शेख रुकनुद्दीन, अबुल फतह व सैयद जलालुद्दीन बुखारी प्रमुख संत हुए हैं।
सैयद जल्लालुद्दीन सुर्ख बुखारी- यह सुहरावर्दी संप्रदाय का संत था। मोहम्मद तुगलक ने इन्हें काजी का पद दिया। 36 बार इन्होंने मक्का की यात्रा की जिस कारण इन्हें जहानियाँ जहांगश्त कहते हैं।
सुहरावर्दी संप्रदाय के संत शेख मूसा स्त्री वेश रखते थे तथा इनकी संगीत व नृत्य में रूचि थी।

विशेषताएँ-
  • राजनीति में रुचि।
  • धन को भक्ति में बाधा नहीं मानते।
  • सुखमय जीवन की कामना करते हैं।
  • मन साफ होना चाहिए।
  • अस्सलाम वालेकुम से अभिवादन करते हैं।

कादरी सम्प्रदाय

इसकी स्थापना बगदाद में सैयद अब्दुल कादिर जिलानी ने (1077-1166 ई.) की थी।
भारत में इसकी स्थापना 15 वीं सदी में सैयद नासिरुद्दीन मोहम्मद जिलानी व नियामतुला ने सिंध प्रदेश में की थी।
शेख मीर मोहम्मद मियां मीर (1635 ई.) इस सम्प्रदाय के प्रमुख संत हुए। इन्होंने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की नींव रखी थी। गुरु अर्जुनदेव इनके शिष्य थे।
शेख मीर मोहम्मद मियां मीर का शिष्य मुल्लाशाह था। दारा व जहांआरा मुल्लाशाह के शिष्य थे।
यह संप्रदाय रहस्यमय सिलसिला था।

चिश्ती सम्प्रदाय

इसकी स्थापना ख्वाजा अब्दुल चिश्ती ने ईरान में की थी।
हजरत शेख उस्मान हारूनी के शिष्य ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती थे।
ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के शिष्य कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, हमीमुद्दीन नागौरी थे।
कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के शिष्य ख्वाजा फरउद्दीन मसूद/बाबा फरीद/फरीदुद्दीन गज-ए-शक्कर थे।
ख्वाजा फरदुद्दीन मसूद के शिष्य निजामुद्दीन औलिया व शेयार मोहम्मद गेसूदराज/बन्दा नवाज थे
निजामुद्दीन औलिया के शिष्य - शेख नासिरुद्दीन महमूद, शेख बुरहानुद्दीन गरीब, अमीर खुसरो थे।

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती
इनका जन्म 1143 ई. में फारस में हुआ था तथा निधन 1235 ई. में अजमेर में हुआ था।
चिश्ती सम्प्रदाय की स्थापना ख्वाजा अबु अब्दुला चिश्ती ने हैरात में की थी।
भारत में चिश्ती सम्प्रदाय, सूफी परम्परा की स्थापना ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने की थी।
इन्हें गरीब नवाज कहा जाता है।
ये मोहम्मद गौरी के साथ पृथ्वीराज चौहान के समय (तराईन-III 1192) भारत आये थे।
मोहम्मद गौरी ने इन्हें सुल्तान अल हिन्द (हिन्दुस्तान का आध्यात्मिक गुरु) की उपाधि दी।
अजमेर में इनकी दरगाह का निर्माण प्रारम्भ इल्तुतमिश ने तथा पूर्ण हूमायूँ ने करवाया।
मुख्य गुम्बद का निर्माण ग्यासुद्दीन ने करवाया।
दरगाह में बड़ी देग (कड़ाई) अकबर ने तथा छोटी देग जहाँगीर ने दी थी।
मोइनुद्दीन हजरत शेख उस्मान हारुनी के शिष्य थे।
ख्वाजा मोइनुद्दीन के शिष्य कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के शिष्य बाबा फरीद, बाबा फरीद के शिष्य निजामुद्दीन औलिया, निजामुद्दीन औलिया के शिष्य अमीर खुसरो थे।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में रज्जब की 1 से 6 तारीख को मेला भरता है। जिसका उद्घाटन भीलवाड़ा का गौरी परिवार करता है।
चिश्ती सम्प्रदाय तीर्थ यात्रियों को जायरीन, उत्तराधिकारी को वली, शिष्य को मुरीद, गुरु को इदु/मुर्शीद, उपदेश स्थल को जमीदखाना, तीर्थ-यात्रा को जियारत व निवास स्थल को खानकाह कहते हैं।

चिश्ती संप्रदाय की तीन शाखाएँ है-
  1. नागौरी
  2. साबिरी
  3. निजामी।

फिरदौसी सिलसिला

फिरदौसी सिलसिले की स्थापना 13वीं सदी में शेख बदरुद्दीन ने बिहार में की थी। शेख याहीया मुनेरी फिरदौसी सिलसिले के प्रमुख संत थे। फिरदौसी सिलसिला की विचारधारा सुहरावर्दी से मिलती है जिस कारण इसे सुहरावर्दी की शाखा मानी जाती है।

नक्शबंदी सिलसिला

नक्शबंदी सिलसिले की स्थापना (14वीं) ख्वाजा नक्शबंदी ने बगदाद में की थी। भारत में इसकी स्थापना ख्वाजा बाकी विल्लाह ने की तथा उच्च में खानकाह स्थापित की। शेख अहमद सरहिन्दी नक्शबंदी सिलसिले का अनुयायी था, जो अकबर का समकालीन था। इसका पुत्र मीर मासूम था जिसका शिष्य औरंगजेब था। ख्वाजा मीर दर्द नक्शबंदी संप्रदाय के अन्तिम महान संत थे।

विशेषताएँ-
इस्लाम का सबसे कट्टर सिलसिला।
गीत, संगीत, नृत्य का विरोध।
योग, क्रियाओं का विरोध।
ईश्वर व मनुष्य, दास व मालिक के रूप में होते हैं।
अकबर के दीन-ए-इलाही धर्म की कटु आलोचना की।

सतारी सिलसिला

सतारी सिलसिले की स्थापना शाह अब्दुला सतारी ने जौनपुर (बिहार) में की थी। मोहम्मद गौस/कुत्व सतारी सिलसिले का अनुयायी था जिससे हुमायूँ व तानसेन प्रभावित थे। मोहम्मद गौस ने अमृत कुण्ड का 'बहार-उल-हरात' के नाम से अनुवाद किया।

विशेषताएँ
आराम की जिन्दगी जीने पर जोर।

कलीन्दरी संप्रदाय

कलीन्दरी संप्रदाय की स्थापना नजीमुद्दीन कलन्दीर ने की थी। इस संप्रदाय पर मुस्लिम संप्रदाय का प्रभाव कम था।

विशेषताएँ
नागा साधु की तरह कान छिदवाकर रखते हैं।

नरुद्दीन ऋषि/नुनद ऋषि

नुनद ऋषि ने कश्मीर में ऋषि आन्दोलन चलाया था। शैव अनुयायी लल्ला योगश्वरी के उपदेशों को भी नुनद ऋषि ने माना था।

बख्तियार काकी
यह मोइनुद्दीन के शिष्य थे। बख्तियार का जन्म सन् 1186 में हुआ था।
इनका केन्द्र दिल्ली था।
ये इल्तुतमिश के समकालीन थे।

शेख हम्मीबुद्दीन नागौरी
ये मोइनुद्दीन के शिष्य थे।
इनका केन्द्र नागौर था।
मोइनुद्दीन ने इन्हें सुल्तान तारीकीन की उपाधि दी।
इन्हें संन्यासियों का सुल्तान कहते हैं।

ख्वाजा फरदुद्दीन मसूद/बाबा फरीद
ये बख्तियार काकी के शिष्य थे। इनका जन्म 1265 ई. में हुआ
पंजाब इनका केन्द्र था।
1604 ई. में रचित आदि ग्रन्थ में इनके पदों को संकलित किया गया है।

शेख निजामुद्दीन ओलिया
  • बाबा फरीद के शिष्य थे। इनका जन्म 1236 ई. में तथा निधन 1325 ई. में हुआ था।
  • दिल्ली इनका केन्द्र था।
  • इन्हें सुल्तान-उल-औलिया (सन्तों के राजा) व महबूब-ए-इलाही (ईश्वर के प्रेमी) की उपाधि दी गयी थी।
  • इन्होंने ग्यासुद्दीन तुगलक को कहा-हनुज दिल्ली दुरअस्त (दिल्ली अभी दूर है) कहा था।
1325 ई. में इनकी मृत्यु हो गयी इनकी मृत्यु के बाद चिश्ती संप्रदाय दो भागों में बंट गया।
  1. निजामिया
  2. शबीरिया
इन्होंने योग-प्राणायाम को प्रारम्भ किया जिस कारण इन्हें योगी संत कहते है। इन्होंने कहा मेरी कब्र पर कोई इमारत न बनाई जाए। मोहम्मद बिन तुगलक ने इनकी कब्र पर दरगाह बनाई जो दिल्ली में है।

नोट- अमीर खुसरो की दरगाह भी दिल्ली में है।

शेख नासिरुद्दीन महमूद
  • ये ओलिया के शिष्य थे।
  • इन्हें चिराग-ए-दिल्ली की उपाधि दी गयी।

अमीर खुसरो
ये ओलिया के शिष्य थे।
इन्हें तूती-ए-हिन्द (भारत का तोता) कहा जाता है।
इन्होने तबला, गिटार, कव्वाली का आविष्कार किया था। खजाई-उल-फतूह इनका ग्रंथ था।

शेख बुरहानुद्दीन गरीब
इन्होने द. भारत में सूफी सिलसिले की नींव रखी।
बंगाल के शासक हुसैनशाह (बंगाल) ने इनसे प्रभावित होकर सत्यवीर आन्दोलन चलाया।
ये ओलिया के शिष्य थे।
दौलताबाद इनका केन्द्र था।

सलीम चिश्ती
ये फतेहपुर सीकरी के थे।
अकबर को इन्होंने पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया था।

शेख बदरुद्दीन समरकन्दी
इन्होंने 13 वीं सदी में फिरदौसी सिलसिले की स्थापना की।
बिहार इनका केन्द्र था।

शेयर मोहम्मद गेसू दराज/बंदा नवाज
यह बाबा फरीद के शिष्य थे इनकी दरगाह गुलबर्गा (कर्नाटक) में है।

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