राजस्थान में जल एवं जल संरक्षण
इस लेख में राजस्थान के संदर्भ में जल संरक्षण, पारंपरिक जल स्रोतों और आधुनिक जल प्रबंधन की विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें विश्व जल दिवस, जल की अवस्थाएं, और राजस्थान की विशिष्ट पद्धतियों जैसे खड़ीन, टांका, बावड़ी और झालरा पर प्रकाश डाला गया है। यह लेख RPSC, RSMSSB, CET और राजस्थान पुलिस जैसी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें परीक्षा उपयोगी तथ्य और नवीनतम सरकारी योजनाओं (जैसे अटल भू-जल योजना) का समावेश है।
- अन्तर्राष्ट्रीय विश्व जल दिवस 22 मार्च को प्रतिवर्ष मनाया जाता है।
2023 के विश्व जल दिवस की थीम
परिवर्तन में तेजी विश्व जल दिवस मनाने की पहल रियो डी जेनेरियो ने 1992 में आयोजित पर्यावरण तथा विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में की गई थी। 1993 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस दिन को वार्षिक कार्यक्रम के रूप में मनाने का निर्णय लिया।
जो उपयोगी जल (1%) हमारे उपयोग के लिए उपलब्ध है उसका हम सिर्फ 0.006% ही उपयोग करते हैं।
'लवणता' 1000 ग्राम जल में मौजूद नमक की मात्रा होती है। महासागर की औसत लवणता 35 ग्राम प्रति हजार है।
इजराइल के मृत सागर में 340 ग्राम प्रति लीटर लवणता होती है। तैराक इसमें तैर सकते हैं, क्योंकि नमक की अधिकता इसे सघन बना देती है।
वर्षा जल संग्रहण की विधियाँ
- गड्ढे या गर्तिका बनाना
- खाइया बनाना
- कुओं का उपयोग
- हैण्डपम्प का उपयोग करना।
- जो उपयोगी जल (1%) हमारे उपयोग के लिए उपलब्ध है उसका हम सिर्फ 0.006% ही उपयोग करते हैं।
- तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है, जहाँ पूरे राज्य में प्रत्येक घर में छत वर्षा जल संग्रहण ढाँचों का बनाना अनिवार्य कर दिया गया है।
- पानी पंचायत जल संरक्षण से सम्बन्धित एक आंदोलन है जिसे महाराष्ट्र के पुणे जिले के माहुर गाँव में शुरूआत किया गया। यह आंदोलन विलासराव सालुंखे नामक व्यक्ति ने शुरू किया था।
- वह जल जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक तथा उत्तम होता है, पेयजल कहलाता है।
- पेयजल शुद्ध, पारदर्शी, रंगहीन व गंधहीन होना चाहिए। इसमें अल्प मात्रा में ऑक्सीजन, कार्बन डाई ऑक्साइड व स्वास्थ्य के लिए आवश्यक कुछ खनिज लवण K, Na, Mg, Ca, S, Cl आदि के लवण घुले होने चाहिए।
- इसमें सूक्ष्म जीव, कीटाणु, रोगाणु आदि नहीं होने चाहिए।
- वर्षा का जल अधिक शुद्ध होता है। परन्तु पीने के लिए योग्य नहीं माना जाता है क्योंकि उसमें आवश्यक खनिज लवण नहीं होने के कारण शरीर के लिए स्वास्थ्यप्रद नहीं होता है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पेयजल का मान 7 से 8.5 के मध्य होना चाहिए।
- वैश्विक जल संरक्षण को प्रोत्साहित करने हेतु पूरे विश्व में 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है।
- वर्ष 2017 के लिए इसका विषय अपशिष्ट जल था। वर्ष 2018 के लिए इसका विश्व जल के लिए प्रकृति आधारित समाधान था।
- वर्ष 2019 में मनाये गये विश्व जल दिवस का मुख्य विश्व 'किसी को पीछे नहीं छोड़ना' था।
- केन्द्रीय जल संसाधन नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय ने जल संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में डा. भीमराव अंबेडकर के योगदान का उल्लेख करते हुए घोषणा की है कि उनके जन्मदिन 14 अप्रैल को राष्ट्रीय जल दिवस के रूप में मनाया जायेगा।
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 246 और अनुच्छेद 262 में जल के संबंध में केन्द्र और राज्यों के दायित्वों का निर्धारण किया गया है।
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 262 का संबंध में अंतर्राज्यीय जल विवादों से है।
- जल की मात्रा मापने की इकाई घन मीटर या हेक्टेयर मीटर है।
- जलभूत मानचित्रण तैयार करने वाला हरियाणा देश का पहला राज्य है।
- भारत में सर्वाधिक वर्षा मेघालय के मासिनराम में होती है।
- अहमदाबाद के पास अडालज बाव है जिसमें 6 मंजिले है। यह एक मंदिर है जो एक कुएँ पर जाकर समाप्त होता है। इनकी मंदिरनुमा संरचना एवं जल उपलब्धता की महत्ता को ध्यान में रखते हुए इन्हें जलमंदिर भी कहा जाता है।
- हमारी पृथ्वी थलशाला के समान है। प्रतिवर्ष 22 मार्च का दिन विश्व जल दिवस के रूप में मनाया जाता है। हर व्यक्ति का जल संरक्षण के महत्त्व की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए ही हम प्रतिवर्ष जल दिवस मनाते हैं।
- पेयजल, धुलाई, खाना पकाने और उचित सफाई बनाए रखने के लिए, संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुझाई गई जल की न्यूनतम मात्रा, 50 लीटर प्रति व्यक्ति है। यह मात्रा प्रति व्यक्ति प्रतिदिन लगभग ढाई बाल्टी जल के बराबर है।
- वर्ष 2003 को अंतर्राष्ट्रीय अलवण जल वर्ष मनाया गया था जिससे लोगों को इस प्राकृतिक संसाधन की निरंतर घट रही उपलब्धता के बारे में जागरूक किया जा सके।
- जल की कमी पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय बन गई है। ऐसा अनुमान है कि अब से कुछ ही वर्षों में विश्व के एक-तिहाई से अधिक जनसंख्या को जल की कमी का सामना करना पड़ेगा।
उपलब्ध जल
- पृथ्वी की सतह का लगभग 71% भाग जल से ढका है।
- पृथ्वी का 2/3 भाग जल से घिरा हुआ है। इस जल का अधिकांश भाग समुद्रों और महासागरों में है।
- उपयोग के लिए उपलब्ध उपयुक्त जल अलवण जल है, जिसे बोल-चाल की भाषा में ताज़ा जल कहते हैं।
- अलवण जल के मुख्य स्त्रोत नदी, ताल, सोते एवं हिमनद हैं। महासागरों एवं समुद्रों का जल, लवणीय होता है। इसमें अधिकांश नमक-सोडियम क्लोराइड या खाने में उपयोग किया जाने वाला नमक होता है।
- 'लवणता' 1000 ग्राम जल में मौजूद नमक की मात्रा होती है। महासागर की औसत लवणता, 35 भाग प्रति हजार ग्राम है।
- इजराइल के मृत सागर में 340 ग्राम प्रति लीटर लवणता होती है। तैराक इसमें प्लव सकते हैं, क्योंकि नमक की अधिकता इसे सघन बना देती है।
- समुद्रों और महासागरों के जल में बहुत-से लवण घुले होते हैं जिससे जल खारा होता है। इसलिए यह पीने के लिए अनुपयुक्त है।
जल का वितरण
हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी की सतह का तीन-चौथाई भाग जल से ढँका हुआ है। यदि धरती पर थल की अपेक्षा जल अधिक है, तो अनेक देशों में जल की कमी का सामना क्यों करना पड़ता है।
| महासागर | 97.3 |
| बर्फ छत्रक | 02.0 |
| भूमिगत जल | 00.68 |
| झीलों का अलवण जल | 0.009 |
| स्थलीय समुद्र एवं नमकीन झील | 0.009 |
| वायुमंडल | 0.0019 |
| नदियाँ | 0.0001 |
| Total | 100.00 |
पृथ्वी पर उपस्थित जल समुद्रों और महासागरों, नदियों, तालों, ध्रुवीय बर्फ, भौमजल और वायुमंडल में पाया जाता है, परंतु अधिकांश जल मानव उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं है।
जल की अवस्थाएँ
जल चक्र द्वारा परिचक्रण के दौरान जल इसकी तीनों अवस्थाओं ठोस, द्रव और गैस में से किसी एक अवस्था में पृथ्वी पर पाया जाता है।
ठोस अवस्था में जल बर्फ और हिम के रूप में पृथ्वी के ध्रुवों पर (बर्फ छत्रक), बर्फ से ढके पर्वतों और हिमनदों (ग्लेशियर) में पाया जाता है।
द्रव अवस्था में जल महासागरों, झीलों, नदियों के अतिरिक्त भू-तल के नीचे (भौमजल) भी पाया जाता है।
गैसीय अवस्था में जल हमारे आस-पास की वायु में जलवाष्प के रूप में उपस्थित रहता है। जल का उसकी तीनों अवस्थाओं के बीच सतत् चक्रण द्वारा पृथ्वी पर जल की कुछ मात्रा स्थिर बनी रहती है।
भौमजल: जल का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत
- मृदा के कणों के बीच के सारे के सारे रिक्त स्थान (अवकाश) और चट्टानों के बीच के स्थान जल से भरे होते हैं। इस परत की ऊपरी सीमा भौमजल स्तर कहलाती है।
- भौमजल स्तर के नीचे पाया जाने वाला जल भौमजल कहलाता है।
- भौमजल स्तर एक मीटर से भी कम गहराई पर अथवा भूमि में अनेक मीटर की गहराई में हो सकता है।
- वर्षा जल, नदियों और तालाबों का जल मृदा में से रिसकर भूमि के नीचे गहराई में रिक्त स्थानों और दरारों को भर देता है।
- भूमि में जल का रिसाव अंत:स्यंदन कहलाता है। इस प्रक्रम द्वारा उपयोग किए जा चुके भौमजल की पुन: परिपूर्ति हो जाती है।
- कुछ स्थानों पर भौमजल स्तर के नीचे स्थिर कठोर शैलों (चट्टानों) की परतों के बीच भौमजल संचित हो जाता है। इस प्रकार संचित भौमजल के भंडारों को जलभर कहते हैं। जिसको सामान्यतः नलकूपों अथवा हैंडपंपों की सहायता से बाहर निकाला जाता है।
- भूमि के नीचे से निकाले गए भौमजल की पुन: पूर्ति प्राय: वर्षाजल के रिसाव (अवस्त्रवण) द्वारा होती है।
- जब तक हम केवल उतना ही जल निकालते हैं जितने जल की प्राकृतिक प्रक्रमों द्वारा पुन:पूर्ति हो जाती है, तब तक भौमजल स्तर प्रभावित नहीं होता है।
- पक्के फ़र्श से जल आसानी से रिसाव (अवस्त्रवण) नहीं होता, जबकि घास के बगीचे, मैदानों आदि से जल तुरंत रिसाव (अवस्त्रवण) हो जाता है।
भौमजल स्तर को प्रभावित करने वाले सामान्य कारक
अल्प वर्षा, जनसंख्या में वृद्धि, औद्योगिक और कृषि गतिविधियाँ आदि भौमजल स्तर को प्रभावित करने वाले सामान्य कारक हैं। भौमजल स्तर को प्रभावित करने वाले अन्य कारक, वनोन्मूलन (वनअपरोपण) और जल के रिसाव (अवस्त्रवण) के लिए प्रभावित क्षेत्रों में कमी होना है। जनसंख्या के बढ़ते दबाव के कारण कृषि के लिए भौमजल का उपयोग दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप भौमजल स्तर में लगातार गिरावट आ रही है।
जल प्रबंधन
- वर्षा के रूप में जो जल हमें प्राप्त होता है उसमें से अधिकांश ऐसे ही बह जाता है। यह बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन की बर्बादी है।
- वर्षा जल का उपयोग भौमजल स्तर की पुन:पूर्ति करने के लिए किया जा सकता है। इसे जल संग्रहण अथवा वर्षाजल संग्रहण कहते हैं।
- हमारे देश में अनेक स्थानों पर जल भंडारण और जल का पुन:पूर्ति करने के लिए बावड़ी बनाने का चलन रहा है, जो कि जल संचित करने का पारंपरिक तरीका था।
- किसान भी अपने खेत में जल का उपयोग मितव्ययता से बूँद (ड्रिप) सिंचाई से कर सकते हैं। ड्रिप सिंचाई व्यवस्था कम व्यास के पाइपों द्वारा पौधे को पानी देने की तकनीक है, जो सीधे उनकी जड़ों तक जल पहुँचाती है।
- गुजरात के कच्छ क्षेत्र के भुजपुर नामक स्थान में वर्षा बहुत अनिश्चित रूप से होती है। वहाँ का भौमजल स्तर चिंताजनक रूप से नीचे गिरता चला गया है। वर्ष 1989 में, गाँववासियों ने एक गैर-सरकारी संगठन के साथ मिलकर, वर्षाजल संग्रहण का निश्चय किया। रूक्मावती नदी और उसकी अनेक सहायक नदियों पर 18 चैकडेम (बाँध) बनाए गए। इस तरह एकत्रित किए गए जल से मृदा में अंत:स्त्रवण की दर को बढ़ा दिया, जिससे जलभरों की पुन:पूर्ति हो गई।
- राजस्थान एक गर्म और शुष्क क्षेत्र है।
- जल की प्राकृतिक कमी को सामाजिक कार्यकर्त्ताओं के एक दल ने अलवर जिले में एक शुष्क क्षेत्र को हरित स्थान में परिवर्तित कर दिया। उन्होंने पाँच सूखी नदियों अखेरी, रूपारेल, सरसा, भगिनी और जहाजवाली को जल संग्रहण द्वारा पुनर्जीवित कर दिया।
- जिस जल का प्रयोग आज हम खेत में सिंचाई के लिए कर रहे हैं, हो सकता है कि वह सैंकड़ों वर्ष पहले अमेज़न नदी में बहता हो।
- अलवण जल के मुख्य स्रोत नदी, ताल, सोते एवं हिमनद हैं। महासागरों एवं समुद्रों का जल, लवणीय होता है। इसमें अधिकांश नमक-सोडियम क्लोराइड या खाने में उपयोग किया जाने वाला नमक होता है।
- पृथ्वी की सतह का तीन-चौथाई भाग जल से ढँका हुआ है। यदि धरती पर थल की अपेक्षा जल अधिक है, तो अनेक देशों में जल की कमी का सामना करना पड़ता है?
महासागरीय परिसंचरण
समुद्री तट पर नंगे पैर चलने से कुछ जादुई-सी अनुभूति होती है। पुलिन पर नम बालू, ठंडी पवन, समुद्री पक्षी, वायु में लवणीय गंध एवं लहरों का संगीत; सब कुछ सम्मोहित करने वाला प्रतीत होता है। ताल एवं झील के शांत जल के विपरीत महासागरीय जल हमेशा गतिमान रहता है। यह कभी शांत नहीं रहता है। महासागरों की गतियों को इस प्रकार वर्गीकृत कर सकते हैं जैसे-तरंगें, ज्वार-भाटा एवं धाराएँ।
22 मार्च 'विश्व जल दिवस' के रूप में मनाया जाता है, जब जल संरक्षण की विभिन्न विधियों को प्रबलित किया जाता है।
ज्वार-भाटा
दिन में दो बार नियम से महासागरीय जल का उठना एवं गिरना 'ज्वार-भाटा' कहलाता है। जब सर्वाधिक ऊँचाई तक उठकर जल, तट के बड़े हिस्से को डुबो देता है, तब उसे ज्वार कहते हैं। जब जल अपने निम्नतम स्तर तक आ जाता है एवं तट से पीछे चला जाता है, तो उसे ज्वार भाटा कहते हैं।
वृहत् ज्वार
सूर्य एवं चंद्रमा के शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण बल के कारण पृथ्वी की सतह पर ज्वार-भाटे आते हैं। जब पृथ्वी का जल चंद्रमा के निकट होता है उस समय चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल से जल अभिकर्षित होता है, जिसके कारण उच्च ज्वार आते हैं। पूर्णिमा एवं अमावस्या के दिनों में सूर्य, चंद्रमा एवं पृथ्वी तीनों एक सीध में होते हैं और इस समय सबसे ऊँचे ज्वार उठते हैं। इस ज्वार को वृहत् ज्वार कहते हैं।
लघुज्वार
लेकिन जब चाँद अपने प्रथम एवं अंतिम चतुर्थांश में होता है, तो चाँद एवं सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल विपरीत दिशाओं में महासागरीय जल पर पड़ता है, परिणामस्वरूप, निम्न ज्वार-भाटा आता है। ऐसे ज्वार को लघु ज्वार-भाटा कहते हैं।
महासागरीय धाराएँ
महासागरीय धाराएँ, निश्चित दिशा में महासागरीय सतह पर नियमित रूप से बहने वाली जल की धाराएँ होती हैं। महासागरीय धाराएँ गर्म या ठंडी हो सकती हैं। सामान्यतः गर्म महासागरीय धाराएँ, भूमध्य रेखा के निकट उत्पन्न होती हैं एवं ध्रुवों की ओर प्रवाहित होती हैं। ठंडी धाराएँ, ध्रुवों या उच्च अक्षांशों से उष्णकटिबंधीय या निम्न अक्षांशों की ओर प्रवाहित होती हैं। लेब्राडोर महासागरीय धाराएँ, शीत जलधाराएँ होती हैं; जबकि गल्फस्ट्रीम गर्म जलधाराएँ होती हैं। महासागरीय धाराएँ, किसी क्षेत्र के तापमान को प्रभावित करती हैं। गर्म धाराओं से स्थलीय सतह का तापमान गर्म हो जाता है। जिस स्थान पर गर्म एवं शीत जलधाराएँ मिलती हैं, वह स्थान विश्वभर में सर्वोत्तम मत्स्यन क्षेत्र माना जाता है। जापान के आस-पास एवं उत्तर अमेरिका के पूर्वी तट इसके कुछ उदाहरण हैं। जहाँ गर्म एवं ठंडी जलधाराएँ मिलती हैं, वहाँ कुहरे वाला मौसम बनता है। इसके फलस्वरूप नौसंचालन में बाधा उत्पन्न होती है।
भारतीय संस्कृति में जल का महत्व
जल, जीवन का मुख्य आधार है। पृथ्वी ग्रह पर जल की उपलब्धता के कारण ही जीवन संभव है। मानव सभ्यता के सभी पहलुओं को छूने वाली एकमात्र तथ्य जल ही है। भारतीय संस्कृति में जल को देवता माना गया है। जल हमारे जीवन का आधार है इसलिए जल को प्रदूषित करना पाप समझा जाता है। पीने, नहाने-धोने, सिंचाई, औद्योगिक विकास और पृथ्वी पर तापमान के संतुलन को बनाए रखने आदि के लिए जल की आवश्यकता होती है। राजस्थान में देश के कुल जल का 1 प्रतिशत विद्यमान है। राजस्थान में जल की कमी है। इसलिए जल संरक्षण आवश्यक है।
विश्व की प्राचीन सभ्यताएँ जल (नदी) के किनारे विकसित हुई। इनमें प्रमुख सभ्यताएँ हैं - मेसोपोटामिया, हांग हो, नील नदी की घाटी सभ्यता, सिंधु सभ्यता आदि।
जल हमारे सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा व्यापारिक महत्व का केन्द्र रहा है।
खारा व मीठा जल
- पृथ्वी पर उपलब्ध समस्त जल का लगभग 2.5 प्रतिशत से भी कम जल पीने योग्य है जिसे 'मीठा' या 'स्वच्छ जल' कहते हैं।
- स्थल पर मीठे जल के प्रमुख स्रोत नदियाँ, झीलें, बाँध, तालाब, कुएँ, एनिकट, भूमिगत जल आदि हैं।
- महासागरों का जल खारा होता है, क्योंकि इसमें लवण की मात्रा अधिक होती है। सागरीय लवणता का मुख्य स्रोत भूमि है। महासागरों की औसत लवणता 35 प्रतिशत होती है। सागरीय जल की लवणता में सर्वाधिक योगदान सोडियम क्लोराइड (27. 2 प्रतिशत लवणता) का होता है। जल लवणता की प्रवणता को हेलोक्लाइन कहते हैं।
- हेलोक्लाइन- महासागर का वह क्षेत्र जहाँ गहराई के साथ-साथ लवणता तीव्र गति से बढ़ती हो, हेलोक्लाइन कहलाता है।
- विश्व की प्रमुख खारी झीलें निम्न हैं : तुर्की की वान झील की लवणता 330‰ है। यह विश्व की सबसे खारी झील है, जॉर्डन का मृत सागर झील की लवणता 238‰ लाल सागर में लवणता 36 से 41 प्रतिशत है, ग्रेट साल्ट लेक (अमेरिका) की लवणता 220‰ है। राजस्थान की सांभर झील एक खारे पानी की झील है। जल का खारापन उसमें उपस्थित सोडियम क्लोराइड (77.8%), कैल्शियम सल्फेट (3.6%), मैग्नीशियम क्लोराइड (10.9%) एवं अन्य लवणों की उपस्थिति के कारण होता है। अरब सागर के पानी का औसत खारापन 35 पीपीटी है क्योंकि अरब सागर में 36% लवणता पायी जाती है।
लवणता
- सागरों में खारेपन का मुख्य स्रोत भूमि है जबकि नदियाँ लवणता को सागर तक पहुँचाने वाले मुख्य कारक है। यदि समुद्र में जल का घनत्व बढ़ता है, तो वह लवणता में वृद्धि का सूचक है अर्थात् सागरीय लवणता में वृद्धि के कारण जल का घनत्व बढ़ता है।
- लवणता की सर्वाधिक मात्रा मृत सागर में पायी जाती है। परन्तु मृत सागर को झील की श्रेणी में रखा जाता है।
- विश्व में सर्वाधिक लवणीय सागर, लाल सागर (37.41% लवणता) है।
- सागरीय जल की लवणता में सर्वाधिक योगदान सोडियम क्लोराइड 27.21% लवणता का है।
- खारे जल को 'कठोर जल' भी कहा जाता है।
- विश्व में अधिक जनसंख्या तथा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति स्वच्छ जल की उपलब्धि कम है। जैसे- भारत, सहारा मरुस्थल आदि।
- ध्रुवीय क्षेत्रों जैसे- कनाडा, आइसलैंड, नॉर्वे, रूस आदि में जनसंख्या की तुलना में जल का अनुपात अधिक है।
- राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र व दक्षिणी राजस्थान में फ्लोराइड युक्त जल पाया जाता है। इस जल के उपयोग से हड्डियों संबंधी बीमारियों का सामना करना पड़ता है। यह क्षेत्र राजस्थान की कुबड़पट्टी कहलाता है।
भूमिगत जल
वर्षा का जल जब भूमि के अंदर प्रवेश कर नीचे की कठोर चट्टानों के ऊपर एकत्रित हो जाता है तो उसे 'भूमिगत जल' कहते हैं।
भूमिगत जल को हैण्ड पम्प, नलकूप एवं कुओं आदि से बाहर निकालते हैं।
मरुस्थलीय क्षेत्रों में भूमिगत जल अधिक गहराई में पाया जाता है जबकि मैदानी एवं समुद्र तटवर्ती क्षेत्रों में भूमिगत जल कम गहराई में पाया जाता है।
भूमिगत जल स्तर में ऋतुओं के अनुसार भी परिवर्तन आता है।
वर्षा ऋतु में भूमिगत जल कम गहराई पर एवं ग्रीष्म ऋतु में अधिक गहराई पर पाया जाता है।
वर्तमान में विश्व में भूमिगत जल में निरन्तर कमी आ रही है जिसका कारण है- वर्षा की कमी, अत्यधिक सिंचाई, उद्योगों में जल की बढ़ती मांग एवं जनसंख्या वृद्धि के कारण जल का अत्यधिक दोहन।
जल प्रदूषण
प्रकृति द्वारा प्रदत्त शुद्ध जल में यदि कुछ अवांछित तत्व मिल जाते हैं तो वह जल पीने एवं मानवीय उपयोग के लिए अनुपयुक्त हो जाता है इसे 'जल प्रदूषण' कहते हैं।
प्रकृति प्रदत्त शुद्ध जल मानवीय गतिविधियों के कारण प्रदूषित हो जाता है।
जल के प्रदूषण से जल में उपलब्ध ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।
जल प्रदूषण भी जल संकट का एक कारण है।
जल प्रदूषण के कारण एवं प्रभाव
- जल प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं : कल - कारखानों व उद्योगों से निकले ठोस अपशिष्ट पदार्थों तथा रासायनिक तत्वों को जल में डालना, घरेलू अपशिष्ट पदार्थों को जल में डालना, कृषि में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक दवाइयों के प्रयोग, जलाशयों पर कपड़े धोना एवं पशुओं को नहलाना, खुले में शौच, महासागरों में जहाजों से तेल रिसाव आदि।
- प्रदूषित जल के उपयोग से अनेक बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।
- जल के साथ घुले प्रदूषित तत्व फसलों एवं जलीय जीवों को भी हानि पहुँचाते हैं।
- आज विश्व में हर 6 में से एक व्यक्ति स्वच्छ जल के लिए जूझ रहा है।
- जनसंख्या वृद्धि, भू जल का अत्यधिक दोहन, ग्लोबल वार्मिंग, वनोन्मूलन, व्यापारिक कृषि, कम वर्षा, बढ़ता औद्योगिकरण, नगरीकरण और आधुनिक जीवनशैली आदि के कारण जल तेजी से कम हो रहा है, जबकि मांग तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2050 तक विश्व की आबादी 9 अरब को पार कर जायेगी, तब आधी आबादी भीषण जल संकट का सामना करेगी।
जल प्रदूषण को रोकने के उपाय
- जल संरक्षण के लिए देश में जल प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रण कानून 1974 बनाया गया।
- पर्यावरण संरक्षण कानून 1986 भी जल संरक्षण का ही एक हिस्सा है।
- जल प्रदूषण रोकने का सबसे मजबूत उपाय है- जनता का जागरूक होना।
- सार्वजनिक जलाशयों में स्नान, कपड़े धोना, पशुओं को नहलवाना आदि नहीं करना चाहिए।
- कृषि में कीटनाशकों व रासायनिक खादों का उपयोग कम से कम करना चाहिए ।
- नगरों के सीवरेज के जल को जलाशयों में मिलने से पहले ही साफ करके पुनः उपयोग योग्य बना दिया जाए।
- ठोस शहरी कचरे का निस्तारण जल स्रोत में न करके अन्यत्र बंजर एवं अनुपयोगी भूमि पर किया जाए।
- जल प्रदूषण संबंधित कानूनों का कड़ाई से पालन करना चाहिए।
- टी.वी., रेडियो, समाचार पत्रों, के माध्यम से जल प्रदूषण और संरक्षण के प्रति जन चेतना जागृत करना भी आवश्यक है।
- जल स्रोतों में फैलते प्रदूषण में मानवीय योगदान पर नियंत्रण आवश्यक है।
- भारत में गंगा एवं यमुना नदियाँ सर्वाधिक प्रदूषित मानी जाती हैं।
- गंगा नदी को साफ करने के लिए 'गंगा एक्शन प्लान' एवं 'नमामिगंगे' नामक कार्य योजनाएँ चलाई जा रही हैं।
- जल संरक्षण का अर्थ है, जल के प्रयोग को घटाना एवं सफाई, निर्माण तथा कृषि आदि के लिए अवशिष्ट जल का पुनः चक्रण (Recyling) करना।
- लगातार बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण में वृद्धि तथा कृषि में विस्तार होने से जल की माँग बढ़ती जा रही है। अतएव जल संरक्षण आज की आवश्यकता बन गई है। वर्षा जल संचयन मूलतः भवनों की छतों पर जल को इकट्ठा करके भूमि में संरक्षण करके आगे काम में लेने की प्रक्रिया है। यह अत्यावश्यक है कि भू-जल की गिरावट तथा भू-जल स्तर में सुधार किया जाए तथा समुद्र के जल का अंतर्गमन अर्थात् समुद्री जल को भूमि की तरफ आने से रोका जाए और वर्षा ऋतु में सतही जल के अपवाह को शहरी अपशिष्ट से दूर रखा जाए।
- जिस देश में 14 बड़ी, 55 सामान्य और 700 छोटी नदियाँ हैं, हर वर्ष औसतन 1,170 मिलीमीटर वर्षा होती है और हर जगह वर्षा जल संरक्षण की परंपरा रही है, वहाँ ऐसे संकटों से बचा जा सकता है। यहाँ समस्या का मूल कारण जल की कमी न होकर जल का उचित प्रबंधन न किया जाना है।
राजस्थान में जल संरक्षण
- जल संचयन, जनसंख्या नियंत्रण, सिंचाई की उन्नत विधियों के प्रयोग, वन आवरण में वृद्धि, भूमिगत जल का विवेकपूर्ण उपयोग, जल और जल की पुनरावर्ती आदि प्रयासों से जल के अभाव और अवनयन की स्थिति को सुधारा जा सकता है।
- राजस्थान में प्राचीन काल में प्रमुख जल स्त्रोत तालाब, झीलें, कुएँ आदि थे। जयसमंद झील का निर्माण मेवाड़ के महाराजा जयसिंह ने सन् 1687 से 1691 ई. तक गोमती नदी पर करवाया जो विश्व की मीठे पानी की प्रथम मानव निर्मित झील मानी जाती है।
- जल संरक्षण के लिये नदी को मोड़ने व जोड़ने तथा झीलों को जोड़ने के विश्व के सबसे पुराने उदाहरण भी मेवाड़ में देखे जा सकते हैं।
- उदयपुर बेसिन में गोवर्धन सागर, दूध तलाई, पिछौला झील, अमरकुंड, कुमारिया तालाब, रंग सागर, स्वरूप सागर, तथा फतेह सागर जलाशयों का निर्माण जल प्रबंधन की दृष्टि से विश्वभर में सर्वोच्च उदाहरण है।
- उदयपुर बेसिन में विभिन्न छोटे बड़े जलाशय सिंचाई पेयजल व पर्यटन हेतु विकास हेतु जल प्रबंधन के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं।
- राजस्थान में जैसलमेर में 'खड़ीन' और अन्य क्षेत्रों में 'जोहड़' शुष्क और अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण के उदाहरण हैं।
- राजस्थान के अर्द्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्रों में लगभग हर घर में पीने का पानी संग्रहीत करने के लिए भूमिगत टैंक या 'टाँका' हुआ करते हैं।
- टाँका में वर्षा जल अगली वर्षा ऋतु तक संग्रहीत किया जा सकता है। यह इसे जल की कमी और ग्रीष्म ऋतु तक पेयजल उपलब्ध करवाने का जल स्रोत बनाता है।
- वर्षा जल या 'पालर पानी' जैसा कि इसे इन क्षेत्रों में पुकारा जाता है, प्राकृतिक जल का शुद्धतम रूप समझा जाता है।
परम्परागत जल संरक्षण विधि
प्राचीन काल से ही जल की कमी की समस्याओं से बचने के लिए राज्य और सार्वजनिक सहयोग से झीलें, तालाब, कुएँ, बावड़ियाँ आदि का निर्माण किया गया है।
परम्परागत जल स्रोतों की उपयोगिता एवं उन पर संकट।
परम्परागत जल स्रोत पारिस्थितिकी और संस्कृति की अनुरूपता के आधार पर बने हैं। जैसे- कुएँ, बावड़ियाँ, नाड़ी, तालाब, झीलें आदि।
परम्परागत जल स्रोतों का निर्माण जल संरक्षण, भूमिगत जल संरक्षण, भूमिगत जल स्तर को बढ़ाने, सिंचाई एवं जनता को जलापूर्ति के लिए किया जाता है।
वर्तमान में जनसंख्या वृद्धि के कारण परम्परागत जल स्रोतों पर संकट मंडरा रहा है।
वर्तमान में परम्परागत जल स्रोतों पर या तो व्यक्तियों ने कब्जा कर लिया है या फिर देख-रेख के अभाव में नष्ट हो गए हैं।
परम्परागत जल प्रबंधन प्रणालियाँ हमारी विरासत का अभिन्न अंग हैं।
जनसंख्या में वृद्धि एवं जलस्तर में हो रही निरन्तर कमी के संदर्भ में परम्परागत जल संरक्षण की विधियाँ अधिक प्रबल एवं कारगर हैं।
राजस्थान में जल संसाधन एवं सिंचाई परियोजनाएँ
- राजस्थान में भारत के सतही जल संसाधनों का 1.11 प्रतिशत भाग है। दोहन योग्य भूमिगत जल केवल 1.72% है।
- राज्य का कुल जल संसाधन 39.463 मिलियन एकड़ फीट (एम.ए.एफ.) है।
- राज्य का कुल सतही जल 29.28 मिलियन एकड़ फीट (एम.ए.एफ.) है, जिसमें से आर्थिक उपयोग योग्य सतही जल 13.02 (एम.ए.एफ.) है और इसका भी केवल 52% ही उपयोग में आता है।
- इसमें से राज्य में आंतरिक स्रोतों से 15.86 (एम.ए.एफ.) जल व बाहरी स्रोतों (सारणी) से प्राप्त जल 13.42 (एम.ए.एफ.) है।
- राज्य 10.183 भूमिगत जल है। (29.28 + 10.183 = 39.463 (एम.ए.एफ.)।
- राज्य की औसत वर्षा 53 सेमी. है।
- राजस्थान में प्रति व्यक्ति जल की वार्षिक उपलब्धता 780 घनमीटर है। जबकि निर्धारित जल की न्यूनतम मात्रा 1000 घनमीटर प्रति व्यक्ति वार्षिक है। इस उपलब्धता में निरन्तर कमी आ रही है। सन् 2025 में घटकर यह 560 तथा 2050 में केवल 439 घनमीटर वार्षिक रह जायेगी।
- देश का 51% प्रतिशत फ्लोराइड एवं 42% लवणता प्रभावित क्षेत्र राजस्थान में है।
राजस्थान की परम्परागत जल संरक्षण पद्धतियाँ
खड़ीन
खड़ीन का सर्वप्रथम प्रचलन 15वीं शताब्दी में जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों ने किया था। यह बहुउद्देशीय परम्परागत तकनीकी ज्ञान पर आधारित होती है। रियासत काल में खड़ीन के निर्माण हेतु राज्य द्वारा जमीन दी जाती थी जिसके बदले में उपज का 1/4 हिस्सा राजा को देना पड़ता था। जैसलमेर जिले में लगभग 500 छोटी बड़ी खड़ीनें विकसित हैं जिनसे 1300 हैक्टेयर जमीन सिंचित की जाती है। वर्तमान में इराक के लोग भी इस प्रणाली को अपनाये हुए हैं।
यह ढालवाली भूमि के नीचे निर्मित होती है। इसके दो तरफ मिट्टी की पाल होती है। तीसरी तरफ पत्थर की पक्की चादर बनाई जाती है। खड़ीन का क्षेत्र विस्तार 5 से 7 किलोमीटर तक होता है। पाल सामान्यतया 2 से 4 मीटर तक ऊँची होती है। पानी की मात्रा अधिक होने पर पानी अगले खड़ीन में प्रवेश कर जाता है। सूखने पर पिछली खड़ीन की भूमि में नमी के आधार पर फसलें उगाई जाती है। मरू क्षेत्र में इन्हीं परिस्थितियों में गेहूँ की फसल उगाई जाती है। खड़ीन तकनीकी द्वारा बंजर भूमि को भी कृषि योग्य बनाया जाता है।
जिस स्थान पर पानी एकत्रित होता है उसे खड़ीन तथा इसे रोकने वाले बाँध को खड़ीन बाँध कहते हैं। खड़ीन बाँध इस प्रकार से बनाए जाते हैं ताकि पानी की अधिक आवक पर अतिरिक्त पानी ऊपर से निकल जाए। गहरी खड़ीनों में पानी को फाटक से आवश्यकतानुसार निकाल दिया जाता है। खड़ीनों में बहकर आने वाले जल अपने साथ उर्वरक मिट्टी बहाकर लाता है। जिससे उपज अच्छी होती है।
खड़ीन पायतान क्षेत्र में पशु चरते हैं जिससे पशुओं द्वारा विसरित गोबर मृदा (भूमि) को उपजाऊ बनाता है। खड़ीनों के नीचे ढलान में कुआँ भी बनाया जाता है जिसमें खड़ीन में रिस कर पानी आता रहता है, जो पीने के उपयोग में आता है।
टांका
टांका राजस्थान में रेतीले क्षेत्र में वर्षा जल को संग्रहीत करने की महत्वपूर्ण परम्परागत प्रणाली है। इसे कुँड भी कहते हैं। यह विशेषतौर से पेयजल के लिए प्रयोग होता है। यह सूक्ष्म भूमिगत सरोवर होता है, जिसको ऊपर से ढक दिया जाता है।
इसका निर्माण मिट्टी से भी होता है और सीमेन्ट से भी होता है। यहां का भू-जल लवणीय होता है। इसलिए वर्षा जल टांके में इकट्ठा कर पीने के काम में लिया जाता है। यह तश्तरी के आकार का निर्मित होता है। टांका किलों में, तलहटी में, घर की छत पर, आंगन में और खेत आदि में बनाया जाता है।
जिस आंगन में वर्षा का जल संग्रहीत किया जाता है, उसे आगोर या पायतान (बटोरना) कहते हैं। पायतान को साफ रखा जाता है, क्योंकि उसी से बहकर पानी टांके में जाता है। टांके के मुहाने पर इंडु (सुराख) होता है जिसके ऊपर जाली लगी रहती है, ताकि कचरा नहीं जा सके। टांका चाहे छोटा हो या बड़ा उसको ढंककर रखते हैं। पायतान का तल पानी के साथ कटकर नहीं जाए इस हेतु उसको राख, बजरी व मोरम से लीप कर रखते हैं। टांका 30-40 फीट तक गहरा होता है।
पानी निकालने के लिए सीढ़ियों का प्रयोग किया जाता है। ऊपर मीनारनुमा ढेकली बनाई जाती है जिससे पानी खींचकर निकाला जाता है।
बावड़ी
राजस्थान में बावड़ी निर्माण की परम्परा भी प्राचीन हैं। अपराजितपृच्छा ग्रंथ में बावड़ियों के चार प्रकार बताये गये हैं। अधिकांश बावड़ियाँ मंदिरों, किलों या मठों के नजदीक बनाई जाती थी। आभानेरी की चांद बावड़ी हर्षद माता के मंदिर के पास बनी हुई है। इसके दोनों ओर बरामदे एवं स्नानगृह हैं। बावड़ियाँ पीने के पानी, सिंचाई एवं स्नान के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत रही हैं। राजस्थान की बावड़ियाँ वर्षा जल संचय के काम आती है।
कहीं-कहीं इनमें आवासीय व्यवस्था भी रहती थी। संस्कृत नाटक 'मेघदूत' में बावड़ी निर्माण का उल्लेख मिलता है। वर्तमान में राजस्थान में बावड़ियों की हो रही दुर्दशा को जीर्णोद्धार की सख्त आवश्यकता है।
- रानी की बावड़ी (गुजरात)- इस बावड़ी की फोटो 2018 में ₹100 मूल्य के नये नोट पर जारी की गई है।
- रानीजी की बावड़ी (बूँदी)- इस बावड़ी को 'बावड़ियों का सिरमौर' कहते हैं। इसका निर्माण अनिरुद्ध की विधवा रानी नाथावत ने करवाया था।
- हाड़ी रानी की बावड़ी (टोंक)- यह बावड़ी टोडारायसिंह कस्बाँ टोंक में है।
- चाँद बावड़ी (आभानेरी, दौसा)- इस बावड़ी का निर्माण गुर्जर प्रतिहार शैली में प्रतिहार निकुम्भ राजा चाँद ने करवाया था। यह बावड़ी 8वीं शताब्दी के मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है।
- नौलखा बावड़ी (डूंगरपुर)- इस बावड़ी का निर्माण चौहान शासक आसकरण की रानी प्रेमल देवी ने करवाया था।
- अनारकली की बावड़ी (बूँदी)- एशिया की सबसे खूबसूरत इस बावड़ी का निर्माण नाथावत की दासी अनारकली ने बूँदी के छत्रपुरा में करवाया था।
- चमना बावड़ी (शाहपुरा)- इस बावड़ी का निर्माण उम्मेदसिंह प्रथम ने चमना के नाम पर करवाया था।
- बड़ गाँव की बावड़ी (कोटा)- इस बावड़ी का निर्माण कोटा के शासक शत्रुसाल की पटरानी जादौणा ने करवाया था।
- नीमराणा की बावड़ी- इस नौ मंजिल की बावड़ी का निर्माण टोडरमल ने करवाया था।
- लम्बी बावड़ी (धौलपुर)- यह बावड़ी सात मंजिल की है। इसकी सातों मंजिलों की बनावट एक समान है।
- त्रिमुखी बावड़ी (डूंगरपुर)- इस बावड़ी का निर्माण महाराजा राजसिंह की रानी सामरदे ने करवाया था।
राज्य की अन्य बावड़ियाँ
- तापी बावड़ी - जोधपुर
- उदय बावड़ी - डूंगरपुर
- भंडारोज की बावड़ी - दौसा
- चैतनदास की बावड़ी - लोहार्गल, झुंझुनूं
- विनाता की बावड़ी - चित्तौड़गढ़
- बाईराज की बावड़ी - बनेड़ा, भीलवाड़ा
- दूध बावड़ी - माउण्ट आबू, सिरोही
- कातन बावड़ी - ओसियाँ, जोधपुर ग्रामीण
- चौखी बावड़ी - बनेड़ा, भीलवाड़ा
- तपसी की बावड़ी - शाहबाद, बाराँ
नाड़ी
यह एक प्रकार का पोखर होता है। इसमें वर्षा का जल एकत्रित होता है। यह विशेषकर जोधपुर की तरफ होती है। 1520 ई. में राव जोधाजी ने सर्वप्रथम एक नाड़ी का निर्माण करवाया था। पश्चिमी राजस्थान के प्रत्येक गाँव में नाड़ी मिलती है। रेतीले मैदानी क्षेत्रों में ये नाड़ियाँ 3 से 12 मीटर तक गहरी होती है। इनमें जल निकासी की व्यवस्था भी होती है। यह पानी 10 महीने तक चलता है।
एल्युवियल मृदा (जलोढ़ मिट्टी) वाले क्षेत्रों में नाड़ी आकार में बड़ी होती है। इनमें पानी 12 महीने तक एकत्र रह सकता है। नाड़ी वस्तुतः भू-सतह पर बना एक गड्ढा होता है जिसमें वर्षा जल आकर एकत्रित होता रहता है।
टोबा
यह एक महत्वपूर्ण पारम्परिक जल प्रबंधन है। यह नाड़ी के समान आकृति वाला होता है। यह नाड़ी से अधिक गहरा होता है। सघन संरचना वाली भूमि, जिसमें पानी का रिसाव कम होता है, टोबा निर्माण के लिए यह उपयुक्त स्थान माना जाता है। इसका ढलान नीचे की ओर होना चाहिए। टोबा के आस-पास नमी होने के कारण प्राकृतिक घास उग आती है जिसे जानवर चरते हैं।
प्रत्येक गाँव में जनसंख्या के हिसाब से टोबा बनाये जाते हैं। प्रत्येक जाति के लोग अपने-अपने टोबा पर झोंपड़ियाँ बना लेते हैं। टोबा में वर्षभर पानी उपलब्ध रहता है।
झालरा
यह अपने से ऊँचे तालाबों और झीलों के रिसाव से पानी प्राप्त करते हैं। इनका स्वयं का कोई आगोर (पायतन) नहीं होता है। झालराओं का पानी पीने लायक नहीं होता, बल्कि धार्मिक रिवाजों तथा सामूहिक स्नान आदि कार्यों के उपयोग में आता था। इनका आकार आयताकार होता है। इनके तीन ओर सीढ़ियाँ बनी होती थी। 1660 ई. में निर्मित जोधपुर का महामंदिर झालरा प्रसिद्ध है। अधिकांश झालराओं का आजकल प्रयोग बन्द हो गया है। जल संचय की दृष्टि से इनका विशेष महत्व रहा है। इनका वास्तुशिल्प सुन्दर होता है।
कुई या बेरी
कुई या बेरी सामान्यतः तालाब के पास बनाई जाती है जिसमें तालाब का पानी रिसता हुआ जमा होता है। कुई मोटे तौर पर 10 से 12 मीटर गहरी होती है। इनका मुँह लकड़ी के फन्टों से ढका रहता है। पश्चिमी राजस्थान में इनकी अधिक संख्या है। भारत-पाक सीमा से लगे जिलों में इनकी मौजूदगी अधिक है। 1987 के भयंकर सूखे के समय सारे तालाबों का पानी सूख गया था, तब भी बेरीयों में पानी आ रहा था। परम्परागत जल-प्रबंधन के अन्तर्गत स्थानीय ज्ञान की आपात व्यवस्था कुई या बेरी में देखी जा सकती है।
खेत के चारों तरफ मेड़ ऊँची कर दी जाती है जिससे बरसाती पानी जमीन में समा जाता है। खेत में बीच में एक छिछला कुआँ खोद देते हैं जहाँ इस पानी का कुछ हिस्सा रिसकर जमा हो जाता है।
नेहटा (नेष्टा)
नाड़ी या तालाब से अतिरिक्त जल की निकासी के लिए उसके साथ नेहटा बनाया जाता है जिससे होकर अतिरिक्त जल निकट स्थित दूसरी नाड़ी, तालाब या खेत में चला जाये।
पालर पाणी
नाड़ी या टांके में जमा वर्षा का जल।
मदार
नाड़ी या तालाब में जल आने के लिए निर्धारित की गई, धरती की सीमा को मदार कहते हैं। मदार की सीमा में मल-मूत्र त्याग वर्जित होता है।
आधुनिक जल संरक्षण विधियाँ
- 22 मार्च प्रतिवर्ष 'जलदिवस' के रूप में मनाया जाता है।
- वर्तमान में जल संरक्षण की निम्न विधियाँ अपनाई जा रही हैं-
- बाँध एवं नहर निर्माण, एनिकट निर्माण, बूँद-बूँद एवं फव्वारा सिंचाई प्रणाली, दूषित जल को साफ करके पुनः उपयोग में लेना, जन-जागृति फैलाना आदि।
- कम वर्षा वाले क्षेत्रों में 'रूफ टॉप जल संग्रहण विधि' अधिक उपयोगी विधि है।
- पश्चिमी राजस्थान के लोगों ने जल की बूँद-बूँद सहेजना मधुमक्खियों से सीखा है।
- साफ जल को 'भविष्य का सोना' या 'नीला सोना' कहा जा सकता है।
राज्य में अनियमित एवं अपर्याप्त वर्षा के कारण निरन्तर अकाल की स्थिति किसी न किसी क्षेत्र में बनी रहती है तथा सिंचाई हेतु जल सीमित मात्रा में उपलब्ध हो पाता है। राज्य में निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या तथा औद्योगीकरण के कारण जल की माँग बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में इस बहुमूल्य संसाधन के संरक्षण, कुशल उपयोग कर अधिक क्षेत्र में सिंचाई उपलब्ध कराना तथा प्रति इकाई जल से अधिक लाभ प्राप्त करना नितान्त आवश्यक है। अतः कृषकों का ध्यान इस सीमित एवं बहुमूल्य संसाधन के संरक्षण एवं कुशल उपयोग की ओर आकर्षित करने के लिये जल के समुचित उपयोग हेतु कृषि विभाग द्वारा निम्न कार्यक्रम क्रियान्वित किये जा रहे हैं-
- डिग्गी-फव्वारा कार्यक्रम
- फार्म पौण्ड (खेत तलाई) कार्यक्रम
- जल हौज कार्यक्रम
- सिंचाई पाईप लाइन कार्यक्रम
भू-जल
राज्य के भू-जल संसाधनों के विकास एवं प्रबन्धन हेतु भू-जल विभाग की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। राजस्थान में, जहाँ अकाल की स्थिति बनी रहती है, ऐसे में जल की कमी की समस्या के समाधान हेतु काफी हद तक भू-जल ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सतत् एवं सफल प्रयासों से राज्य के रेगिस्तानी व पहाड़ी जिलों में सिंचाई के लिए अतिरिक्त भूमिगत जल जुटाने के साथ स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता बढ़ी है। भू-जल विभाग मुख्यतः निम्नलिखित गतिविधियाँ संचालित करता है-
- सर्वेक्षण एवं अनुसंधान कार्यक्रम के अन्तर्गत नलकूपों व पीजोमीटर की संरचना का निर्माण एवं जल संसाधनों की खोज, मूल्यांकन एवं विकास करना।
- पेयजल एवं अन्य उद्देश्य हेतु नलकूपों व हैण्डपम्पों का निर्माण करवाना।
- सरकार की व्यक्तिगत लाभ की योजनाओं के अन्तर्गत व्यक्तिगत लाभ देने हेतु कुँओं को विस्फोटन द्वारा गहरा कर लाभान्वित करना।
अटल भू-जल योजना
अटल भू-जल योजना भारत सरकार एवं विश्व बैंक के सहयोग से (50:50 प्रतिशत) देश के सात राज्यों क्रमशः हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तरप्रदेश एवं मध्यप्रदेश राज्यों में भू-जल के गिरते स्तर को रोकने, भू-जल के बेहतर प्रबन्धन हेतु 1 अप्रैल, 2020 से लागू की गई है। यह योजना पांच वर्षों 2020-21 से वर्ष 2024-25 तक के लिये हैं। इस योजना की अनुमानित लागत ₹6,000 करोड़ है, जिसमें से ₹3,000 करोड़ विश्व बैंक का हिस्सा एवं ₹3000 करोड़ भारत सरकार का हिस्सा है। जिसमें से राजस्थान राज्य हेतु 5 वर्षों के लिये कुल बजट ₹1,189.65 करोड़ स्वीकृत है।
इस योजना के अन्तर्गत राजस्थान राज्य के 17 जिलों की 38 पंचायत समिति के 1,144 ग्राम पंचायतों को चिन्हित किया गया है। चिन्हित 1,144 ग्राम पंचायत स्तर पर जल सुरक्षा प्लान बनाया जाना प्रस्तावित है।
जलग्रहण विकास
राजस्थान क्षेत्रफल की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य है, जिसका क्षेत्रफल 342.87 लाख हेक्टेयर है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 10.40 प्रतिशत है। राज्य के क्षेत्रफल में से 101 लाख हैक्टेयर भूमि बंजर है, जबकि राज्य में कुल स्रोतों से उपलब्ध जल की मात्रा 1.16 प्रतिशत ही है। इसके अतिरिक्त वर्षा के कम दिन, वर्षा की तीव्रता एवं वर्षा पद्धति में हुए परिवर्तन के कारण राज्य में भू-जल स्तर लगातार गिरता जा रहा है, साथ ही उपजाऊ भूमि भी बंजर भूमि में परिवर्तित हो रही है।
इस भीषण समस्या के समाधान हेतु राज्य सरकार द्वारा राज्य में वर्षा जल के अधिकतम संग्रहण, संरक्षण एवं उपलब्ध जल का न्यायोचित उपयोग करने के परिप्रेक्ष्य में 'राजीव गाँधी जल संचयन योजना' प्रारम्भ करने का निर्णय लिया गया है।
राजीव गाँधी जल संचय योजना के अन्तर्गत राज्य में संचालित विभिन्न केन्द्रीय एवं राज्य की योजनाओं में उपलब्ध वित्तीय संसाधनों का प्रभावी कनवर्जेन्स, विभिन्न लाईन विभागों के समन्वय, कॉर्पोरेट जगत, धार्मिक ट्रस्टों एवं सामाजिक संगठनों, गैर सरकारी संगठनों एवं जनसहयोग एवं राज्य सरकार द्वारा पृथक से बजट उपलब्ध करवाकर कर जल संरक्षण एवं जल भराव संरचनाओं की गतिविधियों का प्रभावी क्रियान्वयन किया जा रहा है।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (वाटरशेड कम्पोनेंट) : इस योजना में केन्द्रीयांश एवं राज्यांश का अनुपात 60:40 निर्धारित किया गया है।
जलापूर्ति
राज्य भूजल स्रोतों की कमी का सामना कर रहा है। राज्य में पिछले दो दशकों से भू-जल के अत्यधिक दोहन के कारण भू-जल की स्थिति अत्यन्त चिंताजनक हो गई है। राज्य की भौगोलिक विषमता और भूगर्भीय तथा सतही जल की सीमित उपलब्धता के कारण शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना अत्यधिक कठिन है, इस हेतु राज्य सरकार द्वारा शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध करवाने के लिए विभिन्न पेयजल योजनाएं क्रियान्वित की जा रही हैं।
प्रत्येक ग्रामीण परिवार को वर्ष 2024 तक कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन (एफ.एच.टी.सी.) के माध्यम से पीने योग्य पानी की आपूर्ति प्रदान करने के लिए 'जल जीवन मिशन' कार्यान्वित किया जा रहा है। इस मिशन हेतु केन्द्र तथा राज्य के बीच फंडिंग पैटर्न 1:1 है। राज्य स्तर पर राज्य जल और स्वच्छता मिशन (एस.डब्ल्यू.एस.एम.) जिला स्तर पर जिला जल और स्वच्छता समिति (डी.डब्ल्यू.एस.सी.) और ग्राम स्तर पर ग्राम जल और स्वच्छता समिति (वी.डब्ल्यू.एस.सी.) जल जीवन मिशन के लिए मुख्य कार्यान्वयन और निगरानी एजेंसी है।

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