राजस्थान में मरुस्थलीकरण | Rajasthan mein marusthalikaran

राजस्थान में मरुस्थलीकरण

इस महत्वपूर्ण लेख में "राजस्थान में मरुस्थलीकरण" का विस्तार से वर्णन किया गया है। इसमें विद्यार्थी थार मरुस्थल के प्रसार, 'रेगिस्तान का मार्च', इसके मुख्य कारण और काजरी (CAZRI) सहित रोकथाम की विभिन्न सरकारी योजनाओं के बारे में जानेंगे। यह टॉपिक RAS, REET, LDC और पटवारी जैसी राजस्थान की सभी सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत उपयोगी है।
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रेगिस्तान

यह एक शुष्क प्रदेश है जिस की विशेषताएँ अत्यधिक उच्च अथवा निम्न तापमान एवं विरल वनस्पति हैं।
17 जून, 2023 के मरुस्थलीकरण दिवस की थीम है- उसकी भूमि, उसके अधिकार (Her Land, Her Rights)

गर्म रेगिस्तान-सहारा
विश्व एवं अफ्रीका महाद्वीप के उत्तरी अफ्रीका के बड़े भू-भाग पर फैले सहारा के रेगिस्तान विश्व का सबसे बड़ा रेगिस्तान है। यह लगभग 8.54 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। भारत का क्षेत्रफल 3.2 लाख वर्ग किलोमीटर है। सहारा रेगिस्तान ग्यारह देशों से घिरा हुआ है। ये देश हैं- अल्जीरिया, चाड, मिस्र, लीबिया, माली, मौरितानिया, मोरक्को, नाइजर, सूडान, ट्यूनिशिया एवं पश्चिमी सहारा।
सहारा मरुस्थल बालू की विशाल परतों से ढँका हुआ ही नहीं वरन् वहाँ बजरी के मैदान और नग्न चट्टानी सतह वाले उत्थित पठार भी पाए जाते हैं। ये चट्टानी सतहें कुछ स्थानों पर 2500 मीटर से भी अधिक ऊँची हैं।
सहारा के अल अज़ीज़िया क्षेत्र में, जो त्रिपोली, लीबिया के दक्षिणी भाग में स्थित है, यहाँ का सबसे अधिक तापमान 1922 में 57.7° सेल्सियस दर्ज किया गया था।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आज का सहारा रेगिस्तान एक समय में पूर्णतया हरा-भरा मैदान था। सहारा की गुफ़ाओं से प्राप्त चित्रों से ज्ञात होता है कि यहाँ नदियाँ तथा मगर पाए जाते थे। हाथी, शेर, जिराफ़, शतुरमुर्ग, भेड़, पशु तथा बकरियाँ सामान्य जानवर थे। परंतु यहाँ के जलवायु परिवर्तन ने इसे बहुत गर्म व शुष्क प्रदेश में बदल दिया है।

जलवायु
सहारा रेगिस्तान की जलवायु अत्यधिक गर्म एवं शुष्क है। यहाँ की वर्षा ऋतु अल्पकाल के लिए होती है। यहाँ आकाश बादल रहित एवं निर्मल होता है। यहाँ नमी संचय होने की अपेक्षा तेज़ी से वाष्पित हो जाती है। दिन अविश्वसनीय रूप से गर्म होते हैं। दिन के समय तापमान 50° सेल्सियस से ऊपर पहुँच जाता है, जिससे रेत एवं नग्न चट्टानें अत्यधिक गर्म हो जाती हैं। इनके ताप का विकिरण होने से चारों तरफ़ सब कुछ गर्म हो जाता है। रातें अत्यधिक ठंडी होती हैं तथा तापमान गिरकर हिमांक बिंदु, लगभग 0° सेल्सियस तक पहुँच जाता है।

वनस्पतिजात एवं प्राणिजात
सहारा रेगिस्तान की वनस्पतियों में कैक्टस, खजूर के पेड़ एवं एकेशिया पाए जाते हैं। यहाँ कुछ स्थानों पर मरूद्यान-खजूर के पेड़ों से घिरे हरित द्वीप पाए जाते हैं। ऊँट, लकड़बग्घा, सियार, लोमड़ी, बिच्छू, साँपों की विभिन्न जातियाँ एवं छिपकलियाँ यहाँ के प्रमुख जीव-जंतु हैं।

लोग
सहारा रेगिस्तान की कष्टकारी जलवायु में भी विभिन्न समुदायों के लोग निवास करते हैं, जो भिन्न-भिन्न क्रियाकलापों में भाग लेते हैं। इनमें बेदुईन एवं तुआरेग भी शामिल हैं। चलवासी जनजाति वाले ये लोग बकरी, भेड़, ऊँट एवं घोड़े जैसे पशुधन को पालते हैं। इन पशुओं से इन लोगों को दूध मिलता है, इनकी खाल से ये पेटी, जूते, पानी की बोतल बनाने के लिए चमड़ा प्राप्त करते हैं तथा पशुओं के बालों का उपयोग चटाई, कालीन, कपड़े एवं कंबल बनाने के लिए होता है। धूल भरी आँधियों एवं गर्म वायु से बचने के लिए ये लोग भारी वस्त्र पहनते हैं।
सहारा में मरूद्यान एवं मिस्र में नील घाटी लोगों को निवास में मदद करती है। यहाँ जल की उपलब्धता होने से लोग खजूर के पेड़ उगाते हैं। यहाँ चावल, गेहूँ, जौ एवं सेम जैसी फसलें भी उगाई जाती हैं। मिस्र में उगाए जाने वाली कपास पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।
तेल की खोज संपूर्ण विश्व में अत्यधिक माँग वाले, इस उत्पाद का अल्जीरिया, लीबिया एवं मिस्र में होने के कारण सहारा रेगिस्तान में तेज़ी से परिवर्तन हो रहा है। इस क्षेत्र में प्राप्त अन्य महत्वपूर्ण खनिजों में लोहा, फॉस्फोरस, मैंगनीज़ एवं यूरेनियम सम्मिलित हैं।

विश्व के प्रमुख मरुस्थल
नाम क्षेत्र
सहारा उत्तरी अफ्रीका
गिब्सन ऑस्ट्रेलिया
नाफुद सऊदी अरब
गोबी मंगोलिया व चीन
कालाहारी बोत्सवाना
तकलामाकन चीन
सोनोरन्न मेक्सिको
नामीब नामीबिया
काराकुम तुर्कमेस्तिान
थार भारत और पाकिस्तान
सोमालियाई सोमालिया
अटाकामा उत्तरी चिल्ली
क्यूजिल-कूम उज्जेबिकिस्तान
दश्त-ए-लूत पूर्वी इरान
सीरियन अरब
डेथ वैली कैलिफोर्निया
मोजेव संयुक्त राज्य अमेरिका
नेगेव इजरायल
पेंटागोनिया अर्जेन्टीना
चिहोहुआ उत्तरी अमेरिका

ठंडा रेगिस्तान-लद्दाख
लद्दाख शब्द दो शब्दों से बना है- "ला'' का अर्थ है- 'पर्वतीय दर्रा' तथा "दाख'' का अर्थ है-'देश'।
पृथ्वी के सबसे ठंडे स्थानों में से एक 'द्रास', लद्दाख में स्थित है।
जम्मू एवं कश्मीर के पूर्व में बृहत् हिमालय में स्थित लद्दाख एक ठंडा रेगिस्तान है। इसके उत्तर में काराकोरम पर्वत श्रेणियाँ एवं दक्षिण में जास्कर पर्वत स्थित है। लद्दाख से होकर अनेक नदियाँ बहती हैं, जिनमें सिंधु नदी प्रमुख है। ये नदियाँ गहरी घाटियों एवं महाखड्ड (गॉर्ज) का निर्माण करती हैं। लद्दाख में अनेक हिमानियाँ हैं जैसे- गैंग्री हिमानी।
लद्दाख की ऊँचाई कारगिल में लगभग 3000 मीटर से लेकर काराकोरम में 8000 मीटर से भी अधिक पाई जाती है। अधिक ऊँचाई के कारण यहाँ की जलवायु अत्यधिक शीतल एवं शुष्क होती है। इस ऊँचाई पर वायु परत पतली होती है जिससे सूर्य की गर्मी की अत्यधिक तीव्रता महसूस होती है। ग्रीष्म ऋतु में दिन का तापमान 0° सेल्सियस से कुछ ही अधिक होता है एवं रात में तापमान शून्य से -30° सेल्सियस से नीचे चला जाता है। शीत ऋतु में यह बर्फ़ीला ठंडा हो जाता है, तापमान लगभग हर समय -40° सेल्सियस से नीचे ही रहता है। चूँकि यह हिमालय के वृष्टि-छाया क्षेत्र में स्थित है, अतः यहाँ वर्षा बहुत ही कम होती है, मुश्किल से 10 सेंटीमीटर प्रति वर्ष।

वनस्पतिजात एवं प्राणिजात
यहाँ उच्च शुष्कता के कारण वनस्पति विरल है। यहाँ जानवरों के चरने के लिए कहीं-कहीं पर ही घास एवं छोटी झाड़ियाँ मिलती हैं। घाटी में शरपत (विलो) एवं पॉपलर के उपवन देखे जा सकते हैं। ग्रीष्म ऋतु में सेब, खुबानी एवं अखरोट जैसे पेड़ पल्लवित होते हैं। लद्दाख में पक्षियों की विभिन्न प्रजातियाँ नज़र आती हैं। इनमें रॉबिन, रेडस्टार्ट, तिब्बती स्नोकॉक, रैवेन एवं हूप यहाँ पाए जाने वाले सामान्य पक्षी हैं। इनमें से कुछ प्रवासी पक्षी हैं। लद्दाख के पशुओं में जंगली बकरी, जंगली भेड़, याक एवं विशेष प्रकार के कुत्ते आदि पाए जाते हैं। इन पशुओं को दूध, मांस एवं खाल प्राप्त करने के लिए पाला जाता है। याक के दूध का उपयोग पनीर एवं मक्खन बनाने के लिए होता है। भेड़ एवं बकरी के बालों का उपयोग ऊनी वस्त्र बनाने के लिए किया जाता है।

लोग
यहाँ के अधिकांश लोग या तो मुसलमान हैं या बौद्ध। वास्तव में लद्दाख क्षेत्र में अनेक बौद्ध मठ अपने परंपरागत 'गोपा' के साथ स्थित हैं। कुछ प्रसिद्ध मठ हैं - हेमिस, थिकसे, शे एवं लामायूरू ग्रीष्म ऋतु में यहाँ के निवासी जौ, आलू, मटर, सेम एवं शलजम की खेती करते हैं। शीत ऋतु में जलवायु इतनी कष्टकारी होती है कि लोग धार्मिक अनुष्ठानों एवं उत्सवों में अपने आपको व्यस्त रखते हैं। यहाँ की महिलाएँ अत्यधिक परिश्रमी होती हैं। वे केवल घर एवं खेतों में ही काम नहीं करतीं बल्कि छोटे व्यवसाय एवं दुकानें भी संभालती हैं। लद्दाख की राजधानी लेह, सड़क एवं वायुमार्ग द्वारा भलीभाँति जुड़ी हुई है। राष्ट्रीय राजमार्ग-1 ए लेह को जोजीला दर्रा होते हुए कश्मीर घाटी से जोड़ता है।

मरुस्थलीकरण का तात्पर्य

मरुस्थलीकरण (desertification) उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसके द्वारा किसी भू-भाग में रेगिस्तान या मरुभूमि का निर्माण होता है। जब वह रेगिस्तान किन्हीं कारणों से आगे बढ़ता है, तब उसे 'रेगिस्तान का मार्च' (march of the desert) कहते हैं। राजस्थान में 'थार का रेगिस्तान बहुत प्रसिद्ध माना गया है'। विश्व के अन्य भागों में भी रेगिस्तान पाये जाते हैं; जैसे कि सहारा के विभिन्न क्षेत्र (अफ़्रीका), तकलमकान (Takla Makan) सिक्यांग, (चीन), दी गोबी (मंगोलिया व चीन), सोमाली (सोमालिया), आदि। पहले बतलाया जा चुका है कि राजस्थान में हनुमानगढ़ जिले सहित जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, गंगानगर, जोधपुर, पाली, नागौर, जालौर, चूरू, सीकर व झुन्झुनूँ सहित मरुस्थलीय क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं, जिनके तहत ताजा अनुमानों के अनुसार राज्य का लगभग (4.53 लाख वर्ग किलोमीटर) (61 प्रतिशत) आता है, और इसमें राज्य की लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। यह अरावली पर्वतमाला के पश्चिम से लेकर सिन्धु नदी तक फैला हुआ है जिसकी लम्बाई 600 किलोमीटर व चौड़ाई 200 किलोमीटर आँकी गयी है।
यह सर्वविदित है कि इस मरुस्थलीय क्षेत्र में ग्रीष्म ऋतु में उच्च तापमान, तेज गर्म हवाएँ, वनस्पति का अभाव, बालू के टीलों का विस्तार, कम उपजाऊ मिट्टी, वर्षा की कमी एवं इसकी अनिश्चितता, आदि के रूप में प्राकृतिक व जलवायु सम्बन्धी दशाएँ पायी जाती हैं। इन्हीं दशाओं के परिणामस्वरूप राज्य प्रायः सूखे व अकाल की समस्या से जूझता रहता है। यह प्रक्रिया राज्य में काफी लम्बी अवधि से चली आ रही है। राज्य सरकार ने अकाल राहत के तहत अब तक अरबों-खरबों की धनराशि खर्च कर दी है, लेकिन समस्या न केवल ज्यों-की-त्यों बनी हुई है, बल्कि वर्ष-प्रति-वर्ष अधिक उग्र रूप धारण करती जा रही है। इसलिए राजस्थान में मरुस्थल के निर्माण व इसके प्रसार या विस्तार की प्रक्रिया को ठीक से समझने तथा समस्या के समाधान के लिए दीर्घकालीन व ठोस हल निकालने की आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता। थार का मरुस्थल पाकिस्तान के थार जिले तक फैला हुआ है।

राजस्थान में मरुस्थलीकरण का प्रसार

भूगर्भवेत्ताओं का मत है कि आज से लगभग 7000 वर्ष पूर्व राजस्थान में मरुस्थल का अस्तित्व ही नहीं था। अतः राज्य के उत्तरी-पश्चिम भाग में फैला यह विशाल थार का रेगिस्तान हमेशा से रेगिस्तान नहीं था। विशेषज्ञों का मत है कि रेगिस्तान प्रकृति प्रदत्त नहीं है, बल्कि ज्यादा मात्रा में मनुष्यकृत ही है, अर्थात् मानवीय कार्यकलापों व क्रियाओं के फलस्वरूप इसका निर्माण हुआ है। स्वर्गीय अमृत नाहटा ने अपने एक लेख में राज्य में अकाल के स्थायी हल का विवेचन करते हुए कहा था कि "भूगर्भीय युग में यह पूरा क्षेत्र समुद्र था। इस क्षेत्र में जो खनिज मिलते हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं। असल में तो आज भी, यह पूरा क्षेत्र खारापन लिए हुए हैं। सांभर और डीडवाना में नमक की झीलें हैं, तो फलौदी में नमक की खेती और पचपदरा में नमक का खनन होता है। जिप्सम (मुल्तानी मिट्टी) और लिग्नाइट (भूरा कोयला) और चूने के अपार और अकूत भण्डार इस क्षेत्र में हैं और ये तीनों ही खनिज समुद्री खनिज हैं। एक अन्य समुद्री खनिज पेट्रोलियम और गैस भी इस क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में होनी ही चाहिए।" इस प्रकार इस प्रदेश की धरातलीय परतों में समुद्र-जीवावशेष पाये गये हैं, जिनकी पुष्टि होती है।

मरुस्थलीकरण के कारण

वनों की घटती संख्या-
वनों की अनियन्त्रित कटाई ने इस भू-भाग को रेगिस्तान में बदलने में मदद की। भूगोलवेत्ताओं का मत है कि अरावली के पश्चिमी ढालों पर वनों व चरागाहों को क्षति पहुँचने के कारण अरावली पर्वत श्रृंखला में पाये जाने वाले दर्रों या अन्तरालों (gaps) के रास्ते से बालू का बहाव पूर्व की तरफ होता रहता है। ये अन्तराल लूनी, पिलवा, अजवा, मोरेड, मिठड़ी-सांभर, गगोर, भूणी, घाट की ढाणी, घटवा-रूपगढ़, बाफोर, गुढा व सिंघाना-दिगरोटा के नाम से प्रसिद्ध हैं।

सीमान्त व घटिया भूमि पर खेती का विस्तार
अन्य देशों के मरुस्थलों की तुलना में राजस्थान के थार के मरुस्थल में जनसंख्या का घनत्व अधिक पाया गया है। यहाँ के लोगों ने अपने जीवनयापन के लिए कृषि का विस्तार सीमान्त भूमि के टुकड़ों पर जारी रखा है। लेकिन ऐसे भूखण्डों पर वर्षा के अभाव में मिट्टी के कण उड़ कर ऊपरवर्णित अन्तरालों व संकरे मार्गों (gaps) के द्वारा अन्यत्र जाने लगे, जिससे पूर्वी क्षेत्रों में भी बालू रेत के टीले बनते व बढ़ते गये।

पशुधन की वृद्धि से जैविक दबाव
इस प्रदेश में कालान्तर में पशुधन की अत्यधिक वृद्धि ने इस क्षेत्र में प्राकृतिक व पारिस्थितिकीय असन्तुलन उत्पन्न कर दिया और पशुओं के लिए चारे व पानी का अभाव रहने लगा। विशेषज्ञों का तो यहाँ तक कहना है कि इस प्रदेश में भविष्य में पशुपालन पर कृषि से भी ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए। चूँकि कृषिगत कार्यों में सिंचाई के लिए जल की अधिक आवश्यकता होती है, जिससे इस क्षेत्र के भूजल पर दबाव बढ़ा है और अत्यधिक जल के प्रयोग से मिट्टी की लवणीयता व क्षारीयता की समस्या भी बढ़ती गयी है। इस प्रकार मानवीय भूलों, पर्यावरणीय व पारिस्थितिकीय परिवर्तनों ने इस क्षेत्र को मरुस्थल में बदल दिया है और इस भू-भाग में सूखे व अकालों की निरंतरता का मार्ग प्रशस्त कर दिया है।

रेगिस्तान का मार्च
मरुस्थल का मार्च एक चर्चा का विषय रहा है। विशेषज्ञों का मत है कि राजस्थान का मरुस्थल एक जगह पर स्थिर नहीं है, बल्कि यह वायु के वेग (आँधी व तूफान) के कारण आस-पास के क्षेत्रों की तरफ लगातार बढ़ता जा रहा है। इसके प्रसार से राज्य के अन्य जिले जैसे भरतपुर, सवाई माधोपुर, टोंक, जयपुर, अजमेर, झालावाड़, आदि भी प्रभावित हो रहे हैं।
यही नहीं बल्कि इसके प्रसार के आसार दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात व हरियाणा जैसे राज्यों की तरफ भी प्रतीत होने लगे हैं। यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो यह इन राज्यों के उपजाऊ कृषिगत क्षेत्रों को भी मरुस्थल में परिवर्तित कर सकता है। इस सम्बन्ध में अधिक विस्तृत व सुनिश्चित अध्ययनों की आवश्यकता है।

मरुस्थलीकरण की समस्या को हल करने के उपाय

  • हमें सर्वप्रथम वर्तमान मरुक्षेत्र में जलाभाव की समस्या को हल करने का भरपूर प्रयास करना चाहिए। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि इसके लिए हमें लुप्त सरस्वती के प्राचीन जल-प्रवाह की खोज पर पूरा ध्यान देना चाहिए। यदि उसमें सफलता मिलती है, जिसमें नयी खोजों से आशा का काफी संचार हुआ है, तो समस्या काफी अंश तक हल हो जाएगी, क्योंकि सरस्वती का उद्गम हिमालय है, जो जल का अपार व अटूट भण्डार है। उसका उपयोग करके राजस्थान भी एक हरा-भरा प्रदेश बन सकता है।
  • हमें उन मानवीय कारणों को दूर करने की दिशा में भी कदम उठाने पड़ेंगे जिनकी वजह से मरुभूमि का निर्माण हुआ है जैसे पेड़ों की कटाई के स्थान पर वृक्षारोपण, वृक्षों की ऐसी किस्मों का उपयोग जो मरुभूमि के अनुकूल हों (खेजड़ी, रोहिड़ा, नीम, बोरड़ी, फोग, खींप, कीकर आदि प्रजातियाँ) को तेजी से बढ़ाया जाना चाहिए। यथासम्भव नये क्षेत्रों में घास की पैदावार भी बढ़ानी चाहिए। सतही व भूमिगत जल (Surface and underground water) दोनों का विवेकपूर्ण उपयोग किया जाना चाहिए। सूखी खेती की विधि में बूँद-बूँद सिंचाई (drip-irrigation) व फव्वारा-सिंचाई (Sprinkler-irrigation) का उपयोग किया जाना चाहिए। जैसा कि पहले विस्तार से स्पष्ट किया गया है राज्य में वाटरशेड विकास की परियोजनाओं व जल-संग्रह की परम्परागत विधियों, जैसे टाँके, बावड़ियाँ, तालाबों, आदि का उपयोग करके जल का अधिक वैज्ञानिक ढंग से उपयोग करना चाहिए। पशुओं की चराई को नियन्त्रित किया जाना चाहिए।
  • ऊर्जा के नये स्रोतों, जैसे वायु-ऊर्जा, सौर्य-ऊर्जा, आदि का उपयोग बढ़ाकर ऊर्जा के परम्परागत स्रोतों की बचत करनी चाहिए, ताकि कोयले व जलाने की लकड़ी की बचत की जा सके और इन पर अनावश्यक दबाव कम किया जा सके।
  • कुछ विशेषज्ञों का मत है कि हमें इन्दिरा गाँधी नहर क्षेत्र में जल का उपयोग कृषिगत उपजों; जैसे खाद्यान्नों के उत्पादन की बजाय पशु-पालन को बढ़ाने पर अधिक करना चाहिए, क्योंकि यह प्रदेश प्रकृति ने प्रारम्भ से ही पशुपालन के लिए ज्यादा अनुकूल बनाया है इस प्रदेश में पशु-पालन, विभिन्न प्रकार के पशु-आधारित उद्योगों व अन्य किस्म के उद्योगों, बागवानी व फलोत्पादन तथा उन पर आधारित प्रोसेसिंग उद्योगों तथा कई प्रकार की दस्तकारियों का विकास करना चाहिए। इससे लोगों को रोजगार मिलेगा, उनकी परम्परागत दक्षता का उपयोग हो सकेगा, राज्य की आय बढ़ेगी तथा निर्यात बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। इन क्रियाओं के विकास से राज्य में सिंचाई से उत्पन्न सेम व भूमि के दलदली होने एवं क्षारयुक्त होने की समस्या में भी कमी आयेगी। इसलिए भविष्य में इस क्षेत्र के लिए भूमि के उपयोग व आर्थिक क्रियाओं के उचित चयन व विकास पर विशेष रूप से ध्यान देना होगा ताकि इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना राज्य के लिए अभिशाप सिद्ध न होकर एक वरदान सिद्ध हो सके। अतः भविष्य में थार के रेगिस्तान में भूमि, वनस्पति, मिट्टी, जल, उद्योग, पशु-पालन, बागवानी, दस्तकारियों, परिवहन, इन्फ्रास्ट्रक्चर, आदि के सम्यक व संतुलित विकास के लिए एक नया एकीकृत व सघन कार्यक्रम बनाया जाना चाहिए। ताकि मरुस्थलीकरण की समस्या का दीर्घकालीन हल निकाला जा सके और मरुस्थल का मार्च भी रुक सके। इसी से सूखे व अकाल की समस्या का भी स्थायी हल निकाला जा सकेगा।
  • सरकार द्वारा मरुस्थल की समस्या को हल करने के लिए मरु विकास कार्यक्रम (DPP), सूखा-सम्भाव्य क्षेत्र-कार्यक्रम (DPAP), आदि संचालित किये गये हैं, जिनका अन्यत्र विस्त्... विवेचन किया गया है। जोधपुर स्थित 'काजरी' संस्थान में शुष्क क्षेत्र की विभिन्न समस्याओं पर अनुसंधान-कार्य किया जा रहा है जिससे इस क्षेत्र के विकास में मदद मिली है। लेकिन हमें अरावली पर्वतमाला के सभी अन्तरालों (gaps) में घनी सुरक्षा पेटियाँ (safety belts) स्थापित करनी होंगी ताकि बालू का बहाव रुक सके। हमें मरुभूमि में अधिकाधिक वृक्षारोपण करना होगा, आँधी-तूफान द्वारा रेत के बहाव को रोकने के लिए खेतों की मेड़ों पर बाड़ें लगाने की व्यवस्था करनी होगी तथा मरु प्रसार को रोकने के अन्य सभी प्रकार के उपाय करने होंगे जिनमें सक्रिय जन-भागीदारी भी आवश्यक होगी। मरुस्थलीकरण की समस्या राजस्थान के लिए एक गम्भीर चुनौती है, लेकिन सरकार, जनता, भूगर्भवेत्ता व अन्य विशेषज्ञ सभी मिलकर इसका समुचित हल निकाल सकते हैं। हमें इजरायल व अन्य मरुस्थलीय प्रदेशों के अनुभवों से लाभ उठाकर राज्य में रेगिस्तान की समस्या को हल करने का प्रयास करना चाहिए।

राज्य सरकार का कॉम्बेटिंग डेजर्ट कार्यक्रम
राजस्थान सरकार ने मरुस्थल की समस्या के हल के लिए 'कॉम्बेटिंग डेजर्ट नाम का कार्यक्रम' वर्ष 1979 में शुरू किया था इसके लिए केन्द्र की तरफ से राज्य के वन-विभाग को प्रति वर्ष ₹40-50 करोड़ मिले थे। राज्य के 42 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के 19500 वर्ग किलोमीटर में मरुस्थल माना गया है।

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

राजस्थान की ऐतिहासिक विरासत और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को RPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।