उपभोक्ता संरक्षण (राजस्थान)
इस लेख में राजस्थान उपभोक्ता संरक्षण और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें उपभोक्ताओं के मौलिक अधिकार, विभिन्न उपभोक्ता परिषदें (केन्द्रीय, राज्य और जिला स्तर), और भ्रामक विज्ञापनों से बचाव के नियमों को विस्तार से समझाया गया है। साथ ही, गुणवत्ता मानक जैसे ISI, एगमार्क और राजस्थान सरकार की युवा पुरस्कार योजना का भी उल्लेख है। यह लेख राजस्थान की प्रशासनिक सेवाओं (RAS), REET, और अन्य राज्य स्तरीय सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और परीक्षा उपयोगी है।
- विश्व उपभोक्ता दिवस 15 मार्च को मनाया जाता है।
- भारत में उपभोक्ता संरक्षण कानून 24 दिसम्बर, 1986 को पारित हुआ था,
- इसलिए 24 दिसम्बर को राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस के रूप में मनाते हैं।
वर्तमान समय भौतिकवादी है जिसमें व्यक्ति अपनी सुख-सुविधाओं तथा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अथक प्रयास करता है। वस्तु एवं सेवाओं के उत्पादन एवं उपभोग के आधार पर जनसंख्या, समाज का विभाजन दो भागों में किया जा सकता है। एक वर्ग जिसका संबंध वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति व उत्पादन से होता है, जिसे उत्पादक कहते हैं। जनसंख्या का एक भाग वस्तुओं एवं सेवाओं का उपभोग करता है जिसे उपभोक्ता कहते हैं। उपभोक्ता अपनी आवश्यकताओं की वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए बाजार, व्यापारी एवं उत्पादकों के प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष सम्पर्क में आता है, लेकिन वर्तमान समय में संसाधनों के सीमित होने तथा माँग के अधिक होने के कारण माँग व पूर्ति के मध्य एक असन्तुलन उत्पन्न हुआ है जिससे लाभ उठाने हेतु व्यापारी मिलावटी, गुणवत्ताहीन, नकली वस्तुओं की आपूर्ति करते हैं जिससे मानवीय जीवन व स्वास्थ्य को गंभीर खतरे उत्पन्न हुए हैं।
इन संभावित खतरों से बचने के लिए प्रयास वैश्विक स्तर पर हुए हैं। उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए विश्व में सर्वप्रथम अमेरिका में उपभोक्ता अधिकार अधिनियम 15 मार्च, 1963 को लागू हुआ, इसलिए सम्पूर्ण विश्व में विश्व उपभोक्ता दिवस 15 मार्च को मनाया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी उपभोक्ताओं के संरक्षण के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश एवं नियमों को मान्यता 9 अप्रैल, 1985 को प्रदान की है।
देश में उपभोक्ता संरक्षण के प्रयास सर्वप्रथम चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के द्वारा मद्रास में हुए जहाँ उन्होंने 1949 ई. में उपभोक्ता के हितों के संरक्षण के लिए उपभोक्ता संरक्षण परिषद की स्थापना की। देश में उपभोक्ता आन्दोलन महाराष्ट्र में 1904 में शुरू हुआ। भारत में संसद द्वारा उपभोक्ता संरक्षण कानून 24 दिसम्बर, 1986 को पास हुआ। यह अधिनियम जम्मू-कश्मीर के अतिरिक्त समस्त देश में 15 अप्रैल, 1987 को लागू हुआ।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत कोई भी उपभोक्ता सेवा एवं वस्तुओं में दोष के विरुद्ध अपनी शिकायतों के लिए उपभोक्ता न्यायालय में जा सकता है और न्याय प्राप्त कर सकता है।
जो व्यक्ति कीमत देकर वस्तु एवं सेवा का प्रत्यक्ष एवं अंतिम उपभोग करता है, वह उपभोक्ता कहलाता है।
उपभोक्ता के अधिकार
उपभोक्ता के अधिकारों के बारे में अनेक बार कई आवाज उठीं और अनेक अधिकारों की व्याख्या की गई। किन्तु अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति जॉन कैनेडी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने उपभोक्ता के अधिकारों को सूत्रबद्ध किया।
भारत के उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की प्रारम्भिक टिप्पणी तथा इस अधिनियम की धारा 6 में उपभोक्ता के अधिकारों का उल्लेख किया गया है। इन अधिकारों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य आठ अधिकारों में सात अधिकार सम्मिलित हैं। आठवाँ अधिकार ‘पर्यावरण का अधिकार’ हमारे देश के अधिनियम में अभी तक सम्मिलित नहीं है।
सुरक्षा का अधिकार (The right to safety or to be protected)
उपभोक्ता का प्रथम अधिकार सुरक्षा का अधिकार है। उसे ऐसी वस्तुओं एवं सेवाओं से सुरक्षा प्राप्त करने का अधिकार है जिनसे उसके शरीर एवं सम्पत्ति को हानि उत्पन्न हो सकती है। उसे किसी भी वस्तु या सेवा से चोट लगने या बीमारी होने या क्षति होने या किसी भी व्यक्ति के अविवेकपूर्ण आचरण से क्षति होने के विरुद्ध सुरक्षा पाने का अधिकार है।
चुनाव या पसन्द का अधिकार (The right to a choice)
उपभोक्ता का एक महत्वपूर्ण अधिकार यह है कि वह बाज़ार में उपलब्ध विभिन्न प्रकार की वस्तुओं या सेवाओं में से किसी भी वस्तु का चुनाव कर सकता है। वह किसी भी संस्था द्वारा उत्पादित किसी भी मूल्य, गुण एवं किस्म की वस्तु को अपनी स्वेच्छा से पसन्द कर सकता है। कोई भी व्यक्ति उसकी पसन्द को अनावश्यक एवं अनुचित ढंग से प्रभावित करता है तो यह उसके अधिकार में विघ्न माना जाता है।
उपभोक्ता अपने इस अधिकार के अन्तर्गत विभिन्न निर्माताओं द्वारा निर्मित विविध ब्राण्ड, किस्म, गुण, रूप, रंग, आकार तथा मूल्य की वस्तुओं में से किसी भी वस्तु का चुनाव करने को स्वतंत्र होगा।
सूचना पाने का अधिकार (The right to be informed)
उपभोक्ता को वे सभी आवश्यक सूचनाएँ भी प्राप्त करने का अधिकार होता है जिनके आधार पर वह वस्तु या सेवा खरीदने का निर्णय कर सकें। ये सूचनाएँ वस्तु की किस्म, मात्रा, प्रभावोत्पादकता, शुद्धता, प्रमाप, मूल्य आदि के सम्बन्ध में हो सकती हैं। इन सूचनाओं को प्राप्त करके कोई भी उपभोक्ता व्यवसायी के अनुचित व्यापारिक व्यवहारों से भी सुरक्षा प्राप्त कर सकता है।
सुनवाई या कहने का अधिकार (The right to be heard)
उपभोक्ता का यह अधिकार उसे अपनी बातें या शिकायत उचित मंचों पर कहने या प्रस्तुत करने का अधिकार देता है। दूसरे शब्दों में, उपभोक्ता को अपने हितों को प्रभावित करने वाली सभी बातों को उपयुक्त मंचों के समक्ष प्रस्तुत करने का अधिकार है। वे अपने इस अधिकार का उपयोग करके व्यवसायी एवं सरकार को अपने हितों के अनुरूप निर्णय लेने तथा नीतियां बनाने के लिए बाध्य कर सकते हैं।
उपचार का अधिकार (The right to be redressed)
उपभोक्ता का यह अधिकार उसे अपनी शिकायतों का उचित एवं न्यायपूर्ण उपचार या समाधान प्रदान करता है। इस अधिकार से उपभोक्ता को व्यवसायी के अनुचित व्यवहार अथवा अनैतिक शोषण से मुक्ति मिल सकती है।
यह अधिकार उसे यह आश्वासन प्रदान करता है कि यदि क्रय की गई वस्तु या सेवा उचित, न्यायोचित एवं संतोषजनक ढंग से उपयोग में नहीं लाई जा सकेगी तो उसकी उसे उचित क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार होगा।
उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार (The right to consumer education)
उपभोक्ता का यह अधिकार उसे आजीवन एक जागरूक उपभोक्ता बने रहने में मदद करता है। इस अधिकार के अन्तर्गत उपभोक्ता के अन्तर्गत उपभोक्ता को उन सब बातों की शिक्षा या जानकारी प्राप्त करने का अधिकार होता है जो एक उपभोक्ता के लिए आवश्यक होती है। शिक्षा उपभोक्ता की जागरूकता की आधारभूत आवश्यकता है जबकि सूचना किसी क्रय की जाने वाली वस्तु या सेवा के सम्बन्ध में जानकारी है।
मूल्य या प्रतिफल का अधिकार (The right to value)
उपभोक्ता यह अपेक्षा करने का अधिकार भी रखता है कि उसे उसके द्वारा चुकाये गये धन का पूरा मूल्य मिल सकेगा। उसे व्यवसायी द्वारा विक्रय के दौरान या विज्ञापन में किये गये वायदों तथा जगाई गई आशाओं को पूरा करवाने का अधिकार होता है।
उपभोक्ता संरक्षण परिषदें
उपभोक्ता के हितों का संरक्षण एवं संवर्द्धन करने तथा इस हेतु सरकार को परामर्श देने के लिए उपभोक्ता संरक्षण परिषदों की स्थापना का उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में प्रावधानों के अनुसार देश में निम्नलिखित तीन स्तरों पर उपभोक्ता संरक्षण परिषदों की स्थापना की व्यवस्था है:
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019
संसद ने खाद्य एवं उपभोक्ता मामलात मंत्री श्री रामविलास पासवान द्वारा प्रस्तुत नये उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 को 6 अगस्त, 2019 को पारित कर दिया। यह बिल लोकसभा द्वारा 30 जुलाई को एवं राज्यसभा द्वारा 6 अगस्त, 2019 को पारित किया गया। इस बिल पर राष्ट्रपति की स्वीकृति 9 अगस्त, 2019 को प्राप्त हो गई। यह अधिनियम 1986 के उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम का स्थान लेगा।
उपभोक्ता संरक्षण परिषदें
उपभोक्ता हितों का संरक्षण व संवर्द्धन करने हेतु इस अधिनियम के भाग द्वितीय में निम्न तीन उपभोक्ता संरक्षण परिषदों की स्थापना का प्रावधान किया गया है -
केन्द्रीय स्तर पर केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद
राज्य स्तर पर राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषद
जिला स्तर पर जिला उपभोक्ता संरक्षण परिषद
केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद् (केन्द्रीय परिषद)
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 3 (1) के तहत केन्द्र सरकार केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद की स्थापना करेगी। उपभोक्ता संरक्षण के मामलों में यह देश की सर्वोच्च परिषद् है।
यह एक सलाहकारी परिषद होगी जिसका गठन निम्न प्रकार होगा [धारा 3(2)]
केन्द्रीय सरकार के उपभोक्ता मामलों के विभाग का प्रभारी मंत्री इस परिषद का अध्यक्ष होगा।
सदस्यों की संख्या उतनी होगी जो विहित की जाए।
1986 के अधिनियम के अनुसार वर्तमान में परिषद में 150 सदस्य निम्न प्रकार हैं -
- सभी राज्यों के खाद्य व नागरिक आपूर्ति मंत्री इसके सदस्य होंगे।
- लोकसभा के 5 व राज्यसभा के 3 सदस्य (कुल 8)
- अनुसूचित जाति व जनजाति आयोग का आयुक्त - सदस्य
- उपभोक्ताओं के हितों से संबंधित केन्द्रीय सरकार के विभागों तथा स्वशासित संगठनों के अधिकतम 20 सदस्य।
- उपभोक्ता संगठनों से कम से कम 35 सदस्य।
- महिला सदस्य कम से कम 10 सदस्य।
- कृषकों, व्यापारियों, उद्योगों के अधिकतम 20 सदस्य।
- उपभोक्ताओं का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम अधिकतम 15 सदस्य।
- केन्द्रीय सरकार के उपभोक्ता मामलों का प्रभारी सचिव इसका सदस्य सचिव होगा।
- अवधि : इस परिषद् के सदस्यों की पदावधि या कार्यकाल 3 वर्ष होगा।
- रिक्त स्थान की पूर्ति : परिषद् में यदि कोई पद रिक्त होता है, तो उसके स्थान पर उसी वर्ग का सदस्य नियुक्त होगा व कार्यकाल परिषद् के साथ ही समाप्त हो जायेगा।
- उद्देश्य : धारा 6 के अन्तर्गत उल्लिखित उपभोक्ताओं के हितों का संवर्द्धन व सुरक्षा हेतु कार्य करना। यह माल या सेवाओं की गुणवत्ता, मात्रा, शुद्धता, कीमतों आदि से संबंधित बातों को उपभोक्ताओं के हित में संयोजित करने की समुचित व्यवस्था करती है।
- अधिवेशन : इस परिषद् की बैठक आवश्यकतानुसार की जाती हैं परन्तु वर्ष में कम से कम एक बैठक होना अनिवार्य है। [धारा 3(3)]
- उपभोक्ता संरक्षण कानून, 1986 में केन्द्रीय संरक्षण परिषद् को यह अधिकार दिया गया है कि वह चाहे तो वांछित संख्या में कार्य-दलों का गठन कर सकती है। कार्य दलों का गठन परिषद के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहयोग देने के लिए किया जाता है। परिषद ही दलों के कार्यों व कार्य विधि का निर्धारण करती है। कार्य समाप्ति पर संबंधित दल से प्राप्त प्रतिवेदन, निष्कर्षों और सुझावों को केन्द्रीय परिषद के समक्ष विचारार्थ रखा जाता है।
- केन्द्रीय परिषद का उद्देश्य उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण एवं संवर्द्धन हेतु सलाह प्रदान करता है। [धारा 5]
राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषद् या राज्य परिषद्
- 2019 के अधिनियम की धारा 6 (1) के तहत प्रत्येक राज्य में राज्य सरकार अधिसूचना जारी कर राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषद् की स्थापना करेगी। राजस्थान में इस परिषद् का गठन 1986 के अधिनियम के तहत किया गया था। राष्ट्रीय स्तर की केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद् की भांति यह राज्य स्तर पर सर्वोच्च परिषद् है तथा उपभोक्ता की सुरक्षा, सूचित किये जाने, चयन, सुनवाई, क्षतिपूर्ति व उपभोक्ता शिक्षा के अधिकारों के संरक्षण को सुनिश्चित करती है। राज्य परिषद् की बैठकें आवश्यकतानुसार आयोजित की जा सकती हैं। किन्तु वर्ष में कम से कम दो बार बैठकें अवश्य आयोजित की जायेगी।
- गठन : परिषद् का गठन निम्न प्रकार होगा - [धारा 6 (2)]
- राज्य सरकार के उपभोक्ता मामलों का प्रभारी मंत्री इसका अध्यक्ष होगा।
- राज्य सरकार द्वारा निर्धारित संख्या में सरकारी व गैर-सरकारी सदस्य मनोनीत होंगे।
- केन्द्रीय सरकार द्वारा नामांकित कुछ संरकारी (पदेन) तथा गैर सरकारी सदस्य जो अधिकतम 10 होंगे।
- बैठक : राज्य परिषद् की वर्ष कम से कम 2 बैठक होगी। [धारा 6 (3)]
- उद्देश्य : अधिनियम के तहत् राज्य के उपभोक्ताओं के अधिकारों के संरक्षण व संवर्द्धन करने हेतु राज्य सरकार को सलाह प्रदान करना। [धारा 7]
जिला उपभोक्ता संरक्षण परिषद् या जिला उपभोक्ता परिषद्
- स्थापना : राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा प्रत्येक जिले में एक उपभोक्ता संरक्षण परिषद् की स्थापना करेगी। [धारा 8(1)]
- गठन : परिषद् का गठन निम्नानुसार होगा - [धारा 8 (2)]
- जिले का जिलाधिकारी इसका अध्यक्ष होगा।
- राज्य सरकार द्वारा निर्धारित संख्या में सरकारी (पदेन) तथा गैर सरकारी सदस्य नियुक्त किये जाएंगे।
- सभाएँ : वर्ष में कम से कम 2 सभाएँ आवश्यक है। [धारा 8 (3)]
- स्थान : जिले के अंदर सभा का स्थान, समय व तिथि अध्यक्ष तय करेगा।
- उद्देश्य : अधिनियम के अंतर्गत जिले के उपभोक्ताओं के अधिकारों की सुरक्षा तथा संवर्द्धन करने हेतु सलाह देना। [धारा 9)]
केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 में उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण हेतु केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण के गठन का प्रावधान किया गया है जो 1986 के अधिनियम में नहीं था। अधिनियम की धारा 10 (1) के तहत केन्द्र सरकार उपभोक्ताओं के अधिकारों के संवर्द्धन, संरक्षण एवं उनके समुचित एवं प्रभावी क्रियान्वयन हेतु केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण का गठन करेगी। यह प्राधिकरण उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन, अनुचित व्यापार एवं भ्रामक विज्ञापनों से संबंधित मामलों का विनियमन करेगा। ऐसे मामलों की जाँच एवं अन्वेषण करने हेतु प्राधिकरण की एक अन्वेषण शाखा होगी, जिसका अध्यक्ष महानिदेशक होगा।
इस प्राधिकरण में एक मुख्य आयुक्त (Chief Commissioner) एवं उस संख्या में अन्य आयुक्त होंगे, जितने केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किये जाए। इन सभी की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाएगी। [धारा 10 (2)]
इस प्राधिकरण का मुख्यालय नई दिल्ली में होगा। [धारा 10 (3)]
यह प्राधिकरण निम्न कार्य करेगा-
- उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन की जाँच, अन्वेषण एवं उपयुक्त मंच पर कानूनी कार्यवाही प्रारंभ करना।
- जोखिमपूर्ण वस्तुओं को विक्रेता/उत्पादक द्वारा वापस लेने या सेवाओं को विड्रॉ करने का आदेश जारी करना, उपभोक्ता को उसके द्वारा चुकाई गई कीमत की भरपाई करवाना और अनुचित व्यापार को बंद करना।
- संबंधित व्यापारी/निर्माणकर्ता/इण्डोर्सर/विज्ञापनकर्ता/प्रकाशक को झूठे या भ्रामक विज्ञापन को बंद करने या उसे सुधारने का आदेश जारी करना।
- खतरनाक एवं असुरक्षित वस्तुओं तथा सेवाओं के संबंध में उपभोक्ताओं को सुरक्षा सूचना जारी (Safety Notice) करना।
- यह प्राधिकरण निर्माताओं एवं भ्रामक एवं झूठे विज्ञापनकर्ताओं पर ₹10 लाख तक का जुर्माना लगा सकता है। दुबारा अपराध करने पर यह जुर्माना ₹50 लाख तक हो सकता है। साथ ही निर्माता को प्रथम अपराध पर 2 वर्ष तक की कैद तथा दोहराने पर प्रत्येक बार 5 वर्ष की कैद की सजा का प्रावधान किया गया है। CCPA को भ्रामक विज्ञापन को एण्डोर्स करने वाले व्यक्ति या संस्था पर भी उस विज्ञापन के संबंध में कम से कम 1 वर्ष तक एवं अधिक बार अपराध करने एवं इण्डोर्स करने पर 3 वर्ष तक प्रतिबंध लगाने की शक्ति है।
- केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण के आदेश के विरुद्ध आदेश की तिथि से 30 दिन के अंदर राष्ट्रीय आयोग के समक्ष अपील की जा सकती है। (धारा 24)
प्रमुख योजना
युवा पुरस्कार तथा प्रशस्ति-पत्र योजना
राज्य सरकार उपभोक्ता संरक्षण के कार्यक्रमों को उच्च प्राथमिकता देती है और राज्य में विशेषकर जन-स्तर पर वह एक मजबूत तथा व्यापक आधार वाले उपभोक्ता आन्दोलन को बढ़ावा देने के लिए अत्यन्त उत्सुक हैं। उपभोक्ता की विभिन्न समस्याओं को ध्यान में रखते हुए केन्द्र सरकार ने एक व्यापक उपभोक्ता संरक्षण कानून अर्थात्, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 बनाया है। जिसका उद्देश्य उपभोक्ता की शिकायतों को सरल तरीके से कम खर्च पर और अल्पावधि में निपटाना है। लेकिन राज्य में एक मजबूत उपभोक्ता आन्दोलन को बढ़ावा देने के लिये समाज के प्रत्येक वर्ग विशेषकर युवाओं, महिलाओं को, इसमें अपना योगदान देना है। उपभोक्ता संरक्षण के क्षेत्र में युवाओं, महिलाओं तथा अन्य व्यक्तियों द्वारा किये गये प्रयासों को मान्यता देने तथा उन्हें प्रोत्साहन देने के लिए राज्य सरकार ने वर्ष 1989 से उपभोक्ता संरक्षण के लिये पुरस्कार/प्रशस्ति-पत्र प्रदान करने की एक योजना प्रारम्भ की हुई है।
इस योजना के अन्तर्गत पुरस्कार/प्रशस्ति-पत्र निम्न प्रकार दिये जाते हैं:
- युवा पुरस्कार: राज्य स्तर पर ₹15,000, ₹10,000 तथा ₹5,000 की पुरस्कार राशि के रूप में 3 पुरस्कार दिये जाते हैं। इन पुरस्कारों को प्राप्त करने वालों को प्रशस्ति-पत्र भी दिये जाते हैं।
- प्रशस्ति-पत्र: राज्य स्तर पर 3 व्यक्तियों को तथा प्रत्येक जिले में एक व्यक्ति को प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया जाता है।
युवा पुरस्कार/प्रशस्ति-पत्र के लिए पात्रता
- उपभोक्ता संरक्षण के लिए उत्कृष्ट कार्य करने वाले 20 से 40 वर्ष की आयु वर्ग के सभी युवक-युवतियाँ राज्य स्तरीय युवा पुरस्कार के लिए पात्र हैं। प्रशस्ति-पत्र हेतु सभी व्यक्ति, जिन्होंने उपभोक्ता संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य किया है, पात्र हैं। इस योजना के अन्तर्गत आवेदन करने वाले व्यक्तियों के कार्यों को उनके द्वारा निम्नलिखित में से किसी एक या अधिक क्षेत्र में किये गये कार्य के आधार पर आंका जायेगा:-
- महत्वपूर्ण उपभोक्ता कार्य शुरू करना,
- उपभोक्ता शिकायतों के प्रतितोष के लिए प्रयास करना,
- उपभोक्ता संरक्षण तथा स्वास्थ्य हेतु खतरनाक वस्तुओं से सुरक्षा के लिए नये विचार प्रस्तुत करना।
- प्रदर्शनियों, संगोष्ठियों, प्रदर्शनों आदि के जरिए, विशेषकर छोटे कस्बों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ता आन्दोलन को बढ़ावा देना।
- विशिष्ट उपभोक्ता समस्याओं के संबंध में उपभोक्ता अनुसंधान अथवा जाँच करना।
- कोई भी अन्य कार्य करना, जिसका प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से उपभोक्ता संरक्षण क्षेत्र में योगदान हो तथा स्वैच्छिक उपभोक्ता आन्दोलन के संदेश का प्रसार हो।
युवा पुरस्कार/प्रशस्ति-पत्र के लिए किस प्रकार आवेदन करें
यह पुरस्कार/प्रशस्ति-पत्र प्रत्येक केलेण्डर वर्ष (1 जनवरी से 31 दिसम्बर तक) से संबंधित होगा।
आवेदक अपनी गतिविधि की रिपोर्ट की दो प्रतियाँ संबंधित जिला कलेक्टर को भेजेगा। रिपोर्ट में स्पष्ट शीर्षकों के तहत आवेदक की गतिविधियाँ दी जाएँगी और उसका संक्षिप्त परिचय (बायोडाटा) भी दिया जाएगा।
रिपोर्ट साफ-साफ लिखी होनी चाहिए और यदि संभव हो तो डबल स्पेस टाइप कराया जाए।
आवेदक को स्पष्ट रूप से यह उल्लेख करना होगा कि इस योजना के अन्तर्गत उसके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर उसका स्वत्वाधिकार (कॉपीराइट) का कोई दावा नहीं होगा और सरकार को आवेदक द्वारा भेजी गई सामग्री को प्रकाशित करने का अधिकार होगा।
रिपोर्ट जिला कलेक्टर के पास 31 जनवरी तक पहुँच जानी चाहिए।
युवा पुरस्कार तथा राज्यस्तरीय प्रशस्ति-पत्र हेतु चयन की प्रक्रिया
- संबंधित जिला कलेक्टर आवेदक की गतिविधियों का सत्यापन करेगा। यदि जिला कलेक्टर कार्य को प्रशंसनीय पाता है तो आवेदक द्वारा प्रस्तुत-रिपोर्ट की एक प्रति अपनी सिफारिशों तथा टिप्पणियों के साथ राज्य सरकार (उपभोक्ता मामले विभाग) को भेजेगा।
- आवेदक के कार्य का मूल्यांकन करते समय जिला कलेक्टर विशेष रूप से इस बात को देखेंगे कि उसके कार्य का उपभोक्ताओं के कल्याण पर क्या प्रभाव पड़ा है।
- जिला कलेक्टर की सिफारिश तथा टिप्पणियाँ, गतिविधियों की रिपोर्ट के साथ अधिक से अधिक 15 फरवरी तक राज्य सरकार के पास पहुँच जानी चाहिये।
- चयन एक समिति द्वारा किया जाएगा, जिसमें सचिव, उपभोक्ता मामले विभाग, उपभोक्ता संरक्षण के प्रभारी अधिकारी तथा एक प्रख्यात व्यक्ति, जिन्होंने उपभोक्ता संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य किया हो, शामिल होंगे। उक्त प्रख्यात व्यक्ति को उपभोक्ता मामले विभाग द्वारा नामित किया जावेगा। समिति की सिफारिशों को उपभोक्ता मामले मंत्री, राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित किया जावेगा।
- राज्य सरकार के पास यह अधिकार सुरक्षित होगा कि वह किसी वर्ष यदि किसी आवेदक को इस पुरस्कार/प्रशस्ति-पत्र के लिए पात्र नहीं पाये, उस वर्ष हेतु किसी भी व्यक्ति को पुरस्कार /प्रशस्ति-पत्र प्रदान नहीं करे।
जिला स्तरीय प्रशस्ति-पत्र हेतु चयन प्रक्रिया:
संबंधित जिला कलेक्टर आवेदक की गतिविधियों का सत्यापन करेगा तथा उसके कार्य का मूल्यांकन करते समय इस बात को देखेगा कि उसके कार्य का उपभोक्ता के कल्याण पर क्या प्रभाव पड़ा है।
प्रशंसनीय कार्य करने वाले व्यक्ति का चयन एक समिति द्वारा किया जावेगा। जिसके अध्यक्ष जिला कलेक्टर होंगे। स्वयंसेवी संगठनों का जिला कलेक्टर द्वारा नामित एक प्रतिनिधि, (जिसने उपभोक्ता संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य किया हो) एवं जिला प्रमुख इस समिति के सदस्य होंगे तथा जिला रसद अधिकारी इस समिति का संयोजक होगा।
समिति द्वारा चयनित व्यक्ति का नाम तथा उसके किये गये कार्य का संक्षिप्त ब्यौरा जिला कलेक्टर द्वारा राज्य सरकार के अनुमोदन हेतु 15 फरवरी तक उपभोक्ता मामले विभाग को भिजवाया जावेगा।
राज्य सरकार के पास यह अधिकार सुरक्षित होगा कि यदि वह किसी वर्ष किसी व्यक्ति को इस प्रशस्ति-पत्र के लिये पात्र नहीं पाये तो उस वर्ष हेतु प्रशस्ति-पत्र प्रदान नहीं करे।
गुणवत्ता प्रमाणन व पहचान चिन्ह
बाजार में उपलब्ध विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की गुणवत्ता और मूल्य भिन्न होते हैं। जो भी वस्तु हम क्रय करते हैं, मूल्य के हिसाब से गुणवत्ता उसी के अनुरूप होनी चाहिए। वस्तु के मूल्य तथा उसके वजन की जाँच तो उपभोक्ता अपने स्तर पर कर सकता है परंतु वस्तु की गुण या गुणवत्ता के बारे में वह स्वयं निर्णय नहीं ले सकता, क्योंकि उसे न तो वस्तु के निर्माण की तकनीक का पता होता है और न ही वस्तु की गुणवत्ता के साधन उसके पास होते हैं। अतः बहुत बार वह भ्रामक विज्ञापनों, आकर्षक पैकिंग के चक्कर में फंसकर घटिया वस्तुएँ खरीद लेता है जिस कारण उसका मेहनत से कमाया हुआ पैसा तो बर्बाद होता ही है इसके अतिरिक्त कभी-कभी उसके स्वास्थ्य और जान के लिए खतरा भी उत्पन्न हो जाता है। उपभोक्ताओं को ऐसी स्थिति से उबारने के लिए वस्तुओं और सेवाओं की गुणवता सम्बन्धी मानकों का चलन शुरु किया गया और वस्तुओं पर मानक चिन्हों की उपस्थिति वस्तुओं की गुणवत्ता की गारंटी का काम करने लगी। अतः यह उपभोक्ताओं के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हुई।
अंतर्राष्ट्रीय मानक
14 अक्टूबर 1946 में विश्व के 25 देशों के प्रतिनिधियों द्वारा एक बैठक का आयोजन किया गया था, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय मानक संगठन की स्थापना का निर्णय लिया गया था। आई.एस.ओ. सभी सदस्य देशों के राष्ट्रीय मानकीकरण संस्थाओं का अंतर्राष्ट्रीय संगठन है, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानकों का निर्धारण करता है। अब तक आई. एस. ओ. ने विभिन्न विषयों पर 13000 से भी अधिक अंतर्राष्ट्रीय मानकों का निर्धारण किया हुआ है, इससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि, गुणवत्ता स्पर्धा का विस्तार और अंतर्राष्ट्रीय जन जीवन के स्तर में सुधार हुआ है।
राष्ट्रीय मानक संस्थान
भारतीय मानक ब्यूरो भारत का राष्ट्रीय मानक संस्थान है। औद्योगिक विकास, उपभोक्ता संरक्षण तथा दैनिक जीवन में मानकों के निर्धारण की संगठित प्रक्रिया जनवरी 1947 में भारतीय मानक संस्था की स्थापना के साथ शुरू हुई थी। अपने कार्यकाल में इस संस्था ने औद्योगिक विकास एवं जन जीवन के स्तर में सुधार लाने के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मानकों के निर्धारण में देश के लगभग 40,000 वैज्ञानिक, तकनीकी विशेषज्ञ, प्रमुख प्रयोगशालाओं उपभोक्ता संगठनों एवं सम्बन्धित सरकारी विभागों एवं उप समितियों के सहयोग से ब्यूरो ने अब तक 17,000 से भी अधिक मानकों का निर्धारण कर औद्योगिक इकाईयों के गुणवत्ता विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया है। वर्तमान में राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय मानक ब्यूरो ने विभिन्न प्रकार के उत्पादों के लिए लगभग 14000 से भी अधिक लाइसेंस जारी किए हुए हैं।
एग्रीकल्चरल मार्किंग (एगमार्क)
खाद्य पदार्थों का श्रेणीकरण व चिन्हांकन भारत सरकार का विपणन एवं निरीक्षण निदेशालय पिछले 70 वर्षों से करता आ रहा है। इस उद्देश्य की पूर्ति कृषि उत्पाद अधिनियम 1937 के अनुसार किया जाता है। निदेशालय कृषि, बागवानी, पशुधन, दुग्ध उत्पाद व उनसे प्राप्त उत्पादों के लिए उपयुक्त गुणवत्ता परिभाषाओं श्रेणी मानक निर्धारित करता है। श्रेणी मानक तैयार किए जाते समय उत्पादों की प्रयोगशाला में जाँच की जाती है। सरकारी विभागों, उत्पादकों, व्यापारियों आदि से विचार विमर्श के पश्चात ही श्रेणी मानक तैयार किए जाते हैं। इसे भारत के राजपत्र में अधिसूचित किया जाता है। इसके बाद यह कानूनी रूप ले लेता है। अभी तक 150 कृषि एवं संबंद्ध वस्तुओं के मानक तैयार कर अधिसूचित किए जा चुके है। एगमार्क की योजना घरेलू उपभोग के लिए एक ऐच्छिक योजना है।
कुछ प्रमुख मानक चिन्ह
सामान्यतः बाजार में उपलब्ध विभिन्न पदार्थों पर लगने वाले मुख्य चिन्ह निम्न हैं हैं-
- आई. एस. आई. का निशान- आई. एस. आई. का निशान भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा प्रदान किया जाने वाला प्रमुख मानक चिन्ह है। यह अधिकांशतः सभी प्रोसेस किए खाद्य उत्पादों सहित आम उपभोग की अधिकांश वस्तुओं जैसे विद्युत उपकरण, सीमेन्ट, लोहे के पाईप, हेलमेट आदि पर लगाया जाता है।
- एफ.पी.ओ. का निशान- एफ.पी.ओ. का चिन्ह एक अन्य महत्वपूर्ण मानक चिन्ह है, जो विभिन्न प्रकार के शीतल पेय व अचार, चटनी, शर्बत व सॉस आदि खाद्य पदार्थों पर लगाया जाता है आई.एस.ओ. 9001 का निशान- आई.एस.ओ. 9001 श्रंखला के विभिन्न निशान गुणवत्ता प्रणाली को दर्शाते हैं। आई.एस.ओ निशान किसी उत्पाद की गुणवत्ता प्रमाणित करने के स्थान पर उसकी पूरी प्रणाली को प्रमाणित करते हैं। यह चिन्ह सेवा क्षेत्रों जैसी बैंकिंग, शिक्षा आदि से जुड़े संस्थाओं द्वारा भी उपयोग में लाया जाता है।
- एगमार्क के निशान- जैसे की ऊपर वर्णित किया जा चुका है, एगमार्क का निशान विशेषकर कृषि उत्पादों पर लगाया जाता है। इसमें देशी घी, तेल, मसाले, मैदा जैसे उत्पाद शामिल हैं।
- इकोमार्क- इकोमार्क चिन्ह यह प्रमाणित करता है कि ये उत्पाद पर्यावरण को किसी प्रकार की हानि पहुँचाने वाला नहीं है। इकोमार्क पर्यावरण की सुरक्षा से सम्बन्धित मानक तैयार करेगा।
- इसी प्रकार अन्य बहुत से मानक चिन्ह प्रचलन में है जैसे कम ऊर्जा खपत को दिखाने वाले तारे अथवा वास्तविक ऊन एवं सिल्क को दिखाने वाले वूलमार्क या सिल्कमार्क आदि। उपभोक्ताओं को चाहिए कि वे मानक चिन्हों को देखकर गुणवत्तापूर्ण वस्तुओं की खरीद करें।
- भ्रामक विज्ञापन- उदारीकरण और उपभोक्तावाद के बढ़ते दौर में बाजार में उत्पादों और सेवा प्रदाताओं की संख्या एवं उसी अनुरूप उत्पाद एवं सेवाओं की भिन्नता भी तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में निर्माताओं एवं सेवा प्रदाताओं के पास विज्ञापन ही अपने उत्पादों के संबंध में अधिकाधिक लोगों तक जानकारी पहुँचाने का सबसे सशक्त माध्यम है। उपभोक्ताओं के पास भी विभिन्न उत्पाद एवं सेवाओं के बारे में जानने का यह एक सबसे सुलभ प्रकार है, किंतु बढ़ती प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ताओं के शोषण की बढ़ती प्रवृत्ति के चलते अनेक निर्माताओं एवं सेवा प्रदाताओं ने विज्ञापनों को उपभोक्ता को भ्रमित करने का एक बड़ा माध्यम बना लिया है।
- उपभोक्ताओं को विज्ञापनों के जरिये भ्रमित करने की स्थिति में यदि उपभोक्ता न्याय प्राप्त करना चाहता है, तो उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम सहित विभिन्न कानूनों के माध्यम से वे ऐसे विज्ञापनदाताओं के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही कर क्षतिपूर्ति प्राप्त कर सकते हैं। भ्रामक विज्ञापनों के संबंध में अनुचित व्यापारिक व्यवहार के तहत विभिन्न प्रावधान किये गए हैं, लेकिन इस संबंध में विज्ञापनों की विषय वस्तु को नियंत्रण करने वाले निकाय के रूप में भारतीय विज्ञापन मानक परिषद् एक महत्वपूर्ण निकाय है, जिसके बारे में भी उपभोक्ताओं को जानना चाहिये।
परिषद् ने विज्ञापनों की विषय वस्तु को नियंत्रित करने के लिए एक आचार संहिता को अंगीकार किया है, जिसके तहत सामान्यतः विज्ञापनों में किये गए निरूपणों तथा दावों की सत्यता और ईमानदारी सुनिश्चित करने और भ्रामक विज्ञापनों से बचाव करने के लिए निम्न प्रावधान किये गए है-
- सभी विवरण, दावे और तुलनाएँ जिनका संबंध तथ्यात्मक रूप से निश्चित मामलों से है, प्रमाणित किये जाने योग्य होने चाहिए। विज्ञापनकर्ताओं और विज्ञापन एजेंसियों को जब भारतीय विज्ञापन मानक परिषद् द्वारा बुलाये जाये तो उन्हें ऐसे प्रमाणित तथ्य प्रस्तुत करना अपेक्षित है।
- जहाँ विज्ञापित दावे स्वतंत्र अनुसंधान अथवा आंकलन पर आधारित या उनके द्वारा समर्थित बताये गए हों, वहाँ उनका स्त्रोत और तारीख विज्ञापन में दर्शाई जानी चाहिए।
- विज्ञापनों में संदर्भित व्यक्ति, फर्म अथवा संस्थान की अनुमति के बिना किसी व्यक्ति, फर्म अथवा संस्थान का ऐसा कोई संदर्भ नहीं होना चाहिए जिससे विज्ञापित उत्पाद को अनुचित लाभ मिले अथवा उस व्यक्ति, फर्म अथवा संस्थान का उपहास अथवा बदनामी हो। यदि कभी भारतीय विज्ञापन मानक परिषद् द्वारा ऐसा किया जाना अपेक्षित हो तो विज्ञापनदाता और विज्ञापन एजेंसी को उस व्यक्ति, फर्म अथवा संस्थान जिसका कि विज्ञापन में संदर्भ दिया गया है, से स्पष्ट अनुमति प्रस्तुत करनी होगी।
- विज्ञापनों में न तो तथ्यों को तोड़ना, मरोड़ना होगा और न ही उपभोक्ताओं को उपलक्षणों या चूक के द्वारा भ्रमित करना होगा। विज्ञापनों में ऐसे कथन या दृश्य प्रस्तुतियाँ नहीं होनी चाहिए, जिससे प्रत्यक्ष अथवा उपलक्षण अथवा चूक द्वारा अथवा अस्पष्टता द्वारा अथवा बढ़ा-चढ़ा के किये गए वर्णन से उपभोक्ता को विज्ञापनदाता या अन्य किसी उत्पाद या विज्ञापनदाता के बारे में धोखा दे सकते हों।
- ऐसे विज्ञापन तैयार नहीं किये जाने चाहिए, जिससे उपभोक्ता के विश्वास का दुरूपयोग हो या उसके अनुभव या ज्ञान की कमी के कारण उनका शोषण होता हो। किसी भी विज्ञापन को बढ़ा-चढ़ा कर कोई ऐसा दावा प्रकाशित करने की अनुमति नहीं दी जायेगी जिससे उपभोक्ता के मस्तिष्क में गंभीर या घोर निराशा हो।
- उपभोक्ता को लुभाने या उनको आकर्षित करने के लिऐ स्पष्ट असत्यता और अत्युक्तियों की अनुमति दी गई है, बशर्ते वे स्पष्ट रूप से विनोदपूर्ण या अतिश्योक्तिपूर्ण लगे तथा उनके विज्ञापित उत्पाद के लिए यथार्थ अथवा भ्रामक दावे करने वाले समझे जाने की संभावना न हो।
- वस्तुओं और सेवाओं के व्यापक निर्माण और वितरण में यदा-कदा अंजाने में विज्ञापित वायदे अथवा दावे को पूर्ण करने में चूक होने की संभावना रही है। इस प्रकार की यदा-कदा अंजाने में होने वाली चूकों से विज्ञापन को इस संहिता के अन्तर्गत अवैध नहीं माना जायेगा लेकिन ऐसे मुद्दे की जाँच करते समय यह देखा जायेगा कि क्या वायदा या दावा विज्ञापित उत्पाद के विशिष्ट नमूने को पूरा करने मे समक्ष है और क्या उत्पाद की खामी का अनुपात आमतौर पर स्वीकार किये जाने की सीमाओं के अन्दर है और क्या विज्ञापनकर्ता ने कमी को पूरा करने के लिए तुरन्त कार्यवाही की है।
- इसी प्रकार इसके माध्यम से यह भी सुनिश्चित किया गया है कि विज्ञापन लोकाचार के आमतौर पर स्वीकार्य मानकों के प्रतिकूल न हो अर्थात विज्ञापनों में कोई अश्लील, असभ्य बात नहीं होनी चाहिए। जिससे लोकाचार और लोक मर्यादा के प्रचलित सामान्य स्वीकार्य मानदण्डों के आलोक में गंभीर और व्यापक अपराध होने की संभावना हो। परिषद ऐसे उत्पादों के संवर्धन और उत्पादों के लिए विज्ञापन के अंधाधुंध प्रयोग से बचाव करती है, जिनको समाज या व्यक्तियों में एक हद तक खतरनाक माना जाता है या जो इस प्रकार की होती है जिन्हें समाज व्यापक रूप से स्वीकार नहीं करता। इस संहिता के तहत यह भी सुनिश्चित किया गया है कि विज्ञापन प्रतियोगिता में निष्पक्षता बरते जिससे उपभोक्ताओं को बाजार में विकल्पों के संबंध में सूचित किये जाने की जरूरत और कारोबार में आमतौर पर स्वीकार्य प्रतियोगी व्यवहार दोनों की जानकारी दी जा सके। यदि किसी उपभोक्ता को यह लगता है कि प्रदर्शित किये गये विज्ञापनों में उपरोक्त मानकों का उल्लंघन हुआ है तो उपभोक्ता भारतीय विज्ञापन मानक परिषद में इस संबंध में अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। उपभोक्ता अन्य कानूनों के जरिये भी भ्रमित करने वाले विज्ञापनों के विरूद्ध कार्यवाही कर सकता है। भ्रामक विज्ञापनों के संबंध में उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत गठित उपभोक्ता आयोग एवं मंचों में भी कार्यवाही कर सकता है।
गारंटी वारंटी: सतर्कता जरूरी
उपभोक्ता के साथ ठगी का एक और प्रमुख तरीका है, वस्तुओं के संबंध में दी गई गारंटी या वारंटी को वास्तविक तौर पर पूरा नहीं किया जाना। यह भी देखने में आया है कि आम उपभोक्ता सामान्यः वस्तुओं को खरीदते समय इन गारंटी व वारंटी की शर्तों को पूरी तरह पढ़ता ही नहीं है। जिसका लाभ उठाकर कई बार वारंटी या गारंटी कार्डों में ऐसी शर्तें शामिल करते हैं, जो उपभोक्ताओं के स्वाभाविक अधिकारों का भी हनन करती है।
उपभोक्ता को प्रभावी ढंग से गारंटी और वारंटी का लाभ उठाने के लिए कई बातों का ध्यान रखना चाहिए। उसे इस संबंध में सतर्कता बरतते हुए अपनी आदतों में बदलाव लाना चाहिए, तभी गारंटी और वारंटी को पूरा लाभ मिल सकता है।
निम्न बातों का ध्यान रखा जाना आवश्यक है:-
- जाँचिए कि आपने खरीददारी का बिलमीमो प्राप्त कर लिया है, जिस पर खरीददारी का दिनांक भी अंकित है ।
- खरीददारी करते समय वस्तु का गारंटी या वारंटी कार्ड आपने प्राप्त कर लिया है और उस पर विक्रेता ने हस्ताक्षर कर दिए हैं तथा अपनी मोहर लगा दी है।
- पूरी तरह यह जाँच कीजिए कि आपको क्या-क्या गारंटी दी गई है।
- इस तथ्य को अच्छी तरह जाँच लें कि क्या वारंटी/गांरटी के जरिए उपभोक्ता को प्राप्त अन्तर्निहित अधिकारों में तो कोई कटौती नहीं कर दी गई है। विशेषकर गारंटी में कहीं यह तो नहीं लिखा है कि 'यह गारंटी अन्य समस्त गारंटीज पर अधिप्रभावी होगी।'
- गारंटी या वारंटी की शर्तों के बारीक अक्षरों को पढ़ डालिए, कई बार उपभोक्ता के विरूद्ध जाने वाली शर्तें अत्यधिक बारीक अक्षरों में लिखी होती हैं या उसकी प्रिंटिंग खराब व न पढ़ने में आने योग्य होती है।
- जाँचिए कि वस्तु के बिक्री बाद सेवा केन्द्रों की स्थिति क्या है, वे कहाँ-कहाँ स्थित हैं और उनकी सेवा का स्तर क्या हैं?
- जाँचिए कि वस्तु में शिकायत आने पर उसके परिवहन आदि के 'खर्च को वहन करने का दायित्व किसका है।
- वस्तु से संबंधित पैम्पलेट्स, पोस्टर्स, विज्ञापन आदि की अधिकाधिक सामग्री क्रय से पूर्व एकत्र कर लें।
- कुछ राशि का भुगतान चैक द्वारा करने का प्रयत्न करें ताकि वह खरीद के सबूत के रूप में काम आ सके।
- बिल, कैशमीम, गारंटी कार्ड एवं जानकारी वाले पैम्पलेट्स मूल एवं फोटो स्टेट प्रतियाँ पृथक-पृथक रूप से सुरक्षित रखें।
राजस्थान राज्य उपभोक्ता संरक्षण आयोग
इस आयोग का गठन 26 मई, 1988 को (राजस्थान संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत, 1986) श्री कृष्णमल लोढ़ा के नेतृत्व में जयपुर में हुआ। बोर्ड के वर्तमान अध्यक्ष अशोक परिहार हैं। इसकी एक सर्किट बैंच (खंडपीठ) जोधपुर जिले में स्थापित है।
उपभोक्ताओं के अधिकार
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अनुसार उपभोक्ताओं को निम्न अधिकार प्रदान किए गए हैं-
- अपनी आवश्यकता एवं ऐच्छिक वस्तुओं, उत्पादों के चयन का अधिकार।
- बाजार में उपलब्ध वस्तुओं एवं सेवाओं का उपयोग, लाभ-हानि की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार।
- उपभोक्ता की विभिन्न शिकायतों के समाधान की माँग करने का अधिकार।
- उपभोक्ता अपनी शिकायतें दर्ज विभिन्न स्तरों पर कर सकता है।
- जीवन के लिए हानिकारक उत्पादों से सुरक्षा की माँग का अधिकार।
- राज्य उपभोक्ता आयोग में एक अध्यक्ष व दो सदस्य होते हैं। इसका अध्यक्ष उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है।
- राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग की सदस्य संख्या 5 होती है जिसमें 1 अध्यक्ष व 4 सदस्य होते हैं।
- राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग का अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है।
- उपभोक्ता न्यायालय के प्रत्येक स्तर पर सदस्यों में एक महिला सदस्य का होना अनिवार्य है।
- उपभोक्ता प्रत्येक स्तर पर 30 दिन की अवधि में न्याय के लिए अपील कर सकता है।
इस अधिनियम में उपभोक्ताओं के भी कुछ कर्त्तव्य निर्धारित किये गये हैं:
- खरीदे हुए माल का बिल/रसीद लें।
- मानकीकृत वस्तुओं को प्राथमिकता दें।
- पैकिंग पर लिखे विवरण को ध्यान से पढ़ें।
- वस्तु या सेवा के दोष की शिकायत करें।
- वस्तु या सेवा में दो होने पर दो वर्ष की अवधि में शिकायत दर्ज कराना आवश्यक होता है।
- उपभोक्ता को प्रसिद्ध दुकानों, सुपर बाजार, सहकारी भण्डार, विश्वसनीय विक्रेता, अधिकृत विक्रेता से वस्तुएँ खरीदनी चाहिए।
- कोई भी वस्तु खरीदने से पूर्व उस पर गुणवत्ता चिह्न, मुद्रित मूल्य, दर सूची, उत्पादन तथा अवसान तिथि, बैच नं., उत्पादक का नाम व पता देख लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त सही वजन तथा माप, कैशमीमो या बिल और गारंटी कार्ड अवश्य लेना चाहिए।
- अक्टूबर, 2005 में भारत सरकार ने एक कानून लागू किया जो RTI (राइट टू इनफॉरमेशन) या सूचना पाने का अधिकार के नाम जाता है और जो अपने नागरिकों को सरकारी विभागों के कार्य-कलापों की सभी सूचनाएँ पाने के अधिकार को सुनिश्चित करता है।
- कोपरा (COPRA) अधिनियम ने केन्द्र और राज्य सरकारों में उपभोक्ता मामले के अलग विभागों को स्थापित करने में मुख्य भूमिका अदा की है। उपभोक्ता नीतियों के विकास के इतिहास में 9 अप्रैल, 1985 का दिन काफी महत्त्वपूर्ण है, इसी दिन संयुक्त राष्ट्र महासभा ने उपभोक्ता संरक्षण के लिए दिशा निर्देश को मंजूरी दी थी।
- उपभोक्ता आंदोलन सर्वप्रथम महाराष्ट्र में सन् 1904 में शुरू हुआ। स्वतंत्र भारत में उपभोक्ता आंदोलन को प्रारम्भ करने का श्रेय तत्कालीन मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री श्री चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को जाता है, जिन्होंने वर्ष 1949 में उपभोक्ता के हितों की रक्षा के लिए उपभोक्ता संरक्षण परिषद् की स्थापना की।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की प्रमुख विशेषताएँ
- भौगोलिक स्तर पर जम्मू-कश्मीर के अलावा यह अधिनियम पूरे देश में समान रूप से लागू होता है।
- इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं को दोषपूर्ण सामग्री, असंतोषजनक अथवा त्रुटिपूर्ण सेवा तथा अनुचित व्यापारिक व्यवहार के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करना है।
- यह अत्यंत नवीन एवं प्रगतिशील समाज कल्याण कानून है।
- केन्द्र सरकार द्वारा विशेष रूप से अनुसूचित वस्तुओं एवं सेवाओं को छोड़कर इसके दायरे में समस्त वस्तु एवं सेवाएँ आती हैं।
- यह एकमात्र कानून है, जो सीधे बाजार व्यवस्था से जुड़ा हुआ है तथा इससे उत्पन्न शिकायतों का निवारण करने में सक्षम है। इसकी विभिन्न व्यवस्थाएँ अत्यन्त व्यापक एवं प्रभावशाली हैं।
- इस अधिनियम से उपभोक्ता आंदोलन शक्तिशाली बना है।
दोषपूर्ण वस्तु एवं सेवा में कमी की परिभाषा
- दोषपूर्ण वस्तु: तत्कालीन नियम, विनिमय एवं कानून के अंतर्गत वस्तुओं की गुणवत्ता, माप, असर, शुद्धता या मापदण्डों में त्रुटि अपूर्णता अथवा कमी जो विक्रेता द्वारा किये गये दावे के अनुसार नहीं है- वस्तु अथवा सामग्री में दोष माने जाते हैं।
- वस्तु का आशय: कोई भी चल सम्पत्ति है, (मुद्रा को छोड़कर) इसमें माल अथवा शेयर, उगी हुई फसल, घास या ऐसी चीजें जो जमीन से जुड़ी हुई हैं तथा जिन्हें बिक्री या बिक्री अनुबंध से पहले हटाया या काटा जा सकता है।
- सेवा: सेवा से तात्पर्य किसी भी प्रकार की सेवा है जो उसके सम्भावित प्रयोगकर्ता को उपलब्ध कराई जाती है। इसके अंतर्गत बैंकिंग, परिवहन, बीमा, गृह निर्माण, बिजली, रेलवे, मनोरंजन, टेलीफोन, चिकित्सा आदि सभी प्रकार की सेवाएँ सम्मिलित हैं। किन्तु इसके अंतर्गत निःशुल्क या व्यक्तिगत सेवा संविदा के अधीन सेवा किया जाना नहीं है।
उपभोक्ता न्यायालय द्वारा दी जाने वाली राहत
उपभोक्ता न्यायालय द्वारा निम्नलिखित में से एक या अधिक राहत प्रदान की जा सकती है:
- खराब वस्तुओं के बदले में नई वस्तु दिलवाना।
- वस्तुओं में मौजूद दोष को दूर करा देना ।
- वस्तु खराब होने के कारण हुए नुकसान के लिए मुआवजा दिलवाना। दोषपूर्ण सामग्री के बदले में अदा की गई कीमत को वापस दिलवाना।
- भ्रामक विज्ञापन से हुए नुकसान की भरपाई के लिए नये सिरे से संशोधित विज्ञापन देना ।
- यदि किसी उत्पाद अथवा सेवा से अधिक उपभोक्ताओं को नुकसान पहुँचा है और जिनकी पहचान सुविधाजनक न हो तो ऐसी स्थिति में फोरम एकमुश्त राशि अदा करने का आदेश दे सकती है। यह राशि फोरम द्वारा ही निर्धारित की जाएगी, लेकिन कुल मूल्य के 5 प्रतिशत से कम नहीं होगी।
- पीड़ित व्यक्ति को समुचित राशि दिलवाने की व्यवस्था करना।
जिला मंच, राज्य आयोग तथा राष्ट्रीय आयोग का तुलनात्मक अध्ययन
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम - 2019 में सुनवाई प्रावधान
| स्तर | सीमा | अग्रिम न्याय |
|---|---|---|
| राष्ट्रीय स्तर | 10 करोड़ से अधिक | राष्ट्रीय स्तर |
| ⇑ | ||
| राज्य स्तर | ₹ 1 करोड़ से 10 करोड़ तक | राज्य स्तर |
| ⇑ | ||
| जिला स्तर | ₹ 1 करोड़ तक | जिला स्तर |
Note: राज्य स्तर पर निर्णय के विरूद्ध अपील राष्ट्रीय स्तर पर होगी उच्च न्यायालय में नहीं किन्तु राष्ट्रीय स्तर पर निर्णय के विरूद्ध सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में होती है।
उपभोक्ता मामलात् विभाग
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के प्रावधानों के अन्तर्गत राज्य स्तर पर राज्य आयोग एवं जिला स्तर पर सभी जिलों में पूर्णकालिक जिला उपभोक्ता विवाद निवारण मंचों का गठन किया गया है। जयपुर जिले में 4 तथा जोधपुर जिले में 2 मंच कार्यरत हैं। राज्य में कुल 37 जिला मंच एवं 7 सर्किट बैंच (सम्भागीय मुख्यालय) कार्यरत हैं।
राज्य स्तरीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (1800-180-6030) का संचालन मार्च, 2011 से किया जा रहा है। उपभोक्ताओं द्वारा ऑनलाइन शिकायतें वेबपोर्टल www.consumeradvice.in पर भी दर्ज करवाई जा रही हैं। विधिक मापविज्ञान प्रकोष्ठ, उपभोक्ता मामले विभाग के अन्तर्गत कार्यरत है। जून, 2020 से बाट एवं माप के सत्यापन और मुद्रांकन से संबंधित समस्त कार्य ई-तुलामान वेब पेज के माध्यम से ऑनलाइन किया जा रहा है।


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