राजस्थान में कृषि
इस लेख में राजस्थान की कृषि का विस्तृत विवरण दिया गया है। इसमें कृषि के प्रकार, फसलों का वर्गीकरण (खरीफ, रबी, जायद), प्रमुख कृषि क्रांतियाँ और नवीनतम सरकारी योजनाओं की जानकारी शामिल है। यह लेख RAS, REET, पटवार, और राजस्थान पुलिस जैसी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी है।
- किसान दिवस- 23 दिसंबर
- राज्य का लगभग 272.11 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कृषि योग्य भूमि है जो देश के कृषि योग्य क्षेत्र का लगभग 14% है।
- राज्य में पानी की उपलब्ध मात्रा प्रति व्यक्ति राज्य के स्तर पर औसतन 800 घन मीटर से भी कम है जो देश में उपलब्ध कुल सतही जल का मात्र 1.16% है।
नोट- राष्ट्रीय कृषक आयोग (NFC) ने 4 अक्टूबर, 2006 को सिफारिश प्रस्तुत की, कि कृषि को राज्य सूची से हटा कर समवर्ती सूची में शामिल किया जाए।
इस अध्याय का हम निम्न आधार पर अध्ययन करेंगे :-
- कृषि के प्रकार
- कृषि जोत के प्रकार
- जैव उर्वरक
- फसलों का वर्गीकरण
- कृषि क्रान्तियाँ
- प्रमुख फसलों का उत्पादन, उत्पादकता, क्षेत्रफल सिंचित
- कृषि से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण योजनाएँ
- राजस्थान में उद्यानिकी विकास,
- भारत सरकार की संस्थाएँ, जो कृषि विकास के लिए कार्यरत है,
- राजस्थान की कृषि विकास संस्थाएँ
- कृषि जलवायु प्रदेश/कृषि ग्राहय परीक्षण केन्द्र
- कृषि विश्वविद्यालय
I. कृषि के प्रकार
कृषि के प्रकार
- (i) सामान्य प्रकार
- (ii) वैज्ञानिक प्रकार
(i) सामान्य प्रकार
कृषि के सामान्य प्रकार निम्न हैं-
स्थानान्तरित कृषि
उष्ण कटिबंध क्षेत्र में इस प्रकार की कृषि होती है तथा ये अधिक वर्षा एवं उच्च तापक्रम का क्षेत्र है।
- इसलिए मिट्टी में कार्बनिक तत्व कम रह पाते हैं।
- भारी वर्षा के कारण घुलनशील पोषक तत्त्व निक्षालित हो जाते हैं और केवल लौह एवं एल्युमीनियम ऑक्साइड जो अघुलनशील तत्त्व हैं, बच जाते हैं। अतः कार्बनिक तत्त्वों की कमी, निक्षालन एवं वनस्पतियों को जलाने के कुप्रभावों से मिट्टी की उर्वरता समाप्त हो जाती है।
- इस प्रकार यह कृषि एक स्थान पर केवल 2-3 वर्षों तक ही कृषि की जा सकती है।
- इस कृषि में खाद्यान्न ही अधिक उगाए जाते हैं क्योंकि यह जीविकोपार्जी कृषि है, यह कृषि फसलें मक्का, कसावा, केला तथा शकरकन्द है।
- इस कृषि में कृषक जो फसल उत्पन्न करता है, उसका उपभोग कर लेता है।
नोट- इसमें प्रति हेक्टेयर एवं प्रति व्यक्ति उपज कम होती है। यही कारण है कि इन क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व कम है।
- भूमि की उर्वरा शक्ति समाप्त होने पर ये कृषक दूसरे स्थान पर वनों को साफ करके कृषि करते हैं।
- छोड़े हुए स्थान पर झाड़ियाँ, घास तथा अन्य वनस्पतियाँ उग जाती हैं तथा 10-15 वर्षों बाद फिर उसी क्षेत्र को साफ कर फसल उगाते हैं, ऐसी कृषि को बुश फैलो कृषि/झाड़ी पड़त कृषि कहते हैं।
आलोचना
- पर्यावरण नुकसान- पर्यावरण अपक्षय
- उर्वरता शक्ति का नाश- मृदा अपरदन
- स्थानान्तरित कृषि की वहन- शक्ति/वहन-क्षमता/निर्वहन क्षमता कम है अर्थात् इस प्रणाली में प्रति हेक्टेयर एवं प्रति व्यक्ति उपज बढ़ाई जाने की आवश्यकता को पूरा नहीं किया जा सकता।
- उपनाम- कर्तन व दहन प्रणाली/ पैड़ा पद्धति
विश्व में झूमिंग कृषि/स्थानांतरित कृषि को अनेक नामों से पुकारा जाता है-
- मलेशिया में- लदांग
- फिलीपींस में- कैंगिन
- म्यांमार में- टोग्या
- इंडोनेशिया में- लदांग
- श्रीलंका में- चेना
- मेडागास्कर में- तावी
- ब्राजील में- रोका
भारत में भी झूमिंग कृषि/स्थानान्तरित कृषि को अनेक नामों से पुकारा जाता है-
- उत्तर पूर्वी राज्यों में (असम)- झूम/झूमिंग - ‘बोडो’ जनजाति करती है।
- मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़- देप्पा, डहिया, वेबर। - ‘गोण्ड’ जनजाति द्वारा।
- ओडिशा में- विंगा, पामाडाबी/कोमान
- केरल में- पोनम
- राजस्थान में- वालरा
- आंध्र प्रदेश/तेलंगाना में- पेंडा/पोडू
- मेघालय में- बोगमा
- पश्चिमी घाट (केरल) में- कुमारी
- झारखंड में- कुरुवा
- हिमालय क्षेत्र में- खिल
- मणिपुर में- पामलू
- छत्तीसगढ़ का बस्तर जिला- दीपा
- अंडमान निकोबार द्वीप समूह में- दीपा
2. स्थानबद्ध कृषि
अपने आर्थिक विकास के इतिहास के एक लंबे काल तक मनुष्य घुमक्कड़ रहा है।
संग्रहणकर्ता, आखेटक, प्रवासी पशु चारण करने वाले या स्थानान्तरित कृषक के रूप में वह एक स्थान से दूसरे स्थान तक घूमता रहता था तथा अन्ततोगत्वा जब उसने कृषि करना सीखा तो उसे स्थानबद्ध कृषि कहते हैं।
विशेषताएँ
- एक परिवार या सामूहिक परिवार निश्चित स्थान पर कृषि करते हैं।
- भूमि पर स्वामित्व सामूहिक परन्तु अधिकतर वैयक्तिक होता है।
- कृषक भू-संरक्षण पद्धतियाँ अपनाता है।
- फसल चक्र को अपनाते हैं ताकि मिट्टी की उर्वरता बनी रहे।
- कृषि कार्यों में सहायता के लिए तथा अपनी आय बढ़ाने के लिए पशु पालते हैं।
- कृषि कार्यों में विकास के लिए औजारों का प्रयोग करते हैं।
- कृषि कार्यों के मध्य अवकाश के समय वे अपनी आय बढ़ाने के लिए अन्य काम जैसे टोकरी बनाना, रस्सी बनाने का कार्य करते हैं।
- भारत के कुछ भागों को छोड़कर स्थानबद्ध कृषि की जाती है।
- स्थानबद्ध कृषि ने किसानों के सांस्कृतिक जीवन पर प्रभाव डाला है।
- ग्राम देवता/ग्राम देवी की कल्पना स्थानबद्धता की ही देन है।
3. गहन
कृषि जोत- वह कृषि जमीन जो किसानों द्वारा खेती के लिए उपयोग की जाती है अर्थात् किसान के पास उपलब्ध कृषि योग्य भूमि।
जहाँ भूमि संसाधन कम तथा जनसंख्या अधिक हो।
छोटी जोतों पर भूमि की प्रति इकाई पर अधिक पूँजी तथा श्रम लगाकर प्रति हेक्टेयर अधिक उपज प्राप्त करने हेतु की जाने वाली कृषि गहन कृषि है।
इस कृषि में मुख्य रूप से चावल बोया जाता है।
किसी क्षेत्र में खाद्यान्नों का अधिक उत्पादन 3 तरीकों से प्राप्त किया जा सकता है-
(a) कृषि क्षेत्र को बढ़ाना है लेकिन अधिक जनसंख्या घनत्व के देशों में प्रति व्यक्ति भूमि (भूमि एवं मनुष्य का अनुपात) बहुत कम होती है। इस प्रकार भूमि की उपलब्धि न होने से कृषि क्षेत्र में विस्तार असंभव होता है।
(b) कृषि गहनता है।
- इसमें किसान छोटी जोत पर काम करता है।
- अच्छे बीजों का प्रयोग करता है।
- अधिक कम्पोस्ट तथा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करके मृदा की उर्वरता को बनाए रखता है।
- सिंचाई का प्रबंध करता है।
- पौधों के संरक्षण के उपाय के लिए कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करता है।
Note- इस प्रकार प्रति हेक्टेयर पूँजी निवेश तो बढ़ जाता है परन्तु प्रति एकड़ उपज भी बढ़ जाती है।
(c) कम मूल्य की फसलों को अधिक मूल्य की फसलों से स्थानापन्न करता है।
- इससे किसान व्यापार द्वारा अधिक धन कमा लेता है।
- गहन कृषि के क्षेत्र वे है जिनमें जनसंख्या का घनत्व अधिक है तथा कृषि योग्य भूमि पर दबाव अधिक है।
4. विस्तृत कृषि
- यह बड़ी जोतों पर कृषि यंत्रों की सहायता से बड़े पैमाने पर की जाने वाली कृषि है।
- यह कृषि उन क्षेत्रों में अपनाई जाती है जहाँ भूमि संसाधन अधिक एवं जनसंख्या घनत्व कम होता है।
- कम तथा महँगा श्रम उपलब्ध होने के कारण कृषि योग्य कार्यों में बड़े पैमाने पर मशीनों का प्रयोग होता है।
Note- प्रति हेक्टेयर उपज अपेक्षाकृत कम होती है परन्तु कुल उत्पादन अधिक होता है जिसका कारण कृषि भूमि का क्षेत्रफल बड़ा होना है।
- कम संख्या में श्रम लगाए जाने के कारण प्रति व्यक्ति उत्पादन अधिक होता है।
- इस कृषि का उद्भव 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में हुआ है।
- यह विकसित देशों के द्वारा की जाती है।
- इन देशों ने इस कृषि को अपने आन्तरिक भागों में पाए जाने वाले घास के मैदानों से प्रारंभ किया।
- इनके अधिकांश भागों में महाद्वीपीय जलवायु पाई जाती है।
- कृषि कार्य पूर्ण रूप से यंत्रों से किए जातें हैं।
- मुख्य अनाज- गेहूँ
5. गहन जीविकोपार्जी कृषि/जीविका खेती
- उद्देश्य- ऐसी फसल उगाना है जिससे कृषक के परिवार का भरण-पोषण संभव हो सके।
- इसमें फसलों का विशिष्टीकरण नहीं हो सकता क्योंकि कृषक वे सारी फसलें उगाना चाहते हैं जो उनके उपयोग के लिए आवश्यक है।
- इस कृषि के प्रतिमान में धान्य, दलहन, तिलहन का समावेश होता है।
संसार में जीविकोपार्जी कृषि के 2 रूप पाए जाते हैं-
(i) पहला आदिम जीविकोपार्जी कृषि है जो स्थानान्तरित कृषि का पर्याय है।
(ii) दूसरा गहन जीविकोपार्जी कृषि है जो पूर्वी एवं एशिया के मानसूनी भागों में पाई जाती है। इन देशों की जनसंख्या का घनत्व अधिक है अतः उपलब्ध भूमि का गहनतम् उपयोग करने की चेष्टा की जाती है। इसमें धान की फसल का महत्त्व अधिक है।
(ii) दूसरा गहन जीविकोपार्जी कृषि है जो पूर्वी एवं एशिया के मानसूनी भागों में पाई जाती है। इन देशों की जनसंख्या का घनत्व अधिक है अतः उपलब्ध भूमि का गहनतम् उपयोग करने की चेष्टा की जाती है। इसमें धान की फसल का महत्त्व अधिक है।
- इसमें कार्य हाथ के द्वारा किया जाता है।
- श्रम की अधिक माँग इस क्षेत्र की उच्च जनसंख्या के घनत्व का एक कारण है।
- छोटी जोतों के अतिरिक्त छोटे-छोटे खेत इस क्षेत्र की विशेषता है।
- एक ही वर्ष में धान की कई फसलें उगाई जाती है।
- गहन कृषि करने से उर्वरता (मिट्टी) कम हो जाती है तथा कृषक भरपूर प्रयत्न करते हैं कि उर्वरता नष्ट न हो। अतः हरी खाद, गोबर, कम्पोस्ट एवं रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करते हैं।
- जापान में प्रति हेक्टेयर रासायनिक उर्वरक सबसे अधिक डाले जाते हैं।
6. वाणिज्यिक कृषि
- उद्देश्य- उत्पादों को बाजार में बेचने के लिए पैदा करना है।
- इसके उत्पादन में फसल विशिष्टीकरण मुख्य विशेषता है।
संसार में यह कृषि 2 रूपों में पाई जाती है जैसे :-
मध्य अक्षांशों में वाणिज्यिक अन्न कृषि एवं उष्ण-कटिबंधों में रोपण कृषि।
1. वाणिज्यिक अन्न कृषि
वाणिज्यिक स्तर पर मध्य-अक्षांशों के अधिकांश क्षेत्रों में गेहूं उत्पादन में विशिष्टता लाई गई है।
इस कृषि में अधिकांश कार्य मशीनों द्वारा किया जा रहा है।
U.S.A. में इस प्रकार की खेती करने के लिए कृषक बाहर से आते हैं जिनको साइडवाक तथा सूटकेस कृषक कहते हैं।
भारत में वाणिज्यिक कृषि का विकास अधिक नहीं हुआ है।
2. रोपण कृषि
इसका विकास उपनिवेश काल में यूरोपीय देशों द्वारा किया गया।
यह संगठित एवं व्यवस्थित कृषि है जिसकी तुलना विनिर्माण उद्योग से की जा सकती है।
विशेषताएँ-
(a) उष्ण-कटिबंधीय क्षेत्रों के विरल जनसंख्या के घनत्व के भू-भागों पर बहुत बड़े क्षेत्र पर की जाने वाली कृषि है।
(b) इसका मुख्य उद्देश्य व्यापार करना है।
(c) प्रारंभ में उपनिवेशी देशों ने पूँजी निवेश करके बंधुआ मजदूरों के श्रम से कृषि कार्य शुरू किया।
(d) फसल विशिष्टीकरण इसका मुख्य ध्येय था ताकि एक फसल का बड़े पैमाने पर उत्पादन करके व्यापार किया जा सके।
(e) इस कृषि में श्रम एवं पूँजी अधिक लगती है तथा इसमें अधिकांश प्रक्रमण बागानों पर ही किए जाते हैं।
(f) संसार के अधिकांश रोपण कृषि क्षेत्र उष्ण-कटिबंधीय क्षेत्र के तटीय भागों, नौकागम्य नदियों के किनारे अथवा रेल एवं सड़क मार्गों के निकट स्थित है।
(g) इसमें अधिकांश प्रक्रमण बागानों पर ही किए जाते हैं।
विभिन्न देशों में बागानों का आकार भिन्न-भिन्न है-
जैसे- भारत में असम की पहाड़ियाँ, दार्जिलिंग तथा श्रीलंका के चाय के बागान, मलेशिया के रबर के बागान, ब्राजील में कॉफी के बागान इत्यादि।
7. मिश्रित कृषि
- इसमें फसल उत्पादन के साथ-साथ पशुपालन पर भी उतना ही बल दिया जाता है।
- इस कृषि में खाद्यान्न के साथ-साथ चारे की तथा नगदी फसलें भी उसी पैमाने पर उगाई जाती है।
- सोवियत संघ (लेनिनग्राड, ओडेसा, इर्कुत्स्क को मिला कर बनने वाला त्रिभुज) में प्रचलित है।
- फसलें- सोयाबीन, गेहूं, आलू, चुकन्दर, सूरजमुखी, राई।
8. डेयरी कृषि
दुग्ध उत्पादों की नगरीय माँग की आपूर्ति हेतु दुधारू पशुओं विशेषतः गायों के पालन को डेयरी फॉर्मिंग की संज्ञा दी जाती है।
डेयरी विकास में श्रम की अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि गायों की देखरेख मशीनें नहीं कर सकती है।
इस उद्योग में श्रम की भाँति पूँजी भी अधिक लगती है।
राष्ट्रीय चारा शोध संस्थान- झाँसी
राष्ट्रीय डेयरी शोध संस्थान- करनाल
9. ट्रक कृषि
व्यापार के उद्देश्य से साग-सब्जी की खेती ट्रक कृषि है।
इसका नगरीकरण से घनिष्ठ संबंध है।
इसमें गहन कृषि पद्धति भी अपनाई जाती है।
छोटी जोतों में सिंचाई के साधनों, खाद एवं उन्नत बीजों का प्रयोग करके यह कृषि की जाती है।
प्रति हेक्टेयर उपज को बढ़ाने का हर संभव प्रयत्न किया जाता है।
बाजार में माँग की आपूर्ति के लिए रिले फार्मिंग भी की जाती है।
10. उद्यान कृषि
इस कृषि के मुख्य उत्पाद फल एवं फूल है।
कृषक अपने उपभोग के अतिरिक्त व्यापार के लिए करते हैं।
फलों की कृषि के विकास का आधार परिवहन के साधनों का विकास है।
(ii) वैज्ञानिक प्रकार
कृषि के वैज्ञानिक प्रकार निम्न हैं-
- सेरीकल्चर- रेशम कीट पालन
- एपीकल्चर- मधुमक्खी पालन
- विटीकल्चर- अंगूर की खेती
- फ्लोरीकल्चर- फूलों की खेती
- वर्मीकल्चर- केंचुआ पालन
- ओलेरीकल्चर- सब्जियों/फलों की कृषि
- पिसीकल्चर- मछली पालन
- हॉर्टिकल्चर- उद्यान निर्माण
- सिल्वीकल्चर- वनों का विकास और प्रबंधन
- अरबोरिकल्चर- झाड़ियों और वृक्षों का उत्पादन
- मेरीकल्चर- भोजन हेतु मछलियों, समुद्री जीवों का पालन
कृषि एक प्राथमिक व्यवसाय के अन्तर्गत आती है। इसका उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 में है, जिसमें कृषि तथा पशुपालन का उल्लेख किया गया है।
इस कृषि गणना के अनुसार जोत के प्रकार निम्न हैं-
जोत का अर्थ है कृषि योग्य भूमि में वृद्धि होना।
II. जोत के प्रकार
- कुल जोतों की संख्या- 76.55 लाख
- भूमि जोतों की संख्या में 11.14 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
इसका वर्गीकरण निम्न प्रकार से है:-
1. सीमान्त आकार - 1 हेक्टेयर से कम
कुल जोत में योगदान - 40.12 प्रतिशत
2. लघु आकार - 1-2 हेक्टेयर तक
कुल जोत में योगदान - 21.9 प्रतिशत
3. अर्द्धमध्यम आकार - 2-4 हेक्टेयर तक
कुल जोत में योगदान - 18.5 प्रतिशत
4. मध्यम आकार - 4-10 हेक्टेयर तक
कुल जोत में योगदान - 14.7 प्रतिशत
5. बड़ा आकार - 10 हेक्टेयर एंव इससे अधिक
कुल जोत में योगदान - 4.6 प्रतिशत
| क्षेत्रफल | संख्या | |
|---|---|---|
| 1. सीमान्त | + 19.79 प्रतिशत | + 22.30 प्रतिशत |
| 2. लघु आकार | + 10.5 प्रतिशत | + 11.10 प्रतिशत |
| 3. अर्द्धमध्यम | + 5.6 प्रतिशत | + 6.07 प्रतिशत |
| 4. मध्यम आकार | - 0.2 प्रतिशत | + 0.4 प्रतिशत |
| 5. बड़ा आकार | - 13.20 प्रतिशत | - 11.14 प्रतिशत |
नोट - उपरोक्त आंकड़ों के अनुसार 10वीं कृषि गणना के अनुसार सीमान्त, लघु, अर्द्धमध्यम के क्षेत्रफल में वृद्धि जबकि मध्यम एवं बड़े आकार के जोत के क्षेत्रफल में कमी दर्ज की गई है।
- इस कृषि गणना के अनुसार सीमान्त, लघु, अर्द्धमध्यम एवं मध्यम जोत की संख्या में वृद्धि जबकि बड़े आकार के जोत की संख्या में कमी।
महिला प्रचालक जोतधारक
राज्य में वर्ष 2010-11 में महिला भूमि जोतों के कुल क्षेत्रफल में 24.44 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
महिला जोतों की संख्या- 7.75 लाख
महिला भूमि जोतों की संख्या में 41.94% की वृद्धि हुई है।
जोत का आकार छोटा होने का निम्न कारण हैं-
- जनसंख्या वृद्धि
- उत्तराधिकारी का नियम
- संयुक्त परिवार प्रणाली का पतन
- भूमि के साथ लगाव
- ग्रामीण ऋण और देशी साहूकार
- हस्तशिल्प तथा ग्रामोद्योग जैसे उद्योगों का समाप्त होना।
भू-उपयोग
भू-उपयोग सांख्यिकी 2023-24
III. जैव उर्वरक
इसका वर्गीकरण निम्न प्रकार से है-
1. एजोटोबैक्टर
ये उर्वरक मृदा तथा पौधों की जड़ों में रहते हैं इसके द्वारा ऑक्सीजन के साथ क्रिया करके उत्पन्न नाइट्रोजन को अमोनिया में बदल कर पौधों को लाभ पहुँचाते है।
2. माइकोराइजा
ये एक प्रकार की फफूँद है जो पौधों की जड़ों पर जालीनुमा संरचना का निर्माण करती है तथा ये मृदा में अधिक गहराई तक पाया जाता है। यह गहराई में पहुँच कर मिट्टी की नमी तथा पोषक तत्त्वों को ऊपर लाने का कार्य करता है। पौधों के वृद्धि की लिए यह एक घुलनशील भूमिका निभाता है।
3. फ्रैंकिया
दलहनी फसलों के अलावा ऐसे पेड़-पौधे जिनकी जड़ों में गांठों का निर्माण होता है यह निर्माण फ्रैंकिया द्वारा होता है।
सामान्यतः यह उर्वरक वनों में पाए जाने वाले पेड़-पौधों में होता है। जो कृषि फसलों के लिए लाभदायक है।
4. साइनोबैक्टीरिया
यह जलीय तथा स्थलीय वायुमण्डल में पाए जाने वाला उर्वरक है जो स्वपोषित सूक्ष्म जीव हैं। ये वायुमण्डल में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं।
यह धान के खेत में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जैसे - नॉस्टोक, ऐनाबीना, ऑसिलेटोरिया आदि।
5. एजोस्पाइरिलम
ये जीवाणु विविधपोषी के अन्तर्गत आता है जो वायुमण्डल में नाइट्रोजन को अमोनिया में बदल देते हैं। इनका उपयोग सूरजमुखी तथा बाजरे की कृषि के लिये किया जाता है।
इनके द्वारा नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ा दी जाती है।
6. राइजोबियम
यह दलहनी फसलों के अन्तर्गत पाए जाते है इसके द्वारा दलहनी फसलों से उत्पन नाइट्रोजन मृदा में स्थिरीकृत होकर अगली फसल में लाभ पहुँचाने का कार्य किया जाता है।
7. फास्फोबैक्टरीन
यह फास्फोरस को घुलनशील बनाता है जो पौधों के लिए लाभदायक है।
कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने के उपाय-
- भूमि एवं जल का उचित प्रबंधन
- उन्नत बीजों का उपयोग
- अच्छे उर्वरकों का उपयोग
- सिंचाई के साधनों का प्रयोग
- साख एवं विपणन की सुविधा
राष्ट्रीय बीज नीति
- 18 जून 2002 को जारी की गई।
- कृषि आय बीमा योजना की शुरूआत 2003-04 में की गई।
- राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना भारत सरकार के द्वारा 1993 में शुरू की गई। लेकिन राजस्थान में इसकी शुरूआत 2003 में हुई।
- विशेष खाद्यान्न उत्पादन कार्यक्रम की शुरूआत 1988-89 में की गई।
IV. फसलों का वर्गीकरण
इसका वर्गीकरण निम्न प्रकार से है-
- A. कुल परिवार के आधार पर
- B. जीवन चक्र के आधार पर
- C. उपयोगिता के आधार पर
- D. रेशे प्रदान करने के आधार पर
- E. ऋतुओं के आधार पर
इसके अन्तर्गत फसलों की कुल या परिवार, जीवन चक्र, ऋतु परिवर्तन, आर्थिक दृष्टि के आधार पर किया जाता है।
A. कुल/परिवार के आधार पर वर्गीकरण
| फसल | कुल/परिवार |
|---|---|
| टमाटर, आलू, मिर्च, बैंगन, तम्बाकू | सोलेनेसी |
| मूँग, उड़द, सोयाबीन, मूँगफली, मटर, मसूर, चना | लैग्युमिनेसी |
| गेहूँ, जौ, मक्का, बाजरा, ज्वार, गन्ना | ग्रेमिनी |
| सरसों, राई, तारामीरा | क्रूसीफेरी |
| खरबूजा, तरबूज, ककडी, खीरा | कुकुरबिटेसी |
| सूरजमुखी | कम्पोजिटी |
| आलू, पटसन/जूट, भिण्डी, कपास | मालवेसी |
B. जीवन चक्र के आधार पर फसलों का वर्गीकरण
- एकवर्षीय फसलें- इसके अन्तर्गत ऐसी फसलें आती है। जो अपना जीवन चक्र एक वर्ष के भीतर पूर्ण कर लेती है। जैसे - गेहूँ, जौ, बाजरा, मक्का, ज्वार, उड़द, मूंग, चना, सोयाबीन, आलू, ढैंचा, धान, शक्करकंद, कद्दू, लौकी इत्यादि।
- द्विवर्षीय फसलें - इसके अन्तर्गत ऐसी फसलें आती है जो दो वर्ष के भीतर अपना जीवन चक्र पूर्ण करती है। जैसे- प्याज, चुकन्दर। ये फसलें प्रथम वर्ष में फसल वृद्धि कर पाती है तथा दूसरे वर्ष के अन्तर्गत बीज का उत्पादन करती है।
- बहुवर्षीय फसलें - इसके अन्तर्गत वे फसलें आती है जो कई वर्षों तक चलती है जैसे - रिजका, नेपियर घास, फल वाली फसलें।
C. उपयोगिता या आर्थिक आधार पर फसलों का वर्गीकरण
- अनाज फसलें- गेहूँ, जौ, बाजरा, मक्का, ज्वार, चना, धान इत्यादि।
- तिलहनी फसलें- सरसों, राई, तारामीरा, अरण्डी, तिल, मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी, तोरिया इत्यादि।
- दलहनी फसलें- चना, उड़द, मूँग, मटर, अरहर, सोयाबीन, मूँगफली, मोठ, चवला।
- मसाला फसलें- अदरक, धनिया, प्याज, लहसून, मिर्च, अजवाइन, जीरा, सौंफ, हल्दी, कालीमिर्च, इलायची, तेज पत्ता इत्यादि।
- रेशेदार फसलें- कपास, जूट, ढैंचा इत्यादि।
- चारे वाली फसलें- नेपियर घास, लोबिया, ज्वार, बरसीम, रिजका इत्यादि।
- जड़ एवं कंद वाली फसलें- आलू, गाजर, शक्करकंद, अदरक, मूली, अरबी, शलजम, रतालू, टैपीयोका, चुकन्दर इत्यादि।
- फलदार फसलें- अमरूद, आम, नींबू, केले, पपीता, सेब, नाशपती इत्यादि।
- उद्दीपक फसलें- चाय, कॉफी, तम्बाकू, धतुरा, पोस्त, भांग इत्यादि।
- औषधीय फसलें- पुदीना, अदरक, तुलसी, हल्दी इत्यादि।
- शर्करा फसलें- चुकन्दर तथा गन्ना।
उपयोग के आधार पर फसलों का वर्गीकरण निम्न प्रकार है-
1. कवर क्रॉप्स (Cover Crops)
इसके अन्तर्गत ऐसी फसलें आती है जो भूमि को ढककर रखती है। इस प्रकार की फसलें मिट्टी की गुणवत्ता, मिट्टी की उर्वरता, मिट्टी के कटाव, खरपतवार, कीटों, बीमारियों, वन्य जीवन तथा जैव विविधता को प्रबंधित करती है।
इस प्रकार की फसलों की वानस्पतिक वृद्धि अत्यधिक वृद्धि के साथ होती है। इस प्रकार की फसलों की जड़ें जालीनुमा होती हैं इसके कारण मृदा का कटाव या अपरदन कम होता है। जैसे- मूँगफली, उड़द, शक्करकंद, लौबिया इत्यादि।
2. नकदी फसलें (Cash Crops)
ऐसी फसलें जिनके विपणन पर तुरंत मुद्रा प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार की फसलों को व्यावसायिक फसलें/वाणिज्यिक फसलें कहते है। जैसे- कपास, पटसन, गन्ना, चाय, कॉफी, रबर, तम्बाकू, इत्यादि।
3. बॉर्डर या बैरियर क्रॉप्स (Border/Barrier Crops)
इसके अन्तर्गत ऐसी फसलें आती है जो खेत के चारों तरफ उगाई जाती है ताकि आवारा पशुओं से खेत की फसलों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
ऐसी फसलें हवा की गति भी कम करती है यह मुख्यतः कांटेदार होती है जैसे- कुसुम फसलें।
4. ट्रेप फसलें (Trap Crops)
इसके अन्तर्गत ऐसी फसलें आती हैं जो मृदाजनित हानिकारक जीवों से सुरक्षा कर सकती है। जैसे- खरपतवार, परजीवी या कीट।
स्ट्राइका को सोर्घम द्वारा तथा कॉटन रेड बग को कपास के चारों ओर भिण्डी उगाकर नियंत्रित किया जा सकता है।
5. आपातकालीन फसलें (Emergency Crops)
इसके अन्तर्गत ऐसी फसलें आती है जो प्राकृतिक आपदा आने पर जब फसलें खराब हो जाती है तथा इनमें वे फसलें उगाई जाती है जो अगली ऋतु में उगाई जाने वाली फसल की सुरक्षा के लिए।
ऐसी फसलें अत्यधिक तेजी से वृद्धि करती है जिन्हें सरलतापूर्वक काटकर किसी भी समय उपयोग में लाया जा सकता है। जैसे- मूँग, उड़द, प्याज, मूली, लौबिया इत्यादि।
6. ऊर्जा फसलें (Energy Crops)
इसके अन्तर्गत ऐसी फसलें आती है जिनसे ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है जैसे - गन्ना, मक्का, आलू, जैट्रोफा इत्यादि।
D. रेशे प्रदान करने वाली फसलों की सामान्य जानकारी
1. कपास (गॉसीपियम स्पीशीज)
इसमें बीज के ऊपर रेशे स्थित होते हैं।
2. पटसन (कोरकोरस स्पीशीज)
राष्ट्रीय पटसन नीति 2005 को जारी की गई जिसका उद्देश्य पटसन/जूट को बढ़ावा देना। इसको गोल्डन फाइबर के नाम से भी जाना जाता है।
अन्तर्राष्ट्रीय जूट निगम की स्थापना 1984 में ढाका (बांग्लादेश) में की गई। जबकि भारतीय जूट निगम की स्थापना 1971 में कोलकाता में की गई। भारत में इसका सर्वाधिक उत्पादन पश्चिम बंगाल करता है।
इसके तने में द्वितीयक पोषवाह में उपस्थित बास्ट रेशे के द्वारा किया जाता है।
3. नारियल (कोकोस न्यूसीफेरा)
यह एक प्रकार की रेशेदार मध्य फल भित्ति है।
E. ऋतुओं के आधार पर फसल का वर्गीकरण
1. खरीफ की फसल
उपनाम - स्यालु
जून-जुलाई में बोई जाती है तथा अक्टूबर-नवंबर में काट ली जाती है।
मानसून- दक्षिण पश्चिम मानसून
उदाहरण- धान, गन्ना, तिलहन, ज्वार, बाजरा, मक्का, अरहर, लोबिया, मंडुआ, उड़द, सोयाबीन, जूट, मोठ, मूंग आदि।
2. रबी की फसल
उपनाम - उनालू
मानसून - अक्टूबर-नवंबर में बोई जाती है तथा फरवरी-मार्च में काट ली जाती है
रबी की फसलों के उत्पादन में शीतकालीन पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली वर्षा सहायक होती है।
उदाहरण - गेहूँ, जौ, मटर, चना, सरसों, आलू, मसूर, अलसी, राई, तारामीरा, ईसबगोल, तंबाकू, लहसुन, चुकंदर, मैथी, अफीम आदि।
3. जायद की फसल
मार्च में बोई जाती है तथा जून तक काट ली जाती है
उदाहरण - खीरा, ककड़ी, तरबूजा, खरबूज, करेला, कद्दू आदि।
A. खरीफ की फसलें
राज्य में खरीफ की फसलें सामान्यतया 150 से 165 लाख हैक्टर क्षेत्र में बोई जाती हैं। इनमें से 60 से 65 प्रतिशत खाद्यान्न, 10 से 15 प्रतिशत तिलहन, 4 प्रतिशत कपास एवं गन्ना तथा शेष 20 से 25 प्रतिशत क्षेत्र में अन्य फसलें बोई जाती हैं। खरीफ में मुख्यतः ज्वार, बाजरा, मक्का, मोठ, मूँग, उड़द, चौला, तिल, मूँगफली, सोयाबीन, कपास एवं ग्वार की खेती की जाती है।
राज्य में खरीफ के अन्तर्गत 80 से 90 प्रतिशत क्षेत्र में बारानी फसलें बोई जाती हैं, जो पूर्णतः वर्षा पर निर्भर हैं। यदि राज्य में मानसून का आगमन समय पर एवं सामान्य होता है, तो अच्छी पैदावार प्राप्त होती है। फिर भी विभागीय प्रयासों, उन्नत किस्म के बीजों, उर्वरकों के उपयोग, पौध संरक्षण उपायों एवं कृषि की नवीन तकनीकी के उपयोग से राज्य में उत्पादन में निरन्तर वृद्धि हो रही है।
1. बाजरा (पेनिसेटम टाइफोइडी)
- औसत वर्षा - 20 से 40 सेमी.
- मिट्टी - बलुई
- सर्वाधिक उत्पादन - (1) बाड़मेर (2) जयपुर
- सर्वाधिक उत्पादकता - (1) अलवर (2) धौलपुर
- सर्वाधिक क्षेत्रफल - (1) बाड़मेर (2) जोधपुर
- किस्में - I.C.T.P, W.C.C-75, RHB-30, RHB-58, RCB-911, MH-179 बाजरा चरी 2, SAR 448 , राजस्थान- 171
विशेषताएँ-
- कटी हुई बाजरे की फसल को 'कड़वी' या कडपी कहते हैं।
- पकते समय यदि वर्षा हो जाती है तो बाजरे में 'कण्डुआ' रोग हो जाता है।
- महावीर जी का शंकर बाजरा करौली में सिंचाई करके उत्पादित किया जाता है।
- रोग - जोगिया, ग्रीन ईयर, सूखा रोग
- इसकी उत्पत्ति अफ्रीका से मानी जाती है।
- राज्य में बाजरा अनुसंधान केंद्र- 1. बाड़मेर, 2. मंडोर (जोधपुर)
- बाड़मेर के सर्वाधिक क्षेत्रफल पर बाजरा बोया जाता है।
- बाजरे का बोया गया क्षेत्र पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ता है, जबकि उत्पादन पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ता है।
- बाड़मेर के कुल क्षेत्रफल के 69.4 प्रतिशत भाग पर बाजरा बोया जाता है।
- बाजरे की फसल में गोंद (अरकट) लगने से यह जहरीला हो जाता है, जो गर्भपात, उल्टी, दस्त का कारण बनता है।
नोट- अरकट एक जहरीली फफूँद है, जो स्वाद में मीठी होती है, इस फफूँद से प्रसव के लिए दवा और इंजेक्शन बनाए जाते हैं।
बाजरे को 5F फसल भी कहते हैं।
- F - food (खाद्यान्न)
- F - fertilizer (उर्वरक)
- F - Fodder (चारा)
- F - fiber (रेशा)- आहार फाइबर
- F - fuel (ईंधन)
- औसत तापमान - 25° से 35° सेंटीग्रेड
- गरीब का भोजन- बाजरा
- बाजरा एवं ज्वार अनुसंधान परियोजना निदेशालय- हैदराबाद (AP)
- बाजरे का स्लेटी रंग (ग्रे रंग)- फाइटिन के कारण होता है।
नोट- बाजरे में 80% फाइटिन पाया जाता है जो फास्फोरस का रूप है।
- बाजरे का वैज्ञानिक नाम- पेनिसेटम ग्लूकम (नया नाम), पेनिसेटम अमेरिकेनम (पुराना), पेनिसेटम ट्राइफोडियस (अफ्रीका) है।
- बाजरे का उत्पत्ति स्थान- अफ्रीका
नोट- सभी कम पानी चाहने वाली फसलों का उत्पत्ति स्थान- अफ्रीका
- बाजरे में प्रोटीन- 12% (अनाजों में सर्वाधिक)
- बाजरे में वसा- 5% (अनाजों में सर्वाधिक)
- बाजरे के जनक- डॉ. D.S. अटवाल
2. मक्का (जिया मेज/माइस)
- औसत वर्षा-50 से 80 सेंटीमीटर
- मिट्टी-लाल-लोमी
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) भीलवाड़ा (2) चित्तौड़गढ़
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) बूंदी (2) चित्तौड़गढ़
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) भीलवाड़ा (2) उदयपुर
- सर्वाधिक सिंचित- (1) अजमेर (2) भीलवाड़ा
- मक्का की किस्में- सविता, गंगा-11, गंगा- 5, नवजोत, विजय किरण, सूर्य प्रभात, सूर्य किरण, माही धवल, माही कंचन इत्यादि।
विशेषताएँ-
- इसको अनाजों की रानी कहते हैं।
- यह मूलतः अमेरिकी मूल का पौधा है।
- इसके चारे को 'साइलेज' कहते हैं, जिसको पकने में 110 दिन का समय लगता है।
- भारत में सर्वाधिक मक्का उत्पादन महाराष्ट्र में होता है।
- राज्य में मक्का अनुसंधान केंद्र बोखर गाँव (बाँसवाड़ा) में है। इस अनुसंधान केन्द्र के द्वारा मक्के की नयी किस्म 'W-126' विकसित की गई है।
- 'माही कंचन' मक्का की प्रसिद्ध किस्म है जो बाँसवाड़ा में सर्वाधिक होती है।
- मक्का अनुसंधान परियोजना निदेशालय- लुधियाना (पंजाब) 2017 में स्थानान्तरण, नई दिल्ली से
- भारत में सर्वाधिक उत्पादन- कर्नाटक
- मक्का का पीला रंग- क्रिप्टोजैन्थीन के कारण
- मक्का में तेल - 4%
- मक्का का उत्पत्ति स्थान- मैक्सिको (उष्ण अमेरिका)
- मक्का में प्रोटीन - 10%
- मक्का में पाई जाने वाली प्रोटीन - जीन
3. गन्ना (सैकेरम ऑफिसिनेरम)
- वर्षा- 125 से 175 सेंटीमीटर
- मृदा- काली दोमट मृदा
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) श्रीगंगानगर (2) चित्तौड़गढ़
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) करौली (2) जयपुर
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) श्रीगंगानगर (2) चित्तौड़गढ़
- सर्वाधिक सिंचित- (1) श्रीगंगानगर (2) चित्तौड़गढ़
- किस्में- बाहुबली, चारचिका
विशेषताएँ-
- यह भारतीय मूल का पौधा है।
- विश्व में सर्वाधिक उत्पादन ब्राजील में होता है।
- भारत में सर्वाधिक उत्पादन उत्तर प्रदेश में होता है जो कुल उत्पादन का लगभग 50 प्रतिशत होता है।
- रोग- जड़ छेदन, तना छेदन, सफेद मक्खी, रेड रॉट
- भारत में गन्ना अनुसंधान केंद्र कोयंबटूर (तमिलनाडु) में 1912 में स्थापित किया गया।
- तापमान- 21 - 27⁰ सेंटीग्रेड
- राष्ट्रीय गन्ना अनुसंधान संस्थान- लखनऊ
- गन्ना प्रजनन संस्थान- कोयम्बटूर (1912)
- गन्ने के जनक- T.S. वेकेंटरमन (Sugarcance Wizzard)
- पुष्पन समय- फरवरी
- पुष्पन गन्ने की परिपक्वता का सूचक है।
4. मूँगफली (अरेकिस हाइपोजिया)
- वर्षा - 50 से 80 सेमी.
- मिट्टी- लाल- पीली
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) बीकानेर (2) जोधपुर
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) बीकानेर (2) सिरोही
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) बीकानेर (2) जोधपुर
- सर्वाधिक सिंचित- (1) बीकानेर (2) जोधपुर
- किस्में- चन्द्रा, कौशल, R.G- 510
विशेषताएँ-
- भारत में सर्वाधिक उत्पादन- गुजरात (राजकोट)
- सर्वाधिक मूँगफली उत्पादन के कारण लूणकरणसर (बीकानेर) को राजस्थान का राजकोट कहा जाता है।
- रोग- टीका रोग, सफेद लट्ट, भृंग।
- तिलहनी फसलों का राजा
- अर्थ- नट, पी नट, मनीला नट, बिहार नट, मन्की नट
- गरीब का बादाम/काजू
- राष्ट्रीय मूँगफली अनुसंधान संस्थान- जूनागढ़ (गुजरात)
मूँगफली का उपयोग-
- तेल- 81%
- बीज- 12%
- खाने में- 6%
- निर्यात में- 1%
- मूँगफली का वैज्ञानिक नाम- अरेकिस हाइपोजिया (ग्रीक भाषा का शब्द)
- मूँगफली की उत्पत्ति- ब्राजील
- मूँगफली में प्रोटीन- 26%
- मूँगफली में तेल- 47%
नोट-भारत में रबी + खरीफ में मूँगफली का उत्पादन- तमिलनाडु
5. ज्वार (सौरघम वल्लोर)
उपनाम -सोरगम/गरीब की रोटी
- वर्षा-50-70 cm
- मिट्टी- दोमट/मध्यम काली
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) अजमेर (2) भीलवाड़ा
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) राजसमंद (2) भीलवाड़ा
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) अजमेर (2) पाली
- सर्वाधिक सिंचित- (1) श्रीगंगानगर (2) हनुमानगढ़
- किस्में- प्रताप-1430, चरी
विशेषताएँ-
- मोटे अनाजों का राजा
- केमल क्रॉप (सूखे के कारण)
- मृदा को कमजोर करने वाली फसल
- बाजरा एवं ज्वार अनुसंधान परियोजना निदेशालय- हैदराबाद
नोट- ज्वार में नर्सरी अवस्था/पौध अवस्था में प्रूसिक अम्ल HCN/ धूरिन विषैला रसायन पाया जाता है।
- ज्वार का कुल- ग्रेमिनी
- उत्पत्ति- अफ्रीका
- प्रोटीन- 10-12%
6. कपास (गॉसिपियम हर्बेसियम)
- वर्षा- 50 से 100 सेमी.
- मिट्टी- काली मिट्टी
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) श्रीगंगानगर (2) हनुमानगढ़
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) जालौर (2) बाँसवाड़ा
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) हनुमानगढ़ (2) श्रीगंगानगर
- सर्वाधिक सिंचित- (1) हनुमानगढ़ (2) श्रीगंगानगर
किस्में-
- राज्य में देशी कपास उदयपुर तथा चित्तौड़गढ़, नरमा कपास श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ तथा अमेरिकन कपास श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़ में उत्पादित होता है।
- बीकानेरी नरमा- धारवाड़ + राजस्थान (सूरतगढ़) द्वारा विकसित अगेती किस्म
- गंगानगर अगेती- जीवाणु अंगमारी (झुलसा) रोग प्रतिरोधी सूखा सहनशील
विशेषताएँ-
- भारतीय मूल का पौधा जिसका उल्लेख ऋग्वेद और सिंधु घाटी में भी मिलता है।
- उपनाम- सफेद सोना, बणिया
- भारत में सर्वाधिक उत्पादन महाराष्ट्र में होता है।
- जलवायु- उष्ण कटिबन्ध
- सर्वाधिक उत्पादन- श्रीगंगानगर तथा हनुमानगढ़ से राजस्थान का लगभग 80 प्रतिशत कपास उत्पादन होता है।
- ओटाई- कपास के बिनौले से रेशा प्राप्त करना।
- अमेरिका और मिस्र की कपास सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है।
- कपास अनुसंधान केंद्र- गंगानगर, उपकेंद्र - बाँसवाड़ा
- रात्रिकालीन वर्षा अधिक अच्छी होती है।
- इसमें सर्दी के कारण बॉलविवल रोग हो जाता है।
- भारत विश्व का पहला देश है जहाँ कपास की संकर किस्में विकसित की गईं।
King of Appraisal Fiber
- कपास में रेशा पौधे के ऊपरी भाग से प्राप्त होता है
- कपास को कहते है- सफेद सोना
- राष्ट्रीय कपास अनुसंधान संस्थान- नागपुर (महाराष्ट्र)
नोट :- कपास में 1 गांठ का वजन- 170 kg
- जूट की एक गांठ का वजन- 180 kg
- मेस्टा की एक गांठ का वजन- 181 kg
- कपास के बीजों में तेल%- 16-25% (हरे रंग का तेल)
- कपास में प्रोटीन (बीजों में) - 25%
7. चावल (ओराइजा सेटाइवा)
- वर्षा- 150 से 200 सेमी.
- मिट्टी- दोमट
- जलवायु- आर्द्र
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) बूँदी (2) हनुमानगढ़
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) हनुमानगढ़ (2) कोटा
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) बूँदी (2) हनुमानगढ़
- सर्वाधिक सिंचित- (1) बूँदी (2) हनुमानगढ़
- किस्में- इंडिका, जैपोनिका, चंबल, माही सुगन्धा, जलजीरा, रतना, जया, कामोद, जमुना, करुणा, कावेरी, हंसा, बाला, पदमा, कृष्णा, कांची, पूसा-सुगन्धा।
विशेषताएँ-
- सर्वाधिक चावल का उत्पादन- चीन, भारत
- चावल की कृषि को 'खुरपे की कृषि' भी कहते हैं
- सर्वाधिक बासमती चावल हनुमानगढ़ में उत्पादित होता है।
- भारत में सर्वाधिक उत्पादन- पश्चिम बंगाल
- प्रति हेक्टेयर सर्वाधिक उत्पादन- पंजाब
- चावल का कटोरा- छत्तीसगढ़ + आंध्र प्रदेश
- राजस्थान में चावल अनुसंधान केंद्र - बाँसवाड़ा
- रोग- खैरा।
- केंद्रीय चावल अनुसंधान केंद्र- कटक (ओडिशा)
- अंतर्राष्ट्रीय राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI) के प्रथम दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय केंद्र (ISARI) की स्थापना को 'वाराणसी' में अनुमति दी गई।
8. चवला - लोबिया
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) झुँझुनूँ (2) सीकर
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) सीकर (2) बाँसवाड़ा
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) झुँझुनूँ (2) सीकर
- सर्वाधिक सिंचित- (1) सीकर (2) झुँझुनूँ
चवला का वैज्ञानिक नाम- विग्ना साइनेसिस (खेती)
चवला में प्रोटीन- 23%
विश्व में सर्वाधिक उत्पादन- भारत
भारत में सर्वाधिक उत्पादन- उत्तर प्रदेश
9. मोठ (Moth bean)
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) बाड़मेर (2) बीकानेर
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) जैसलमेर, जोधपुर (2) श्रीगंगानगर
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) बीकानेर (2) चूरू
- सर्वाधिक सिंचित- (1) बीकानेर (2) जैसलमेर
मोठ का वैज्ञानिक नाम- विग्ना एकोनिटीफोलिया
मोठ का उत्पत्ति स्थान- भारत
मोठ में प्रोटीन- 23%
विश्व में सर्वाधिक उत्पादन- भारत (80%)
नोट- दलहनी फसलों में सबसे अधिक सूखा सहनशील- मोठ
10. उड़द (Black Gram)
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) बूंदी (2) टोंक
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) प्रतापगढ़ (2) डूंगरपुर
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) बूंदी (2) टोंक
- सर्वाधिक सिंचित- (1) टोंक (2) अजमेर
काला चना (Black Gram)
भैरू जी की दाल
उड़द का वैज्ञानिक- विग्ना मूंगो
उड़द में प्रोटीन- 24%
उड़द का वर्गीकरण-
(i) विग्ना मूंगो किस्म नाइजर- शीघ्र पकने वाली (65-70 दिन में) पत्तियाँ छोटी सर्वाधिक क्षेत्रफल में लगाई जाने वाली
(ii) विग्ना मूंगो किस्म विरीकीस- देरी से पकने वाली (70-90 दिन) पत्तियाँ चौड़ी
11. ग्वार (Cluster bean)
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) बीकानेर (2) हनुमानगढ़
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) करौली (2) राजसमंद
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) बीकानेर (2) जैसलमेर
- सर्वाधिक सिंचित- (1) श्रीगंगानगर (2) हनुमानगढ़
क्लस्टर बीन- फलियाँ गुच्छों में आने के कारण
ग्वार का वैज्ञानिक नाम- सायमोप्सीस टेट्रागोनोलोवा
नोट- ग्वार में गम की मात्रा- 28-33%
- गम का उपयोग- वस्त्र उद्योग + सौन्दर्य उत्पादन + विस्फोटक के रूप में
नोट- गर्मियों में गर्भित मादा पशु को इसका चारा नहीं खिलाते हैं। कारण- गर्भपात हो जाता है।
- विश्व में सर्वाधिक उत्पादन- भारत (80%)
- भारत में सर्वाधिक उत्पादन- राजस्थान (87.69%)
B. रबी की फसलें
राज्य में रबी की फसलों 2023-24 के बुवाई का लक्ष्य 117.15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र है। रबी मौसम में मुख्यतः गेहूं, जौ, चना, राई-सरसों, धनियाँ, जीरा एवं मैथी की बुवाई की जाती है।
खरीफ दलहनों की भाँति रबी दलहन फसलें भी मुख्य रूप से बारानी क्षेत्रों में बोई जाती हैं। चने का करीब 45-50 प्रतिशत क्षेत्र ही सिंचित है। इसलिए चने का अच्छा उत्पादन सर्दी की वर्षा (मावठ) पर निर्भर है। रबी तिलहनों में मुख्य रूप से सरसों की खेती की जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर सरसों के उत्पादन में राज्य का प्रमुख स्थान है।
1. गेहूँ (ट्रिटिकम एस्टिवम)
- वर्षा- 50 से 75 सेंटीमीटर
- मिट्टी- जलोढ़/दोमट
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) हनुमानगढ़ (2) श्रीगंगानगर
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) अलवर (2) कोटा
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) हनुमानगढ़ (2) श्रीगंगानगर
- सर्वाधिक सिंचित- (1) हनुमानगढ़ (2) श्रीगंगानगर
किस्में
कल्याण सोना, सोनालिका, राज 3077, अर्जुन, गुंटूर सोना, कोहिनूर, मेक्सिकन, लोकवान, लाल बहादुर, मालविका इत्यादि।
विशेषताएँ
- राजस्थान में 'ट्रिटिकम' किस्म सर्वाधिक बोई जाती हैं।
- भारत में सर्वाधिक उत्पादन- उत्तर प्रदेश
- सर्वाधिक प्रति हेक्टेयर उत्पादन- पंजाब
- रोग- रतवा, चंपा, रस्ट ब्लेक, रस्ट ब्राउन, करनाल बट।
- जलवायु- शीतोष्ण
नोट- ट्रिटिकम गेहूं की एक ऐसी प्रजाति है जिसे गेहूं और राई के मध्य संकर करके उत्पन्न किया गया।
- 'मैकरोनी' शुष्क प्रदेशों की असिंचित परिस्थितियों के लिए सबसे उत्तम परिस्थिति की किस्म है।
- राज्य के कुल क्षेत्रफल के 9.5 प्रतिशत भाग पर यह फसल बोई जाती है।
- यह राज्य की सर्वाधिक सिंचित एवं उत्पादित होने वाली फसल है।
- अनाजों का राजा
- Staple food of world (विश्व में सर्वाधिक खाया जाने वाला अनाज)
- गेहूँ एवं जौ परियोजना निदेशालय- करनाल (हरियाणा)
- गेहूँ के जनक- संजय राजाराम
- विश्व में सर्वाधिक क्षेत्रफल बोया गया - भारत
- भारत में सर्वाधिक क्षेत्रफल बोया गया - उत्तर प्रदेश
- भारत में सर्वाधिक उत्पादकता/hac- पंजाब
- भारत में सर्वाधिक उत्पादन- उत्तर प्रदेश
- प्रोटीन- 10-11%
- गेहूँ में पाई जाने वाली प्रोटीन- ग्लूटेन
2. जौ (होर्डियम वल्गारे)
- वर्षा- 70 से 100 सेमी.
- मिट्टी- हल्की दोमट
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) श्रीगंगानगर (2) जयपुर
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) श्रीगंगानगर (2) अलवर
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) जयपुर (2) श्रीगंगानगर
- सर्वाधिक सिंचित- (1) जयपुर (2) श्रीगंगानगर
किस्में
राजकिरण, ज्योति, मोल्वा, कंचन ज्योति
विशेषताएँ
- यह मधुमेह के रोगियों के लिए उपयोगी है।
- यह शराब बनाने में भी उपयोगी है।
- जौ का उत्पत्ति स्थान- इथोपिया और अबीसीनिया
- प्रोटीन- 11% (होर्डिन)
- जलवायु- शीतोष्ण
- जौ का प्रमुख उपयोग- लुगरी शराब बनाने में
- मधुमेह रोगियों के लिए उपयुक्त
- विश्व में सर्वाधिक उत्पादन- रूस
- भारत में सर्वाधिक उत्पादन- उत्तर प्रदेश
3. चना (साइसर एराइटिनम)
- वर्षा- 50 से 70 सेमी.
- मिट्टी- बलुई
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) अजमेर (2) जयपुर
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) बाराँ (2) कोटा
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) चूरू (2) हनुमानगढ़
- सर्वाधिक सिंचित- (1) बीकानेर (2) जैसलमेर
- किस्में- वरदान, अर्पण, अनुभव और संगम।
- 'मावठ' इसके लिए बहुत उपयोगी है।
- उपनाम- चिक पी (Chick Pea)
- दालों का राजा (King of Pulse)
- जलवायु- शुष्क
नोट- विश्व + भारत की प्रमुख दलहनी फसल- चना
विशेषताएँ
- राजस्थान की प्रमुख दलहनी फसल- मूँग
- चने का उत्पत्ति स्थान- दक्षिण-पश्चिम एशिया
- भारत में चने का सर्वाधिक उत्पादन- मध्य प्रदेश
चने का परीक्षण भार-
(i) देशी चना- 170 gm
(ii) काबुली चना- 320 gm
चने के एक पौधे पर फलियों की संख्या- 100-150 के मध्य
चने में बीज बोने की गहराई- 6-8 cm
4. तंबाकू (नकोटिना टोबैकम)
2021-22 के अनुसार-
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) जालौर (2) अलवर
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) झुँझुनूँ (2) राजसमंद
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) जालौर (2) अलवर
- सर्वाधिक सिंचित- (1) जालौर (2) अलवर
अमेरिकन पौधा 1508 ई. में पुर्तगाली भारत लाए।
इसकी खेती को सर्वप्रथम शुरू और बंद 'जहाँगीर' ने किया।
केंद्रीय तम्बाकू शोध संस्थान- राजमुंदरी (आंध्र प्रदेश)
5. अफीम (पैपेवर सोमेनीफेरम)
- इसके कच्चे फल को डोडा कहते हैं।
- उपनाम- काला सोना
- राजस्थान में सर्वाधिक उत्पादन- चित्तौड़गढ़ में
प्रमुख तिलहन फसलें निम्न हैं
1. सरसों (ब्रेसिका कैम्पेस्ट्रिस)
- वर्षा- 100 सेमी
- मिट्टी- दोमट/काली
- उत्पादन- अलवर, टोंक, भरतपुर
- किस्में- वरुणा, दुर्गामणि, पूसाकल्याणी
- जलवायु- शुष्क
विशेषताएँ
- देश में सरसों के उत्पादन में राजस्थान का प्रथम स्थान है।
- सरसों अनुसंधान केंद्र- सेवर (भरतपुर)
- सरसों मंडी- सुमेरपुर (पाली)
- तेलों का पीला रंग- केरोटीनोइड्स के कारण
नोट- सरसों प्रजाति में सबसे सूखी सहनशील फसल - तारामीरा
- सरसों का कुल- क्रूसीफेरी/ब्रेसिकेसी
- सरसों की उत्पत्ति- चीन
- सरसों में तेल %- 33-37%
- सरसों में प्रोटीन- 24-30%
2. सोयाबीन
2021-22 के अनुसार
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) बाराँ (2) झालावाड़
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) भीलवाड़ा (2) सवाईमाधोपुर
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) झालावाड़ (2) बाराँ
- सर्वाधिक सिंचित- (1) सवाई माधोपुर (2) बूँदी
कोलेस्ट्रोल रहित तेल।
सर्वाधिक उत्पादन- महाराष्ट्र
सोयाबीन अनुसंधान केन्द्र- बोरखेड़ा (बाँसवाड़ा)
3. होहोबा/जोजोबा
- उपनाम- पीला सोना, डेजर्ट गोल्ड।
- अमेरिका का पौधा।
- भारत में इजराइल के सहयोग से 'एजोर्व' पद्धति के द्वारा झुँझुनूँ में लगाया गया।
फॉर्म
- फतेहपुर (सीकर)
- ढंढ
यह एकलिंगी पादप है।
4. तिल
खरीफ की फसल।
2021-22 के अनुसार
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) पाली (2) सवाईमाधोपुर
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) अलवर (2) भरतपुर
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) पाली (2) सिरोही
- सर्वाधिक सिंचित- (1) जैसलमेर (2) जोधपुर
5. अलसी
2021-22 के अनुसार
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) प्रतापगढ़ (2) झालावाड़
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) करौली (2) बाराँ
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) प्रतापगढ़ (2) झालावाड़
- सर्वाधिक सिंचित- (1) प्रतापगढ़ (2) झालावाड़
6. मैथी
2021-22 के अनुसार
- सर्वाधिक उत्पादन- (1) बीकानेर (2) जोधपुर
- सर्वाधिक उत्पादकता- (1) कोटा (2) प्रतापगढ़
- सर्वाधिक क्षेत्रफल- (1) बीकानेर (2) जोधपुर
- सर्वाधिक सिंचित- (1) बीकानेर (2) जोधपुर
भारत में कृषि क्षेत्र में राजस्थान की भागीदारी
7. सूरजमुखी
- हृदय रोगियों का डॉक्टर
- सूरजमुखी का भारत में आगमन- 1969 ( रूस )
- सूरजमुखी में लिनोलिक + लिनोलेनिक (64%) अम्ल पाया जाता है।
- सूरजमुखी में- असंतृप्त वसीय अम्ल पाया जाता है।
- सूरजमुखी के पुष्प का सूर्य की ओर मुड़ना ऑक्सीजन हार्मोन के कारण।
- सूरजमुखी का वैज्ञानिक नाम- हेलिएथस एनस (ग्रीक भाषा)
- कुल- कम्पोजिटी/एस्टेरेसी
फसलों के रोग
- गेहूँ - लाल सड़न रोग
- जौ - धारीदार रोग, कण्डुआ रोग
- सरसों - किट्ट रोग
- गन्ना - लाल सड़न रोग
- अलसी - किट्ट रोग
- मूंगफली - टिक्का रोग
- ज्वार - तुलासिता रोग
- मक्का - ब्राउन स्पॉट रोग
- अनाज - छाछ्या रोग
- बाजरा - हरित बाली रोग, कण्डुआ रोग
- ज्वार-बाजरा - अरगत रोग
प्रमुख शहरों के उपनाम
| शहरों | उपनाम |
|---|---|
| ❖ धान का कटोरा | छत्तीसगढ़, कृष्णा गोदावरी डेल्टा क्षेत्र |
| ❖ दूध शहर | आनंद, गुजरात |
| ❖ भारत में अण्डों की टोकरी | आंध्रप्रदेश |
| ❖ भारत का रेशम शहर | भागलपुर, बिहार |
| ❖ भारत की काजू राजधानी | कोल्लम, आंध्रप्रदेश |
| ❖ मिर्च शहर | गुण्टुर, आंध्रप्रदेश |
| ❖ भारत की शराब राजधानी (अंगूर शहर) | नासिक, महाराष्ट्र |
| ❖ आमों का शहर | माल्दा, उत्तरप्रदेश |
| ❖ सेबों का शहर | हिमाचल प्रदेश |
| ❖ चाय राज्य | असम |
| ❖ अन्न का कटोरा | उत्तरप्रदेश |
| ❖ सोयाबीन राज्य | मध्यप्रदेश |
| ❖ मसालों का शहर | केरल |
| ❖ कॉफी शहर | कर्नाटक |
| ❖ संतरा शहर | नागपुर, महाराष्ट्र |
प्रमुख फसलों के उत्पादन में तुलनात्मक विवरण
- स्त्रोत- भारत सरकार द्वारा प्रकाशित सांख्यिकी पुस्तिका एक नज़र में वर्ष 2023 के आधार पर।
V. कृषि क्रांतियाँ
कृषि से सम्बन्धित क्रांतियों की सामान्य जानकारी निम्न प्रकार से है :-
हरित क्रान्ति 1966-67
- सर्वाधिक प्रभावित- पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश।
- 'हरित क्रांति' शब्द का प्रयोग डॉक्टर विलियम गैड़ के द्वारा किया गया।
- जनक- नार्मन ई. बोरलॉग - 1970 में नोबेल पुरस्कार
- भारत में जनक- M.S. स्वामीनाथन
नोट- दूसरी हरित क्रांति का संबंध-जैविक खेती से है। श्वेत क्रांति (Operation Flood Revolution) का जनक डॉक्टर वर्गीज कुरियन थे।
कृषि क्षेत्र में अनेक क्रांतियाँ
- हरित क्रांति - खाद्यान्न (गेहूँ) से।
- श्वेत क्रांति - दुग्ध उत्पादन
- नीली क्रांति - मछली पालन
- भूरी क्रांति - उर्वरक उत्पादन
- रजत क्रांति - अण्डा उत्पादन
- पीली क्रांति - सरसों/तिलहन उत्पादन
- बादामी क्रांति - मसाला उत्पादन
- सुनहरी क्रांति - बागवानी, शहद और फलों के उत्पादन से
- गोल क्रांति - आलू उत्पादन
- सदाबहार क्रांति - जैविक खेती
- रजत रेशा क्रांति - कपास उत्पादन
- सुनहरा रेशा क्रांति - जूट उत्पादन
- शिफॉन क्रांति - केसर उत्पादन
- हरित सोना क्रांति - बाँस उत्पादन
- मूक क्रांति - मोटे अनाज उत्पादन
- इंद्रधनुष क्रांति - सभी क्रांतियों पर निगरानी हेतु
- गुलाबी क्रांति - झींगा मछली उत्पादन
- अमृत क्रांति - नदियों को जोड़ने से संबंधित है
- ग्रीन गोल्ड क्रांति - चाय उत्पादन से
- पराभनी क्रांति - भिंडी उत्पादन से
- लाल क्रांति - टमाटर/माँस उत्पादन
विशिष्ट कृषि मंडियाँ
- जीरा मंडी - मेड़ता सिटी व जोधपुर
- प्याज मंडी - अलवर
- अमरूद मंडी - सवाई माधोपुर
- फूल मंडी - पुष्कर (अजमेर)
- लहसुन मंडी - छीपाबड़ौद (बाराँ)
- मिर्च मंडी - टोंक
- किन्नू मंडी - गंगानगर
- ईसबगोल मंडी - भीनमाल (जालौर)
- मूँगफली मंडी - बीकानेर
- दलहन मंडी - मदनगंज, किशनगढ़
- धनिया मंडी - रामगंज
- टमाटर मंडी - जयपुर
- टिण्डा मंडी - जयपुर
- संतरा मंडी - झालावाड़
- मेहंदी मंडी - सोजत
- अश्वगंधा मंडी - झालावाड़
NOTE:- राजस्थान का पहला जैविक जिला- डूंगरपुर राजस्थान का पहला जैविक गाँव- जयसमन्द घाटी (उदयपुर)
VI. प्रमुख फसलों का उत्पादन (2021-22 के अनुसार)
क्षेत्रफल की दृष्टि से खरीफ में बोई गई फसलें 2022-23 के अनुसार निम्न हैं-
| फसल का नाम | प्रथम | द्वितीय |
|---|---|---|
| चावल | बूंदी | हनुमानगढ़ |
| ज्वार | अजमेर | पाली |
| बाजरा | बाड़मेर | जोधपुर |
| मक्का | भीलवाड़ा | उदयपुर |
| मूँग | नागौर | चूरू |
| उड़द | बूंदी | टोंक |
| मोठ | बीकानेर | चूरू |
| चंवला | झुंझुनूँ | सीकर |
| तूर | बाँसवाड़ा | उदयपुर |
| तिल | पाली | सिरोही |
| मूँगफली | बीकानेर | जोधपुर |
| सोयाबीन | झालावाड़ | बाराँ |
| अरंडी | जालौर | बाड़मेर |
| कपास | हनुमानगढ़ | श्रीगंगानगर |
| गन्ना | श्रीगंगानगर | चित्तौड़गढ़ |
| ग्वार | बीकानेर | जैसलमेर |
| मिर्च | सवाईमाधोपुर | जालौर |
उत्पादन (Production) की दृष्टि से खरीफ फसलें 2022-23 के अनुसार
| फसल का नाम | प्रथम | द्वितीय |
|---|---|---|
| चावल | बूँदी | हनुमानगढ़ |
| ज्वार | अजमेर | भीलवाड़ा |
| बाजरा | बाड़मेर | अलवर |
| मक्का | भीलवाड़ा | चित्तौड़गढ़ |
| मूँग | नागौर | जोधपुर |
| उड़द | बूँदी | टोंक |
| मोठ | बाड़मेर | बीकानेर |
| चंवला | झुँझुनूँ | सीकर |
| तूर | उदयपुर | बाँसवाड़ा |
| तिल | पाली | सवाईमाधोपुर |
| मूँगफली | बीकानेर | जोधपुर |
| सोयाबीन | बाराँ | झालावाड़ |
| अरंडी | जालौर | सिरोही |
| कपास | श्रीगंगानगर | हनुमानगढ़ |
| गन्ना | श्रीगंगानगर | चित्तौड़गढ़ |
| ग्वार | बीकानेर | हनुमानगढ़ |
| मिर्च | सवाईमाधोपुर | जालौर |
सर्वाधिक क्षेत्रफल की दृष्टि से रबी में बोई गई फसलें - 2022-23 के अनुसार
| फसल का नाम | प्रथम | द्वितीय |
|---|---|---|
| गेहूँ | हनुमानगढ़ | श्रीगंगानगर |
| जौ | जयपुर | श्रीगंगानगर |
| चना | चूरू | हनुमानगढ़ |
| मटर | जयपुर | नागौर |
| मसूर | झालावाड़ | प्रतापगढ़ |
| तारामीरा | नागौर | बीकानेर |
| अलसी | प्रतापगढ़ | झालावाड़ |
| सूरजमुखी | - | - |
| धनिया | झालावाड़ | कोटा |
| जीरा | बाड़मेर | जोधपुर |
| मैथी | बीकानेर | जोधपुर |
| हल्दी | बूँदी | बीकानेर |
| अदरक | उदयपुर | डूंगरपुर |
| आलू | धौलपुर | भरतपुर |
| प्याज | अलवर | सीकर |
| तम्बाकू | जालौर | अलवर |
| सौँफ | सिरोही | नागौर |
| लहसुन | बाराँ | झालावाड़ |
| अजवाइन | चित्तौड़गढ़ | प्रतापगढ़ |
| ईसबगोल | बाड़मेर | जैसलमेर |
| मेहंदी | पाली | जोधपुर |
सर्वाधिक उत्पादन की दृष्टि से रबी फसलें 2022-23 के अनुसार
| फसल का नाम | प्रथम | द्वितीय |
|---|---|---|
| गेहूँ | हनुमानगढ़ | श्रीगंगानगर |
| जौ | श्रीगंगानगर | जयपुर |
| चना | अजमेर | जयपुर |
| मटर | जयपुर | नागौर |
| मसूर | झालावाड़ | प्रतापगढ़ |
| तारामीरा | जयपुर | पाली |
| अलसी | प्रतापगढ़ | झालावाड़ |
| सूरजमुखी | - | - |
| धनिया | झालावाड़ | कोटा |
| जीरा | जोधपुर | बाड़मेर |
| मैथी | बीकानेर | जोधपुर |
| हल्दी | बीकानेर | बूँदी |
| अदरक | उदयपुर | डूंगरपुर |
| आलू | धौलपुर | हनुमानगढ़ |
| प्याज | जोधपुर | सीकर |
| तम्बाकू | जालौर | अलवर |
| सौंफ | नागौर | सिरोही |
| लहसुन | बाराँ | कोटा |
| अजवाइन | चित्तौड़गढ़ | प्रतापगढ़ |
| ईसबगोल | नागौर | जैसलमेर |
| मेहंदी (हीना) | पाली | जोधपुर |
सर्वाधिक सिंचित क्षेत्रफल की दृष्टि से रबी फसलें 2022-23 के अनुसार
| फसल का नाम | प्रथम | द्वितीय |
|---|---|---|
| गेहूँ | हनुमानगढ़ | श्रीगंगानगर |
| जौ | जयपुर | श्रीगंगानगर |
| चना | बीकानेर | जैसलमेर |
| मटर | जयपुर | नागौर |
| मसूर | झालावाड़ | प्रतापगढ़ |
| तारामीरा | बीकानेर | नागौर |
| अलसी | प्रतापगढ़ | झालावाड़ |
| सूरजमुखी | - | - |
| धनिया | झालावाड़ | कोटा |
| जीरा | बाड़मेर | जोधपुर |
| मैथी | बीकानेर | जोधपुर |
| हल्दी | बूँदी | बीकानेर |
| अदरक | उदयपुर | डूंगरपुर |
| आलू | धौलपुर | भरतपुर |
| प्याज | अलवर | सीकर |
| तम्बाकू | जालौर | अलवर |
| सौँफ | सिरोही | नागौर |
| लहसुन | बाराँ | झालावाड़ |
| अजवाइन | प्रतापगढ़ | चित्तौड़गढ़ |
| ईसबगोल | बाड़मेर | जैसलमेर |
| मेहंदी |
VII. कृषि से संबंधित महत्वपूर्ण योजनाएँ
कृषि क्षेत्र से सम्बन्धित महत्वपूर्ण योजनाओं का वर्गीकरण निम्न हैं:-
1. राष्ट्रीय कृषि विस्तार कार्यक्रम एवं कृषक प्रशिक्षण योजना
उद्देश्य- कृषि से संबंधित योजनाओं का क्रियान्वयन करके किसानों तक पहुँचाना जिससे कि किसान लाभान्वित हो सकें।
कृषि का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण देना।
शुरुआत- 1977 से 1982, सहयोग- विश्व बैंक
2. आइसोपोम योजना
शुरुआत- 2004-05
उद्देश्य- दलहन, तिलहन एवं मक्का की फसल के उत्पादन में वृद्धि करना।
3. अमूल्य नीर योजना
शुरुआत- 2005-06
उद्देश्य- जल का संरक्षण करके उचित प्रयोग करना।
4. राजीव गाँधी कृषक साथी योजना
इसकी शुरूआत 30 अगस्त, 1994 में की गई। 22 दिसम्बर, 2004 को इसका नाम परिवर्तन करके किसान जीवन कल्याण योजना कर दिया गया। फिर से 9 दिसम्बर, 2009 को राजस्थान राजीव गाँधी कृषक साथी सहायता योजना नाम में परिवर्तन कर दिया गया।
उद्देश्य- किसान या खेतीहर मजदूर जो कृषि कार्य करते समय मृत्यु या अंग-भंग हो जाने पर सहयोग राशि प्रदान करना।
5. सहकारी किसान क्रेडिट कार्ड योजना
केन्द्र स्तर पर इसकी शुरूआत अगस्त, 1998 में की गई है, जबकि राजस्थान में प्रथम KCC कार्ड श्री रामनिवास यादव (जयपुर) को दिया गया।
6. सहकारी कृषक सुरक्षा योजना
शुरुआत- 1 सितम्बर, 1998
उद्देश्य- केन्द्रीय सहकारी बैंक के द्वारा या प्राथमिक कृषि सहकारी समिति के ऋणी सदस्यों की दुर्घटना में मृत्यु हो जाने पर आर्थिक सहायता प्रदान करना।
7. राष्ट्रीय औषधीय पादप मिशन (राष्ट्रीय आयुष मिशन)
शुरुआत : 2009-10
उद्देश्य- दवाई उद्योग के लिए कच्चे माल की आपूर्ति रखने के लिए औषधीय पौधों की कृषि को प्रोत्साहन देना।
जैसे- अश्वगंधा, सफेद मूसली, गिलोय, शतावरी, गूगल, ग्वारपाठा, तुलसी, मुलेठी, कोंच इत्यादि।
8. गूगल संरक्षण एवं विकास कार्यक्रम
शुरुआत- 2008-09
उद्देश्य- गूगल एक औषधीय पौधा है तथा इसकी कृषि को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन करना।
9. राष्ट्रीय बम्बू मिशन
शुरुआत- 2007-08
उद्देश्य- बाँस की खेती को बढ़ावा देने के लिए इसकी निम्न जिलों में शुरुआत की गई- सवाईमाधोपुर, झालावाड़, करौली, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, सिरोही, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, बाराँ, भीलवाड़ा, राजसमंद, प्रतापगढ़।
10. राज्य की प्रथम कृषि नीति- जून 2013
उद्देश्य-
- प्रतिवर्ष 4% कृषि की विकास दर को प्राप्त करना।
- खाद्यान्नों के उत्पादन को दोगुना करना
- बागवानी फसलों के उत्पादन में वृद्धि करना एवं बागवानी विपणन संघ का गठन करके निर्यात को बढ़ावा देना।
- कृषि के क्षेत्र में वार्षिक व्यय 6% से बढ़ाकर 10% करना।
- कृषि भूमि का कृषि के क्षेत्र में अधिक उपयोग करना एवं गैर कृषि कार्यों में प्रयोग में ना लेना।
- प्रत्येक ग्राम पंचायत पर कृषि सूचना केन्द्र का निर्माण करना।
- आम लोगों तक खाद्यान्न सुरक्षा उपलब्ध करवाना।
11. महात्मा ज्योतिबा फूले मण्डी श्रमिक कल्याण योजना- 2015
यह योजना प्रदेश की कृषि उपज मण्डी समितियों में कार्यरत अनुज्ञापत्रधारी हम्मालों, पल्लेदारों एवं तुलाईकारों के सहायतार्थ है, जो राज्य की मण्डियों में निर्धारित कार्य कर रहा हो तथा जिसे किसी अन्य स्रोत से वेतन प्राप्त नहीं हो रहा हो। इसलिए इनको निम्न सहायता उपलब्ध करवाने का प्रावधान है। जैसे विवाह के लिए सहायता, प्रसूति सहायता, छात्रवृत्ति/ मेधावी छात्र पुरस्कार योजना, चिकित्सा सहायता इत्यादि।
12. राजस्थान कृषि प्रसंस्करण, कृषि व्यवसाय एवं कृषि निर्यात प्रोत्साहन योजना-2019
इसके उद्देश्य निम्न है:
कृषि क्षेत्र में औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक आपूर्ति श्रृंखला एवं आधारभूत संरचना तैयार करना।
पूँजी निवेश प्रोत्साहन द्वारा कृषि-प्रसंस्करण क्षेत्र की मौजूदा क्षमता में वृद्धि करना।
13. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन एक केन्द्रीय प्रवर्तित स्कीम के रूप में 2007-08 से शुरू किया गया है।
इसका लक्ष्य सतत् आधार पर राज्य में गेहूँ, दलहनी, मोटे अनाज (मक्का व जौ) एवं पौष्टिक अनाज (बाजरा व ज्वार) फसलों की उत्पादकता और उत्पादन को बढ़ाना हैं, जिससे देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
14. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना
शुरूआत - 2016
भारत सरकार द्वारा जारी मार्गदर्शिका अनुसार किया जा रहा हैं, जिसमें खरीफ व रबी फसलों हेतु क्रमशः 2 व 1.5 तथा उद्यानिकी एवं वाणिज्यिक फसलों के लिए 5 प्रतिशत कृषक प्रीमियम निर्धारित किया गया है।
15. जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग
राजस्थान सरकार द्वारा बजट घोषणा वर्ष 2019-20 में "खेती में जान तो सशक्त किसान" की सोच रखते हुए कृषि लागत को कम करने के लिए जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग योजना की घोषणा की गई। प्रारम्भिक अवस्था में राजस्थान राज्य के 03 जिलों (बाँसवाड़ा, टोंक एवं सिरोही) में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में योजना का क्रियान्वयन किया गया।
16. मुख्यमंत्री बीज स्वावलम्बन योजना
किसानों द्वारा स्वयं के उपयोग हेतु उनके खेतों पर गुणवत्तायुक्त उन्नत बीज उत्पादन किये जाने के उद्देश्य से राज्य में "मुख्यमंत्री बीज स्वावलम्बन योजना" (एम.बी.एस.वाई.) वर्ष 2017-18 में प्रारम्भ की गई। राज्य निधि की इस योजना की शुरूआत सर्वप्रथम पायलट प्रोजेक्ट के रूप में कोटा, भीलवाड़ा एवं उदयपुर कृषि खंडों में की गई।
17. कृषक उपहार योजना
कृषि उपज का अधिकतम मूल्य प्रदान करने के लिए ई-नाम पोर्टल 1 जनवरी, 2022 को शुरू किया गया है। यह योजना राज्य के उन सभी व्यक्तियों पर प्रभावी होगी जो अपनी कृषि उपज को ई-नाम के माध्यम से बेचते हैं प्रत्येक ₹ 10 हजार (या इसके गुणक) की बिक्री पर एक कूपन है जो ई-भुगतान पर जारी किया जायेगा।
VIII. राजस्थान में उद्यानिकी विकास
- राज्य में वर्ष 1989-90 में पृथक से उद्यान निदेशालय की स्थापना की गयी।
प्रस्तावित उत्कृष्टता केन्द्र (राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत)
- पपीता उत्कृष्टता केन्द्र, दौसा
- अंजीर उत्कृष्टता केन्द्र, सिरोही
- अमरूद उत्कृष्टता प्रशिक्षण केन्द्र, सवाईमाधोपुर
नोट- राजस्थान खाद्य प्रसंस्करण मिशन (Rajasthan Food Processing Mission) के तहत मधुमक्खी पालन उत्कृष्टता केन्द्र टोंक की स्थापना प्रक्रियाधीन है।
- उद्यानिकी फसल विशेष के सर्वांगीण विकास, प्रशिक्षण एवं उन्नत किस्मों के पौधों की उपलब्धता हेतु राज्य में 9 उत्कृष्टता केन्द्रों की स्थापना की गई हैं।
- राष्ट्रीय बागवानी मिशन योजना के तहत स्थापित उत्कृष्टता केन्द्रः 2012-13
उत्कृष्टता केन्द्र
- अनार (जयपुर)
- सिट्रस/नींबू (नान्ता, कोटा)
- खजूर (सागरभोजका जैसलमेर)
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत स्वीकृत उत्कृष्टता केन्द्रों का विवरण निम्नानुसार है:
- संतरा उत्कृष्टता केन्द्र, झालावाड़ - प्रारम्भ- 2014-15
- आम उत्कृष्टता केन्द्र, खेमरी (धौलपुर) - प्रारम्भ- 2014-15
- अमरूद उत्कृष्टता केन्द्र, देवड़ावास (टोंक) - वर्ष 2014-15 में अमरूद उत्कृष्टता फार्म की स्थापना की गई। इण्डो-इजराइल प्रोजेक्ट के माध्यम से अनार उत्कृष्टता केन्द्र स्थापित किया गया है।
- सब्जी फसलों का उत्कृष्टता केन्द्र, बूंदी- सब्जी उत्कृष्टता केन्द्र वर्ष 2016-17 से प्रारम्भ किया गया।
- सीताफल उत्कृष्टता केन्द्र, चित्तौड़गढ़ - प्रारम्भ- 2016-17
- फूलों का उत्कृष्टता केन्द्र, सवाईमाधोपुर - फूल उत्कृष्टता केन्द्र वर्ष 2016-17 से प्रारम्भ किया गया।
- सेन्टर ऑफ एक्सीलेन्स फॉर ड्रैगन फ्रूट-(ढिढोल, बस्सी (जयपुर ग्रामीण)), जयपुर वर्ष 2016-17 से प्रस्तावित है।
- सेन्टर ऑफ एक्सीलेन्स फॉर मेज- (उदयपुर) वर्ष 2016-17 से प्रस्तावित है।
- सेन्टर ऑफ एक्सीलेन्स फॉर ऑर्गेनिक फार्मिंग - (झालावाड़) वर्ष 2017-18 से प्रस्तावित है।
IX. भारत सरकार की संस्थाएँ जो कृषि विकास के लिए राजस्थान में कार्यरत हैं-
1. भारतीय कृषि अनुसंधान (ICAR)
स्थापना- 16 जुलाई 1929
कार्य-
(1) कृषि अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में विज्ञान एवं तकनीकी कार्यक्रमों को प्रोत्साहन देना।
(2) इसके द्वारा राज्य में कृषि क्षेत्र के विकास हेतु निम्न अनुसंधान केन्द्रों की स्थापना की गई है-
(A) काजरी- जोधपुर
(B) राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान केन्द्र- सेवर (भरतपुर)
(C) केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र उद्यानिकी अनुसंधान केन्द्र- बीकानेर
ICAR के अंतर्गत कार्यरत संस्थान-
केन्द्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, बीकानेर (राजस्थान)
केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर (राजस्थान)
केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर, टोंक
2. इफको (IFFCO)
3 नवम्बर, 1967
कार्य- अच्छी गुणवत्ता वाले उर्वरकों को समय पर उपलब्ध करवाना ताकि कृषि उत्पादन बढ़ सकें।
3. कृभको (KRIBHCO)
स्थापना- 4 मई 1980
कार्य-
(1) अच्छी किस्म के उर्वरक उपलब्ध करवाना
(2) किसानों की फसलों के उत्पादन को बढ़ाना एवं उचित मूल्य दिलवाना तथा कृषि सहकारी समितियों को मजबूत बनाना।
इसके उर्वरक संयंत्र-
(i) हजीरा
(ii) वाराणसी
(iii) लांजा
4. नाबार्ड (NABARD- National Bank for Agriculture Development)
- स्थापना- 12 जुलाई 1982
- यह राष्ट्रीय बैंक अधिनियम- 1981 के तहत् सर्वोच्च संस्था है।
- कृषि के विकास के लिए ग्रामीण एवं कुटीर उद्योगों के विकास के लिए ऋण देने वाली सर्वोच्च संस्था है।
5. चौ. चरण सिंह राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान-दुर्गापुरा (जयपुर)
- स्थापना- 8 अगस्त 1988
- कृषि विपणन क्षेत्र में अनुसंधान, प्रशिक्षण एवं परामर्श देना।
X. राजस्थान की कृषि विकास संस्थाएँ
1. राजस्थान राज्य सहकारी क्रय-विक्रय संघ लिमिटेड (राजफेड): स्थापना- 26 नवम्बर 1957 (मुख्यालय-जयपुर)
कार्य- सहकारी समितियों के माध्यम से किसानों को उचित मूल्य पर उत्पादों की खरीद, बिक्री, कृषि सामान उपलब्ध करवाना।
2. राजस्थान राज्य भंडार व्यवस्था निगम (राजस्थान स्टेट वेयरहाउसिंग कॉर्पोरेशन), मुख्यालय-जयपुर
स्थापना एवं संगठनात्मक ढाँचा - स्थापना 30 दिसम्बर, 1957 को हुई एवं निगम ने वास्तविक रूप में कार्य 24 मार्च, 1958 से प्रारम्भ कर दिया था।
कार्य
- कृषि उपकरण उपलब्ध करवाना।
- कृषि गोदामों एवं भंडार गृह की स्थापना करना ताकि कृषि उत्पादों का रख-रखाव सही हो सके।
3. राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड, मुख्यालय-जयपुर
स्थापना: 6 जून 1974
कार्य
कृषि उपज मण्डी क्षेत्र में सम्पर्क सड़कों का निर्माण कार्य
कृषि विपणन बोर्ड, कृषि विपणन निदेशालय एवं मण्डी कर्मचारियों व अधिकारियों को प्रशिक्षण देना।
4. राजस्थान राज्य बीज प्रमाणीकरण- जयपुर
संस्था- स्थापना- 30 दिसम्बर 1977
कार्य- कृषि उत्पादन विकास के लिए अधिसूचित किस्मों के बीजों का प्रमाणीकरण करना।
5. राजस्थान राज्य बीज निगम- जयपुर
स्थापना- 28 मार्च 1978
कार्य- अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों का विपणन, उत्पादन एवं विधायन करना।
6. कृषि विपणन निदेशालय - जयपुर
स्थापना- 1980
7. श्रीगंगानगर कॉटन कॉम्पलैक्स- श्रीगंगानगर
स्थापना- 1989
8. तिलम संघ लिमिटेड (Rajasthan State Co-Operative Oil Seeds Growers Federation Ltd.): जयपुर
स्थापना- 3 जुलाई 1990
कार्य- राज्य में तिलहनी फसलों के उत्पादन में वृद्धि, सहकारी क्षेत्र में तिलहनों की खरीद एवं उचित मूल्य पर शुद्ध खाद्य तेल उपलब्ध करवाना।
9. राजस्थान राज्य बीज एवं जैविक प्रमाणीकरण संस्था, मुख्यालय - जयपुर
स्थापना- 1977
10. राजस्थान राज्य जैविक प्रमाणीकरण संस्था-जयपुर
स्थापना- 2005
11. किसान कल्याण कोष- जयपुर
स्थापना - 5 जुलाई 2005
संचालन- कृषि विपणन बोर्ड के द्वारा
12. राजस्थान किसान आयोग- जयपुर
स्थापना- फरवरी 2007
कार्य प्रारंभ किया- नवम्बर 2011
उद्देश्य- किसानों को ऋण व्यवस्था, उपज का उचित मूल्य, मण्डी व्यवस्था एवं कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना करने के लिए राज्य सरकार को सिफारिश भेजना।
इसके प्रथम अध्यक्ष : नारायण सिंह।
13. बायोफ्यूल प्राधिकरण
स्थापना- 4 सितम्बर 2005
उद्देश्य- रतनजोत, करंज एवं अन्य तेलीय पौधों की खेती, अनुसंधान, विपणन एवं आधारभूत सुविधाओं का विकास करना है।
XI. कृषि विश्वविद्यालय
1. केशवानंद कृषि विश्वविद्यालय बीछवाल, बीकानेर
स्थापना 01 अगस्त, 1987 को हुई। विश्वविद्यालय के अधीन बीकानेर, अनूपगढ़, हनुमानगढ़, चांदगोठी (चूरू), मण्डावा (झुंझुनूँ) एवं श्रीगंगानगर।
यह पूर्व में सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर का हिस्सा था जो बाद में 01 अगस्त, 1987 में एक अलग इकाई के रूप में स्थापित हुआ। सन् 2010 में पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के रूप में विभाजित हो गया।
2. कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर
स्थापना वर्ष- 2013
विश्वविद्यालय के कार्यक्षेत्र में जोधपुर, फलौदी, बाड़मेर, बालोतरा, पाली, जालौर, सिरोही एवं नागौर डीडवाना-कुचामन का भू-भाग सम्मिलित है।
क्षेत्रफल की दृष्टि से राज्य का 28 प्रतिशत भू-भाग इस विश्वविद्यालय के कार्यक्षेत्र में हैं। इस भू-भाग में औद्योगिकीकरण कम है, कृषि एवं पशुपालन ही आजीविका का मुख्य साधन है।
3. श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय जोबनेर, जयपुर ग्रामीण
श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना 13 सितम्बर, 2013
4. महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर
स्थापना 1 नवम्बर, 1999 में तत्कालीन राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर से विभाजित होने के पश्चात् हुई। आरम्भ में इसका नामकरण कृषि विश्वविद्यालय उदयपुर किया गया जो कि राजस्थान सरकार के 1999 के अध्यादेश की घोषणा द्वारा किया गया जिसने मई 2000 में एक एक्ट का रूप लिया।
वर्तमान में विश्वविद्यालय कार्य क्षेत्र में राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 14.28 प्रतिशत हिस्सा (48.9 लाख हेक्टेयर) है।
वन क्षेत्र का 32.97 प्रतिशत हिस्सा विश्वविद्यालय के कार्य क्षेत्र के अन्तर्गत आता है।
5. कृषि विश्वविद्यालय, कोटा
स्थापना - 14 सितम्बर, 2013
इस विश्वविद्यालय का कार्य क्षेत्र छः जिलों कोटा, बूँदी, बाराँ, झालावाड़, करौली व सवाईमाधोपुर तक विस्तृत है।
इन खण्डों का भौगोलिक क्षेत्रफल 34.37 लाख हैक्टेयर है तथा प्रदेश में इसका 9.98 प्रतिशत हिस्सा है।
राजस्थान में कृषि क्षेत्र के अन्तर्गत जुड़े अन्य संस्थान
निम्न 2-कृषि फार्म कार्यरत हैं:
केन्द्रीय कृषि फार्म-
1. सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर)
- स्थापना - 1956 ई.
- सहयोग - रूस
- यह एशिया का सबसे बड़ा कृषि फार्म है।
2. जैतसर (श्रीगंगानगर)
- स्थापना - 1964-65 ई.
- सहयोग - कनाडा
- राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान केन्द्र- सेवर (भरतपुर)
- राष्ट्रीय ऊँट अनुसंधान केन्द्र- (जोहड़बीड़) बीकानेर
- राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केन्द्र- तबीजी (अजमेर)
- अन्तर्राष्ट्रीय उद्यानिकी नवाचार एवं प्रशिक्षण केन्द्र- जयपुर
- केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान- अविकानगर (टोंक)
- केन्द्रीय शुष्क बागवानी संस्थान- बीकानेर
- केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान- जोधपुर
- केन्द्रीय कृषि फॉर्म- सूरतगढ़ एवं जैतसर (श्रीगंगानगर)
- खजूर टिश्यू कल्चर प्रयोगशाला- जोधपुर
- बेर एवं खजूर अनुसंधान केन्द्र- बीकानेर
- सिंचाई प्रबंध एवं प्रशिक्षण संस्थान- कोटा
- कृषि प्रशिक्षण केन्द्र- टोंक
- कृषि प्रबंधन संस्थान- दुर्गापुरा (जयपुर)
- टर्मिनल मार्केट- मुहाना (जयपुर)
- राजकीय खजूर फार्म सगरा भोजका, जैसलमेर एवं खारा फार्म बीकानेर पर आधारभूत संरचना का निर्माण किया गया है।
- चूरू में खारे पानी की जलीय कृषि प्रयोगशाला स्थापित की गई है।
- खजूर के टिश्यू कल्चर प्रयोगशाला की स्थापना - भविष्य में टिश्यू कल्चर तकनीक से उत्पादित खजूर के पौधों की मांग की पूर्ति हेतु राज्य में विभाग द्वारा निजी जनसहभागिता के आधार पर विश्वस्तरीय खजूर टिश्यू कल्चर प्रयोगशाला की चौपासनी, जोधपुर में स्थापना की गयी है। प्रयोगशाला में खजूर पौध उत्पादन कार्य किया जा रहा है।
XII. कृषि जलवायु प्रदेश/कृषि ग्राह्य परीक्षण केन्द्र
राज्य में निम्न कृषि ग्राह्य परीक्षण केन्द्र (A.T.C.) कार्यरत है-
1. शुष्क पश्चिमी मैदानी क्षेत्र (I-A)
- वर्षा- 200-370 मिलीमीटर (20 से 37 सेंटीमीटर)
- मिट्टी- मरुस्थलीय/बलुई
- विस्तार- बाड़मेर, जोधपुर, बालोतरा, फलौदी
- परीक्षण केन्द्र- रामपुरा (जोधपुर)
- यह राज्य का दूसरा सबसे बड़ा कृषि जलवायु प्रदेश है।
- खरीफ फसलें- बाजरा, मोठ, तिल
- रबी फसलें- गेहूँ, सरसो, जीरा
2. सिंचित उत्तरी-पश्चिमी मैदान प्रदेश (I-B)
- वर्षा- 100 से 350 मिलीमीटर (10 से 35 सेमी.)
- मिट्टी- लवणीयता से युक्त
- विस्तार- श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़
- परीक्षण केन्द्र- श्रीकरणपुर (श्रीगंगानगर) एवं हनुमानगढ़
- राज्य का दूसरा सबसे छोटा कृषि जलवायु खंड।
- इसको नाली एवं बग्गी (उपजाऊ प्रदेश) भी कहते हैं।
- इस क्षेत्र में सेम की समस्या भी सर्वाधिक है।
- राज्य में सर्वाधिक आंधियाँ इसी कृषि जलवायु प्रदेश में चलती है।
- यह राज्य के अर्द्ध-शुष्क जलवायु प्रदेश का हिस्सा माना जाता है।
- खरीफ फसलें- कपास, ग्वार
- रबी फसलें- गेहूं, सरसों, चना
3. शुष्क मैदानी पश्चिमी क्षेत्र (I-C)
- वर्षा- 100 से 350 मिलीमीटर (10 से 35 सेमी.)
- मिट्टी- इसमें भी मरुस्थलीय/बलुई मृदा
- विस्तार- बीकानेर, जैसलमेर, चूरू आंशिक (सरदार शहर, सुजानगढ़, रतनगढ़, बीदासर तहसील)
- परीक्षण केन्द्र- लूणकरणसर (बीकानेर)
- यह राज्य का सबसे बड़ा कृषि जलवायु प्रदेश है।
- खरीफ फसलें- बाजरा, मोठ, ग्वार
- रबी फसलें- गेहूं, सरसों, चना
4. अन्तः स्थलीय जलोत्सरण अर्न्तवर्ती मैदानी क्षेत्र (II-A)
- वर्षा- 300 से 500 मिलीमीटर (30 से 50 सेमी.)
- मिट्टी- भूरी रेतीली/भूरी पीली मिट्टी/सीरोजम
- विस्तार- नागौर, सीकर, चूरू (सरदारशहर, सुजानगढ़, रतनगढ़, बीदासर तहसील को छोड़कर), झुंझुनूं, डीडवाना-कुचामन
- परीक्षण केन्द्र- आबूसर (झुंझुनूं)
- इस कृषि जलवायु प्रदेश को 'बागर' के नाम से भी जाना जाता है।
- इसमें सर्वाधिक बरखान (शेखावाटी प्रदेश) भी मिलते हैं।
- इसमें स्थानीय भाषा में कुओं को जोहड़ कहते है।
- खरीफ फसलें- बाजरा, ग्वार, दलहन
- रबी फसलें- सरसों, चना
5. लूनी नदी का मैदानी प्रदेश (II-B)
- वर्षा- 300 से 500 मिलीमीटर (30 से 50 सेमी.)
- मिट्टी- भूरी दोमट मिट्टी
- विस्तार- जालौर, पाली, सिरोही (पिण्डवाड़ा, आबूरोड़ तहसील को छोड़कर) एवं ब्यावर आंशिक (जैतारण, रायपुर तहसील) आता है।
- परीक्षण केन्द्र- सुमेरपुर (पाली)
- यह प्रदेश अर्द्ध शुष्क प्रदेश में आता है एवं इसको गौड़वार प्रदेश भी कहते हैं।
- खरीफ फसलें- बाजरा, ग्वार, तिल
- रबी फसलें- गेहूं, सरसों
6. अर्द्ध-शुष्क पूर्वी मैदानी प्रदेश (III-A)
- वर्षा- 500-700 मिलीमीटर (50-70 सेमी.)
- मिट्टी- सामान्यतः लाल-पीली मिट्टी
- विस्तार- जयपुर, कोटपूतली-बहरोड़, ब्यावर (जैतारण, रायपुर तहसील को छोड़कर) खैरथल- तिजारा, अजमेर, दौसा, टोंक।
- परीक्षण केन्द्र- तबीजी (अजमेर)
- खरीफ फसलें- बाजरा, ग्वार, ज्वार
- रबी फसलें- गेहूं, सरसों, चना
7. बाढ़ सम्भाव्य पूर्वी मैदानी प्रदेश- (III-B)
- वर्षा- 500-700 मिलीमीटर (50-70 सेमी.)
- मिट्टी- जलोढ़ मिट्टी (सर्वाधिक उपजाऊ)
- विस्तार- अलवर, डीग, भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवाई माधोपुर
- परीक्षण केन्द्र- मलिकपुर (भरतपुर)
- खरीफ फसलें- बाजरा, ग्वार, मूंगफली
- रबी फसलें- गेहूं, जौ, सरसों, चना
8. अर्द्ध-आर्द्र दक्षिणी मैदानी/अरावली पर्वतीय क्षेत्र (IV-A)
- वर्षा- 500-900 मिलीमीटर (50 से 90 सेमी.)
- मिट्टी- पर्वतीय मिट्टी
- विस्तार- भीलवाड़ा, राजसमंद, चित्तौड़गढ़ (बड़ी सादड़ी तहसील छोड़कर), उदयपुर एवं सिरोही आंशिक (पिण्डवाड़ा एवं आबूरोड़ तहसील)
- परीक्षण केन्द्र- चित्तौड़गढ़
- राज्य का सबसे छोटा कृषि जलवायु खंड।
- खरीफ फसलें- मक्का दलहन, ज्वार
- रबी फसलें- गेहूं, चना
9. आर्द्र दक्षिणी मैदानी क्षेत्र (IV-B)
- वर्षा- 500 से 1100 मिलीमीटर (50 से 110 सेमी.)
- मिट्टी- लाल लोमी मिट्टी
- विस्तार- बाँसवाड़ा, सलूम्बर, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़ (बड़ी सादड़ी तहसील)
- परीक्षण केन्द्र- परीक्षण केन्द्र कार्यरत नहीं है।
- खरीफ फसलें- मक्का, धान, ज्वार, उड़द
- रबी फसलें- गेहूं, चना
10. आर्द्र दक्षिणी-पूर्वी मैदानी क्षेत्र (V)
- वर्षा- 650 से 1000 मिलीमीटर (65 से 100 सेमी.)
- मिट्टी- मध्यम काली मिट्टी
- विस्तार- कोटा, बूंदी, झालावाड़, बाराँ
- परीक्षण केन्द्र- छत्रपुरा (बूंदी)
- खरीफ फसलें- ज्वार, सोयाबीन
- रबी फसलें- गेहूं, सरसों




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