राजस्थान में सूखा, अकाल एवं पारिस्थितिकी तंत्र

राजस्थान में सूखा, अकाल एवं पारिस्थितिकी तंत्र

इस लेख में राजस्थान में सूखा, अकाल और पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तृत विश्लेषण दिया गया है। इसमें अकाल के प्रकार, प्रमुख सरकारी योजनाएं (जैसे सूखा संभाव्य व मरु विकास कार्यक्रम) और जायका (JICA) जैसी नवीनतम परियोजनाओं की जानकारी शामिल है। यह सामग्री RAS, REET, CET और राजस्थान पुलिस जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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  • आपदा घटित होने पर त्वरित कार्यवाही एवं मॉनिटरिंग करने हेतु ‘‘आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली- 112’’ राज्य में टोल फ्री नम्बर 112 पर आपदा से संबंधित कॉल हेतु राज्य आपातकालीन परिचालन केन्द्र शासन सचिवालय, जयपुर में स्थापित किया गया।
  • जब किसी क्षेत्र में लम्बे समय तक वर्षा कम होती है या नहीं होती है, तो इसे सूखा कहते हैं।
  • सूखे के कारण अन्न, जल तथा चारे की कमी हो जाती है, जिसे अकाल कहते हैं।

सूखे के निम्न 2 प्रकार हैं-
  1. सामान्य सूखा- इसमें औसत वर्षा 25 सेमी से कम होती है।
  2. प्रचंड सूखा- इसमें 500% से कम वर्षा होती है।

सूखे के अन्य प्रकार जैसे-
  • जल संबंधित सूखा-इसमें भू-जल स्तर का लगातार घटना, जलाशयों के सूखने से पानी की कमी होती है।
  • मौसम विज्ञान संबंधित सूखा-अपर्याप्त, अनियमित, अनिश्चित वर्षा का होना।
  • कृषि संबंधित सूखा-अन्न, चारा की कमी होना।
  • पारिस्थितिक सूखा-पारिस्थितिक तंत्र में जल की कमी होने से भूमि की उत्पादकता में कमी हो जाना।

राजस्थान के पारिस्थितिकी तंत्र- 04 भाग

1. मरुस्थल
  • तापमान उच्च
  • वनों का अभाव
  • अम्लीयता एवं क्षारीयता

2. अरावली
  • मरूस्थल को नियंत्रित
  • यह तंत्र अवशिष्ट है अर्थात् अंतराल है

3. पूर्वी मैदान
  • वर्षा के कारण भूमि कटाव
  • नगरीकरण में सर्वाधिक वृद्धि

4. हाड़ौती क्षेत्र
  • बीहड़ का क्षेत्र
  • सर्वाधिक अवनलिका अपरदन

अकाल के प्रभाव के संबंध में विभिन्न योजना/कार्यक्रम

केन्द्र की योजना
1. सूखा संभाव्य कार्यक्रम- 1974-75 - राज्य (25%), केन्द्र (75%)

उद्देश्य
  • प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग
  • भूमि की उत्पादकता को बढ़ावा
  • सूखे के प्रभाव को कम करने के लिए लोक-नियोजन योजना को लागू करना

2. मरु विकास कार्यक्रम- 1977-78 - राज्य (25%), केन्द्र-75%

उद्देश्य
मरुस्थलीकरण को सीमित करने के लिए वृक्षारोपण करना।
सामाजिक वानिकी, वन विकास तथा चारागाह का विकास करना।

3. कंदरा सुधार कार्यक्रम- 1987-88
यह निम्न जिलों में संचालित है- कोटा, बूंदी, बाराँ, झालावाड़, करौली, सवाई माधोपुर, धौलपुर, भरतपुर, गंगापुर सिटी

4. जलग्रहण विकास कार्यक्रम- 1995

5. जीवन धारा योजना- 1996-97

6. मरु गोचर विकास योजना- 2002-2003 - राज्य (25%), केन्द्र (75%)

  • प्राकृतिक आपदा कोष- 1990-91
  • राज्य आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण- सितम्बर, 2007 इसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं।
  • जिला आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण-1 सितम्बर, 2023
  • काम के बदले अनाज योजना-नवम्बर, 2004
  • टिड्डी चेतावनी संगठन-जोधपुर

राज्य सरकार की योजना

1. मेवात क्षेत्रीय विकास योजना- 1986-87 - 3 जिले-अलवर, डीग, खैरथल-तिजारा

2. डांग क्षेत्रीय विकास योजना- 2005-06

इसमें निम्न जिले हैं- कोटा, बूंदी, बाराँ, झालावाड़, करौली, सवाई माधोपुर, धौलपुर, भरतपुर

3. मगरा विकास कार्यक्रम- 2005-06
इसमें निम्न जिले हैं- ब्यावर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, राजसमंद, पाली

प्रदूषण

जल प्रदूषण
  • रंगाई-छपाई के कारण जैसे- बांडी नदी, लूनी नदी
  • औद्योगिकीकरण के कारण चम्बल नदी प्रदूषित

वायु प्रदूषण
  • वाहन के कारण- जयपुर, कोटा, अजमेर, जोधपुर
  • औद्योगिकीकरण के कारण- जयपुर, कोटा, अलवर, अजमेर, किशनगढ़, पाली

भू-प्रदूषण
  • नगरपालिका का कचरा
  • कृषि रसायनों का प्रयोग
  • औद्योगिक इकाइयाँ

राजस्थान जलवायु परिवर्तन प्रतिक्रिया और पारिस्थितिकी तंत्र सेवा संवर्धन- जायका

यह परियोजना जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (जेआईसीए) द्वारा वित्त पोषित है। यह परियोजना अक्टूबर, 2024 से प्रभावी है और मार्च, 2025 तक पूर्ण होने वाली है। विकास गतिविधियाँ राजस्थान के 19 जिलों अजमेर, बाड़मेर, बाँसवाड़ा, बीकानेर, चूरू, चित्तौड़गढ़, डूंगरपुर, जयपुर, जैसलमेर, जालौर, झुंझुनूँ, जोधपुर, नागौर, पाली, प्रतापगढ़, सीकर, सिरोही, राजसमंद और उदयपुर में क्रियान्वित की जायेगी।

उद्देश्य
  • कृषि-वानिकी कार्य: ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और वनस्पति के मिश्रण से जीवन यापन को बढ़ावा देना और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखना।
  • राज्य पक्षी, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का संरक्षण: इस गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजाति के संरक्षण के लिए जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में विशेष योजनाएँ लागू करना।
  • ओरण (पवित्र वन) संरक्षण: पश्चिमी मिलों में 10,000 हेक्टेयर पवित्र उपवनों के पारिस्थितिक और सांस्कृतिक महत्त्व को संरक्षित करने के लिए संरक्षण उपाय करना।
  • पौधों के सूक्ष्म रिजर्व का निर्माण: 3,000 हेक्टेयर में दुर्लभ और संकटग्रस्त (आरईटी) पौधों की प्रजातियों के संरक्षण के लिए सूक्ष्म रिजर्व की स्थापना करना।
  • जैव विविधता प्रबंधन समितियों (बीएमसी) को सशक्त करना: 140 जैव विविधता प्रबंधन समितियों के लिए प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराकर जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा देना।

हरित विकास के लिए राज्य द्वारा की गई पहलें
राजस्थान भारत में सबसे बड़े मरूस्थलीय क्षेत्र में होने के कारण जल संकट, मरूस्थलीकरण, अत्यधिक तापमान, निम्न आर्थिक-विकास एवं जीवन स्तर जैसी चुनौतियों का सामना करता है। सतत विकास, दीर्घकालिक स्थायित्व और जीवन की गुणवत्ता के लिए अत्यंत आवश्यक है। हरित विकास की रणनीति तैयार करना राज्य की मरूस्थलीय पारिस्थितिकी को संरक्षित करने, भूमि क्षरण को नियंत्रित करने तथा जैव विविधता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

हरित विकास के लिए राज्य की प्रमुख नीतियां
  • (i) राज्य ने अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए राजस्थान एकीकृत स्वच्छ ऊर्जा नीति - 2024 जारी की है। इसे भारत की वर्ष 2070 तक के शुद्ध-शून्य कार्बन उत्सर्जन प्रतिबद्धता से संबद्ध किया गया है।
  • (ii) राज्य में ई-वेस्ट प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए ई-वेस्ट प्रबंधन नीति-2023 जारी की गई है।
  • (iii) जलवायु परिवर्तन से निपटने तथा प्राकृतिक संसाधनों के संधारणीय उपयोग को बढ़ावा देने के लिए जलवायु परिवर्तन नीति- 2023 जारी की गई हैं।
  • (vi) सतत परिवहन को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक रणनीति के साथ, राजस्थान इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी (आर.ई.वी.पी.)- 2022 अगले पाँच वर्षों के लिए जारी की गई है। राज्य में इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाये जाने को बढ़ावा देने के लिए इलेक्ट्रिक व्हीकल नीति के अन्तर्गत ₹200 करोड़ का ई-व्हीकल प्रोत्साहन कोष स्थापित करने हेतु 14 नवम्बर, 2024 को आदेश जारी किये गये।

वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन क्षेत्र संबंधी प्रमुख पहलें एवं योजनाएँ:
पिछले कुछ दशकों में तीव्र औद्योगीकरण एवं शहरीकरण की ओर अग्रसर आर्थिक विकास-उन्मुख दृष्टिकोण के कारण वैश्विक रूप से विभिन्न पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। राजस्थान में पिछले कुछ दशकों में खनन क्षेत्र, औद्योगिक विकास एवं शहरी विकास में तीव्र वृद्धि देखी गई है। पर्यावरण एवं वन क्षेत्र की प्रमुख पहलें एवं योजनाएँ इस प्रकार है-
  • (i) माननीय प्रधानमंत्री द्वारा वृक्षारोपण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान प्रारंभ किया गया है। इस अभियान के अन्तर्गत, मेरी लाइफ पोर्टल (merilife.nic.in) के अनुसार, राज्य द्वारा 3 करोड़ के लक्ष्य के विरूद्ध 5.62 करोड़ पौधरोपण किये गये।
  • (ii) राजस्थान ग्रीनिंग एवं रीवाइल्डिंग मिशन के अंतर्गत वर्ष 2023-24 में ट्री आउटसाइड फॉरेस्ट राजस्थान (टी.ओ.एफ.आर.) योजना शुरू की गई। इस योजना का उद्देश्य वन क्षेत्र के बाहर प्रतिवर्ष 5 करोड़ पौधे लगाकर हरियाली को बढ़ाना है। इनमें से 1 करोड़ पौधे गोचर, ओरण तथा घास के मैदानों के लिए 1 करोड़ शहरी क्षेत्रों के लिए तथा 3 करोड़ पौधे घरों एवं खेतों में लगाने हेतु सार्वजनिक वितरण के लिए आवंटित किए गए है। दिसम्बर, 2024 तक 400 लाख के लक्ष्य के विरुद्ध 409.41 लाख पौधे वितरित किये गये है।
  • (iii) ईको-टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए, प्रत्येक जिले में 2 लव कुश वाटिकाएँ विकसित की जाएगी, जिनमें मनोरंजन गतिविधियाँ , पैदल पथ, जलाशय, पक्षी दर्शन आदि की सुविधाएँ होंगी।
  • (iv) बीस सूत्री कार्यक्रम के अन्तर्गत सार्वजनिक एवं वन भूमि क्षेत्र में वृक्षारोपण किया गया।
  • (v) संयुक्त वन कार्यक्रम के अन्तर्गत वन सुरक्षा एवं प्रबंधन समितियों/पारिस्थितिकी विकास समितियों द्वारा वन भूमि की सुरक्षा एवं प्रबंधन किया जा रहा है।
  • (vi) वर्ल्ड फोरेस्ट्री अबोरिटम, जयपुर की तर्ज पर जोधपुर, बीकानेर, कोटा, उदयपुर, भरतपुर एवं अजमेर में वनस्पति उद्यान विकसित किए जा रहे है।
  • (vii) राज्य में 91 वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन (45 मैनुअल स्टेशन एवं 46 सतत परिवेशी वायु गुणवत्ता स्टेशन) स्थापित किये गये है।
  • (viii) वायु गुणवत्ता सूचकांक हेतु पूर्व चेतावनी प्रणाली जयपुर में क्रियाशील है।

आपदा प्रबन्धन, सहायता एवं नागरिक सुरक्षा विभाग, जयपुर

  • राज्य आपदा मोचन निधि: शुरुआत- 1 अप्रैल, 2024
  • राजस्थान राज्य का अधिकांश भाग रेगिस्तानी एवं कम वर्षा वाला है। जिसमें से ग्रामीण क्षेत्रों की जनसंख्या 515.00 लाख है तथा शहरी क्षेत्र की जनसंख्या 170.48 लाख है। जनसंख्या का औसत घनत्व 200 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। राज्य की जनसंख्या का लगभग 75.13 प्रतिशत ग्रामीण व 24.87 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में निवास करता है।
  • राजस्थान के निवासियों को किसी न किसी रूप में लगभग हमेशा ही अकाल का सामना करना पड़ता रहा है। राजस्थान बनने के पश्चात केवल वर्ष 1959-60, 1973-74, 1975-76, 1976-77, 1990-91 व 1994-95 को छोड़कर अन्य वर्षों में अकाल की स्थिति राज्य के किसी न किसी भाग में कमोबेश लगातार विद्यमान रही है।
  • वर्ष 2018-19 के समंकों के अनुसार प्रदेश में सकल बोये गये 253.13 लाख हैक्टेयर भूमि में से 110.21 लाख हैक्टेयर ही सकल सिंचित भूमि है। राज्य में शुद्ध सिंचित क्षेत्र की 80.86 लाख हैक्टेयर (97.62 प्रतिशत) भूमि कुओं, नलकूपों तथा नहरों से सिंचाई की जाती है।

विभाग की स्थापना एवं गठन

  • सहायता विभाग की स्थापना राज्य सरकार के आदेश दिनांक 24.10.1951 के द्वारा सहायता आयुक्त के कार्यालय की स्थापना के साथ हुई।
  • आपदा प्रबन्धन अधिनियम, 2005 राज्य में अगस्त 1, 2007 से लागू होने के फलस्वरूप विभाग के कार्य में व्यापक दृष्टिकोण एवं नये परिप्रेक्ष्य में आपदा प्रबन्धन के कार्य, जिसमें आपदा से बचाव व राहत प्रदान करने के स्थान पर आपदा पूर्व योजनाबद्ध तरीके से रोकथाम के उपाय, आपदाओं के प्रभाव को न्यूनतम करने के उपाय एवं इस सम्बन्धी सभी अग्रिम आवश्यक तैयारियाँ करना और आपदा आने पर बचाव, राहत एवं पुनर्वास कार्य प्रभावशाली तरीके से संचालित करना है।
  • उपनिवेशन विभाग - राजस्थान राज्य में उपनिवेशन क्षेत्र में स्थित भूमियों को व्यवस्थित व सुचारू रूप से विकास कर आवंटन करने, सुदूर बीहड़ क्षेत्रों को आबाद करने एवं सुव्यवस्थित प्रशासन के लिए उपनिवेशन विभाग का मई, 1955 में सृजन किया गया था।
  • भू-सर्वेक्षण : भू-सर्वेक्षण का कार्य सर्वप्रथम अक्टूबर, 1956 में राजस्व विभाग द्वारा तहसील हनुमानगढ़, रायसिंहनगर, सूरतगढ़, अनूपगढ़ एवं नोहर से प्रारम्भ किया गया था।

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

राजस्थान की ऐतिहासिक विरासत और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को RPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।